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मेघदूत

26 October 2023

28 दर्शितम् 28

समर्पणम्
स्निग्धामुदारमधुरांविलसत्प्रसादां
विश्रामधामपुलिनाविशदार्थधाराम् ।
माराधयामि कविराजसरस्वतीं ताम् ॥ १॥
श्री कालिदासरसपिच्छिलकाच्यमार्गे
शिशुत्वमेव । जानन्नपि स्फुटमिदं पुनरेव गन्तु
मालम्ब्य सद्गुरुकराङ्गुलिमुद्यतोऽस्मि ॥ २ ॥
स्वाभाविकं स्खलनमेव पदे पदे मे
सम्भाव्यते यदपि दुर्जनहासहेतुः ।
स्मृत्वा सतां परमपार कृपामकम्पा-
माश्वासनादकरवं ललितार्यटीका ॥ ३ ॥
श्रोतुर्विमुग्धमतिविभ्रममारहन्तीं
चित्रो पटीमिव नटीमिव नाटकस्य ।
वाचं निवेदयति सो विपुला लक्ष्मी
स्मेराननं तमनिशं गुरुमानतोऽस्मि ॥ ४ ॥
कीर्तिधुरि-स्फुरति नामनि यस्य शश्व-
दानन्द एवं चरमावयवं विभति ।
तस्मै सुधीन्द्रतिलकाय सुदेशिकाय
टीकामिमामुपहरत्यथ वैद्यनाथः ॥ ५ ॥

-: व्याख्यातुमङ्गलाचरणम् :-
शृङ्गार- दैवतमनन्तगुणाभिरामं
रामानुजं हृदयरञ्जनमञ्जनाभम् ।
नेत्रामृतं निरुपमं वृषभानुजाया दन्तेव सत्स्वतुलवत्सलमेव सत्सु ।
आन्वीक्षिकीहृदयवल्लभमाकी- मन्दाभिधं गुरुवरं प्रणमामि भक्त्या ॥ २ ॥
यस्मिन् प्रसीदति निषीदति भाग्यलक्ष्मी- रुत्सृज्य दैवहतकं गमनोत्सुकापि ।
जागत सुप्तनियतिः शरणागतानां तं पूज्यपूजितगुरु शरणं प्रपद्ये ॥ ३ ॥
श्रीमत्कवीन्द्रकलकीतिकृताग्रदूतं शश्वद्रसोमिशतमेदुरमेषदूतम्
व्याख्यातुमाश्रयति सद्गुरुदत्तवियां हृयामवद्यरहितामिह वैद्यनाथः ॥ ४ ॥ 1
वान्तापहं किमपि धाम नमामि कृष्णम् ।। १ ।।
विद्याविनोदरसिकं मधुरं निसर्गा-

भूमिका
संस्कृत साहित्य से सम्बद्ध ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो स्वनामधन्य सर्व- मूर्धन्य कवि एवं मुनिपुण नाटककार कविकुलगुरु "कालिदास" को न जानता हो जिनका पr: सौरभ शकुन्तलानाटक के माध्यम से समस्त विश्व को सुवा- 1 सित कर रहा है, जिनकी काव्य-मधुरिमा पर क्या प्राव्य और क्या भारतीय समस्त सहृदयगण खट्ट हैं "कविकुलमूर्धन्य" नाम वाली पगड़ी जिनके सम्पर्क में सार्थक हुई उन कविकुल-सुधाकर "कालिदास" को कौन नहीं जानता है आपकी प्रतिभा सर्वतोमुखी है, सडकाव्य, महाकाव्य और नाटक सर्वत्र ही आपकी कवित्व शक्ति पूर्णरूप से परिचय दिलाई पड़ती है। आप भारत के ही नहीं अपितु समस्त विश्व के महाकवियों में सर्वप्रथम गिने जाने वाले महाकवि हैं। काव्य के तीनों विधानों में आपके समान विश्व का कोई भी कवि ऐसा मनोरम काव्य-प्रणयन नहीं कर सका। प्रकृति के मनोरम चित्रण करने में एवं अपनी रचनाओं के पात्रों के चरित्र का असाधारण चित्रण करने में महाकवि द्वितीय हैं। इनकी रचनाओं में नाट्यकला की सुन्दरता का अय- लोकन कीजिए या महाकाव्य का वर्णन सौन्दर्य देखिये अथवा गीतिकाव्य के सरस करण हृदयोद्गारों का मानन्य लीजिए, सब उपर्युपरि है महाकवि में वह अप्रतिम चमत्कार है जिस पर समस्त विश्व आर्यान्वित हो रहा है, इनमें ऐसी ब्रह्माण्डानि सर्वातिशायिनी प्रतिभा है जिसका एकत्र समागम संसार में दुष्प्राप्य है। आध्यात्मिक रहस्य का ऐसा सरस प्रतिपादन अन्यत्र दुर्लभ है। इनकी शान्तिप्रदायिनी उपदेशमयी कविताको मुदी जिज्ञासुजन के जिज्ञासातल हृदय को आनन्द सागर की लहरों में ऐसा दुबो देती है कि उससे निकलने का नाम नहीं लेना चाहता। इनकी कविता में अपनी शकुन्तला की तरह बना- प्रात पुष्प की ताजगी, अखण्डित किसलयों की कोमलता, अनास्वादित रस का माधुर्य तथा अखण्ड सौभाग्यशाली पुष्पों के फल की पवित्रता आदि का समवाय मिलता है। इस कलाकार की कला में केवल रसिकता ही नहीं अपितु समाज- विज्ञान का भी अपूर्व एवं अद्भुत दर्शन होता है। संस्कृत साहित्य के एकमात्र


कालिदास ही ऐसे कवि है जिन्होंने अपनी कविता में अपने युग का का रूपायित किया है (बाण को छोड़कर)। इनका काव्य भारत के प्राचीन इतिहास के देदीप्यमान युग का प्रकाश स्तम्भ और पौराणिक ब्राह्मणधर्म तथा वर्णाश्रम धर्म का वास्तविक प्रतीक है।
जीवन दुःख है कि हम अपने इस महाकवि के जीवन के विषय में 'इदमित्यम्' नहीं कह सकते क्योंकि ऐसा कोई निश्चयात्मक प्रमाण उपलब्ध नहीं हो सका है। महाकवि स्वयं इतने बड़े निरभिमानी थे कि अपने सम्बन्ध में इन्होंने नाम के प्रयोग को छोड़कर और कुछ लिखा ही नहीं आत्मश्लाचा से से कितनी दूर रहते थे एवं ये कितने विनम्र थे इसका परिचय हमें इनके रघुवंश महाकाव्य के निम्नलिखित पद्यों में मिलता है-
सूर्यप्रभवो वंशः पापविषया मतिः । तितीर्षुदुस्तरं मोहादुडुपेनाऽस्मि सागरम् ॥ मन्दः कवियणः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् । प्रांशुल फले लोभादुद्वाहुरिव वामनः । रघुणामयं वक्ष्ये अनुवाग्विभवोऽपि सन् । तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः । (रघु०, १ - २३९॥ )
अतः ये कब और कहाँ उत्पन्न हुए? ऐसे महारत्न का जन्म किस स्तुत्य दम्पति ने दिया एवं ये कब परलोक सिधारे इन सब दातों का समुचित एवं सन्तोषप्रद उत्तर हमें नहीं प्राप्त हो सका है।
ऐसी जनश्रुति है कि महाकवि पहले महामूर्ख थे। किसी शारदानन्द नामक राजा की पुत्री विद्योतमा विदुषी एवं परम सुन्दरी थी अपनी विद्या के गर्व के कारण उसने 'शास्त्रार्थ में जो पुरुष मुझे परास्त करेगा उसी से मैं अपना विवाह करूंगी' ऐसी प्रतिज्ञा कर ली थी तात्कालिक विद्वान् लोग उससे परास्त होकर ईर्ष्यावश उसका दर्प-भंग करने के लिए उसका विवाह किसी महामूर्ख से कराना चाहते थे, और सब मिलकर ऐसे मूर्ख को खोजने लगे। कहा जाता है कि कालिदास वृक्ष की डाल पर बैठकर उसी डाल को इस तरह काट रहे थे जिससे उसके कटने पर डाल सहित कालिदास भी धराशायी हो जाते । पण्डितों ने इनकी कार्यवाही को देखा और इन्हें महामूर्ख समझकर इन्हें नीचे उतरवाकर 'हमलोग तुम्हारा विवाह एक पर सुन्दरी राजकुमारी से

करवा देंगे तुम कुछ न बोलना हमलोग राजसभा में तुम्हारा परिचय ये हमारे गुरुजी है इस तरह देंगे इत्यादि बातें समझाकर अपने साथ ले गये। राज- सभा में जाकर ने इनका पूर्वनियोजित ढंग से परिचय दिया तथा शास्त्रार्य के लिए राजकुमारी को कहा एवं यह भी सूचित कर दिया कि इस समय हमारे पूज्य गुरुवर ने मौन व्रत ले रखा है अतः शास्त्रार्थं साङ्केतिक ( इवारों से ) होगा ।' शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। विद्योत्तमा ने 'ईश्वर एक है' इस अभिप्राय से अपनी एक अंगुली उठाकर गुरुजी की तरफ दिखाया। गुरुजी ने 'यह मेरी एक आँख फोड़ने का संकेत कर रही है ऐसा समझकर तुम्हारी दोनों फोड़ दूँगा' इन अभिप्राय से अपनी दो अंगुली ऊपर उठाकर राजकुमारी को दिखाया। इस पर गुरु के ऐसा तर्क प्रस्तुत किया कि विद्योत्तमा को परास्त होना पड़ा । अन्ततः एकजुट होकर इनका विवाह राजकुमारी से हो गया। कहा जाता है कि सुहागरात के शुभावसर पर बाहर कोई 'ऊँट' चिल्लाया और विनोद के लिए राजकुमारी ने अपने पति मे किमिदम् ( यह क्या है ? ऐसा पुला। उस मूर्ख ने पत्नी के प्रश्न को सुनकर घबराकर या उच्चारण की असमर्थता से 'उद्रोऽयम्' ऐसा उत्तर दिया। राजकुमारी पण्डितों के यन्त्र को समझकर अपने दुर्भाग्य पर पाती हुई पति महोदय को अपमानित कर राजभवन से निकाल दिया। उस मूर्ख के लिए पत्नी का अपमान असह्य था अतः उसने विद्या प्राप्ति के लिए किसी 'काली मन्दिर' में जाकर आमरण उपासना प्रारम्भ कर दी। काली ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा, उस मूर्ख ने 'कवित्वपूर्ण विद्या दो' ऐसा बर माँगा भगवती के 'एवमस्तु' ऐसा कहकर अन्तर्धान हो जाने पर वह मूर्ख तत्क्षणशास्त्र का पारङ्गत एवं अद्वितीय प्रतिभासम्पन्न विद्वान् हो गया। काली की उपासना के फलस्वरूप उन्हें विद्या मिली अतः उनका नाम 'कालिदास' पड़ा, ऐसा भी सुना जाता है। आगे यह भी किंवदन्ती है कि वरदान मिल जाने पर कालिदास को अपनी पत्नी के द्वारा किया गया अपमान भी स्मरण हो बाया और उसका बदला लेने वे घर की ओर चले। जिस समय वे पर पहुंचे यह समय सम्भवत: रात का समय था अतः पर का द्वार बन्द था, उन्होंने बाहर से आवाज लगायी 'अनावृतकपाट द्वारे देहि (वन्द किवार खोलो)। विद्योत्तमा पति के स्वर से परिचित थी एवं पति की मूर्खता से भी, अतः उसने सायं पूछा-

'अस्ति कचिद्वाग्विशेषः' (क्या वाणी की कुछ विशेषता है ?) महाकवि ने पत्नी के विद्याभिमान का मर्दन करने के लिए उसके द्वारा प्रयुक्त वाक्य के तीन पदों को लेकर तीन काव्यों का निर्माण किया जो संस्कृत साहित्य के अनूठे काव्य है। जैसे कि 'अस्ति' इस menin को लेकर 'अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'कुमारसंभव' महाकाव्य "कचित्' इस वाक्यांश को लेकर कश्चित् कान्ताविरहगुरुणा' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला नेवदूत' नामक खण्डकाव्य तथा 'वाकू' इस वाक्यांश को लेकर 'वागर्थाविव सम्पृक्तो' इस चरण से प्रारम्भ होने वाला 'रघुवंश' महाकाव्य यह बहुत प्रसिद्ध है।
इनके सम्बन्ध में दूसरी जति कि०ई० में वर्तमान लङ्का के महाराज कुमारदास स्वयं कवि थे और कलामगंज भी अतः उन्होंने कालि- दास को अपनी राजसभा में ही नहीं रखा अपि अपना मित्र भी बना लिया। राजभोग का उपभोग करते हुए इनका सम्बन्ध किसी वेश्या से हो गया और उसी के द्वारा इनकी हा कर दी गयी पर यह जनवृति बिल्कुल निराधार जान पड़ती है।
कुछ लोग इन्हें महाराज विक्रमादित्य की समा के नवरत्नों में एक मानते हैं। जैसा कि इनके कामों में 'विक्रम' शब्द का सामिप्राय प्रयोग किसी विक्रम राजा के आधित होने का संकेत करता है।
कालिदास का सम्प्रदाय :- कालिदास जाति के ब्राह्मण थे। ये किस सम्प्रदाय के थे ? इनके उपास्य देव कौन थे ? इन सब प्रश्नों का उत्तर हमें उनके काव्यों में किये गये मङ्गलाचरणों से मिलता है। रघुवंश के मङ्गलाचरण में उन्होंने के माता-पिता शङ्कर और पार्वती को प्रणाम
किया है— जैसे
यागचिव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरी ॥
इसी प्रकार मालविकाग्निमित्र नाटक में उन्होंने अष्टमूर्ति शङ्कर की
बन्ना की है जैसे-
एक स्थितोऽपि प्रणत बहुफले यः स्वयं कृत्तिवासाः,
कान्तास मित्रदेहोऽप्यविषयमनसा यः परस्ताद्यतीनाम् ।
अष्टाभिर्यस्य कृत्स्नं जगदपि तनुभिविभ्रतो नाभिमानः,
सन्मार्गलोकनाय व्यपनयतु स वस्तामसीं वृत्तिमीशः ॥

इसी प्रकार विक्रमोर्वशीय शेट के मङ्गलाचरण में उन्होंने की प्रार्थना की है जैसे-
वेदान्तेषु मारेकपुरुषं व्याप्य स्थितं रोदसी
यस्मिन्नीश्वर इत्यनन्यविषयः शब्दोचारः । अन्तश्च मुमुक्षुभिनियमितप्राणादिभि स्थाणुः स्थिरोगलो निःश्रेयसायास्तु वः ॥
इसी प्रकार 'अभिज्ञानशाकुन्तल' के मङ्गलाचरण में उन्होंने अष्टमूति शङ्कर को ही प्रणाम किया है। जैसे-
या सृष्टिः खष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हवियों न होगी ये कालः विषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम् । यामाहुः सकृतिरिति यथा प्राणिनः प्राणवन्तः प्रत्यक्षाभिः स्तनुभिरवतु •वस्ताभिरष्टाभिरीशः ॥
इस प्रकार हम यह निश्चय कर सकते हैं कि ये भगवान् शिव के उपासक थे और इनका सम्प्रदाय 'दशैव' या परन्तु यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ महाकवि कालिदास स्वयं होते हुए भी सम्प्रदायिक संकीर्णता से बहुत ही दूर से यह बात में नहीं, उनका काव्य स्वयं कह रहा है। कुमारसंभव के द्वितीय सगँ में ब्रह्माणी की स्तुति एवं रघुवंश के दशम सर्ग में की गयी 'विष्णु' की स्तुति इसका प्रमाण है इतना ही नहीं ये एक ही परवा के तीनों रूप (बह्मा, विष्णु और शिव मानते हैं जैसा कि कुमार संभव के सप्तम सर्ग में उन्होंने प्रतिपादित किया है। जैसे-
एक मूर्तिविभिदे विधा सा सामान्यमेषां प्रथमावरत्यम् । विष्णोरेस्तस्य हरेः कदाचिद्वेधास्तयोस्तावपि धारा (७४४
कालिदास का स्थितिकाल - कालिदास का स्थितिकाल संस्कृत साहित्य के इतिहास में विभिन्न इतिहासज्ञों के अन्तः साक्ष्य प्रमाणों के आधार पर ईसा के पूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी तक के साथ सो वर्षों के लम्बे समय में झूल रहा है। यहाँ पर संक्षेप में प्रधान मतों का उल्ले किया जायगा। उनमें सामान्यतः चार मत प्रधान है। जिसमें प्रथम है-
(१) धारा नगरी के राजा भोज का समय (१००५ १०५४) दृष्ट की स्यारहवीं शताब्दी लालसेन नामक किसी विद्वान् ने कालिदास को

राजा भोज का सभापति माना है। मान ने यह बात गुन बातों के आधार पर लिखी है क्योंकि वे स्वयं भोज के समकालिक नहीं थे। यह बात उन्हीं के कथनों से पुष्ट होती है क्योंकि जहाँ पर कालिदास को भोज का समापण्डित उन्होंने कहा यहीं भारवि ण्डमा आदि कवियों को भी (श्री विभिन्न समय के पति कहा है अतः यह मठ बिल्कुल क्योंकि राजाजीं शताब्दी के थे और कादम्बरी तथा] [afe के रविता वाण छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुए थे। ने 'हरित' में शालिदास की प्रशंसा में लिखा है-
'निता न वा कस्य कास्यति। प्रीतिमधुरसान्द्रा मरीचि जायते ॥'
यदि कालिदास भोज के सभापति होते तो उनकी प्रशंसा ५०० वर्ष पूर्व कैसे होती ? हो सकता है बल्लालसेन ने भोज के समय हुए परिमल कालिदास या कालिदास वाले किसी और कवि को ही भ्रमणदीप शिखा 'कालिदास' मान किया हो।
(२) दूसरा मत है नीची शताब्दी के अन्त में पांचवी के पूर्वाध तक अर्थात् विक्रमादित्य और समुद्रम का राज्यकाल प्रो० लासेन, कर्नल फोर्ट, जेम्स विलेन,प्रो० प्र० की और विन्सेण्ट स्मिय आदि विदेशी विद्वानों का कहना है कि के राजाओं के राज्यकाल में भारत का साहित्यसूर्य मsers के आकाश में स्थित होकर सारे संसार को अपने प्रखर किरणों से प्रभावित कर रहा था कालिदास की रचना में जो तृति और आनन्द की अजस्र धारा प्रवाहित हुई वह उसी सुख एवं समृद्धि के सौभाग्य समय में संभव हो सकती है प्रो० विन्सेण्ट स्मिथ कालिदास के अfeature में बाये 'चीनांशुकमिव केलो:' इस उक्ति के आधार पर यह मानते हैं कि जिस बौद्ध धर्म के प्रभाव से भारत और चीन की पारस्परिक मैत्री होकर दोनों देशों की सभ्यता के संमिश्रण से एक तीसरी सभ्यता उत्पन्न
दुई उसका पूर्ण विकास गुप्त वंश के राज्यकाल में ही हुआ। कामं नृपाः सन्तु सहस्रज्ये राजस्वतीमाहुरनेन भूमिम् । नक्षत्रताराग्रहसंकुलाऽपि ज्योतिष्मती चन्द्रमव रात्रिः ।। रघुवंश ६-२२)

रघुवंश के इन्दुमती स्वयंवर में सुनन्दा सर्वप्रथम मगध के राजा की प्रशंसा करती है। गुप्तवंश के राजा मगध पर शासन करते थे, यह बात तो निविवाद है ही। प्रो० कीच सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा किये जाने को यह मानते हैं कि कालिदास ने इस तरह प्रच्छन्नभाव से अपने आश्रयदाता का संकेत एवं पोषित करने के लिए प्रशंता अपने काव्यों में की है। उनका कहना है कि कालिदास ने इसी तरह रघुवंश में समुद्र क्षितीशानाम् इस वाक्य के द्वारा समुद्रगुम के राज्यविस्तार का संकेत किया है, इसी तरह पोतिष्मती चन्द्रमसेव रात्रिः इस श्लोक में आये 'चन्द्र' शब्द के द्वारा अपने आश्रयदाता चन्द्रगुप्त का एवं 'कुमारकल्प सुपुर्व कुमारम्' इस श्लोक में माये 'कुमार' शब्द के द्वारा उसके पुत्र कुमारगुप्त का संकेत किया है। उनका कहना है कि 'कुमारसम्भव' नामक महाकाव्य की रचना कालिदास ने चन्द्रगु के पुत्र कुमारगुप के जन्म के उपलक्ष्य में की है।
उन्होंने कालिदास को गुप्त काल में मानने के लिए कुछ ऐतिहासिक प्रमाण भी प्रस्तुत किये है। उनका कहना है कि अप कनिष्क के शासनकाल में विद्यमान थे अश्वघोष एवं कालिदास की रचनाओं में अनेक स्थल पर भाव- 1
साम्य है। भावसाम्य के कुछ उदाहरण नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं- महाकवि अश्वघोष का अपने बुद्धचरित में सिद्धार्थ के जन्म का वर्णन वाताः सुखा मनोज्ञा दिख्यानि वासस्यपातयन् । सूर्यः स एवाभ्यधिक बकाया सौम्याचिरमीरितोऽग्निः ॥
(बुद्धपरित १-२२) यदि इस तरह करते हैं तो महाकवि कालिदास भी अपने कुमारसंभव में कार्तिकेय के जन्म का भी वर्णन उसी प्रकार करते हैं- वाता व सोयराः प्रसेदुः वाशाविधूत्र हुतभु दिदीपे
विमलानि तत्रोत्सवेतरिक्ष प्रसाद] ( ११-३७) यदि अश्वघोष राजकुमार सिद्धार्थ जिस समय वनविहार के लिए राजमार्ग पर निकले उस समय उनको देखने के लिए उण्ठित नगर-नारियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते है-
वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परम्परायासितकुण्डलानि । स्त्रीणां विरेजुखपङ्कजानि सक्तानि हमेध्यिय पजानि ॥
(बुद्धचरित -१९)

तो कालिदास भी स्वयंवर में आते हुए बम को देखने के लिए उत्कण्ठित नगरस्त्रियों के मुख का वर्णन इस प्रकार करते हैं-
यान्तराः । विभ्रमाक्षाः सहस्रपत्त्र भरणा इवासन् । (रघुवंश ७-११)
बुद्धचरित में तपस्या में लीन बुद्ध को से विरत करने के लिए प्रयत्नशील काम को आकाशस्य विशिष्टभूत इस प्रकार फटकारता है। मी अमं नार्हसि मार! कर्तुं हिसात्मतामुत्सृज गच्छ धर्म नेवा कम्पयितुं हि यस्य महापरिरुरिवाऽनिलेन ॥
(बुद्धचरित १३५७) रघुबंध में नन्दिनी सेवा में तत्पर दिलीप की परीक्षा के लिए माया- निर्मित सिंह भी राजा को उसी प्रकार कहता है-
* महीपाल व मेण प्रयुक्तमप्यस्वमितो वृथा स्यात् । न पादपोमूलनशक्ति शिलोच्चये मूर्च्छति मारतस्य । (रघुवंश २-३४) इसी तरह सौन्दरनन्द में नन्द को बुद्ध के गौरव से एवं सुन्दरी या के अनुराग से हुई दुविधा का वर्णन अवधी इस प्रकार करते है- गौरवं बुद्ध चकर्ष भार्यानुरागः पुनराचकर्ष दोन स्तरस्तरविव राजहंसः । (४-४२) कुमारसंभव में पारित पार्वती की परीक्षा के लिए आये हुए ब्रह्मचारी की निन्दा सुनाने के कारण जाती हुई पार्वती को अपना
स्वरूप दिला कर जैसी दुविधा में डाला - कालिदास के द्वारा उसका वर्मन
देखिए- संवीक्ष्य पयुती सरसाङ्गयष्टि निक्षेपणा पदमुदती मालव्यतिकराकुलितेयसिन्धुराज नवा न वन तथ
(५-८५) इस प्रकार दोनों महाकवियों की रचनाओं में बहुत से स्थलों पर समानता पायी जाती है जो इस बात को प्रमाणित करती है कि एक ने दूसरे का अनुकरण किया है। कितने अनुकरण किया और किसकी रचना अनुकार्य है इसका विवेचन यदि किया जाय तो समय की कुछ जानकारी हो सकती है प्रो० साहेब का कहना है कि महाकवि भास ने अपने नाटकों में जैसी प्राकृत भाषा का प्रयोग किया है वह अश्वोष के द्वारा प्रयुक्त प्राकृत से परिष्कृत और अर्वाचीन है, इससे सिद्ध होता है कि महाकवि भास अश्वघोष से अर्वाचीन है। महाकवि

कालिदास भास से अधीन है यह बात तो निविवाद ही है क्योंकि कालिदास स्वयं मालविकाग्निमित्र नाटक के प्रारम्भ में भाग को प्राचीन स्वी मान चुके हैं। जैसे प्रतिभासमिवित्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानक कालिदासस्य कृती कथं बहुमान ? अब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया है। हम पहले ही लिख चुके है कि अनि के समय में विद्यमान में कनिष्क सम्भवतः सुष्ट की प्रथम या द्वितीय शताब्दी के प्रारम्भ में पज्जाद का शासन करते थे इस स्थिति में नाम पदि तृतीय शताब्दी के कवि माने जाएँ तो कालिदास उनसे परवर्ती कवि माने जाएँगे
दूसरी बात बाणभट्ट की रचनाओं से पता चलता है कि वे हर्षवर्द्धन के सभापति थे। हर्षवर्द्धन सातवीं शताब्दी के मध्यभाग में राज्य करते थे कालिदास को प्रशंसा में निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्ति' ऐसा लिखा है जिससे सिद्ध होता है कि कालिदास सातवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे।
"विजय रविकीर्तिः कविताऽऽश्रितकालिदास मारविकी" द्वितीय पुलकेशी के इस प्रस्तरलेख से सिद्ध होता है कि कालिदास द्वितीय पुलकेशी जो ६४ का माना जाता है, के पूर्व विद्यमान थे। इस तरह कालिदास ६३ष्ट से पूर्व सिद्ध होते हैं।
नाम के कवि ने प्राचीन दपुर आधुनिक मन्दसौर नाम के स्थान * सूर्य मन्दिर के प्रशस्ति की रचना की है जिस प्रशस्ति पर मालव संवद ५२९ का उल्लेख है। पूर्वोकले की भाषा और शैली में कालिदास की भाषा और शैली को समानता पायी जाती है। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास मा० ५२९ से पूर्व विद्यमान थे।
प्रो० साहेब ने पूर्वोक्त प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करना चाहा है कि कालिदास तृतीय शताब्दी से पीछे एवं पाँचवीं शताब्दी के पूर्व विद्यमान थे। एव यह सिद्ध होता है कि कालिदास वंश के राजाओं के राज्यकाल में विद्यमान थे। इनकी आनन्दपूर्ण शान्तिप्रदायिनी काव्यधारा उसी सौभाग्य समय मैं प्रवाहित हुई थी एव पूर्वोक्त पद्य में 'चन्द' शब्द के आधार पर इनके आदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय को मान दिया जाता है, जिसका राज्यका ४१४

तक था। इस प्रकार सिद्ध हुआ कि महाकवि कालिदास द्वितीय के समय में उत्पन्न हुए थे।
परन्तु पाश्चात्य विद्वानों के इस मत का यदि ठीक से विवेचन किया जाए तो उनका कथन मात्र काल्पनिक सिद्ध होगा, सत्य नहीं जिसका विचार हम आगे करेंगे।
तीसरा मत है छठी शताब्धी अर्थात् विश्वविख्यात ज्योतिषी वराहमिहिर का समय इस मत को मानने वाले प्रमुख पाश्चात्य विद्वान् है प्रो० मैक्स- सूर, डॉ० भण्डारकर, प्रो. करें एवं डॉ. भाऊदा जी इन लोगों का आधार भारतीय जनभूति है।
कालिदास के ग्रन्थों के टीकाकार मल्लिनाथ ने मेदूत की टीका में कालिदास को महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से एक माना है- पूर्वोक्त विद्वान ने इसी पर निर्भर होकर इनको छठी शताब्दी का मान लिया है क्योंकि कालिदास जिन नवरत्नों में एक थे उन्हीं में ज्योति के उद्भद् विद्वान वराहमिहिर भी एक रत्न ये ब्रह्म के साथ की टीका में अमरराज लिखते है-
'वाधिक पाके वराहमिहिराचायों दिवं गतः । नवाधिक पश्चात का अर्थ ५०९ होगा।
सकती है। इस तरह कालिदास भी छठीं शताब्दी के सिद्ध होते हैं। आचार्य
इस उक्ति के आधार पर वराहमिहिर की मृत्यु ५८७ खुदा मानी जा दिङ्नाग और धर्मकीति बस के छात्र थे । असङ्ग ५४१ वृष्टा में विद्यमान थे। स्थानावस्मात्स रस निलापतोदङ्मुखः सं दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तान पान् ।
इस श्लोक की टीका में मल्लिनाथ ने दिना एवं निचुल शब्द को लिष्ट माना है दिनागाचार्य वसदन्धु के भी छात्र थे उसी समय उज्जयिनी में 'विक्रमादित्य' नामक राजा राज्य करते थे कालिदास उन्हीं के सभा रत्न थे, यह बात प्रमाणित होती है परन्तु यह मत भी निःसार ही प्रतीत होता है। अब हम कालिदास को प्रथम शताब्दी का सिद्ध करने से पहले पूर्वकथित
मठों का संक्षेप में विवेचन कर वास्तविकता की ओर बढ़ें। गुमकाल में ही संस्कृतविद्या का पुनर्जागरण हुआ यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यह सर्वसम्मत मत नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि संस्कृत

विद्या का चरमोत्कर्ष विक्रमादित्य और राजा भोज के समय में हुआ और उसे ही संस्कृत का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। जिन विद्वानों ने 'चीनांशुकमिव-' यह प्रयुक्त 'चीन' शब्द को देशपरक मानकर तात्कालिक सभ्यता का हादान प्रदान आदि की कल्पना की है यह भ्रम मात्र है सत्य नहीं क्योंकि 'बीन' शब्द का मेदिनी कोश के चीनी देशांशुकसीहिभेदेन्तो मृगान्तरे' इस पंक्ति के अनुसार 'रेशमी वस्त्र भी अर्थ है और यही अर्थ शाल के उक्त स्थल के उपयुक्त भी है। 'चीनांशुक' में चीन (देश) का अंशुक ( कपड़ा) ऐसा षष्ठीतत्पुरुष समास न मानकर 'चीनं च तदंशुकम्' ऐसा कर्मधारय मानने से उपर्युक्त रेशमीवस्त्र वाला मत पुष्ट हो जाता है एवश्व इन्दुमती स्वयंवर में सर्वप्रथम मगधेश्वर की प्रशंसा करवाने के कारण कालिदास यदि मगध के राजाओं के अति मान लिये जायें तो उनकी जन्मभूमि के विषय में अनेक तरह के प्रश्न उत्पन हो सकते हैं जैसे मेघदूत में अलकापुरी की अत्यधिक 1 प्रशंसा करने से वे सकापुरी के कोई पक्ष मान लिये जायें एवच कुमारसंभव में हिमालय की पर्याप्त प्रशंसा करने के कारण वे कोई हिमालयवासी किन्नर मान लिये जाएँ, रघुवंश में रघु और आज की अत्यधिक प्रशंसा करवाने के कारण उन्हें योध्यावासी मान लिया जाए, शाकुन्तल में शकुन्तला प्रस्थान के समय आधार को देखकर उन्हें मिथिलावासी ही न क्यों मान लिया जाए इस प्रकार बहुतेरे प्रश्न हो सकते हैं। अतः विद्वानों का उक्त आवार भी बालू की भीति ही है।
इसी तरह ज्योतिष्मती चन्द्रमसेव रात्रिः इस इलोकांस एवं 'गुसमूल प्रयत्नत:' इत्यादि स्थलों को आधार मान कर यह कहना कि कालिदास ने अपने दाता गुम वंशज राजाओं का एवं 'चन्द्र' पद से 'द्वितीय चन्द्रगुप्त' का निर्देश किया है तो यह कहना भी पुक्तिमूलक नहीं प्रतीत होता क्योंकि जब कवि सर्ववस्त्र होता है एवं उन्हें यदि अपने आश्रयदाता का संकेत ही करना था तो स्पष्ट रूप से कह सकते थे। कुमारसंभव की रचना चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्मोत्सव पर की गयी यह भी कोरी कल्पना है, इसमें सत्यता नहीं क्योंकि इसमें कोई प्रबल प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार महाकवि कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण किया इस लिए ये अश्वघोष के परवर्ती है, यह भी नहीं कह सकते।

महाकवि कालिदास की रचना प्रदर्शन माप के लिए अर्थात् 'कला कला के लिए थी, जब कि अश्वयोष की रचना अध्यात्ममार्ग से अन्यमनस्क लोगों का ध्यान काव्य के माध्यम से अध्यात्म की ओर आकृष्ट करना था। जैसा कि उन्होंने सौन्दरनन्द में स्पष्ट रूप से लिख भी दिया है।
'इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षाकृतिः
श्रग्रहणाऽमन्यमनसां काव्योपचारात्कृता । इत्यादि
अतः रचना की समता को लेकर किसी महाकवि की रचना को मौलिक और किसी की रचना को अनुकृतिमूलक कहना सामान है। वैसे यदि कहा जाय कि अश्वघोष ने ही कालिदास का अनुकरण किया तो युक्तियुक्त भी हो सकता है। जैसे-
अपने नगर में अपने पिता द्वारा अवरुद्ध सिद्धार्थ का वन विहार के लिए निकलने पर नगर स्त्रियों की उस्तुकता उतनी नहीं रही होगी जितनी कि कुमारसंभव में औषधि में वरयात्रा के प्रस में शिवजी या इन्दुमती स्वयंवर के अनन्तर अज की यात्रा में उसे देखने के लिए स्त्रियों की उत्सुकता अपूर्व रही होगी, अतः महाकवि ने जो स्त्रियों के कल्लुक्य का वर्णन किया है वह स्वाभाविक है अतः मौलिक एवं मनोरम है। अश्वोष को तो अनुकृति है।
कालिदास ने अश्वघोष का अनुकरण नहीं किया इसमें एक युक्ति यह भी है कि अनुकरण आदर्श का उत्तम का किया जाता है जो स्वयं अपूर्ण है उसका कोई भला नया अनुकरण करेगा ? अश्वघोष की भाषा पोली अपरिमार्जित है च्युति-संस्कृति दोषग्रस्त और साथ ही उतना हृदयावर्धक भी नहीं जितनी कि महाकवि कालिदास की कालिदास की परिमार्जित सरस एवं मनोरम है।
साथ ही महाकवि कालिदास कितने निरभिमानी से इस बात को मैंने प्रारम्भ में ही लिख दिया है। ये अपने से प्राचीन प्रतिष्ठित कवियों का मशो- मान करने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते और न अपनी प्रतिष्ठा भङ्ग ह मानते थे। अतः उन्होंने मालविकाग्निमित्र में लिखा है कि---
'मास सौमिल्लककविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वर्तमानको कालिदासस्य कृती कथं बहुमानं इत्यादि यदि कालिदास महाकवि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो उपर्युक्त पंक्ति में क्या उनका नामोल्लेख नहीं करते ? अवश्य

करते और भी चोरी चोरी की तरह की जाती है। महाकवि कालिदास यदि अश्वघोष का अनुकरण किये होते तो वे यह साहस कभी नहीं कर सकते ये कि एक ही भाव को अपने दो महाकाव्यों (कुमारसंभव और रघुवंश) में उल्लेख करते। अतः इस आधार पर उन्हें चौथी शताब्दी के शेष भाग से पाँचवीं शताब्दी के पूर्वा का मानना कल्पनामात्र है।
प्रो० मैक्समूलर का यह कहना कि संस्कृत विद्या का चरमोत्कर्ष छठी शताब्दी से हुआ और उस समय कालिदास विद्यमान थे, फर्ग्यूसन के कथन पर आधारित है। फर्गुसन का कहना है कि "लुष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नाम का कोई राजा या ही नहीं, अतः कालिदास प्रथम शताब्दी के नहीं माने जा सकते। अपितु उज्जयिनी के महाराज विक्रमादित्य ने ५४४ ई० में भारत से शकों को भगाकर उस जियो में ६०० वर्ष पूर्व अपना संवत्सर स्थापित किया और उसी समय कालिदास उत्पन्न हुए।"
परन्तु फर्गसन के इस मत का खण्डन प्रो० फ्लीट और हल ने महाकवि कालिदास के ज्योतिविदाधरण नामक ग्रन्थ के इस एलोक- धन्वन्तरिक्षपणकार सितार कालिदासा
स्पातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रहनानि व विक्रमस्य ॥ को आधार मानकर किया है। कुछ यूरोपीय विद्वान् ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ को महाकवि कालिदास की कृति नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ज्योतिि भरण ग्रन्थ में वर्णित ग्रहादि की दशा से यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है। कि पन्द्रहवीं शताब्दी के पश्चाद किसी नवीन विद्वान् ने इसका निर्माण किया है और कालिदास के नाम से प्रचारित कर दिया है। 'वस्तु' ज्योतिर्विदाभरण ग्रन्थ भले ही कालिदास विरचित न हो परन्तु यह तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि कालिदास विक्रम के नवरत्नों में एक थे जब रही बात खुष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नामक राजा के रहने और न रहने को तो इस पर यदि विचार किया जाय तो यह भी सिद्ध हो जाता है कि सृष्ट के ५० वर्ष पूर्व विक्रम थे।
डॉ० राजबली पाण्डेय ने अपने "विक्रमादित्य" नामक ग्रन्थ में पर्याप्त
प्रमाणों से सिद्ध कर दिया है कि लूट से ५७ वर्ष पूर्व विक्रम नामक राजा थे।
यूरोपीय विद्वान् ने जो चन्द्रगुप्त (द्वितीय) को ही उज्जयिनी के महाराज विक्र
मादित्य मानकर यह लिखा है कि उसी ने ५४४ ई० में शकों को भारत से भगाया और ६०० साल पहले का संवत्सर चलाया' बिलकुल निराधार एवं बेतुका लगता है। यदि उसे अपने नाम से ही संवत्सर चलाना या तो ६०० साल पहले से क्यों चलाता ? साथ ही यूरोपीय विद्वानों ने अपने उक्त कथन में कोई प्रमाण भी नहीं दिया है। अतः यह भी मत अनादरणीय ही है। अब हम भारतीय विद्वानों के सम्मत प्रथम शताब्दी वाले मत का उल्लेख

करने जा रहे हैं। भारत की बहुप्रचलित जनवृति के आधार पर मालवनरेश विक्रम संवत्सर के प्रवर्तक जो दृष्ट से ५७ वर्ष पूर्व हुए थे उन "विक्रमादित्य" की

सभा के नवरत्नों में कालिदास भी एक रत्न थे।

महाकविकालिदास गुप्तवंश के राजाओं के आश्रित नहीं थे अपितु सृष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी के विक्रमादित्य के आधि में निम्नलिखित प्रमाणों से सिद्ध हो जाता है।

जे० के० सुब्रह्मण्यम् ने कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक से जो सूक्ष्म प्रमाण प्रस्तुत किये हैं वह महत्वपूर्ण है। उनका कथन है कि महाकवि ने अपनी नवीन रचना के विषय में यह लिखा है कि-

"पुराणमित्येव न साधु सर्व न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।" इत्यादि। यहाँ प्रयुक्त "पुराण" पद मिलष्ट है महाकवि ने पुराण शब्द के द्वारा पुराणस्यातवृत्त" का संकेत किया है। अर्थात् प्राचीन कवियों ने जो प्राचीन ( रामायण, महाभारत आदि) स्यात्तों का जाश्रयण लेकर अपने काव्यों की रचना की है उसका मैंने (कालिदास ने ) उल्लंघन किया है, इस लिए वह उपेक्ष्य नहीं है, काव्य-मर्मज्ञजन उसकी परीक्षा करके इस बात का निर्णय कर सकते हैं। वस्तुतः महाकवि ने उक्त नियम का उल्लखन किया है। मालविकाग्निमित्र के भरतवाक्य-

"आशास्यनीतिविगमप्रभृतिप्रजानां संपत्स्यते न खलु गोसरि नाऽग्निमित्रे ॥"

में प्रयुक्त "गोसरि, मित्रे" पद की सप्तमी को भावलक्षणा मानकर उस समय "अग्निमित्र" जीवित थे यह सिद्ध होता है। अग्निमित्र पुष्यमित्रशुद्ध के

पुत्र थे। इनका समय खुष्ट से पूर्व प्रथम शताब्दी माना गया है। महाकवि की रचनाओं के अवलोकन से यह बात (प्रथम शताब्दी की ) और भी प्रमाणित हो जाती है। शुद्धवंश के राजाओं के समय चोरी जैसे अपराधों

में मनु, वशिष्ठ और आपस्तम्व ऋषियों की स्मृतियों के आधार पर मृत्युदण्ड का विधान था। जैसा कि 'अँगूठी को चोरी में पकड़े गये मल्लाह को प्राण- दण्ड दिया जाता है।' अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में कालिदास ने ऐसा अभिनीत करवाया है। परन्तु गुप्तकाल में वैसा कठोर दण्ड-चोरी जैसे अपराध के लिए नहीं था। उस समय यावत्क्य स्मृति की मान्यता थी और भी कालिदास ने अपने नाटकों में मृतपति के धन का दायभाग faser को नहीं दिया जाता है वह राजकोष की चीज है, ऐसा वर्णित किया है जो कि मनु वशिष्ठ, बौधायन और आपस्तम्ब स्मृतिसम्मत है परन्तु याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार विधवा को उसके मृतपति के धन का दायभाग मिलता है—ऐसी व्यवस्था गुप्तकाल में थी। इससे सिद्ध होता है कि कालिदास वंश के राजाओं के समय में थे न कि गुप्तवंश के राजाओं के समय

कालिदास अपने आश्रयदाता का स्पष्ट संकेत अपनी रचना में ही करते हैं जैसे कि शाकुन्तल के प्रारम्भ में सूत्रधार नटी से कहता है 'आयें ! रस- भावदीक्षागुरो विक्रमादित्यस्याऽभिरूपभूविष्ठा परिषद् अस्यां च कालिदास- प्रतिवस्तुना नवेनाभिज्ञानशाकुन्तलमामधेयेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः । पूर्वकाल में आजकल के समान उपाधि के तौर पर नाम का प्रयोग नहीं किया जाता था अतः उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'विक्रमादित्य का अर्थ--

मालवनरेश कुष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में विद्यमान संवत्सर प्रवर्तक विक्रमादित्य' ही है, न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य' उपाधिधारी। महाकवि को प्रथम शताब्दी ई० पू० सिद्ध करने में उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द भी प्रमाण है। उन्होंने कुमारसंभव के तृतीय सर्ग में एक श्लोक में लिखा - त्रियम्बकं संयमिनं ददर्श

यहाँ पाणिनि व्याकरण के नियम से लोक में 'व्यम्बक' प्रयोग ही साधु है और उसी का प्रयोग होना चाहिए था परन्तु उक्त प्रयोग होने के कारण यह सिद्ध होता है कि कालिदास के समय पाणिनि व्याकरण पूर्ण रूप से लोक में प्रचलित नहीं हो पाया था। इसी तरह उन्होंने 'पातयामास' का जहाँ प्रयोग उचित था वहाँ 'पातयाम्' का पृथक् और 'शास' का पृथक् प्रयोग किया है, जैसे- तं पाठयां प्रथममास पपात पश्चात् (रघुवंश ९६१ ) इत्यादि । ३ मे० भू०

इसी प्रकार जहाँ-जहाँ महाकवि ने प्राकृत का प्रयोग किया यहाँ-वहाँ मागधी प्राकृत का ही जिसका उल्लेख ईसा के पूर्व में प्राप्त होता है। इस तरह हम निश्चयपूर्वक यह कह सकते हैं कि 'महाकवि कालिदासः सृष्ट के पूर्व प्रथम शताब्दी में हुए थे न कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय '

महाकवि की जन्मभूमि जन्मसमय की तरह इनकी जन्मभूमि भी विवादास्पद हो है भिन्न-भिन्न प्रदेश के विद्वान् इन्हें अपने-अपने यहाँ का सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। कश्मीर प्रदेश के विद्वानों का कहना है कि कालिदास ने अपनी रचनाओं में कई बार 'प्रत्यभिज्ञान' शब्द का प्रयोग कर कश्मीर के प्रत्यभिज्ञान-व सम्प्रदाय की ओर संकेत किया है एवं इन्होंने हिमालय का तथा उसमें होने वाले पदार्थों का बहुत ही बारीकी से वर्णन किया है एवं केशर-पुष्प का भी वर्णन किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि कालिदास कश्मीर के रहने वाले थे। बंगाल के विद्वान इन्हें बंगाल का सिद्ध करते हैं। उनका तर्क कालिदासः 1 के नाम पर आधारित है। काली की उपासना बंग देश में अधिक है और कालिदास काली (देवी) के उपासक है जैसा कि उनके नाम से ही प्रतीत होता है, अतः वे बंगकवि थे ऐसा उनका कहना है मैथिलों का कहना है कि महाकवि मिथिला के थे वे लोग महाकवि के 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' के चतुर्थ अंक में दर्शायी गई परिपाटी को आधार मानकर उन्हें मैथिल कहते हैं। साथ मिथिला के प्रत्येक परिवार में काली देवी का एक विशेष घर बनाया जाता है जो काली की प्रबल उपासना का द्योतक है, अतः काली के उपासक कालिदास के थे, ऐसा सिद्ध करते हैं वे लोग वर्तमान 'उच्चैठ गाँव मैं वर्तमान काली की मूर्ति को ही कालिदास की उपास्या मानते हैं। कई लोग इन्हें मालवा का भी मानते हैं। 'अस्तु'–भारत की भिन्न-भिन्न भूमि इसे अपना पुत्र कहने को उत्सुक हैं; कहती है, परन्तु यह निराला बच्चा कभी नहीं कहता कि मेरी माँ (जन्मभूमि) कौन है केवल वह अपने धात्री (पालन- पोषण करने वाली ) का निर्देश करता है। उज्जयिनीनरेश महाराज विक्रमा- दिव्य की सभा में इनका जीवन निर्वाह हुआ और इनकी रचना में उज्जयिनी के प्रति इनका विशेष अनुराग देखकर ( मेघदूत में हम यह निश्चय करते हैं कि महाकवि की जन्मभूमि भी उज्जयिनी ही रही होगी।

कालिदास की काव्यकला

कालिदास की रचनाएँ साहित्य जगत् में अपनी शानी नहीं रखतीं भाव; कल्पना, आदर्श और भाषा की आधारशिला पर साहित्यकला की जो सुन्दर अट्टालिका का निर्माण महाकवि ने किया है वह दूसरी जगह देखने को नहीं मिलती। कला की आलोचनात्मक अग्नि परीक्षा में भी इनकी रचनाएँ इतनी खरी, ज्योत्स्नामयी और उत्कृष्ट निकलती है कि विश्व की आँखें चकाचौंध में पड़ जाती हैं। इनकी रचनाओं में वाक्य अर्थ की अपेक्षा व्यय अर्थ की प्रधा नता पायी जाती है जिसके कारण इनके काव्यों को ध्वनिप्रधान माना गया है- उत्तम माना गया है। काव्यप्रकाशकार मम्मट उत्तमकाव्य का लक्षण लिखते हैं- "इदमुत्तममतिशायिनि व्यङ्ये वाक्याद् ध्वनिर्बुधः ।"

( काव्यप्रकाश, १४) इनकी रचनाओं का भाव तत्व जिसे साहित्य में रस या काव्य की आत्मा कहा जाता है, कल्पना के विविध उड़ान एवं उदात्त आदर्शो से समन्वित होकर इतना परिपकव हो जाता है कि सर्वश्रेष्ठ कहलाने लगता है। कालिदास प्रकृति के पक्के पुजारी हैं परन्तु इनकी प्रकृति जड़ नहीं, अपितु संवेदनशील है, सजीव है। इनकी रचनाओं में क्या तो बड़ा से बड़ा पर्वत और क्या तो छोटा-से-छोटा पुष्प सभी अपना-अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व रखते हैं और संवेदन- शील हैं। यदि ऐसा न होता तो रघुवंश में दिलीप का जयकार पेड़-पौधे भला किस तरह कर सकते ? शकुन्तला की विदाई पर लताएँ पाण्डुपत्र छोड़कर अपने आंसू कैसे गिराने लगती ? कालिदास ने यद्यपि बाह्यप्रकृति के भी वर्णन में मानव प्रकृति की तरह अन्तरतम स्तर तक घुसकर निश्चित दृष्टि रखी हैं. पर उन्होंने प्रकृति के कोमल कान्त एवं मधुर पहलू का ही वर्णन किया है- भीषण या भद्दे का नहीं ।

कालिदास की शैली साहित्यजगत में अपना अनुपम स्थान रखती है। इनकी शैली के कारण ही इन्हें विश्व वन्द्य कवि माना गया है भद्दा-से-भद्दा या नीरस से नीरस कथानक क्यों न हो ये अपनी कल्पना के द्वारा उसका ऐसा मार्मिक एवं चमत्कृति- पूर्ण वर्णन करेंगे कि हृदय आनन्द-सागर में डूबने-सा लगता है। इनकी शैली वैदर्भी है, जिसका लक्षण विश्वनाथ ने लिखा माधुर्य-रचना उमात्मिका । अवृत्तिरत्यवृत्तियां वैदर्भी रीतिरिष्यते ॥ ( साहित्यदर्पण )

1 नियमविधिजला बहिया थोपनेत्री ॥

उपर्युक्त सभी बातें कालिदास की रचनाओं में दृष्टिगत होती हैं ऐसी छलित परिष्कृत एवं प्रसादगुण सम्पन्न रचना अन्यत्र दुर्लभ है।

कालिदास की रचना में बलकार का भी दर्शन होता है ये आनुषङ्गिक हैं, कालिदास ने इन्हें जबरदस्ती लादने का प्रयास नहीं किया है। उनका तो कहना है- "किमिव हि मधुराणो मण्डनं नाऽकृतीनाम्" । इन्हें तो उपमा का आचार्य ही माना गया है। कहा भी है 'उपमा कालि दासस्य इति । परन्तु उनमा के अतिरिक्त उत्प्रेक्षा. दृष्टान्त, रूपक, निदर्शना अन्तरस्यास स्वभावोक्ति अलङ्कारों की भी कमी इनकी कविता- कामिनी को नहीं है।

संक्षेप में उनकी काव्य-कला की छटा देखें क्या हो स्वाभाविक एवं मनोरम युक्ति है उनकी-

अवचितवलिपुष्पवेद सम्मार्गदक्षा

वे सौन्दर्य के कवि तो है ही, साथ ही साथ उनमें सत्यम् शिवम् की भी परिमा भरी पड़ी है। सौन्दर्य को सत्यता की कसौटी में परख कर उससे शिवत्व का सन्देश देना कवि के लिए बाएँ हाथ का खेल लगता है। वे कहते हैं-

स्वायत्तं कृषिफलमिति भूविलासानभितैः ।

प्रीतिस्निग्धैर्जनपदबंधूलोचनैः

पीयमानः ॥

त्यामा पवनपदवीमुगुहीताल कान्ता

प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसस्य ।। स्वभाव-चित्रण में भी वे उतने ही सिद्धहस्त हैं। उनका प्रत्येक पात्र अपने स्वाभाविक क्षेत्र से ही गुजरता है और कल्पना में भी वह अयथार्थता को नहीं छूता इतना होने पर भी वे शिष्टता को कभी नहीं छोड़ते। पार्वती के सौन्दर्य वर्णन में वे कहते हैं।

सम्भूतं मण्डनमङ्गयष्टेरनासवाक्यं करणं सदस्य । कामस्य पुष्पव्यतिरिक्तमस्वं वास्यात्परं साऽय वयः प्रपेदे ॥

वे मर्यादा का कुछ-कुछ उल्लधन भी करते हैं तो इतनी चतुराई के साथ कि पाठक को उसका गन्ध तक नहीं आता। पार्वती के विवाह के प्रसङ्ग में उनकी सी के द्वारा किया गया परिहास इसका उदाहरण है-

पत्युः शिलामन स्पृशेति सस्याः परिहासपूर्वम् सा रज्जयित्वा चरणौ कृताशीर्मास्येन तो निर्वाचनं जघान ॥

यहाँ कितना गूढ़ एवं शिष्ट परिहास है। यह देखने लायक है। इसी तरह अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् का चरम समन्वय महाकवि की रचनाओं में पाया जाता है। शब्दों को सजाना उनको बहुत रुचिकर है। वे उपमा के एकमात्र सिद्ध कवि माने जाते हैं उनकी उपमाछा सहृदयों को मोह लेती है। प्रभामहत्या शिखमेव दीपरत्रमार्गयेव त्रिदिवस्य मार्गः । संस्कारवत्येव गिरा मनीषी तया स तच पवित्रितय || सचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिवरा सा नरेन्द्रमार्गा इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ।

उपमा के साथ मक भी उनका प्रिय द्वार है। रघुबंध में वसन्त वर्णन में इसकी छटा देखने को मिलती है।

अनुभववदतोत्सवं पटुरपि प्रियकण्ठजिक्षया।

अनवदासनरज्जुपरिग्रहे जलता जलनामबलाजनः ।

कुसुमजन्म ततो नवपल्लवास्तदनुषट्पदको किलकूजितम् । इति यथाक्रममा विरभून्मघुमवतीमवतीयं वनस्थलीम् ॥ वस्तुस्थिति का वर्णन तो उनका कहना ही क्या ? वे जो भी वस्तु छूते हैं

उसमें स्वाभाविकता एवं सौन्दर्य का समावेश करते हैं। देखिए स्वजत मानमलं वत विग्रहाः न पुनरेति गतं चतुरं वयः । -

परभृतामिरितीय निवेदिते स्मरमते रमते स्म वधूजनः ॥ मृगया के सम्बन्ध में उन्होंने इस तरह कहा है--

परिचय चललक्ष्यनिपातने यस्य तदितिवेदनम् ।

श्रमजात्यगुणाच करोत्यसी तनुमतोऽनुमतः सचिवैयौ ॥ कॉलिदास वैदर्भीरीति के कवि है यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रीतियों

का भी अच्छा खासा प्रयोग है।

तथा समक्षं दहता मनोभवं पिनाकिना भग्नमनोरथा सती ।

निनिन्द रूपं हृदयेन पार्वती प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता ॥ उनकी रचनाओं में प्रसाद गुण सर्वत्र व्याप्त है। जैसे-

[सा हंसमाला शरदीव गङ्गां महौषधि रत्न इवात्मभासः ।

कवि को शृङ्गार एवं वीर रस बहुत प्रिय है यद्यपि उनकी रचनाओं में अन्य रसों का भी समावेश कम नहीं है। शृङ्गार रस जैसे शाकुन्तल में- स्निग्धं वीक्षितमस्यतोऽपि नयने यत्प्रेरयन्त्या तथा यातं यच्च नितम्बयोस्तया मन्दं विलासादिव ।।

वैसे तो कालिदास की सभी रचनाओं में उदात्त शृङ्गार है ही। कालिदास की रचनाओं में अर्थान्तरस्यास, स्वभावोक्ति, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलद्वारों का प्रशस्त प्रयोग पाया जाता है। स्वभावोति की छटा देखिए-

शरीरमात्रेण नरेन्द्र तिष्ठत्राभासि तीर्थप्रतिपादिताद्धिः । आरण्यकोपात्तफलप्रसूतिस्तम्बेन नीवार इवावशिष्टः ।। एक वनवासी के द्वारा यह कहना कितना सुहावना लगता है। कालिदास अभा के कवि तो कहे जाते हैं लेकिन इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उनकी रचनाओं में ध्वनि तत्त्व है ही नहीं इनमें पर्याप्त ध्वनि है अतः इनका काव्य उत्तम काव्य में जाता है।

इनकी रचनाओं में भावपक्ष और कलापक्ष का बहुत अच्छा समन्वय दिखाई पड़ता है। वे आर्य संस्कृति के एक सफल उद्घोषक थे परन्तु उनकी रचनाओं में यही नहीं, अपितु विश्वजनीनता ही अधिकतर झलकती है। यही उनकी उच्चता का परिचय है कि वे विश्वजनीन कवि थे और हरेक दृष्टिकोण उनकी आँखों पे ओझल नहीं था दर्शन, संस्कृति, आध्यात्मिकता, सौन्दर्य नादि विविध विषयों पर उनका उदात्त विचार उनकी रचनाओं में मिलता है। इतना सब कुछ होने पर भी आत्मश्लाघा इनमें जरा-सी भी नहीं थी । वे कहते हैं-

मणी समुत्कीर्णे सूत्रस्यैवाऽस्ति मे गतिः ।

इसका अर्थ यह नहीं कि वे प्राचीनता के अन्धभक्त मे वे तो सही अर्थ में सुधारक भी थे। उनका कहना था-

पुराणमित्येव न साधु सर्वे न चापि सर्व नवमित्यवद्यम् ।

सन्तः परीव्यान्यतरद् भजन्ते मूर्ख परप्रत्ययनेव बुद्धिः ॥ कुछ आलोचक कालिदास के कवित्व में यह बारोप लगाते हैं कि वे समस्या तो उभारते हैं लेकिन समाधान प्रस्तुत नहीं करते। यह उन आलोचकों

की अल्पदृष्टिता से और कुछ नहीं कालिदास की रचनाओं में सर्वत्र समस्या के साथ समाधान भी दिये हुए हैं। जरूरत है उनको समझ पाने की दृष्टि का मानव के मन में उठ सकने वाले भावों की चिरन्तनता एवं कहापोह को वे इस प्रकार वर्णन करते हैं

कार्य लक्षण न च भूयोऽपि दृश्येत सा दोषाणां प्रशमा नः घुतमहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् । कृतधियः स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा चेतः स्वास्थ्यमुपैहिका खलु युवा धन्योऽधरं पास्यति ।। यह श्रेय कालिदास को ही जाता है कि संस्कृत साहित्य विश्वसाहित्य में उच्चतम स्थान पाया हुआ है।

कालिदास की कृतियाँ

वैसे तो कालिदास की रचनाएँ बहुत-सी हैं जैसे ऋतुसंहार, कुमार संभव, रघुवंश, मेघदूत, श्रुतबोध (छन्दोग्रन्थ) शृङ्गारतिलक, नोदय, नव- रत्नमाला, घटकरकाप, पुष्पबाणविलास, चिगमनचन्द्रिका, ज्योतिविदाभरण ( ज्योतिषग्रन्थ), कुन्तेश्वरदत्य, अम्बास्तव, कल्याणस्तव, कालीस्तोत्र, काव्य- नाटकाला गङ्गाष्टक, चण्डिकादण्डको चर्चास्तव, दुर्घटकाव्य, मकर- स्तव, मलाष्टक, महापद्माष्टक, रत्नकोश, राक्षसकाव्य, लक्ष्मीस्तव, लघु- स्तव, विद्वद्विनोदकाम्य, वृन्दावन काव्य वैद्यमनोरमा, शुद्धचन्द्रिका शृङ्गार- रसाtee शृङ्गारसार काव्य, श्यामलादण्डक, सेतुबन्ध, मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय एवं अभिज्ञानशाकुन्तल आदि । परन्तु रचनाशैली को विभिन्नता के कारण आलोचकों ने इनमें से कुछ को हो सर्वसम्मत से कालिदास की कृति माना है। सर्वसम्मत से जो रचनाएँ कालिदास की मानी जा चुकी है वे हैं- (१) ऋतुसंहार, (२) कुमारसंभव) रघुवंश (४) मालविकाग्नि- मित्र, (५) विक्रमोर्वशीय (1) अभिज्ञानशाकुन्तल तथा मेघदूत ।

अब हम इन प्रसिद्ध कृतियों के सम्बन्ध में संक्षिप्त परिचय देते हैं- (१) ऋतुसंहार : प्रस्तुत रचना कालिदास की प्राथमिक मानी जाती है क्योंकि इसमें वैसी प्रौढि नहीं पायी जाती जैसी कवि की अन्य कृतियों में

दृष्टिगोचर होती है। इसमें जाये पच अन्यत्र कहीं लक्षणादिग्रन्थों में उदाहर के तौर पर नहीं पाये जाते और मल्लिनाथ ने इस पर टीका भी नहीं लिखी इसीलिए पहले कुछ विद्वान् इसको महाकवि की रचना नहीं मानते थे, पर कतिपय सूक्ष्म प्रमाणों के मिलने पर पुनः इसे उनकी कृति मान लिया ग है। इसमें ग्रीष्म से लेकर बसन्त के पट् ऋतुओं का बड़ा ही मनोर चित्रण छः सगों में किया गया है। इसमें १४४ पद्म हैं।

(२) कुमारसंभव :- १७ सर्गों का यह महाकाव्य महाकवि की दूस रचना मानी जाती है। इसमें कार्तिकेय का जन्म एवं उनके चरित्र का वर्ण ही प्रधान विषय है। इसमें प्रथम स से लेकर सप्तम सर्ग तक क्रमशः हिमाल पर्वत का वर्णन एवं पार्वती का जन्म, तारकासुर की उता, उसके की लिए शिवजी के औरस पुत्र हेतु तपस्या में लीन शिवजी के योग के देवताओं के द्वारा कामदेव को शिवजी के पास भेजना, उसके तृतीय नेत्र उत्पन्न के द्वारा कामदाह काम की पत्नी रति का विलाप, रति सान्त्वना देना, पार्वती की तप और उनका शिवजी से विवाह वर्णित है अष्टम सर्ग में शिव और पार्वती के काम-केलि का वर्णन है महामहोपाध्या मल्लिनाeat की टीका यहीं तक उपलब्ध है, चीन विद्वान इसी मम स से लेकर अन्त तक के सर्गों को में कालिदास की दी भिन्नता होने के कारण भी अष्टम सर्ग तक को ही कालिदास की रच मानते हैं परन्तु यह महाकाव्य है और उसका लक्षण है कि 'सर्गाष्टाधि इह' अर्थात् महाकाव्यों को आठ समों से अधिक होना चाहिए। साथ ही अ [सर्गे तक केवल कामकेलि का वर्णन है जो कार्तिकेय के जन्म की भूमिका मा है यदि इसे आठ का हो माना जाये तो 'कुमारसंभव' यह नाम भी संगत नहीं हो पायेगा। अतः इसे कालिदास की ही रचना मान लीजिए, आठ सर्पों तक की रचना महाकवि ने की और नवम से यह सर्ग तक

किसी परवर्ती कवि ने की होगी, ऐसा मानना चाहिए। (३) रघुवंश: १९ सर्गों का यह महाकाव्य है। इसमें दिलीप से ले अतक के सूर्यवंश के राजाओं के चरित्र का वर्णन बड़े ही प्रौढ़ मनोरम ढंग से किया गया है। भारतीय संस्कृति का लोकोत्तर चित्रण इस

है है कि इसके पश्चम सर्ग में सरस्वती का बीजमन्त्र है एवं इस सर्ग के अन्तिम १३ लोकों की रचना स्वयं सरस्वती ने की है। कान्तासम्मित उपदेश का यह अनूठा उदाहरण है।

(४) मालविकाग्निमित्रांच का यह रूपक, रूपकरचना में महाकवि की प्रथम कृति है। इसमें तात्कालिक विदिशाधिप राजा अग्निमित्र एवं मालविका के उत्कृष्ट प्रेम का वर्णन बड़े ही मर्मस्पर्शी ढंग से किया गया है।

) विक्रमोर्वशीय : यह पाँच अड्डों का छोटक है। इसमें महाभारत की कथा के आधार पर पुरूरवा और उर्वशी के प्रेम का वर्णन है। इसमें विप्र शृङ्गार का मनोरम ढंग से वर्णन कर 'न दिना विप्रलम्भेन संभोग: पुष्टिमनुते वाले सिद्धान्त को महाकवि ने और भी पुष्ट किया है। महाकवि ने अपने आश्रयदाता का संकेत इसके नामकरण से किया है।

(६) अभिज्ञानशाकुन्तल : यह संस्कृत साहित्य में ही नहीं अपितु विश्वसाहित्य में अद्वितीय नाटक है। इसमें सात अन् है। इसमें महाभारत के कथानक के आधारपर चन्द्रवंशी महाराज दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम का वर्णन है। कहा जाता है कि विश्वसाहित्य में कालिदास अद्वितीय हैं और उनकी रचनाओं में शाकुन्तल उत्कृष्ट है और इसमें भी पौधा म उत्कृष्ट है और उस बनू में निम्नलिखित चौथा लोक हृदयस्पर्शी है, जो वास्तविक है और सहृदय-संवेध है। जैसे-

यास्यत्यद्य वाकुन्तलेति हृदयं संविलष्टमुत्कण्ठया कण्ठस्तम्भितबाष्पवृति-पश्चिन्ताय दर्शनम् । वैलस्यं मम तावदीदृशमपि स्नेहादरण्यौकसः पीयन्ते गृहिणः कथं नु तनया विश्लेषदुखनं ॥

अर्थात् ( कण्व कह रहे हैं) आज शकुन्तला ( अपने पति गृह) चली जायगी यह सोचकर ही उत्कण्ठा के कारण मेरा हृदय भरा-सा जा रहा है, गला धा-सा जा रहा है और बांसुओं से परिप्लुत आँखों से देखा नहीं जाता। स्नेह के कारण ( धर्मपुत्री के लिए) यदि मुझ जैसे वनवासी को भी इतनी विकलता है तो फिर भला जो गृहस्य अपनी मोरस पुत्री को विदा करता होगा उसे कितना कष्ट होता होगा संभवतः कालिदास की ऐसी ही रचना को देखकर पाचात्य कवि बेटे ने कहा था-

यासन्तं कुसुमं फलं च युगपद्मस्य च यद् । यच्चान्यम्मनसो रसायनमतः सन्तर्पणं मोहनम् ॥ वयं यदि वासि प्रियसखे! शाकुन्तलं सेव्यताम् ॥

इसमें कालिदास ने आर्यनारी के पातयत्यको विरहाग्नि में तपाकर कुन्दन स चमकाकर उसकी महत्ता का चूडान्त निदर्शन किया है।

मेघदूत

काव्य दो प्रकार का होता है- (१) महाकाव्य, (२) लण्डकाव्य महाकाव्य एक विस्तृत प्रबंधक होता है, जैसे रघुवंश, कुमारसंभव मादि काम्य इसमें पूर्ण जीवन वृत्तान्त नहीं होता अपितु जीवन के एक माम का वर्णन होता है। प्रकृति में मेषदूत वैसा ही एक काव्य है इसे लो गीतिकाव्य' भी कहते हैं।

यह संस्कृत साहित्य के गीतिकाव्यों में सर्वप्रथम गिना जाने वाला है कला का चरमपरिपाक, कल्पना की ऊँची उड़ान परिष्कृत मधुरिमामयी सर भाषा विषय की अक्षुण्णगति एवं छन्द की एकतानता का जो समन्वय कालिदास की इस कृति में पाया जाता है वैसा संसार में अन्य मिलना दुर्लभा क्या असंभव ही है। इसका वर्ण्य विषय अत्यन्त मर्मस्पर्शी है। इसमें दो भाग हैं, पूर्व एवं उत्तर

कोई यक्ष अपनी नवोढा प्रिया के प्रणयपाश में उलझकर अपने कर्त्तव्य में प्रसाद कर जाता है, अतः स्वामी कुबेर के कोप का भाजन ही नहीं शाप का पात्र भी बन जाता है। इस तरह वह यक्ष प्रभु कुबेर के शाप से अपनी भूमि अलकापुरी से निर्वासित होकर एक वर्ष के लिए रामगिरि पर्वत पर रहता है। पूर्वमेघ में इसी पक्ष की करुण कहानी है।

पूर्वमेष:-अपनी प्राणेश्वरी के विरह में कुश, कामुक यह यक्ष आषाढ़ मास के प्रारम्भ में मेघ को देखकर जड़-चेतन के विवेक से शून्य-सा होकर उससे अपनी प्रिया के पास संदेश के जाने के लिए कहता है पहले मेघ की प्रशंसा करता है, अलकापुरी जाने के लिए उसे रास्ते में कहाँ-कहाँ जाना होगा, इन सबका वर्णन पूर्वमेध में जिस ढंग से किया है वैसा तो कोई भी कवि

वाज तक नहीं कर सका। अलकापुरी के रास्ते में मेघ को कहीं तो भोली-भाली ग्रामीण युवतियों की आनन्दभरी कटाक्षरहित आशान्वित आँखें पीयेंगी तो कहीं वह अपने गर्जन से आकाश में उड़ती बलाकाओं को गिनती हुई सिद्धवनिताओं को डराकर उनके द्वारा अपने प्रियों का जिन करवाकर उनके धन्यवाद का पात्र बनेगा। आगे वह उज्जयिनी में महाकालेश्वर का दर्शन करेगा एवं अपनी विद्युत् के द्वारा अभिसारिकाओं को केवल मार्ग ही दिखायेगा-गरजकर उन्हें डरायेगा नहीं। इसके बाद ज्ञातास्वाद रसिक की तरह वह मेघ - अपना नाविका के समान गम्भीरा नदी का रसास्वाद करेगा। इस प्रकार वह ब्रह्मावर्त क्रौंचपर्वत आदि मानों का अतिक्रमण कर अलका में पहुंचेगा।

उत्तरमेष : मे उस अलका में पहुँचेगा जहाँ की लड़कियों रत्नों को में छिपा छिपाकर समिचौनी मेला करती हैं, जहाँ की कामिनियाँ अपने को विवस्त्र होती देखकर लज्जा से पूर्णमुष्टियों से मणिदीपों को बुझाना तो चाहती हैं पर बुझा नहीं पाती और जहाँ के राजमार्ग प्रातःकाल अभिसारिकाओं के कानों से गिरे कनक कमल धागे के टूट जाने से बिखरी हुई मालाएं और पैरों से कुचले हुए मन्दार पुष्पों के द्वारा उनके अभिसरण को सूचना देते हैं। तदनन्तर यक्ष मैच से अपने निवास स्थान का सरस एवं विलासपूर्ण वर्णन करता है तथा तन्वी अपनी प्रिया की जो स्त्रियों के सम्बन्ध में विधाता की सर्वप्रथम सृष्टि है विरहविदग्ध क्लान्तदशा का बड़ा ही हृदयस्पर्शी वर्णन करता है। अन्त में यक्ष मेम से अपनी प्रिया के लिए वह सन्देश कहता है जिससे सहृदयों का हृदय करुगा एवं भानन्द के अपारसागर में निमग्न हो जाता है, जिसमें कालिवास ने अपने प्रेमी की भावना को भर दिया है।

मेघदूत का उद्गम

कालिदास की कृतियों के प्रसिद्ध टीकाकार महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने मेघदूत का उपजीव्य रामायण माना है 'सीतां प्रति रामस्य हनुमत्सन्दे मनसि निधाय मेघदूत संदेशं कविः कृतवानित्याहुः वर्षात् कालिदास ने वाल्मीकि रामायण में भगवान् रामचन्द्र ने सीताजी के लिए हनुमान् को जो संदेश दिया था उसी को मन में रखकर 'मेघदूत' इस गीतिकाव्य की रचना

की मेघदूत में आये 'जनकतनया - स्नान पुष्पोदकेषु रघुपतिपदर मेखलासु' 'दशमुख मुजीवासितप्रस्थसन्धे' एवं 'इत्याख्याते पवनतनयं मेलबोन्मुखी सा' इत्यादि पद्यांश महामहोपाध्याय की शक्ति को और प्रवक बनाते हैं । मेघदूत के कथानक का उद्गम संभवतः ब्रह्मवर्तपुराण का वह स्थल है जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से 'आषाढ कृष्ण पक्ष की 'योगिनी' नामक एकादी के माहात्म्य को कहा है। माहात्म्य इस प्रकार है--

'अलकाऽधिपतिर्माना कुवेरः शिवपूजकः ।

तस्यासीत् पुष्पबटुको हेममालीति नामतः ॥

तस्य पत्नी सुरूपाssसीद्विशालाक्षीति नामतः ।

स तस्यां स्नेहसंयुक्तः कामपाशवसंगतः ॥

मानसाद पुष्पनिचयमानीय स्वगृहे स्थितः पत्नीप्रेमसमायुक्तो न कुबेराचार्य गतः ॥

देवसदने करोति शिवपूजनम्। मध्याह्नसमये राजन् पुष्पाणि प्रसमीक्षते ॥

हेममाली स्वभवने रमते कान्तया सह यक्षरा प्रत्युवाचाय कालाऽतिक्रमकोपितः ॥

'कस्मान्नायाति भी यक्षा हेममाली दुरात्मवान् ।

निश्रयः क्रियतामस्य' अत्युवाच पुनः पुनः ॥

यक्षा अबु - कामुको देहे रमते स्वेच्छया नृप।

यां वाक्यं समाक कुबेर कोपपूरितः ॥

आह्वयामास तं तूर्णं बटुकं हेममालिनम्।

शारदा कालात्पर्य सोऽपि भवव्याकुललोचनः ॥

आजगाम नमस्कृत्य कुबेरस्याऽग्रतः स्थितः ।

वृष्ट्वा धनदः क्रुद्धः कोपसंरक्तलोचनः ॥

प्रत्युवाच रुषाविष्टः कोपाद्विस्फुरिताधरः ।

कुबेर उवाच

रे पाप दुष्ट ! कृतवान्देवहेलनम् ॥

बतो मव श्वित्रयुक्तो वियुक्तः कान्तया सह।

गच्छस्थानमथाऽधमम् ॥

इत्युक्ते वचने तेन तस्मात् स्थानात् पपात स | अर्थात् "अलका के स्वामी यक्षराज कुबेर शिवजी के भक्त थे वे प्रतिदिन भगवान् शिव की पूजा करते थे। पूजा के लिए फूल तोड़कर लाने वाला कुबेर का अनुचर 'हेममाली' नाम का था उसकी पत्नी अत्यन्त सुन्दर रूप वाली 'विशालाक्षी' नाम की थी। एक दिन ममाली मानसरोवर से फूल तोड़कर कुबेर के यहाँ न पहुँचाकर अपने घर ही अपनी प्रिया के पास रह गया। उधर दोपहर में शिवजी की पूजा पर बैठे कुबेर फूल की प्रतीक्षा कर रहे थे। समय के बीत जाने पर क्रुद्ध होकर उन्होंने दूसरे सेवकों से जब पूछा कि 'हममाली क्यों नहीं आया, पता लगायो ?' तो पक्षों ने कहा कि वह अपने पर अपनी प्रिया के साथ बिहार कर रहा है। इसे सुनकर कुबेर आग-बबूला हो गये और तुरन्त यक्ष को बुलवाया यक्ष ने भी कुबेर की बुलाहट जब सुनी तब उसे अपना कार्य स्मरण आया फिर क्या ? डर के मारे वह घरथराता हुवा कुबेर के सामने प्रणाम कर एवं हाथ जोड़कर खड़ा हुआ तब कुबेर ने यह कहकर कि तुमने जिस प्रिया के प्रणय-पाश में बबद्ध होकर देवता का निरा दर किया है, उस प्रिया से एक वर्ष के लिए वियुक्त हो जाओ एवं हमारे इस अलकापुरी से गिर कर नीचे के लोक में जाओ' कुबेर के ऐसा शाप देने पर पक्ष वहाँ से गिर पड़ा। मेघदूत के कथानक का मूल तो यह है ऐसा कहा जा सकता है परन्तु कालिदास ने अपनी कल्पना प्रसूत सृष्टि-नैपुण्य से जो कलेवर इसे प्रदान किया है उसके कारण कवि की यह कृति मौलिक हो गयी है, यह कहने से हम नहीं चूक सकते।

मेघदूत का वैशिष्टय कल्पना का विविध विलास, घावों की कोमल -- व्यञ्जना तथा माधुर्य के सतत प्रवाह का अनुपम समन्वय होने के कारण मेष- दूत ने महाकवि को, जो प्रतिष्ठा रघुबंध एवं कुमारसंभव से मिली, उसमें चार- चांद लगा दिया। मेघदूत वस्तुतः विरह-पीड़ित मानव का सम्पूर्ण अन्तर्जगत् माशा हो या निराशा, हर्ष हो या विवाद सब भावों को हमारे सामने खड़ा कर देता है। मेघदूत के प्रतिश्लोक के हर एक शब्द में विरह-पीड़ित हृदय की कसक और सूक्ष्म धड़कन सुनाई देती है। कवि ने उसके उपयुक्त मन्दाक्रान्ता छन्द का भी उपयोग किया है। साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ ने

'निसृष्टार्थी मिता तथा सन्देशहारकः ।

कार्यस्त्रिधा दूतो दूत्यचापि तथाविधाः ॥ " (३-५८) यह लिखकर दूत के तीन भेद माने हैं- ( १ ) निसृष्टार्थ (२) मिता (३) सन्देशहारक अब हम तीनों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं। (१) निसृष्टार्थ विश्वनाथ ने इसके सम्बन्ध में लिखा है--

"उपय स्वयं वदति चोतरम् ।

लिष्टं कुरुते कार्य निसृष्टार्थस्तु स स्मृतः ॥" अर्थात् निसृष्टा दूत वह है जो दोनों (३५९) पक्षों (जिसने भेजा एवं जिसके पास भेजा ) के भावों को जानकर स्वयं संन्देश कहे और पूछे जाने पर वैसा ही उपयुक्त उत्तर भी वे और कार्य को सफल करे।

(२) मितार्थ - मितार्थमासी कार्यस्य सिद्धकारी मितार्थकः' (साहित्य ३६०) जो दूत कम बोलकर कार्य सिद्ध कर दे उसे मितार्थ- भाषी कहते हैं।

(३) सन्देशहारक सन्देशहारक' वह दूत है जो भेजने वाले व्यक्ति के द्वारा जितना ही कहा जाय उसी वाक्य को वह वहाँ कहे। जैसा कि विश्व नाथ लिखते हैं-

यावद्भाषितसन्देशहारः सन्देशहारकः ॥ ( सा० द०, ३-७०) बाल्मीकि रामायण में राम के सन्देश को सीता के पास पहुंचाने वाले श्री हनुमान जी 'निसृष्टार्थ दूत हैं, इसी प्रकार श्रीमद्भागवत में मणी के संदेश को भगवान् श्रीकृष्ण के पास पहुंचाने वाले ब्राह्मण भी निसृष्टार्थ दूत हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल का 'षिकेशी' मिठार्यदूती है। मालतीमाधव में नन्दन से भेजा गया पुरुष 'सन्देशहारक' दूत है।

प्रकृत प्रबन्ध में महाकवि ने मेष का ऐसा चित्रण किया है कि यह उपर्युक्त तीनों दूतों में से किसी में भी अन्तर्भूत नहीं हो सकता क्योंकि सन्देश पहुंचाने बाले दूध के लिए चाहे वह जिस श्रेणी का दूत हो चेतन होना आवश्यक है। अन्यथा यह वक्ता के भाग को कैसे समझ सकता है। प्रस्तुत काव्य का दूत तो 'धूमज्योतिः सलिलमस्तां सन्निपात: नय मेघः' है परन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि साधारण व्यक्ति प्रायः ( सन्देशहारक ) अभिधावृत्ति से अपने अभिप्राय का प्रतिपादन कर अपना पिट छुड़ा लेता है, मध्यम प्रतिभा

यामा ( मितार्थ) लक्षणावृत्ति' के द्वारा अपने भावों को लक्षित कराक कार्यनिष्पन्न करता है परन्तु अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न परिपक्व विचारवाल (सृष्टार्थ ) दूत लक्षणा से भी ऊपर उठकर व्यावृति के द्वारा अपने वक्तव्य को अभिव्यक्त करता है।

प्रकृत में महाकवि कालिदास ध्वनिकदि हैं। व्यचप्रधानवाक्य हो 'ध्वनि कहलाता है। महाकवि ने इसीलिए प्रस्तुत रचना में जनवृत्ति के द्वार संदेश अभिव्यक्त कराकर अपनी अद्भुत कल्पना का चमत्कार दिखलाया है मेघदूत की अमरवाणी

(१) मेघालोके भवति निवृतः कण्डावलेय-प्रणयिनि जने किं पुनरसंस्थे ? [१३]

(२) कामाती हि प्रकृति कृपणाश्चेतनाचेतने[१५] (३) याच्या मोपा वरमधिगुणे नाऽधमे लकामा [१६]

(४) 'आशाबन्ध: कुसुम प्रायाङ्गनानां सद्यः पाति प्रणविहृदयं प्रयोग [1-10 ]

(५) नोऽपि प्रथम सं

प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनस्तयोः [१-१७]

(६) 'रिक्त सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय' [१-२०]

(७) स्त्रीणामायं प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु [१-२८] (८)

मन्दायन्ते न व सुहृदामभ्युपेताऽकृत्या [१-१८]

(९) शातावादी विजयन को विहा समर्थः [१-४१]

(१०) मा सम्पदो तमानाम् । [१-५३] (११) केन स्युः परिभवपदं निष्फलाऽऽरम्भयत्नाः[१-५४ ]

(१२) सूर्यापायेन स कमलं पुष्यति स्वामभिस्याम् [२-१९]

(१३) प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्तिरार्द्रान्तरात्मा [२-३२] (१४) 'कान्तोदान्तः सुहृदुपगतः सङ्गमात्किचिदून [ २-३९]

(१५) 'स्यायन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा । नीचैच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण [ २-४८ ]

(१६) स्नेहानाहुः किमपि विरहे ध्वंसिनस्ते स्वा दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशोभयन्ति' [२-५१] । (१७) प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सिताऽयं क्रियैव [२-५३ ]

रचना में उन व्यक्तियों के प्रति जिनसे लेखक लाभान्वित होता है तेल के माध्यम से बाभार प्रदर्शन एक प्रथा है जिसका मैं निर्वाह कर रहा हूँ नहीं तो परम पूज्य गुरुवर पं श्री नन्द जी (म्याय प्रवक्ता का हि० वि० वि०) के लिए भी मेरे पास कोई ऐसा शब्द हो सकेगा जिसके माध्यम से उनका आभार व्यक्त कर सकूं ? सच्ची कृतज्ञता तो हृदय से होती हैं। मेघदूत की इस इन्दुकलाटीका में जो कुछ भी लिख सका है यह सब पूज्य गुरुजी के कारण ही अतः श्री चरण में शतकोटि प्रणाम करता हुआ भाशा करता कि बागे भी इसी प्रकार आपके वात्सल्य की सुखद छाया हमें मिलती रहेगी। अव रूप पं० श्री हरेकान्त जी मिश्र का भी मे परम बाभारी है जिनके सुन्दर पथ-प्रदर्शन के कारण ही मैं इस टीका को पूर्ण कर सका हूँ सती श्री बौनानन्द जी सा एवं श्री राधारमण ठाकुर जी का भी उपकृत हूँ। अतः हृदय से आभारी हूँ एवं जिनके वस्तुतस्वनिर्देशन एवं मत्साहवर्द्धन के कारण ही यह टीका सम्पूर्ण हो सकी और जिनके अमोष आशीर्वाद का मैं आजीवन अभिलाषी हूँ उन पूज्य गुरुचरण पं० श्री रविनाथ झा ( रीडर का हि० वि० वि०) के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के अतिरिक्त में क्या निवेदन कर सकता हूँ? अन्त में प्रकाशक महोदय का भी आभारी हूँ जिनके सदुत्साहपूर्ण प्रेरणा के कारण ही मैं सरस्वती की इस उपासना में लग सका है। यद्यपि मेकी मेघदूत की अन्य बहुत-सी टीकाएँ उपलब्ध है परन्तु मैने अपनी इस टीका में उन सब अभावों की पूर्ति का प्रयास किया है जिनका अन्य टीकाओं में अभाव रहा है या कठिनाई रही है टीका के शब्द प्रायः सरल है, अतः यदि इसके माध्यम से छात्रगण थोड़ा भी लाभान्वित हो सकेंगे तो मैं अपने परिश्रम को सफल समक्षूंगा। इस टीका में कतिपय अन्य टीका एवं ऐतिहासिक ग्रंथों की सहायता मुझे लेनी पड़ी है, अतः उन सब के प्रति में हृदय से आभारी हूँ।

प्रकाशन की भूल से या मेरे मतिभ्रम से यदि टीका में किसी प्रकार की त्रुटि रह गई हो तो इस रीति से क्षमा करेंगे।

'गच्छतः स्वनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः,

हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ।।

ग्राम-जलपुरा, पो०-तुपाड़ (ताजपुर ) अनु० अंशारपुर, जि० मधुवनी ( बिहार )

विनीत

श्लोकानुक्रमणिका

पूर्वमेधः

लो० पृ०:

८४

हरति पवनः० १४ २७ स्वनिष्यन्दोवसति वसु० ४२ १०५

अप्यन्यस्मिर म० ३४ ८९ स्वय्यादा जलमा अम्भोविन्दग्रहणचतुराया० ५५ वा कृषिफलमिति आपृच्छस्व १२ ३३

त्वामा प आराध्येनं शरवणमवं देव० ४५ ११४

त्वामासार प्रशमित बनो १७ ४५

आसीनानां सुरभित० ५२ १३८

दो उत्पस्यामि त्वयि तटगते० ५० १४७

घुमज्योतिः सलिलमत [५] [१५

] उत्पयामि तमपि स २२५७

नीचैरास्यं गिरिमधिवसे० कविता-विरहगुरुणा ० १ १

गच्छन्तीनां रमणवसति ३७ ९७

गम्भीराय: पयसि सरित० ४० १०३

पादन्यासः परि० छत्रोपान्त: परिणतफल १८४६

जातं जे भवन-विदि ६१८

मोदीर्णेरुपतिवपू० ३२ ८५ क्योल ग - ४४११२ [ चेद्राय सरति ० ५३ १३३

तत्र व्यक्तं वृदि चरणा० ५५ १३८ तत्रावश्यं कुलिशोद० ११ १५१

ये संरम्भोत्पतनरभसाः ५४ १३६ तस्मात् गरन० ५० १२६

तस्मिन्काले नयनसलिलं० ३० १०१ क: पत्या यदपि भवः० २७. ६८

तमी कतिचिदवला० २ ६ तस्य स्थिरमा कथमपि पुर० ३ १०

तस्याः ककरघुतम ४१ १०८ श्रेणी भूतप्रतनु-लिला २९ ७३

तस्याः पातु मरगज इव० ५१ १२१ शब्दायन्ते मधुरमनि तस्यानिजम०

२०५१ २०५१ मा त्वमसि शरणं ७. २१ तस्योत्सहने प्रणयिन इ०

६३ १५५ स्थित्वा तस्मिन्वनचर तामुतीयं ब्रज परिचित० ४० ११९

तेषां दिक्षु प्रथितविदिशा० २४ ६१

४६ ११६

१६४३ ८ २४

३१७७

२५ ६३

कर्तुं प्रभवति मही० ११३१

नीपं पुष्ट्वा हरितकपिशं ० ( दिनकरयस्प०)

२१ ५३

पश्चादुच्चैर्भुज-तरुवनं म० ३६ ९४ १८ १४५ पाण्डुच्छायपवनः ०२३५९

३५ ९२

प्रत्यासन्ने नभसि दविता० ४ १३ (प्रयोतस्य प्रियदुहितरं व०) प्राप्यावतीना को ३० ७५

८२

प्रायास्य-समति ० ५६ १४२ ब्रह्मावर्त जनपदमा ४८ १२१

भः कण्ठच्छविरिनिगणैः० ३३८७. मन्दं मन्दं नुदति पचन ९ २७ तत्र स्कन्द नियतवसति ४३ ११० मार्गान् कथयत०] १३ ३५

रत्नच्छायतिकर इ० १५४१

विधान्तः सत्वज बनन० २६ ६६

मिनिवि० १८७१

५६ १४०

१९४८

तकनी० ३८ ९९ सोचा दिवसगणनात १० २९

(हास्तरांस्तसगुटिका० ) हित्वा तस्मिन् गज ०

६० १४०

हित्वा हालामभिमतरसां० ४९ १२ हेमाम्भोजप्रसवि सलिले० ६२ १५३

८०

अशान्तभवन-निधयः प्र० ८ अना प्रतनु तनुना

१७९

नीवीबन्यो सिसिचि ० २५४ नूनं तस्य प्रति० २१ २१०

५ १७२

३९

आये बद्धा विरहृदिवसे या० २९ २३१

नेवा नीतोः सततगतिना०

६१७४

आधिक्षामा विरशयने स० २६

२२४ पादानिन्दोरमृतशिशिरा० २७

२२६ २४७

(आनन्दत्यं नयनसलिले) आलोके ते निपतति पुरा०

१६५

भर्तुमि प्रियमविधवे ! वि०

३६

२२

२१३

मित्वासद्यः किसलया भूयश्राह मायने

४४

२६५

आश्वास्यैव प्रथमविरहीद०

५०

२८०

४८ २७४

इत्याख्याते पवनतनयं मै० उत्सङ्गे वा मलिनवसने० २३ २१६

३०२४९

मत्वा देवं धनपति य० मन्दाकिन्याः सलिल शि

१० १८३

४ १७०

एतत्कृत्वा प्रियमनुचिता०

५२२८५

मामाकाशप्रणिहितभुजं ४३ २६३

एतस्मान्मा कुशलिनमभि०

४९

२७६

स्त्रीणां प्रियतमभुजा

७ १७७

एभिः साधो हृदयनिहि

१७

२००

( योत्यत्तभ्रमरमुखराः ० )

१६३

कच्चिसौम्य [] [स्तवसि० गत्युत्कम्पालकपतितैयै •

५१२८२

यस्यां यक्षाः सितमणिम

५१६७

९१८१

रक्ताशोकल किसलयः०

१५ १९५

गत्वा सय: कलमतनुतां

१८२०२

द्वापाङ्गप्रस०३२२३८

जाने] सस्यास्तव मनः म०

३१२३६

वापी पास्मिन् मरकत●

१३ १९०

( सन्देश जलधरवरी) तत्रागारं धनपतिगृहात०

२८८

वावास्या कर

३३२४०

१२

१८८ वासविणं मधु नयनयो

१११८६

तन्मध्ये च स्फटिक फलका १६

१९७ विद्युत्वन्तं सति वनि

११५८

तन्वी दयामा शिरिवश० १९ २०४

शब्दाख्येयं यदपि किलः

४० २५६

तस्मिन् काले जलद ! यदि०

३४

२४३

शापान्तो मे भुजगशयन

४० २७१

तस्यास्तीरे रचितशिखरः०१४

१९२

शेषान्मासान्विरहविवस्था २४ २१९

जानीथाः परिमित सामायुष्मन्मम च वचना०

२०२००

श्यामास्वयं चक्तिहरि० ४१

२५८

३८

२५२

(वाबात जलदकवितto) संक्षिप्यते क्षण इव

तामुत्थाप्य स्वजलनिका० २५

२४५

क०४५२६७

स्वामलिस्य प्रणयकुपित० ४२ २६१ सव्यापारामहनिन तथा० २५

२२१

जन्वात्मानं बहु विगणय ४६

२६९ सा संन्यस्ताभरणमला ३०

२३३

निःश्वासेनाधर किसलय० २८ २२८ हस्ते सीताम २ १६०

२९०

॥ श्रीः ॥

मेघदूतम् 'इन्दुकला' संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम्

अथ पूर्वमेघः

कश्चित् कान्ता-विरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः । जनकतनयास्मान-पुण्योदकेषु स्निग्धच्छायातरुषु बर्सात रामगिर्याश्रमेषु ॥ १ ॥

अन्वयः-स्वाधिकारात् प्रमत्तः कान्ताविरहरुमा वर्षमग्भर्तुः शापेन अस्तमितमहिमा कचित् यक्षः जनक- तनया-स्नानपुष्पोदकेषु स्निग्धच्छाया- तर रामधिमेषु वसति च ।

स्वाधिकारात्कर्तव्यात्प्रमत्तः असावधानः कान्ता- विरहगुरुणा प्रेयसीवियोगदुः सहेन वर्षभोग्येण संवत्सरायेण भर्तुः स्वामिनः कुबेरस्येति यावद, शापेन दुरेषणमा अस्तमितमहिमा अक्षम- महत्त्वः कचित् कयनामा, पक्षः गुहाकः जनकतनयास्नानपुष्पोदकेषु रामगिरिनामकपर्वतायनेषु वसतिया चकार = = -

शध्दार्थ: स्वाधिकारात् अपने कर्तव्य से प्रमत्तः असावधान, कान्ता विरहगुरुणा प्रेयसी के वियोग से दुःसह वर्षभोग्येण (एक) वर्ष तक भोगे जाने वाले भर्तुः मालिक (कुबेर) के शापेन शापसे, अस्तंगमितमहिमा जिसकी महिमा मलिन (असमर्थ ) बना दी गयी है, यक्षः हाक "एक = =

= देवयोनिविशेष" जनकतनयास्नानपुष्पोदकेषु सीता जी के स्नान करने के कारण पवित्र हो गया है जल जहाँ का, स्निग्धच्छायातरुषु धने छाया वाले वृक्ष हैं जहाँ पर (ऐसे ) रामगिर्याश्रमेषु रामगिरि नामक पर्वत के आश्रमों में वसति अपना निवास बनाया ।

भावार्थ:- स्वकर्तव्ये असावधानः कश्चिदशानामधेयो यक्षः स्वामिनः कुबेरस्यानयोगरूपैर्षभोग्या शापाद (तमभिशप्त समयमतिवायितुम्) महावाक्षेषु "रामगिरि" पर्वतकुटीरेषु स्वनिवासं कृतवान् ।

हिन्दी - अपने कर्तव्य में बसावधानी करने वाले ( अट एग ) अपनी प्रियतमा के वियोग के कारण दुःसह एवं एक वर्ष तक भोगे जाने वाले स्वामी कुबेर के शाप से असमर्थ महिमावाले किसी यक्ष ने "रामगिरि" नामक पर्वत के म में अपना निवासस्थान बनाया।

समासः कान्ताविरहगुरुणा कान्तायाः विरहः कान्ताविरहः ( ६० सत्०) कान्ताविरहेण गुरुः (तृ००) कान्ताविरहगुरसतेत कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् स्वस्थ अधिकार: स्वाधिकारः ( प तद्०) अथवा स्वः अधिकारःस्वाधिकारः ( कर्मधारय) अस्तंगमितमहिमा == अस्तंगतो महिमा यस्य (बहुवीहि ) स अस्तंगमितमहिना वर्षभोग्येण = वर्ष भोग्यः वर्षभोग्यः यहाँ पर वर्ष के बागे जो द्वितीया विभक्ति है यह "कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे च" इस सूत्र से विहित है पश्चात् aeroयोगे इस सूत्र से समास किया गया है। जनकतनयायाः स्नानं जनकतनयास्नानम् (६० तत्०) जनकतनयास्नानः पुण्यानि उदकानि ये (बहुव्री) जनकतनयास्नानपुष्पोदकेषु स्निग्धच्छायातरुषु निग्धा च सा छाया स्निग्धच्छाया (कर्मधारय), यहाँ पर "पुंवत्कर्मधारय जातीयदेशीयेषु" इस सूत्र से "स्निग्धा" इस enteres rest पुंवद्भाव होकर स्निग्ध ऐसा रूप बना; पश्चात् तुगादि करके स्निग्धच्छाया ऐसा प्रयोग बनाया जाता है। तिच्छाया प्रधानास्तरको येषु स्निग्धच्छायातर यहाँ पर "शाकपार्थिवादीनां सिद्धव उत्तरपदलोपन" इस वार्तिक से "प्रधान" इस मध्यम पद का लोप कर समास किया गया है।

कोशः प्रमादोऽनवधानता इत्यमरः गुरुस्तु गीयते श्रेष्ठे गुरी पितरि मेरे इति शब्दार्णवः शापाकोशी दुरेपणा इत्यमरः । विद्याधरोऽसयक्षरक्ष गन्धर्वकिन्नराः इत्यमरः । वत्सरे वर्षस्त्रयाम् इत्यमरः । नितु म सान्दति दायः छाया वृक्षो नमेरुः स्यात् ।

टिप्पणी-स्वाधिकारात् अधिक्रियते अस्मिन्निति अधिकार: यहाँ पर 'अधि' उपसर्गपूर्वक 'कृ' धातु से अधिकरण में 'लक्ष' (पा० ०२३१) सूत्र से 'पत्र' प्रत्यय होकर 'अधिकार' यह शब्द निष्पक्ष हुआ है 'स्वाधि 'कारा' यहाँ जो पचमी विभक्ति आयी है. यह 'प्रमस:' इस पद का योग रहने के कारण 'गुप्ता विरामप्रमादानामुपसंस्थानम्' इस बात से अपादान संज्ञा होकर 'अपादाने पचमी' से पंचमी हुई है। प्रमत्तः प्र' उपस पूर्वकम' धातु से क्त' प्रत्यय होकर 'प्रमत्तः' ऐसा रूप बना है। (प्र+मद + क्तप्रमत्तः) वर्षभोग्येण इस पद का विमत्यादि विश्लेषण तो समास के सन्दर्भ में ही प्रदर्शित कर दिया गया है, यहाँ पर 'भोग्य' इस पद के सत्य पर मोड़ा विचार किया जा रहा है-"भोक्तुं योग्य:' इस विग्रह में पालन और अभ्यवहार ( भक्षण ) इस अर्थ में स्थित रुधादिगणस्य 'मुन्' धातु सेोद' इस से 'यत्' प्रत्यय का विधान करके 'चलोः कुषिष्यतो:' इस सूत्र से जकार को कुल वकार होकर गुणादि करके 'भोग्य' ऐसा रूप बनता है। इसी धातु से मक्षण अर्थ में 'भोज्यं भक्ष्ये' इस सूत्र से कुत्व का aare विधान करके 'भोग्य' ऐना रूप बनता है। विभति इति मर्त्ता तस्य भर्तुः, धारण और पोषण अर्थ में विद्यमान ' (यु) मृन्' धातु से 'ब्लतृचों इस सूत्र से कर्त्ता में तृच् प्रत्यय होकर 'म' शब्द सिद्ध होता है, उक्त प्रयोग उसी शब्द के पट्टी एकवचन का है। शापेन शपनं शापः इति शाप इन दोनों विग्रहों से आको अर्थ में विद्यमान 'श' धातु से भाव में 'भाये' इस सूत्र से 'व्' प्रत्यय हुआ है; यहाँ पर 'शाप' शब्द से हेतु में तृतीया विभक्ति 'देवी' इस सूत्र से हुई है, क्योंकि यक्ष की महिमा शाप के कारण ही मस्तंगत हुई थी। स्तङ्गमित महिमा 'अस्तम्' यह मान्त बव्यय है। गमित गत्यर्थक 'गम्' धातु से 'हेतुमति च' इस सूत्र से 'शि' प्रत्यय होकर =

समिधा बना उससे कृदन्तीय 'क' प्रत्यय होकर 'गमितः ऐसा रूप बनता है ( गम् + + = गमितः) महिमा महतो भावः इस विग्रह में 'महद' = शब्द में पृथ्यादिभ्य इमनिज्वा' इस सूत्र से 'इमनिच्' प्रत्यय होकर 'महिमा है।'' यह विशेषण जो यक्ष के साथ लगाया है वह साभिप्राय है, क्योंकि स्वामी के शाप के द्वारा यदि उसकी महिमा असमर्थ न बना दी गयी होती तो वह मणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियों के मध्य पाँचों विद्धि प्राप्तिः' के द्वारा अथवा अदृश्यरूप होकर स्वयं प्रिया से मिल सकता था, अतः कवि ने मेतत्व के निर्वाह के लिए पह विशेषण दिया है। रामगिर्याश्रमेषु यहाँ पर बहुवचनान्त प्रयोग को देख कर यह प्रतीत होता है कि अपनी प्रिया के विरह से इतना विन्न किवा अव्यवस्थितचित्त हो गया था कि वह स्थिर रूप से  एक आश्रम में नहीं रह पाता था, अतः एक आश्रम से दूसरे आश्रम में अपना डेरा बदलता रहता था बल्लभदेव और महिनाथ के मतानुसार चित्रकूट पर्वत ही राम- गिरि है। डा०वान के मतानुसार नागपुर से उत्तर रामटेक पर्वत ही राम- गिरि है परन्तु आधुनिक अन्वेषकों का कहना है कि मध्यप्रदेश में जो 'रामगढ़' पर्वत है, जो कि अमरकूट कूट के समीप है एवं नर्मदा का उद्गम स्थान है 'रामगिरि है यह मत युक्तियुक्त भी प्रतीत होता है, क्योंकि महाकवि ने भी आगे चलकर इन दोनों वस्तुओं की पर्चा की है वसत- निवास वर्ष में स्थित 'यस' धातु से 'बहिस्पतिभ्यश्च' इस मौणादिक सूत्र से 'अति' प्रत्यय होने पर वसनि रूप बनता है। चक्रे (करण) करण अर्थ में वर्तमान एवं जिसके अन्त में अकार को इत्संज्ञा की गयी है ऐसे 'कृ' धातु से परोक्षभूत 'वि' लकार जाने पर ''यह हर बनता है। यहाँ पर क्रिया का कर्ता को प्राप्त होने के कारण एवं धातु के 'जिद' होने के कारण 'स्वरितवतः कर्मभिप्राये क्रियाफले से आत्मनेपद हुआ है। पत कौन-सा काव्य माना जाय इस प्रकार का प्रश्न उपस्थित होने पर कुछ विद्वानों का कहना है कि 'प्रस्तुत काम्य खण्डकाव्य है, इस उक्ति की पुष्टि में उनका प्रमाण साहित्यदर्पण की ' भवेद काव्यस्यैकदेशानुसारि यत्

यह पक्ति है। महाकवि ने "वर्णन के सौष्ठव" को महाकाव्य का प्रयोजक माना है। अतः उनके मतानुयायी विद्वज्जन मेघदूत को महाकाव्य की गणना में रखते हैं। उक्त ग्रन्थ गीतिप्रधान होने के कारण पाश्चात्य विद्वान् मैक्डोनल्ड ने इसे "गीति काव्य" माना है। मेघदूतः "मेष एव दूतः मेघदूतः इस तरह रूपक समात की यदि दवा की जाय तो यह पद लिङ्ग एवं अभेद क्षणया प्रत्यवाचक बन जायगा। यदि मेष एव तो पस्मिस्तत् मेघदूतम् अर्थात् नेम ही हो दूत जिसमें इस प्रकार अत्यपद प्रधान बहुवीहि समास की विवक्षा की जाय तो यह पद नपुंसक हो जाता है। निर्विघ्नतापूर्वक ग्रन्थ की समाप्ति के लिए ग्रन्थ के आरम्भ में धन्य के मध्य में एवं अन्य के सन्त ने "मङ्गल" किया जाता है, ऐसा शिष्टों का अर्थात् आत पुरुषों का आचार है। यह मङ्गल तीन प्रकार का होता है, जैसे कि "बाशीनंमस्क्रिया वस्तुनिवेशोऽपि तन्मुखम् अर्थात् (१) आशीर्वादात्मक ( २ ) नमस्क्रियात्मक और (2) वस्तु- निर्देशात्मक, इस प्रकार तीन तरह के मंगल होते हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ 'क' अक्षर से प्रारम्भ होता है जो कोश के अनुसार वायु ब्रह्मा और सूर्य का नायक है ( red due बने) अतः यहाँ भी मंगल किया गया है ऐसा समझना चाहिए। यहाँ वस्तु-निर्देशात्मक मंगल दिया गया है। इस प्रस्तुत प्रत्य में शृङ्गार रस है। श्रृंगार रस के दो भेद होते हैं- ( १ ) संयोग और (२) । के भी चार भेद है - ( १ ) पूर्वराग (२) मान (३) प्रयास और (४) करुण यहाँ पर यक्षाधिप के शाप से इस अज्ञात नामा पक्ष को 'प्रवास' मिला है, अतः इस काव्य में प्रयासरूपम्भिर है। कश्चित जिस कविचचूड़ामणि कालिदास के लिए वागधिgrat देवता बामी ने स्वयं 'मेवा' का सुस्पष्ट उद्घोष किया था, क्या वे अपने ग्रन्थ में उस यक्ष का नाम नहीं लिख सकते थे ? पर उन्होंने नहीं लिखा, इसका क्या कारण ? इस पर विचार करने से यहीं कहा जा सकता है कि धर्मशास्त्र ने अभिशप्त व्यक्ति का नाम लेने का निषेध किया है भर्तुराशां न कुर्वन्ति ये च विश्वासघातकाः । तेषां नामापि न ग्राह्य शास्त्रादी तु विशेषतः ॥ इत्यादि आधुनिक टीकाकार तो इसका हेतु यह प्रस्तुत करते हैं कि काल्पनिक वृत्त वाले काव्यों में नाम बतलाने की जरूरत नहीं थी।

अलंकार- (क) वहाँ पर शाप के प्रति 'स्वाधिकारात को हेतु बताया गया है एव 'अस्तमितमहिमा' के प्रति शाप को हेतुक बताया गया है अतः यहाँ पदार्थहेतुककाम्पल अलङ्कार है।

(ख) विशेषण यदि साभिप्राय हो तो परिकरांकुर' अलंकार होता है ऐसा आलंकारिकों का सिद्धान्त है यहाँ 'अस्तमितमहिमा' रूप विशेषण सामि प्राय है अतः यहाँ पर भी परिकरांकुर अलङ्कार है।

छन्दमन्दाक्रान्ता जनताद्गुरू वेद' इस लक्षण के अनुसार मेघदूत में मगण ( 355 ) भगण ( 521 ), नगम ( 111 ) तगणा (552), तगण (ा) और दो गुरु ( 55 ) होने से मन्दाक्रान्ता छन्द है। यह छन्द समत है इसमें चौथे, छठे एवं सातवें अक्षरों पर यति (विश्राम) होता है। जैसा कि

कविता याविरहगुरु वास्वाधि कारात् मत्तः । । १

तस्मिन्नौ कतिचिव बलाबप्रयुक्तः स कामी नोत्वा मासात् कनकवलय-भ्रंशरिक्त-प्रकोष्ठः । आषाढस्य प्रथम दिवसे मेघमाविलष्ट- सानुं क्रीडा - परिणतगजप्रेक्षणीयं

ददर्श ॥ २ ॥

अन्वयः तस्मिन् बडो अबला विप्रयुक्तः कनकरिक-प्रको कामी सः कतिचित् मासान् नीत्वा आषाढस्य प्रथमदिवसे माश्लिष्टसानुम क्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम् मेवम् ददर्श ।

व्याख्यातस्मिन्पूर्वोक्ते अद्रपर्वते रामगिरी इति यावत् अलाव युक्तः प्रियाविरहितः कनकवलयभ्रंशरितप्रकोः स्वर्णकटक-पातन्यकक्षा- नारः, कामी कामुकः कतिचित् कतिपयान् मासान् शिविससमूहात्मक- मासाभिधेयान् अष्टौमासानित्यर्थः येषान् मासान् नमय चतुरः' इति सप्त- चत्वारिंशत्तमे (४७) लोके कथयिष्यति, अतः नीत्या व्यतीत्य आषाढस्य=

मासस्य प्रथम दिवसे आचाहो, आश्लिष्टसानुम् समालिङ्गित- शृङ्गम्, क्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम् उत्खातकेति संलग्न तिर्यग्दन्तप्रहार- हस्तिविलोकनीयम् । मेषम् वारिदम् दद अवलोकयामास ।
- = - - = शब्दार्थः तस्मिन=उस ( पहले कहे गये) में, अद्रौ पर्वत में, अर्थात् रामगिरि में अलाविप्रयुक्तः अपनी प्रिया से बिछुड़ा हुआ, कनकवलय- शरिक्तप्रकोष्ठः सोने के कङ्कण गिरजाने से सूनी हो गयी है कलाई जिसकी, कामी विषयविलासी, सः वह यक्ष, कतिचित् कुछ (आठ), मासान्- महीनों को नीत्वा बिताकर आषाढस्य आषाढ़ महीने के प्रथमदिवसे पहले दिन आश्लिष्ट सानुम् पहाड़ की चोटी को जकड़े हुए, aster- परिणत गजप्रेक्षणीयम् टेढ़े होकर खेल में टीले पर दाँतों से प्रहार करने वाले हाथी के समान देखने योग्य, मेघम् = बादल को, ददर्श देखा ।
भावार्थ:- वल्लभावियुक्तः सः कामुको यक्षः, अत्यन्तकार्यात् यस्म मणिबन्धः कनक कटकोऽपि भ्रष्टः सः पूर्वोक्त- रामगिरी अष्टो मासान् व्यतीत्य जाषादस्य प्रारम्भ एवं दिने पर्वत शृङ्गसंलग्नं यस्यां क्रीडायां हस्तिनः तिर्यग्भूय दन्तेः उच्चस्थानेषु प्रहारं कुर्वन्ति ( मृत्तिकादिकमुत्खनन्ति ) तस्यां क्रीडायां संततं दर्शनीयं हस्तिनमिव मे दद
हिन्दी-अपनी प्राणप्रिया से वियुक्त, ( अत एव ) दुबले होने के कारण स्वर्णक के गिर जाने से शून्य मणिबन्ध वाले कामी उस यक्ष ने बाढ़ महीने के पहले ही दिन पर्वत की चोटी से सटे हुए एवं टीले पर तिरछे होकर दांतों से प्रहार करने वाली क्रीडा में लगे हुए हाथी की तरह देखने योग्य मेघ को देखा ।
समासः - अवलाविप्रयुक्तः = अबलया विप्रयुक्तः अबलाविप्रयुक्तः (तृ० तद०) कनकस्य वलयः कनकवलयः ( प० तद्) तस्य न रिक्त- प्रकोष्ठो यस्य स कनकवलयभ्रंश- रिक्तप्रकोष्ठ (बहुव्रीहि), वप्रक्रीडासु परिणतः वत्र क्रीडापरिणतः (स० त० ) स चाम्रो गजच इति पप्रकीडा- परिणतगज: ( कर्मधारय) तद्वत् प्रेक्षणीयम् वप्रक्रीडापरिणतगण प्रेक्षणीयम् ( उपमान कर्मधारय ) ।
कोश:- स्त्री योषिदवसा इत्यमरः कटकं वलयोऽस्त्रियाम् इत्यमरः । कक्षान्तरं प्रकोष्ठः स्यात् इति शावत तिर्यग्दन्तप्रहारस्तु गजः परिणतो मतः इति हलायुधः । उत्लातकेलिशृङ्गाप्रक्रीडा निगद्यते इति शब्दानंवः । अद्विगोत्र- गिरि-प्रावा-बल-शिलोच्चयाः इत्यमरः अनं मेघो वारिवाहः इत्यमरः ।
टिप्पणी-मला-विद्यमानं बलं यस्याः सा अबला यहाँ पर "मओ- त्यर्थाना वाच्यो वाचोत्तरलोपः " इस वार्तिक से न बहुव्रीहि समास हुआ है। यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिए कि अबला में अपुत्रः की तरह समास न होकर 'अनुदरा कन्या' की तरह समास हुआ है, क्योंकि न का केवल अभाव मात्र अर्थ नहीं है अपितु ६ अर्थ है-
"तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदस्पता
अप्राशस्त्यं विरोधच नवर्याः पद् प्रकीर्तिताः ॥ इसका अभिप्राय यह है कि नल के सादृश्य, अभाव, भिन्नता, अल्पता, अप्रशस्तता और विरोध ये ६ अर्थ हैं यहाँ अल्प अर्थ में "न" है।
विप्रयुक्तः - ( विप्र + पुज् + क्त) यद्यपि यहाँ पर योग ( सम्बन्ध ) अयं में विद्यमान "युज्" धातु से "क्त" प्रत्यय होकर उक्तरूप निष्पन्न हुआ है, परन्तु "बि" और "" ये दो उपसर्ग लग जाने से अर्थ बिल्कुल विपरीत हो गया। कहा भी गया है-
उपसर्येण धात्वर्थी बलादन्यत्र नीयते ।
प्रहाराहारसंहार-विहार परिहारवत् कामी- उक्त पद की निष्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है
कामयते तच्छीतः अस्यास्तीति इस विग्रह में इच्छार्थक कम् धातु से "सुप्यजातो गिनिस्ताच्छील्ये" इस सूत्र से "मिनि" प्रत्यय करके "कामिन्" शब्द बनाके "कामी" की निष्पत्ति हो गयी २-कमनं कामः इस विग्रह में "कम्" धातु से भाव में "भावे" इस सूत्र से "घव्" प्रत्यय करके "काम" बना पश्चात् "कामः बस्ति" इस विग्रह में अत इनिठनौ" इस सूत्र से इनिप्रत्यय करके "कामिन्" शब्द बनायेंगे। यक्ष का यह विशेषण
देकर कवि ने यक्ष के लिए प्रिया वियोग को असाता बताई है। कतिचित्- "कम्" शब्द से "किमः संख्या परिमाणे इति च" इस सूत्र से "इति" प्रत्यय करके (किम्+इति ) "कति" शब्द बनाके उससे "विद" अभ्यय जोड़कर "कतिचित्" शब्द बनाते हैं कतिशब्द हमेशा बहुवचन में ही प्रयोग किया जाता है। आषाढ- " आषाढा इति नामकेन नक्षत्रेण युक्ता पौर्णमासी" ऐसे विग्रह में आषाढा इस प्रातिपदिक से "नक्षत्रेण युक्तः कालः " इस सूत्र से अन् प्रत्यय का विधान करते हैं पश्चात् दि होने के कारण eatre की faeक्षा में टिड्ढाण यस मात्र श्रुतयष्ठक् कक्वरप" इस सूत्र से "डोप्" करके "आषाढी" ऐसा पद बनाते हैं ( आषाढा + अ + डीप्लाषाढी) आषाडपत्ति अस्मिन् मासे इस विग्रह में "आषाढी" इस पद से "साऽस्मिन् पौर्णमासी" इस सूत्र से अण् प्रत्यय करके "आषाढ" ऐसा मास वाचक पद निष्पन्न होता है। प्रथम दिवसे- कुछ लोग "प्रत्यासत्रे नभसि अर्थात् श्रावण महीने के समीप आने पर इस पद के सामञ्जस्य के लिए प्रथमदिवसे के स्थान पर 'प्रथम दिवसे' अर्थाद आषाढ़ के बीत जाने पर ऐसा पाठ मानते हैं परन्तु मल्लिनाथ जी ने इसका विरोध किया है और उन्होंने लिखा है कि यहाँ पर धावण का सामीप्य विवक्षित है अतः उल्लिखित पाठ ही युक्त है। वप्रकीडापरिणतगजप्रेक्षणीयम् - उत् वप्रक्रीडा निगद्यते इति शब्दार्णवः अर्थात् जिस खेल में पशु सींग या दाँत इत्यादि से प्रहार कर मिट्टी बादि कुरेदें उसे क्रीडा' कहते हैं तिर्थग्दन्तप्रहारस्तु गजः परिणतो मतः हलायुध कोवा के इस वाक्य के द्वारा तिरछे होकर जो प्रहार करे उस हाथी को 'परिणत' कहते हैं, तब तो 'परिणत' शब्द से ही 'राज' शब्द का बोध हो जाता है पुनः राज पद देना पुनरुक्त दोष है अतः उसके निवारण के लिए परिणत का अर्थ उक्त हाथी नहीं अपितु सामान्य 'संलग्न' माना जाय और उसका गज के साथ कर्म- धारय समास किया जाय तो काम बन जायेगा। वप्रक्रीडायां परिणतः क्रीडापरितः स पास गश्व इति वप्रक्रीडापरिणतगजः इति इस तरह पुनरुक्त दोष का वारण हो जायेगा।
अलंकार यहाँ पर मेघ की उपमा हाथी से दी गयी है,
'इव' आदि उपमावाचक शब्द का लोप होने से 'लुप्तोपमा' अलंकार है ।। २ ।।
तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो- रन्तर्बापश्चिरमनुचरो राजराजस्य बध्यो ।
मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथा-वृत्ति चेतः कण्ठादलेषप्रणयिनि जने कि पुनर्द्वर संस्थे ॥ ३ ॥

अन्वयः - राजराजस्य अनुचरः अन्तर्वाष्प (सन्) कौतुकाधानहेतोः तस्य पुरः कथमपि स्थित्वा चिरं दध्यौ मेमालोके सुखिनः अपि चेतः अन्यथावृत्ति भवति कण्ठाश्लेपप्रणयिनि जने दूरसंस्थे ( सति ) कि पुनः।
। व्याख्या - राजराजस्य कुबेरस्य, अनुचरः सेवकः स यक्ष इत्यर्थः अन्त- पः अवरुद्धानिलः (सन् ) कौतुकाधानहेतोः उत्कण्ठोत्पत्तिकारणस्य, तस्य मेघस्य, पुरः सम्मुखे, कथमपि येन केनाऽपि प्रकारेण बहुप्रयासानन्तर- मिति भावः स्थित्वा आत्मानं स्थिरीकृत्य चिरं बहुसमयपर्यन्तम् दध्यौ= ध्यानं कृतवान्, निजवल्लमां चिन्तयामासेति भावः स कथं चिरकालं प्रियां est इति प्रश्नं कविः स्वयं समाइले मेघालोके जलदविलोकने, सुखिनः अपि प्रियापाववस्थस्यापि चेत: चित्तम्, अन्यथावृत्तिविचलितप्राय इव ( झकृत इव) भवति जायते। कष्ठाश्लेषप्रणयिनि गलाऽऽलिङ्गना- भिलाषिण, जने प्रियारूपे जने दूरसंस्थेअसमीपस्थे ( सति), कि पुन: ( का वार्ता (विरहिणो जनस्य ) O = = =
= - = शब्दार्थ - राजराजस्य कुबेर के अनुचरः सेवक ने, अन्तर्वाष्पः सों के अन्दर ही अधु को रोके हुए, कोतुकाधानहेतोः उत्कण्ठा होने के कारणीभूत, मेषस्य मेषके, पुरः-सामने, कथमपि किसी तरह (बहुत प्रयास करने के बाद), स्थिस्वाबैठकर चिरम् बहुत देर तक, योध्यान किया, अर्थात् अपनी प्रिया का स्मरण किया। उसने प्रिया का स्मरण क्यों किया, उसमें कारण बताते हैं - मेषाला के बादल के दी जाने पर सुखिनः

= = = अपि सुखी (व्यक्ति) का भी, अर्थात् जो लोग अपनी प्रिया के पास हैं उनक भी, चेतः चित्त, अन्यथा-वृत्ति और ही तरह का अर्थात् विकृत भवति हो जाता है तो फिर), कण्ठाश्लेषप्रणयिनि गले लगाने की अभिलाषा वाले व्यक्ति के, या गले लगाने की अभिलाषा वाली प्रिया के दूरसंस्थे दूर रहने (पर), किं पुन: तो फिर क्या कहना।
भावार्थ:- धनाधिपस्य सोऽनुचरः निजोत्कण्ठोत्पादकस्य जलदस्य सम्मुख बहुप्रयासेन स्थित्वा निजवल्लभां बहुकालपर्यन्तं चिन्तयामास यतो हि मेघसमा- लोकनेन पिपासमीपस्वस्थापि जनस्य चित्तं विकृतं भवति, तस्य जनस्य पुनः का कथा यः खलु प्रिया गलाश्लेषाभिलाषी वर्तते अपच दूरस्थोऽपीति ।
हिन्दी कुबेर का वह सेवक (पक्ष), अन्दर ही अन्दर आँसुओं को यामे हुए, उत्कण्ठा पैदा करने वाले उस मेघ के सामने किसी तरह (बहुत प्रयास के बाद) रुककर बहुत देर तक ( प्रिया के विषय में सोचता रहा। क्योंकि बादल के दीखने पर सुखी (प्रिया युक्त) व्यक्ति का भी चित्त विकृत हो जाता तो फिर गले मिलने वाली प्रिया के अथवा गले मिलने वाले व्यक्ति के दूर रहने पर कहना ही क्या ?
= समासः - राजा राजा राजराजः (ष० तत्०) तस्य राजराजस्य वन्तः स्तम्भ वा यस्य अंतर्बाष्प: ( मध्यमपदलोपी बहुबीहि), कौतुकस्य आधा- नम् कौतुकाधानम् (प० तत्०) कौतुकाधानस्य हेतुः तस्य कौतुकाधानहेतोः मेrस्य बालोकः = मेघालोकः (प० त०), अन्यथा वृत्तिर्यस्य सः अन्यथावृत्तिः (बहुव्रीहि), दूरे संस्था यस्य (बहुव्रीहि) सः दूरसंस्थः तस्मिन् दूरसंस्थे । कण्ठस्य आश्लेषः कण्ठाश्लेषः (ष० त०) तस्य प्रणयी कष्ठाश्लेषण (००) तस्मिन् कण्ठाश्लेषणविनि ।

- कोश: राजराज धनाधिपः इत्यमरः ।
अ-नेत्राम्बुरोदन चासमधु चेत्य- मरः ।
कौतुकं चाभिलाषे स्यादुत्सवे नमहर्षयोः इति विश्वः ।
कथमादि तथा- प्यन्तं यन- गौरव बादयोः इत्युज्ज्वलः।
चितं तु तो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं तु मनः इत्यमरः ।
बालोको दर्शनोद्योती इत्यमरः ।

टिप्पणी- राजा राजा राजराजः ( ब० तद्० ) यहाँ पर समासप्रयुक्त सुलोपादि कार्य हो जाने पर "राजाहः सखिभ्यष्टच्" इस सूत्र से समासान्तटच् प्रत्यय होकर "राजराज" यह प्रातिपदिक बना पश्चात् षष्ठी विभक्ति के आने 'पर 'राजराजस्य' यह रूप निष्पन्न होगा।
- = अनुचरः अनुपश्चात् चरति ( गच्छति ) इति अनुचरः, यहाँ पर अनु उपसर्ग पूर्वक गत्यर्थक एवं भक्षणार्थक "वर" धातु से गति अर्थ की विवक्षा मैं "नन्दिग्रहिपचादिभ्यो युजिन्यथ" इस सूत्र से अच् प्रत्यय हुआ है। कौतुकम् कुतुकमेव कौतुकम् यहाँ स्वार्थ में 'प्रज्ञादिभ्यश्च' इस सूत्र से अण् प्रत्यय हुआ पश्चात् णित्वात् वृद्धि करके 'कौतुकम्' रूप बनता है। कुतुक अणु कौतुकम् आधानम् आ उपसर्ग पूर्वक 'घा' 'धातु' से अधिकरण में ल्युट् प्रत्यय होकर आधानम, यह बनता है (आधा अन) पुरः अव्यय है। 'पूर्वा' शब्द के स्थान पर पूर्वाधरावराणामसि पुरवश्चैषाम्' इस सूत्र से 'पुर्' आदेश होकर 'असि' प्रत्यय होकर 'पुर:' यह निष्पन्न होता है। स्थित्वा गतिनिवृत्यर्थक 'स्था' धातुसे 'सत्या' प्रत्यय होकर स्थित्वा यह रूप बनता है बच्यो यह चिन्तार्थक 'ये' धातुके लि कार के प्रथमपुरुष एकवचन का रूप है। आलोक आङ् उपसर्ग पूर्वक दर्शन अर्थ में (क) धातु से स्वायं में पत्र प्रत्यय हुआ है। (आ+लोक+ घब्) आश्लेषः = आपलेपणम् आश्लेयः आ उपसर्गपूर्वक दिलवधातु से भाव में 'व्' प्रत्यय हुआ है। प्रणयी प्रणयमस्यास्तीति' विग्रह में 'अत इनिठनौ' इस सूत्र से इनि प्रत्यय होकर 'प्रणयी' बना है। दूरसंस्थेसंस्थान संस्था सम्' उपसर्गपूर्वक 'स्पा' धातु से भाव में 'आत' इस सूत्र से '' प्रत्यय होकर 'संस्था' यह रूप बनता है। =
अलंकार-यहाँ पर बाद के दो चरणों के द्वारा पहले के चरण में कही गयी 'चिन्ता' का समर्थन किया गया है अतः अर्थान्तरन्यास अलङ्कार है। एवच उत्तरार्ध में कि पुनरसंस्थे' इस पद के द्वारा 'कैमुतिकन्यायेन अर्थापत्ति अलंकार है। इस तरह साहित्य दर्पण के 'मिथोऽनपेक्षयैतेषां स्थितिः संसृष्टि- यज्यते।' इस लक्षण के अनुसार यहाँ 'संसृष्टि' अलङ्कार है।

प्रत्यासन्ने नभसि दयिता- जीवितालम्बनार्थी जीमूतेन स्वकुशलमव हारयिष्यत् प्रवृत्तिम् ।
स प्रत्यधैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्घाय तस्मै प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥ ४ ॥ ।।
अन्वयः सः नभसि प्रत्यासन्ने दयिताजीवितालम्बनार्थी जीमूतेन स्वकुशलमपी प्रवृत्ति
हारविष्यन् प्रत्यन्त्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितार्थाय तस्मै प्रीप्रमुख वचनं स्वागतम् व्याजहार ।

= = व्याख्या ध्यानानन्तरं सः यक्षः (प्रियाचिन्तकः ) नमसि धावणे मासि प्रत्यासन्ने बहूनिकटवर्तिनि ( सति), दयिताजीवितालम्बनार्थी प्रियाप्राणधारणाभिलाषी, (सन्) जीमूतेन मेथेन स्वकुशलमय निजक्षेम- मुख्याम्, प्रवृत्ति वार्ताम् हारविष्यन्वाहविष्यत् प्रत्ययैः नवीन कुटजकुसुमैः, वासकसुमनेः कल्पितार्थाय विहितानुष्ठानविधये, तस्मै दूतत्वेन सम्प्रेष्यमानाय जीमूतायेत्यर्थः प्रीतः प्रहृष्टः सन् प्रीतिप्रमुखवचनम् । = स्नेहधानोति यथास्यात्तया, स्वागतम् शुभागमनम्, व्याजहार उवाच मेघस्य स्वागत चकारेत्यर्थः ।
शब्दार्थ:- ध्यान के बाद सः उस यक्ष ने नमसि श्रावण मास के प्रत्यासन्ने अत्यन्त नजदीक वा जाने पर दयिताजीवितालम्बनार्थीप्रिया के जीवन का अभिलाषी, जीमूतेन मेघ के द्वारा स्वकुशलमयीम् अपने कुशल प्रवृत्तिम् [समाचार को हारयिष्यन् भेजने की इच्छा करता हुआ, प्रत्यग्रः नवीन, कुटजकुसमैः = पर्वतीय पुष्पविशेष के द्वारा, कल्पितार्घाय जिसके लिए अर्थ ( पूजा की विधि) तैयार की गयी है (ऐसे) मेषाय मेघ के लिए, प्रीतः प्रसन्न होकर, प्रीतिप्रमुखवचनं प्रेमपूर्ण शब्दों में, स्वागतम् शुभागमन, व्याजहार कहा। = S - =
भावार्थ:- ध्यानं विधाय सः यक्षः धावणे मासे समीपे आगते सति प्रियामा प्राणधारणाभिलाषया मेथेन निजकुशलपूर्ण वार्ता प्रेषणकामः सन् नूतन- गिरि- मल्लिकापुष्पैः तमर्चयित्वा प्रसन्नः सन् प्रेमपूर्णवाणिभिः तस्य स्वागतं चकार ।

हिन्दी- -श्रावण महीने के समीप आ जाने पर प्रिया के जीवन धारण को चाहने वाले उस यक्ष ने मेघ के माध्यम से अपना कुशल समाचार भेजने की इच्छा से कुटजपुष्पों के द्वारा मेष की पूजा करके प्रसन्न होकर प्रेमपूर्ण वाक्यों द्वारा उसका स्वागत किया।
समास: दवितायाः जीवितं दयिताजीवितं (प० तत्०) तस्य आलम्बनं ( च० त०] ) - तस्य अर्थी ( प० त० ) दयिताजीवितालम्बनार्थी, कुटजस्य कुसुमम् कुटज कुसमम् (प० तद्० ) तैः कल्पितः अर्को यस्मै स कल्पितार्थः ( बहुव्रीहि ) तस्मै कल्पितार्थाय प्रीतिप्रमुखानि वचनानि यस्मिन् यथा स्पात्तया इति प्रीतिप्रमुखवचनम् बहुव्रीहिः)।
कोश:-नभाः वणिकरच सः नमः खं भवणे नभा इत्यमरः । भावुक भविकं भव्यं कुशल इत्यमरः कुटज को वासको गिरिमल्लिका इतिहला युधः मूल्ये पूजाविधावर्थः इत्यमरः । मुद् प्रीतिः प्रमदो हर्ष इत्यमरः ।
करण टिप्पणी-प्रत्यासन्ने- 'प्रति' और 'बाबू' उपसर्ग पूर्वक, 'सद्' धातु से कर्ता में क्त प्रत्यय होकर 'प्रत्यासन्न' (प्रति+आ+सद् + क्त) बनवा है और 'भाव' में सप्तमी विभक्ति आयी है। दयिताजीवितालम्बनार्थी- जीवितम् प्राणधारण अर्थ में विद्यमान 'जीव' धातु से 'नपुंसके भावे क्तः' इस सूत्र से प्रत्यय लाकर जीवितम्' यह रूप बनाया जाता है। आलम्बनम्-- 'आह' उपसर्गपूर्वक 'बि' धातु स्युट् प्रत्यय लाकर 'आलम्बनम्' यह रूप बनता है (आ+बि+अन्) । दयिताजीवितालम्बनमर्थयते तच्छील इस विग्रह में 'दविता जीवितालम्बन्' उपपदवाले याचा अर्थ में विद्यमान 'अर्थ' धातु से 'सुप्यजाती जिनिस्ताच्छील्ये' इस सूत्र से णिनि प्रत्यय हुआ है। एवं 'उपपदमति' इस सूत्र से उपपद समास हुआ है। जीमूतः जीवनस्य मूत: जीमूतः यहाँ पर "पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्" इस सूत्र से समास एवं "जीवन" इस पदवर्ती "वन" का लोप करके जीमूत शब्द बना है जीमूतेन यह प्रयोज्य कर्ता है एवं मेव प्रयोजक कर्ता है। स्वकुशलमयीम् - यहाँ 'स्व- कुशल" शब्द से "तत्प्रकृतवचने मयटू" इस सूत्र से 'मयद्' प्रत्यय हुआ है।

= पचात् स्त्रीत्व की विवक्षा में 'टिद्वाणम्' इत्यादि सूत्र से प्रत्यय करके 'स्वकुशलमयी' यह शब्द बना है। हारविष्यन्हरणार्थंक 'हृ' धातु से 'हेतुमति च' से णिच् प्रत्यय करके 'हारि' धातु बना करके पश्चात् स से च' इस सूत्र से हलकार लाकर पश्चात् उसके स्थान में 'दः सहा इस सूत्र से शतृ प्रत्यय आदेश करके 'हारविष्यन्' यह रूप साधु होता है। कुटजकुसुमैः यहाँ 'अर्थ' क्रिया के अत्यन्त उपकारक होने के कारण 'साधक- तमं करणम्' इस सूत्र से शब्द को करण संज्ञा हुई और 'कर्तृकरणयोस्तृतीया' से तृतीया विभक्ति आयी है। प्रीतिः प्रीव्' धातु से 'स्त्रियां सिन्' इस सूत्र से क्तिन् प्रत्यय होकर 'प्रीति' शब्द बनता है। प्रस्तुत पद्य में कवि यह प्रदर्शित करना चाहते हैं कि यक्षप्रिया अपने प्रिय से वियुक्त है और वर्षा ऋतु आ गयी है, ऐसी अवस्था में अपने प्रिया कुशलक्षेम न जानकर कहीं प्राण त्याग न कर ले इसलिए 'यक्ष' अपना माल क्षेत्र के द्वारा भेजना चाहता है ॥ ४ ॥
धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातः वव मेघः ?
सन्देशार्थाः वच पटुकरणः प्राणिभिः प्रापणीयाः ?
इत्यत्सुक्यादपरिगणयत् गुह्यकस्तं ययाचे कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतना-चेतनेषु ॥ ५ ॥
अन्वयः - धूमज्योतिः समस्त सन्निपातः मेघः वद ? पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः सन्देशार्याः क्व ?
इति औत्सुक्याद अपरिगणयन् गुपकः तं ययाचे हि कामातः चेतनाऽचेतनेषु प्रकृतिकृपणाः ।
व्याख्या- धूमज्योति:सलिलमरुतां घूमतेजोवारिवायूनाम् सन्निपातः समवायः मेष: वारिवः पटुकरण:कार्योपयुक्तेन्द्रियद्भिः प्राणिभिः = चेतनैः प्रापणीयाः वासनीयाः सन्देशार्याः वाचिकाभिधेयाः क्व कुत्र, इति उभयोर्महदन्तरम् इति एवमन्तरम् औत्सुक्याद् इष्टाक्तत्वात् अपरि गणयन् विवेचयन् गुह्यकः यक्षः मेघम्ययाचे याचयामास पूर्वी- २ मे० दू० = -

-- = - = शब्दार्थः धूमज्योतिः सलिलमरुतां धुआं तेजः, जल और वायु का सन्निपात मिश्रित समूह बादल कहाँ पटुकरण कार्य में समर्थ इन्द्रिय वाले प्राणिभिः प्राणियों के द्वारा प्रापणीयः भेजे जाने योग्य सन्देशार्या:सन्देश की बात कहाँ, दोनों में महान् अन्तर है. इति इस अन्तर को बौत्सुक्याद उत्सुकता के कारण, अपरिगणयन् बिना विचार किये गुह्यकक्ष ने उस मेघ से ययाचे पाचना की, हिक्योंकि, कामार्ता:= = कामान्ध, चेतनाचेतनेषु सजीव और निर्जीव वस्तुओं के विषय में प्रकृति• कृपणा: स्वाभाविक रूप से दीन, अर्थात् विवेकशून्य हो जाते हैं।
क्तार्थमर्थान्तरन्यासेन प्रदर्शयति कामाति हियतः कामार्ताः मारा. कुलाः, चेतनऽचेतनेषु सजीव-निर्जीविषु प्रकृतिकृपणाः औत्सगिककदर्याः ( भवन्ति ) मदनेन व्याकुलीकृतानां कर्तव्याकर्तव्य विषय कविवेकशून्यत्वेन अचेतनमपि मे प्रति याचना नाऽनुपयुक्ता इति भावः ।
भावार्थ:- धूमाग्निजलमस्तां समवायरूपोऽयमचेतनः जलदः कुत्र ? कार्य समर्थेन्द्रिययुक्तंश्चेतनैः वाहनीयाः सन्देशवचनाः कुत्र ? इत्युभयोर्मध्ये महदन्तरं वर्तते तथापि औत्सुक्यादेवमन्तरं यक्षः अविचारयन् 'मत्संदेशं मत्प्रिया पाद नय' इति यमाचे, अर्थान्तरन्यासेन तं इदयति यतो हि कामपीडिताः जनाः 'अयं चेतन: अयमचेतनः' इति विवेकशून्याः स्वभावेनैव भवन्ति ।
हिन्दी धुआं, अग्नि, जल और वायु के संमिश्रण से बना कहाँ यह अचेतन मेघ ? और अच्छी इन्द्रियों से युक्त प्राणियों के द्वारा पहुँचाये जाने योग्य सन्देश की बातें कहाँ ? दोनों में कितना अन्तर है, फिर भी उत्कण्ठावश यक्ष ने इस अन्तर को बिना विचारे मेघ से सन्देश ले जाने की याचना की, क्योंकि काम से पीडित जन यह चेतन है यह अचेतन है इस प्रकार के विवेक से शून्य स्वाभाविक रूप से हो जाते हैं।
समासः धूमा ज्योति सलिलच महश्यधूमज्योतिः सलिल- मत:, तेषाम् पटूनि करणानि येषां ते पटुकरणे (बहुव्रीहि ) सन्देशा एव अर्थाः सन्देशार्थाः ( कर्मधारय ) कामेन आर्ता:कामार्ता: ( वृ० तद्०) चेतनाश्च अचेतनाश्च चेतनाऽचेतनाः (इन्द्र) तेषु ।

- - टिप्पणी-सत्रिपातः सम्+नि+पढ्+असभपातः यहाँ 'सम् और 'नि' इन उपसर्ग पूर्व गिरने के अर्थ में विद्यमान पद (छ) धातु से भाव में 'अन्' प्रत्यय होकर सन्निपातः यह रूप बना है। पटुकरण:-क्रियन्त एभि रिति करणानि करण अर्थ में विद्यमान (ड) कृ धातु से ल्युट् प्रत्यय होकर करण यह शब्द बना है पटु विशेषण है ( कृ + अनकरण ) प्राणी- 1 प्राणमस्यास्तीति इस विग्रह में "प्राण" शब्द से "इनि" प्रत्यय हुआ है। प्रापणीयाः प्रापयितुं योग्याः इस विग्रह में 'प्र' उपसर्गपूर्वक 'आप' धातु से 'अनीयर्' प्रत्यय करके प्रापणीयाः बनाया जाता है। संदेशाः सम् + विश +ब सम्' उपसर्गपूर्वक दिशु धातु से भाव में पन् प्रत्यय होकर सन्देश यह रूप निष्पन्न होता है। अपरिगणयन् परि + गण+परिगणन् 'परि' उपपूर्वक गिनने के अर्थ में विद्यमान 'गण' ( संस्थाने ) धातु के प्रथमा के समानाधिकरण में भी 'लटः शतृशानचावप्रथमा समानाधिकरणे' इस सूत्र से शतृ प्रत्यय हुआ है, क्योंकि यहाँ लट् की अनुवृत्ति पहले से ही आती ही थी पुनः 'लद्' का विधान किया जाने के कारण परिगणयन् यहाँ 'न' सूत्र से समास हुआ है एवं 'नलोपो 'नम्' से नकार का लोप हो गया और तदन्त- ति अकार बच गया है। गुह्यकः संवरण अर्थ में विद्यमान 'गृह' धातु से 'च' इस सूत्र से प्रत्यय होकर पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' इस सूत्र से 'यह' का आगम करके 'गुह्यक' यह रूप बनता है। गृहति धनं रक्षति इति गुहाकः ( गुह+य+अकगुह्यकः ) यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि अमरकोषकार ने प्रथमकाण्ड के स्वयंवर्ग में ही गुह्यक एवं यक्ष को अलग- अलग देवयोनि विशेष माना है। जैसे-
कोश:- प्राणी तु चेतनो जन्मी जन्तुजन्यशरीरिणः इत्यमरः करण साधकतमं क्षेत्रमात्रेन्द्रियेष्वपि इत्यमरः इष्टार्थोक्त इत्यमरः सलिलं कमले जलम् इत्यमरः, यक्षरागुकेश्वर इत्यमरः कामः पचशरः इत्यमरः ।
'विद्याधराऽप्रो' 'यक्ष' रक्षोगन्धर्व-किनराः ।
'पिशाचो' गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमीदेवयोनयः ।।

परन्तु कालिदास ने इन दोनों शब्दों को पर्यायवाची माना है; क्योंकि प्रथम श्लोक में उन्होंने 'यक्ष' शब्द का प्रयोग करके पुनः पन्चम श्लोक में उसी अभिप्राय से 'गुह्यक' शब्द का प्रयोग किया है। इस तरह इन दोनों में मतभेद प्रतीत होता है परन्तु उसका परिहार 'गोबलीवदं न्याय से किया जा सकता । यहाँ कोशकार ने दोनों को अलग-अलग 'गोबलीवर्द न्याय' से माना है। जैसे 'गो' इस शब्द का अर्थ 'गाय' भी है और बलीवर्द (बैल) भी बलीवर्द में बलीवर्द रूप 'गो' का अभेद है एवं 'गाय' रूप गो का भेद है। इस प्रकार कोषकार व्याडि ने 'गुह्यक' शब्द का अर्थ 'धनरक्षक यक्ष' माना है। इस प्रकार एक पक्ष सामान्य हुआ और दूसरा गुह्यक धनरक्षक रूप विशेष इस तरह दोनों के विरोध का परिहार हो जाता है। धनं रक्षति में यक्षास्ते कसंज्ञकाः इति व्यादिः । ययाचे याचना अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'याच्' धातु के लिट् लकार के प्रथमपुरुष के एक वचन का यह रूप है। प्रकृति- कृपणाः प्रकृत्या कृपणा: यहाँ 'प्रकृत्यादिम्य: उपसंस्थानम्' इस सूत्र से तृतीया होकर तृ० तत्पुरुष समास हुआ है। R
अलंकार:- इस श्लोक में विषमालङ्कार एवं अर्थान्तरन्यासालङ्कार का अङ्गाङ्गिभाव होने के कारण 'सर' अलंकार है क्योंकि श्लोक के पूर्वार्ध के प्रथम चरण में 'मेष' एवं द्वितीय चरण में 'सन्देश' इन दो विरूप पदार्थों के संघटन होने के कारण साहित्यदर्पण के 'विरूपयोः संघटना या च तद्विषमं स्मृतम्' इस लक्षण के अनुसार यहाँ विषमालङ्कार है एवच कामार्ताः हि प्रकृत' इत्यादि सामान्य से ऊपर के कहे गये विशेष का समर्थन होने के कारण अर्थान्तरन्यासालार है ।। ५ ।।
जातं वंशे भुवन - विदिते पुष्करावर्तकानां जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः ।
तेनाचित्वं स्वयि विधिवशाद्दूर बन्धुतोऽहं याचा मोघा वरमधिगुणे नाघमे लब्धकामा ॥ ६॥

- - = = = - - व्याख्या (हे मेघ !) त्वाम् भवन्तम् भुवनविदिते लोक-विख्याते, पुष्करावर्तकानां पुष्करावर्तकाख्यानां मेघानां वंशे अन्वये जातम् उत्पन्नम् कामरूपयेच्छविग्रहम् मधोनः इन्द्रस्य प्रकृतिपुरुषम् प्रधान पुरुषम् जानामि वैध परिचिनोमीतियावत् । तेन उच्चकुलोत्पन्नो भवानतः, विधिवत् दैवदुर्विपाकात् दूरबन्धुः वियुक्तप्रियः, अहं यक्षः, त्वषि= भवति भवत्समीपे इत्यर्थः अयित्वम्याचकत्वम्, गतः प्राप्तः अधिगुणे- गुणशालिनि पुरुषे, याच्या याचना, मोधा नपि व्यर्था अपि वरम् श्रेष्ठा, अधमे गुणरहिते पुरुषे, लब्धकामा अपि पूर्णमनोरया अपि ( याच्या ) न (वरम् ) इति
अन्वयः - त्वां भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां वंशे जातं कामरूपं मघोनः प्रकृतिपुरुषं जानामि तेन विधिवशात् दूरबन्धुः अहं त्वनित्वं गतः अधि- गुणे मोधा याच्या वरम् अक्षमे लकामा अपि न ( वरम् )।
शब्दार्थ:- (हे मेघ !) त्वाम् तुमको, भुवनविदिते लोकविख्यात पुष्करावर्तकानाम् पुष्करावर्तक नाम वाले मेयों के (श्रेष्ठ), बंकुल में, जातम् उत्पन्न हुए को, कामरूपम् = अपना इच्छानुसार शरीर धारण करने वाले को मोनः इन्द्र के प्रकृतिपुरुषप्रधान पुरुष को, जानामि (मैं) जानता हूँ। तेन चूंकि तुम अच्छे कुल में उत्पन्न हुए हो, इसलिये विधि- वशात् दुर्भाग्यवश, दूरबन्धुः प्रियजन से वियुक्त, अहम् लयितुम्हारे पास, अधित्वम्यापक रूप में, गतः आया। अधिगुणे गुणी व्यक्ति के पास, याच्या याचना, मोधा अपि निष्फला भी, वरम् अच्छी है; परन्तु बघ गुणरहित व्यक्ति के पास, अन्धकामा अपि पूर्ण अभिलाषा होने पर भी, न वर श्रेष्ठ नहीं है। = = = = =
भावार्थ:-हे जलद भुवनविख्याते, पुष्करावर्तकाभियान मेघानां वंशे उत्पन्नं यथेच्छ विग्रधारिणमिन्द्रस्य प्रधानपुरुषं भवन्तमहं जानामि अत एव दैवदुर्विपाकात् प्रियायाः दूरस्थोऽहं भवत्सकाशं याचकत्वेनागतः । भवादु गुण- शालिषे निष्फला अपि याचना श्रेष्ठा भवति, अधमे पुरुषे पुर्णाभिलापा अधि न श्रेष्ठा भवति ।

हिन्दी मे ! भुवनविख्यात पुष्करावर्तक नामक मेघ के वंश में उत्पन्न अपने इच्छानुकूल शरीर धारण करने में समर्थ इन्द्र के प्रधान पुरुष आपको मैं जातना हूँ। इसलिए दुर्भाग्यवश पत्नी से बिछड़ा हुआ मैं आपके पास पाचक बन के आया हूँ क्योंकि ( आप के समान ) गुणी व्यक्ति के पास 1 यदि याचना निष्फल भी हो जाय तो अच्छी है, परन्तु निर्गुणी व्यक्ति के पास यदि सफल हो जाय तो भी अच्छी नहीं है।
समासः - भुवनेषु विदित इति भुवनविदितः (स० त०) तस्मिन् पुष्कराज्य आवर्तकाल इति पुष्करार्ता (इन्द्र) इति महिनाममतानु सारम् अन्ये तु एतन्नामक एवं मेषः । प्रकृतिषु पुरुषः प्रकृतिपुरुषः (स० त०) तम् । कामकृतानि रूपाणि यस्य तम् ( मध्यम पदलोपी बहुव्रीहि ) दूरे बन्धु- यस्य स ( बहुव्रीहिः) लब्धः कामः यया सा लब्धकामा (बहुव्रीहिः )
कोश: 'जगती लोको विष्टपं भुवनं जगत् इत्यमरः । पुष्करं करि गुण्डा वायभाण्डमुखे जले इत्यमरः । इन्द्रो मरुत्वान् मघवा इत्यमरः । प्रकृति- गुणसाम्ये स्यादमात्यादिस्वभावयोः इति मेदिनी देवं दिष्टं भागधेय भाग्य स्त्री नियतिविधिः इत्यमरः । सगोजबान्धवजाति बन्धु स्व-स्वजनाः समाः इत्यमरः । बनीयको याचनको मार्गणो याचकार्थिनी इत्यमरः ।
टिप्पणी-भुवनविदिते यह सप्तमी समासान्त शब्द है। यहाँ ज्ञानार्थक 'विद्' धातु से भूताऽयं में 'निष्ठा' इस सूत्र से 'क्त' प्रत्यय किया गया है, न कि 'मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च' इस सूत्र से क्योंकि यदि मतिबुद्धि०' इस सूत्र से वर्तमान अर्थ में 'क्त' प्रत्यय करेंगे तो 'तस्य च वर्तमाने' इस सूत्र से 'भुवन' शब्द से षष्ठी विभक्ति आयेगी एवन्च क्तेन च पूजायाम्' इस सूत्र से समास का निषेध हो जायगा। फलस्वरूप 'भुवनविदिते' ऐसे शब्द निष्पन्न न होकर बल्कि 'भुवनानां विदिते ऐसा असमस्त रूप होने लगेगा जो यहाँ इष्ट नहीं है। पुष्करावर्तकानाम् मल्लिनाथजी ने 'पुष्कराच वावर्तकाच ऐसा विग्रह करके उक्तपद को द्वन्द्व समासान्त माना है परन्तु एक ही मेघ दो वंशों में कैसे उत्पन्न हो सकेगा ? इसलिए कुछ लोग विष्णुपुराण के

' नाम ये मेघा बृहन्तस्तोयमत्सराः ।
पुष्करावर्तकास्तेन कारणेनेह शब्दिता ॥
= - इस उद्धरण के अनुसार प्रलयकारी एक मेघवंश को ही 'पुष्करावर्तक' कहते हैं। मातृगोष एवं पितृगोत्र के प्रधान पुरुष 'पुष्कर' और 'आवर्तक' हो सकते हैं एवं उन दोनों की सन्तति एक मेघ हो सकता है, इस प्रकार मल्लिनाथ जी का भी व्याख्यान युक्तियुक्त माना जा सकता है। जातम् प्रादुर्भाव अर्थ में विद्यमान 'जन्' धातु से 'क' प्रत्यय करके 'जातम्' शब्द निष्पन्न हुआ है। कामम् = काममस्यास्तीति इस विग्रह में 'काम' शब्द से अर्थ आदिम्योऽब् इस सूत्र से 'अच्' प्रत्यय करके 'कामम्' शब्द बना है। जानामि 'ता' धातु के उत्तम पुरुष के एकवचन का रूप जानामि होता है। 'शाजनोज' इस सूत्र से शा के स्थान पर 'जा' आदेश है। अथित्वम् असन्निहितोऽर्थोऽस्यास्तीति अर्थी' यहाँ पर जिसके पास अर्थ न हो, अर्थात् अर्थ के बसविधान में 'अर्थ' शब्द से 'अर्थवासन्निहिते' इस सूत्र से इनि प्रत्यय हुआ है तथा 'अर्थी' (अर्थ+ इन्) यह रूप बना है। अर्थिनो भावः अधित्वम् तस्य भावस्त्वतलो' इस सूत्र से भाव में 'अर्थी' शब्द से 'स्व' प्रत्यय होकर 'स्यान्तं क्लीवम्' के नियमनुसार नपुंसकान्त 'अधित्वम्' यह रूप बना है। अर्थ के सनिधान में तो 'अवान्' हुआ और जिसके पास अर्थ न हो वह 'अर्थी' हुआ याच्या पाचन यात्रा याचा अर्थ में विद्यमान 'याच' धातु से 'वजयाचयतविच्छप्रन्डरशो न' इस सूत्र से 'म' प्रत्यय हुआ है पश्चात् 'स्ती: चुना पत्रु' इस सूत्र से शत्रुत्व एवं स्त्रीत्व विवक्षा में 'टाप्' करके 'याच्या' शब्द बना है।
अलङ्कार यहाँ अयित्व प्राप्तरूप विशेष अर्थ का समर्थन चतुर्थेचरणस्य सामान्यार्थ के द्वारा होने के कारण 'अर्थान्तरन्यास अलंकार है ।। ६ ।।
सन्तप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद !
प्रिणया: सवेशं मे हर धनपतिको विश्लेषितस्य ।

गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणाम् बाह्योद्यान स्थितहरशिरदचन्द्रिका धौतह ||७||
अन्वयः पयोद ! एवं सन्तताना वारणम् अति तद् धनपतिक्रोध- विश्लेषितस्य मे सन्देश प्रियाया हर बाह्योद्यानस्थितहरशिराचन्द्रिका धौतह अलका नाम पक्षेश्वराणां वसति ते गन्तव्या ।
= व्याख्या है पयोद | जलद स्वम् सन्तप्तानाम् आतपेन विरहेण वा पीडितानाम् शरणंरक्षकः असिवर्तसे आतपपीडितं जलदानेन, विरहपीदितं स्वस्थान- प्रेरणया वा रयसे इति भावः तद् तस्माद्धेतोः, रक्षकत्वादिति भावः धनपतिको विश्लेवितस्य कुवेरकोप वियुक्तस्य में मम यक्षस्य सन्देशम् वार्ता, प्रियाया: प्रेयस्याः पार्श्वम् इति शेषः । हर नय सामप्रिया कुत्र वर्तते तस्य स्थानस्य किन्ना मे ति जिज्ञासायामाह । बाह्मवानस्थितहरशिरन्द्रिकात बाह्ययाने दहिरारामे, स्थितस्य - वर्तमानस्य हरस्य शम्भोः शिरसि मस्तके या चन्द्रिका ज्योत्स्ना तथा धौत हम्य प्रक्षालिताट्टालिका अलका नाम एतन्नामिका यक्षेश्वराणाम् गुह्यकाधिपतीनां वसतिस्थानम्, ते मैचस्य गन्तब्या पाण्या = = = =
शब्दार्थ: है पयोद ! हे मेघ ! स्वम् तुम सन्तप्तानाम् = धूप से पीड़ित अथवा वियोग से पीड़ित जनों के सरणम् रक्षक, असिमे तद्तुम रक्षक हो इसलिए, धनपतिक्रोध विश्लेपितस्य कुबेर के क्रोध के कारण अपनी त्रिया से वियुक्त, मेमेरा ( यक्ष का ) सन्देशम् सन्देश प्रियाया: प्रिया के पास हर पहुँचा दी। यदि तुम कहो कि, मेरी प्रिया कहाँ रहती है, उस स्थान का क्या नाम है तो सुनो, बाह्योद्यानस्थितहरशिख्यन्द्रिकाौतह नगर से बाहर के उद्यान में विद्यमान शिव जी के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से जहाँ के महल घुल रहे हैं, अलका नाम अलका नाम की यक्षेश्वराणाम् कुबेर की ( वही ) वसतिगरी, ते तुम्हें, गन्तब्या=जाना है ।

भावार्थ:- हे मेघ! धर्मपीडितानां विरहसन्यसानो वा त्वं रामोऽसि, अतः कुबेरकोपवियुक्तस्य में यक्षस्य सन्देशं मत्प्रियायाः पार्श्व प्रापय । यत्र मे प्रिया वसति तदस्यानं कथयामि तथाहि यस्याः नगर्या हम्पनि नगरबहिरा रामस्थशिव शिरचन्द्रमसः कान्तिभिः सततं प्रक्षास्यन्ते सा अरुका नाम्नी कुबेरस्य निवासभूमिरेव त्वया गन्तव्या । तत्रैव प्रिया वर्तते इति भावः ।
हिन्दी - हे मेघ! तुम सन्तप्त जनों के रक्षक हो, ( वह चाहे धूप से पीड़ित हों या विरह से ) अतः कुदेर के क्रोध के कारण अपनी प्रिया से वियुक्त मेरा सन्देश मेरी प्रिया के पास पहुँचा दो जहाँ के भवन, नगर के बाहर स्थित बाग में विद्यमान शिवजी के मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से घुलते रहते है, असका नाम की उसी कुबेर की निवास भूमि में तुम्हें जाना है ।
समासः धनपतेः क्रोधधनपतिक्रोधः (प० उ० ) तेन विश्लेषितः तस्य ( वृ० द०) धनपतिक्रोध विश्लेपितस्य बाह्यच तदुद्यानं बाह्योदानम् (प्र० तत्० ) स्थितश्वासी हर स्थितहरः (कर्मधारय) बाह्योदाने स्थितहरः बाह्ययानस्थितहरः (स० तद्० ) तस्य शिरः ( प० त० ) तस्मिन् या चन्द्रिका (म० तत् ) तथा धौतानि हम्र्म्याणि यत्र सा ( बहुवीहिः ) ।
कोश: सन्तापः सज्वरः सभी इत्यमरः शरणं गृहरक्षित्रोः इत्यमरः । चन्द्रिका कौमुदी क्योत्स्ना इत्यमरः सन्देशवान् वाचिकं स्यात् इत्यमरः । हम्यादि धनिनां वासः इत्यमरः नाम प्रकाश्य सम्भाव्य क्रोधोपगमकुत्सने इत्यमरः ।
टिप्पणी- पयोदयो ददाति इति पयोदः उसके सम्बोधन में हे पयोद ! 'प' उपपद रहते (ड) वा' धातु से 'अतोऽनुपसर्गे कः इस सूत्र से क प्रत्यय होकर 'पयोद' यह रूप बना है सन्तप्तः सम् + तप्तम् उपसर्ग- पूर्वक 'वप्' धातु से क्त प्रत्यय होकर 'सन्तप्त' यह शब्द बना है। विश्लेषितः- वि+ल+वि उपसर्गपूर्वक 'दिल' धातु से 'क्त' प्रत्यय हुआ है। प्रियाया: प्रीव्' धातु से 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' से 'क' प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप करके प्रिया यह रूप बना है। बाह्यम्— 'बहिस्' इस अव्यय से 'बहिष्टिलोपो च' इस सूत्र से 'यन्' प्रत्यय एवं टि रूप 'इस' का लोप -

- करके 'तद्धितेष्वचामादे' इस सूत्र से विश्वात् वृद्धि करके 'बाह्यम्' यह रूप बनता है। गन्तव्य गम्' धातु से सम्पत् प्रत्यय होकर स्त्रीत्व विवक्षा में टापू करके 'गन्तव्या यह रूप निष्पन्न होता है। 'तम्यत्' प्रत्यय कृत्य प्रत्यय है अतः 'गन्तम्पा' के योग में 'कृत्यानां कर्तरि वा' इस सूत्र से कर्ता में विकल्प से षष्ठी हुई है ।। ७ ।।
स्वामाट पवनपदवीमुद्गृहीतालकान्ताः प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसन्त्यः ॥ कः सन्नद्धे विरहविधुरां स्वय्युपेक्षेत जायां न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनवृत्तिः ॥ ८ ॥
अन्वयः पवनपदवीम् आरूढम् त्वाम् पथिकवनिताः प्रत्ययात् माश्व- सत्य: उद्गृहीतालकान्ताः प्रेक्षिष्यन्ते त्वयि संनद्धे अहम् इव यो जनः परा- धीवृत्तिः न स्यात् कः अन्यः अपि विरहविधुराम् जाम् उपेक्षेत ।
व्याख्या - पवनपदवीम्यवनाध्वानम् गगनमितियावत् । बाढम् गतम्, स्वाम् ==मेघम् पथिकवनिताः पान्यप्रियाः प्रोषितभर्तृका इत्यर्थः प्रत्ययात् विश्वास मागमनस्येति बोध्यः, आश्वसन्त्यः प्राप्त विश्वासाः, उद्गृहीता- लकान्ताः उद्धृत केशप्रान्ताः (सत्य), इतस्ततः द्रष्टुम् उत्तमस्य केशाप्रमा धूत्वेत्यर्थः प्रेक्षिष्यन्ते विलोकविष्यन्ति त्वयि संनदृष्टये समुद्यते, अहमिव मत्समानः यः जनः यो नरः पराधीनवृत्तिः पराधि- कृतजीवनः, न स्यात् नमवेद ( तादृशः ) कः प्रियाविलासानमिशः अन्यो ऽपि अपरोऽपि ( जनः), विरहविधुराम् विप्रलम्भयाग्रा जायाम् प्रियाम् उपेक्षेत उपेक्षां कुर्यात्, मेघाच्छन्ते न कोऽपि स्वतन्त्रः प्रियाविलासः जनः प्रियायाः उपेक्षां करोतीतिभावः । - = - = =
शब्दार्थ : -- पवनपदवीम् आकाश में, जारूढम् स्थित, त्वाम् तुमको, पथिकवनिताः पथिकों की पत्नियां प्रत्ययात् विश्वास के कारण, आश्व सन्पः आश्वस्त होकर, उद्गृहीतालकान्ताः केशों के अग्रभागको उठाकर = =

= प्रेक्षिष्यन्ते देखेंगी। स्वयि तुम्हारे, अर्थात् मेष के संत छा जाने पर, अहमिव मेरे समान यः जनःजी पुरुष, पराधीनवृत्ति पराधीन जीवन वाला न स्यात् न हो ऐसा क: कोन, अन्योऽपि दूसरा व्यक्ति ( होगा ) जो विरह-विधुराम् विरह से व्याकुल, जायाम् प्रिया को उपेक्षेत उपेक्षा करेगा। अर्थात् कोई भी नहीं करेगा।
भावार्थ:- आकाशे विद्यमानं त्वां प्रोषितभकाः नार्थः विश्वासाद आच सन्त्यः सत्यः केशाग्रभागमुन्नमय्य अवलोकविष्यन्ति । वर्षणाय समुद्यते त्वयि आगते को जन ईदृग् स्यात् यः खलु मत्सदृशः पराधीनजीवनः न स्यात् विरह- याकुलाया: प्रियाया: उपेक्षां कुर्यात् । न कोऽपि कुर्यादिति भावः ।
हिन्दी - हे मेघ ! जब तुम आकाश में छा जानोगे उस समय तुमको पथिकों की प्रियाएँ अपने प्रिय के आगमन के विश्वास से आश्वस्त होकर अपने केशों के अग्रभाग को ऊपर उठाकर देखेंगी तुम्हारे आ जाने पर मेरे समान जो पराधीन न हो ऐसा कौन पुरुष होगा जो अपनी विरह से व्याकुल प्रिया की उपेक्षा करेगा।
समासः पवनस्य पदवीपयनपदवी ताम्] ( [ष० त०) उदग्रहीता: कानामन्ताः याभिस्ता: उद्गृहीतालकान्ताः (बहुव्रीहिः) पथिकानां तिपदिकवनिता ( ष० त०) विरहेण विधुराविरह-विधुरा (१० तत् ) विगताः धूः यस्याः सा विधुरा (बहुव्रीहिः) परस्मिन्नधीना वृति- यस्य स पराधीनवृत्तिः बहुवीहिः) ।
कोशः पन्थानः पदवी सृतिः इत्यमरः । प्रत्ययोऽधीनशपथज्ञानविश्वास- हेतुषु इत्यमरः । अलकाश्चूर्णकुन्तलाः इत्यमरः परतन्त्रः पराधीनः परवानाच वानपि इत्यमरः । विधुरं तु प्रविश्लेये इत्यमरः वृत्तिर्वर्तनं जीवने इत्यमरः ।
टिप्पणी-बारूद था यह 'आ' उपसर्गपूर्वक वह धातु से क्त प्रत्यय होकर आरूढ यह पद बना है ।
पथिकः पचिन्' शब्द से 'पथ कन्' इस सूत्र से 'कन्' प्रत्यय का विधान करके 'पः प्रत्ययस्य' इस सूत्र से प्रत्यय के 'प' कार का लोप आवि

करके 'पथिक' शब्द की निष्पत्ति होती है। आश्वसन्त्य:- यहाँ पर महोपा- ध्याय श्रीमल्लिनाथ के मतानुसार 'आश्वसत्य' ऐसा ही पाठ होना चाहिए, क्योंकि 'देव' धातु का पाठ अदादि गण में होने के कारण 'श' का 'अद प्रभृतिभ्यः शप' इस सूत्र से लोप हो जाने के कारण 'शपुश्यनोनित्यम्' इस सूत्र के द्वारा जो 'नुम' होता है वह नहीं होगा। अतः आश्वसत्यः ऐसा होना चाहिए परन्तु महावैयाकरण भारवि का आश्वसे युनिशाचरा:' एवं महाभारत का 'न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नाऽति विश्वसेत्' इत्यादि प्रयोगों के आधार पर स्वादिस्तु आकृतिगणः तेन बुलुम्पतीत्यादिसंग्रह सिद्धान्तकौमुदी की इस पंक्ति के आधार पर 'श्वस्' धातु को स्वादिगणी मानकर 'पू' का लोप नहीं होने के कारण 'तुम' हो जाने से 'आश्वसन्त्य' यह पाठ भी समीचीन हो जाता है। पराधीनवृत्तिः पर्तनं वृत्तिः । वर्तनार्थक त धातु में भाव में किन् प्रत्यय होने से 'वृत्ति' यह शब्द बना है। परस्मिन्नधीना वृत्तिः पराधीनवृत्ति विरहविधुरा विगता धूः भारः पुष्टिः ) यस्याः सा ( विधुरा यहाँ वि उपसर्गपूर्वक 'र्' शब्द से उपपद समाप्त करके 'ऋक्पूरब्धू- पथामानक्षे' इस सूत्र से समासान्त 'अ' प्रत्यय होकर एवं स्त्रीत्व की विवक्षा में टापू होकर 'विधुरा' यह शब्द बना है जाया जायते अस्यां] ( पुत्ररूपेण ) इति जाया ताम् पुत्ररूपेण' इसमें मनुस्मृति का निम्नलिखित उक्ति प्रमाण है-
पतिर्भाव संप्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्य जायते पुनः ॥
अर्थात् पति पत्नी में गर्म रूप से प्रवेश होकर उत्पन्न ( जात) होता है इसलिए पत्नी, 'जाया' कहलाती है। 'जनि प्रादुर्भावे' धातु से औणादिक 'जय' इस सूत्र से यह प्रत्यय करके टापू करके जाया यह शब्द बना है।
अलङ्कार यहाँ पर भी पूर्व इलोकों की तरह सामान्य से विशेष का समर्थन होने के कारण 'अर्थान्तरन्यास' नामक अलंकार है ।। ८ ।।

मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां वामश्चायं नवति मधुरं चातकस्ते सगन्धः ।
गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमाबद्ध - मालाः सेविष्यन्ते नयनसुभगं से भवन्तं बलाकाः ॥ ९ ॥
1 अन्वयः - अनुकूल पवनो मन्दं यथा त्वां मन्दं नुदति ।
अयं सगन्ध से दामः चातको मधुरं नदति गर्भाधान क्षणपरिचयात् आमाला बलाका के नयनसुभयं भवन्तं नूनं सेवियन्ते ।

= = व्याख्यात्ययात्रा का शकुनान्यपि शुभानि वर्तन्त इति कथयति मन्दं मन्दमित्यादिना अनुकूल अनुगुणः पवनः वायुः मन्दं यथा स्थिरमिव, त्वाम् भवन्तं मन्दं शनैः शनैः यथा स्यात्तथा नुदति चोदयति । अयं पार्श्वस्थः सगन्धः समर्थः ते भवतः वामः अपसव्यभागे ( सुन्दरो पा चातकः पक्षिविशेषः मधुरं मनोरमं यथा स्यात्तथा नयति वक्ति गर्भाधानक्षणपरिचयात्= रतिसमय जातसंस्तवाद, आबद्धमाला:-रचितपतयः, बलाका: बकप्रियाः से गगने, नयनसुभगम् दर्शनप्रियम् भवन्तम् == मेथम्, नूनम् अवश्यं सेविध्यन्ते समुपचारविष्यन्ति यात्राकाले पवना- नुकूल्यं चातकावनिः बलाकादर्शनं शुभ सूचकमिति वदन्ति देवशाः ।
शब्दार्थ:- अनुकूलः अनुरूप, पवनः हवा, मन्दं मन्दयति बाला, त्वाम् तुमको, मन्दम् धीरे धीरे नुदति प्रेरित करता है। अयं यह, सगर्व गर्वयुक्त, ते तुम्हारे, नामः बायें भाग में अथवा सुन्दर, चातकः पपीहा, मधुरं श्रवणप्रिय नदतिशब्द कर रहा है। गर्भाधानक्षणपरि- याद गर्भाधान के समय परिचय होने के कारण, आवयमाला:- • पंक्तिबद्ध, बलाकाबलियों से आकाश में, नयनसुभगम् देखने में सुन्दर, भवन्तम् = तुम्हारा, नूनम् अवश्य सेविध्यन्ते आश्रयण करेंगी। - - = = -
भावार्थ: है पयोद ! तब यात्रा समये इमानि शुभसूचकानि शकुनान्यपि दुष्यन्ते । यथा त्वदनुरूप एवं मन्दगतिर्वायुः शनैः पात्व प्रेरयति एव त्वद्-

- - समास: गन्धेन सहितः सगन्धः (तृ० बहूवी०) गर्भस्य आधानं गर्भाधानम् (प० त०) तदेव क्षण: गर्भाधान क्षण (रूपक) तस्मिन् परिचयः गर्भाधानक्षण-परिचयः (स० तद्० ) तस्मात् बावडा माला याभिस्ता: बाबढमाता (बहुवीहि ) ।
वामभागे सुन्दरभ्रातकः कर्णप्रियं शब्दङ्करोति । अन्यदपि वर्तते शकुनम् । यथा- संभोगसमये भवता सह परिचयजननात् बद्धपतयः वाङ्गनाः नयनसुभ भवन्तमवश्यमेव सेविध्यन्ते ।
हिन्दी - हे मेघ तुम्हारी यात्रा के समय ये शुभशकुन भी दिखाई दे रहे हैं जैसे तुम्हारे अनुकूल ही पवन मंद गति वाले तुम्हें धीरे-धीरे प्रेरित कर रहा है एवं तुम्हारे बायीं ओर पपीहा कर्णप्रिय शब्द बोल रहा है और भी शकुन हैं जैसे संभोग के समय तुमसे परिचय होने के कारण ये पंक्तिबद्ध वगु- लियों को अच्छे लगने वाले तेरा जरूर आय लेंगी।
कोश: यथा सादृश्य-योग्यत्वं वीप्सा स्वार्थानतिक्रमे इति यादवः । गन्धी  नामो से सम्बन्धयोः इति विश्वः वामस्तु वक्रे रम्ये स्यात् वामगतेऽपि च इति शब्दार्णवः सारङ्गाः स्तोकयातकः समाः इत्यमरः । पकारके नौमुखेपनस कष्टके कुक्षी कुक्षिस्यजन्ती च इति यादवः । क्षण उद्धव मह उद्धव उत्सवः इत्यमरः । संस्तवः स्यात्परिचयः इत्यमरः । बलाका सिष्ठिका इत्यमरः लोचनं नयनं नेषमीक्षणं चक्षुरक्षिणी दृग्दृष्टी इत्यमरः ।
टिप्पणी- मन्दं मन्दमिति इस पद को कई लोग 'नुदन' का विशेषण मानकर उसकी व्याख्या करते हैं। परंतु गुणवाचक पदों की बीप्सा न होने के कारण एवं मन्द' इस शब्द के गुणवाचक होने के कारण 'बोप्ता' में द्वित्व नहीं होगा यदि इस अर्थ में प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से द्वित्व "विधान करें तब भी कर्मधारयवदुत्तरेषु' इस सूत्र से सुविभक्ति का लोप हो जाने पर 'मन्दमन्दम्' ऐसा अनीप्सित रूप बनने लगेगा। इसकी अपेक्षा यदि हम प्रथम मन्द को मेघ का विशेषण मानकर दूसरे मन्द को 'मुदन'

क्रिया का विशेषण मार्ने और 'मन्दं त्वां यया स्यात्तया मन्दं नुदति' ऐसा अन्वय माने तो महाकवि की प्रामाणिकता के साथ ही अर्थ भी सुसंगत हो जायगा । वैसे तो 'निरङ्कुशा: हि कवयो भवन्ति इसका आश्रय लेकर मन्दमन्दं इसको क्रियाविशेषण भी माना जा सकता है। मुवति प्रेरणार्थक 'नु' धातु के लकार के प्रथम पुरुष एक वचन का यह रूप है। सगन्ध:- गन्धेन सहितः इस विग्रह में 'तेन सहेति तुल्ययोगे' इस सूत्र से ( बहुबीहि) समास होकर 'बोपसर्जनस्य' इस सूत्र से 'सह' के स्थान पर 'स' यह आदेश विकल्प से होकर 'सगग्ध:' ऐसा रूप बना है जहाँ सह कोस आदेश नहीं होगा वहाँ 'सहगन्ध:' ऐसा रूप भी बनता है। श्लोकक्रम कुछ टीकाकार 'तां चावश्यम् इस श्लोक को नवम स्थान पर, जिसे मल्लिनाथ जी ने दशम स्थान पर रखा है रखते हैं और 'मन्दं मन्दं' को दशम स्थान पर परन्तु यह क्रम उचित नही जंचता। इस काव्य का मुख्य अभिधेय 'सन्देश' पहुँचाना है। इसका कथन कवि ने सन्ततानाम्' इस सातवें श्लोक में कर दिया। तदनन्तर आनुषंगिक पथिक वनिताओं को आश्वासन का कथन 'अष्टम' में किया तदनन्तर शुभशकुन का प्रदर्शन मन्दं मन्दं' इस श्लोक में यात्रानुरूप उचित ही है। तदनन्तर वह अवश्य जीवित है अतः तुम्हारा जाना निरर्थक नहीं होगा इसकी पुष्टि 'तो चावश्य' इस दशम श्लोक में उचित है ।। ९ ।।
तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपत्नी-
मय्यापनाम वितगतिर्द्रक्ष्यसि भ्रातृजायाम् ।
आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्यः पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि ॥१०॥
अन्वयः - ( हे मेष) दिवसगणना तत्पराम् अध्यापन्नाम् एकपत्नी भ्रातृजायाम् ताम् अविहृतगतिः (स्यम् ) नवश्यं द्रक्ष्यसि आशाबन्धः प्रणवि कुसुमसदृचम् विप्रयोगे सद्यःपाति अंगनानां हृदयं प्रायशो रुणद्धि ।
व्याख्या हे मेघ ! मत्प्रिया 'मृता अथवा प्रभ्रष्टा' इति विनि- चित्य एवं स्वयात्रायाः वैयथ्यं नाध्याय पतोहि-दिवसगणनातत्पराम्

- = = याप्य वासरसंख्यामा सताम् अव्यापन्नाम्जीविताम् (अनेन स न मृता इति डयति वक्षः) एवा एकपत्नीम् पतिव्रताम् ( इत्यनेन तस्या व्रतास्थलनत्व- प्रतिपादयति ) शापान्ते स आगमिष्यतीति पाठिवल्यपूर्वक साऽवश्यं प्राणान् धारयति इति भावः भ्रातृजायाम् = बन्धुप्रियाम् ताम् मत्प्रियाम्, अविहृतगतिः- [अव्याहतगमन (सन् त्वम् ) अवश्यम् नूनम् अक्ष्यसि अब लोवियत आशाबन्धः तृष्णाबन्धनम् प्रणविप्रेमपूर्णम्, कुसुमसदृशम् - पुष्पवन्मृदुभवतीति भावः । अत एव विप्रयोगे विरहे प्रेमिणः इति शेषः । सद्यःपातितरक्षणविदावाशीलम् बङ्गनानाम्-वधूनाम्, हृदयम् जीवनम् प्रायशः प्रायेण रुगनिह्यति ।
= = 0 शब्दार्थ:- दिवसगणना तत्पराम् अवधि के दिनों को गिनने में संलग्न, अपना जीवित ( प्रिय आयेंगे इस माझा में ), एकपत्नी पतिव्रता, भातृजायाम् अपनी भाभी, ताउस मेरी पत्नी को, बविहतगतिः बेरोक- टोक जाने वाले तुम, अवश्यं निश्चित द्रयसि देखोगे आशाबंध: आशा का बन्धनः प्रणयि प्रेमयुक्त, कुसुमसदृशम् फूल की तरह कोमल, विप्रयोगे विरह में, सद्यःपातितुरंत टूट जाने वाले अंगनानाम् स्त्रियों के हृदयम् हृदय को प्रायशः प्रायः रुणद्धि पाये रहता है । =
भावार्थ:- हे मेष विरहावशिष्टदिवस गणना संलग्नाम्, प्रियागमनाशया- प्राणान्धारयन्तीमपालां मत्प्रियामविषयगतिस्त्वमवश्यं विलोकविष्यसि । आशrरूप बंधनं प्रेमपूर्ण कुसुमतुल्यमृदु प्रेमास्पदविरहे सद्योविनाशशालि बघून जीवितं प्रायशः रुणदि ।
हिन्दी है मेथ! विरह के बचे दिनों को गिनने में लगी, मेरे आने की आशा से जीवित पतिव्रता अपनी मामी को ( मेरी पत्नी को ) अतिगति वाले तुम अवश्य देखोगे क्योंकि शारूपी बंधन प्रेमपूर्ण फूल की तरह कोमल तथा प्रिय के विरह में तुरंत टूट जाने वाले अवाओं के हृदय को प्रायः रोके रहता है।
समासः - दिवसानां गणना दिवसगणना ( ष० त०) तस्यां तत्परा दिवसगणना तत्परा (स० तत्०) ताम् भ्रातुः जायाम् भ्रातृजायाम् (प० -

सद०) । आशा एवं बन्ध: आशाबन्धः (कर्मधारय) कुसुमैः सदृशं कुसुम- सदृशम् (तृ० तत्० ) ।
कोश:- तत्परे प्रसितासक्तौ इत्यमरः आशादिगति तृष्णयोः इति यादव आशाबन्धः समाश्वासे तथा मर्कटवास के इति मेदिनी । विप्रलम्भो विप्रयोगः इत्यमरः । हृदयं जीविते ते वृक्षस्याकृतहृद्ययोः इति शब्दार्णवः ।
टिप्पणी- गणना संख्यानायक "गण" धातु से णि प्रथम करके पश्चात् "युच्' प्रत्यय करके अनादेश करके स्त्रीत्वविवक्षा में "टाप्" करके "गणना" ऐसा रूप बनता है ( गण्+इ+ अन् ( मुच्) +टाप्) अध्या- पन्ना-वि एवं आ उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक पद धातु से "क" प्रत्यय करके टाप करके व्यापणा बनाते हैं न व्यापाअध्यापना ताम् ( नम० ) एक- पत्नीम् एकः पतिर्यस्याः सा एकपत्नी ( बहुवीहि ) ताम्। यहाँ "नित्यं सपल्यादिषु" इस सूत्र से "न" और "की" प्रत्यय हुआ है। अविहत- गतिः न विहृता अविता पतिः यस्य सः अवितगतिः (बहुव्रीहिः ) "गम्" धातु से तिन् प्रत्यय होकर "गतिः " ऐसा साधु होता है। विप्रयोगे- वि और प्र उपसपूर्वक युज् ( युजिर ) धातु से भाव में "घ" प्रत्यय करके विप्रयोग ऐसा रूप बनता है। सद्यः पाति सद्यः पतितुं शीलमस्य इस विग्रह मेंस इस उपपदपूर्वक "पत्" धातु से "णिनि" प्रत्यय करके 'उपपदमति' से समास करके वृद्धपादि करके सद्यः पाति ऐसा रूप बनता है। अंगना - प्रश स्तानि अङ्गानि यासाम्, इस विग्रह में "अङ्ग" शब्द से "अङ्गात् कल्याणे" इस वार्तिक के अनुसार "लोमाऽदिपामाऽऽदिपिच्छाऽऽदिभ्यः शलच" इस सूत्र से "न" प्रत्यय हुआ है ।। १० ।। =
कतु यच्च प्रभवति महीमुखिलप्रामवन्ध्यां तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गजितं मानसोत्काः ।
कैलासा दिवस - किसलयच्छेद- पाथेय-वन्तः सम्पत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः ॥ ११ ॥
३ मे० ०

- = व्याख्या मार्गे भवतां सहायका अपि भविष्यन्ति इति प्रतिपादयति यद गर्जितं महीम् पृथ्वीम् उच्छिलन्धाम् उद्गतकन्दलीम् अत एव अब- न्याउराम्, कर्तुं रचयितुम्, प्रभवति शक्नोति । तत्तथा- भूतम् ( लोकानाम् ) श्रवण-सुभगम् कर्णपेयम्, ते तव मेघस्येति भावः । मंजित निर्घोषम् श्रुत्वा आकर्ण्य मानसोरका: मानसरोवरं गन्तुमुम्मनाः :- मृणालाप्रभाग-शकल-सम्बलवन्तः, राजहंसा: हंसा, नमसि आकाशे, आकैलासात् कैलास यावत् भवतः • मेघस्य, सहायाः सहगामिनः संपत्स्यन्ते भविष्यन्ति । C =
अन्वयः - पद् महीम् उच्छलीप्राम् अवन्यां च कर्तुं प्रभवति तत् श्रवणसुभगं ते गतिं श्रुत्वा मानसोकाः विस किसलयच्छेद- पाथेयवन्तः राजहंसा: नमसि कैलासात् भवतः सहाया सम्पत्स्यन्ते ।
सरलार्थ - पत्जो (गर्जन) महीम् पृथ्वी को, उच्छिलन्प्राम्= कन्दली युक्त, जवन्ध्याम् = फल युक्त, कर्तुं करने में प्रभवति समर्थ है, तद् उस श्रवणसुभगं सुनने में प्रिय, ते तुम्हारा, गर्जितं गर्जन को, श्रुत्वा सुनकर, मानसोत्काः मानसरोवर जाने को उत्कण्ठित, बिस किस- यच्छेदपायेयवन्तः कमलनाल के अभाव के टुकड़ों को रास्ते के लिए जलपान बनाने वाले, राजहंसाः श्रेष्ठहंस, नभसि आकाश में, आर्कलासात् कैलास पर्वत तक भवतः तुम्हारा, सहायाः साच जानेवाले, सम्पत्स्यन्ते- S बनेंगे।
भावार्थ: है जलद ! लोकानां श्रोत्रानन्ददं यद्भवदीयगर्जनं महीं कन्द-  सम्पादयति तदाकर्ण्य मानसरोवरं गन्तुमुत्कण्ठिताः मृणाला मार्ग मार्गमयत्वेन गृहीताः राजहंसाः कैलासपर्वतपर्यन्तं भवतः सहगामिनो भविष्यन्ति ।
हिन्दी - हे मेघ! तुम्हारा जो गर्जन कानों को सुख देने वाला है और पृथ्वी को शिलीन्प्रपुष्प से युक्त करने में तथा उर्वरा बनाने में समर्थ है तुम्हारे उस गर्जन को सुनकर मानसरोवर आने को उत्कण्ठित, रास्ते के भोजन के लिए मृणाल के आगे के भाग के टुकड़ों को लेकर चलने वाले राजहंस (श्रेष्ठ हंस ) कैलास पर्वत तक तुम्हारा साथ देंगे

- टिप्पणी- कर्तुम्— 'कृ' धातु से "समानकर्तृकेषु तुमुन्" दस सूत्र तुमुन् प्रत्यय होकर "कर्तुम्" ऐसा रूप बना है। प्रभवति उपसर्गपूर्वक 'भू' धातु के लट् लकार का रूप है प्रभवति । यद्यपि "भू" धातु का सत्ता (स्थिति) अर्थ है फिर भी "उपसर्गेणैव धात्वर्थी, बलादन्यत्र नीयते" इस युक्ति के अनुसार प्र" उपसर्ग लग जाने के कारण यहाँ उसी धातु का अर्थ समर्थ हो गया। वैसे तो वैयाकरणों के मत में सभी अपेक्षित अर्थ धातु में ही रहते हैं, "अनेकार्थाः हि धातव:" इस वचन के अनुसार उपसर्ग तो द्योतक मात्र है बोधक नहीं। गजितम् गर्ज" धातु के भाव में "नपुंसके भावे त" इस सूत्र से "ख" प्रत्यय और दहादि करके "गजितम्" ऐसा रूप बना मानसरोवर: मानसम् (ब्रह्मणा मनसा निर्मितं "मानसम्" । ब्रह्माजी ने इस तालाब की रचना मन से की थी अतः इसको "मानस" या मानसरोवर कहते हैं। कविप्रसिद्धि है कि वर्षा ऋतु में ही हंसगण मानसरोवर जाते हैं; क्योंकि अन्य ऋतुओं में उसमें बर्फ जम जाती है जो हंसों के लिए हानिकारक होती है। पाथेयम् - "पचिन्" शब्द से पथ्यतिथिवसति स्वपते- " इस सूत्र से "ढन् प्रत्यय का विधान करते हैं पश्चात् उसके स्थान पर "आपने वीनीवियः फढसख्यां प्रत्ययादीनाम्" इस सूत्र से "ए" आदेश होकर
विवाद वृद्धि होकर "पाथेयम्" ऐसा रूप बना है ।। ११ ।।
आपृच्छस्व प्रियसखममं तुङ्गमालिङ्ग्य शैल बन्यैः पुंसां रघुपतिपदं रङ्कितं मेखलासु ।
काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य स्नेह-व्यक्तिश्चिर बिरहजं मुञ्चतो बाध्वमुष्णम् ॥ १२ ॥

अन्वयः - पुंसां वन्यैः रघुपतिपदैः मेखला अतिम तुङ्गम् प्रिय सखम् अयुम् पौतम् आलिङ्ग आपृच्छस्व । काले काले भवतः संयोग एत्य चिरविरजम् उष्णम् बाध्यम् मुच्चतः यस्य स्नेहव्यक्तिः भवति । व्याख्या पुंसाम् मानवानाम्, वन्द्यः पूज्यः, रघुपतिपदैः रामचन्द्र परणः, मेखलासु कटिप्रदेशेषु अतिम् चिह्नितम् तुङ्गम्=अत्युच्चम् -

= = सिम अमुम् सम्मुखस्थम् रामगिरिम्, शैलम् पर्वतम् मलियलिय आपृच्छस्व समाजयस्व हे मित्र ! अहं गच्छामीति संसूचयेतिभावः । काले काले समये समये भवतः मेघस्य संयोगम् सानिध्यम् एत्य प्राप्य, चिरविरहणम् दीर्घकालिक विरहजन्यम् उष्णम् सप्तम्, बाध्यम् अबू मुखतः स्वतः यस्य रामगिरेः स्नेहव्यक्तिः प्रेमप्राकट्यं भवति वरीवर्तत इति अनुमीये ।
= शब्दार्थः पुमाम् मानवों के पूज्य, रघुपतिपदे रामचन्द्रजी के चरणों से, मेखला मध्यभाग में अतिम् चिह्नित तुङ्गम् अत्यन्त ऊँचे प्रियसखम् अपने प्रिय मित्र, अमुम् इस रामगिरि पर्वत का आलिङ्ग्य आलिंगन कर उससे आपृच्छस्व अनुमति ले को काले काले समय समय पर भवतः = तुम्हारे, संयोग मिलने को, एल्य प्राप्तकर, चिरविरजम् बहुत दिनों के वियोग से उत्पन्न, उष्णम्-गर्म, बाष्पम् = जाँसू. व्यजतः छोड़ते हुए, यस्य जिसकी स्नेहव्यक्तिः प्रेमाभि- व्यक्ति भवति होती है। = = E
भावार्थ:- हे मेप ! मानवाराम्यैः रामचन्द्रचरणविन्यासः मेखला तिमेतं प्रियमित्रमत्झतं रामगिरिमाश्लिष्य ततः अनुमिति गृहाण तब संयोग प्राप्य समये समये यस्य गिरेः चिरवियोगत्पन्नाश्रुभिः स्नेहाभिव्यक्ति: भवति ।
हिन्दी - हे मेघ ! मानवमात्र के पूज्य श्रीरामचन्द्रजी के चरणों से चिह्नित मध्यप्रदेश वाले इस अपने मित्र रामगिरि से मिलकर उससे (अलका जाने की) अनुमति ले लो। तुम्हारा संयोग पाकर, समय-समय पर बहुत दिनों के वियोग के कारण उत्पन्न उष्ण अधुओं के द्वारा जिसकी स्नेहव्यक्ति हुआ करती है।
समासः रघूणां पतिः रघुपतिः (प० तत्०) तस्य पदानि रघुपति पदम् ( [ष० त० ) । त्रियवासी सखा प्रियसखः तम् ( कर्मधारय ) । चिरविरहात् जातः चिरविरहजः तम् (पश्चमी तत् ) स्नेहस्य व्यक्तिः स्नेहव्यक्तिः ष० त० ) । =

कोश: मेसला श्रोणि-स्थानेऽद्रि कटके बन्धने इति यादव आमन्त्रणसभाजने आप्रच्छनम् इत्यमरः ।
उष्ण उष्मागमस्तपः इत्यमरः ।
नेत्र जलमणः विश्वः ।
टिप्पणी- प्रियसखम्प्रयास इस प्रकार कर्मधारय समास होने के पश्चात् राजाहः सखिभ्यष्टच' इस सूत्र से समामान्तदच् प्रत्यय करके प्रियसख बना है उसी के द्वितीया विभक्ति का यह रूप है बन्धेः पुंसाम् यहाँ कृत्य प्रत्ययान्त "वरथ" के योग में पुंस शब्द से वैकल्पिक "कृत्याना कर्तरि वा" से हुई है। पक्ष में तृतीय भी होती है। आपृच्छस्व- "आ" उपसर्गपूर्वक "प्रच्छ" धातु के लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का यह रूप है। यद्यपि यह धातु परस्मै फिर भी आ उपसर्ग हो जाने के कारण "बकि प्रच्छ्यो: " इस सूत्र से आत्मनेपद होकर यह रूप बना है । काले काले यहाँ वीप्सा में "नित्यवीयसी' इस सूत्र से द्विरुक्ति हुई। स्नेह- नि धातु से भाव में पन् प्रत्यय हुआ है। व्यक्ति: 'वि' उपसर्गपूर्वक 'अ' धातु से क्तिन् प्रत्यय करके 'पक्तिः' यह रूप बना है। चिरविरहज मुखतो बापमुष्णम्-बहुत दिनों के बाद मिलन होने पर मित्रों के आँखों सेब गिरना स्वाभाविक है। वर्षा ऋतु में पर्वत से 'भाप' उत्पन्न होता है। कवि ने इसी को उपरोक्त भाव से 'उत्प्रेक्षित' किया है ।। १२ ।।
मार्ग तावच्छृणु कथयतस्त्वत्-प्रयाणानुरूपं सन्देशं मे तदनुजलद ! श्रोष्यसि श्रत्रयम् । ।
खिन्नः खिनः शिखरिषु पदं न्यस्य गन्तासि यत्र क्षीणः क्षोणः परिलघु पयः स्रोतसां चोपभुज्य ॥ १३ ॥
अन्वयः - हे जलद ! तावत् कथयतः लट् प्राणानुरूपं मार्ग घृणु, तदनु श्रोत्र में सन्देश घोष्यसि यत्र विन्नः
खिन्नः शिखरि पदं न्यस्य क्षीण क्षीण (सन् ) स्रोतसां परिलघु पयश्व उपमुख्य गन्तासि ।। १३ ।।

व्याख्या है जलद ! हे मेथ तावत् प्रथमम् कथयतः वदतः, पक्षादिति शेषः स्वत्प्रयाणानुरूपम् भवदीययावानुकूल मार्गान
= शृणु आय तदनुपश्चात् मन्यक्षस्य सन्देशम् = बार्ताम् श्रोष्यसि णङ्करिष्यसि यत्र मार्गे, खिन्नः खिन्नः वारंवारं क्षीण: शक्तिर्भूय, दिरिषु गिरिषु पदं पादम् व्यस्थाप्य शक्तिसंत्रा पर्वतेषु विश्रम्येत्यर्थः क्षीण क्षीणः भूपानल्पशरीरः सन् स्रोतसांपर्यंतनदी प्रवाहाणाम्, परिलघु गौरवदोषहीनम् परान जल उपभुज्य पीत्वा गन्तासि यास्यसि ।
= = = = = = शब्दार्थ - हे जलद ! हे मेघ तापयतः कहते हुए ( मुझसे ), त्वत्प्रयागानुरूपम् अपनी पात्रानुकूल, मार्गम् रास्ते को शृणुन लो; तदनुत्पादयम् कानों को अच्छा लगने वाला मेमेरा, सन्देशम् सन्देश, घोष्यसि सुनना यत्र जहाँ रास्ते में विन विन चक थककर, शिरिषु पर्वतों पर पदं पैर, न्यस्य रखकर, शक्ति प्राप्त करने के लिए थोड़ा रुककर) क्षीण क्षीण:बार बार दुबला होकर स्रोतसाम् पर्वतीय नदियों के परिलघु-हल्के, पवनजलको उपभुज्यपीकर, गन्तासि जाने वाले हो ।
भावार्थ:- हे मेघ ! प्रथमं मत्तः, नियात्रानुकूलं मार्गेणु तदनन्तरं कर्णप्रियं मत्सन्देश पोष्यसि यत्र मार्गे एवं वारंवारं यात्राऽऽप्यासेन परिश्रान्तः सन् पर्वतेषु विश्रम्य तनुकाम: (सत्) पर्वतीमनदीप्रवाहाणा जलमुपभुज्य यास्पसि ।
हिन्दी - हे मेघ पहले (तुम) मुझ से अपनी यात्रा के अनुकूल रास्ते का श्रवण कर लो, पश्चात् कर्णमधुर मेरे सन्देश को सुनना। जिस मार्ग में थक-एक कर पर्वतों पर कुछ विश्राम करके, अत्यन्त दुर्बल होकर पर्वतीय नदी के प्रवाहों का जल पीकर जाने वाले हो ।
समासः - जलं ददाति इति जलदः तत्सम्बुद्धौ हे जलद ! तब प्रयाण स्वप्रयाण (प० तत्०) स्वप्रयागस्यानुरूपम् त्वत्प्रयाणानुरूपम् (प० सत्) । श्रोत्राभ्यां पेयम्यम् तु तत्० ) ।
कोश: अयनं व मार्गावः पन्थानः पदवी सृतिः इत्यमरः । सन्देश- वावाचिकं स्यात् इत्यमरः । पयः क्षीरं पयोऽम्बु च इत्यमरः ।

टिप्पणी- - जलद !-जल उपपदपूर्वक दानार्थक यो धातु से 'जातो- अनुपसर्गे कः इस सूत्र से क प्रत्यय होकर 'उपपदमति' इस सूत्र से समास होकर जलद यह रूप बनता है। कथयतः यहाँ जिन्स 'कवि' धातु से 'लट शतृशानचावाऽप्रथमा समानाधिकरणे' से शतृ प्रत्यय होकर कथयत् शब्द से 'आयातोपयोगे' इस सूत्र से पचमी विभक्ति हुई है प्रयाणम्'प्र' उपसर्ग पूर्वक प्राणार्थक 'या' धातु से करण में 'ल्युट' प्रत्यय करके 'प्रमाण' यह शब्द निष्पन्न होता है। तदनुयहाँ 'अनु' को 'अनुर्लक्षणे' इस सूत्र से कर्मप्रवचनीय संज्ञा होकर 'कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया' इस से द्वितीया विभक्ति हुई है। श्रोत्रपेयम् श्रूयते आभ्यामिति श्रोत्रम् धातु से औणादिक टुन् प्रत्यय होकर 'ओ' शब्द बनता है। पातुं योग्यं पेयम् पानार्थक पा धातु से अयो यत्' इस सूत्र से यत् प्रत्यय होकर ईद्यति' इस सूत्र से धातु के 'आकार' को ईत्व कर के 'पेयम्' यह रूप बनता है। सन्देशम् - 'सम' उपसर्गपूर्वक दिश धातु से मन् प्रत्यय का विधान कर 'सन्देश' यह शब्द freeन होता है। खिन्नः खिन्नः क्षीणः क्षीमः यहाँ नित्यार्थ में 'नित्यवीसयो' इस सूत्र से द्वित्व हुआ है। क्षीणः क्षयार्थक 'वि' धातु से 'क्त' प्रत्यय होकर 'क्षियो दीर्घाद' इस सूत्र से दीर्घ होकर नत्य णत्वादि होकर क्षीण शब्द बना है परिलघु-परितः लघुः परिलघु । यहाँ 'कुगतिप्रादय:' इस सूत्र से समास हुआ है। उपभुज्य 'उप' उपसर्ग पूर्वक भुज् धातु से कक्षा प्रत्यय करके उसके स्थान में 'स्यप्' आवेश करके उपभुज्य यह रूप बना है।

अलङ्कार यहाँ 'समासोक्ति' नामक अलंकार है ।। १३ ।।

अद्रेः शृङ्ग हरति पवन: किस्विदित्युन्मुखीभि दुष्टोत्साहश्चकितचकितं मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः ।

स्थानादस्मात् सरस निचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं दिङ्नागानां पथि परिहरन् स्थूलहस्तावलेपात् ॥ १४॥

= = = - व्याख्या - अद्रेः पर्वतस्य शृङ्गम् सानुम् पवनः वायुः हरति किस्वित् कर्षति किम् इति एतादृश्याशंकयेति यावत् उन्मुखीभिः उन्नतास्पाभि: मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः मुनिभिः चकितचकितम् आर्य सहितं वा स्यात्तथा दृष्टोत्साहः प्रदर्शितोद्योग (सन्) सरसनिचुला आर्द्रभूमिवेतसाद, अस्मात् पुरोदृश्यमाना स्थानात् = आश्रमाद, प=ि= अध्वनि, आकाशे इति भावः । दिङ्नागानां दिग्गजानाम्, स्थूलहस्तावलेपान् = विशालशुण्डप्रहारान् परिहरन् परित्यजन् उदङ्मुखः उत्तराभिवदनः ( सन् ) । खम् = आकाशम् उत्पत उद्गन्छ ।

= = शब्दार्थः अद्रेः पहाड़ की श्रृंगम चोटी को पवनः वायु, हरति = ले जा रहा है, किस्वित् क्या ? ( इस शंका से ) उन्मुखीभिः ऊपर को मुँह किये हुए, मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः सीधी-सादी सिद्धों की बधुओं के द्वारा, चकितचकितम् अत्यन्त अश्र्चर्य से दृष्टोत्साह देखे गये उत्साह वाला, सरसनिचुलात्गीले स्थल की वेतों से युक्त, पथिरास्ते में दिना गानाम् दिग्गजों के स्थूलहस्तावलेपान् लम्बी लम्बी सूड़ों के प्रहारों को, परिहरन् = छोड़ता हुआ ( उनसे बचता हुआ ) उदङ्मुखः उत्तर दिशा की ओर मुँह करके, खम् = आकाश में, उत्पत दड़ जाना । =

अन्वयः - अद्रेः पवनः हरति किस्वित् इति उन्मुखीभिः मुख- सिद्धाङ्गनाभि: चकितचकितं दृष्टोत्साहः सरसनिलात् अस्मात् स्यानात् पथि दिङ्नागानां स्थूलहस्तावलेपान् परिहरन् उदङ्मुखः खम् उत्पत ।

भावार्थ:- हे मेघ । अत्यधिकवेन गच्छतः भवतः उद्योगमवलोक्य पवनः परति किम् ? इत्याशङ्कया मूढाः सिद्धप्रियाः श्रर्यान्विताः भविष्यन्ति तत स्थलवेतसात् पुरोदृश्यमानादस्मात् स्थानादाकाशमार्गे अन्तरायाणां दिग्गजानां पीवरसुण्डप्रहारान् परित्यजनल कागमनार्थमुत्तराभि मुखीभूय गगनमुत्पत ।

हिन्दी मे ! अत्यधिक वेग से जाते हुए तुम्हें देखकर भोली-भाली सिद्धों की प्रियाएँ 'दायु पर्वत की चोटी उड़ा कर ले जा रहा है क्या ? ऐसा सोचकर अत्यन्त साबित हो जाएँगी। तुम भोगे स्थलवेतसों से परिपूर्ण -

इस आश्रम से गगनमार्ग में दिग्गजों की बड़ी-बड़ी सूड़ों के आक्रमण से गगन मार्ग में बचते हुए अलकापुरी जाने के लिए उत्तर की ओर मुँह करके ऊपर उड़ जाओ।

समासः - उन्मुखीभिः मुखं यासां ता: उन्मुखाः ठाभिः (बहुव्रीहिः) मुग्धसिद्धाङ्गनामिः - सिद्धानाम् अङ्गता: सिद्धाङ्गनाः (००)

मुग्धाय वा सिद्धाङ्गना मुग्धसिद्धाङ्गना: (कर्म० ) ताभिः 1 दृष्टोत्साहः दृष्ट उत्साहो यस्य स दृष्टीत्साहः (बहु० ) ।

सरस निचुलात्- सरसा निचुला यस्मिस्तत् सरसनिलम् बहुव्री०) तस्माद्। विनागानां दिशां नागाः = दिङ्नागाः ( प० तत्० ) ।

तेषाम् स्थूलहस्तावलेपान्- स्थूला हस्वास्थूलहस्तावलेपान (प० त० ) ।

उदङ्मुखः उदक् मुर्ख से यस्य स उदमुखः (बहु० ) ।

कोश:- कूटोजणी शिखरं शृङ्गम् इत्यमरः । वानीरे कविभेदे स्थानि स्वछयेतसे शब्दार्णवः मतङ्गजो जो नागः कुञ्जरी वारण: करी इत्यमरः ।

टिप्पणी- हरति-हरणार्थक धातु के वर्तमानकालिक लट् लकार के प्रथमपुरुष के एक वचन का रूप है (हु+अ+ ति) किस्वित् – "किम" यह अव्यय है, और "स्वित्" यह अव्यय है- दोनों अभ्यय मिलकर विकल्प और वितर्क इन दो अर्थी को प्रकाशित करते हैं उम्मुखीमि:- यहाँ उन्मुख शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में "स्वाङ्गाच्चोपस जनादसंयोगोपधात्" इस सूत्र से "ही" प्रत्यय हुआ है। चकितचकितम् चकितं यथा स्यात्तथा यहाँ पर प्रकार अर्थ में "प्रकारे गुणवचनस्य" इस सूत्र से द्वित्व होकर 'कर्मधारयवदुत्तरेषु' इससे सु का लोप हो गया है। दुष्टधातु से ''प्रत्ययो दुः यह शब्द निष्पन्न होता है। स्थानात्- '' गतिनिवृतो इस धातु से ल्युट् प्रत्यय होकर स्थान यह रूप बना है, उस शब्द के पचमी विभक्ति का यह रूप है। परिहरन्-'परि' उपसर्गपूर्वक 'हृ' धातु से वर्तमानकालिक लट् लकार के स्थान में 'श' आदेश करके 'परिहरन्' यह रूप बनाया जाता

है। यहाँ महोपाध्याय मल्लिनाथ ने 'सरसनिचुलात्' और 'दिङ्नागानाम्' इन दो शब्दों के आधार पर उक्तार्थ के अलावे दूसरे अर्थ का भी प्रतिपादन किया है जो कि इस प्रकार है-सरसनिचुलात् अर्थाद रसिक 'निल' नामक कालिदास के समकालीन कवि, जो कि दूसरे विरोधी कवियों द्वारा दिलाये गये दोषों का परिहरन करने वाले थे, ऐसे कवि के आश्रम से निर्दोष होने के कारण वे मुखवाले होते हुए मार्ग में अर्थात् सारस्वत मार्ग में विरोधी 'दिङ्नाग' जैसे आदरणीय कवि में हस्तावलेप अर्थात् हस्तविन्यासपूर्वक दिलाये गये दोषों को दूर करते हुए अद्रेः अर्थात् पर्वत की तरह बे दिङ्- = नागाचार्य की शृङ्गमप्रधानता को परिहरति नष्ट करता है क्या ? इस कारण से सिद्ध महाकवियों द्वारा और अङ्गनाभिश्रगुणशालिनी स्त्रियों द्वारा दृष्टोत्साह: उद्योग देखे जाते हुए, खम् उत्पत आकाश में उड़ जाओ। परन्तु महोपाध्याय मल्लिनाथ जी का यह मत सर्वसम्मत नहीं है। दिनागाचार्य कालिदास के विरोधी थे, यह भी एक विचारणीय विषय ही है। क्योंकि 'दिलाग' नाम के अनेक विद्वान् हो गये हैं। बौद्ध दर्शन के विद्वान् वसुबन्धु के शिष्य दिनाम' कालिदास के विरोधी इसलिए नहीं माने जा सकते, क्योंकि दोनों का समय भिन्न है। यदि यह कहा जाय कि कालभेद होने पर भी पूर्वकालिक विद्वान् के मत का खण्डन उत्तरकालिक कवि कर सकता है अत: दिमाग का विरोधी महाकवि हैं, तो यह भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि कालिदास का काल आधुनिक बहुत से विद्वानों के मत में विक्रमीय प्रथम शताब्दी है जब कि दिङ्नागाचार्य का काल पाँचवीं शताब्दी है और भी सम्प्रदायान्तर के विद्वान के लिए आदरार्थक बहुवचनान्त का प्रयोग भी आपत्तिपूर्ण नहीं प्रतीत होता अब समस्या यहाँ यह खड़ी हो जाती है कि उत्तरदिशा जब एक है और एक दिशा में एक ही दिग्गज होता है तो 'महाकवि ने 'दिङ्नागानाम्' यह बहुवचनान्त का प्रयोग कैसे किया है तो इसका समाधान यह है कि एक उत्तर दिशा में एक उत्तर दिशा के अलावे अन्य दिग्गजों के स्कूल सूड़ों के प्रहार से बचते हुए ऐसा अर्थ करने से किसी प्रकार की आपत्ति नहीं आ सकती है ।। १४ ।।

रत्नच्छायाssव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत् पुरस्तात् वल्मीकाप्रात्प्रभवति धनुषखण्डमाखण्डलस्य ।

येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापत्स्यते ते बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः ॥ १५ ॥

व्याख्या ( हे मेघ) रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इव पद्मरागादिमणिप्रभा- सम्मिश्रणमिव प्रेक्ष्यम् दृश्यम् आखण्डलस्य इन्द्रस्य एतद्पुरोवर्ति धनुधलण्डम्

= चापाकलम्, पुरस्तात् अग्रतः वल्मीकाग्रात्नाकुविवरात् प्रभवति उद्गच्छति ।

येन चापशफलेन तब "मेघस्येत्यर्थः " श्यामम् कृष्णवर्णम्, वपुः शरीरम् स्फुरितरुचिना धवलकान्दिना

, बपिच्छेन, गोपवेषस्यास्व, विष्णोः हरेः "कृष्णस्येति यावत्", इवा अतितराम् तातिशयम् कान्तिम् त्रियम् आपत्स्यते प्राप्स्यते ।

अन्वयः - रत्नच्छायाम्यतिकर इव प्रेक्ष्यम् आखण्डलस्य एवं धनुष्य- म् पुरस्तात् वल्मीकाग्रात् प्रभवति ।

येन ते श्यामं वपुः स्फुरितचिना  गोपवेषस्य विष्णो ( श्यामं वपुः ) इव अतितरां कान्तिम् आपत्स्यते ।

शब्दार्थ:- (हे मेष) रत्नच्छायाऽऽव्यतिकर इव रत्नों की कान्तियों के सम्मिश्रण जैसा, प्रेक्ष्यम्दीखने वाला आखण्डलस्य इन्द्र का एतत्वह ( सामने ), धनुखण्डम् धनुष का टुकड़ा, पुरस्तात् सामने वल्मीकाप्राद चाँबी के अग्रभाग से प्रभवति निकल रहा है। येन जिससे ( धनुष के टुकड़े से ) ते तेरा, श्यामम् काले रंग का वपुः शरीर, स्फुरितरुचिना= उजलीकान्त वाले बर्हेण मोरपंख से, गोपवेषस्य ग्वालवेषधारण किए हुए विष्णोः कृष्ण के अतितराम् अत्यधिक कान्तिम् सोभा को, आपत्स्यते धारण करेगा । = =

समास:- रत्नानां छाया रत्नच्छायम् (प० तत्०) आसमन्ताद व्यतिकरः  (उपपद० प० ) रत्नच्छायस्य आव्यतिकरः रत्नच्छायाऽऽभ्यतिकरः

(प० त०])] वल्मीकस्य अग्रम् वल्मीकाग्रम् (५० तत्०) तस्मात् । धनुषः खण्डम् धनुखण्डम् (प० तत्०) गोपानां देषः गोपवेषः (ष० त०) तस्य ।

कोशः - रत्नं मणिः द्वयोरक्ष्मजात मुक्तादिकेऽपि न इत्यमरः । आखण्डल सहस्राक्षः इत्यमरः कृष्णे नीलाऽसितश्यामकालश्यामल मेचकाः इत्यमरः । पिच्छ बहें नपुंसक, इत्यमरः छाया सूर्यप्रिया कान्तिः इत्यमरः ।

भावार्थ:- (हे मे) पद्मरागादिमणीनां संमिश्रणमिव सुन्दरमेदिन्द्र धनुः पुरस्ताद् वल्मीकविवरादाविर्भवति येन धवलसिंचलितेन मयूर- पिच्छे गोपवेषस्य कृष्णस्यैव तावकीनमपि श्यामं दशरीरं सातिशयं शोभासम्प भविष्यति ।

हिन्दी मे ! पराग आदि मणियों की प्रभा के सम्मिश्रण की तरह दर्शनीय इन्द्रधनुष सामने बांदी के अग्रभाग से निकल रहा है। जिस इन्द्र- धनुष के टुकड़े से श्याम रंग का यह तेरा शरीर उज्वल कांतिवाले मोर पंस से गोपवेषधारी कृष्ण के शरीर के समान अत्यधिक शोभा को प्राप्त करेगा।

टिप्पणी- रत्नच्छायम् - रत्नानां छाया रमच्छा (प० त० ) । यहाँ "छाया बाहुल्यै" इस सूत्र से नपुंसकलिङ्ग हुआ है। व्यतिकरः "वि" और "अति" इन दो उपसर्गपूर्वक "कृ" धातु से दोर इस सूत्र से "अप् प्रत्यय करके गुणादि करके "व्यतिकर" यह रूप बना है। आसमंतात् व्यतिकर व्यतिकरः यहाँ कुमति प्रादय:" इस सूप से समास हुआ है। प्रेक्ष्यम्"" उपपूर्वक "इश" धातु से "व्यत्" प्रत्यय होकर "प्रेक्ष्यम्", यह शब्द बनता है। धनुखण्डम् – किसी-किसी पुस्तक में "धनुःखण्डम्" यह पाठ मिलता है जो कि पाणिनीय व्याकरण के अनुसार अशुद्ध है क्योंकि "नित्यं समासेऽनुचरपदस्यस्य इस सूत्र से यहाँ नित्य मूर्धन्य पकार होता है। इन्द्र के विषय में वृहत्संहिता में लिखा है-

सूर्यस्य विविधाः वर्णाः पवनेत विघट्टिताः सा ।

वियति धनुः संस्थाना ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ॥

पुरस्तात्पूर्वस्यादिशि " इस विग्रह में पूर्वा" शब्द से प्रकृत्पर्थ मे "विशब्देभ्य" सप्तमी पन्चमी प्रथमाभ्यो दिग्देशकालेध्वस्ता ति" इस सूत्र से "अस्ताति" प्रत्यय लाकर "अस्ताति च" इस सूत्र से पूर्व के स्थान पर "पुर" यह आदेश करके "पुरस्ताद" यह रूप बना है। अतितराम् "अतितर" शब्द से किमेत्तिङ्क्ययधावाम्बद्रव्यप्रकर्षे इस सूत्र से "आ" प्रत्यय करके "अतितराम्" यह रूप बना है।

अलंकार इस श्लोक के प्रथम चरण में एवं चतुर्थ में दो श्रोती उपमा निरपेक्ष रूप से है अतः यहाँ 'संसृष्टि' असङ्कार है ||१५||

त्वय्यायत्तं कृषिफलमिति बिलासामभिज्ञः सद्यः सोरोत्कषणसुरभि क्षेत्रमारुह्य माल किञ्चित्पश्चाद् व्रज लघुगतिर्भूय एवोसरेण ॥ १६ ॥

प्रीतिस्निग्धैर्जन पदव धूलोचनैः पोयमानः ।

= व्याख्या कृषिफलम् सस्यादिकम् स्वपि मेघे, आयत्तम् अधीनम्, इति अस्मात् हेतोः कारणाद, भूविलासानभिःकटात्यपरिचितः प्रीतिस्तिः स्नेहस्वपितैः जनपदवधूलोचनैः नीवृम्महिलानयनैः पीय- मानः सादरमीक्षमाणः सीरोत्कषणसुरभि लाङ्गलविदारणेन प्राण तर्पर्ण ( यथा स्यासथा ) मालम्मालनामानम्, क्षेत्रम् केदारम् सत्यम् आरुह्य आरोहणं विधाय किञ्चित्पश्चात् कियत्क्षणानन्तरन् भूयः पुनः, घुगति: द्रुतगमनः (सन् ) उत्तरेण एव उत्तरमार्गेण एवं व्रज गच्छ ।

अन्वयः - कृषिफलं त्वयि आयत्तम् इति हेतोः भूविकासानभिरी प्रीति- जनपवधूलोचनः पीयमानः सोरोत्कषण-सुरभि मा क्षेत्रं सः बाह्य किचित् पश्चात् भूयः लघुगतिः उत्तरेण एव वज

शब्दार्थ - कृषिफलम् सेती का फल ( धान आदि ), वि - तुम्हारे बायत्तम् अधीन है, इति इस हेतोः कारण से, भूविलासानभिः मोहों के विलास से अपरिचित ( भोली-भाली ), प्रीतिस्निग्धै: स्नेह से ओत- - = =

प्रोत, जनपदवधूलोचनैः ग्रामीण महिलाओं की आखों से पीयमानः आदर के साथ देखा जाता हुआ, सीरोत्कषणसुरमिन्हल चलने के कारण जहाँ से भीनी सुगन्ध निकल रही है (ऐसे ) मालक्षेत्रम् = [माल नामक क्षेत्र पर ( पठार पर ), सद्यः तुरत ही, बारा पढ़कर अर्थात् बरसकर, किचित् पश्चात् कुछ देर बाद भूयः फिर, लघुगतिः (सन् ) तेज गति वाला होकर, उत्तरेण एवं उत्तर दिशा की ओर ही, व्रज जाना ।

- = = समासः भुवः विलासः भूविलासः ( ष० त०) तेम्य: अनभिज्ञ विलासानभितैः (प० तत्०) । प्रीत्या स्निग्धः प्रीतिस्निग्धः (तृ० तद०) । जनपदस्य वधूः जनपदवधू तासां लोचन (००) सीरे उत्कपणम्- सीकपणम् (०) तेन सुरभि यया स्यात् तथा क्रियाविशेषणम् । =

हिन्दी - हे मेघ खेती का परिणाम (उपज) तुम्हारे अधीन है, इसलिए रास्ते के कटाक्ष विक्षेपादि से अपरिचित भोली-भाली ग्रामीण स्त्रियों की आँखों से आदरपूर्वक ( सस्नेह ) देखे जाते हुए तुम, जहाँ तुरत हल चलाया गया। ऐसे "माल" नामक पठारी भाग पर बरसकर उसे सुगन्धित बना कर कुछ समय के बाद फिर तेज गति से उत्तर मार्ग से ही चले जाना ।

कोश:- आयत्तः इत्यमरः । नीवृज्जनपदो देश, इत्यमरः । लाल, गोदारणच सीरोंऽधः इत्यमरः सुरभिर्माणतर्पणः इत्यमरः । केदार: क्षेत्रमस्तु इत्यमरः । क्षिप्रमरं द्रुतम् इत्यमरः ।

भावार्थ: है म कृपैः फलं तस्यादिकं त्वदीनमत एवं स्वाभाविक- स्नेह-स्नपितैः भूविकारप्रदर्शनादक्षैः ग्राम्यवधूभिः सादरमवलोक्यमानस्त्वं साङ्गलोत्कर्षणेन सुगन्धियुक्तं मालनामकमुन्नतं प्रदेश वृष्टया सनाथीकृत्य किय- कालानन्तरं तगल्या पुनरुत्तरेणेव मार्गेण गच्छ

टिप्पणी-स्वय्यायत्तम्यहाँ अधिकार विवक्षा में "युष्मद्" मान्य से सप्तमी हुई है। "आ" (छ) उपसर्गपूर्वक "गम्' धातु से "वत" प्रत्यय करके आयत यह रूप बनता है। उत्तरेण यहाँ प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम्" से तृतीया हुई है ।। १६ ।।

त्वामासार - प्रशमित बनोपप्लवं साधु मूर्ध्ना सानुमानान्नकूटः ।

न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनस्तयोच्चैः ॥१७॥

अन्वयः - आम्रकूटः सानुमान् आसार प्रशमित वनोपलयम् अध्यक्षम परिगतं स्वाम् साधु मूर्ध्ना वक्ष्यति शूद्रः अपि संघवाय मित्रे प्राप्ते प्रथम- सुकृतापेक्षया विमुखः न भवति यः तथा उच्चैः कि पुनः

= = व्याख्या आम्रकूट: एतन्नामकः सानुमान् पर्वतः मासार-प्रशमित- वनोपप्लवम्धारा संपातापसारितदावानलं, अध्यक्षमपरिगतम् मार्गपरिश्रम क्लान्तम् त्वाम् भवन्तं मेधमिति यावद साधु-समीचीनम् मूर्ध्ना शिरसा, शृङ्गेण वक्ष्यति वोढा, क्षुद्रः अपि साधारणोऽपि संचयाय =भाधयाय मित्र संख्यों प्राप्ते आगते (सति) प्रथमसुकृतापेक्षाकृत पूर्वोपकारसंस्मरणेन, विमुखः पराङ्मुखः न भवति यः बाभ्रकूट पर्वतः तथा उच्च तथाविधो महान् ( स ) किं पुनः विमुखो भविष्यति किम् ? कदापि न भविष्यति । -

= = = शब्दार्थ आम्रकूट: आम्रकूट नाम का, सानुमान् पर्वत, आसार प्रशमितवनोपप्लवम् मूसलाधार वृष्टि से दावाग्नि को शान्त करनेवाले, अध्य श्रमपरिगतम् = मार्ग के परिश्रम से थके हुए, त्वाम् तुम को साधुच्छी तरह, मूर्ध्ना शिर पर ( चोटी पर ) वक्ष्यति धारण करेगा। शुद्रोऽपि साधारण जन भी संधयाय के लिए, मित्रे मित्र के प्राप्ते आने पर प्रथम सुकृतापेक्षया पहले के किये हुए उपकारों को याद कर, विमुखः न मुंह नहीं मोड़ता, भवति है जो मानकूट पर्वत तथा उच्चैः सा ऊँचा है। कि पुनःक्या वह मुँह मोड़ेगा ? कभी नहीं मुँह मोड़ेगा ।

भावार्थ:- हे मेघ ! धारासम्पातेन प्रशमित वनाग्नि मान्य-परिश्रम- बलात्वामात्रकूटोऽद्रिः शिखरेण सम्यक् प्रकारेण धारयिष्यति । ( यतोहि )

नीवोsपि बाधाय गुहागतं मित्रमवलोक्य पूर्वकृतोपकारं स्मृत्य पराङ्मुखो न

भवति यः आम्रकूट पर्वतस्तादृशो महान् स कथं भविष्यति । नैव भविष्यती-

तिभावः ।

हिन्दी है मैव मूसलाधार वृष्टि के द्वारा दावाग्नि को बुझाने वाले, मार्ग के पश्चिम से पके हुए तुमको आम्रकूट पर्वत शिखर पर धारण करेगा। (क्योंकि) छोटे भी (जन) आश्रय के लिए मित्र के जाने पर पहले के उपकारों को याद कर मुंह नहीं मोड़ते तो फिर जो आम्रकूट उतना महान है वह मुँह मोड़ेगा बुरा ? कभी नहीं मुँह मोड़ेगा।

समासः म्राणां कूटो यत्र स आम्रकूट ( बहुव्रीहिः) आसारेण प्रशमितो बनोपडवो चेन तम् आसारप्रशमितवनोपलम् (बहुवीहिः ) । अध्वनः श्रमः अध्यक्षम ( ० तद्०) तेन परिगतस्तम् (तृ० तद्० ) ।

कोश: कूटोsent freeरं शृङ्गम् इत्यमरः । द्वारा सम्पात असार इत्यमरः सरणिर्वतमं माध्य इत्यमरः । क्षुद्रो दरिद्रः कृपणे, इति यादवः । अमिसा सुहृद् इत्यमरः पुंस्यादि पूर्वपौरस्त्य प्रथमाचा, इत्यमरः ।

टिप्पणी- आम्रकूट : यहाँ पर कुछ टीकाकार 'आम्राः कूटेषु यस्य सः' इस प्रकार व्यधिकरण बहुब्रीहि समास मानते हैं सानुमान् सानवः सन्ति यस्मिन् ऐसे विग्रह में 'सानु' शब्द से मतुप् प्रत्यय करके सानुमान् यह रूप बना है। वक्ष्यति 'वह' धातु के 'सद्' लकार के प्रथम पुरुष के एक वचन काक है ( वह+स्य+ति संधयाय 'सम्' उपसर्गपूर्वक सेवार्थक 'बि' धातु से 'एर' इस सूत्र से भाव में अच् प्रत्यय करके 'संघयः' यह रूप बनता है, यहाँ 'मर्या भाववचनाद' से चतुर्थी हुई है।

अलंकार - यहाँ अर्थान्तरन्यास एवं अर्थापति इन दोनों अलंकारों के अङ्गाङ्गिभाव होने से 'सङ्कर' नामक अलङ्कार है ॥ १७ ॥

छनोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रं : स्त्वय्यारूडे शिखरमचल: स्निग्धवेणीसवर्णे ।

नूनं यास्यत्यमर मिथुन- प्रेक्षणीयामवस्थां मध्ये
श्यामः स्तन इव भुवः शेषविस्तारपाण्डुः ॥१८॥

= व्याख्या ( हे मेघ !) परिणत फलद्योतिभिः पवफलमिभिः काम- नाः बन्यचूतैः उन्नोपान्तः आवृतपापप्रदेशः, अचल पर्वतः आम्रकूट इत्यर्थः । स्निग्धवेणी-सवर्णे विकणकेशपाश तुल्यवर्णे, स्वयमेवे, शिखरम्= शृङ्गम्, आस्ये आरोहणकृते सति मध्येदयामः कृष्णान्तरः शेषविस्तार- पाण्डु : प्रभागातिरिक्तपीतवर्णः भुवः पृथिव्याः स्तनः कुचः, व्यथा, अमरमिथुन प्रेक्षणीयाम् = देवयुगलावलोकनीयाम् अवस्थाम् दशाम्, नूनम् = अवश्यम् यास्यति प्रास्यति ।
अन्वयःपरिणतफलद्योतिभिः काननाः उप्रोपरान्त: अवल: स्निग्ध- वेणी-सवर्णे स्वयि शिखरम् आरुडे, मध्येवयामः शेषदिकारपाण्डुः भुवः स्तन इस अमरमिथुन- प्रेक्षणीयाम् अवस्थां नूनं यास्यति ।
शब्दार्थ :- हे मेघ ! परिणतफलद्योतिभिः परिपक्व से चमकनेवाले, काननः ॐ जंगल के आमों से, छन्नोपान्त ढके हुए, पार्श्वभागवाला, कूटपर्वतः स्निग्धवेणी-सवर्णे चिकने केशपाश की तरह रंग- बाले त्यतुिम्हारे शिवरम् शिखर पर आडे चढ़ जाने पर, मध्ये- श्यामबीच में काला, शेषविस्तारपाण्डु और बितृत भाग में पोला, भुवः पृथ्वी के स्तन इतन की तरह, अमरमिथुन प्रेक्षणीयाम् देवदम्पतियों के द्वारा दर्शनीय अवस्थाम्दशा को नूनम् अवश्य ही, यास्यति आत करेगा।
भावार्थ:- (हे मेघ ) परत्रफलकान्तिभिः बनाओ राच्छादितपार्श्वभागः आम्रकूटोऽद्रिः कृष्णवर्णे त्वयि मेघे शृङ्गे सति मध्ये कृष्णः अन्तभागेषु पाण्डुरः पृथिव्याः स्वन इव देवदम्पतीनां दर्शनीयामवस्थां निश्वयमेव यास्यति ।
हिन्दी है मेथ! चिकनी वेणी के समान काले रंगवाले तुम जब आम्रकूट के शिखर पर चढ़ जाओगे, तब वह पर्वत पके हुए फलों से चमकनेवाले जंगली - ४ मे० दू०

आमों से घिरे हुए पाव भागवाला देवदम्पतियों के देखने योग्य अवश्य बन जायेगा, जैसा कि बीच में काला और शेष विस्तृत भाग में पीला-सा पृथ्वी का स्तन हो ।
समासः स्निग्धाया वेणी तस्याः सदृशः वर्णः यस्य सः स्निग्धवेणी- सवर्णः तस्मिन् (बहुव्रीहिः) काननेषु भवाः आम्राः काननाम्राः ( मध्यमपद- सोपी ) है परिणतः फलैः द्योतन्ते (तत्) । छग्नां उपान्ताः यस्य सछन्नोपान्त (बहुवीहि । शेषे विस्तारे पाण्डुः शेषविस्तारपाण्डुः (स० त० ) ।
कोश: पक्वं परिणतम्, इत्यमरः कृष्णे नीलाऽसित स्यामः इत्यमरः । चिक्कणं मसृणं स्निग्धम् इत्यमरः । वेणी तु केाबन्धे जलसुती, इति यादवः । हरिणः पाण्डुरः पाण्डुः इत्यमरः मिथुनं तु द्वयो राशिभेये स्त्रीपुंस युग्मके, इति मेदिनी ।
- टिप्पणी छन्नः छद् इस धातु से क्त प्रत्यय करके छन इस तरह का रूप बनता है। स्निग्धा 'स्निह' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा करके स्निग्धा यह रूप बनता है।
सवर्णः समानो वर्णः सवर्णः यहाँ 'ज्योतिर्जनपदराजिनामि' इत्यादि सूत्र से समान के स्थान पर 'स' ऐसा आदेश किया गया है। आढावा' उपसर्गपूर्वक 'रुह्' धातु से 'क्त' प्रत्यय करके बाढ़ ऐसा रूप बनता है।
अमरमिथुन- प्रेक्षणीयाम् - यहाँ अमरना प्रेक्षणीयाताम् कृत्यानां कर्तरि वा इस सूत्र से विकल्प से 'अमर मिथुन शब्द से षष्ठी विभक्ति होती है तब पट्टी समाप्त किया गया है ।। १८ ।।

स्थित्वा तस्मिन् वनचरवधूभुक्तकुजे मुहूर्त तोयोत्सगंद्रुततर गतिस्तत्परं वत्म तीर्णः ।
रेवां द्रक्ष्यस्युपलविषमे विन्ध्यपादे विशीर्णां भक्तिच्छेदेरिव विरचिता भूतिमगे गजस्य ॥ १९ ॥

अन्वयः - ( हे मेघ ! ) वनचरवधूमुक्त तस्मिन् मुत्तस्थित्वा
व्याख्या (हे मेघ !) वनचर-वधू मुक्त-कुजे किरात-कामिनी- भुक्तलता सवने तस्मिन् आम्रकूटे (पर्वते) मुहूर्तम् किश्चित्क्षणम् स्थित्वा विरम्य तोयोत्सर्गदूततरगतिः जलवर्षणेनातिशौभगमनः तत्परम् आम्रकूटानन्तरम् वर्त्म मार्गम्, तीर्णः अतिक्रान्तः सन् उपलविषमे पाषाणनिम्नो विन्ध्यपादे विन्ध्याचल - प्रत्यन्तपर्वते विशीर्णाम्प्रसृताम्, रेवाम्-नर्मदाम् गजस्य हस्तिनः, अगे शरीरे भक्तिच्छेदैः रेखा- गिभिः विरचिताम् निर्मिताम् भूतिम्मातङ्गशृङ्गार इवयपा द्रक्ष्यसि बिलोकविष्यसि । = - = = = =
लोयोत्सर्गयुततर गतिः तत्परं वस्तीर्णः उपल-विषमे विन्ध्यपादे विशीर्णाम् रेवा गजस्य बने भक्तिच्छेदः विरचिताम् भूतिम् इव द्रक्ष्यसि ।
= - = = शब्दार्थ : - ( हे मेष!) वनचरवधू मुक्तकुब्जे किरात-कामिनियों द्वारा उपयुक्त लताकुब्जों वाले, तस्मिन् उस आम्रकूट पर्वत पर मुहर्त कुछ देर, स्थित्वा ठहरकर, तोयोत्सगंततर गति जल बरसाने के कारण शीघ्र गमनवाले (तुम) तत्परम् आम्रकूट के आगे, वह रास्ते को तीर्णः पार करके, उपलविषमे पत्थरों के कारण ऊँची-नीची, विन्ध्यपादे विन्ध्या- पर्वत की तलहटी में विशीर्णाम् फैली हुई, रेवा नर्मदा को गजस्य हाथी के लड़ने में भक्तिच्छेदैः चित्रकारी के द्वारा विरचिताम् बनायी गई, भूतिम सजावट इव की तरह द्रश्यसि देखोगे। - = = = a
भावार्थ:- हे मेघ ! आम्रकूट पर्वतस्य किरातकामिनीभिः कृतसम्भो लतागृहे किचित्क्षणं विश्रम्य तत्र जलवर्षणेन द्रुतगतिः सन् आम्रकूटात्परं मार्गमतिक्रम्य प्रस्तरबहुलान्निम्नोग्नत-भूमौ विन्ध्यादेस्तटे विस्तीर्णा नर्मदा गज- मस्तके रचनाङ्गिभिविरचिता भस्मरेखामिवावलोकयिष्यति ।
हिन्दी - हे मेध ! वनचर बधुओं के द्वारा उपयुक्त लताकुज वाले उस आम्रकूट पर्वत पर कुछ देर विश्राम करके पानी बरसने के कारण शीघ्र गति से आम्रकूट के आगे के मार्ग को पार करके ऊंचे-नीचे पथरीले बिन्ध्याचल
प्रान्त में विस्तृत नर्मदा नदी को हाथी के शरीर में रचना-विशेष के माध्यम से बनायी गयी शृङ्गार-रेखा की तरह देखोगे ।
-= समासः वने चरन्तीति वनचरा ( उपपद तत्० ) तेषां वचः, ताभिः मुक्ताः कुब्जा: यस्मिन् तस्मिन् ( बहुव्रीहि) तोयस्य उत्सर्गः तोयोत्सर्गः ( ० तत्० ) तेन द्रुततरगतिः तोयोत्सगं द्रुततर गतिः ( वृ० तत्) दूततरा गतिर्यस्य स द्रुततरगति ( बहुब्रीहि ) । तस्मात्परं तत्परम् (सुप्सुपेति- समासः) । उपलेन विषमः उपलविषमः तस्मिन् ( तृ० त०) विन्ध्यस्य- पादे विन्ध्यपादे ( ० तत्० ) ।
कोशः - निकुञ्ज वा क्लीबे सादि पिहितोदरे, इत्यमरः । मुहूर्त- मल्पकाले स्याद पटिका द्वितयेऽपि च इति शब्दार्गवः पादाः प्रत्यन्तपर्वतः, इत्यमरः । पादो बच्ने तुरीयांश शैलप्रत्यन्तपर्वते इति मेदिनी रेवा तु नर्मदा सोमोद्भवा  इत्यमरः । भूतिर्मातङ्गशृङ्गारे जाती भस्मनि सम्पदि इति विश्वः ।
- टिप्पणी- वनचरवधूमुक्त० – यहाँ वन उपपदपूर्वक गत्यर्थक "च" धातु से "उपपदमति" इस सूत्र से समाप्त करके "परेष्ट:" इस सूत्र से "ट" प्रत्यय करके "वनचर" शब्द बनाया जाता है। "तत्पुरुषे कृति बहुलम्' से वैकल्पिक समास करके "वनेचर" ऐसा रूप भी बनता है। द्रुततर- गतिः प्रतिशयेन द्रुतादुततरा तथा भूता गतिर्यस्य स द्रुततरगतिः । यहाँ " द्रुता" शब्द से "द्विवचन- विमज्योपपदे तरबीयसुनी” इस सूत्र से "तरप्” प्रत्यय किया गया है एवं स्त्रीत्व विवक्षा में टापू करके "वतरा" यह रूप निष्पन्न होता है। विन्ध्य पर्वत भी सात कुल पर्वतों में से एक हैं, जैसे—

महेन्द्रो मलयः साः पुतिमानुषपर्वतः ।
विन्ध्य पारियात्रा सप्तैते कुलपर्वताः ।
नर्मदा भी सात पूज्य नदियों में एक है जैसा कि स्नान के समय लोग
बोला करते हैं-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधि कुरु ॥
अलङ्कार यहाँ समासोक्ति एवं धोती उपमा के
मङ्गाङ्गिभाव से रहने के कारण संकर अलङ्कार है ।। १९ ।।
तस्यास्तिक्तंवंमग नमदेर्वासितं वान्तवृष्टि- कुञ्जप्रतिहतरयं तोयमादाय गच्छेः ।
अन्तःसारं घन ! तुलयितुं नानिलः शक्ष्यति त्वां रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय ॥ २० ॥

= व्याख्या है घन ! हे जलद वान्तवृष्टिः उद्गीर्णवर्ष (सन्) तिन === कटुभिः तिक्तरसान्वितैश्चेत्यर्थः वनगजमदैः कानन हस्तिदानवारिभिः वासितम् सुगन्धितम् जम्बूकुजप्रतिहतरयम् जाम्बनिकुञ्ज प्रतिबद्धजवम् तस्याः नर्मदायाः तोयम् जलम् आदायनीत्वा गच्छेः व्रज अन्त:- सारम् अन्तः स्थितत्वम् बलमिति यावद जलपरिपूर्णमितिभावः । त्वाम् मेयम् अनिल वायुः तुलयितुम्मापयितुम् न शक्यति समय भवि यति हि नियेन रिक्तः निःसारः शून्य इत्यर्थः सर्वः सकलः, उघुः न्यूनः हेय इति भावः भवति वर्तते पूर्णतासारवत्ता, गौरवाय गरिम्णे भवति । = = -
अन्वयः - हे धन ! वान्तवृष्टिः तिक्तः वनगजमदैः वासितम् जम् प्रतिहतरयम् तस्याः तोयम् आदाय गच्छे अन्तःसारम् त्वाम् अनिल: तुलयितुं न शक्ष्यति हि रिक्तः सर्वः लघुः भवति पूर्णता गौरवाय
शब्दार्थ: है मैच ! यान्तदृष्टिः जल बरसाये हुए, तिक्तः सुगन्धित बनगजमदैः - जंगली हाथियों के मदजल से वासितम् सुगन्धित, जम्बूकुज्ज प्रतिहतरयम्जामुन के निकुञ्ज से रोके हुए वेगवाले, तोयम् [जल को, आदाय = लेकर, गच्छे:जाना अन्तः सारम् भीतर से शक्तिशाली, त्यामु तुझको, - तुझ को, अनिलवायु, लयितुम् हिलाने में न वक्ष्यति समर्थ नहीं

= = - होगा, हि क्योंकि, रिक्त: भीतर से खाली सर्व सभी लघुः हल्का (हेय) "और" पूर्णता गुरुता, गौरवाय गौरव के लिए भवति होता है।
भावार्थ: है मेघ! तत्र जलवर्षणानन्तरं सुगन्धिभिर्वन्यगजानां दान- वारिभिः सुवासितं जम्बूनिकुजावरुद्धवेगं नर्मदाजलं गृहीत्वा ब्रज जलवत्वा- 1 दन्तःसारं त्वां पवनः प्रकम्पयितुं समर्थो न भविष्यति यतो हि निःसार: सर्वोऽपि यः भवति, केवलं सारवतंय गौरवास्पदं भवति ।
हिन्दी - मैच ! यहाँ जल बरसाने के बाद जंगली हाथियों के सुगन्धित मदजल से सुवासित जामुनों के निकुञ्जों के द्वारा रोके गये वेग वाले नर्मदा नदी के जल को लेकर (बागे) जाना भीतर से शक्तिशाली तुझे वायु हिला नहीं सकेगा, क्योंकि प्रत्येक वस्तु जो भीतर से निःसार हो, हल्की होती है एवं भरापन गुरता के लिए होता है।
समासः वान्ता वृष्टियेन स वान्तवृष्टि (बहुव्रीहिः) वनस्य गजा वनगजाः ( ष० त०] ) तेषां मदैः वनगजमदैः (प० स०) जम्बूनां कुज्ञ- जम्बूकुञ्ज ( प० स० ) तैः प्रतिहतो रयः यस्य तम् जम्बूकुञ्जप्रतिहतरयम् (बहुवीहि । अन्तः सारो यस्य तम् अन्तःसारम् (बहुवीहिः ।
कोश:-- दृष्टिम् इत्यमरः तिक्तो रसे सुगन्धे च इति विश्वः जम्बू स्त्री जम्बुजाम्बवम् इत्यमरः सारो बले स्थिरांशे च इत्ययरः सारो बले मज्जनि च स्थिर स्याये च नीरे च घने सारम् इति विश्वः । भवेत् प्रति- हृतं द्विष्टे प्रतिस्खलितरुद्धयः इति मेदिनी । मदो रेतसि कस्तूयों गर्व हर्षेभ- दानयो:, इति विश्वः ।
टिप्पणी (ड) वम् धातु से कर्म में क्त प्रत्यय करके स्त्रीश्व विवक्षा में टापू करके 'वान्ता' ऐसा प्रयोग बनता है यहाँ "वम्" धातु का "उगलना" अर्थ होने पर भी गौणवृत्ति का आश्रय लेने के कारण जुगुप्सा व्यंजक अश्लीलता नहीं आ पायी है। क्योंकि "निष्ठ्यूतोद्गीर्णवातादिगणवतिव्यपाश्रयम् । मति सुन्दरमन्यत्र प्राम्यकक्षां विगाहते ।" ऐसा दण्डी लिखते हैं। आदाय उप-

सर्वपूर्वक "दा" धातु से क्या प्रत्यय करके उसके स्थान पर ल्यप् करके उक्त रूप निष्पन्न होता है। गच्छ यहाँ "विधिनिन्त्रणामन्त्रणादि" सूत्र से विधि में लिए है। तुलयितुम् - यहाँ "तुल" धातु से "तत्करोति तदाचष्टे" इस सूत्र से "णि" प्रत्यय करके पश्चात् "समानकर्तृकेषु तुमुन" इस सूत्र से "तुमुन् प्रत्यय किया गया है। शक्ष्यति वाक्' धातु के बद लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन का रूप है ( शक्+स्पति ) प्रस्तुत श्लोक का महोपाध्याय मल्लिनाथजी ने एक दूसरा भी अर्थ निकाला है, जैसे कि आयुर्वेद- शास्त्रानुसार वमन के बाद मानव को सेला, हल्का और वरपरा जल पीना चाहिए ताकि वायुविकार न होवे, इसलिए है मेघ! तुम जल वमन करने के 1 सुगन्धित एवं जामुन के कुज में रुके हुए प्रवाह के कारण कसैला नर्मदा का जल पीकर जाना, तब तुम्हें पवन नहीं हिला सकेगा, अन्यथा वमन के कारण भीतर से निःसार तुम्हें पवन हिला देगा, क्योंकि भीतर से शून्य सभी हल्के होते हैं, पूर्णता हो गौरव के लिए होती है।
अलङ्कार:- यहाँ तृतीयचरण के विशेष अर्थ का समर्थन चतुर्थचरण के सामान्य अर्थ से किया गया है,
अतः यहाँ " अर्थान्तरन्यास" नामक अलङ्कार है ।। २० ॥
नीपं दृष्ट्वा हरितकपिशं केसरं रथंरू- राविभूत प्रथम- मुकुलाः कन्दलीश्चानुकच्छम् ।
जग्ध्वाऽरण्येध्वधिकसुरिभं गन्धमाघ्रायचोर्व्याः सारङ्गास्ते जललवमुचः सूचयिष्यन्ति मार्गम् ॥ २१ ॥

अन्वयः -- केसरे हरितकविणम् नीपम् दृष्ट्वा अनुकच्छम् आविर्भूतप्रथममुकुलाः कन्दली: च जलवा अरण्येषु उम्याः अधिकं सुरभिम् गन्धम् च आधाय सारंगा: जललवमुचः ते मार्गम् सूचयिष्यन्ति ।
व्याख्या (हे मेघ) अर्ध बर्षोत्पन्नः केसरः किञ्जल्क हरितकपिशम्= हरिधूसरम् नीपम् कदम्बम् दृष्ट्वा विलोभय, अनुकच्छम् - --

= मन्वनूपम् जलप्रादेशसमीपे इत्यर्थः आविर्भूत प्रथममुकुलाः सज्जात पूर्व- कुलाः कन्दलीश्च भूकन्दली, जवाभुक्त्वा भरण्येषु काननेषु उपः पृथिव्याः अधिकसुरभिम् उत्कट सुगन्धियुक्तम् आधायावा, सारङ्गाः कुरङ्गाः, जललवमुचः सलिलविन्दुवर्धकः, ते मेघस्य मार्गम् - पन्थानम्, सूचयिष्यन्ति निर्देश करिष्यन्ति । = =
= - = शब्दार्थ:- (हे मेच !) अर्धआये निकले हुए केस रेशों से, हरितकपिशम्हरे और धूसर रंगवाले, नीपम् कदम्ब को, दृष्ट्वा देखकर, अनुकच्छम् दलदल में, आविर्भूतप्रथममुकुलाः जिनमें पहले पहले कलियाँ प्रकट हुई हैं, कन्दली केले के समान पुष्प वृक्षों को, जग्ध्वा खाकर अरण्येषु वनों में उप पृथ्वी की अधिक सुरभिम् अत्यन्त सुरभित, मन्धम् सुगन्ध को आधायसूचकर सारंगा: मृग, हाथी, अमर, जललवमुषः जलविदु बरसाने वाले, ते तेरे मार्गममार्ग को सूच विध्यन्ति सूचित करेंगे।
भावार्थ:- ( हे मेघ !) हस्तिभ्रमरमृगाः अर्धोत्पन्नकेसरः हरितघूसर कदम्बकुसुमं विलोक्य जलप्रायदेशे उत्पन्नपूर्वकमनाः भूमिकन्दलीय मुक्त्वा, अरण्येष्वत्यधिक भूमिगन्धमाघ्राय सलिलविदुरजस्तै पन्यान- मनुमापयिष्यति ।
हिन्दी मे ! हाथी, मृग और मोरे अर्धविकसित केसर से हरे-धूसर रंगवाले कदम्बपुर को देखकर दल दल से पहले पहले जिनमें कलियाँ प्रकट हो रही है। ऐसे भूमिकन्दलियों के नये कुमलों को लाकर जंगलों में अधिक सुगन्धित पृथ्वी के सुगंध को सूंघकर जलबिंदु बरसाने वाले तेरे मार्ग को सूचित करेंगे।
समास: हरितन्तत् कपिनाम् हरितकपिशम् (कर्मधारयः ) कच्छस्य समीपे अनुकच्छम् (अव्ययीभावः) आविर्भूताः प्रथमा मुकुलाः यासां ताः आविर्भूतप्रथममुकूला (बहुव्रीहिः) साराण्यंगानि येषां ते ( मृगादयः ) (बहुव्रीहिसमासः) ।

कोश:- पलाशी हरितो हरित् यायः स्यात् कपियो धूम्रधूमिलो कृष्णलोहिते, इत्यमरः । अथ स्थलकदम्बके । नीपः स्यात्पुलके, दर्ति शब्दा र्णवः जलप्रायमनूपं स्यात्पुंसि कच्छस्तथाविधः इत्यमरः । कुड्मलो मुकुलो स्त्रियाम् इत्यमरः । द्रोणपर्णी स्निग्ध-कन्दा कन्दली भूकदत्यपि इति शब्दा यः सारंगात मृगे कुरङ्गे चमतङ्गजे, इति विश्वः
टिप्पणी-सारङ्गाः साराम्यगानि येषा ते सारङ्गाः ऐसा समास किया जाता है, परन्तु यहाँ सवर्ण दीर्घ न होकर कन्यादि गण में पाठ होने के कारण "शवादिषु पररूपं वाच्यम्" इससे पररूप होकर "सारंग" शब्द सिद्ध होता है। "सारंगः पशुपक्षिणी" इसके अनुसार सारंग शब्द का अर्थ हाथी, हिरण, भौरा, चातक आदि किया जाता है। जगवारण्येष्वधिक ०- इसके स्थान पर कोई-कोई टीकाकार "दगवारण्येष्वधिकसुरभिम्" ऐसा पाठ मानते हैं इस विषय में उनका कहना है कि इस इलोक में दो बार ही केवल "" शब्द का प्रयोग किया गया है, एक दूसरे पाद में तथा दूसरा, तीसरे पाद मैं पहला च नीपं और आघाव को जोड़ता है। ऐसी दशा में यदि जवारण० को शुद्ध पाठ माना जाय तो दृष्ट्वा जलवा और आधाय तीनों एक ही साथ आ जाते है एवं उनको जोड़ने वाला केवल दो च ही रह जाते है तथा जवाका कर्म इससे बहुत दूर हो जाता है परन्तु उचित तो "जग्ध्वा- रण्ये" आदि पाठ ही है क्योंकि कवि ने यहाँ सारंग शब्द का प्रयोग इसलिए  किया है कि उसके तीन कर्ता अभिप्रेत हैं हाथी, भरे और हरिण इसलिए पूर्व- कालिक क्रियाएँ भी तीन रहनी चाहिए. एक मूल क्रिया है और दो क्रियाओं के जोड़ने के लिए दो "च" का रहना उचित है।

अलङ्कार यहाँ दृष्टि का अनुमान किया गया है इसलिए यहाँ अनुमाना लंकार है ।। २१ ।
अम्भोबिन्दु ग्रहणचतुरश्चातकान् वीक्षमाणाः श्रेणीभूताः परिगणनया निविशन्तो बलाकाः ।
त्वामासाद्य स्तनितसमये मानयिष्यन्ति सिद्धाः सोत्कम्पानि प्रियसहचरीसम्भ्रमालिङ्गितानि ।। २२ ।।

व्याख्या अम्भोबिन्दुग्रह्णचतुरान् वारिकणग्रहणपटून् चातकान् सारंगानू, वीक्षमाणः - अवलोक्यमानः, श्रेणीभूताः पंक्तिबद्धाः, बलाका वकपंक्ती, परिगणनया एका हे, तिलः इति क्रमपूर्वकेण संख्यानेन निर्दि- शन्तः अंगुल्या निर्देशं कुर्वन्तः सिद्धाः देवयोनि विशेषाः स्तनित-समये= रति समये, स्वद्गर्जनकाले वा सोत्कम्पानि उत्कम्पस हितानि प्रियसहचरी- संभ्रमानिमितानि स्निग्धप्रियात्वस्यानि आसाद्य प्राप्य, स्वाम् मेघम् मानयिष्यन्ति साधुवादान् वदिष्यन्ति ।
शब्दार्थ:-अम्भोबिन्दुपह्मचतुरान् जल के कणों को ग्रहण करने में चतुर, चातकान् "चातक" नामक पक्षियों को वीक्षमाणः देखते हुए. श्रेणीभूताः पंक्तिबद्ध, बलाका: वपंक्तियों को परिगणनया एक-दो तीन इस तरह गिनकर, निदिशन्तः अंगुली से दिखाते हुए सिद्धाः देव- योनिविशेष, स्तनितसमये संभोगकाल में अथवा ( तुम्हारे गर्जन काल में ), सोत्कम्पानि कम्पन के सहित प्रियसहचरीसम्मान अपनी प्यारी सहचरियों के भय के साथ भरपूर आलिंगन को, आसाद्य प्राप्त कर, स्याम् तुम्हें ( मेघ को ), मानविष्यन्ति धन्यवाद देंगे । = - = = -
अन्वयः - अम्मोबिन्दुग्रहणचतुरान् वादकात् क्षमाणा. बेणीभूता: बलाका: परिगणनया निदिशन्तः सिद्धाः स्तनितसमये सोत्कम्पानि प्रियसहचरी- सम्मालिङ्गितानि आसाद्य त्वाम् मानयिष्यन्ति ।
भावार्थ:- हे मेथ! वणजलग्रहणनिपुणान् चातकान् पश्यन्तो मद्धपंक्तीः बलाका: एका तिखः इत्यं संस्थानेन दर्शयन्तः सिद्धाः रतिकाले स्वद्ग भीतानां कामिनीनां स्वेच्छयाऽश्लेषं प्राप्य त्वां धन्यवादान् व्याहरिष्यन्ति ।
हिन्दी है मेघ वर्षा के जल-बिन्दुओं को ग्रहण करने में चतुर चातकों को देखते हुए पंक्तिबद्ध नकपंक्तियों को एक, दो, तीन इस प्रकार अंगुली से दिन- कर बताते हुए दिखाते हुए) सिद्धयोग, संभोग काल में तुम्हारे गरजने के कारण भयभीत अपनी प्रियाओं के घरपूर आलिंगन को प्राप्तकर तुम्हें धन्यवाद देंगे।

= समास: अम्भसां विन्दवः बम्भोविन्दवः ( प० तत्०) तेषां ग्रहणं [ष० त०) तस्मिन् चतुरास्तान् (स० तत्०) प्रिया ताः सहचयैः ( कर्मधारय०) तास सम्भ्रमः ( [ष० त० ) तेन बालगितानि ( वृ० तत् ) प्रियसम्मलिगितानि ।
कोशः पृषन्तिबिन्दुपृषताः इत्यमरः सारंगा स्तोकाकः समाः इत्यमरः । बलाकाः वकपंक्तिः स्यात् इत्यमरः । स्तनितं गर्जितं मे निषे रसितादि च इत्यमरः ।
टिप्पणी-बीक्षमाणाः यहाँ "वि" उपसर्गपूर्वक आत्मनेपदी "इक्ष" धातु के लट् लकार के स्थान में "लटः शतृशानचावप्रयमासमानाधिकरणे" इस सूत्र से "शानच् प्रत्यय करके "वीक्षमाण" ऐसा रूप हुआ है श्रेणी- भूता:- अषेणयः घेणयः संपद्यन्ते इति श्रेणीभूताः । यहाँ "श्रेणी" शब्द से भूताः के योग में "कृस्वस्ति योगे संपकर्तरि च्वि:" इस सूत्र से अभूत तद्भाव अर्थ में for प्रत्यय होकर "यो " इस सूत्र से दीर्घ होकर "श्रेणीभूता" ऐसा रूप बना है ।। २२ ।।
उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे मत्प्रियार्थं यियासोः
कालक्षेपं ककुभसुरभो पर्वते पर्वते ते ।
शुक्लापाङ्गैः सजलनयनैः स्वागतीकृत्य केका
प्रत्युद्यातः कथमपि भवान् गन्तुमाशु व्यवस्येत् ॥ २३॥

अन्वयः - हे ससे मत्प्रियार्थं दुतं विवासोः अपि ते ककुभसुरभी पर्वते कालक्षेपम् उत्पश्यामि सजलनपनैः शुक्लापा का स्वागतीकृत्य प्रत्युद्यातः भवान् कमपि आशु गन्तुं व्यवस्येत् ।
व्याख्या हे सखे हे मित्र ! मत्प्रियार्थम् मत्प्रियार्य किंवा मदिष्ट सम्पादनाय तम् शीघ्रम् विवासोः गन्तुमिच्छी: अपि ते तब मेथस्येति यावत् ककुभसुरभीकुटजपुष्पपरिमलसुरभिते पर्वते पर्वते कालक्षेप =समयविलम्बम् उत्पश्यामि उत्प्रेक्षे सजलनयनैःपूर्णाक्षिभिः शुक्ला-

= - = शब्दार्थ : हे सखे हे मित्र, मत्प्रियार्थम् मेरी प्रिया के पास अथवा मेरा सन्देश पहुँचाने के लिए, बियासोः जाने की इच्छा वाले, अपि भी, ते- - तुम्हारा, ककुभसुरमौ कुटज पुष्प के सुगन्ध से सुगन्धित पर्वते पर्वते प्रत्येक पर्वत पर कालक्षेपम् समय के विलम्ब की उत्पश्यामि सम्भावना करता हूँ । सजलनयनैः आनन्दाओं से परिपूर्ण नेत्रों वाले, शुक्लापाः। भोरों द्वारा, केका उनकी वाणी को स्वागतीकृत्यस्वागत वचन बनाकर, प्रत्युद्यातः अगवानी किया जाता हुआ, भवान् = आप (मेघ) कथमपि किसी तरह, शुशोन, गन्तुम् जाने का, ( आगे बढ़ने का ) व्यवस्थेत्== प्रयत्न कीजियेगा ।
पाङ्गैः = मयूरैः, केकाः =मयूरवाणीः, स्वागतीकृत्य स्वागत वचनं विधाय प्रत्युद्यातः प्रत्युद्गतः सन् भवान्मेघः कथमपि यथाकथञ्चित्, आशु = स्वरितम् गन्तुम्प्रयातुम् व्यवस्येत्प्रयत्नं कुर्यात् ।
भावार्थ: है ससे मवभासमीपं किंवा मन्सन्देशार्थं गन्तुमिच्छोरपि भवतः कुटजपुष्पपरिमलसुवासिते प्रत्यही समयविलम्बमनुमीये । तथापि आनन्दामृपूरितः मयूरैः केकया स्वागतं प्राप्य प्रत्युद्गतो भवान् ततः यथा कथ चित् शीघ्र गन्तुमुयुञ्जीत ।
हिन्दी - हे मित्र ! मेरी प्रिया के पास ( या मेरे सन्देश पहुँचाने के लिए) शीघ्र जाने की इच्छा रहने पर भी, कुटज पुष्पों से सुगंधित प्रत्येक पर्वत पर तुम्हारे समय क्षेत्र का अनुमान में कर रहा हूँ। ( फिर भी ) आनंद से भरे नेत्रों वाले मोर अपनी केका वाणी से तुम्हारा स्वागत करके, तुम्हारी अगवानी करेंगे, तुम भी किसी प्रकार वहाँ से शीघ्र जागे जाने का प्रयत्न करना।
समासः मदीया प्रिया मप्रिया तस्यै, किंवा मदीयं प्रियम् मत्प्रियम् ( नित्यसमासः) कालस्य क्षेपम् कालक्षेपम् (प० त०] ) न स्वागतम् अस्वागतम्, (नज०) अस्वागतं स्वागतं सम्पद्यमानं कृत्वा इति स्वागतीकृत्य ।
कोश: अथ मित्र सखा सुहृद् इत्यमरः । जयोऽय शीघ्रं स्वरितं लघु क्षिप्र मरं द्रुतम् इत्यमरः ककुभः कुटजेऽर्जुने, इति शब्दार्णवः । क्षेपो विलम्बे निन्दा-

याम् इति विश्वः मयूरो बहिणो वहीं शुक्लापाङ्गः शिखावत, इति यादवः । केकावाणी मयूरस्य इत्यमरः ।
टिप्पणी-मप्रियार्थ-यहाँ मम प्रियम् मत्त्रियम् इस प्रकार षष्ठी तत् पुरुष समास हुआ है। "प्रिय" इस उत्तर पद होने के कारण "प्रत्ययोत्तरपद- बोध" इस सूत्र मे "अस्मद्" शब्द के स्थान पर "मत्" यह आदेश हुआ है। विवासोः = यातुमिच्छो: विवासोः प्रापणार्यक "या" धातु से इच्छा अर्थ में "सन् प्रत्यय करके तत् प्रयुक्त द्वित्य इत्यादि कार्य करके "सनाशंसति उः" इस सूत्र से उप्रत्यय करके "वियासुः " ऐसा रूप बनता है।

उक्त रूप उसी शब्द के षष्ठी विभक्ति का है ।। २३ ।।
(पाण्डुच्छायोपवनवृतयः तर्कः सूचिभिन्नैः- नारम्भेगृ'हबलिभुजामा कुल ग्रामचैत्याः ।
स्वय्यासन्ने परिणतफलश्याम जम्बूव नान्ताः सम्पत्स्यन्ते कतिपय विनस्थायिहंसा दशार्णाः ॥ )

अन्वयः - ( है मैच !) त्वयि आसले दशार्णाः सुचिभिन्नः केतकैः पाण्डुच्छायोपवनवृतयः गृबलिभुजाम् नीयारम्भः आकुलग्राम चैत्याः परिषत
फलश्यामजम्बूवान्ताः कतिपयदिनस्थाहिंसाः सम्पत्स्यन्ते । व्याख्या (हे मेघ) त्वयि मेथे, बसन्ते समीपस्थे सति) दशार्णाः एवन्नामकाः देशाः सूचिभिन्न मुकुलाप्रविकसितैः केतकैः। केतकीकुसुमैः पाण्डुच्छायोपवनवृतयः पाण्डुरवर्णाऽऽरामप्रकाराः, गृहबलि- भुजाम्गेहवलिभोक्तृणाम्, काकादीनामिति भावः नीडारम्भः कुलायच नाभिः, आकुलग्राम चैत्याः संकीर्णग्रामवृक्षाः, अश्वत्थादयः परिणतफलश्याम- जम्बुवनान्ताः परिपक्वफलकृष्ण जम्बुकाननप्रदेशाः कतिपय दिनस्याहिंसा:- किचिद् दिवस स्थापिसाः, संपत्स्यन्ते भविष्यन्ति । = - =
शब्दार्थ:- (हे मेघ) स्वपि तुम्हारे आसलेबाने पर दशा दशा नामक देश, सूचिभिन्न मुकुल के अग्रभाग में खिले हुए, केट: -

= = = केतकी के पुष्पों से, पाण्डुच्छागोपननवृतयः जहाँ के उद्यान का मेरान पीला- पलासा हो गया। गृहबलभुजा घर की (विश्वेदेव ) बलि को खाने वाले ( कौए आदि) पक्षियों के नीवारम्भः सलों की रचना से आकुल- ग्रामचत्या. सङ्कीर्ण हो गये हैं पीपल आदि वृक्ष जहाँ के गाँवों के परिणत फल- श्यामजम्बूवनान्ताः == जहाँ के जामुन के वन पके हुए फलों से काले हो गये हैं, कतिपयदिनस्याहिंसाः जहाँ हंस कुछ दिनों तक रह सकते हैं ऐसे, सम्पत्स्यन्ते हो जायेंगे।
भावार्थ: है मे 1 स्वयि समीपस्थे सति दशाणदेशे गुहारामा वृत्तयः सिकेतकीकुसमानांकन्या पीतामा भविष्यन्ति, ग्राम्याः श्वत्यादयो वृक्ष: ariant काकादीनां कुलाय निम्मर्णिः भविष्यन्ति । तत्रस्यवनप्रान्तभागाः पक्व जम्बूफलैः कृष्णाः भविष्यन्ति, हंसा कतिपयदिवस यावत् स्थास्यन्ति ।
हिन्दी मे तुम्हारे समीप जाने पर दशार्णदेश के बगीचों का घेराव अधखिले केant पुष्प के रंग से पीला हो जायेगा, घर में दी गयी बलि को खाने वाले कौए आदि पक्षियों द्वारा पोंसलों के निर्माण से वहाँ के गाँवों के पीपल आदि वृक्ष सङ्कीर्ण हो जायेंगे पके हुए फलों की आभा से वहाँ के जामुन के वन प्रदेश काले हो जायेंगे, हंस भी वहाँ वर्षाऋतु के कारण कुछ दिन ही ठहरेंगे।
= = समासः पाछाया यासां ताः पाण्डुच्छायाः (बहु०) पाण्डुच्छायाः उपवनानां वृतयः येषु ते पाण्डुच्छायोपवनवृतयः ( बहुत्री०) आकुलानि ग्रामेषु चैत्यानि येषु ते आकुलग्रामभैत्याः (बहुव्रीहि०) परिणतः फलैः श्यामानि पानि जम्बूवनानि ( बहुवीहिः) अन्तःपरिणतः फलश्यामजम्बू- बनान्ता (इ०स०) कतिपयेषु दिनेषु स्थायिनोमा येषु ते कतिपयदिनस्थावि हंसा (बहुव्रीहि०) सूचीषु निनानि सूचिभिन्नानि (स० त०) ते नीटाना- मारम्भ: नीवारम्भ: (१० तत्) तैः गृहाणां वलय ( ० त०) गृहवलीन मुज इति गृहबलिभुजः तेषाम् ।

कोश: समीपे निकटासनप्रिकृष्टसनीडव इत्यमरः केतकी मुकुला- घुसूचि:, इति शब्दार्णवः । हरितः पाण्डुरः इत्यमरः । प्रकारो वरण: साल: प्राचीरं प्रान्ततो दृतिः इत्यमरः । ध्वाङ्क्षात्मपरवलिभुग्वासा अपि, इत्यमरः । चैत्यमायतने बुद्धबन्धे चोददेशपादपे इति विश्वः ।
टिप्पणी- दशार्णाः पशब्द अलग-अलग व्युत्पत्ति से अलग-अलग अर्थ को कहता है। जैसे-दश ऋणानि ( दुर्गभूमयः) येषा ते (बहुव्री०) दशार्णाः। दश + ऋण, यहाँ "प्रवत्सर कम्बलबसनदशानामृगे" इस सूत्र से "आ" वृद्धि होकर "उरण् रपरः " से रपर हो गया है। प्रस्तुत व्युत्पत्ति के अनुसार "दशार्णा:" शब्द पुरुषवाची है, जिनके दश दुर्ग हो उन राजाओं को "दशार्णे" कहा जाता है। तेषां निवासः ऐसा विग्रह करके "तस्य निवास:" से अण प्रत्यय होता है। उसका "जनपदे लुप्" से लुप् तो हो जाता है परन्तु लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने" इस सूत्र से लिङ्ग और वचन के प्रकृतिभाव हो जाने से "दशार्णा" यह बहुवचनान्त रूप निष्पन्न होता है। दूसरी व्युत्पत्तिः ऋण शब्द का दूसरा अर्थ जल भी है तो दया ऋणानि (जलस्रोतस ) बस्यां सा "दशार्णा" यहाँ "दशार्णा नदी अर्थ का बोधक शब्द है। चेस्याः यहाँ "चंत्य" शब्द वग्निवाचक "चित्य" शब्द से "चित्यस्य इमानि" इस विग्रह में “तस्यैदम्' इस सूत्र से "अणु" प्रत्यय करके आदि वृद्धि करने पर निष्पन् होता है न कि "चिता" या "वित्या" शब्द से ।। २३ ।। -
तेषां दिक्षु प्रथितविविशालक्षणां राजधानों गत्वा सद्यः फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा ।
तोरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात् सभ्रूभङ्गं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोमि ।। २४ ॥
अन्वयः - दिक्षु प्रथितविदिशा लक्षणाम् तेषां राजधानीम् गत्वा सद्यः कामुकत्वस्य विकलफलं लब्धा यस्मात् स्वादु चलोमि वेत्रवत्याः पयः सभू- म मुखम् इव तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि ।

= - = = - = = व्याख्या दिक्षु दिशासु प्रथितविदिशा लक्षणाम्प्रसिद्धविदिशेति- नाम्नीम् तेषां दशार्णानाम्, राजधानीम् = मुख्यनगरीम् गत्वा प्राप्य, सद्यः तत्क्षणम् कामुकत्वस्य विलासितायाः, अविकलम् समग्रम् फलम् लाभन् लब्धप्राप्स्यते भवतेति शेषः यस्मात्कारणात् स्वादु पेयम् चलोमितरंगसहितम् वेत्रवत्याः वेत्रवतीनचा पयः जलम् सभंगम् सकटाक्षम् मुखमिव आननमिव ( अधरमिवेतिभावः) तीरोपान्ते कूलप्रदेशे (यत्) स्तनितम् गर्जितम् तेन सुभगम् सुन्दरम् पास्यसि पानं करिष्यसि ।
= शब्दार्थ:- दिक्षु दिशाओं में प्रथितविदिशा लक्षणाम् विख्यात विदिशा नाम वाली, तेषाम् दशार्ण देशवालों की राजधानीम् राजधानी में गत्वा =जाकर कामुकत्वस्य कामुकता का अविकलम् सम्पूर्ण फलम् फल को, लब्धा प्राप्त करोगे यस्मात् क्योंकि, स्वादुमधुर, चलोमि तरंगयुक्त, वेगवत्याः वेत्रवती नदी के पयः जल को सश्रूभंगम् कटाक्ष- युक्त, मुखमिव मुख की तरह (अधर के समान तीरोपान्तस्तनितसुभगम् सट के पास गर्जन से सुन्दर, पास्पसि पान करोगे। = =
भावार्थ: है मेघ विदिशाभिधेयां दशार्थानां राजधानीं गत्वा तत्र त्वं सत्क्षणमेव विलासिताया अशेष लाभं लप्स्यसे । यतस्तत्र वेत्रवत्याः नद्याः मधुरं तरंगयुक्तच जलं कस्याचिन्नाविकायाः कटाक्ष युक्तमधुरमिव तटप्रान्ते गजनान्तरं पास्यसि ।
हिन्दी मे ! तुम विख्यात विदिशा नामावली दशार्णा देश की राज धानी में जाकर तुरन्त विलासिता के सम्पूर्ण फल को प्राप्त कर लोगे क्योंकि वहाँ वेत्रवती के मधुर एवं तरंगयुक्त जल को किसी नायिका के कटाक्षयुक्त अधर के समान तटान्त में गर्जन के बाद पान करोगे ।
समासः प्रथितं "विदिशा" इति लक्षणं यस्याः ताम् प्रथितविदिशलक्षणम् (बहुव्रीहि०) विगता कला यस्य तद्विकलम् (बहुव्रीहि) न विकलम् - अविकलम् (नम् तत् ) चलाः उमेयो यस्याः तद् चलोमि (बहुबीहि० ) । तत्०)

- कोशः प्रतीते प्रथितख्यात वित्तविज्ञातविश्रुताः इत्यमरः लक्षणं नाम्नि पिछे च इति विश्वः प्रधाननगरी राजा राजधानीति कथ्यते इति शब्दार्णवः बिलासी कामुको कामी, इति शब्दार्णवः स्तनितं गतिं मेव निर्दोष रसितादि च इत्यमरः ।
भङ्गेन सह वर्तमानम् समंगम् (बहुव्रीहि०) वीरस्य उपान्तः वीरोपान्तः ( प त ) तस्मिन् स्तनितम् (स० त०) तेन सुभगम् रोपान्तस्तनित- सुभगम् (तृ० तम् )।
टिप्पणी- राजधानी- धीयन्ते अस्यामिति धानी, "धा" धातु से अधि- करण में "करणाधिकरणयो" इस सूत्र से ल्युट् प्रत्यय हुआ है एवं स्त्रीत्व विवक्षा में डीप होकर "धानी" यह शब्द निष्पन्न हुआ है राज्ञां धानी राजधानी । कामुकत्वस्य कामयते तच्छील: इस विग्रह मे "क्रान्ति" अर्थात् "इच्छा" अर्थ वाले "कमु" धातु से "लपपतपदस्याभूषनकमगम्य उकम्" इस सूत्र से "उकञ् " प्रत्यय किया गया है एवं भिटवाद "तद्धितेब्वचामादेः " इस सूत्र से आदिवृद्धि करके "कामुक" ऐसा रूप बना है एवं तस्य ( कामुकस्य ) भावः इस अर्थ में "तस्य भावस्त्वतलो" से "स्व" प्रत्यय करके "कामुकत्व" ऐसा साधु होता है । लब्धा - "लम्" धातु के अनद्यतन भविष्यत् अर्थ में "ढ" लकार के प्रथम पुरुष के एकवचन का रूप "लवा" यह पाठ भी मिलता है जिसका वर्ष होगा "प्राप्त करके" उक्त रूप उसी धातु से "त्या" प्रत्यय करके बनेगा ।
अलङ्कार इस श्लोक में लिङ्ग साम्य से नायक-नायिक के व्यवहार का समारोप होने से "समासोक्ति" अलङ्कार है एवं "सधूमवं मुखमिव" यहाँ उत्प्रेक्षा अलङ्कार है। इस तरह दोनों अलङ्कारों के अङ्गाङ्गिभाव से रहने के कारण यहाँ "संकर" नामक अलङ्कार है ।। २४ ॥

नीचैराख्यं गिरिमधिवसेस्तत्र विश्रामहेतो-
संपर्कात् पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः ।

यः पण्यस्त्री रति+रिमलोद्गारिभिर्नागराणा-
मुद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभियों बनानि ॥ २६ ॥

व्याख्या - ( हे मेघ ! ) तत्र विदिशायाम्, विश्रामहेतोः श्रमापनोद- नाय, प्रौढपुष्पैः सुविकसितकुसुमैः कदम्बैः सीपैः स्वत्संपर्काद्भवत्सा- हचर्याद पुलकितमिव सलोमहर्षमिव रोमान्चमिवेत्यर्थः नीचैरास्यम् = नीचैः नामानम् गिरिम् पर्वतम् अधिवते अधिवासं कुर्याः । यः पर्वतः पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिः वेश्याकामक्रीडासौरभाविष्कुर्वद्भिः शिलावेश्मभिः पाषाणसदनैः कन्दराभिरित्यर्थः नागराणाम् चतुरनगर- वासिनाम्, उद्दामानि निर्वन्धानि उत्कटानीति भावः यौवनानि तारुण्यानि प्रथयति कथयति ।
अन्वयः -- तत्र विश्रामहेतोः प्रौढपुष्पैः कदम्बैः त्वत्संपर्कात् पुलकितमिव नीरूपम् गिरिम् अधिवसेः । तः पम्यस्वीरतिपरिमलोद्गारिभिः शिला- वेश्मभिः नागराणाम् उद्दामानि यौवनानि प्रथयति ।
शब्दार्थ:- :-तत्र उस विदिशा में विश्रामहेतोः थकावट दूर करने के लिए, प्रौढपुष्पैः अच्छी तरह खिले हुए फूलों वाले कदम्बकदम्ब वृक्षों से, स्वत्संपर्कात् तुम्हारे संपर्क से, पुलकितमिव रोमान्चित हुए की तरह, नीचैराख्यम्"नीचे" इस नाम के गिरिम् पर्वत, पण्यस्त्रीरतिपरिम छोद्गारिभिः वेदयामाओं की काम-क्रीडा में ( उपयुक्त ) सुगन्ध को व्यक्त करने वाले, शिलावेश्मभिः कन्दराओं के द्वारा, नागराणाम्-नगर निवासियों के, उद्दामानि निबन्ध ( उत्कट ), योवनानि यौवन ( जवानी) को, ( प्रथयति कहता है ( प्रकट करता है)। = = - = - = =
भावार्थ:- हे मेघ ! विदिशायां श्रमापनोदनाय कुसुमित-कदम्ब, रोमान्चयुक्तमिव नीचैनमक पर्वतमधिवासं कुर्याः । यः पर्वतः वैश्यारम्भक्रीडा- प्रयुक्त सुगन्धिताभिः कन्दराभिनवराणामुत्कटयौवनानि व्यनक्ति ।
हिन्दी है मेष ! विदिशा में विश्राम करने के लिए पूर्णविकसितकदम्ब पुष्पों से मानो तुम्हारे सम्पर्क से रोमान्च के समान "नीचैः" नामक पर्वत


पर ठहर जाना जो पर्वत, वेश्याओं द्वारा काम-क्रीडा में प्रयुक्त सुगन्धवाली कन्दराओं के माध्यम से नगरनिवासियों के उत्कट यौवन ( जवानी) को व्यक्त कर रहा है।
समास:- विश्रामस्य हेतु विश्रामहेतुः तस्य ( प० त०) प्रौदानि पुष्पाणि येषु तैः प्रौढपुष्पैः ( बहु० ) तब संपर्कः तस्मात् त्वत्संपर्कात् (० तद्) । नीचैः आल्या अस्य तम् (बहु० ) पण्याः स्त्रियः तास ( बहु० ) रतिषु यः परिमल (स० त० ) तमुदगिरन्ति ते पम्यस्त्री रतिपरिमलोद- गारिभिः, दाम्नः उद्गतानि ( कुगतिप्रा० त०) यूनः भावः यौवनम् तानि ।
कोश:- वारस्त्री गणिका वेश्या पण्यस्त्रीरूपजीवनी, इति शब्दाः ॥ विमर्दोत्ये परिमली सन्धे जनमनोहरे, इत्यमरः । पाषाणप्रस्तरग्राबोपलाश्मान: शिलाषद् इत्यमरः । उद्दाम बन्धरहिते स्वतन्त्रे च इति मेदिनी ।
टिप्पणी- विश्रामहेतोः यद्यपि कई टीकाकार "विश्राम" शब्द को अपाणिनीय कहकर "विश्रान्ति" ऐसा पाठ इस वलोक में रखते हैं उनका कहना है कि "अ" धातु से जब "घ" प्रत्यय करेंगे तब उपधावृद्धि नहीं हो पायेगी, क्योंकि "नोदात्तोपदेश मान्तस्यानाचामे" इस सूत्र से उसका निषेध हो जायेगा सिद्धान्तकौमुदीकार ने भी विश्राम शब्द को अपाणिनीय ही बताया है परन्तु महाकवि कालिदास को प्रमाद दोष से बचाने के लिए यदि "श्रमु" धातु से स्वार्थ में "णि प्रत्यय लगाकर वृद्धि करके "आमि" ऐसा रूप बना- कर उसकी धातु संज्ञा करके वि उपसर्गपूर्वक, "धामि" धातु से "एरचु" इस सूत्र से "अ" प्रत्यय करेंगे (वि + धामि ) तो "विधाम" यह रूप सिद्ध हो जायेगा। यदि यह कहें कि पुनः वृद्धि निषेध करेंगे तो नहीं कह सकते क्योंकि उपधावृद्धि निषेध इस सूत्र में "कृति" का अनुवर्तन किया जाता है “णिच्” कृत्प्रत्यय से भिन्न है हाँ णिजन्त बनाकर "विश्राम" सिद्ध होने पर भी एक दावा यह आ सकती है कि "मिठो ह्रस्वः" से वृद्धि को पुनः हस्व होना चाहिए, परन्तु यह सूत्र विकल्प से ह्रस्व करता है, क्योंकि "वा" की अनुवृत्ति जाती है

यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि "शिव" प्रत्यय स्वार्थ में है "प्रेरणा" में नहीं ताकि अर्थभेद को आपत्ति आ सके कवि को इस दोष से बचाने के लिए मल्लिनाथजी "विद्यामो वा" इस सूत्र को प्रस्तुत करते हैं, उनका कहना है कि यह सूत्र चान्द्र व्याकरण का है। कुछ लोगों का कहना है कि यह सूत्र जैनेन्द्र व्याकरण का है जो कुछ भी हो, किसी भी व्याकरण से सिद्ध तो है ही, परन्तु पाणिनि नहीं सिद्ध कर सके। महोपाध्याय मल्लिनाथजी ऊपर णिजन्तादि प्रक्रिया की अपेक्षा "श्रमणं श्रमः, भावे पञ्" और धम शब्द से स्वार्थेऽण करके "श्राम" शब्द सिद्ध करके पुनः विगतः बामो यस्मिन् इति "विधाम:" यह प्रक्रिया भी सरल और लघु होते हुए दोष विधातक भी है। पुलकितम् पुलकाः सञ्जाता यस्य" इस विग्रह में "वदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्" इस सूत्र से "इतच्" प्रत्यय करके "पुलकित" यह रूप बना है। उक्त रूप इसी शब्द के द्वितीया के एक वचन का है। पण्यस्त्री० यहाँ "पथ्य शब्द" "वणि योग्या" इस विग्रह में निन्या अर्थ में "अवयव गणितव्याऽनिरोधेषु" इस सूत्र से निपालन किया गया है। उद्गारिभिः यहाँ उद्गार शब्द का प्रयोग गौणत्या होते के कारण जुगुप्साaan अश्लीलता नहीं आ पायी है। क्योंकि दण्डी की "निष्ठ्यूतोद्गौणं०" वाली पंक्ति इसका प्रमाण है ।। २५ ।। -
विश्रान्तः सन् व्रज बननदीतीरजातानिसिञ्च- तुधानानां नवजलकणैयूँ थिका - जालकानि ।
गण्डस्वेदापनयनदजावलान्तकर्णोत्पलानाम् छायादानात् क्षणपरिचितः पुष्पलावी मुखानाम् ॥ २६ ॥
अन्वयः तत्र विधान्तः सन् वननदीतीर जातानि उद्यानानाम् सूचिका-:
सिचन् गण्डस्वेदापनयन स्वाक्लान्तकर्णोत्पलानाम् पुष्पलावीमुखानाम् छायादानात् क्षणपरिचितः ( सन् ) ।

व्याख्या तत्र विदिशायां स्थिते नीचे गिरी, विधान्तः सन् यतश्रमः सन्, वननदीतीरजातानि वन्यस रिस्कुलोद्भवानि, उद्यानानाम् आरामाणाम, =

यूथिकाजालकानि मागधीपुष्प कुलानि नवजलकणी: नूतन सलिलबिन्दुभिः, सिचन्यन् गण्डस्वेदापनयन राजालान्तकर्णोत्पलानाम् = कपोलस्वेदा- पनयनपीडाशामश्रोत्रपद्यानाम् पुष्पलायीमुखानाम् पुष्पावचायिकायदनानाम् छायादानात् अनातपीकरणात्, क्षणपरिचितः किचिदकालेन ज्ञातः, (सन् - ब्रज गच्छ ।
= - शब्दार्थः तत्र उस "नीचे" नामक पर्वत पर विश्रान्तः सन् विश्राम करके, वननदीतीरजातानि जंगली नदियों के किनारे उत्पन्न, उद्यानानाम् बगीचों के पूथिकाजालकानि माधवी की कलियों को नवजलरूप: नूतन बूंदों से सिन्सींचता हुआ, गण्डस्वेदापनयन रुजालान्तकर्णोत्पलानाम् == जिसके कानों में ( पहने गये) कमल गालों पर ( जूते हुए) पसीने को पोछने के कारण मुरक्षा गये हैं, ऐसे, पुष्पलावीमुखानाम्फूल तोड़नेवाली महिलाओं के मुखों का छापादानात् छाया देने के कारण, क्षणपरिचितः कुछ समय के लिए परिचित होकर, वज जाना ।
भावार्थ:- (हे मेच !) नीरद्री विश्रम्य नदीतटोत्पन्नानि बारामाणां मागधीकुसुमकुद्मलानि नूतनजललवेराकुर्वन् पुध्यायचयनपरायणानां नारीमु status जलदूरीकरजेन म्लानकर्णाऽऽभरणीभूतपद्मानां छायाप्रदानेन चिकाला परिचितः सन् गच्छ ।
हिन्दी (हे मेम ) वहाँ नीचैः नामक पर्वत पर विश्राम करके जंगली नदियों के तट पर विद्यमान बगीचों के जूही पुष्प की कलियों को नवीन जलकणों से सींचा हुआ, जिनके कानों में पहिने गये कमल मालों पर बहते हुए पसीनों को पोछने के कारण मुरझा गये हैं. ऐसी फूल तोड़ने वाली महिलाओं के मुह को छाया प्रदान करने के कारण कुछ समय के लिए परिचित होकर (आगे) जाना । -
समासः बने या नद्यः तासां तीरेषु जातानि वननदीतीरजातानि (बहूवी०)। नवजलाना कणास्तैः (प०तत्०) नवजलकणैः। गण्डयोः स्वेदः गण्ड स्वेदः (स०] तत्०) गण्डस्वेदस्य अपनयनम गण्डस्वेदापनयनम् (प० तत्०), तेन जा (तत्) तथा क्लान्तानि (तृ० तद्०) गण्डस्वेदापनयन रुजाक्लान्तानि

= = कर्णयोः उत्पलानि कर्णोत्पलानि ( ० तद्०) गण्डस्वेदापनपनरुजालान्तानि कर्णोत्पलानि येषां तानि तेषाम् (बहुव्रीहि०) पुष्पाणि कुलन्तीति पुष्पलाभ्यः वासां मुखानि पुष्पलावीमुखानि ष० त०) तेषाम् छायायाः दानं तस्मात् ( प वत्०) क्षणं परिचितः क्षणपरिचितः ( द्वि० ० )
कोश:पुमानाक्रीड उद्यानं राजः साधारणं वनम् इत्यमरः । मागधी गणिका चिकाम्बठ्ठा इत्यमरः  काकुला तुल्यानि इति हलायुधः । राजा रोगे च भंगे, इति मेदिनी छाया सूर्यप्रिया- कान्तिः प्रतिविम्बमनातपः इत्यमरः अव्यापारस्थितो कालविशेषोत्सवयोः । क्षणः इत्यमरः ।
टिप्पणी- विश्रान्तः वि उपसर्गपूर्वक श्रम्" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "विधान्त" ऐसा रूप निष्पन्न किया जाता है। सिश्वन्- "सिच्" धातु जिसका अर्थ है अट्टीकरण से लट् लकार लाकर उसके स्थान पर लट मातृ" इत्यादि सूत्र से "शतृ प्रत्यय करके नुमादि लाकर सिचन् ऐसा रूप बनता है। पुष्पलावी-पुष्प उपपदपूर्वक छेदनायक "लू" धातु से कर्म में "कर्मण्यण" इस सूत्र से अणु प्रत्यय करके वृद्धि करके स्त्रीत्व विवक्षा में "टिड्ढाणम्" इत्यादि सूत्र से "छीप्" करके पुष्पलावी वाब्द बना है। यहाँ कुगतिप्रादयः" से पुष्प और लावो का समास हुआ है ।। २६ ।।

वक्र: पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां शोधोत्सङ्ग-प्रणय- विमुखो मास्म भृदुज्जयिन्याः ।
विद्युद्दाम - स्फुरित चकितस्तत्र पौराङ्गनानां लोलापाङ्गैर्यदि न रमते लोचनवञ्चितोऽसि ॥। २७ ॥ -

अन्वयः - उत्तराणाम् प्रस्थितस्य भवतः पन्था यदपि वक्रः उज्जयिन्याः सोघोरसङ्ग-प्रणव- विमुखः मास्मभूः । तत्र विद्युद्दामस्फुरितच किती लोला- पाङ्गः पौराङ्गनानाम् लोचनेः यदि न रमसे बन्चित असि

व्याख्या— उत्तरागाम् उदीचीं दिशं प्रति प्रस्थितस्यगच्छतः भवतः मेघस्य, पन्यामार्ग, पदपि यद्यपि वज्रः अनृजुः तथापि ) उज्जयिन्या विशालायाः, सोधोत्सङ्ग-प्रणयविमुखः हम्य भागपरिचयपराङ्मुखः, मास्मभूः मा भव । तप उज्जयिन्याम् विद्युद्दामस्फुरित चकितैः तडिल्ल वादीत लोलापाङ्गचचलका पौराङ्गनानाम् नागरिक- वनितानाम्, लोचनैःनेः यदि वेद ( स्वम् ) न रमसे न क्रीडसि (तहि ) वन्चितोऽसि प्रतारितोऽसि ।
शब्दार्थ: उत्तराधाम् उत्तर दिशा की ओर, प्रस्थितस्य प्रस्थान किये हुए भक्त आपका, पन्यामार्ग, बदनि यद्यपि वक्रः टेढ़ा है तथापि उज्जयिउज्जयिनी के सौद्योत्सङ्ग प्रणयविमुखः ॐ महलों के ऊपरी भाग के परिचय से पराङ्मुख, मास्म भूमत होइयेगा तम उज्जयिनी के उन महलों पर विद्युद्दामस्फुरित चकितः विद्युल्लता की चमक से भौचक्की, खोपायैः कटाक्षों वाली, पौराङ्गनानाम् नागरिक रमणियों के, लोचनों से, यदि न रमसे यदि बिहार (रमण) नहीं किया तो अपने को, बन्चितोऽसि प्रताड़ित समझो ( जीवन लाभ से उगा गया समझो ) । =
भावार्थ: है मेघ अलका गन्तु प्रवृत्तस्य ते उज्जयिनी गमने मार्गः यद्यपि वक्रस्तथापि उपन्या प्रासादपरिचयाद्विमुख मा भववत्र विद्युल्लतायाः कान्तियकिः चन्चलकयुक्ते नागरीणां युवतीनां नयनैः यदि न रमणं करोति तहि जीवनकलादात्मानं प्रताडित एवं जानीहि ।
हिन्दी हे मेघ अलका जाने के लिए प्रवृत्त तुम्हारा मार्ग यद्यपि टेढ़ा होगा, फिर भी उज्जयिनी के ऊंचे महलों की छतों के परिचय करने से विमुख मत होगी बिजली की रेखा की चमक से भौचक्की, चन्चल कटाक्षों वाली, नगरवासी स्त्रियों की आँखों से यदि तुमने बिहार नहीं किया तो जीवन- लाभ से ) अपने को बन्चित हो समझो ।
समासः - उत्तरा चेयमाशा उत्तराशा ( कर्म० धा० ) ताम् सौधाना- : सोधोत्सङ्ग (प० तत्० ) तेषु प्रणयः (स० त०) तस्मिन् विमुखः

(स० तद्०) सोधोत्सङ्गप्रणयविमुखः लोला अपाङ्गा येषु तानि लोला- पाङ्गानि ( बहुवी०) तैः विद्युतः दामानीव विद्युद्दामानि ( उपमित तद्० ) विद्यानां स्फुरितानि वै विद्युद्दामस्फुरितैः (प० त०) चकित पौराख ताः अङ्गनाः ( कर्म० धा० ) तासाम् अथवा पौराणाम् अङ्गनाः ( च० तत्०) तासाम् ।
कोश: उत्तरा दिगुदीची स्वाद इत्यमरः अपने वस्मापयान पदवी सृतिः इत्यमरः आविद्धं कुटिल भुग्नं वेल्लितं वक्रमित्यपि इत्यमरः । विशालज्जयिनी समाः इत्यमरः उत्पः प्रणयः स्वात्परिचये पाच सौहृदे पिच, यादवः तडित्सौदामिनी विद्युला चपला अपि इत्यमरः । अप ग स्वंग होनेवाले त्रान्ते तिलकेऽपि च इति मेदिनी लोचनं नयनं नेत्रमित्यमरः । 1
टिप्पणी-उत्तराशाम्पूर्वक स्था" (प्रस्थितस्य के ) धातु के अकर्मक होने के कारण उसके योग में उत्तराशा की सकर्मक धातु- भिर्योगे देश कालो भावो गन्तव्यssar कर्मसंज्ञक इति वाच्यम्" से कर्म संज्ञा हो जाती है और "कर्मणि द्वितीया" इस सूत्र से द्वितीया विभक्ति हुई है। वक्रः परथा० - निविख्या नदीं विन्ध्याचल पर्वत से उत्तर की ओर बहती है और "उज्जयिनी "निन्डिया" नदी से पूरव की ओर है जिसे आजकल उज्जैन कहते हैं एवं उत्तरापथ जिधर अलका है निविन्ध्या से पश्चिम में है अतः अलका जाने वाले के लिए उज्जयिनी जाने का मार्ग टेढ़ा पड़ेगा। उज्जयिनी पहले कभी "मानव" देश की राजधानी थी। यहाँ शिप्रा नदी बहती है एवं महाकालेश्वर का मन्दिर है। आज भी यहाँ दूर-दूर से लोग दर्शन करने जाते हैं। इसे ही विशाला नगरी भी कहते हैं प्रातःस्मरणीय सात पुष्प पुरियों में उज्जयिनी भी अन्यतम है
"अयोध्या मथुरा माया काशी काही हावन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तता मोक्षदायिकाः ॥

मास्मः यहाँ आशीर्वाद अर्थ से "भू" धातु से मा और हम के योग में "स्मोतरे " इस सूत्र में चकार पाठ होने से लड़ लकार जाता है एवं

= = व्याख्यापथि मार्गे वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रेणिका श्रीगुणायाः तर चलनशब्दातिपक्षिपतिकटिबन्धदोरकः यस्याः तस्याः, स्वलितेन मदस्खलितेन सुभगम् रमणीयम् यथास्यात्तथा संसर्पन्त्याः प्रवाहितायाः, वा निविख्यायाः एतनामिकाया नया अथवा कस्याश्चिन्नाविकायाः, सन्निपत्यसंपत्य रसाभ्यन्तरः जलमध्यगतः अन्तःस्थितश्रृंगारो बा, भव, हि यतः, स्त्रीणाम् कामिनीनाम् प्रियेषु कान्तेषु विषये) विभ्रमः विलास एवं बाधम् प्रथमम् प्रणयवचनम् प्रेमवाक्यम् भवति । कामित्यः रतिप्रसंगे स्वकीयामिच्छां हाव-भाव प्रदर्शनेनेव प्रकटयन्ति न तु शब्दतः कथयन्ति [लाधिक्यात्। अत्र विकास प्रदर्शनम् आवर्तरूपं नाभि- प्रदर्शनमेव । =
"दात" इस सूत्र से प्राप्त बडागम का " माझ्योगे" इस सूत्र से निषेष हो गया है ।। २७ ।
बीचिक्षोभस्तनितविहगश्रेणिकाचीगुणायाः संसर्पन्त्याः स्खलितसुभगं दशितावर्तनाभेः ।
निर्विन्ध्यायाः पथि भव रसाभ्यन्तरः सनिपत्य स्त्रीणामाद्यं प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु ॥ २८ ॥
अन्वयः पथि वीचिसोभस्तनितविहग श्रेणिकाखीमुनाया: स्खलित- सुभगं
संसर्पन्त्याः वशितावर्तनाभे निविन्ध्यायाः सन्निपत्य रसाभ्यन्तरः भव |
हि स्त्रीणाम् प्रियेषु विभ्रमः आयम् प्रणयवचनम् ।

शब्दार्थः पथि मार्ग में, वीचिक्षोभस्तनितविङ्गश्रेणिकान्ची गुणाया: लहरों के चलने से शब्द करते हुए पक्षियों ( हंसादि) की पङ्क्ति ही जिसकी करनी है, स्खलित सुभगं संसर्पन्त्याः पत्थरों से टकराते हुए ( जवानी के मद से फिसलती हुई जो ) बड़ी अच्छी चाल से बह रही है या चल रही दर्शितावर्तनाभेः जिसने भँवररूपी अपनी नाभि को दिखा दिया है ( ऐसी ) निविन्ध्याया:निविख्या नदी के सन्निपत्य संपर्क में आकर - =

रसाभ्यन्तरः भीतर जल धारण करने वाला या शृङ्गार रस का आनन्द लेने
वाला, भव हो जाओ, हि क्योंकि, स्त्रीणाम् कामिनियों की, प्रियेषु
प्रिय के प्रति विभ्रमः हाव-भाव विलास प्रदर्शन ही आपली प्रणय-
वचनम् प्रेमप्रार्थना होती है। भावार्थ:- (हे मेष ! ) यस्यास्तरङ्ग सन्चलनेन शब्दायमानाः हंसादि- पक्षिणी रसनादोरका इव भवन्ति । उपस्थलने रमणीयं यथास्यात्तथा प्रवहत्या जलम नाभि दर्शयन्त्या वनिताया इव निविन्द्रयाया अन्तः प्रविश्य तद्रसास्वादं विधेहि यतो हि वनितानां प्रियेषु विलास प्रदर्शनमेव रतिप्रसंगे प्राथमिक प्रेमप्रार्थनावाक्यं भवति ।
हिन्दी - (हे मेघ) मार्ग में लहरों के चलने से शद करते हुए पक्षि- गण ही जिनको करनी के समान है, पत्थरों पर गिरती हुई मानी मद से गिरती हुई मनोहरता के साथ बहने वाली तथा जल-वररूपी नाभि को दिखाने वाली निदिन्या नदी के पास पहुँच कर उसका रसास्वादन करो। क्योंकि स्त्रियों का अपने प्रिय के प्रति पहली प्रेम-प्रार्थना विलास प्रदर्शन हो होता है।
समासः वीचीनां क्षोभवीचिक्षोभस्तेन ( च० तद्०) स्वनिता ते  यस्या:, तस्था: ( बहु० ) स्खलितेन सुभगं यथा स्वातया क्रियाविशेषणं ( ० ० ) आवर्त एवं नाभिः = आवर्तनाभिः द०) । "मयूरव्यंसकादयश्च (रूपकसमास० ) रसः अभ्यन्तरे यस्य स रसाभ्यन्तरः ( बहुबीहि०) । -
कोश: स्त्रियां वीरोमि इत्यमरः । सगे विहङ्गः विगः विहङ्गम विहायसः इत्यमरः स्त्रीकट्या मेखलाका श्रीमती रशना तथा इत्यमरः स्यादा- बम्स अमः इत्यमरः शृङ्गारादी छले वीर्ये सुवर्णे विषशुक्रयोः । वित्तादावते चैव निवसे पारदे ध्वनी, आस्वादे च रसं प्राहुः इति शब्दाव आवर्तचिन्तने वारिभ्रमे चावर्तने पुमान् इति मेदिनी ।
टिप्पणी- दर्शितः" दृ" धातु से प्रत्यय लाकर उक्तरूप निष्पन्न किया जाता है। निविन्ध्याः विन्यात् निष्क्रान्तानिविन्ध्या यहाँ उक्त -

विग्रह करके "निरादव" क्रान्तादचे पचम्या" से समास किया गया है। यहाँ समास कर चुकने के बाद "परवल्लिङ्गं तत्पुरुयोः " इस सूत्र से उक्त समास के तत्पुरुष होने के कारण "पर" पद "विन्ध्य" की तरह पुल्लिङ्गता होनी चाहिए थी, परन्तु उसका निषेध "हिगुप्राप्ताऽपा पूर्वगति समासेषु प्रति- पेधो वाच्या" इस वार्तिक से हो जाता है।
अलंकार:- यहाँ विगश्रेणी को उपमेय है उसमें उपमानकाचीगुण का एवं आवर्त में नाभि का आरोप होने से शाब्द हुआ एवं निविन्ध्या में नायिका का आरोप आर्य होने से यहाँ "एक देश विति सांगरूपक" है। इस शब्द में "श्लेष" अलङ्कार है एवं चतुर्थ चरण के द्वारा पूर्वकथित तीनों चरणों के वाक्यों का समर्थन होने से "अर्थान्तरन्यास" नामक अलंकार है। इस प्रकार यहाँ तीनों अलङ्कारों का अंगाङ्गिभाव से रहने के कारण "संकर" नामक अलंकार हो गया ।। २८ ।।
वेणी - भूतप्रतनु सलिलाऽसावतीतस्य सिन्धुः पाण्डुच्छाया तटरुहतरु-भ्रंशभिजणंपणैः ।
सौभाग्यं ते सुभग विरहावस्थया व्यञ्जयन्ती काश्यं येन त्यजति विधिना स स्वयंवोपपाद्यः ।। २९ ।।

अन्वयः - बेणीभूत प्रतनु-पला तट तर प्रसिभिः जीर्णपर्णः पाण्डुच्छामा असौ सिन्धु विरहावस्थया अतीतस्य ते सौभाग्यं जयन्ती येत विधिना काव्यं त्यजति सुभग ! सः स्वया एवं उपपाद्य
व्याख्या-येणी भूतप्रतनुसलिला केशपाशीभूतस्वरूपजला तर शिभिः तीरोत्पन्न-वृक्ष शिभिः शुष्कपत्रे, पाण्डुच्छाया पीतवर्णा, असौ एया, सिन्धुः एतन्नामिका नदी निविल्या या विरहावस्था= वियोगावस्था अतीतस्य प्रोषितस्य ते मेघस्य सौभाग्यम् सुभगत्वम् जयन्ती प्रकाशयन्ती, येन तादृशेन विधिना प्रकारेण काश्यम्- कुशलताम् त्यजति जहाति हे सुभग हे मेघ ! सः तादृशः व्यापारः स्वयंवमेधेनवः, उपपाद्यः[सम्पादनीयः ।

= शब्दार्थ:- वेणीभूत-प्रतनु सलिला पतली चोटी ( वेणी ) के समान जिसका जल स्वल्प है, तदरुहरु शिभिः तीरों पर उत्पन्न वृक्षों से गिरे हुए, जीर्णः पुराने पत्तों से, पाण्डुच्छाया पीले रंग की असी सिन्धुः सिन्धुनाम की नदी ( या निविन्डया), विरहावस्वया वियोगावस्था के द्वारा अतीतस्य = प्रोषित तेरे, सौभाग्यम् सौभाग्य को व्यजयन्ती प्रकाशित करती हुई, येन जिस विधिना=प्रकार से कार्यम् = दुर्बलता को त्यजति छोड़े, हे सुभग 1 == मेघ ! सः वह उपाय त्वया एव तुम्हें ही, उपपाद्यःकरना चाहिए। =
- हिन्दी हे मेघ स्त्रियों की चोटी की तरह कम जलवाली तेरे वियोग के द्वारा तीर पर उत्पन्न वृक्षों से गिरे पुराने पत्तों के कारण पीली कान्तिवाली सिन्धुनदी तुम्हारे सौभाग्य को सूचित कर रही है। अतः जिस उपाय से उसकी दुर्बलता दूर हो, ऐसा उपाय तुम्हें करना चाहिए।
भावार्थ: हे मेघ कामिन्याः स्वल्पा वेणीव स्वल्पवती सिन्धुः नाम्नी नदी, स्वद्वियोगेन स्वतटोत्पन्नवृशात् पतितः पुराणपत्रैः पीता या तब सौभाग्यशालित्वं मूचयति । अतः येनोपायेन सा कृतां यजेत् तादृशः उपायः त्वया कर्तव्यः ।
समासः - वेणी भूतप्रतनु-सलिलान वेणी अवेणी (नत्र तत्०), जवेणी वेणी] सम्पद्यते यथा तथाभूतं वेणीभूतम् अभूततद्भावे वि) वेणीभूतं प्रतनु सलिलं यस्याः सा वेणीभूतप्रसलिला (बहुबीहि०) तटयो रुहा तट कहा (स० द०) तटमहाधते तरवः तरुतरवः (कर्मधारयः ) तेभ्यो अंशिभिः तटहृतभ्रंशिभिः (पश्चमी तत्०) जीर्णानि च तानि पर्णानि जीर्णपर्णाति ( कर्म० प्रा० ) ते जीर्णपणे विरहस्य अवस्था विरहावस्था ( च० तत्०) तथा शोभनं भर्ग ( भाग्यम् ) यस्य स तत्सम्बुद्धी सुभग ! ( बहुवी०)।
कोश: वेणी प्रवेणी, इत्यमरः स्त्री नद्यां ना नदे सिन्धुदेशभेदेऽम्बुधौ गजे इति जयन्ती। विधिन नियमे काले विधाने परमेष्ठिनी, इति मेदिनी । तनुः काये स्वपि स्त्री स्यात् त्रिबल विरले कुथे, इति मेदिनी ।

टिप्पणी-वेणीभूत प्रतनुसलिला - अवेणी देणी यथा सम्पद्यते तथाभूतं वेणीभूतम् यहाँ अभूत तदभाव अर्थ में "वेणी" शब्द से "कृम्बस्तियोगे सम्पकर्तरि " प्रत्यय होकर एवं "भू" धातु से "क्त" प्रत्यय लाकर वेणीभूत" ऐसा रूप सम्पन्न होता है ( श्रेणी + विभू+क्त) रहा रोहन्तीति यहा, "यह" धातु से " इगुपधज्ञाप्रीकिर क इस सूत्र से क प्रत्यय होकर बहुवचन की विवक्षा में "रुहाः " ऐसा रूप बना है। सिन्धुः- कुछ टीकाकार "सिन्धु" को स्वतन्त्र मालवदेश में बहनेवाली "काला सिन्धु" नदी ही मानते हैं परन्तु महोपाध्याय मल्लिनाथजी "सिन्धु'" का अर्थ सामान्यतया निविन्ध्या ही करते हैं जो भी हो, हमने अपनी व्याख्या में "वा" करके दोनों का उल्लेख कर दिया है। 1
अलङ्कारः- इस श्लोक में साम्प के द्वारा सिन्धु से नायिका का एवं मेष से नायक का व्यवहार किया गया है, अतः यहाँ "समासोक्ति" नामक अलङ्कार है ।। २९ ।।
प्राप्यावन्ती— कोविदप्रामवृद्धान् पूर्वोद्दिष्टामनुसर पुरीं श्रीविशालां विशालाम् ।
स्वल्पीभूते सुचरितफले स्वगिंणां गां गतानां शेषः पुण्यै तमिव दिवः क्रान्तिमत् खण्डमेकम् ॥ ३०॥

अन्वयः - उदयनकथाकोविदग्रामवृद्धान् जयन्तीन् प्राप्ा सुचरित फले स्वल्पीभूते गां गतानां स्वगिणां शेषः पुण्यैः हृतं कान्तिमत् एकं दिवः खण्डम् इव पूर्वोद्दिष्टाम् श्रीविशालाम् विशालाम् पुरीम् अनुसर
व्याख्या - उदयनकथाकोविदद्यामवृद्धान् = यत्स राजकथाविशजनपदवृद्धान् अवन्तीन् मालवदेशान् प्राप्यगत्वा, सुचरितफले पुण्यफले, स्वल्पोभूते- क्षीणे सति क्षीणे पुष्पे मत्र्यलोकं विशन्ति" इति भगवद्वाक्यानुसारम् गाम्- पृथ्वीम् गतानाम्प्राप्तानाम्, स्वर्गिणाम् देवलोकनिवासिनाम् शेषः

शालिनीम् ), विशालाम् उज्जयिनीम्, पुरीम् नगरीम्, अनुसर गछ । शब्दार्थः -- उदयन० जहाँ के गाँवों के लोग उदयन राजा की कथाओं के पण्डित हैं. (ऐसे ) अवन्तीन् अवन्ती देश में प्राप्य जाकर, सुचरित फले पुण्यफल के स्वल्पीभूते क्षीण हो जाने पर, गाम् पृथ्वी पर गतानाम आए हुए स्वगिणाम् देवलोक में रहनेवालों के शेषः पुण्यै:- अवशिष्ट पुण्यों के द्वारा, हुतम् लाया गया, कान्तिमत्उज्ज्वल, एकम् एक दिवः स्वर्ग के कलमिव टुकड़े की तरह पूर्वोद्दिष्टाम्पहले कही गयी, श्रीविशालाम् सम्पत्ति से परिपूर्ण, विद्यालाम् उज्जयिनी, पुरीम् नगरी को, अनुसर जाना।
अवशिष्टः पुण्यैः धर्मः सुकृतैरिति भावः हृतम् अवतारितम् कान्ति-
मत् उज्ज्वलम् एकम् अन्यतमम् दिवः स्वर्गलोकस्य, खण्डमिव
शकलमिव पूर्वोद्दिष्टाम् पूर्वकथिताम् श्रीविशालाम् सम्पत्तिपूर्णाम ( शोभा-
भावार्थ : हे मेघ ! यत्रत्याः ग्रामवृद्धाः वत्सराजोपाधानज्ञातारः सन्ति तामवन्ति नगरी प्राप्य पुण्यफले क्षीणे सति पृथिव्यामागतानां स्वर्गनिवासिना- मवशिष्टः पुण्यफलं राहतं स्वर्गस्येकं दिव्यं शकलमिवं सम्पत्तिपूर्णा पूर्वकथिता -मुज्जविनी गच्छ
हिन्दी मे जहाँ के गाँवों के वृद्ध लोग राजा उदयन की कथा को 1 जानने वाले हैं ऐसे भवन्तिनगरी में जाकर पुण्यफल के कम हो जाने पर पृथ्वी पर आये हुए स्वर्गवासियों के बचे हुए पुष्यफलों के द्वारा लाये गये स्वर्ग के एक उज्ज्वल टुकड़े की तरह सम्पत्ति से परिपूर्ण पूर्वीक उज्जयिनीनगरी को जाना।
समासः उदयनस्यकथा उदयनकथा (प० तत्०) उदयनकषायी कोविदाः उदयनकथा- कोविदाः (स० उ० ) प्रामे वृद्धाः ग्रामवृद्धाः (स०] त०), उदयन-कथा- कोविद ग्रामवृद्धाः येषु तान् उदयमकथाकोविद- ग्रामवृद्धान् (बहु० ) श्रिया विशालाम् श्रीविशालाम् (तृ० त०) पूर्वम् उद्दिष्टाम् = पूर्वोद्दिष्टाम् (सुप्सुपेति समासः) विविधाः शाला: यस्यां सा विद्याला (बहुवी०) ताम्

कोश: विद्वान् विपश्चित् दोषज्ञः सन् सुधीः कोविदो बुधः इत्यमरः ॥ स्यादुद्धर्मनस्त्रियां पुण्यं श्रेयसी सुकृतं नृपः इत्यमरः धो दियो द्वे स्त्रियाम व्योमपुरकरमम्बरम् इत्यमरः । शोभा सम्पति पानी धीरिव दुपवते, इति शाश्वतः विशालाविन्द्रवारुण्यामुज्जयिन्यां तु योषिति इति मेदिनी ।
टिप्पणी- उदयनकथा - विदन्तीति विदाः- ज्ञानार्थ विदधातु से इगुपधज्ञाप्रीकर क" इस सूत्र से क प्रत्यय लाकर "विदा" यह रूप बना है। ओकस ( वेद्यस्थान के ) विदाकोविदाः यहाँ महोपाध्याय मल्लिनाथजी ने "लोकस" शब्द के लोकार का "पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्" इस नियमा नुसार लोप करके "कोविद" शब्द की साधुता निष्पन्न करते हैं। अर्थात् "कोविद" शब्द का अर्थ हुआ "बेद्य" स्थान के जानकार । वत्सराज उदयन की कृपा पैशाची भाषा में लिखित सम्प्रति अनुपलब्ध बृहत्कथा में बृहत्कथा- मञ्जरी, कथासरित्सागर, भास लिखित "स्वप्नवासवदत्तम्", रत्नावली, आदि ग्रन्थों में पायी जाती है। सुचरितफले शोभनं चरितं सुचरितम् " कुगति- प्रादयः" से समास हुआ है। स्वल्पीभूतम् अस्वल्प स्वरूपं सम्पद्यते यथा तथा भूलम् इस विग्रह में "स्वरूप" शब्द से अभूततद्भाव अर्थ में "" प्रत्यय एवं "भू" धातु से, "त' प्रत्यय लाकर स्वल्पीभूत शब्द की निष्पति होती है।

स्वगिणाम् स्वर्गमस्त्यस्य इति स्वर्गी स्वर्ग से "अतः इनठनौ" से इन् प्रत्यय लाकर "स्वर्गी" यह रूप बनता है। तेषां स्वगिणाम् ।
अलंकार:- यहाँ "विशालाम्" में " दिवः खण्डमिय" इस वाक्य द्वारा स्वर्ग के एक खण्ड की सम्भावना की गयी है अतः उत्प्रेक्षा अलंकार हुआ एवं "श्रीविशाल विशालाम्" यहाँ "यमक अलंकार हुआ इसलिए दोनों का "संसृष्टि" अलंकार है ॥ ३० ॥
दीर्घाकुवंद पटु मवकलं कूजितं सारसानां प्रत्यूषेषु स्फुटितक मलामोद मैत्रीकषायः ।
यत्र स्त्रीणां हरति सुरत ग्लानिमङ्गानुकूलः शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थना चाटुकारः ॥ ३१ ॥

अन्वयः -पत्र प्रत्यूषेषु पटु मदकलम् सारसानाम् कुजितम् दीर्घीकुर्वन् स्फुटितकमलामो दमैत्रीकषायः अङ्गानुकूलः शिप्रावातः प्रार्थनाचाटुकार: प्रियतमः इव स्त्रीणाम् सुरतग्लानिम् हरति ।
= = = व्याख्या पत्र विशालायाम् प्रत्यूषेषु प्रातः समयेषु, पटु स्फुटम् मदकलम् = मदेनाव्यक्तमधुरम् सारसानाम्पक्षिविशेषाणाम्, कूजितम् = याब्दम् दीर्घीकुर्वन् वर्द्धयन् स्फुटितकम लामोदमै श्रीकषायः विकसित- पद्मगन्धिसुरभिः अङ्गानुकूलः अवयवानुरूपः शरीरसुखद इति भावः, शिप्राबाद: शिप्रानदीपवनः प्रार्थनाचाटुकारः रतिरचनाय मधुरभाषी, प्रियतमः वल्लभः इव यथा स्त्रीणाम् कामिनीनाम्, सुरतग्लानिम् = सम्भोगपरिश्रमम्, हरति = दूरीकरोति ।
= = शब्दार्थः यत्र जहाँ अर्थात् (विशाला में ) प्रत्ययेषु प्रातःकाल, पटु-प्रस्फुट, मदकलम् मद से मधुर, सारसानाम् सारस पक्षियों के, कूजितम् शब्द को, दीर्घीकुर्वन् विस्तृत करता हुआ, स्फुटितकमलामोद मंत्री- कषाय: विकसित कमलों के सुगन्ध के संसर्ग से सुगन्धित, अङ्गानुकूल शरीर को सुख देने वाला, शिप्रावातः शिप्रा नदी का वायु प्रार्थनाचाटुकारः रतिक्रिया में (पुनः प्रवृत्ययं ) मधुर-मधुर बोलने वाले प्रियतम इव प्रेमी के समान, सुरतग्लानिम् संभोग के परिश्रम को, हरति दूर करता है। =
भावार्थ: है मंत्र | यस्यां विद्यालायां प्रातःकाले सारस-पक्षिविशेषाणां प्रस्फुटं मदेनाम्यक्तमधुरं कलरवं वर्द्धयन् विकसितकमल सुगन्धिसंस्पर्शसुगन्धितः सुखद: शिप्रानदीपवनः रतिक्रीडायां पुनः प्रवृत्यर्थं मधुर भाषणशीलः वल्लभ इव कामिनीनां सम्भवजन्यपरिश्रमं दूरीकरोति ।
हिन्दी मे जिस विशाला नगरी में प्रातःकाल सारस पक्षियों के तीक्ष्ण एवं मद से मधुर कलरव को विस्तृत करता हुआ पूर्ण विकसित कमल की सुगन्ध के सम्पर्क से सुगन्धित शरीर के अंगों को सुख देने वाला शिप्रानदी का वायु रतिक्रीड़ा में (पुनः प्रवृत्ति के लिए) मीठी-मीठी बातें करने वाले प्रेमी के समान कामिनियों के सम्भोग के परिश्रम को दूर करता है।

= समासः स्फुटितानि च तानि कमलानि स्फुटितकमलानि (कर्म- धा० ) तेषाम् आमोद ( ० तत्) तेन मंत्री ( ० त०) तथा कपायः स्फुटितक मलामोद भी पाय: ( ० तत्) । अवी दीर्घं करोतीति दीर्घा करोति ( अभूततद०) । सुरतस्य ग्लानि सुरतग्लानि ( ० ० ) । प्रार्थनायां चाटुकार प्रार्थनाचाटुकार (स० स०) अङ्गानाम् अनुकूलः अनुकूल (प० त० ) ।
कोश: प्रत्यूषोऽहर्मुखं कल्यम् इत्यमरः ध्वनी मधुरास्फुटे कल तु इत्यमरः सरसो मैबुनी कामी गोनर्दः पुष्कराह्वयः इति यादवः । चक्रायः सारसो हंसः शब्दार्थवः मदोरेतसिकस्य गर्ने हर्षे भेदानयो:, इति मेदिनी । पटुर्दशेचनीरोगे चतुरेऽप्यभिध्येयवाद् इति मेदिनी । रागद्रव्ये कपायोश्री नियति सौरमे रसे इति यादवः विमत्थे परिमको गन्धे जनमनोहरे । आमोद इत्यमरः ।
टिप्पणी- सरसि चरन्तिसारसा या सरसि भवाः सारसा:- दोनों अर्थों में "सरस" शब्द से अणु प्रत्यय लाकर "सारस" शब्द निष्पन्न किया जाता है। मंत्री- मित्रस्य भावः मित्र शब्द से भाव या कर्म में ध्यम्' प्रत्यय करके उसके आदि वृद्धि करके वित्त्वात् "विदगौरादिभ्यश्च" से डी करके "मैत्री" शब्द की निष्पत्ति होती है “अङ्गानुकूल" को यदि वायु का विशेषण मानते हैं तब तो शरीर को सुख देने वाला यह अर्थ होगा, यदि "" का विशेषण मानें तर गाढालिङ्गन के द्वारा "नायिका के अङ्ग को सुख देने वाले" ऐसा अर्थ होगा अच्छा तो यह होता कि "देहलीदीपक- ज्यायेन" दोनों का विशेषण माना जाता। शिप्रा नदी उज्जयिनी के समीप बहती है जो कि बहुत ही प्रसिद्ध नदी है। कुछ लोग यहाँ "प्रार्थना बाटुकारः" को लेकर "सता" नायिका के अनुनय की कल्पना करते हैं परन्तु मल्लिनाथजी ने उसका खण्डन इसलिए किया है कि यहाँ सहित नायिका के साथ पहले संभोग नहीं किया गया और इसलिए अनुनय कर रहा है तो पुनः उसके "सुरतहानि" का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है। अतः यहाँ खण्डिता नायिका नहीं है बल्कि स्वकीया है जिसके साथ एक बार संभोग कर चुकने


के बाद पुनः प्रवृत्ति के लिए पकी-माँदी नायिका के परिश्रम को चिकनी-चुपड़ी बातों से नायक दूर करता है।
अलंकार यहाँ पूर्णोपमा नामक अलंकार है ।। ३१ ।।
'हारांस्तारांस्तरलगुटिकान्कोटिशः शंखशुक्ती: शप - श्यामान्म र क तमणी नुन्मयूख- प्ररोहान् ।
दृष्ट्वा यस्यां विपणिरचितान्त्रिद्रुमाणाञ्च भङ्गान् संलक्ष्यन्ते सलिलनिधयस्तोयमात्रावशेषाः ॥३२॥

- - व्यापा-यस्याम् विशालायाम्, कोटिशः असंख्यान् विपणिरचितान्= पण्येषु विक्रयार्थं प्रसारितान्: "अयं शब्दः विशेषणत्वेन सर्वत्र यथालिङ्गमन्वीयते देहलीदीपन्यायेन" न्यायं टिप्पण्या स्पष्टविष्यते ।" तारान् विमलान् तरलटि- कान्हारमध्य महारत्नान्; हारान् मुक्तासन, पंखशुक्तीः कम्बु मुक्तास्फोटान पक्ष्यामान्नव तृणमिव हरितान्, उन्मयूख प्ररोहान् उद्मतांकुरा, मरकत- मणीन् मरकतास्य मणिविशेषान् गारुडरत्नानीति यावद, विद्रुमाणाम् प्रबालानाम् भङ्गान् सकलान् चतथा दृष्ट्वा अवलोक्य सलिलनि- धयः रत्नकराः समुद्रा इत्यर्थः तोयमात्रावशेषा:- केवल जलावशिष्टाः, - क्ष्यन्ते अनुमीयन्ते । पच्येषु प्रसारितान् तादृशान् रत्नसमूहान् दृष्ट्वा जनाः समुद्रः रत्नहीनः जलमात्रावसिष्ट इत्यनुमीयन्ते ।
अन्वयः यस्यां कोटिशो विपणि रचितान् वारान् तरल-गुटिकान् हारान् सक्ती: पश्यामान् उम्मयूसप्ररोहान् मरकतमणीन् विद्रुमाणां मङ्गान च दृष्ट्वा सलिल-निधयः तोयमात्रावशेषाः संलक्ष्यन्ते ।
शब्दार्थ:-पस्याम्-जिस उज्जयिनी नगरी में, कोटिशः असंख्य, विपणि- रचितान्- ( बेचने के लिए) बाजारों में फैलाये गये, तारान् विशुद्ध, तरलगुटि- कान् जिनमें मध्यमणीभूत महारत्न थे, ( ऐसे ) हारान् मोतियों की मालाओं को, चक्कीको एवं सीपियों को, सम्पश्यामाननयी पास की तरह गाढ़े हरे रंग की उम्मयूख-रोहान्कुरों की तरह जिनकी किरणें ऊपर की -

= - ओर फैल रही हैं, ऐसे मरकतमणीन् "मरकत" नामक मणियों को, बिंदु- मानां मूंगों के भङ्गान् टुकड़ों को, दृष्ट्यादेखकर मलिलनिधयः समुद्र, तोयमात्रावशेषाः केवल जालान्ते दिखाई देते हैं।
- भावार्थ: है ! यस्यामुज्जयिन्या पष्येषु विक्रयार्थं प्रसारितान् बहून बहुमूल्यमुक्तास्रजः शङ्खान् शुक्ती: हरितवर्णान् मनोरमाऽकुरान् मरकतमणीन् प्रवालको विलोक्य जनाः रत्नाकराः समुद्राः जलमात्रावशिष्टाः सञ्जाता इत्यनुमीयन्ते ।
हिन्दी - हे मेघ जिस उज्जयिनी नगरी में बाजारों में बेचने के लिए फैलाये गये असंख्य बहुमूल्यमोतियों की मालाओं को, जिनमें कि मध्यमणीभूत महारत्न लगे हैं, शों को सीपियों को, घास की तरह गाढ़े हरे रंग की जिनकी किरणें ऊपर की ओर फैल रही हैं, ऐसे मरकत मणियों को और मूंगों के टुकड़ों को देखकर लोग, समुद्र को केवल जलवाला ही ( रत्न-विहीन) समझने ।
समासः विपणिषु रचिता विपणिरचिताः (स० तत्० ) ठान् । तरला: गुटिका: येषु ते (बहु०) तान् शुकान् (द्वन्द्र०) उद्गता मयूखाः येषां ते उन्मयूखाः (बहु०) तान् उन्मयूखाः तादृशाः प्ररोहाः येषां ते उन्मयूख- प्ररोहा (बहु० ) तान् । तोयमेव तोयमात्रम् (रूपकसमासः ) तोयमात्रमवशेषो येषान्तोपमात्रावशेषा (बहु०) शष्याणीय श्यामान् ( उपमितकर्म० ) । 1
कोश: वरलो हारमध्यगः इत्यमरः । पिण्डे मणी सहारने गुटिकाबद्ध पारवे, इति शब्दार्णवः । मुक्तास्फोट: स्त्रियां शुक्तिः शंसः स्यात् कम्बुरस्त्रियाम्, इत्यमरः शपोः बालतृणं धासः इत्यमरः । किरणोत्रमलांग मस्तिघृणि- रश्मयः इत्यमरः ।
- टिप्पणी-संलक्ष्यते - यह रूप "सम् उपसर्वपूर्वक णिजन्त "लक्ष" धातु के प्रथमपुरुष के बहुवचन का है। यह धातु आत्मनेपदी है 'कर्म में मि के का विधान किया गया है।

व्याख्या अत्र उज्जयिन्याम् वत्सराजः सदेशाधिपः उदयन इति भाव:, प्रद्योतस्य=प्रद्योताभिधेयस्य उज्जयिनीनरेशस्येति भावः प्रियदुहितरम् प्रियां पुत्रीम वासवदत्तामिति भाव:, जह्रे अपहृतवान् ।
अत्र-उज्जयिन्याम् तस्यैव प्रद्योतस्यैव राज्ञः नरेशस्य हैमम् सुवर्णमयम्, तालदुमवनम् तालवृक्षकाननम् अभूत् आसीत् ।

अत्र-उज्जयिन्याम् नलगिरिः नल गिरि- नामको हस्ती, दर्षात्मवाद, स्तम्भम् स्थाणुम् उत्पादयउद्धृत्य उद्घान्तः उद्भ्रमणं चकार इति अनेन प्रकारेण अभिशः पूर्वोक्तकथा- कोविदः जनः = नरः आगन्तून् प्राग्पुणिकान् अन्यस्मात् देशादागतान् अन्यस्माद्देशादागतान् बन्धून् = बान्धवान् रमयति विनोदयति । - = -
( प्रद्योतस्य प्रियदुहितरं वत्सराजोऽत्र जह हैमं तालद्रुमबनमभूत्र तस्यैव राज्ञः । अत्रोभ्रान्तः किल नलगिरिः स्तम्भमुत्पाटय दर्पा- दित्यागन्तून् रमयति जनो यत्र बन्धूनभिज्ञः ॥ )
अन्वयः - अत्र वत्सराजः प्रतोद्यतस्य प्रियदुहितरम् जले वत्र तस्यैव राश: हैमम् लालद्रुमवनम् अभूत् अत्र निलगिरि वर्षात् स्तम्भम उत्पाटय उद्द्घान्तः यत्र इति अभिज्ञः जनः आगन्तून् बन्धून् रमयति ।
शब्दार्थ बत्र उज्जयिनी में वत्सराजः वत्सदेश के राजा (उदयन) प्रयोत्तस्य प्रद्योतनामक, उज्जयिनी नरेश की प्रियदुहितरम् = प्रिय पुत्रीका ( वासवदत्ता का) हे अपहरण किया था। अब इसी उज्जयिनी में, तस्यैव प्रद्योत राशः नरेश का ही हैमम् स्वर्णमय तालदुमवनम् = तालवृक्षों का वन अमूद या अयहाँ किल निश्चय ही नलगिरिः after नामक राजा का हाथी, दमदमत्त होकर, स्तम्भम् सूंटे को, उत्पाटप= उखाड़कर उद्घान्तः घूमा करता था, यत्र जहाँ इति इस प्रकार से अभिः उदयन- वासवदत्तादि की कथाओं के जानकार जनः लोग, बागन्तून् = दूसरे देशों से आये हुए, बन्धून् बान्धवों का, रमयति ( मन ) बहलाया करते हैं।

समासः - वत्सानां राजा वत्सराज ( प तत्० ) प्रिया चासो दुहिता च तामप्रियदुहितरम् ( कर्म० धा० ) तालानां दुमाः तालदुमाः ( [ष० त०) तेषां वनम् तम् तालभवनम् ( ० त०] ) |
भावार्थ: है मेघ ! उदयन उज्जयिभ्यामेव वासवदतामपहृतवान् । अजैव प्रयोतस्य राज्ञः सौवर्णेतालाकाननमासीत्, अस्मिन्नेव प्रदेश नलगिरिनामा उज्जयिनीनरेशगजः मदात् स्थूणमुत्पादय बनाम एतादृशीः कथा: safeत्या कथाज्ञाता जनः देशान्तरादागताना बान्धवानां मनासि रमयति ।
हिन्दी मे ! इसी उज्जयिनी में उदयन ने वासवदत्ता का अप हरण किया था। यहाँ प्रयोत का सोने का बना तालवृक्षों का वन था। इसी उज्जयिनी में नलगिरि नाम के राजा का हाथी मदमत्त होकर खम्भों को उड़कर घूमा करता था, इस प्रकार की कथाओं को कहकर जानकार लोग दूसरे देश से आये हुए बन्धुओं का मनोविनोद किया करते हैं।
कोश:-दर्पोऽवलेोऽहङ्कारः इत्यमरः । वार्तासंभाव्ययोः किल इत्यमरः । प्रवीण निपुणाभिज्ञनिष्णात शिक्षिताः इत्यमरः । स्युरावेशिक आगन्तुर तिथिनां गृहागते, इत्यमरः ।
टिप्पणी- वत्सराज:- यहाँ वत्स पद का राजा के साथ समास हो जाने पर "राजाहः सखिभ्यष्टच्" इस सूत्र से टच् प्रत्यय हुआ है।
अभिज्ञः - "अभि जानातीति" इस विग्रह में "अभि" पूर्वक ज्ञानार्थंक "शा" धातु से "बातरचोपसर्गे कः " इस सूत्र से "क" प्रत्यय लाकर "अभिज्ञ" "ज्ञा" ऐसा रूप बना है।
अलंकार - जयदेव के "भाविक भूतभाव्ययंसाक्षाद्दर्शन वर्णनम् ।
अलं विलोकयाऽद्यापि युध्यन्तेऽन सुरासुराः ॥" इस लक्षण के अनुसार यहाँ "भाविक" नामक अलङ्कार है, क्योंकि यहाँ यत्सराजादि के बीते हुए वृत्तान्त का साक्षात् दर्शन के समान कथन है ।


( पत्रयामा दिनकरस्पधनो यत्र वाहाः शैलोदग्रस्त्वमिव करिणो वृष्टिमन्तः प्रभेदाद् ।
योधाप्रण्यः प्रतिदशमुखं संयुगे तस्थिवांसः प्रत्यादिष्टाभरणरुचयर चन्द्रहास व्रणाः ॥ )

अन्वयः - पत्र वाहाः पत्रश्यामा दिनकरय स्पधिनः शैलोदप्राः करिणः प्रभेदात् त्वमिव वृष्टिमन्तः योधाग्रयः संयुगे प्रतिदशमुखम् तस्थिवांसः चन्द्र- हासव्रणाः प्रत्यादिष्टाभरणरुचयः
व्याख्याय उज्जयिन्याम् वाहाः पोटका, पत्रश्यामाः पर्ण- श्यामाः हरितवर्णाः इत्यर्थः दिनकर स्पधिनः सूर्याश्वतुल्याः वर्णेन वेगेन सूर्याववतुल्य इति भावः शैलोदयः पर्वतेोच्छ्रिताः, करिणः गजाः, प्रभेदात्मवस्रवणात् त्वमिव भवत्समानः, मेमेवेत्यर्थः दृष्टिमन्तः वर्षण ator: सन्तीति शेषः । योधाग्रण्यः सेनानायकाः, संयुगे शुद्धे, प्रतिदशमुखम् = रावणसमक्षम् तस्थिवांसः स्थिताः चन्द्रहासव्रणाः रावणकरवाल- सतविह्नः प्रत्यादिष्टाऽऽभरणरुचयः तिरस्कृतभूषण कान्तिवन्तः सन्तीति = = - - = = = = भावः ।
- = शब्दार्थ:-पत्र जिस उज्जयिनी में बाहाःघोड़े, पत्रश्यामाः पत्ते के समान हरे रंग के, दिनकरहस्पधिनः सूर्य के घोड़ों से रंग में एवं वेग में होड़ लेने वाले हैं। शैलोदग्रा:= पर्वत के समान ऊँचे, करिण: हाथी, प्रभेदाद मदजल के गिरने के कारण, त्वमिव तुम्हारी तरह, वृष्टिमन्तः= वर्षा वाले हैं योधाप्रण्यः श्रेष्ठ योद्धा गण, संयुगे युद्ध में प्रतिदशमुखम् = रावण के सम्मुख तस्थिवांसः स्थिर होकर ( उसके विरुद्ध होकर ) चन्द्र- हासमा रावण के तलवार के प्रहार के चिह्नों से प्रत्यादिष्टाभरण- रुचयः आभूषणों को तिरस्कृत करने वाली कान्ति से युक्त है। = =
भावार्थ:- मेघ ! यत्रत्याः अश्वाः हरितवर्णत्या वेगाच्च सूर्यश्विर्षण शीला: सन्ति पर्वतसमानोच्या गजाः मदजलवर्षणात् दृष्टिमन्तः सन्ति श्रेष्ठाः

योद्वारः रणे रावणं प्रतियुद्धयन्तस्तदीयखड्गप्रहारविः प्रत्याख्याताऽऽमरण- कान्तयः सन्ति ।
हिन्दी - हे मेघ ! जहाँ घोड़े हरे रंग के होने के कारण ( और देश के कारण ) सूर्य के घोड़ों से होड़ लेने वाले हैं, पर्वत के समान ऊँ हामी मजल के गिरने से दृष्टि वाले है एवं श्रेष्ठ योद्धागण युद्ध में रावण के विरुद्ध युद्ध करते हुए रावण के खग के प्रहार-विह्न से युक्त होकर बाभूषण को तिरस्कृत करने बाली कान्ति से युक्त हैं।
समासः पत्रमिव श्यामाः पश्यामाः (कर्मधारयः) दिनकरस्य याः दिनकरया ( प० तत्) ते स्पर्धन्ते तच्छीला इति दिनकरस्पधिनः । चन्द्रहासस्य वणानि चन्द्रहासव्रणानि ष० त०) तान्येव अङ्कारः चन्द्रहास- ( रूपकसमासः) आभरणानां रुचयः आमरणरुचयः ( च० त० ) (50 प्रत्यादिष्टा बाभरणरुचयो पैस्ते प्रत्यादिष्टाभरणरुचयः ( बहु० ) ।
कोश: बाजिवाहाऽवं गन्धर्वसेन्धन समयः इत्यमरः । खड्गे तु निस्त्रिश चन्द्रहासाऽसिरिष्टयः इत्यमरः । स्युः प्रमारुगुरुचित्वद्भाभाछ विद्युति दीतयः, इत्यमरः ।

टिप्पणी-वाहा: "वह" धातु से पम् प्रत्यय करके "बाह" ऐसा रूप बनाया जाता है।
दिनकरः करोतीति करः दिनं करोतीति दिनकरः ॥
जालोद्गीर्णेरुपचितवपुः केशसंस्कारधूप- बंधु त्या भवनशिखिभिदं तनृत्योपहारः ।
हर्येष्वस्याः कुसुमसुर भिध्वध्व-खेदं नयेयाः लक्ष्म पश्येल्ललितवनितापावरागाङ्कितेषु ॥ ३२ ॥

अन्वयः - जालोदणी: केशसंस्कारधूपैः उपथितवपुः बन्धुप्रीत्या भवन- शिखिभिः दत्तनृत्योपहारः कुसुमसुरभिषु ललिवनितापादरागतेषु हम्र्म्येषु अस्या: लक्ष्मीम् पश्यन् अध्वसेदम् नयेथाः ।

- - = व्याख्या - जालोदगी वातायन निर्गतः केशसंस्कारधूपैः कामिनी संस्कृतधूपैः, उपथितवपुः परिपुष्टदेह, बन्प्रीत्या बान्धवस्नेहेन भवन- शिखिभिः सदनमयूर, दत्तनृत्योपहार प्रदसनतनोपहार, कुसुमसुरभिषु = पुष्प सौरभेषु ललितवनिता पादरागाद्वितेषु सुन्दराङ्गनावरलाक्षारुचिचिह्नि तेषु हम्पु अट्टालिकासु, अस्या: यस्याः लक्ष्मीम् शोभाम् पश्यन् विलोकयन् वेदम् मार्गपरिश्रमम् नयेथाः दुरीकुरु ।
= = = शब्दार्थ:--- जालोद्गीर्णैः जातियों से (खिड़की से) निकलते हुए, केश- संस्कारधूपै (कामिनियों के केश को सुगन्धि करने वाले धूप से, उपचितयपु = परिपुष्ट देह वाला स्नेह से, भवनशिखिभिः पर के ( पालतू ) मीरों द्वारा इसनृत्योपहार जिसे मूल्य का उपहार दिया गया है, कुसुम-सुरभिषु फूलों के सुगन्ध से सुगन्धित तापादरागा सुन्दर स्त्रियों के पैरों में लगे महावर के चिह्न से चिह्नित हषु - महलों में अस्याः इस उज्जयिनी की, लक्ष्मी शोभाको पश्यन् देखता हुआ, मध्वमेवम् रास्ते के परिश्रम को नयेयाः दूर करना। -
भावार्थ:- मेष वातायनमार्गनिर्गतः कामिनीकच वासनार्थः गन्धद्रव्यधूपैः परिपुष्टशरीर भ्रातृस्नेहेन सदनमयूरेण नृत्यद्वारा कृतातिथ्यः (स्वम् ) पुष्पपरिमलेषु सुन्दरललनावरणात चिह्नितेषु भवनेषु उज्जयिन्याः शोभामवलोकयन् मार्गगमनजन्यपरिश्रममपनय
हिन्दी - हे मेघ ! यहाँ उपयिनी में खिड़कों की जालियों से स्त्रियों के केशों को सुगन्धित करनेवाले धूप से परिपुष्ट देवाले भातृस्नेह से घर के पालतू मयूरों के द्वारा सत्कृत तुम पुष्प के सुगन्ध से सुगन्धित, सुन्दर स्त्रियों के पैरों में लगे महावर के चिह्नों से युक्त महलों में उज्जयिनी की शोभा को देखते हुए मार्ग में चलने के कारण उत्पन्न परिश्रम को दूर करना ।
समासः मालेभ्यः उद्गीर्णाः तैः ( प० तत्०) केशानां संस्कार: केश- संस्कारः ( प० उ० ) तस्य धूपस्तैः (६० तत्० ) । बन्धोः प्रीतिः तथा बन्धु- प्रीत्या ( [ष० त०) उपचितं वयुर्वस्य स उपचितवपुः (बहु० ) भवनेषु

शिखिनः भवनशिखिनः तैः स तत्०) नृत्यमेवोपहारः नृत्योपहारः (रूपक समासः) इतः नृपोपहारः यस्मै स ( बहुबीहिः । कुसुमैः सुरभिषु कुसुम- सुरभि ००) बिठाता बनिता हलिस निता: (फर्म० धा० ). पादयोः रामः पादः (स० त०] ) लिवनिताना पादराग:- -ललित- वनितापादराग (प० तत्) तेन मते ( वृ० त०] ) ललितवनिता- पादरागाद्वितेषु ।
कोश:- जाल गवाक्ष जानाये जालके कपटे गणे, इति यादवः । निविग्धो- पचिते इत्यमरः। उपायनमुपग्राह्यमुपहारस्तथोपदा, इत्यमरः त्रिषु सुन्दरम् इति शब्दार्णवः अयनं वर्त्म मार्गावः इत्यमरः । इयदि धनिना वासः इत्यमरः ।
टिप्पणी- उद्गीर्णः "उद्" उपसर्गपूर्वक निगरणा "" धातु से "क्त" प्रत्यय करके गत्य करके "उद्गीर्ण" ऐसा रूप बनता है। संस्कारः- "सम्” उपसपूर्वक करणार्थंक (दु) "कृ" धातु से घञ् प्रत्यय करके लित्वात् आदि वृद्धि करके "सम्परिभ्यां करोती भूषणे" इस सूत्र से सुडागम करके अनुस्वारादि करके "संस्कार" ऐसा रूप बना है। (सम्+कार+संस्कार ) शिखिन:-"शिक्षा" शब्द वादिगण में पड़ा गया है। अतः व्रीह्यादिया" इस सूत्र से 'इनि' प्रत्यय करके 'शिखिन्' ऐसा रूप बनता है। उक्त रूप उसी शब्द के बहुवचन का है। नृत्यम् गात्र विक्षेपार्थक "तृती" धातु से "ऋदुपध- पाप" इस सूत्र से "'" प्रत्यय करके "नृत्य" ऐसा रूप बनता है। उपहार: उपसपूर्वक "हू" धातु से "घ" प्रत्यय करके "उपहार" ऐसा रूप बनता है। कुछ टीकाकार अवले नवेया:" के स्थान पर "अध्य- विनान्तरात्मा" ऐसा पाठ मानते हैं और इसका सम्बन्ध आगे वाले श्लोक के साथ कर इन दोनों को "युग्मक" मानते हैं ॥ ३२ ॥ -
भर्तुः कण्ठच्छविरितिगणैः सावरं वीक्ष्यमाणः
पुष्पं यायास्त्रिभुवनगुरोर्घाम चण्डीश्वरस्य ।

= - = = व्याख्या भर्तुः स्वामिनो नीलकण्ठस्य कविः गलशोभा प्रति अस्माद्धेतोः गनैः दूतः सादरम् सम्मानपूर्वकम् दीक्ष्यमाणः अवलो यमान: ( सन् ), कुवलयरजोगग्धिभिः पद्मरागसुगन्धितः तोयक्रीडानिरत- युवतिस्नानतिक्त जलक्रीडात्परवनिताऽवगाहन मुगन्धितः गन्धवत्याः एतन्ना- मिकायाः सरितः मरुद्भिः वायुभिः धूतोद्यानम् प्रकम्पिताऽऽरामम् त्रिभुवन- गुरो: त्रैलोक्यनाथस्य चण्डीश्वरस्यभवानीपतेः पुण्यम् पवित्रम् धाम= स्थानम् महाकालमिति भावः यायाः गच्छे
धूतोद्यानं कुवलयरजोगन्धिभिगन्धवत्या-
स्तोयको डानिरतयुवतिस्नान तिक्तैर्महद्भिः ॥ ३३ ॥ अन्वयः --पर्तुः कष्ठछवि: इति गणैः सादरं वीक्ष्यमाणः कुवलयरजो- मभितोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतिक्तः गन्धवत्याः मदभिः धूतोद्यानं त्रिभुवनगुरो: चण्डीश्वरस्य पुष्यं धाम गायाः ।
शब्दार्थ : भर्तुः स्वामी नीलकण्ठ के, कण्ठच्छविः गले की शोभा के समान (तुम हो ) इति इस कारण, गणैःशिवजी के गणों द्वारा सादरम् - मसम्मान वीक्ष्यमाण:-देखा जाता हुआ, कुवलयरोगन्धिभिः कमल के पराग से सुगन्धित तोय क्रीडानिरतयुवतिस्नान तिक्त जलक्रीडा में आसक्त युवतियों के स्नान से सुगन्धित गन्धवत्यागन्धवती नाम की नदी के म = वायु के द्वारा, धूतोद्यानम् जहाँ का बगीचा पाया गया है, त्रिभुवन गुरो:लोक्यनाथ, चण्डीश्वरस्य पार्वतीपति (शिवजी के उस ) पुण्यम्- पवित्र धाम स्थान को ( महाकाल को ) यायाः जाना। = = = - =
भावार्थ: है मेच! शिवस्य गलशोभामिव त्वां प्रथमः सादरमवलोक विध्यन्ति त्वयि पचपरिमल जलक्रीडासकामिनीस्नान- ( चन्दनादिभिः ) सुरभितः गन्धवत्याः नद्याः वायुभिः कम्पिताऽऽरामं भवानी- भर्तुः महाकालेश्वरस्य पवित्र धाम गच्छ
हिन्दी - हे मे शिवजी के गले की शोभा के समान तुम्हें शिवजी के गण सादर देखेंगे। तुम भी वहाँ कमल के पराग से सुगन्धित जलक्रीड़ा में लगी

कामिनियों के स्नान से (देह में लगे चन्दनादि से) सुवासित गन्धवती के बायु के द्वारा जहाँ का बगीचा कॅपा दिया गया है, महाकालेश्वर के उस पवित्र स्थान में जाना।
समासः कण्ठस्यैव छवियंस्य स कण्ठच्छविः (बहु० ) । कुवलयानां रजः कुवलयरज ( प० तत्० ) तेषां गन्धः = कुबलवरजोगन्धः ( ० ० ) सः येवामस्तीति तैः = कुवलय रजोगन्धिभिः ( बहुदी० ) । तोये क्रीडा = तोयक्रीडा (स० त० ) तस्या निरताः तोयक्रीडानिरताः, ताम्र युवतयः तोपकोडा- निरतयुक्तय: ( कर्मधा० ) तासां स्नानं ( [ष० त०) तेन विततास्ते ( ० तत् ) । कम्पितानि उद्यानानि यस्मिन् तत् कम्पितोद्यानम् (बहुवी० ) । त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनम् (समाहारद्विगु: ) तस्य गुरुः, तस्य ( च० तत्० ) ।
कोश:- कण्ठो गलः इत्यमरः । गणस्तु गणनायो स्याद् गणेशे प्रमथे चये, इति शब्दार्णवः । प्रमचाः स्युः पारिषदाः इत्यमरः स्वानीयेऽभिषये स्नानम्, इति यादवः कटुतिक्तकषायास्तु सौरभे च प्रकीर्तिताः इति हलायुधः । राहदेह- विट् प्रभावाधामान्यथ इत्यमरः ।
टिप्पणी- कण्ठच्छविः -- यहाँ "सप्तमीविशेषणे बहुवीही" इस सूत्र के "मी" पद से शापित व्यधिकरण बहुव्रीहि समास हुआ है। समुद्र मन्थन के समय निकले विष को शिवजी ने संसार की रक्षा के लिए पी लिया था, उसके ताप से उनका गला मेघ की तरह "नीला" हो गया था इसलिए शिवजी को नीलकण्ठ कहा गया है। वीक्षमाणः "दि" उपसर्गपूर्वक "इस" धातु से "शानच् प्रत्यय करके "बीजमानः" ऐसा रूप बना है।
अलङ्कार यहाँ "उदात्तालङ्कार" है ।। ३३ । -

अप्यन्यस्मिजलधर ! महाकालमासाद्य काले
स्थातव्यं ते नयनविषयं यावदत्येति भानुः ।

1 अन्वयः - जलधर महाकालम् अन्यस्मिन् अपि काले आसाच ते स्थातव्यम् यावत् भानुः नयनविषयम् अत्येति वलाघनीयाम् शूलिन सन्ध्या- बलिपट कुर्वन् आमन्द्राणाम् गर्जितानाम् अविकलम् फलम् उप्स्यसे ।
- = = व्याख्या है जलघर !हे मेष महाकालम् एतनामकज्योतिलिङ्ग स्थानम्, अन्यस्मिन्नपि अपरस्मिन्नपि काले समये, आसाद्य प्राप्य ते त्वया स्थातव्यम् निवसितम्यम् पावत् यावत् कालम् भानुदिनकरः नयनविषयम् दृष्टिगोचरताम्, अत्येति अतिक्रामति, सूर्यास्तसमयपर्यन्तं स्वया तत्र स्थातव्यम् इति भावः धनीयाम् प्रशंसनीयाम्, शूलिनः महाकाले श्वरस्य शिवस्येत्यर्थः सख्या बलिपटताम्सालिजाभावम् कुर्वन् विदधत् आमन्द्राणाम् ईषद्गम्भीराणाम् गर्जितानाम् स्तनितानाम्, अविलम् सम्पूर्णम् फलम् = पुष्यम्, लप्स्यसे प्राप्स्यसि । -
कुर्वन् सन्ध्याबलिपटहतां शूलिनः श्लाघनीया मामन्द्राणां फलमविकलं लप्स्यते गजितानाम् ॥ ३४ ॥
शब्दार्थ :- हे जलधर ! हे मेघ | महाकालम् चण्डीश्वर के स्थान में, अन्यस्मिन्नपि सन्ध्या के अतिरिक्त, काले समय में भी आसाद जाकर ते तुम्हें, स्थातव्यम् (वहाँ ) ठहरना चाहिए, याद जब तक भानु सूर्य नयनविषयम् दृष्टिगोचरता को, अत्येति अतिक्रमण करता है, अर्थात् जब तक सूर्य डूब नहीं जाते हैं, तब तक पापनीयाम् प्रशंसनीय शूलिनः शिवजी की सन्ध्या लिपटताम् सन्ध्या की पूजा (आरती) में नगाड़े का काम विद्यत: करता हुआ (तुम) आमन्द्राणाम् किचिद् गम्भीर, गजि- वानाम् गर्जन का अविकलम् सम्पूर्ण फलम् फल को लक्ष्यसे- प्राप्त करेगा। = = = = =
भावार्थ:- हे मेघ ! समयाऽतिरिक्तसमयेऽपि महाकालेश्वरस्य पुण्यं धाम गत्या एवं सूर्यो यावत्कालपर्यन्तमस्ताचलं न गच्छेत् तावत्कालपर्यन्तं स्थास्यसि । ( यतो हि ) सायन्तनपूजापटहतां विदधत् ईषद्गम्भीरनादस्त्वं गर्जितानां सम्पूर्ण फलं प्राप्स्यसि ।

= समास:-- धरतीति घर जलानां घर-घर (प० त०) नयनमो विषय: नयनविषयः (तत्) तम् सन्ध्यायाः बलिः सन्ध्यावधि: ( ब० त०) तस्व पटः सन्यालपट ( ० ० ) तस्य भावस्तम्= सन्ध्या लिपटताम् । विगताः कलाः यस्मात् तत् विकलम् (बहु०) न विकलम् अविलम् (न)।
हिन्दी मे सध्या के अतिरिक्त दूसरे समय में भी महाकाल के पवित्र स्थान में जाकर जबतक सूर्य दूद नहीं जाते तब तक ठहरना (क्योंकि) महाकालेश्वर की सायंकाल की पूजा ( आरती ) में नगाड़े के काम को करते हुए तुम थोड़े गम्भीर गर्जन का सम्पूर्ण फल प्राप्त करोगे।
कोश:- पावत्तावच्च साकल्ये ऽवधौ मानेऽवधारणे, इत्यमरः शिवः शूली महेश्वरः इत्यमरः । बलिः पूजापहारे च इति वैजयन्ती । कलो मन्द्रस्तु गम्भीरे, इत्यमरः । आनक पटहोत्री स्वाद इत्यमरः स्वनितं गतिं मेघनिर्घोष- रसितादि च इत्यमरः ।
टिप्पणी- धरतीति धरः यहाँ धारण अर्थ में विद्यमान "धू" धातु से "नन्दिग्रहिपचादिभ्यो णिम्यचः " इस सूत्र से पचादित्वात् "म" प्रत्ययः किया गया है। आसाध "आ" उपसर्गपूर्वक (प) "सद" धातु से क्वा प्रत्यय करके एवं उसके स्थान पर व्ययादेश करके "आसाद" ऐसा रूप बनता है। अत्येति अति उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक 'इन्' धातु के छद् लकार के पुरुष के एकवचन का 'अत्येति' यह रूप है। स्थातव्यं ते पत् प्रत्यय के कृत्य होने के कारण 'स्थातव्यम्' के योग में 'कृत्यानां कर्तरि वा' इस सूत्र से विकल्प से पष्ठी यहाँ हुई है, जिसका अर्थ 'त्या' है। यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि युष्मद् अस्मद् शब्द को ते मे, आदेश वाक्य के आदि में नहीं होता है, जैसा कि गन्तव्या ते वसतिः' यहाँ पर भी 'ते' प्रयोग वाक्य के आदि में नहीं किया गया है। सन्ध्यासम्' उपसर्गपूर्वक चिन्ता अर्थ में विद्यमान् 'ये' धातु से आत्व करके 'प्रातश्चोपस इस सूत्र से '' प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टापू करके ' ऐसा रूप होता है। -

अलंकार - यहाँ पूर्वार्ध कथित वाक्यों का उत्तरार्धं कथित वाक्य हेतु है, तः यहाँ 'काव्यलिङ्ग' नामक अलङ्कार है ।। २४ ।।
पावन्यासैः क्वणित रशनास्तत्र लीलावधूतः रत्नच्छायाखचित-बलिभिश्चामरः क्लान्तहस्ताः ।
वेश्यास्त्वत्तो नखपद-सुखान् प्राप्यवर्षाबिन्दू- नामायन्ते त्वयि मधुकर श्रेणि-दोर्घात् कटाक्षान् ।। ३५ ।।

उपाध्या तत्र सन्ध्यासमये पादन्यासः चरण प्रक्षेपैः क्वणितरक्षनाः ==मुखरितमेखलाः, लीलावधूतः विलास चलितः, रत्नच्छायासचितवलिभिः कणमणिप्रभाव्याप्तदण्डः, चामरैः बालव्यजनैः कान्तहस्ताः वित्रस्ताः वेश्या: वाराङ्गनाः, त्वत्तः भवतः मेघादिति भावः नखपदसुखान्न सुखदान, वर्षावन्दून् दृष्टिप्रथमणान् प्राप्य वा स्वमेधे मधु- करणिदीर्घान् भ्रमरपंकीवायतान् कटाक्षान् अपाङ्गान्, आमोक्ष्यन्ते परित्यक्ष्यन्ति ।
अन्वयः -- तत्र पादन्यासः भवणितरशना लीलावधूर्तः रत्नच्छायाचित मिपाः हस्ताः वेश्याः त्वत्तः नखपदसुखान् वर्षाविन्दून् प्राप्य मधुकर णिदीप कटाक्षान् ।
शब्दार्थः तत्रसंध्या समय में पादन्यासः पैरों के संचालन से नाजनी करधनियाँ बजती रहती हैं, लीलावधूतविलासपूर्वक दुलाये गये, रत्नच्छायासचितवलिभिः मणियों की प्रभा से स्यामदण्डवाले, चामरैः चैवरों से कान्तहस्ताः पके हुए हाथों वाली वेश्यानर्तकियाँ स्वतः तुमसे, नखपदसुखान्नखक्षत को सुख देनेवाली वर्षाग्रविन्दून् वर्षों की पहली बूंदों को, प्राप्यपाकर, त्वयि तुम्हारे ऊपर, मधुकरखेणि- दीपप्रमरों की पंक्ति की तरह लम्बी कटाक्षान् कटाक्ष, आमोक्यन्ते फेकेंगी।

भावार्थ: है मेघ ! सायंकाले चरणविक्षेपैः मुखरितमेखलाः सविलास मणिमयदण्डयुक्तचामरस चालनेन विग्रहस्ता गणिका: त्वत्तः नखक्षतशान्ति- प्रदान इष्टेः प्रथमविन्दून्या त्वयि भ्रमरपंतीवायतान् कटाक्षान् परित्य इयन्ति । कामिनीकाशरूपं शिवस्तुतिफलं सथः तस्य इति भावः ।
हिन्दी - हे मेघ ! सायंकाल यहाँ चरणसंचालन से जिनकी करधनिय बजती रहती है, विलासपूर्वक मणिमयदण्डवाले चैवरों को दुलाने के कारण बके हुए हाथों वाली, (ऐसी नर्तकियाँ तुमसे नखक्षत को सुख देने वाली वर्षा की प्रथम बिन्दुओं को पाकर तुम्हारे ऊपर भौरों की पंक्ति के समान लम्बी कटानें फेंकेगी। इस तरह शिवजी की स्तुति का कामिनी के कटाक्षरूप फल तुरन्त पा जाओगे।
समासः पादयोः न्यासः पादन्यासः (ष० त० ) ः स्वपिता रशना यासां ताः पादन्यासक्वणित रशना (बहुव्री०) लीलया अधूर्तःसीमावर्त (तृ० तद्०) रत्नानां छाया रत्नच्छाया ( ० तद्) तथा खचिता वलयो येषां तैः रत्नच्छायातचितवतिभिः (बहुबी०) क्वान्तो हस्तो मासां ताः हस्ता (बहुवी०) नखानां पदानि नखपदानि (१०त०) तेषु सुखाः तान् नखपदमुखान् (स० त०) या ते बिन्दवः अविन्दवः (कर्मधा० ) वर्षस्य अग्रविन्दवःवर्षांनबिन्दवः (१० द०) । मधुकराणां श्रेणी मधुकर श्रेणी तद्वद्दीर्घान् मधुकरोणिदीर्घान् ( उपमानानि सामान्यवचनैरिति समासः )
कोशः पदं व्यवसितत्राणस्थानलक्ष्यांशिवस्तुषु इत्यमरः । बलिया- मरदण्डे च जरा विश्लचचर्मणि इति विश्वः करोपहारयोः पुंसि वहिः इत्य- मरः । सुखहेती सुखे सुखम् इति शब्दार्णवः । दीर्घमायतम् इत्यमरः कटाक्षो पाङ्गदर्शने इत्यमरः पृषन्ति बिन्दुषतः पुमांसो विप्रुषः स्त्रियाम् इत्यमरः । 1
टिप्पणी-न्यास "नि" उपसर्गपूर्वक "अ" धातु से भाव में "घ" प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके "भ्यास" शब्द निष्पन्न होता है। क्वणित- यहाँ शब्दार्थक "क्वण" धातु से कर्ता में "क्त" प्रत्यय हुआ है. क्योंकि यह धातू. -

अकर्मक है, इसलिए "गत्यर्थाऽकर्मक क्लिपशी स्वाऽऽसवसजन सहजीतिभ्यश्च" इस सूत्र से कर्ता में "क" प्रत्यय का विधान किया जाता है। त्वत्तः यहाँ "मद" शब्द से पचम्यास्तसिल्" इस सूत्र से तसिल प्रत्यय करके उसके परे रहते "प्रत्ययोत्तरपदयो" इस सूत्र से युष्मद्" शब्द के स्थान पर "त्वत्" आदेश का विधान करके "त्वत्तः" ऐसा रूप बना है। मधुकरः- मधु करोतीति मधुकरः, यहाँ करोति तच्छीलः इस अर्थ में "कृ" धातु से "कृलो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु" इस सूत्र से "ट" प्रत्यय करके गुण करके मधुकर ऐसा रूप बनता है।
अलंकार - यहाँ "मधुकरोणिदीर्मान्" इस स्थल पर "व" आदि उपमानवाची सामान्य शब्द का लोप होने के कारण "लुप्तोपमा" नामक अलङ्कार है ।। ३५ ।।

पश्चादुच्चैर्भुज - तरुवनं मण्डलेनाभिलीनः सान्ध्यं तेजः प्रतिनवजपापुष्परक्तं दधानः ।
नृत्यारम्भे हर पशुपतेरार्द्रनागाजिनेच्छां शान्तोद्वेगस्तिमितनयनं दृष्टभक्तिर्भवान्याः ॥३६॥

अन्वयः - पश्चात् नृत्यारम्भे प्रतिनवजपापुष्परक्तम् सान्ध्यम्, तेजः दधानः उच्चैः भुजतस्वनम् मम्डलेन अभिलीनः भवान्या गान्तोद्वेगस्तिमित- नयनम् दृष्टमक्तिः पशुपतेः आईनागाजिनेच्छाम् हर
पापा-पश्चात् सायन्तनपूजावसाने नृत्यारम्भे ताण्डवोपक्रमे शिव- स्पेति शेषः प्रतिनवजपापुष्परक्तम् नूतनजपाकुसूमारुणम्, सान्ध्यम् सन्ख्या- कालिकम्, तेजः कान्तिम् दधानः- धारयन्, उच्चैः उन्नतम् भुजतवनम् बाहुवृक्षकाननम्, मण्डलेनवृत्ताकारतया बभिलीनः अभिव्यासः, (सन् ) भवान्या पावत्या, शान्तोद्वेगस्ति मित्तनयनम् विगतभयस्थिरनेत्रम् यथा- स्यात्तया (स्वम्) दुष्टभक्तिः अवलोकितानुरागः, पशुपतेः महाकालेश्वरस्य बानावाजिनेच्छाम् विजयकांक्षा, हर दूरी कुरु त्वमेव गज- चर्मास्थानी कृष्णवर्णत्वेन भवेति भावः ।

शब्दार्थ:- पश्चात् सायंकाल की पूजा के बाद हत्यारम्भे टाण्डव के प्रारम्भ में प्रतिनवजपापुष्परक्तम् नवीन जपा ( अल ) पुष्प के समान लाल माध्यम सार्वकालिक, तेजप्रकाश को, धान धारण करते हुए. उनसे बहुरूपी वृक्षों के वन पर मण्डलेनवृत्ताकारतया, अभिलोन पास होकर, भवान्या पार्वती के द्वारा शान्तो गस्तिमितनयनम् = निर्भय होकर free isों से, दुष्टभक्तिःदेखी गयी है भक्ति जिनकी (ऐसे तुम ) पशुपते: शिवजी की आनागाजिनेच्छाम ( कोणित से) गीले हाथी के चमड़े की इच्छा को हरदूर करना ।
भावार्थ:- सायङ्कालिक पूजावसाने ताण्डवारम्भे नवीन जपापुष्पाऽऽरुण्य- प्राणं धारयन् उच्छुतवाहरूपे वृक्षवने मण्डलाकारेणाच्छन्नः सन् पार्वत्या विगतभयस्थिरलो बनेनावलोक्यमानः अवलोकितपुण्यानुरागस्त्वं
हिन्दी समय को पूजा के बाद  के प्रारम्भ में नवीन जपाकुसुम के समान सायकालिक तेज को धारण करते हुए. रूपी वृक्षों के वनों पर वृत्ताकार रूप से व्याप्त होकर, पार्वती के द्वारा निर्भय- पूर्व निखों से देखे जाते हुए तुम शिवजी के ताले हाथी के चमड़े की ( मोड़ने की इच्छा को दूर करना । ऊंचे बाइ-
समासः पशूनां पतिः पशुपतिः (प० तद्०) तस्य नृत्यस्य आरम्भे नृत्यारम्भे ( ० त०) नवं प्रतिगतं प्रतिनवं च तत् जपापुष्पम् प्रतिनब- जपापुष्पम् ( कर्म० धा० ) तद्वत् रक्तम् ( उपमानकर्म०) उच्चर्भुजा एव तरव: (रूपक०) भुजतरूणां वनम् उच्चैर्भुजतरुवनम् ( प० स० ) । चान्त उद्वेगो पयोस्ते शान्तोद्वेगे ( बहुवी० ) अतएव स्तिमिते नयने पस्मिस्तत् यथा तथा बहुव्री० ) क्रियाविशेषणम् ( दृष्टं वस्तु ) भक्तिरेव यस्य स दृष्ट भक्तिः बहुव्री०)। = =
कोशः- नाट्य नृत्य नर्तने इत्यमरः प्रत्ययोऽभिनवो मध्यः इत्यमरः उद्वेगरस्वदिते क्लेशे भये मन्वरगामिनि इति शब्दार्णवः । मण्डले परिधी कोष्ठे

दे द्वादवाराशिषु इति मेदिनी स्तिमितोऽचञ्चलायः इति मेदिनी। आई लिम्नं निमित्तं स्तिमितं सम्मुन्नतं मुक्तच इत्यमरः अजिनं चर्म कृतिः स्त्री, इत्यमरः ।
- टिप्पणी-पश्चात् यह अव्यय है। "अपरस्मिन्" ऐसा विग्रह करके "अपर" के स्थान में "पश्चात्" इस सूत्र से "पश्चात्" आदेश किया गया है। दधानः धारणार्थक "धा" धातु से लट्लकार में लिए के स्थान पर लट शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे" इस सूत्र से "ज्ञानच्" आदेश किया गया है। उच्च है; इस शब्द से आयी विभक्ति का 'अव्ययादाप्युपः' इस सूत्र से 'लक' हो गया है।

इसका सभी वचनों एवं सभी विभक्तियों में बोर तीनों लिङ्गों में एक-सा ही रूप रहता है क्योंकि अव्यय का सामान्य लक्षण है-
सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु ।
वचनेषु च सर्वेषु यत्र व्येति तदव्ययम् ।। सान्ध्यम्-यायां भवः सान्ध्यम् यहाँ सन्ख्या शब्द से "तत्र भव" इस सूत्र से अण् प्रत्यय लाकर "सान्ध्यम्" ऐसा रूप बनता है। भवानी भवस्य स्त्री इस विग्रह में "भव' शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में -
इन्द्रवरुणभवसहिमाऽरण्ययवयवनमातुलाऽऽचार्याणामानुकू" इस सूत्र से
"डी" प्रत्यय एवं "अनुकू" का आगम हुआ है। वृष्टमति:-महाकवि का यह प्रयोग पाणिनीय व्याकरण के विरुद्ध प्रयोगों
में अन्यतम है। "दृष्टा भक्तिर्यस्य" इस विग्रह में समास हो जाने के पश्चात् स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादन सामानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु" इस सूत्र से "दृष्टा" इस पद को पुंवद्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि उक्त सूत्र "त्रियादि" गणपठित शब्द से भिन्न शब्दों के परे रहते ही पुंवद्भाव करता है, जल कि "भक्ति" शब्द का पाठ "प्रियादि" गम में जाता है अतः पाणिनीय व्याकरण-सम्मत तो "दृष्टा भक्ति:" ऐसा ही प्रयोग होगा। कुछ विद्वानों ने इसको व्याकरण-सम्मत बनाने का परिश्रम किया है। उनका विग्रह "दृष्ट"

( वस्तु) भक्ति यस्य" इस प्रकार है उनका अभिप्राय है "दृष्ट" शब्द "भक्ति" का विशेषण न होकर स्वतन्त्र विशेष्य है और "प्रमाणम्-वेदः की तरह शुद्ध है। परन्तु यह केवल खींचातानी ही प्रतीत होता है क्योंकि महा- कवि का अभिप्राय वही है जो "दृष्टा भक्ति से ध्वनित हो रहा है।
अलङ्कार इस लोक में "भुजतरुवनम्" यहाँ भुजाओं में रूपक का आरोप होने से "रूपक अलंकार है "प्रतिनवजपापुष्परक्तम्" यहाँ उपमान- वाची सामान्य शब्द इवादि के लोप होने से लोपमा है, एवं सान्ध्यतेज को मेघ के धारण करने से असंभव वस्तु सम्बन्ध विम्बप्रतिबिम्बभाव व्यक्त हो रहे हैं। अतः यहाँ "निदर्शना" नामक अलंकार है। इस प्रकार तीनों की संसृष्टि होने से "संकर" नामक अलंकार है ।। ३६ ॥

गच्छन्तीनां रमणवसति योषितां तत्र नक्तं रुद्वालोके नरपतिपथे सूचिभेद्यैस्तमोभिः |
सोवामन्या कनकनिकषस्निग्धया दर्शयोव तोयोत्सर्ग स्तनितमुखरो मास्मभूविक्लवास्ताः ||३७||

= व्याख्यातन उपविन्याम्, नक्तम् निशायाम्, रमणवसतिम्-प्रेमी- सदनम् गच्छन्तीनाम्यातीनाम्, योषिताम् स्त्रीणाम्, अभिसारिकाणामित्य- भिप्रायः । सूचिभेद्यैः निविडे (कविप्रसिद्धोऽयं शब्दः), तमोभिः अन्धकारः, रुद्वालोके आवृत्तप्रकाशे, नरपतिपथे राजमार्गे, कनकनिकषस्निग्धया हैम- शाणरेखाजसा, सौदामन्यातडिता, उर्वीम् पृथ्वीम् मार्गमितिभावः, दर्शय आलोक, तोयोत्सर्गेस्तनितमुखरः दृष्टिगर्जनवाचाल, मास्मभूः नो भव ( यतो हि ) ताः प्रिय सदनगन्तुमुत्सुकाः अभिसारिकाः, विक्लवाः भीरका भवन्ति अतः ताः त्वया न भेवम्याः । = = - =
अन्वयः - तन नक्तं रमणवसति गच्छन्तीनां योषितां सूचिभेद्यः तमोभिः रुद्वालोके नरपतिपये कनकनिकषनिया सौदामन्या उर्वीम् दर्शय तोयोत्सर्ग- स्वनितमुखरः मास्मभूः वा विक्लवाः ।

शब्दार्थः तत्र उज्जयिनी में नक्तम् रात्रि में रमणवसतिम् प्रिय के घर गच्छन्तीनाम् जाती हुई, योषिताम् अभिसारिकाओं का, सूचिर्य: गहन तमोभिः अन्धकार से रुद्रालोआवृत प्रकाशवाले, नरपतिपये - राजमार्ग पर कनक-निकपस्निग्धया सोने की कसौटी की रेखा की तरह तेज वाली, सौदामन्या बिजली के द्वारा उर्वीम् पृथ्वी को अर्थात् मार्ग को दर्शय प्रदर्शन करो (अर्थाद उन्हें रास्ता दिखलाओ ) तोयोत्सर्ग- स्तनितमुखर दृष्टि से तथा गर्जन से शब्दायमान, मास्मभूः मत होना, क्योंकि, ताः वे अभिसारिकायें, विक्लवाः डरपोक ( भवन्ति होती है)
भावार्थ:- हे मेघ ! उज्जयिन्यां रात्रौ प्रियसदनं यान्तीनां अभिसारि- काणां निविस्तमोभिः प्रकाशरहिते राजमार्गे स्वर्णशलाकातेजसे विद्युता मार्गनिदर्शनं कुरु वृष्टिगर्जनेन ताः न भेतव्याः स्वभावेन ताः विमलवा भवन्ति ।
हिन्दी है मेथ! उज्जयिनी में रात्रि में प्रेमी के घर जाती हुई अभि सारिकाओं का घोर अन्धकार के कारण प्रकाशहीन राजमार्ग पर कसौटी पर स्वर्ण रेखा के तेज के समान तेजवाली बिजली के द्वारा पथ-प्रदर्शन करना। वृष्टि से तथा गर्जन से शन्दायमान मत होना क्योंकि वे अभिसारिकायें डरपोक होती है।
समासः - रमणानां वसतिः ताम्रमणवसतिम् (प० त०)। रुद्धः आलोकः यस्मिंस्तस्मिन् कालोके (बहुवी०) नराणां पतिः नरपति: ( च० तद्०) तस्य पये नरपतिपये ( ० तद्०) सूचिभि: भेद्याः (० तद्०) तैः । कनकस्य निकषः कनकनिकष ( च० त० ) । तद्वत् स्निग्धं यस्याः तथा ( व्यधिकरण बहु० ), तोयोत्सर्ग स्तनितचतोयोत्सस्तनितम् (इन्द्र) ताभ्यां मुखरः ( ० तद्) ।
कोस:-दोषाच नक्तच रजनाविति इत्यमर: आलोको दर्शनोद्योती, इत्यमरः । तदामिनी विद्युम्नचता चपता अपि इत्यमरः सुधीर्वी वसुन्धरा इत्यमरः ।

टिप्पणी-म्-यह अभ्यय है। रमणः रमयतीति विग्रह में क्रीडार्थक रम" धातु से णिच् प्रत्यय करके कर्ता में नन्दिग्रहिए वादिभ्यो युणिन्यचः " इस सूत्र से ल्यु प्रत्यय करके हस्वादि करके "रमण" ऐसा रूप बनता है। सूचि :- सूर्य से छेदने योग्य यह इस शब्द का अर्थ है परन्तु यह गाढ़े अन्धकार के लिए प्रयुक्त होता है, ऐसी कविप्रसिद्धि है। नरपतिपथेः यहाँ नरपति शब्द का पथिन् शब्द के साथ समास हो जाने पर ऋक्पूरब्धूपणा मानक्षे" इस सूत्र से समासान्त "अ" प्रत्यय करके उपधालोपादि करके "मरपतिपथ" ऐसा रूप बनता है। उक्तरूप उसी शब्द के सममी विभक्ति का है। मुखरः मुखमस्यास्ती विग्रह में मुख शब्द से "रप्रकरणे खमुलकुजेभ्यः रः" इससे प्रत्यय करके "मुसर'" ऐसा रूप बनाया जाता है।
अलङ्कारः- यहाँ "कनकनिकषस्निग्धया" इसमें लुप्तोपमा नामक अलङ्कार है एवं "तोयोत्सर्गस्वनितमुखर:" इसका हेतु "विस्तवास्ता:" यह पद है इसलिए वाक्यार्थहेतुक "काव्यलिङ्ग” नामक अलङ्कार है।

अतः यहाँ दोनों का "संसृष्टि" नामक अलङ्कार है ।। २७ ।।
तां कस्यचिद्भवन- बलभौ सुप्तपारावतायां नीत्वा रात्रि चिर- विलसना त्विन्न विद्युत्कलः ।
दृष्टे सूर्ये पुनरपि भवान् वाहयेदध्वशेषं मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः ॥ ३८ ॥

अन्वयः -- विरविलसनात् विन विद्युत्कलः भवान् सुमपारावतायाम् कस्यचित् भवनवलभी ताम् रात्रिम् नीत्वा सूर्ये दृष्टे पुनरपि अध्यशेषम् बाहयेत् सुहृदाम् अभ्युपेताऽकृत्या न मन्दायन्ते खलु ।
व्याख्या (हे मेष) विरविलसनात् बहुकालं यावत् स्फुरणात् विनवि कलत्र:धान्त बन्चलभायैः भवान् मेषः, गुमपारावतायाम् निद्रितरूपोतानाम्, कस्यचिद् अन्यतमायाम् भवन वलभी हम्यच्छिादनोपरि मागे, रात्रि खां रजनीम्, नीत्वा = व्यतीत्य सूर्ये मानी, दृष्टे उदिते पुनरपि भूयोऽपि अध्य- -

= शेष मार्गावशेषम्, दाहयेद्प्राप्युपाद, सुहृदाम् मित्राणाम्, मभ्युपेतार्थ- कृत्याः अङ्गीकृत-क्रिया:, (जना), न खलु नन्दायन्ते नैव मन्दाः भवन्ति ।
- शब्दार्थ:- विरविलसनात् बहुत समय तक चमकने के कारण, खिन्न विद्युत्कल गयी है बिजलीरूपी स्त्री जिसकी (ऐसे) भवान् आप, सुप्तपारावतायाम् जहाँ कबूतर तो गये हैं ऐसे कस्यचित् किसी भवन- महल के ऊपरी भाग पर तां रात्रि उस रात्रि को नीत्या=विता- कर सूर्य सूरज के दृष्टे दीखने पर अर्थात् उग जाने पर अध्वशेषम् = अवशिष्ट मार्ग को बाहयेत् पार करना (क्योंकि), सुहृदाम् मित्रों के, अभ्युपैत्तार्थ कृत्याः कार्य को करने के लिए ) अङ्गीकार कर लिया। जिन्होंने ऐसे पुरुष, न खलु मन्दायन्ते कभी आलस्य नहीं करते हैं। = = - =
भावार्थ:- बहुकालं यावत् स्फुरणानि चञ्चलाः एवं सुप्पारावतै कस्मिश्चिद् भवनस्योपरिमागे तो रात्रिमतिवाह्य सूर्योदये सति पुनः मार्गावशेष बाहयेः । यतो हि मित्राणामङ्गीकृतकर्तव्याः जनाः न मन्दायन्ते ।
हिन्दी है मेष बहुत समय तक चमकने के कारण थकी हुई बिजली- रूपी पत्नीवाले तुम जहाँ कबूतर सो गये हैं ऐसे किसी भवन के ऊपरी भाग पर उस रात्रि को बिताकर सूर्योदय हो जाने पर जो मार्ग बच गया हो उसे भी पार करना, क्योंकि जिन्होंने मित्रों के कार्यों को करना स्वीकार कर लिया बे पुरुष कभी बालस्य नहीं करते।
समासः - चिरं विलसनं तस्माद ( सुप्सुपेति समासः ) सिन्नं विद्युदेव कल पस्य सः खिन्न विद्युत्कल (बहुद्री) सुमाः पारावताः यस्यां सा सुमपारावता] (बहुव्री०) तस्याम् । भवनस्य वलमी भवनवलभी (प० तद०) तस्याम् अध्वनः देवम् अध्वशेषम् ( ६० तद०) अभ्युपेता अर्थस्य कृत्या पैस्ते अभ्युपेतार्थकृत्याः (बहु० ) ।
कोस:- कलत्रं घोणिभार्ययोः इत्यमरः पारावतः कलरवः कपोतोऽप इत्यमरः । बाच्छादन्तु वलभी छादने वक्रदारुणि इत्यमरः आच्छादनं स्याद्वल-


श्री गृहाणाम्, इति हलायुधः । कृत्याः क्रिया देवतयोः कार्ये स्त्री कुपिते वि इति यादवः ।
टिप्पणी- सूर्य:- सरति आकाश इति सूर्यः यहाँ "सृ" धातु से "राज- सूयसूर्य- मृषोद्यरच्य कुप्य कृष्टपच्याऽभ्ययच्या" इस सूत्र से "क्यप् प्रत्यय एवं उत्व निपातन किया जाता है। कृत्या:-'कृ' धातु से "कृञः च" इस सूत्र से चकार बलात् क्यप् प्रत्यय का विधान करके "ह्रस्वस्य पिति कृति" इस सूत्र से तुक् का आगम करके स्त्रीत्व विवक्षा में टापू करके "कृत्या" ऐसा रूप बनता है । अभ्युपेतशब्द "सुहृदाम्" पद के साथ सापेक्ष है परन्तु यहाँ गमक- स्वात् समास विधान हुआ है। मन्दायन्ते यहाँ मन्द शब्द से "लोहितादि- डाय: क्यप्" इस सूत्र से "क्यप् प्रत्यय करके विकल्प से "वा पषः इस सूत्र से आत्मनेपद हुआ है।
अलङ्कार:- यहाँ विद्युत् में कलत्र का आरोप शाब्द एवं मेघ में पतित्व का आरोप अर्थतः होने से "एकदेशविवर्ति-रूपक" नामक अलंकार है, एवं सामान्य के द्वारा विशेष का समर्थन होने से "अर्थान्तरन्यास" नामक अलंकार है और दोनों का अङ्गाङ्गिभाव होने से "शंकर" नामक अलंकार है ॥ ३८ ॥ तस्मिन्काले नयनसलिलं योषितां खण्डितानां शान्ति नेयं प्रणयिभिरतो व भानोस्यजाशु | प्रालेयाल कमलवनात्सोऽपि तु नलिम्याः प्रत्यावृत्तस्त्वयि कररुधि स्यादनल्पाभ्यसूयः ॥ ३९ ॥
अन्वयः - तस्मिन् काले प्रणयिभिः सहितानाम् पोषिताम् नयनसलिलम् शान्तिम् नेयम् । मानो र आशुत्य सः अपि नलिम्याः कमलवदनात् लेवासम् हर्तुम् प्रत्यावृत्तः त्ववि कररुधि अनल्पाभ्यसूयः स्यात् ।
व्याख्या- तस्मिन् उपर्युक्ते, काले समये, सूर्योदय-समय इत्यर्थः । प्रणयिभिः रमणैः खण्डितानाम् नायिकाविशेषाणाम्, नयनसलिलम्-नेत्राम्बु अथुरित्यर्थः, शान्तिम् प्रशमनम् नेयम् नेतव्यम् । राज्यन्ते प्रेमिणः अन्यथा

रमणं कृत्वा स्वकीया नायिकामनुनयेन प्रार्थयन्ति वतः भानो-दिन- करस्य वह पत्थानम् आमुख सः सूर्यः अपि नलिन्याः पथिन्याः कमलदनादपद्ममुखात् प्रायाम्नीहारविन्दुम् हर्तुम् दूरीकर्तुम् प्रत्यावृत्तः (सन् ) त्वयि मेघ, कररुधि किरणावरोधे सति अनल्पाभ्यसूयः प्रकामेष्ः स्वानुभवेत् ।
शब्दार्थः तस्मिन् पहले कहे गये काले समय में (सूर्योदय काल में ) प्रणयतिःप्रेमियों के द्वारा ण्डिताना जिनके पति दूसरी स्त्री के साथ रमण करते हैं ऐसी योषिताम् स्त्रियों के नयनसलिलम् आसुओं को, शान्तिम् शान्त नेयम् करना ( होता है), रात्रि के बीत जाने पर जो पुरुष दूसरी स्त्रियों के साथ संभोग करते हैं अपनी खण्डित पत्नी को मनाने के लिए उसकी प्रार्थना करते हैं, अतः सूर्य के मार्ग को आशु शीघ्रता से, छोड़ देना, क्योंकि, सः सूर्य अभी नलिन्याः कमी के मदना कमलरूपी मुँह से प्रायानम् - जोस कणरूपी अों को, हर्तुम् दूर करने के लिए प्रत्यावृत्तः कोटा हुआ रहता है, त्वयि तुम्हारे ( द्वारा ), करधिकरण के रोके जाने पर अनायसूयः अत्यधिक द्वेष वाले स्यात् हो जायेंगे। =
भावार्थ:- हे मेघ सूर्योदयकाले वलभैः खण्डितानां कामिनीनां नेवा शमनीयं भवत्यतः भानुपयं त्वरितं मुखयतो हि सूर्योऽपि नलिन्या: पाखामारूपम निवारयितुं प्रत्यागतः (भवति) तस्मिन् काले त्वयि तदीयकरावरोधके सति स त्वां प्रत्यधिके भवेत् ।
हिन्दी हे मंघ सूर्योदयकाल में प्रेमियों को अपनी खण्डिता पनियों के आँसुओं को दूर करना रहता है तुम सूर्य के मार्ग को छोड़ देना। क्योंकि वे भी अपनी प्रिया कमनी के कमलपी मुख से आँसू को हटाने के लिए, वापस आते हैं उस समय यदि तुम (उनके) हाथों (किरणों) के बाधक बनोगे तो वे (तुम्हारे प्रति अधिक क्रुद्ध हो जायेंगे।
समासः नवनयोः सलिलं नयनसलिलम् ( ० ० ) कमल मेक =

- बदनम् कमलवदनम् ( रूपककर्मधा० ) तस्मात् न अल्पा अनल्पा] (नन्) अनल्पा अभ्यसूया यस्य स अनल्पाभ्यसूयः (बद्री ० ) ।
कोषः - अयनं व मार्गाश्व इत्यमरः सलिलं मइत्यमरः तृणेऽम्बुजेन वा तु राज्ञि नाले तु न स्त्रियाम् इति शब्दार्णवः प्रालेयं मिहिकाचार्या इत्यमरः । असको कचे पुंसि मणि शोणिते इति मेदिनी । बलिस्तायः, कराः इत्यमरः ।
टिप्पणी- खण्डितानाम्-वैसे तो नायिका के बहुत भेदोपभेद है पर मुख्य आठ भेदों में "afteता" भी एक नायिका का विशेष भेद होता है। "खण्डिता नायिका" उसे कहते हैं जिनके पति रात्रि में किसी दूसरी स्त्री के साथ विहार करते हैं और वह यह जान जाती है कि मेरे पति अमुक स्त्री के साथ रात्रि व्यतीत करते हैं। यहाँ सूर्य अस्ताचल पर जाकर उधर की कमलि नियों के साथ विहार करते हैं अतः इधर की कमलिनियाँ खण्डिता हुई। मैंने हिन्दी एवं संस्कृत दोनों व्याख्याओं में इस बात का संकेत किया है। शान्ति नेयम् - "नी" धातु द्विकर्मक है, अतः "नयनसलिलम्" यह पद यहाँ मुख्य कर्म है एवं "सलिलम्" यह गौणकर्मवाची पद है। प्रत्यावृत्तः प्रति उपसर्गपूर्वक 'वृत्' धातु से "क" प्रत्यय करके "प्रत्यावृतः" ऐसा रूप बनता है। कररुधि- 'कर' उपपदपूर्वक "रु" धातु से विप्रत्यय करके उसका सर्वापहारी लोप करके "कर" ऐसा शब्द बनता है। यह कर उसी शब्द के सप्तमी विभक्ति का है।
अलङ्कार:- यहाँ "भानोः वत् त्यज" इस पुचित बायका उत्तरार्द्ध का वाक्यार्थ हेतु है, अतः "काव्यलिङ्ग" अलङ्कार है और लिङ्ग- समानता से नलिनी में नायिका और सूर्य में नायक का आरोप होने से "समा सोक्ति" अलङ्कार है, एवं "कररुधि" इस शब्द के "कर" में "श्लेय" बलकार है एवं तीनों का अङ्गाङ्गिभाव होने से "शंकर" नामक अलङ्कार है ।। २९॥

गम्भीरयाः पयसि सरितश्चेतसीव प्रसन्ने
छायात्मापि प्रकृतिसुभगो लप्स्यते ते प्रवेशम् ।

तस्मवस्या: कुमुदविशदान्यर्हसि त्वं न धैर्यात्-
मोघीकतु चटुलशकरोद्वर्तन प्रेक्षितानि ॥ ४० ॥ -

- = व्याख्या है ! गम्भीरायाः एतन्नामिकायाः सरितः नद्याः, चेतसि मानसे, इव यथा प्रसन्ने स्वच्छे पयसिजले, प्रकृतिमुभयः शाश्वति- कमनोहरः, ते तर मेघस्वेति यावदः छायात्माऽपि प्रतिविम्वस्वरूपात्माऽपि प्रवेशम् निवेशम् लप्स्यते याप्स्यति तस्मात्तत्कारणात् तस्याः गम्भीराया:, कुमुदविशदानि रोज्ज्वलानि चटुलशफ रोइर्तनप्रेक्षितानि मत्स्पोल्लुण्ठनानि त्वम् मेषः, धैर्याद धीरत्वाद, मोधीकर्तुम् फिलोकम्, न अनि योग्योऽसि ।
= = शब्दार्थ:- (हे मेघ) गम्भीरायाः गम्भीरा नाम की सरितः नदी के चेतसिहृदय दव की तरह निर्मल में प्रकृति सुभगः स्वभाव से सुन्दर ते तुम्हारा, छायात्माऽपि छायारूपी शरीर भी, प्रवेशम् प्रवेश को लप्स्यते प्राप्त करेगा। तस्मात् इस कारण से अस्याः इस गम्भीरा नदी के कुमुदविसदानिकुमुद के समान धवल, पटुलशफरो- इनप्रेशितानि चचल मछलियों के उन्न रूप चितवनों को स्वम् तुम धीरता से गोधीकर्तुम् निष्फल करने मे न अर्हसि समर्थ नहीं हो। = - = = =
अन्वयः - गम्भीरायाः सरितः चेतसि इव प्रसन्ने पयसि प्रकृतिसुभगः मात्मा अपि प्रवेशम्लप्स्यते तस्मात् अस्याः कुमुद विशदानि बटुलशफ रोइन प्रेक्षितानि त्वम् धैयद मोचीकर्तुम् न अर्हसि ।
भावार्थ:- हे मेघ । गम्भीरायाः प्रसन्नहृदय इव स्वच्छे जले प्रतिबिम्ब- रूपेण प्रविष्टो हि त्वं मम्भीरया नया कयाचिदुदात्तनाविकमेव अचलम- पोल्लुण्ठन-रूपेवलो करतो विध्यसे। त्वमपि माथित्य तदवलोकन निष्फली कर्तुम् न समर्थोऽसि ।
हिन्दी - हे मेघ ! गम्भीरा नदी के प्रसन्न हृदय के समान निर्मल जल में छायारूप से प्रविष्ट तुम्हें गम्भीरा नदी किसी उदात्त नायिका की तरह चञ्

मछलियों के उन (छलन) रूपो चितवनों से देखेगी। तुम भी. धीरता का अवलम्बन कर उसके अवलोकन को व्यर्थ मत होने देगा।
समासः प्रकृत्या सुभगः प्रकृति- सुभगः ( वृ० सत्) । छाया चासो आत्मा पछामात्मा (क० पा० ) कुमुदानीय विद्यदानि कुमुदविशदानि ( उपमानकर्म०) चटुखानि च ताति शफरोद्वर्तनानि चटुलसफरोद्वर्तनानि ( कर्मधा० ), वान्यैव प्रेक्षितानिचटुल- शफरोद्वर्तनप्रेक्षितानि ( रूपक० ) ।
कोश:- विलन्तु तो हृदयम् इत्यमरः सुन्दरेऽधिकभाग्ये च दुर्दिनेतर यासरे तुरीयांचे श्रीमति च सुभगः इति शब्दार्णवः सिते कुमुदे कैरवे, इत्यमरः । त्रिषु स्याच्चटु शीघ्रम् इति विश्वः ।
टिप्पणी- प्रकृतिसुमगः- यहाँ 'प्रकृति' शब्द से प्रकृत्यादिभ्यः उपसंख्यानम्' इस सूत्र से तृतीया विभक्ति आती है तब तृतीयासमास होता है। प्रवेश-प्र उपसर्गपूर्वक प्रवेशार्थक 'विश' धातु से पण प्रत्यय करके प्रवेश' ऐसा रूप बनता है। कुमुदविशदानि इस पद का विग्रह तो समास के समय प्रदर्शित किया गया है। यहाँ महोपाध्याय पं० मल्लिनाथजी ने 'कुमुदवत् विशदानि ऐसा विग्रह किया है। यहाँ कुमुद शब्द से तत्र तस्यैव' इस सूत्र से 'पति' प्रत्यय किया गया है, न कि 'तेन तुल्यं क्रिया वेद्वति' इस सूत्र से, और इस सूत्र से 'क्रिया' पद को अनुवृत्ति भी 'तत्र तस्येव' इस सूत्र में नहीं जाती है। अतः 'पति' प्रत्यय होने में कोई अनुपपत्ति नहीं है। कुछ टीकाकार जैसे कि विद्याविनोद, शारदारब्जन राय और संसारचन्द्र जी एवं मोहनदेव पन्त जी इत्यादि विद्वानों ने महोपाध्याय के उपर्युक्त विग्रह का खण्डन किया है, सम्भव है उन्हें 'तत्र तस्येव' यह सूत्र ध्यान में न रहा हो धैर्यात् 'धीर' शब्द से 'ध्यन्' प्रत्यय करके धैर्य यह रूप बनता है। उक्त रूप पश्चमी विभक्ति का है। यहां पन्चमी विभक्ति स्यलोपे कर्मण्यधिकरणे च' इस सूत्र से हुई । यहाँ 'आश्रित्य' इस स्वबन्त पद का लोप हुआ है।
अलङ्कारः- यहाँ 'संकर' नामक अलङ्कार है क्योंकि यहाँ पयः का चेतः से, प्रेक्षितों का कुमुदों के साथ समानता ( सादृश्य ) होने से शाब्दी उपमा

- अन्वयः सखे! प्रातवानीरशाखम् किञ्चित्करधृतम् इव मुक्त-रोधी- नितम्बम् नीलम् तस्याः सवनम् नीत्वा सम्बमानस्य ते प्रस्थानम् भावि ज्ञातस्वादः कः विकृतजपनाम् विहातुम् समर्थः । ४१ ।। व्याख्या हे ससे मित्र प्राप्तवानीराखम् लब्ध- वेतसाम्
हुई एवं गम्भीरा का नायिका के साथ आर्थ सादृश्य होने से यहाँ 'एकदेश विवर्तनी' उपमालङ्कार हुआ और 'कुमुदविशदानि यहाँ यत् इवादि का छोप होने से लुप्तोपमा हुई एवं उद्वर्तनों में प्रेक्षितों का आरोप होने से 'रूपक' अलङ्कार हुआ और इन तीनों का अङ्गाङ्गिभाव संकर है ॥ ४० ॥
तस्याः किञ्चित्करतमिव प्राप्तवानीरशाखं नीत्वा नीलं सलिलसवनं मुक्तरोधोनितम्बम् । प्रस्थानं ते कथमपि सखे ! लम्बमानस्य भागि जातस्वादो विद्युतजधनों को विहातु समर्थः ॥ ४१ ॥
किश्चित्करयुतम् ईषत् हस्तगृहीतम् इव यथा (स्थितम् ), मुक्त-रोधी- नितम्बम् परित्यक्ततटकटि, नीलम् श्यामलम् तस्याः गम्भीराया सलिलसनम् जलाम्बरम् नीत्वा अपहृत्य, लम्बमानस्य = जलभारावनतस्य मेघस्य प्रस्थानम् प्रयाणम् कथमपि केनापि प्रकारेण भावि भविष्यति । यतो हि ज्ञातस्वादः अनुभूतकामिनीसंभोगसुखः कः पुरुषः, विवृतजपनाम् प्रदर्शित-कटि-पूर्वभागाम् विहातुम् त्यक्तुम् समर्थः, योग्यः ।
शब्दार्थ : हे सखे हे मित्र ! प्राप्तवानीराखम्बॅट की शाखाओं को जिसने प्राप्त कर ली है, किञ्चित्करतम् कुछ कुछ हाथ से पकड़े हुए की, इस तरह, मुक्तरोधोनितम्बम् जिसने तटरूपी नितम्ब प्रदेश को छोड़ दिया है (ऐसे ) नील नीले रंग के सलिलसनम् जलरूपी वस्त्रों को, नीला हटाकर लम्बमानस्यजल के भार से अवनत ते तुम्हारा, प्रस्थानम् बनाना, कथमपि किसी प्रकार अर्थात् कष्ट से भावि होगा। (क्योंकि) ज्ञातस्वाद: जिसने स्त्री के संभोग के सुख का अनुभव कर लिया है ऐसे

= = कःकौन पुरुष, विकृत जपनाम् उपड़ी जंघाओं वाली (कामिनी) को, विहातुम छोड़ने के लिए, समर्थः ( होगा ) अर्थात् कोई नहीं।
भावार्थ:- हे मेष ! वेतसशाखाप्राप्ता ईषद्धस्तगृहीतमिव त्यक्त-रूप- नितम्ब कृष्णवर्ण जलरूपवस्त्रमपनीय तब गम्भीरायाः नद्याः प्रस्थानं कष्टेन भविष्यति । यतो हि अनुभूतकामिनी संभोग सुखः कः पुरुष एवं स्यात् म प्रतिघनां मारी त्यक्तुम् (अनुपभोक्तुम् ) समय भवेत्।
हिन्दी - हे मेघ ! समीप तक बेंत की शाखाओं के पहुँचने के कारण कुछ- कुछ हाथों से पकड़े हुए की तरह छोड़ दिया है तटरूपी नितम्ब को जिसने काले रंग के जलरूपी वस्त्र को हटाकर गम्भीरा नदी के पास से तेरा जाता बहुत कठिन होगा क्योंकि जिसने कामिनीसंभोग के सुख का अनुभव कर लिया है ऐसा कौन पुरुष होगा जो उपड़ी जंघाओं वाली स्त्री को छोड़ सकता है ?"
- समासः प्राप्ता वानीराखा बेन तत् प्राप्त वानीर-शाखम् (बहुबी०) 1 करेण धृतम्]करतम् (वृ० त०) रोध एवं नितम्बः रोधोनितम्ब (रूपक) मुक्तः रोधोनितम्बों येन तद् मुक्तिरोधोनितम्बम् ( बहुबी०) सलिमेव वसनं तद् सलिलबसनम् (रूपक० कर्म० ) शातः स्वादो येन सः ज्ञातस्वादः ( बहु० ) विवृतं जघनं यस्याः ताम विवृत जयनाम् (बहुबी०)।
कोश: फूलं रोधश्च तीरच प्रतीरश्च लटं त्रिषु इत्यमरः । नितम्बः भागे कटकटी, इति यादव जयनं स्यात् कटी पूर्वश्रोणिभागा- पराशयो:, इति यादवः ।
टिप्पणी- विवृतम्- "वि" उपसर्गपूर्वक "यू" धातु से बत" प्रत्यय करके "विद्युत" शब्द बनता है। विहातुम्- "वि" उपसर्गपूर्वक (ओ) हा धातु से जिसका "त्याग" अर्थ है "तुमुन् प्रत्यय करके "विहातुम्" ऐसा रूप बनता है। कुछ टीकाकार "विद्वतजनाम्" के स्थान पर "विपुल-जप- नाम्" ऐसा पाठ मानते हैं।
अलंकार:- माँ " करतमिव" इस पद में "उत्प्रेक्षा" रोध में नितम्ब एवं सलिल में वसन का आरोप शाब्दरूपक तथा गम्भीरा में नायिका का

आरोप अर्थरूपक है अतः एकदेशविवर्तिरूपक एवं चतुर्थ चरण के वाक्यार्थ द्वारा ऊपर के तीनों चरणों के वाक्यार्थ का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास " ये तीन अलंकार है। एव उपर्युक्त तीनों अलंकारों का अङ्गाङ्गिभाव होने "शंकर" अलंकार है ।। ४९ ।।
त्वनिष्यन्दोच्छ्वसित — वसुधा - गन्धसंपर्करम्यः स्रोतोरन्ध्र ध्वनितसुभगं वन्तिभिः पीयमानः ।
नीचैः वास्यत्युपजिगमिषोदेवपूर्व गिरि ते शीतो वायुः परिणमयिता काननो दुम्बराणाम् ॥४२॥
अन्वयत्वनिष्यन्दोदसितवसुधा गन्धपरम्पः स्रोतोरनध्वनित सुभगम दन्तिभिः पीयमानः
काननोदुम्बराणाम् परिणमविता शीतो वायुः देवपूर्वम् गिरिम् उपजिगमियोः ते नीचे वास्यति ।

व्याख्या - (हे मेच !) त्वनिष्यन्दो भवति वसुधागन्धसंपर्करम्य=त्वद- वृष्टिवधितपृथ्वीगन्धसंस्पर्शंसुरभिः, श्रोतोरन्द्रध्वनितसुभगम् गुण्डादिशब्द सुन्दरम् यया स्यात्तथा दन्तिभिः = गर्वः पीयमानः प्रायमाणः काननोदुम्ब राणाम् = बन्यहेमदुग्धकानाम् परिणमविता परिपाकविता, पीतः हिमः, वायुः पवनः, देवपूर्वम्"देव"शब्दपूर्वकम् गिरिम् पर्वतम् देवगिरि"- पर्वतमित्यर्थः उपजिगमिषोः विवासोः, ते मेषस्य, नीचैः शनैः, वास्यति= प्रापयिष्यतीत्यर्थः । a
शब्दार्थः त्वनिष्यन्दोलित - वसुधा- गन्धसम्पर्क रम्यः तुम्हारे बरसने के कारण प्रसन्न पृथ्वी के संसर्ग से सुन्दर, सोदोरन्यनित सुभगम् (हाथी 6) के छिद्रों में शब्दपूर्वक जिसका सेवन सुन्दर प्रतीत होता है, दन्तिभिः हाथियों के द्वारा पीयमानः सुँचा जाता, शीतः ठंडी, वायुः हवा, काननोदुम्बराणाम् जंगली मूलरों को परिणमविता पकाने वाली, देवपूर्वम् जिसके पूर्व में "देव" शब्द है ऐसे गिरिम् पर्वत को ( देवगिरि को ) उपजिगमियोः जाने की इच्छा वाले तेतेरे, नीचः नीचे या धीरे, वास्यति बहेगी। = - -


भावार्थ:- (हे मेष !) वृष्ट्युपन हितायनिसौरभसंपन्नं गर्जः शुण्डा छिद्रः सशब्दमात्रायमाणः बन्योदुम्बरफलानां परिणमयिता शीतलः पवनः देवगिरि विमासोस्ते नीचेः वास्यति ।
हिन्दी - हे मेष ! तुम्हारे बरसने के कारण प्रसन्न भूमि के गन्ध के संसर्ग से सौरभयुक्त, गुण्ड के अग्रभागस्य छिद्रों के द्वारा शब्दपूर्वक सूचने में अच्छे हाथियों के द्वारा सूंघा गया, बन के गूढरों को पकाने वाला शीतल पवन तुम्हारे नीचे बहेगा, अर्थात् तुम्हें पंखा झलेगा।
समासः तब निष्यन्दः स्वन्निष्यन्दः ष० त०) तेन सिता (०] तत्०) स्वनिष्यन्दवसिता वासी वसुधा चत्वनिष्यन्दोच्छ्वसितवसुध ( कर्म० ) तस्याः गन्धः (प० तत्०) तस्य सम्पर्क ( ० तत्०) तेन रम्यः स्वन्निष्यन्दोच्छ्वसित वसुधागन्ध-सम्पर्करम्यः (तृ० तद्०) स्रोतसो रन्माणि= स्रोतोरन्याणि (प० उत्) (तत्) काननेषु उदुम्बराणाम्- काननौदुम्बराणाम् (स० त०) देव शब्दः पूर्वो यस्य सः देवपूर्वः ( बहु० )
कोश: स्रोत इन्द्रिये निम्नगारये इत्यमरः । दन्तो यन्तावलो हस्ती द्विरदोऽनेको द्विपः इत्यमरः । उदुम्बरो जन्तु-फलो पाङ्ग हेम दुखकः, इत्यमरः ।
टिप्पणी- उच्छ्वसिता:- उद् उपसर्गपूर्वक श्वस्" धातु से "क" प्रत्यय करके इडादि कर स्त्रीत्व विवक्षा में टापू किया गया है। संपर्क:-"सम् उपसर्गपूर्वक "पृच्" धातु से "घन् प्रत्यय करके "संपर्क" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। त्वनिष्यन्दो० स्रोतोरन्घ्र०ये दोनों समस्तपद क्रिया-विशेषण हैं। परिणमविता यहाँ परि उपसर्गपूर्वक णिजन्त "परिणाम" धातु से कर्ता में तृच् प्रत्यय हुआ है। एवं "मितां ह्रस्व" इस सूत्र से ह्रस्व करके परिणमि बनाकर गुणादि करके "परिणममिता" ऐसा रूप बनता है। देवपूर्वम् गिरिम्- इस प्रकार के प्रयोग संस्कृत साहित्य के बहुत से कवियों के काव्यों में पाये जाते है जैसे कि कालिदास के रघुवंश महाकाव्य के वेंस २९ लोक को देखिये 'दशपूर्वरयं यमाख्यया दशकण्ठारिगुरु विदुर्बुधाः" और महाकवि भारकि

के किरातार्जुनीय महाकाव्य के १८वें सगँ के ४४ में दलोक को देखें-"धनुरूप पदमस्मै वेदमध्यादिदेश" इसी तरह महाकवि माघ के शिशुपालवध के प्रथम सगँके ४२ लोक में "हिरण्यपूर्व कशिपुं प्रचक्षते ऐसा वर्णन है। रघुवंश का उक्त पद "दशरथ" इसको एवं किरातार्जुनीय का पद "धनुर्वेद" को एवं शिशुपाल का पद "हिरण्यकशिपु" को व्यक्त करने के लिए कहा गया है। इसी तरह महाकवि ने यदि "देवपूर्व गिरिम्" ऐसा प्रयोग कर ही दिया तो महो- पाध्यायजी का अवाय वचन "दोष का उद्घाटन प्रयुक्त" प्रतीत नहीं होता।
"देवगिरि" से यहाँ देवगढ़ विवक्षित है न कि 'दक्षिण' में स्थित देवगिरि या दौलताबाद। क्योंकि देवगढ़ जो चम्बल के दक्षिण में मालवा के मध्य में पड़ता है वहीं कार्तिकेवजी का मन्दिर भी है जिसका वर्णन आगे स्वयं कवि करेंगे ।। ४२ ।।
तत्र स्कन्दं नियतवसति पुष्पमेघीकृतात्मा पुष्पासारै: स्नपयतु भवान्व्योमगङ्गाजलाई ।
रक्षाहेतोनंवशशिभूता वासवीनां चमूना- मत्यादित्यं हुतवहमुखे संभूतं तद्धि तेजः ॥ ४३ ॥ ॥
अन्वयः -- तत्र नियतवसतिम् स्कन्दम् पुष्पमेषीकृतात्मा भवान् व्योम जला पुष्पासारैः स्नपयतु तद् हि वासवीनाम् चमूनाम् रक्षा हेतोः नवशिमृता हुतवह मुले, सम्भूतम् बत्यादित्यम् तेजः ।
व्याख्या--तत्र देवगिरी, नियतवसतिम् निश्चितनिवास बन्तम्, स्कन्दम् कार्तिकेयम् पुष्पमेषीकृतात्मा कुसुम वर्षमेषीकृतदेहः, भवान् = मेषः, व्योमगावला देवनदी तौयक्ति, पुष्पासारैः कुसुम-वृष्टिभिः, स्नपयतु अभिषिञ्चतु तत्स्कन्दः वासवीनाम् इन्द्र सम्बन्धिनीनाम् चमूनाम् सेनानाम् रणाहेतोः रक्षणाय नवशशिभूता अभिनवहिमांशु- धारिणा, बमुग्निवदने, सम्मृतम् सञ्चितम् अस्यादित्यम् दिन- करातिशायि तेजः प्रतापः अस्ति, शंकर प्रतिमूर्ति एवास्ति ।


शब्दार्थः तत्र वहाँ देवगिरि पर नियतवसति निश्चित निवास वाले, स्कन्दम् कार्तिकेय को पुष्पमेषीकृतात्मा अपने-आपको फूल का मेघ बना कर, भवान् तुम व्योमगङ्गाजलाई आकाशगङ्गा के जल से fr (भीगे हुए), पुष्पासारैः फूलों की दृष्टि से स्वपयलाओ, तद्वह वासवीनाम् इन्द्र को, चमूनाम् सेनाओं को, रक्षाहेतोः रक्षा के लिए, नवशिभृता नूतन चन्द्रधारी शंकर के द्वारा बह अग्नि के मुख में, सम्भृतम् एकत्रित किया गया अत्यादित्यम् सूर्य का अतिक्रमण करने वाला तेज तेज (ही है) । अर्थात् सूर्य की प्रतिमूर्ति ही है।
- हिन्दी (हे मेघ) उस देवगिरि पर्वत पर अपने-आपको फूल का मेष बनाकर तुम वहाँ निश्चित रूप से रहनेवाले कार्तिकेय को आकाशगङ्गा के जल से गीली पुष्पवृष्टि से नहलाना। वे (कार्तिकेय) इन्द्र की सेना की रक्षा के लिए अग्नि के मुख में शंकर द्वारा एकत्रित किये गये तेज है। अर्थात् शंकर की प्रतिमूर्ति ही है।
भावार्थ: है मेघ तत्र देवगिरीपुष्पमेव विग्रहस्वं पुपसंपा कार्तिकेयमभिषिचतु सः स्कन्दः इन्द्रसम्बन्धिनीनां सैन्यानां रक्षणाय शंकरेण वह्निमुखे सचितं तेज एवास्ति, शंकर प्रतिमूर्ति एवास्तीति भावः ।
समासः नियता वसतिर्यस्य स नियतवसति ( बहु०) तम् पुष्पाणा मेषः पुष्पमेघः ( ब० तद्० ) । अपुष्पमेधः पुष्पमेधः यथा सम्पद्यते तथा कृतः पुष्पमेषीकृतः, तथाविधः आत्मा यस्य स पुष्पमेधीकृतात्मा (बहु० ) । व्योम्नि गङ्गा व्योमगङ्गा (स० तत्० ) तस्याः जलम् (स० त०), तेन आर्द्रा व्योमगङ्गाजला ( तृ० तत्) तैः पुष्याणाम् बासारैः पुष्पासारैः (प० तत्०) नववासी शशी नवशशी ( कर्मधारय) तं विभति इति नवशशिभृत् तेन नवशशिभृता ( उपपद०) । तस्य वह: हुतवहः (१० तत्०) हुतवहस्य मुले हुतवहमुले (प० स०) मादित्यमतिक्रान्तमिति अत्पादित्यम् ( मयूरव्यंसका० ) । = E
कोश: - पार्वनीनन्दनः स्कन्दनः इत्यमरः । धारासम्पात बसारः, ८० दू०

इत्यमरः । वासवो वृत्रहा वृषा इत्यमरः । ईश्वरः ईशानः पिनाकी शशि- शेखरः इत्यमरः ।
टिप्पणी- स्नपयतुणिजन्त "स्नापि धातु से "स्नापयतु" ऐसा प्रयोग बताना उचित था, परन्तु अनुपसर्ग होने के कारण पलास्वनुवमाच" इस सूत्र से विकल्प से मित्व हो जाने के कारण "मिठां ह्रस्व:" इस सूत्र से हस्व होकर "स्नपयतु" ऐसा रूप बना है। वासवीनाम् वासवस्येयं वासवी तासाम्, यहाँ "वासद" शब्द से "तस्येदम्" इस सूत्र से अप् प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके स्त्री- विवक्षा में "डी" होकर "वासवी" ऐसा रूप बनाया जाता है, इसी के षष्ठी विभक्ति के बहुवचन का वासवीनाम् प्रयोग है। कार्तिकेय और हुतवहमुखे सञ्जितम्-तारकासुर के उपद्रव से संत्रस्त देवताओं की रक्षा के लिए "शंकर" जी ने अपना वीर्य अन्ति में स्थापित किया। इसी पौराणिक कथा को आधार बनाकर "हुतवहमुले संभूतं तद्धि तेजः" ऐसा कहा गया। एवन्ध जब उस वीर्य को अग्नि नहीं सहन कर पाये तो उन्होंने उसे सङ्गाबी में डाल दिया, और गङ्गा की लहरों पर तैरता हुआ वह वीर्य स्नान करती छः कृत्तिकाओं के पेट में चला गया; और वे भी तेजाधिक्य के कारण इसे न सह सकीं तो शरकण्डों के वन में उसे डाल दिया। इस प्रकार कृत्तिकाओं के मुख से उत्पन्न होने के कारण उन्हें "कार्तिकेय" कहा जाता है। सरकण्डे के वन में उत्पन्न हुए अतः "शरजन्मा" कहा जाता है।
अलङ्कार:- यहाँ "रूपक" एवं "अर्थान्तरन्यास" ये दो अलंकार है, और दोनों के बङ्गाङ्गिभावतया रहने के कारण "संकर" अलंकार है ।। ४३ ।

ज्योतिलेखालय गलितं यस्य वहं भवानी पुत्रप्रेम्णा कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति ।
धौतापाङ्ग' हरशशिचा पावकेस्तं मयूरं पश्चाद्रि - ग्रहण - गुरुभिर्गजितैनंतयेयाः ॥ ४४ ॥
अन्वयः -- ज्योतिर्हेखावलयि गलितम् पस्य वम् भवानी पुत्रप्रेम्णा

- व्याख्या ज्योतिलाल कान्ति राजमण्डलम् गलितम् स्तम् पतितमिति भावः । बर्हपिच्छम् भवानी गौरीपुत्रप्रेण सुतस्नेहेन नीलकमलपत्रप्राप्यम्, यथा स्यात्तथा कर्णे कर्णे, करोति आदधाति । हरशशिराचा शिवशशित्विया धौतापाङ्गम् प्रवतितनयन- प्रान्तम् पावके कार्तिकेयस्य तम् वर्णितम्, मनूरम्बर्हिणम् पश्चात् - स्कन्दाभिषेकानन्तरम् अद्रिग्रहणगुरभिः देवगिरि प्रतिध्वनिवद्विगुणि गजितः स्तनितः, नर्तयेयाः नृत्यद्वारय
शब्दार्थ:- ज्योतिलेखालय कान्तिवाली रेखाओं के मदन से युक्त, गलितम्-गिरे हुए, पस्य जिसके बहंम् पंख को भवानी पार्वती पुत्र- प्रेम्णा पुत्र प्रेम के कारण कुवलयदलप्रापि नील कमल के पत्रों से युक्त, कर्णे कान में, करोति पहनती है। हरशशिचा शंकरजी के मस्तकस्थ चन्द्रमा की कान्ति से, धोतापाङ्गम् धुल गये हैं (श्वेत हो गये हैं) ने कोरक जिसके पावके कार्तिकेय के तमु उस मरम्= मोर को पचात् कार्तिकेय के अभिषेक के बाद, अधिग्रहणगुरुभिः देवगिरि की प्रतिध्वनि से बड़े हुए, गजित गर्जनों से मर्तयेयाः नचाना । = =
कुवलयदलप्रापि कर्णे करोति हरशशिरुपा धौतापाङ्गम् पावकैः तम् मयूरम् पश्यत् अद्रिग्रहणगुरुभिः गर्जितः नर्तयेथाः ।
भावार्थ:- हे मेघ ! स्कन्दाभिषेचनानन्तरं कान्तिपङ्क्तिमाि यस्य पिछे पार्वती सुतस्नेहेन भीलपद्मपत्रापि श्रोत्रे धारयति यस्यापा शिवाशिषन्द्रिका धवलितमस्ति कार्तिकेयस्य तं मयूरं देवगिरिप्रतिध्वनि- बद्धित गजित नर्तयेमाः ।
हिन्दी है मेप ! कार्तिकेय को पुष्पवृष्टि से नहला चुकने के बाद कान्ति वाली रेखाओं के मण्डलों से युक्त गिरे हुए जिसके पंख को पार्श्वती पुत्र प्रेम से नीलकमल के पत्तों से युक्त कानों में पहनती है एवं जिसकी आंखों की कलियाँ शिवजी के चन्द्रमा की चन्द्रिका से श्वेत हो गयी हैं, कार्तिकेय के उस "मयूर" को देवगिरि के प्रतिध्वनि से बढ़े हुए गर्जन से मचाना।

टिप्पणी- कुवलयदलप्रापि समास की पति के अलग-अल करने से अर्थ भी अनेक प्रकार के उक्तपद के हैं जैसा कि मैंने ऊपर किया है। उस व्युत्पत्ति के अनुसार कमलदल के साथ जिसे धारण करती है" ऐसा अर्थ होता है। (१) यदि कुवलयदलं प्राप्नोति इति कुवलयदलप्राप्" ऐसा विग्रह करके "कर्णे" इस सप्तम्यन्त पद का विशेषण माना जाय तो इसका अर्थ होगा 'कुवलय के पत्तों को छोड़कर जिसे पहनती हैं।" (३) कोई-कोई मूल के प्रापि" इस पाठ के स्थान पर "क्षेपि" ऐसा पाठ मानते हैं, उसके अनुसार अर्थ होगा "कुवलयदलं क्षिपतीति कुवलयदलक्षेपि" कुछ लोग "प्रापि" के स्थान पर "स्पधि" ऐसा पाठ मानते हैं, कुवलयदलं स्पर्धेते तच्छीलमस्यास्तीति" "कुवलयदलस्पधि" इस विग्रह के अनुसार अर्थ होगा "नील कमल के पत्तों से स्पर्धा करने वाला" इत्यादि । पावकिः पावकस्यापत्यं पुमान्पावकिः, यहाँ "पावर" शब्द से "अत इन्"इस सूत्र से "इन् प्रत्यय किया गया है। नर्तयेथाः गावविक्षेपायक "नृत्" धातु से शिच करके ललकार के मध्यम पुरुष एकवचन का यह रूप है। यद्यपि यहाँ भिजन्त "नृत्" अकर्मक होते हुए भी चिवान् कर्ता से युक्त है अतः "अणावकम्मैकाच्चितवत्कर्तृकात्" इस सूत्र से, पचनार्थक होने से "निगरण चलनायॅम्पश्च" इस सूत्र से परस्मैपद होना चाहिए था, परन्तु "न पादभ्यासपरिमुहरुचिवृत्तिवदवसः " इस सूत्र से निषेध हो गया और "विश्व" इस सूत्र से आत्मनेपद हो गया ।। ४४ ।।

आराध्यैनं शरवणभवं देवमुल्लङ्घिताध्वा सिद्धद्वन्द्वैर्जलकण - भयाद्बोणिभिर्मुक्तमार्गः ।
व्यालम्बेथाः सुरभितनयालम्भन मानयिष्यत् स्रोतोमूर्त्या सुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम् ॥४५॥

अन्वयः - एनम् शरवणभवम् देवम् आराध्य वीणिभिः सिद्धः जलकण- भात् मुक्तमार्गः उल्लङ्घिताच्या सुरभितनयाऽसम्भजाम् भुवि स्रोतोमू परिणताम्रन्तिदेवस्य कीर्तिम् मानयिष्यन् व्यात्तम्बेयाः ।

- = व्याख्या एनम् = पूर्वोसम् शरवणभवम् बाणतृणारण्यजातम्, देवम्= मुरम् कार्तिकेयमिति भावः वाराध्य सम्पूज्य, बीणिभिः = वीणाद्भिः सिद्धः
जलकणभयात् = तोयविन्दुभीते मुक्तमार्ग: उमटावा, (सन् ) उल्लपिताध्या निस्तृतपणः सुरभि तनयाऽऽलम्भजाम् = गवालम्भन जाताम, भुवि भवन, सोतोय नदीरूपेण परिणताम् परिवर्तिताम् रन्तिदेवस्य एतनामकस्य दापुर- नरेशस्य कीर्तिम्यशः 'चर्मवती' नाम्नी नदीमित्यर्थः मानविष्यन् = = = =
शब्दार्थः एनम् = पहले कहे गये, शरवणभवम् सरकण्डों के वन में उत्पन्न देवम् देवता की अर्थात् कार्तिकेय की आराध्य आराधना करके, बीणिभि: वीणाधारी, सिद्धइन्द्रःसिद्धों के जोड़ों द्वारा, जलकणभयात्- जल-कण के भय से व्यक्तमार्गः जिसका मार्ग छोड़ दिया गया है, उल्लषि- साध्या जिसने अपना मार्ग तय कर लिया है (ऐसे तुम ), सुरचितनया- सम्भजाम् गौओं के बलिदान से (गोमेयश से) भुवि पृथ्वी पर उत्पन्न, स्रोतोमूर्त्या नदीरूप से, परिणताम् परिणत, रन्तिदेवस्य इस नाम के दशपुर के राजा के, कीर्तिम्यथ को, अर्थात् "वर्मण्वती" नदी को मान- मिष्यन् सस्कृत करते हुए, म्यालम्बेषाः नीचे उतरना ।
भावार्थ है मेथ ! पूर्ववणि भगवंत कार्तिकेयं संपूज्य वीणावद्भिः सिद्ध- मिथुनः तोयपतनभयात् परित्यतपयः अतिकान्ताध्या (त्वम् ) दशपुरनरेशस्य यशोमूर्ति गवालम्भनोद्भवां घूमौ नदीरूपेण परिणतां चर्मण्वत सत्कुर्वन् नीचैः अवतरे: ।
हिन्दी - हे मेघ पहले कहे गये कार्तिकेय की पूजा करके, वीणाधारी सिद्धयुगलों ने जिसका मार्ग छोड़ दिया है एवं जिसने मार्ग पार कर लिया है ( ऐसे तुम ) यज्ञ मे गोनों के बलिदान से उत्पन्न, पृथ्वी पर नदीरूप में परिणत रन्तिदेव नामक दशपुरनरेश को कीर्तिमूर्ति, चर्मण्वती" का सत्कार करते नीचे

समासः शरवणे भयो यस्य तम्शरवणभवम् (व्यधिकरण )। जलस्य कणाः जलकणा: ( प० तत्०) तेभ्यः भवात् जलकणभयात् (प० तत्० ) । त्यक्तः मार्गों यस्य सः त्यक्तमार्ग (बहुबी०) उल्लङ्घता येन सउल्लपिताच्या (बहुवी०) सुरभेः तनयाः सुरभितनयाः (प० सत्) तासामू आलम्भनम् सुरभितनयालम्भनम् (तत्) तस्मात् जानाम् सुरभितनयासम्भवाम् (प० द०) । स्रोतसः मूर्तिः स्रोतोमूर्तिः (प० तद) तथा
= टिप्पणी- शरवणभवम् भवनं भवं "भू" धातु से दोरप्" इस सूत्र से धातु के उकारान्त होने के कारण अप प्रत्यय किया गया है। शरवण पद-पटक "बन" शब्द के नकार को "प्रविरन्तः शरेच्छुलाकाष्यंदिर- पीयूषक्षाम्पोसंज्ञायामपि" इस सूत्र से णत्व हो गया है। वीणिभिः वीणा अस्त्येषामिति "वणितः " यो "वीणा" शब्द से "वीह्मादिभ्यम" इस सूष से "इनि" प्रत्यय करके "वीणिन्" शब्द बना है। उल्लङ्घितः "उद्” उपस पूर्वक 'लचि' धातु से कर्म में 'क' प्रत्यय करके इडादि करके "उल्लिङ्घित" शब्द निष्पन्न होता है। मानयिष्यन् – विजन्त "मानि" धातु के लूट डकार के शतृ प्रत्ययान्त उक्त शब्द है। व्यालम्बेथाः "बी" एवं "बाहु" उपसर्ग-- पूर्वक "fe" धातु के लिङ् लकार के मध्यमपुरुष के एकवचन का यह रूप है। रन्तिदेवः प्राचीन समय में भरतवंश में उत्पन्न संस्कृति के पुत्र रन्ति- देव" मे यह दशपुर के राजा थे। ये बहुत बड़े याजिक, दानी एवं प्रतापी थे। इन्होंने ही कबूतर की प्राणरक्षा के लिए अपना मांस काटकर बाज को दिया था। "ब" -
कोश:- शरो वाणे वागतृणे इति शब्दार्णवः शरजन्मा षडाननः, इत्यमरः अनं वर्त्ममार्गध्व इत्यमरः सुरभिविच स्त्रियाम् इत्यमरः ।
अलङ्करः यहाँ कोटि में एवं चर्मण्वती नदी में भेद होने पर भी अभेदेन वर्णन होने के कारण "अतिशयोक्ति" नामक अलङ्कार है ।। ४५ ।।
स्वय्मादातु जलमवनते शाङ्गिण वर्णचौरे तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात्प्रवाहम् ।

व्याख्या - शाङ्गिणः श्रीकृष्णस्य वर्णचोरे कान्ति चौरे, समान वर्णके इति भावः त्वयि मेथे, जलम् = तोयम्, भादातुम् ग्रहीतुम् अवनते सम्बते सति पृथुमपि स्थूलमपि दूरभावात् विप्रकृष्टत्वात् तनुम् सूक्ष्म- मिवाभासमानम् तस्या:पूर्वकथितायाः, सिन्धोः एतन्नामिकायाः नद्याः प्रवाहम्वेगम्, गगनगतयः खेचराः सिद्धादयः इत्यर्थः, दृष्टीः नेत्राणि, आवय संनियम्य, एकम् एकयष्टिकम्, स्थूलमध्येन्द्रनीलम् पृथुमध्यमणी भूतेन्द्रनीलम् भुवः पृथिव्याः मुक्तागुणम् मौक्तिकहारम् इव यथा नूनम् अवश्यम् प्रेक्षिष्यन्ते अवलोकयिष्यन्ति । =
प्रेक्षिष्यन्ते गगनगतयो नूनमावज्य दृष्टी- रेकं मुक्तागुणमिव भुवः स्थूलमध्येन्द्रनीलम् ॥ ४६ ॥
अन्वयः - शाङ्गिणः वर्णचौरे त्वयि जनम् आदातुम् अवनते पृयुमपि दूर- भावात् तनुम् तस्या: सिन्धोः प्रवाहम् गगनगतय दृष्टी आवर्ज्य एकम्  मुक्तागुणम् इव नूनम् प्रेक्षिष्यन्ते ।
शब्दार्थ:- शाङ्गिणः श्रीकृष्ण के वर्णचौरे रंग को पुराने वाले अर्थात् श्यामरंगवाले व्यथितुम्हारे जलम् जल आदातुम लेने के लिए, अवनते नीचे झुकने, ( उतरने पर ) पृथुमपि विशाल होने पर भी, दूर- भावाद दूर होने के कारण, तनुम् छोटे से दीखने वाले, तस्याः उस पहले कही गयी, सिन्धो: सिन्धु (चर्मण्वती नदी के प्रवाहम् प्रवाह को गगन- गतयः आकाशचारी सिद्धगन्धर्वादि, दृष्टी नजरों का (लों को ). आवज्यै केन्द्रित कर एकम् एक नदी वाली, स्थूलमध्ये नीलम् जिसके बड़े मणियों के मध्य एक इन्द्रनीलमणि लगा है (ऐसे) भुव:पृथ्वी को मुक्ता- गुणम् मोती की माला के इव समान, नूनम् अवश्य प्रेक्षिष्यन्तं देखेंगे। = = = = = = = = =
भावार्थ: है मेघ कृष्णसमानवर्णके त्वयि तोयाऽऽदातुमवनते सति गगनचारिणः सिद्धादयः विशालमपि विप्रकृष्टत्वाद् सिन्धो तनुमिव प्रतीयमानं प्रवाहम्, एकष्टिकामिन्द्रनीलमणियुक्तां पृथिव्याः माचामि त्वां दृष्टी नियम्य शिष्यन्ते ।

हिन्दी है मेष! श्रीकृष्ण के समान नीले रंग के तुम्हारे जल लेने के लिए उतरने पर, गगनवारी सिद्धगन्धवदि विशाल होने पर भी दूर होने के कारण छोटे से दीखने वाले सिन्धु नदी के प्रवाह को मध्यमणीभूत इन्द्रनील मणिवाली एक लरी की पृथ्वी की मोती की माला की तरह तुम्हें दृष्टि केन्द्रित कर अवश्य देखेंगे।
समासः गगने गतिर्वेषान्ते गगनगतयः ( बहु० ) मध्यवासी इन्द्र नील: --- मध्येन्दनील: (फर्मधारय) मध्येन्द्रनीलो यस्य तम्-स्थूलमध्येन्द्र- नीलम् (बहु०) मुक्तायाः गुणम् मुक्तागुणम् [ष० तत्पु० ) । वर्णस्य चौर:- वर्णचरः तस्मिन् ( ० ० ) ।
कोश: चापः शरैस्तु प्रत्यमरः । विशटं पृथु वृहद्विशाल पृ महत् इत्यमरः । स्काल्पलका कुशं तनु इत्यमरः ।
टिप्पणी- शाङ्गिणःस्य विकार:" इस विग्रह में शृङ्ग शब्द से "लस्य विकार:" इस सूप से अण प्रत्यय करके वृद्धिरपरत्वादि करके था' ऐसा होता है और स्यास्तीति" इस विग्रह में """ शब्द से "" इस सूत्र से "इनि" प्रत्यय करके शाङ्गिन्"। ऐसा शब्द निष्पन्न किया जाता है। उस रूप इसी शब्द के विभक्ति के एक वचन का है। चौर:- इस शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जा सकती है। (१) चोरणं पूराः स्य अर्थ में विद्यमान पुर" धातु से "अव्ययाद" इससे अप्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टापू करेंगे एवच चुरा शीलमस्याः स्तीति इस विग्रह में इस सूत्र से ""प्रत्यय करके "चोर" शब्द बनाया जा सकता है। (२) दूसरी व्युत्पत्ति "चोरयतीति चोर चोर एव चौर:" ऐसी भी हो सकती है। स्वायिक जिन्त "चोर" धातु से कर्त्ता में बच् प्रत्ययादि करके "चोर" शब्द बना लेंगे और उसी से स्वायं में "प्रज्ञादिभ्य" इस सूत्र से "चोर" ऐसा रूप बनाया जा सकता है।
अलंकार:- यहाँ "एक के वर्ण का दूसरे द्वारा चोरी होना" रूप असम्भव वस्तुसम्बन्ध होता हुआ वाहों के वर्णसाम्य का प्रतिपादन करने के

- तामुतीयं व्रज परिचित भ्रूलताविभ्रमाणां पक्ष्मोत्पादुपरि विलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् । कुन्दक्षेपानुगमधुकर - श्रीमुषामात्मविम्बं पात्रीकुर्वन्दशपुरवधूनेत्र कौतूहलानाम् ॥ ४७ ॥
कारण निदर्शना अलंकार है। काले रंग के मेघ से युक्त सिन्धु (चर्मण्वती ) के प्रवाह में स्मणियों के मध्यमणीभूत इन्द्रनील मणि वाले हार की संभा बना पृथ्वी के कण्ठ में की गई है, अतः उत्प्रेक्षा" अलंकार हुआ उत्प्रेक्षा वाचक शब्द यहाँ "नूनम्" है।
इस प्रकार यहाँ दोनों अलङ्कारों का बहुगागभाव होने से "सर" मलद्वार है ।। ४६ ।।
अन्वयः -- ताम्] उत्तीर्व आत्मबिम्बम् परिचितलताविभ्रमाणाम् पमो स्क्षेपात् उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् कुन्दक्षेपानुगमधूरश्रीमुषाम् दशपुर- वधूने कोतुहलानाम् पात्री कुर्वन् ब्रज
व्याख्या ( हे मेघ) ताम्चर्मण्वतीम् उत्तीर्य पारङ्कृत्वा, आत्म- बिम्बम्स्वस्वरूपम् परिचित भ्रूलताविभ्रमाणाम् अवगतचल्लीविलासा- नाम्, पक्ष्मोत्पादनेषलोमोप्रमनात् उपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् = ऊर्ध्वभाग विराजितनील बलकान्तीनाम् कुन्दक्षेपानुगमधुकरश्रीमुषाम् = पुष्पेतस्ततः गमनानुगभ्रमरं शोभापहारिणाम्, दशपुरवधूने कौतुहलानाम्रन्ति- देवनगरी वनिताशि- कौतुहलानाम् पात्रीकुर्वन्भाजनीकुर्वन् व्रज गच्छ =
शब्दार्थ: है मेघ ताम उस चर्मण्वतीनदी को उत्तीर्य पार करके, आत्मविम्बम् अपनी मूर्ति को परिचितधूलताविभ्रमाणाम्जो लताओं के विलास से परिचित है, पक्ष्मोत्पालकों को ऊपर उठाने के कारण, उपरि- विलकृष्णशारप्रभाणाम्= ऊपर विराजमान काले, लाल तथा सफेद कान्ति से सम्पन्न हैं (ऐसे), कुन्दक्षेराऽनुगमधुकर श्रीमुषाम् कुन्दपुष्प के ऊपर इधर-उधर घूमनेवाले भौरों की शोभा को चुराने वाले हैं, दशपुरवधूने कौतुहलानाम्

रन्तिदेव राजा की नगरी की स्त्रियों के नेत्रों की अभिलाषाओं का पात्री- कुर्वन्भाजन बनाते हुए, जाना।
भावार्थ: है मेथ! त्वं चर्मण्वती नदीमुत्तीय स्वात्मबिम्बमवलोकनाय ऊम्बनिनां धूविलासज्ञानां दशपुरवनितानां नेत्राणां कौतूहल- विषयीकुर्वन् गन्छ ।
हिन्दी - हे मेघ ! उस चर्मण्वती नदी को पार कर अपनी मूर्ति को, विलास से परिचित, पलकों को ऊपर उठाने के कारण ऊपर विराजमान काले, लाल तथा सफेद कान्तियों से युक्त कुन्दपुष्प पर इधर-उधर घूमने वाले भ्रमरों को शोभा को चुराने वाले दशपुर की नारियों के नेत्रों को अभिलाषाओं का पात्र बनाते हुए जाना ।
समासः - आत्मनः बिम्बम् आत्मबिम्बम् ( ष० त०) ध्रुवः लता इव धूलता (उपमितकर्मधारय ) लतानां विभ्रमाः = धूलताविभ्रमाः ( ष० त०) परिचिता श्रृताविभ्रमा येषु तानि परिचरितलताविप्रमाणि तेषाम् (बहुव्री०) पक्ष्मणाम् उत्क्षेपः पक्ष्मोत्शेपः (प० त०] ) तस्मात् । कृष्णाच ताः शाराः कृष्णशाराः (कर्मधारय ) उपरिविलसन्त्य ( सुसुपेति- समासः) उपरिविलसत्यः कृष्णशाराः प्रभा येषां तानि तेषाम् उपरिविस- सत्कृष्णशारप्रभाणाम् (बहुव्रीहिः) । दशपुराणि यत्र तत् दशपुरम् (बहुवी० ) ।
कोशः- पक्ष्म सूत्रे च सूक्ष्म जिवलोमनि इति विश्वः कृष्ये नीलम कालश्यामल मेचकाः इत्यमरः । कृष्मरक्षिताशारा, इति यादवः । माध्यं कुन्दम् इत्यमरः । वधूजयानुषा स्त्रीच इत्यमरः ।
टिप्पणी-उत्तीर्य - उद् उपसर्गपूर्वक प्लवन और संतरण" अर्थ में विद्यमान "" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान में "स्यम्" करके ऐसा रूप बनता है। उत्क्षेपः-"उद्" उपसर्ग-पूर्वक क्षेपणार्यक "क्षप्" धातु से भाव में "घ" प्रत्यय करके "उत्क्षेप" ऐसा रूप निष्पन्न किया जाता है। कृष्णशाराः यहाँ जो कर्मधारय समास कृष्णाच ताः शारा: " किया गया है वह दोनों पद के वर्णवाची होने कारण "वर्णों वर्णन" इस सूत्र से किया गया है।


- श्रीमुषाम्- [श्रमुष्णन्ति इति श्रीमुद्" तेषाम् । यहाँ स्तेयाक "मुष्" धातु सेवि प्रत्यय किया जाता है परन्तु उसका सर्वापहारी लोप हो जाता है। पात्रीकुर्वन् अपात्र पात्रं यथा सम्पद्यते" इस विग्रह में पात्र शब्द से अभूततद्भाव अर्थ में "वि" प्रत्यय करके "कृ" का अनुप्रयोग करके श प्रत्यय लाकर "पात्रीकुर्वन् ऐसा रूप बनाया जाता है।
अलङ्कारः--यहाँ कुन्द पुष्प सफेद, उसी तरह दशपुर-वधुओं के नेत्र भी सफेद एवं उस फूल पर धमर काला है, उसी तरह आंखों की पुतलियाँ भी काली हैं, इसलिए यहाँ "उपमा" अलङ्कार है ॥ ४७ ॥
ब्रह्मावर्त जनपदमचच्छायया ग्राहमान: क्षेत्रं क्षत्रप्रघन-विशुनं क्षत्रप्रघन- पिशुनं कौरवं तद्भजेथाः । राजन्यानां शितशरशतंयंत्र गाण्डीवधन्वा धारापातस्त्वमिव कमलान्यभ्यवर्षन्मुखानि ॥ ४८ ॥
अन्वयः - 'अथ ब्रह्मावर्तम्' जनपदम् छायया गाहमानः प्रधनपिनम् कौरवं क्षेत्रम् भजेथाः । यत्र गाण्डीवधन्वा तिसरयातः राजन्यानाम् मुखानि द्वारा पार्टी कमलानि त्वम् इव अभ्यवर्षद
व्याख्या - अथ अनन्तरम् ब्रह्मावर्तम्ब्रह्मावर्तनामानम् जनपदम् देशम्, छायया अनाप-मण्डलेन गाहमानः प्रविशन् प्रधनपिनम् राजन्य- रण सूचकम् तत् प्रसिद्धम् कौरवम् कुरुसम्बन्धि क्षेत्रम् स्थानम्, कुरुक्षेत्र- मित्यर्थः, भजेयाः = गच्छेः । यत्र कुरुक्षेत्रे, गाण्डीवधन्वा अर्जुनः । शितयार शतैः प्रत्यन्ततीक्ष्णवाणसहस्रैः राजन्यानाम् नृपानाम्, योद्धानामिति भावः । • मुखानिवदनानि, धारापतः = आसार, कमलानि पद्मानि त्वम्= मेघः इ यथा, अभ्यवर्षदभिमुखं दृष्टवान् बाणप्रहारैः शिरांसि पातयामासेत्यर्थः । =
शब्दार्थः अथ पञ्चात् ब्रह्मावर्तम्ब्रह्मावर्त नामक जनपदम् देश को, छायाछायारूप से, ग्राहमानः प्रविष्ट होता हुआ, क्षत्रप्रधनपिशुनम् - अत्रियों के युद्ध को सूचित करने वाले उस प्रसिद्ध कौरवम् कुरुवंशियों के, क्षेत्र स्थान को अर्थात् कुरुक्षेत्र को भजेाः प्राप्त करना यत्र जहां गाण्डीव

धन्वा अर्जुन ने शितवारयतः वस्पतीक्ष्ण बाणों के द्वारा राजन्यानाम् राजाओं के, मुखानि शिरों पर धारासारः मूसलाधार वृष्टि के द्वारा, कम- लानि = कमलों पर त्वम् मेघ की इस तरह अभ्यवर्षतु वर्षा की दी अर्थात् अत्रियों के मस्तकों को बेच डाला था।
समासः क्षत्राणां प्रधनं त्रप्रधनम् ([ष० त०) तस्य पिशुनम् प्रधनपिनम् (तत्) शिवाय ते शराः शितशराः (कर्म० ) तेषां शतानि ते ( प० तद् ) शितशरशतैः । गाण्डीवं धनुर्वस्य गाण्डीवधन्वा (बहू वीहिः) धाराणां पाठाः धारापाता (प० त० ) =
भावार्थ:- हे मेथ! पञ्चाद छापा-रूपेण ब्रह्मावर्तनामकं देशं प्रविश्य कौरव-युद्ध सूचक-कुरुक्षेत्रं गच्छ पत्र अर्जुनः स्वीणवाणसह प्रतिभटानो शिरांसि धारापात यया त्वं कमलानि पातयसे तथैव पातयामास ।
हिन्दी - है मेथ! उसके बाद छायारूप से ब्रह्मावर्त देश में प्रवेश करते हुए तुम, क्षत्रियों के युद्ध को आज भी जो सूचित कर रहा है, उस प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र को जाना। जहाँ अर्जुन ने अपने असंख्य तीखे बाणों के द्वारा क्षत्रियों के मस्तकों को उसी तरह काट गिराया था जिस तरह तुम मूसलाधार वृष्टि के द्वारा कमलों को गिराते हो।
कोश:-- नीवृज्जनपदो देशः इत्यमरः । युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्रवि- दारणम् इत्यमरः । कपिध्वजस्य गाण्डीवगाण्डिवो पुन्नपुंमको इत्यमरः । मूर्धाभिषिक्तो राजन्यः इत्यमरः ।
टिप्पणी- ब्रह्मावर्तम् आवर्तनं आवर्त "आह" उपसर्गपूर्वक वर्तनार्थक "बुद्" प्रातु से भाव में पत्र प्रत्यय करके "आवर्त "शब्द निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ "सृष्टि" है। ब्रह्माण: आवर्तः यस्मिन् सः ब्रह्मावर्तः देश-विशेषः ग्राह मान:- विलोक्न अर्थ में विद्यमान "गाई' धातु से सट्लकार के स्थान पर "सटः शतृशानच" इस सूत्र से "शानच् प्रत्यय करके मुडादि करके “गाहमानः " ऐसा रूप बनता है। कौरवं तद्भजेयाः यद्यपि इस श्लोक में “यद" शब्द के पाठ के बिना भी "तद्" शब्द का प्रयोग है. एवच साहित्यिकों ने ऐसे स्थल पर सामान्य रूप से "विधेयाऽऽविमर्श'' नामक दोष को माना है; क्योंकि "यद्


और तद्" शब्द का नित्य सम्बन्ध होता है। तथापि कुछ ऐसे स्थल भी होते है, जहाँ "पद्" शब्द की अपेक्षा किये बिना भी "तद्" शब्द के प्रयोग से दोष नहीं आता। इसमें प्रमाण आलङ्कारिकों की निम्नलिखित पंक्ति है— "क्रान्तसिद्धानुभूताकत छन्दो यच्छन्दोपादानं नापेक्षते" इति । इसका अर्थ है कि "प्रक्रान्त अर्थात् पूर्ववणित पदार्थ में प्रसिद्ध अर्थ में और अनुभूत अर्थ में प्रयुक्त तद्' शब्द 'यद की अपेक्षा नहीं करता। अतः यहाँ प्रसिद्ध अर्थ में "" शब्द के प्रयोग होने के कारण उक्त दोष नहीं है।
कौरवम्- कुरूणामिदं कौरवम् यहाँ "कुछ" शब्द से "तस्येदम्' इस सूत्र से "अ" प्रत्यय करके वृद्धयादि करके "कौरवम्" ऐसा रूप निष्पन्न किया गया है। कुरुक्षेत्र:- यहाँ पाडवों और कौरवों का प्रसिद्ध "महाभारत" युद्ध हुआ या परशुरामजी ने वहीं पर २१ बार क्षत्रियों को निर्मूल करने के अभिप्राय से उनका संहार कर "स्यमन्तपञ्चक" क्षेत्र की स्थापना की थी गाण्डीवम्- गाण्डी ग्रन्थिः अस्यास्तीति गाण्डीवम्, यहाँ "गाण्डी" शब्द से "गाडगा संज्ञायाम्" इस सूत्र से "ब" प्रत्यय हुआ है, क्योंकि यह अर्जुन के धनुष की संज्ञा है शितम् "शो तनूकरणे" इस धातु से "क" प्रत्यय करके "शाच्छोरन्यतरस्याम्" इस सूत्र से विकल्प से इत्व हुआ है। राजन्य:- राज्ञामपत्यानि इस विग्रह में "राजन्" शब्द से "राजश्वसुराद्यत्" इस सूत्र से यत् प्रत्यय हुआ है एवं "ये वाऽऽभावकर्मणोः " इस सूत्र से "टी" (अनु) को प्रकृतिभाव हो गया, तब "राजन्य" ऐसा रूप बना है।
अलंकार:- यहाँ अर्जुन की बाणवृष्टि की तुलना मेघ की जलदृष्टि से की गयी है, अतः उपमा" अलङ्कार है ।। ४८ ।

हित्वा हालामभिमतरसां रेवतीलोचनाका
बन्धुप्रीत्या समर-विमुखो लागली याः सिषेवे ।
कृत्वा तासामभिगममपां सौम्य सारस्वतोना-
मन्तः शुद्धस्त्वमपि भविता वर्णमात्रेण कृष्णः ॥ ४९ ॥

। अन्वयः - बन्धुप्रीत्या समरविमुखः लाङ्गली अभिमतरसाम् रेवतीलोच- नाम् हाला हित्वा याः सिषेवे हे सौम्य ! त्वम् अपि तासाम् सारस्व- तीनाम् अपाम् अभिगमम् कृत्वा अन्तःशुद्धः वर्णमात्रेण कृष्णः भविता ।
- व्यायाप्रीत्या संबन्धिस्नेहेन न तु भीखपा, समरविमुखः युद्धपराङ्मुखः, लाङ्गली बलरामः, अभिमतरसाम् इष्टस्वादाम् रेवतीलोप- नाङ्काम् = स्वप्रियानयनाङ्किताम् हाला मदिराम, हित्वा क्वा सरस्वत्यापः सिषेवे सेवितवान्' पावित्यर्थः हे सौम्य ! हे भद्र! त्यम् 1. मेघः अपि तासाम् पूर्वकथितानाम् सारस्वतीनाम् सरस्वती संबन्धिनीनाम् अपाम्= तोयानाम्, अभिगमन् सम्मुखगमनम्, पानमित्यर्थः कृत्वा - विधाय अन्तः शुद्धः निर्मलान्तःकरणः सन् वर्णमात्रेण शारीरिकरूपेय, कृष्णः क्यामः नतु हृदयेनापि कृष्णः पापी इति भावः । भविता भविष्यसि ।
शब्दार्थः बन्धुत्यान्यप्रेम से, चूंकि कौरव-पाण्डव संबन्धी ये इस स्नेह से न कि भय से समर विमुखः युद्ध से विमुख, लाङ्गली बलराम ने अभिमतरसाम् इष्टस्वादवाली रेवतीलोचनाम्-अपनी प्रिया की आंखों ( की छाया ) से चिह्नित हाला मंदिरा को हित्वा छोड़कर, या जिसका ( सरस्वती के जल का ) सिषेवे सेवन किया था, अर्थात् पान किया था हे सौम्य है भद्र, तुम अपि भी, तासामू उस सारस्वती- नाम सरस्वती के अपाम् जनों का अभिगमम् सेवन कृत्वा करके उसका पान करके, अन्तः शुद्धः-निर्मलानाःकरण वाले होकर, वर्णमात्रेण केवल रंग से न कि हृदय से भी कृष्णः श्यामवर्ण के भविता हो जाओगे । - = = =
भावार्थ: हे सौम्य ! बान्धव प्रेम्णा समरपराङ्मुखो हलधरः अभीष्ट स्वादां स्वप्रियानयनप्रतिविम्बितां मदिरां त्यक्त्वा याः सारस्वती अपः पपो स्वमपि तेषां सारस्वतीनाम् अपां पानं कृत्वा निर्मलान्तःकरणः सन् रूपेणैव ( न तु हृदयेन ) श्यामो भविता ।
हिन्दी हे सम्बन! बान्धव-स्नेह के कारण युद्ध से विरत बलराम ने अपनी इच्छित स्वादवासी अपनी प्रिया के नेत्रों के प्रतिबिम्ब से चिह्नित मदिरा को छोड़कर जिस सरस्वती के जल का सेवन किया था तुम भी उस जल का

- समासः बन्धूनां प्रीतिः बन्धुप्रीतिः ( ६० तत्०) तथा समरात् मुखः समरविमुख (पञ्चमी तद०) । अभिमतो रसो यस्या सा अभिमत- रसा ( बहु०) ताम् । रेवत्याः लोचने एवं बकं यस्या सा रेवतीलोचनाडा ( बहु० ) ताम् ।
सेवन ( पान ) करके निर्माण अन्तःकरण वाले होकर केवल रूप से (न कि हृदय से भी ) श्यामरंग के हो जालोगे।
कोश:- रेवती रमणो रामः इत्यमरः । कलङ्काको लाञ्छनं च इत्य- मरः । सुरा इलिप्रिमा हाला इत्यमरः तालांको मुसली हलो, इत्यमरः ।
टिप्पणी- लाङ्गली छाङ्गसमस्यास्तीति लाङ्गली, यहाँ "लाङ्गल" शब्द से "अवइनिनी" इस सूत्र से "इन" प्रत्यय करके "लाङ्गली" शब्द निष्पन्न होता है। इसका अर्थ हलवाला होता है, यह बलरामजी का नाम है; क्योंकि हल ही उनका प्रधान अस्त्र था ये रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न वसुदेव के पुत्र से रेवतोलोचना डाम्-बलरामजी "मंदिरा" के बहुत प्रेमी ये और पति यदि मदिरा पीता हो तो पत्नी भी यदि उसका साथ दे तो कोई अनुचित नहीं इसीलिए रेवती भी मदिरा पोती थी अतएव मदिरा में उसको बाँसों की परछाई पड़ती होगी, जिसका कवि ने कपन किया है। सारस्वती- नाम्- सरस्वत्याः इमा सारस्वत्यः सरस्वती शब्द से "तस्येदम्" इस सूत्र से व प्रत्यय करके वृद्धयादि करके स्त्रीत्व की विवशा में कीप करके "जस्' विभक्ति लाकर "सारस्वत्यः " ऐसा रूप बनता है, तासाम् सरस्वतीनाम् यह षष्ठीविभक्ति का रूप है। अभिगमम् - "अधि" उपसर्गपूर्वक "गम्” धातु से "प्रद्धनिश्चिगमय" इस सूत्र से "अप्” प्रत्यय करके "अभिगम" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उक्त रूप उसी शब्द के द्वितीया विभक्ति का है। वर्ण- मात्रेण वर्ण एवं "वर्णमात्रम्" यहाँ एवं के साथ विग्रह करके "मात्र" के साथ-साथ समास किया गया है, अतः अस्यपद विग्रह होने के कारण "मयूर व्यंसकादया" इस सूत्र से नित्य समास किया गया है। उक्त रूप तृतीया विभक्ति का है। भविता यहाँ "भू" धातु से भविष्यत् अर्थ में "वर्तमान- समीपवर्तमानयद्वा" इस सूत्र से वर्तमान काल में स्तृची" इस सूत्र से "तृन् प्रत्यय किया गया है ।। ४९ ।।

= = 1 व्याख्यातस्मात् कुरुक्षेत्रात् अनुकनखलम् = कनसलतीर्थ- समीपे राजाऽवतीर्णा हिमाच्यनिःसृताम् सगरतनयस्वर्ग सोपानपङ्क्तिम्- सगर मनारोहणा स्वर्गमानभूतामिति भावः । जलो: एतनाम कस्य राजः कन्यापुत्री व गङ्गामित्यर्थः गच्छेयायाः प जाह्नवी, गौरव कुटिरचनाम् = पार्वतीवदनभ्रूभङ्गनिर्मिताम्, फेनैः डिण्डिरै विहस्य इव उपहासं कृत्वेव इग्नोर्महस्ता चन्द्र संलग्नवीचिकरा (सती) सम्म शंकरस्य केशग्रहणम् जटाहृणम् अकरोत् चकार । =
तस्मात् गच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णां जह्वोः
कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपान-पंक्तिम् ।
गौरवक्त्र कुटिरचनां या विहस्येव फेनैः श-भोः
केशग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोमिहस्ता ॥ ५० ॥

अन्वयः - तस्माद अनुकनखलम् शैलराजाऽवतीर्णा सगर समय-स्वर्ग- सोपानपति जो कायाम् गच्छ या गौरीवमधुकुटिरचना फेनैः विहस्य इन्ग्नमस्ता सम्भोः केशग्रहणम् अकरोत् ।
शब्दार्थः तस्मात् कुरुक्षेत्र से (आगे), अनुकनखलखलती के समीप जातोर्नाम् हिमालय से उतरी, सगरतनयस्वर्ग सोपानपड़ि- क्तम् सगर राजा के पुत्रों के लिए स्वर्ग की सीढ़ी के समान हो जह नामक राजा की, कन्याम् लड़की जाह्नवी गङ्गा के पास, गच्छे जाना। या जिस गाने, गौरीवत्र प्रकुटि रचनाम् पार्वतीके मुख में (ईर्ष्याविया उत्पन्न ) भ्रुकुटि रचना का फेफेन के द्वारा, विहस्य इव उपहास- सी करती हुई, इन्दुलग्नोमिहस्ता चन्द्रमा को स्पर्श करते हुए लहररूपी हाथों वाली, शम्भो शिवजी का केशग्रहणम् जटाजूट ग्रहण, अकरोत् की है। = - = =
भावार्थ: है ! कुरुक्षेत्रादये कनखलतीर्थ- समीपे सगरपुत्राणां कृते स्वर्गसोपानभूतां जाह्न गच्छ या जाह्नवी ( पतिशिरः स्थितत्वात् ) पार्वती- मुझे उत्पन्नकूटरचना फेनैः उपहासं कृत्वेव चन्द्रसंस्पर्शन-शीलोमिकरा (सती) शिवजटाजूटपणं कृतवती ।

हिन्दी - हे मेघ ! कुरुक्षेत्र से आगे कनखल के समीप हिमालय से उत्तरी सगरपुत्रों के लिए स्वर्ग सोपानभूत जाह्नवी के पास जाना जिसने अपने फेन के द्वारा (ईया) पार्वती के मुख में उत्पन्न भ्रुकुटि का उपहास सी करती हुई चन्द्रमा को छूनेवाले तरङ्गरूपी हाथ से शिवजी के जटाजूट की पकड़ लिया है।
समासः कनखलस्य समीपे अनुकनखलम् (अव्ययीभावः) सगरस्य तनयाः सगरतनया ( प० त०), सोपानानां पतिः सोपानपंक्तिः ( ० तत्०) स्वर्गस्य सोपानपङ्क्तिः सगरतनयस्वर्ग सोपानपतिः (१० तद्० ) । गीर्याः वनम् गौरवक्त्रम् (प० १५०) भुकुटे रचना कुटिरचना, गौरीवस्त्र- म्रुकुटिरचना (स० तत्० ) ताम् इन्दी लग्नाः इन्दुलग्ना (स०] त०), इन्दुलग्ना ऊर्मय एवं हस्ताः यस्याः सा इन्दुसम्मोहिस्ता (बहु० ) ताम् । केशानां ग्रहणम् केशग्रहणम् ( ० ० ) । =
कोश: गङ्गा विष्णुपदी जङ्ग तनया पुरनिम्नगा इत्यमरः वक्त्रास्ये वदनं तुण्डमाननं रूपनं मुखम् इत्यमरः डिण्डिरोऽब्धिकफः फेनः इत्यमरः । टिप्पणी- कनखल:- यह तीर्थं हरिद्वार के समीप है। हरिवंशपुराण में इसका वर्णन मिलता है, जैसे-
हरिद्वारे कुशावतें नील भिल्ल पर्वते ।
स्नात्वा कसले तोपें पुनर्जन्म न विद्यते ॥ महोपाध्याय मल्लिनाथजी कनखल को कमसल नामक पर्वत मानते हैं। उनका आधार महाभारत के वनपर्व का "एते कनखला: राजन् ऋषीणां दयिता नगाः" यह श्लोक है। जोः कन्याम् — सगरवंश में उत्पन्न भगीरथ के द्वारा अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए जब गङ्गा पृथ्वी पर लायी गयीं, तब गंगाजी ने राजा वह्न की यज्ञशाला को दुबा दिया तो क्रुद्ध होकर जह्न ने उन्हें पी लिया और पुनः अनुनय आदि करने पर उन्हें बाहर निकाल दिया अतः गंगाजी को जह्नुतनया कहते हैं। सगरः यह सूर्यबंध में उत्पन्न हुए थे। इनके नाम के -


विषय में प्रसिद्धि है कि ये जब गर्म में ही थे उसी समय इनकी विमाता ने इनकी माता को गर (विष) दे दिया, परन्तु किसी ऋषि के आशीर्वाद के कारण ये मरे नहीं सकुशल उत्पन्न हो गये अतः उन्हें "सगर" नाम दिया गया। गौरवक्त्र कुटिरचनाः- यहाँ पार्वती के मुख में त्रुकुटि की कल्पना कवि ने किया है। पार्वती और गंगा दोनों हिमालय से उत्पन्न हैं और संयोग की बात यह है कि दोनों बहन एक शंकरजी की ही पत्नी हुई। फिर ये दोनों बहनें परस्पर सौत हो गयीं। फिर पार्वती के मुंह में प्रकुटि क्यों न हो? वह सोचती है मैं तो अङ्ग की ही स्वामिनी रही, गंगा तो पति देवता के सिर पर चढ़ी है। शंकरजी ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। फिर तो ईर्ष्या स्वाभाविक ही है। और इधर क्रुद्ध पार्वती को और अधिक क्रुद्ध करने के लिए फैन बहाने के ब्याज से मानो हँसकर उनका उपहास सी कर रही है।
अलंकार:- यहाँ "विहस्य इव" इस वंश में "उत्प्रेक्षा" अलंकार है एवं "ऊर्मिहस्ता" यहाँ "क" अलंकार है एवं दोनों के बंगांगिभाव होने से "शंकर" अलंकार है । ५० ॥
तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि पश्चालम्बी स्वं
चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तिर्यगम्भ
1 संसर्पत्या सपदि भवतः स्रोतसिच्छाययाऽसौ
स्यादस्थानोपगत यमुना सङ्गमेवाभिरामा ॥ ५१ ॥

अन्वयः -- सुरगज इव व्योम्नि पचार्द्धलम्बी त्वम् अच्छस्फटिकविशदम् तस्याः सम्मः तियं पातुम् तर्कये चेतु सपदि स्रोतसि संसर्पत्यां भवतः छायया  अस्थानोपगत-यमुना सङ्गमा इव अभिरामा स्यात् ।
व्याख्यासुरगजः देवहस्ती, इव यथा, व्योम्निनमसि, पचाई- लम्बी पश्चिम भागाचपिनतः त्वम् मेषः अभ्छस्फटिकविशयम् निर्मल- स्फटिकधवलम् तस्याः गङ्गायाः, अम्मः तोयम् तिर्यक् तिरखीनं यथा स्वात्तथा पातुम् पानकुतर्कयेःविचारमे, चेदतर्हि सपदि सहसा = - =

विषय में प्रसिद्धि है कि ये जब गर्म में ही ये उसी समय इनकी विमाता ने इनकी माता को गर (विष) दे दिया, परन्तु किसी ऋषि के आशीर्वाद के कारण ये मरे नहीं सकुशल उत्पन्न हो गये अतः उन्हें "सगर" नाम दिया गया। गौरवक्त्र कुटिरचनाः- यहाँ पार्वती के मुख में त्रुकुटि की कल्पना कवि ने किया है। पार्वती और गंगा दोनों हिमालय से उत्पन्न हैं और संयोग की बात यह है कि दोनों बहन एक शंकरजी की ही पत्नी हुई। फिर ये दोनों बहनें परस्पर सौत हो गयीं। फिर पार्वती के मुंह में प्रकुटि क्यों न हो? वह सोचती है मैं तो अङ्ग की ही स्वामिनी रही, गंगा तो पति देवता के सिर पर चढ़ी है। शंकरजी ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है। फिर तो ईर्ष्या स्वाभाविक ही है। और इधर क्रुद्ध पार्वती को और अधिक क्रुद्ध करने के लिए फैन बहाने के ब्याज से मानो हँसकर उनका उपहास सी कर रही है।
अलंकार:- यहाँ "विहस्य इव" इस वंश में "उत्प्रेक्षा" अलंकार है एवं "ऊर्मिहस्ता" यहाँ "क" अलंकार है एवं दोनों के बंगांगिभाव होने से "शंकर" अलंकार है ।। ५० ।।
तस्याः पातुं सुरगज इव व्योम्नि पश्चालम्बी स्वं चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तिर्यगम्भः 1 संसर्पत्या सपदि भवतः स्रोतसिच्छाययाऽसौ स्यादस्थानोपगत यमुना सङ्गमेवाभिरामा ॥ ५१ ॥
अन्वयः -- सुरगज इव व्योम्नि पचार्द्धलम्बी त्वम् अच्छस्फटिकविशदम् तस्याः सम्मः तियं पातुम् तर्कये चेतु सपदि स्रोतसि संसर्पत्यां भवतः छायया अस्थानोपगत-यमुना सङ्गमा इव अभिरामा स्यात् ।
व्याख्यासुरगज: देवहस्ती, इव यथा व्योम्निनमसि, पचाई- लम्बी पश्चिम भागापनतः त्वम् मेघः अण्छस्फटिकविशदम् निर्मल- स्फटिकधवलम् तस्याः गङ्गायाः, अम्मः तोयम् तिर्यक् तिरखीनं यथा स्वात्तथा, पातुम् पानम् तर्कः विचार, वेद तर्हि सपदि सहसा =

स्रोतसि प्रवाहे, संसर्पन्त्या संक्रामन्या भवतः मेवस्य छायया प्रति- बिम्बेन, असीगङ्गा, अस्थानोपगत- यमुनासंगमा प्रयागभित्रस्थलप्राप्त- कालिन्दीसमागमा, गया, अभिरामा मनोहरा, स्याद्भवेत् । = =
- शब्दार्थः – सुरगजः = देवताओं के हाथी की इव तरह, व्योम्नि आकाश में, पश्चादलम्बीपीछे के आधे भाग से झुके हुए त्वम् तुम अच्छस्फटिक विवादम् = निर्मलस्फटिक के समान श्वेत, तस्याः उस गंगा के, अम्मल को तिटेढ़ा होकर, पातुम्पीने को तर्कयेःसोचेंगे, चेद्यदि तब सपदि सहसा स्रोतसि प्रवाह में संसर्पन्त्या चलते हुए. भवतः तुम्हारे, छायया प्रतिबिम्ब से मसौ वह गंगा, अस्थानोपगत- यमुनाङ्गमा अस्थान प्रयाग से भिन्न दूसरे स्थान में [प्राप्त ] यमुना के संगम बाली, इव की तरह, अभिरामा मनोहर, स्यात् दिखाई देगी।
भावार्थ: है मेघ ! दिग्गज इवाकाशे पाचार्येण स्थितः पूर्वार्द्धन एवं यदा गङ्गायाः
स्वच्छस्फटिकवलं जलं पातुं चिन्तयते तदा सहसा प्रवाहे त्वच्छाया
संयुक्ततया गंगा प्रयागेतरस्थाने प्रा-यमुना-समागममेव मनोहरा भवेत् ।

हिन्दी - हे मेघ ! सुरगजों की तरह आकाश में पीछे के आधेभाग से रहकर जागे के बाधे भाग से टेढ़ा होकर जब तुम गंगाजी के निर्मलस्फटिक मणि की तरह धवल जल को पीने को सोचोगे तभी सहसा प्रवाह में तुम्हारी छाया पड़ने के कारण गंगा प्रयाग से भिन्न स्थान में यमुना संगम वाली सी मनोहर दिखाई देगी।
समास: अपरम् अर्धम् पश्चार्द्धम् (कर्मधारयः) पञ्चान लम्बते तच्छीलः इति पचाम्बी ( उपपदसमासः) अच्छासौ स्फटिक अच्छ स्फटिक ( कर्म० ) तदिव विशदम् अच्छस्फटिकविवादम् ( उपमान कर्म० ) । न स्थानम् अस्थानम् (नव्) अस्थाने उपगतः अस्थानोपगतः (स० तत्० ) यमुनायाः संगम: यमुनासंगमः ( ष० त०) अस्थानोपगतः यमुना संगमो यस्याः सा अस्यानोपगतयमुनासंगमा ( बहु० ) ।

कोश:-- प्रसन्ने भल्हुच्छः इत्यमरः । विशवश्वेतपाण्डुराः इत्यमरः । सति यस्तिरोऽश्वति इत्यमरः सत्यः सपदि तत्क्षणे इत्यमरः । छाया सूर्य प्रिया कान्तिः प्रतिविम्बमनातपः इत्यमरः ।
टिप्पणी- पञ्चार्द्धम् परं तत् अर्धम् "यहाँ समास होने पर "अपर स्पार्धे पच भावो वक्तम्य:" इस यातिक से "अपर" के स्थान पर "" आदेश हुआ है।
तिर्यक - तिरस उपपदक "अ" धातु से विवम् प्रत्यय करके उसका सर्वापहारी लोप हो जाता है। उपपद समास किया जाता है और "तिरस्तियं- लोपे" इस सूत्र से "विरस्" के स्थान पर "तिरि" आदेश करके न छोप कुत्वादि करके "तिर्यक्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।
पातुम् पानार्थक "पा' धातु से तुमुन् प्रत्यय करके उक्त रूप बनाया जाता है।
संसर्पन्त्याः सम् उपसर्गपूर्वक "सूप" धातु से लट् के स्थान पर तृप्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में की करके "संसर्पन्ती" ऐसा रूप बनता
है। उक्त रूप उसी शब्द के तृतीया के एकवचन का है।
अभिरामा:- "अभि" उपपूर्वक क्रीडार्थक "रम्' धातु से अधिकरण में प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टाप करके "अभिरामा" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।
सुरगन: माठों दिशाओं के आठ दिग्गज होते हैं। अमर कोषकार
ने कहा है-
'ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ।
पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीक इन्हें ही सुरगज भी कहा जाता है। अलंकार - यहाँ " बच्छ स्फटिक विशदम्" में लुप्तोपमा एवं "बस्थानो पगत-यमुना-संगमा इव" यहाँ उत्प्रेक्षा है मोर दोनों के अंगिभाव के कारण
दिग्गजाः ॥
"शंकर" अलंकार है ।। ५१ ।।
-

व्याख्या-आसीनानाम् स्थितानाम्, मृगाणाम् कुरङ्गाणाम् गन्धमृगाणा- मिति भावः ।
नाभिगन्धेः कस्तूरिकागन्धेः सुरभितशिलम् सुगन्धित प्रस्तरम्, तस्याः गङ्गायाः एवं प्रभवम् उत्पत्तिस्थलम्
तुषारैः हिमः, गौरम् धवल, अचल पर्वतम् प्राप्य आसाद्य हिमालयं गत्येत्यर्थः,
अवधम- विनयने मार्गपरिश्रमापनोदने, तस्य हिमालयस्य शृङ्गे सानो, निषण्ण उपदिष्टः सन् खम् ) त्रिनयनोत्खातोपमेयाम्
श्वेत शिववृषभ- विदारितकर्दमल्याम्, शोभाम् श्रियम्, वक्ष्यसि धारविष्यसि ।

आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगन्धैमृगाणां तस्या एव प्रभवमचलं प्राप्य गौरं तुषारैः । वक्ष्यस्यध्वमविनयने तस्य शृङ्ग निषण्णः शोभांशु त्रिनयन-वृषोत्खातपकोपमेयाम् ।। ५२ ।
अन्वयः - आसीनानाम् मृगाणाम् नाभिगन्धेः सुरभितशिलम् तस्याः एव प्रभवम् तुषारैः गौरम् बलम् प्राप्य श्रमविनयने तस्य शृङ्गे निषणः शुभ- त्रिनयन-वृषलात पोपमेयाम् शोभाम् वक्ष्यति ।
शब्दार्थः आसीनानाम्-बैठे हुए, मृगाणाम् हिरणों के (गन्धमृगों के), नाभिगन्ध कस्तूरी की सुगन्धि से सुरभितशिलम् = सुगन्धित पत्थरवाले, तस्याः एवं उस गङ्गा के ही प्रभवम् उत्पत्ति स्थान, तुषारै: बर्फी से गौरम् उजले, अचलम् पर्वत को अर्थात् हिमालय को प्राप्य प्राप्त करके, अध्वश्रम- विनयने मार्ग के परिश्रम को दूर करने में, तस्य उस हिमालय को = चोटी पर षिणः-बैठे हुए (तुम), शुभत्रिनयनवृपोत्खातपोपमेयाम्= शिवजी के उजले नदी के द्वारा विदीर्ण की गयी कीचड़ की तरह, शोभाम् सोभा को वयसि धारण करोगे। - = = - C =
भावार्थ:- हे मेघ! तदनन्तरमुपविष्टानां गन्धमृगाणां कस्तूरिकामधे सुरभितस्तरे पितरि हिमगुनले पर्वते हिमालये मार्गपरिश्रमापनोदनायो- पविष्टस्त्वं शिवस्य श्वेतनन्दिनोत्खातकर्दमशोभां प्राप्स्यसि ।

हिन्दी है मेघ। उसके बाद बैठे हुए मृगों के कस्तूरी के सुगन्ध से पत्थर वाले गंगा की उत्पत्ति के स्थान बर्फी से उजले पर्वत हिमा- लय की चोटी पर मार्ग परिश्रम को दूर करने के लिए जब तुम बैठोगे तब शिवजी के उजले नन्दी के द्वारा विदारित कीचड़ के समान शोभा को धारण करोगे ।
= समासः सुरभिताः शिला यस्य स सुरभितशिलः (बहु०) तम् । नाभीना गन्धाः नाभिगन्धाः (ष० त०) : अध्वनः श्रमः अध्वधमः ( ष० त० ) तस्य विनयनम् अध्यक्षमविनयनम् ष० त०) तस्मिन् वयमविनयने । विनयनस्य वृषः विनयनवृपः (१० तत्) त्रास त्रिनयनषः शुत्र-( कर्म० ) शुभत्रिनयनवृषेण उत्वातः पुत्रत्रिनयन-वृषोत्तातः (तृ० त०) स पासी पङ्कः (कर्म पा० ) शुभत्रिनयनोत्खातकेनोपमेयाम्= शुनषिनयनद्वषोत्यातपङ्कोपमेयाम् ( वृ० तद्०) श्रीणि नयनानि यस्य जिनयन ( ब० वी०)
कोश:- मृगनाभि गमदः कस्तूरी च इत्यमरः । नाभिः प्रधाने कस्तू मदे च क्वचिदीरितः, इति विश्वः । अवदातः सितो गौरः इत्यमरः सुकृतं तृषमे वृषः, इत्यमरः । शुत्रमुद्दीसशुक्लयोः इत्यमरः ।
टिप्पणी- आसीनानाम्" भासत इति" इस विग्रह में उपवेशन अर्थाद बैठने के अर्थ में "आस" धातु से लट् लकार के स्थान पर “लटः शतृशान- चावप्रथमासमानाधिकरणे" इस सूत्र से "ज्ञान" प्रत्यय आदेश करके, शानच् के आकार को "ईदास:" इस सूत्र में ईकार आदेश करके "आसीन" ऐसा रूप बनता है। उक्त रूप उसी के षष्ठी विभक्ति का है।
प्रभवः प्र" उपसर्वपूर्वक "चू" धातु से "वोरप्" इस सूत्र से “अप् प्रत्यय करके गुणादि करके "प्रभव" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। अचल:- चलतीति चलन चल अचल, यहाँ संचलनार्थक "च" धातु से "नन्दिग्रहिपचादिभ्यो" इस सूत्र से पचादित्वात् बच् प्रत्यय होता है।

= विनीयतेऽनेनेति विनयनम् इस प्रकार करण में "वि" उपसर्गपूर्वक "ती" धातु से "करणाधिकरणयोश्च" इस सूत्र से "स्युद्ध" प्रत्यय होता है।
- विषण्ण: "दि" उपसर्गपूर्वक गत्यर्थक "सद्" (लू) धातु के कर्ता में क्त प्रत्यय किया जाता है।
विनयनम् - वि उपसर्गपूर्वक नी धातु से करण में अथवा कर्ता में ल्युट् प्रत्यय होता है।
कर्ता में विनयतीति विनयनम् इस विग्रह में उसी धातु से "कृत्यल्युटो बहुलम् इस सूत्र से बहुलग्रहणात् स्युट् प्रत्यय किया जाता है और "युवोर- aret" इस सूत्र से "यु" के स्थान में अनादेश होता है तब "विनयनम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है।
त्रिनयनः यहाँ समास के पश्चात् पूर्वपदात्संज्ञायामगः " इस सूत्र से गत्व प्राप्त था परन्तु उक्त शब्द के क्षुम्नादि गणपठित होने के कारण "क्षुम्ना- दिषु च " इस सूत्र से णत्व का निषेध हो जाता है।
उत्खात:- "उद्" उपसर्गपूर्वक "खन्' धातु से मत प्रत्यय होता है एवं धातु के न् को आय हो जाता है।
उपमेयाम् उपमातुं योग्या इस विग्रह में उप" उपसर्गपूर्वक "मा" धातु से "बचो यत्" इस सूत्र से यत् प्रत्यय करके "ई यति" इस से धातु के बकार को ईकारादेश करके गुण करके टाप करके "उपमेया' 'निष्पन्न होता है। द्वितीया विभक्ति का उक्त रूप है।
अलङ्कारः - यहाँ हिमालय की तुलना नन्दी से एवं मेघ की तुलना कीचड़ से की गयी है अतः यहाँ "उपमालङ्कार है ।। ५२ ।।

तं चेद्वायो सरति सरलस्कन्धसङ्घट्टजन्मा
बाघेतोल्काक्षपित चमरी-बाल-भारो दवाग्निः ।
बर्हस्पेनं शमयितुमलं शमयितुमलं वारि-धारा-सहस्र
- रापनातिंप्रशमनकला: सम्पदो समानाम् ॥५३॥

= = व्याख्या वायो पवने, सरति बाति सति सरल स्कन्ध-संपट्ट जन्मा देवदारुप्रकाण्डसंघर्षणोद्भवः, उत्काक्षपितचमरीबालभारः स्फुल्लिङ्गप्रदग्ध- चमरीकेश समूहः दवाग्निः वरण्यवह्निः तम् हिमालयम् बाधेत पीडयेत् वेद (हि) एनम् वह्निम वारिधारासह जलसंपातैः पर्याप्तं यथास्यात्तथा शमयितुम् निर्वापवितुम् अर्हसि योग्पोऽसि हियतः उत्त मानाम् महताम्, सम्पदः समृद्धयः आपन्नातिप्रशमनफला पीडितपीडा- निवारण हेतुका: ( भवन्ति ) ।
= = शब्दार्थः वायी हवा के, सरतिचलने पर संघ जन्मा देवदारु की शाखाओं के संघर्षण से उत्पल उपक्षविचरीवाल भार: चिनगारियों से चमरीगायों की पूंछ की वालों को कर देने वाली दवाग्निः वन की आग, तम् उस हिमालय को चेद्यदि ते पीडित करे, तहितब, एनम् इस दवाग्नि को वारिधारामहरु जल की असंख्य धाराओं से मूसलाधार वृष्टि से अपर्याप्त रूप से शमवितुम् बुझाने के लिए अर्हसि म योग्य हो बर्बाद तुम बुझा सकते हो हि क्योंकि, उत्तमानाम् बड़ों की सम्पदः समृद्धि, आपन्नातिप्रथमनफलाः दुखियों की पीड़ाओं को दूर करने के लिए ( भवन्ति होती हैं ) । = = =
अन्वयः - बायो सरति सरलस्कन्धसंघटजरमा उल्कापित चमरीबाल भारः दवाग्निः तम् बाघेत चेद् एनम् वारिधारासहस्रं अलम् शमयितुम् अर्हसि हि उत्तमानाम् सस्पदः आपन्नातिप्रशमनकलाः ।
भावार्थ : हे मेच वायौ सरति यदि देवदारुणोत्पन्नः उत्कवाचमपुच्छ केशदग्धको दवाग्निः हिमालयं पीडयेत् तर्हि त्वं जलधार- सहस्रैः दवाग्निमुपशामयेः यतो हि महतां समृद्धयः पीडित पीडानिवारण- हेतुकाः भवन्ति ।
हिन्दी मे ! हवा के चलने पर यदि देवदार की शाखाओं की रगड़ से उत्पन्न चिनगारियों से चमरीगाय की पूँछ को झुलसा देनेवाली दवाग्नि हिमा लय को पीड़ित करता हो तो तुम अपने जल की सहस्रधाराओं से दवाग्नि को बुझा

सकते हो क्योंकि बड़ों की समृद्धि पीड़ितों की पीड़ा को दूर करने के लिए होती है।
समास सरलानां स्कत्याः सरलस्कन्धाः (ष० त० ) तेषां संघट्टनं सरलस्कन्ध-संघट्टनम् (प० तद) सरलस्कन्ध-संघटनेन जन्म यस्य सरलस्कन्ध- संघट्ट जन्मा (बहु०) उत्कामि अपिता: उल्काक्षपिताः (तृ० त०) चमरीणां बालभारा: चमरीबालभारा (६० तत्०) उस्काक्षपिताः चमरीबालभारा: येन उल्कापितामरीबालभारा: ( बहु०) वारीणां धाराः वारिधारा: ( ६० स) वारिधाराणां सहस्रै वारिधारासह (६० तत्०) आपन्नानाम् आति आपनाति ( प० त० ) तस्याः प्रशमनम् आपनातिप्रशमनम् (० तत्) तदेव फलं यासां ता आपनातिप्रशमनफला (बहु० ) ।
कोश:- स्त्री प्रकाण्डः स्कन्धः स्यान्मूलाच्छाखावधेस्तरोः इत्यमरः । उल्का स्यान्निर्गता, इत्यमरः । वने च बनवली च दवो दाव इतीष्यते, इति यादव दवो दावो वनवह्निः इत्यभिधानचिन्तामणिः ।
टिप्पणी- वायु:- वातीति वायुः "वा" धातु से ओणादिक "कुवापाजि०'
इत्यादि सूत्र से सुप्रत्यय करके "वायु" शब्द निष्पन्न किया करता है। चमरी:- "मरी" शब्द "चमरी" गाय का वाचक है। यह एक पशु (गाय) विशेष है जो हिमालय की तराई में अधिक पायी जाती है। इसकी पूंछ में बालों का गुच्छा रहता है जिसका वर बनाया जाता है। यह अपने बालों से बहुत स्नेह रखती है। दव:- दुनुतीति दय: इस विग्रह में उपताप ( संताप ) अर्थ में विद्यमान (ड) दु धातु से पचाद्य करके गुणादि करके "दव" ऐसा रूप बनता है। "दाव" शब्द तो उसी धातु से "दुन्योरनुपस में इस सूत्र से होने वाला प्रत्यय करने पर होता है। बात-"बाघ' धातु के लिङ् लकार के प्रथम पुरुष के एक वचन का यह रूप है। शमयितुम् उपशमनार्थक "शम्' धातु से णिच् प्रत्यय करके पश्चात् "तुमन् प्रत्यय करके "शमवितुम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। सम्पदः सम्" उपसर्गपूर्वक "पद्" धातु से विव प्रत्यय भाव में करके उसका सर्वापहारी लोप करके "सम्पद" शब्द बनता है, उक्त रूप प्रथमा के बहु-

वचन का है। आपन्नः "बाई" उपसर्गपूर्वक "पद" धातु से कर्ता में "त प्रत्यय करके "बापन्न" रूप निष्पन्न होता है। आति "आई" उपसर्गपूर्व गत्यर्थक ऋ धातु से भाव में "क्तिन्” प्रत्यय करके "अति" ऐसा श बनता है।
अलंकार:- यहाँ यीया चरण के वाक्यार्थ का समर्थन चतुर्थ चरण वाक्यार्य के द्वारा होता है, अतः "अर्थान्तरन्यास" नामक अलंकार है ।। ५३

ये संरम्भोत्पतनरभसाः स्वाङ्ग भङ्गाय तस्मिन् मुकाध्वानं सपदि शरभा लङ्घयेयुर्भवन्तम् ।
तान्कुर्वीयास्तुमुल करका-वृष्टि-पाताव कीर्णान् के वा न स्युः परिभवपर्व निष्फलारम्भ-यत्नाः ॥ ५४ ॥

= व्याख्यातस्मिन् हिमालये, संरम्भोत्पतन रमसा क्रोधोत्सवनवेग शालिनः ये शरभाः अष्टापद-मृगविशेषा, मुक्ताध्वानम् परित्यक्तमार्गम भवन्तम् = मेषम्, सपदि महमा स्वाङ्गभङ्गाय- निजत्रोटना संघयेयुः अतिक्रमणं कुर्युः तान् शरान् मुकरकावृष्टिपाताऽवकीर्णान् भीषणोपलवर्षणविकीर्णात् कुर्वीथाः कृरुण्य, निष्फलारम्भपन्नाः विफल व्यापार-संलग्दा, के वा जन्तवः परिभवपदम् = तिरस्कार- यात्राः न स्युः भवेयुः सर्वे भवत्येवेति ध्वनिः ।
अन्वयः - तस्मिन् संरम्भोत्पतन- रमसा ये शरभा: मुक्ताध्यानम् भव- न्तम् सपदि स्वाङ्गभङ्गाय लङ्घयेयुः तान् तुमुलकरका दृष्टिपाताऽवकी- मन् कुर्वीथाः निष्फलारम्भ-यत्नाः के वा परिभवपदम् न स्युः ।
शब्दार्थः तस्मिन् उम्र हिमालय पर संरम्भोत्पवन रमसः क्रुद्ध होकर उसने से बेगवाले, जो सरमा:आठ पैर वाले मृग (पशु) विशेष मुक्ताध्वानम् = मार्ग को छोड़े हुए, भवन्तम्-तुमको, (यदि ) सपदि सहसा स्वगथाम अपने ही अंगों के विनाश के लिए, सङ्घयेयुः अतिक्रमण करें (तो) ताउन मृगों को, तुमुलकरका दृष्टिपातावविकीर्णान् -

= बोलों की घोर दृष्टि से तितर-बितर कुर्वीचा: कर देना निष्फलारम्भयत्नाः- व्यर्थ के कामों को करने का प्रयास करने वाले के वाकौन जन्तु, परिभव- पदम् = अपमान के पात्र न स्युः नहीं होते ।
भावार्थ:- हे मेघ ! क्रोधेोत्पतनत्वात् वेगशीलाः परभाः त्यक्तमार्ग भवन्तं यदि निजमात्रविशताय अतिक्रमणं कुर्युस्तहि त्वमपि करकानां तुमुल- दृष्टिभिस्तान् विप्रकीर्णानि कुरुष्व व्ययंव्यापारसंसना के प्राणिनः तिरस्कार- भाजना: न भवन्ति । अर्थात् सर्वेऽपि भवन्त्येवेतिभावः ।
हिन्दी - हे मेघ क्रोध से कूदने के कारण वेगवाले शरभ (जिनकी माठ टाँगें होती हैं) छोड़ दिया है मार्ग को जिसने ऐसे तुम्हारा यदि अपने ही को विनष्ट करने के लिए अतिक्रमण करें तो तुम बोलों की घोर वर्षा से उन्हें तितर-बितर कर देना; क्योंकि व्यर्थ के कामों को करने का प्रयास करने वाले कौन अपमान के पात्र नहीं होते ? अर्थात् सब होते ही हैं।
समासः - संरम्भेण उत्पतनम् सं रस्मोत्पतनम् (तृ० तत्०) संरम्भपवने रमसः येषान्ते संरम्भोत्पतनरभसाः ( बहु०) मुक्तः बध्वा येन स मुक्ताभ्या ( बहु० ) तम् अङ्गानां मः मः ( ० तत्० ) स्वस्य अङ्गभङ्गः स्वाङ्गभङ्गः (ष० त० ) तस्मै तुमुलाच ताः करका:- तुगुल-करका: ( कर्मधारय) तासां दृष्टि: तुमुल- करका दृष्टि (प० तद्) तस्याः पादः (प० तत्) तेन अवकीर्णा तुमुलकरकादृष्टिपाताऽयकीणी (तृ० चत्० ) तान् । बारम्भेषु यत्नः- आरम्भयत्नः (स० त०) निष्फल आरम्भयत्नः येषान्ते निष्फलारम्प- यत्नाः ( बहु०) परिभवस्य पदम् परिभवपदम् ( ० ० ) ।
कोश:- रमसो हर्षवेगयो, इति विश्वः द्राक्झटित्याजसाहाय द्राणु सपदिते इत्यमरः सद्यः सपदि तत्क्षणे इति च । तुमुलं रण संकुले, इत्यमरः । स्युपुनवें वेत्यवधारण वाचकाः इत्यमरः वर्षोपलस्तु करको करकाऽपि च दृश्यते इत्यमरः इति खः ।
टिप्पणी-संरम्भ: संरम्भणं संरम्भः यहाँ भाव में सम् उपसर्गपूर्वक "रम्" धातु से चन् प्रत्यय किया गया है। शरभा:-शरभः शलभेष्टापदे

- प्रोक्तो मृगान्तरे" इति विश्वः आठ पैर वाले मृग को शरम कहते हैं आजकल यह नहीं मिलता है। यह मृग सिंह को भी परास्त कर मार डालता है। पुराणों में कथा आती है कि प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु से रक्षा करने के लिए जब भगवान विष्णु ने "सिंह" रूप धारण कर उस दैत्यराज को मार डाला तब भी उनका क्रोध शान्त नहीं हो सका, तब सभी देवताओं की प्रार्थना करने पर शिवजी ने "शरम" का रूप धारण कर उन्हें परास्त करके उनका क्रोध शान्त किया। स्वाङ्गमङ्गाय यहाँ तादयें में चतुर्थी है। लङ्घयेयुः furta " धातु के लिङ् लकार के प्रथम पुरुष के बहुमन का यह रूप है। अवकीर्णा :- "अब" उपसर्गपूर्वक (दु) "कृ" धातु से क्त प्रत्यय करके गत्व करके "अवकीर्ण" ऐसा रूप बनता है। जस विभक्ति का यह रूप है। निष्फल :- फलानिष्क्रान्तः निष्फलः, यहाँ निरादयः कान्ताद्यर्थे पञ्चम्या " इस वार्तिक से जो "मयूरव्यंसकादयश्च" सूत्र में पठित है, समास हुआ है। परिभवः "परि" उपसर्गपूर्वक "भू" धातु से "अ" प्रत्यय करके "परिभव" शब्द बनता है। इसका अर्थ तिरस्कार होता है "अनादर: परिभवः परीभाव- स्तिरस्क्रिया" अमर कोश की यह उक्ति ही प्रमाण है।
अलंकार:- यहाँ तृतीय चरण के वाक्यार्थ का समर्थन चतुर्थ चरण के वाक्यार्थ से होता है अतः अर्थान्तिरन्यास नामक अलङ्कार है ।। ५४ ।।
तत्र व्यक्तं हर्षादि चरणन्यासमर्धेन्दुमौले
शश्वत् सिद्धैरुपचित-बलि भक्तिनम्रः परीया: ।
कल्पिष्यन्ते स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः ॥५५॥

अन्वयः तत्र दृषदि व्यक्तम् शश्वत् सिद्धैः उपलम् अर्धेन्दुमः चरणन्यासम् भक्तिनम्रः परयाः यस्मिन् दृष्टे उद्धूतपापाः श्रद्दधानाः करण- विगमात् स्थिरगणपदप्राप्तये कल्पिष्यन्ते ।
व्याख्या - तत्र हिमालये दूषदिप्रस्तरे व्यक्तम् स्पष्टम् पाश्वत् स्थायी, सिद्धगन्धर्वैः, उपचितबलिम् = विरचित-पूजाविधिन्, अर्धेन्दुमौले =

= = = इन्दुशेखरस्य, शिवस्येत्यर्थः चरणन्यासम्पादचिह्नम्, भक्तिनम्रः भक्त्या वनतः, (सन् ) परीयाः प्रदक्षिणां कुर्याः यस्मिन् पदन्यासे, दृष्टे अव लोकिते, उद्धूतपापाः== मुक्त किल्विषाः, ( सन्तः) श्रद्दधानाः भक्ताः करण- विगमात् = शरीरत्यागात्, कम्, अनन्तरम्, स्थिरगणपदप्राप्तये स्थाविप्रमय स्थानलगाये संकल्पन्ते समर्थाः भवन्ति ।
= शब्दार्थ :- तंत्र = उस हिमालय पर यदि किसी ) पत्थर पर व्यक्तम्=स्पष्ट, सश्वत्=स्थायी सिद्ध सिद्धों के द्वारा, उपचितबलि जिसकी पूजा की गयी है ऐसे अदुमोले शिवजी के चरणन्यासम्=चरणचिह्न को, भक्तिनम्रः भक्ति से शुरू कर परीयाः प्रदक्षिणा करना, यस्मिन् जिस चरणचिह्न के दुष्टे दीखने पर उद्धूतपापा: निष्पाप होकर, श्रद्धानाः भक्तगण, करणविगमात् शरीर त्यागने के कार्य पश्चाद, स्थिरपणपदातये शिवजी के गणों के स्थायी स्थान की प्राप्ति के लिए, पन्ते समर्थ होते हैं। = = = -
भावार्थ: है मेप तत्र हिमालये कस्मिश्चिद पाषाणे स्पष्ट स्थायि सिद्धः रचितपूजाविधि शिवस्य वरणविद्धं भक्तिविनम्रः सन् प्रदक्षिणां कुर्याः । यस्मिन्त्रलोक भक्ताः निष्कल्मषाः सन्तः शिव-प्रमयेषु स्थाविस्थानं प्राप्तुं समर्था: भवन्ति ।
हिन्दी - हे मेघ किसी पत्थर पर स्पष्ट, स्थायी तथा सिद्धों ने जिसकी पूजा कर की है ऐसे शिवजी के चरणचिह्न की प्रदक्षिणा, भक्ति से विनम्र होकर करना जिस चरणचिह्न के देखने पर भक्तलो शिवजी के गणों में स्थायी स्थान प्राप्त करने में समर्थ होते हैं।
समासः - चरणयोः ग्यासः चरणन्यासः ( प तद्०) तम् । उपचितः तम् उपचितबलम् (बहु० ) तस्य अर्थासी इन्दुः अर्धेन्दु (कर्म० ) अर्धेन्दुः मौली यस्य सः अर्धेन्दुमौलि ( बहु० ) तस्य उद्धृतानि पापानि येषान्ते उद्धूतपापा: ( कर्म० ) । गणानां पदं गणपदम् ( [ष० त०) स्थिर



तत् गणपदम् = स्थिरगणपदम् (कर्म०) तस्य प्राप्तिः स्थिरगणपदप्राप्तिः ( ब० तद् ) तस्मै ।
कोशः - सिद्धिनिष्पत्तियोगयोः इति विश्वः बलि पूजोपहारयोः इति यादवः । अधः खम्बे सर्वेऽशके, इति विश्वः करणं साधकतमं क्षेत्रानेन्द्रिये ध्वपि इत्यमरः । गणः प्रमथसंख्याद्या:, इति वैजयन्ती । पापं किल्वियं कल्मषम् इत्यमरः ।
टिप्पणी-व्यक्तम्- "दि" उपसर्गपूर्वक "अजू" धातु से कर्ता में "क्त" प्रत्यय करके "व्यक्त" ऐसा रूप बनता है। शश्वत्-यह अध्यय है। परीयाः - "परि" उपसर्गपूर्वक गायक "इन्" धातु के लिङ् लकार के मध्यमपुरुष के एकवचन का यह रूप है। न्यासः "नि उपसर्गपूर्वक "अ" धातु के भाव में "घ" प्रत्यय करके "स्यास" ऐसा रूप बनता है। करण- विगमावू वहाँ "क" शब्द जो दिशावाची है, के आगे रहने के कारण करणविंगम शब्द से "अन्यारादितरदिशन्दाज्यूत्तरपदाजाहियुक्ते" इस सूत्र से पचमी हुई है ।। ५५ ।।
शब्दायन्ते मधुरमनिलैः कीचका: पूर्यमाणाः संसक्ताभिस्त्रिपुरविजयो गीयते किन्नरीभिः । निर्ह्रादस्ते सुरज इव चेत्कन्दरेषु ध्वनिः स्यात् संगीतार्थो मनु पशुपतेस्तत्र भावी समग्रः ॥ ५६ ॥
अन्वयः -- जनि पूर्यमाणा: कीचका: मधुरम् शब्दायन्ते संसक्ताभिः किनरीमि: त्रिपुरविजयः गीयते कन्दरेषु ते निर्ह्राद: सुरजे ध्वनिः इव स्यात् तत्र पशुपतेः समयः संगीतार्थः भावी नतु ।
व्याख्या (हे मेघ 1) मनिल पवनः पूर्यमाणाः पूरिताः, कीचका:- वेणुविशेषा, मधुरम् धाव्यम्, शब्दायन्तेस्वनन्ति संसक्ताभिः संयुक्ताभिः किन्नरीभिः किन्न र कामनीभिः त्रिपुरविजय त्रिपुरासुरवधः, गीयते स्तुपते कन्दरेषु गुहासु ते मेघस्य निर्ह्राद:निर्घोषः मुरजे मृदंगे,

ध्वनिः शब्दः, हवयथा स्यात् भवेत् तत्र चरणन्याससमीपम् पशुपतेः शिवस्य संगीतार्थः संगीतवस्तु समय: सम्पूर्णः भावी भविष्यति, ननु ।
शब्दार्थ:- ( हे मेघ !) अनिल पवन के द्वारा पूर्यमाणाः जिनके छिद्र भर दिये गये हैं वे, कीचका:वेणु विशेष, मधुरम् कर्णप्रिय शब्दायन्ते ध्वनि करते हैं. संसक्ताभिः ( आपस में मिली हुई किन्नरोभिः किश्वर ) वधुओं के द्वारा, त्रिपुरविजय: त्रिपुरासुर का वध, गीयते गाया जाता है- कन्दरेषु गुफाओं में, ते तुम्हारा, निर्ह्रादिःनिर्घोष, मुरजे मृदंगपर, ध्वनिःशब्द की इव तरह, स्यात् = ( यदि ) होगा ( तो ) तत्र तब पशुपते: शिवजी का संगीतायैः संगीत वस्तु समय: सम्पूर्ण भावी हो जाएगा, ननु अवश्य
भावार्थ:- हे मेष वायुपूरिताः कीचकाः कर्णप्रियं शब्दं कुर्वन्ति । संयुक्ताः किन्नरवनिताः शिवस्य त्रिपुरविजयं गायन्ति गुहासु तय निर्घोषः मृदंगे ध्वनिरिव यदि भवेत् तहि शंकरस्य संगीतार्थः सम्पूर्ण भविष्यति ।
हिन्दी (हे मेघ ) वायु से भरे कीचक ( वेणु विशेष ) कर्णप्रिय शब्द कर रहे हैं, आपस में मिली किनारियां शिवजी के मयनिर्मित त्रिपुरविजय का मान करती हैं, कन्दराओं में यदि तुम्हारा निर्दोष मृदंग की ध्वनि के समान हो जाए तो शिवजी का संगीत सम्पूर्ण हो जाएगा। -
समास: त्रीणि पुराणि यस्य स त्रिपुरः ( बहु० ) या त्रयाणां पुराणो समाहारः त्रिपुरम् (समाहारद्विगुः ) त्रिपुरस्य विजय: त्रिपुर विजयः ( च० तत्०) पशूनां पतिः पशुपतिः ष० त०) तस्य, संगीतस्य अर्थः संगीतार्थ ( ० तत्० ) ।
कोश: कीचको दैत्यभेदे स्याष्ठवंशे दुमान्तरे, इति विश्वः दरी तु कन्दरो वास्त्री, इत्यमरः । तौयंत्रिक संगीतं न्यायारम्भे प्रसिद्ध सूर्याणां त्रिये च इति शब्दार्णवः तौर्यत्रिकं नृत्यगीतं वाद्यनाट्यमिदं त्रिषु इत्यमरः । अयोऽभिधेये वस्तु प्रयोजननिवृत्तिषु इत्यमरः ।


टिप्पणी-पूर्यमाणाः- पिजन्त "पूरि" धातु से लट्लकार के स्थान पर "शानच्" आदेशकर "पूर्वमाण" ऐसा शब्द बनता है। मधुरम्-यह क्रिया विशेषण है। शब्दायन्ते "शब्द" शब्दसे "शब्दं कुर्वन्ति" इस अर्थ में "शब्द- वैरकलहान कण्वमेधेय:" इस सूत्र से "बन्प" प्रत्यय करके लट् लकार के प्रथम पुरुष के बहुवचन (शि) का "शब्दायन्ते" ऐसा रूप होता है। किन्नर:- यह एक देवयोनि विशेष है ये दो प्रकार के होते हैं। एक जाति के किन्नर के होते हैं जिनके मुँह घोड़े का और अङ्ग मनुष्य की तरह और दूसरे के होते हैं। जिनका मुँह तो मनुष्य की तरह और शेष अङ्ग घोड़े के होते हैं। इनका कण्ठ बड़ा ही सुरीला होता है। ये लोग बहुत अच्छा गाते हैं। त्रिपुरविजयः- :-मय दानव ने लोहे, सोने और चाँदी के तीन पुर ( लोक ) निर्माण कर और उसमें सुरक्षित रूप से रहकर देवताओं को सताया करता था तब देवताओं की प्रार्थना करने पर शिवजी ने उसको परास्त किया था। गीयते"" धातु से कर्म में सह प्रत्यय करके धातु को बारव करके उसे पुनः ईकारादेश करके लट् लकार के प्रथम पुरुष के एकवचन में गीयते ऐसा रूप बनता है। सङ्गीतम् सम्यग् गीतम् सङ्गीतम् - यहाँ "कुगतिप्रादयः " से समास हुआ है। ननु - यह निश्चयार्थक अव्यय है।
अलंकार:- यहाँ शिवजी के चरण-चिह्न के समीप कीचक शब्द, किन- रियों का विजय गीत और मेषध्वनि के क्रम से होने से पर्यायालङ्कार हुआ एवं "मुरज हब" यहाँ धोती उपमा है। एवक दोनों के अंगागिभावतया रहने के कारण संकर बलंकार है ।। ५६ ।।
प्रालेयारुप समतिक्रम्य तांस्तान्विशेषान्
हंसद्वारं भगुपति यशोवत्मं यत्क्रौञ्च रन्ध्रम् ।
तेनोदोचीं दिशमतु सरेस्तिर्यगायाम-शोभी
श्यामः पादो बलिनियमनाम्युद्यतस्येव विष्णोः ॥५७॥

व्याख्या (मेघ) प्रायादे: - हिमालयस्य उपतम् तस्य समीपे तान् तान् विशेषान्प्रसिद्धान् पदार्थान्, अतिक्रम्य उरलय, हंसारम् - चक्राङ्गद्वारम् भृगुपतियशोवत्मं परशुराम कीर्तिमार्गम् यत् क्रोचरन्धम् काबिलम् तेन विलेन, बलिनियमनाभ्युद्यतस्य पतिनिबन्धोत्सुकस्य, विष्णोः वामनस्य, श्यामः कृष्णः पादः इववरण इव तिर्यगायाम (शोभीतरी देणोभी (सन् त्वम् ) उदीचीम् उत्तराम् दिशम् आणाम अनुसरेः अनुगच्छ
शब्दार्थ:- ( हे मेघ ) प्रावा हिमालय के उपतटम्तों के समीप, तान्तान् विशेषान् उन उन विशेष प्रसिद्ध पदार्थों को अतिक्रम्य = लांघ कर हंसद्वारम् हंसों का मार्ग, भृमुपतियशोवत् परशुराम के पक्ष का मार्ग, बंद जो चरन्धम् पर्वत के नामक विवर ते उस विवर से, बलिनियमनाभ्युद्यतस्य पति को वश करने में तत्पर, विष्णोः वामनावतार भगवान विष्णु के पयामः कृष्ण वर्ग के पादचरण की तरह तिरंगायामशोभी टेड़ा लम्बा होने के कारण सुन्दर लगने वाले, (दुम ) उदीचीम् उत्तर दिशम् दिशा को अनुसरेचले जाना। = =
अन्वयः - प्रालेयाः उपदम् तान् तान् विशेषान् अतिक्रम्य हंसद्वारम् पतियो यत् तेन नियमनाऽम्युद्यतस्य विष्णोः श्यामः पाद इव तोयंगायामशोभी उदीचीम् दिशम् अनुसरे
भावार्थ: है मेघ! हिमालयलट निकटे दर्शनीयान् पदार्थान् दृष्ट्वा सद्वारेण परशुराम यशः- सूचकेन चास्यपर्वतविलेन त्वम् बलिनिबन्धन- तत्परस्य वामनस्य यदीयामपाद इव शोभायमानः सन् उत्तरां दिशम् गच्छ ।
हिन्दी (हे मेघ) हिमालय पर्वत के किनारे उन प्रसिद्ध पदार्थों को देखकर मानसरोवर जाने वाले हंसों के मार्गभूत, परशुराम की कीर्ति के सूचक "कोच" नामक पर्वत के छिद्र से बलि को वश करने में तत्पर भगवान् वामन के श्याम रंग के पैर के समान टेढ़ा और विस्तृत से शोभायमान तुम उत्तर दिशा को चले जाना। मे० ० १०


- समासः तदानो समीपम् उपतरम् (अव्ययीभावः) | हंसानां द्वारम् हंसारम् ( ० तत्० ) । भृगूणां पतिः भृगुपतिः (प० त०) भृगुपतेः यशः भृगुपति यशः ष० तत्) भृगुपतियशसः च भृगुपति-यशोव ( ब० स० ) कौचस्य राम् कौचरन्धम् (प० द०) । बलैः नियमनम् बलिनियम- नम् (तत्) तस्मिन् अभ्युद्यतः बलिनियमनाभ्युत (००) वस्य तिर्यक चासो आयाम: तिर्यगाथाम: ( कर्म० ) तेन शोभते तच्छील इति तिरंगायामशोभी। =
कोशः प्रालेयं मिहिका चाय इत्यमरः । विशेषोऽवयवेभ्येष्टम वस्तुनि इति यादव देयमावास आताहः इत्यमरः ।
टिप्पणी- प्रालेयम् - प्रलीयन्ते पदार्था अस्मिन्निति प्रलयः प्रलयादा- गतम् प्रालेयम् । "अ" उपसर्गपूर्वक "आश्लेष" अर्थ में विद्यमान "ली (ङ) धातु से "एरच्" इस सूत्र से अच् प्रत्यय करके प्राय ऐसा रूप बनाया जाता है और प्रलयादागतः इस विग्रह में "प्रलय" शब्द से "तद् आगतः " इस सूत्र से प्रत्यय करके आदि वृद्धि करके "केकय-मित्र प्रलयानां वादेरियः " इस सूत्र से "य" को "इय" आदेश करके गुणादि करके प्रालेयम्" ऐसा सिद्ध होता है। हंसद्वारम् कवि प्रसिद्धि है कि हंस लोग मानसरोवर इसी कीथ- पर्वत के चित्र से जाते हैं अतः 'हंस द्वारम्" यह विशेषण दिया गया। मृगोरपत्यानि पुंमासः इस विग्रह में "मृगु" शब्द से अपत्य अर्थ - दृष्टि- कुरुभ्यश्च" इस सूत्र से अणु प्रत्यय होता है। परन्तु बहुत्व विवक्षा में भृगुपतियश:- मृगु कुत्स वसिष्ठ- गौतमाङ्गरोभ्यश्च" इससे प्रत्यय का क हो जाता है। नियमनम् — "नि" उपसर्गपूर्वक "यम्" धातु से भाव मैं ल्युट् प्रत्यय करके "नियमन" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। पुराणों में ऐसी कथा आती है कि परशुरामजी ने कार्तिकेयजी से स्पर्धा करते हुए कोच पर्वत में छिद्र कर डाला था। बस इसी कथा के आधार पर उक्त छिद्र परशु रामजी का यशोवत्म हो गया।

अलङ्कारः—– “यशोवत्र्त्म" यहाँ तो रूपक अलंकार है एवं "विष्णोः पाद " यहाँ भीती उपमा है एवञ्च दोनों का अङ्गाङ्गिभाव रहने से संकर अलंकार है ।। ५७ ॥
गत्वा चोवं दशमुखभुजोन्छ्वासित प्रस्य सन्धेः कैलासस्य त्रिदशवनितादर्पणस्यातिथिः स्याः ॥ शृङ्गाच्छ्रायैः कुमुदविशदेयों वित्तत्य स्थितः खं राशीभूतः प्रतनिमिव त्र्यम्बकस्याट्टहासः ॥५८॥ अन्वयः -- गत्वा दशमुख जोड्यासित प्रस्थ-सन् दिवानि तादर्पणस्य कैलासस्य अतिथिः स्याः यः कुमुदविदः प्रोच्छ्रायः वितत्य प्रतिदिनम् राशीभूतः व्यम्बकस्य इव स्थितः ।
व्याख्या ( हे मेघ 1 ) ऊर्ध्व उपरि च गत्वा प्राप्य दशमुखमुजो च्छ्वासिन् रावणबाह्वालिङ्गितानुसन्धेः विदशवनितादर्पणस्प देवललनामुकुरस्य कैलासस्य शिवादे, अतिथिः आगन्तुकः स्याः भवेः । यः कैलासः कुमुदविशदेः श्वेतपद्मधवलैः शृङ्गोच्छ्रायैः शिखरोनत्यैः, खम् नमः, वित्तस्यः व्याप्य प्रतिदिनम् दिने दिने, राशीभूतःपुञ्जीभूतः, त्र्यम्बकस्य वासुरस्य अट्टहास इतिहास इव स्थितः विद्यमानो वर्तते इति भावः ।
शब्दार्थ और ऊपर गया-जाकर दशमुच्छ्वासित प्रस्थसन्धेः रावण की भुजाओं के आलिङ्गन से वियोजित शिखर सन्धि वाले, त्रिदशवनितादर्पणस्य देवताओं की स्त्रियों के लिए दर्पण के समान; कैलासस्य कैलास पर्वत का अतिथिः आगन्तुक, स्याः होना या जो कैलास पर्वत कुमुदविशदेः कमल के समान हवेत शृङ्गाः चोटियों को ऊँचाई से साकाश को, वितत्यव्याप्त कर प्रतिदिन प्रतिदिन, राशीभूतः एकत्रित व्यम्बकस्य शिवजी के, अट्टाहास इव उहाका ( जोर की हँसी) सा स्थितः स्थित है।

= समास: दशमुखानि यस्य सः दासुखः ( बहु० ), दशमुखस्य भुजाः- दामुखभुजाः ष० त०) ते उच्छ्वालिताः दशमुलीच्छ्वासिताः (तृ० तद् ) प्रस्थसन्धयो यस्य सः दामुखमुजोच्छ् वासितप्रस्थसन्धिः (बहु०) तस्य । तिम्रो दशाः येवान्ते त्रिदशाः ( बहु० ) तेषां वनिताः त्रिदशवनिता ( प० तत्) तासां दर्पण: त्रिदशवनितादर्पण (प० तत्० ) तस्य शृङ्गाणाम उच्छ्रायः शृङ्गोच्छ्राये ( प० तत्०) कुमुदानीव विशदा: कुमुदविशदा ( उपमान कर्म० ) तैः दिने दिने इति प्रतिदिनम् ( अव्ययीभावः) श्रीणि अम्बकानि यस्य सः व्यम्बकः ( बहु० ) जयाणाम् ( लोकानाम् ) अम्बक: (पिता) त्र्यम्बकः (no a०) मीन (वेदान्) अम्बते (उपायते इति व्यम्ब यम् एव व्यम्बकः स्वार्थे कन् (द्वि० तत्० ) । S = = =
भावार्थ:- (हे मे !) कोबलानित्यच गत्वा रावणवाहूद्वार स्थित सन्धेः देवललनामुकुरभूतस्य कैलासस्य भागन्तुको भवः । यः कैलासः श्वेतपयले शृङ्गकाशमभिव्याप्य पुज्जीभूतः शिवस्य अट्टहास व वर्तमानोऽस्ति ।
हिन्दी (हे मैप 1) कौबिल से बाहर निकलने के बाद ऊपर जाकर, रावण ने अपनी भुजा के मन से जिसकी घोटियों की सन्धि को ढीला कर दिया और देवाङ्गनाओं के लिए दर्पण के समान है उस कैलास पर्वत का अतिथि बनना। जो कैलास पर्वत कमल के समान अपनी उजली ऊँची चोटियों से were को व्यास कर शिवजी के पुजीकृत अट्टहास के समान विद्यमान है।
कोश:- अमरा निर्जरादेवास्त्रिदशा विबुधाः सुराः इत्यमरः । विरूपा- स्त्रिलोचनः इत्यमरः । मट्टावतिशयक्षोभी, इति यादव विशदश्वेतपाण्डुरा, इत्यमरः ।
टिप्पणी- गत्वा "गम्" धातु से "क्वा" प्रत्यय करके गत्वा बनाया जाता है। दशमुखजच्छ्वासित० वाल्मीकि रामायण में एक कथा आती है कि रावण एक बार बल के मद से मदान्ध होकर कैलास पर्वत को लंका में उठा ले जाने की इच्छा से उसे भुजाओं से उखाड़ने लगा। रावण के इस तरह करने से कैलास पर रहने वाले सभी जीव-जन्तु विकल से होने लगे, अधिक नया

पार्वतीजी ने भी भयातुर होकर शिवजी का आलिङ्गन किया। इधर सभी को भयभीत देख शिवजी ने रावण के अभिमान को चूर्ण करने के लिए कैलास पर्वत को अपने अंगूठे से नीचे की ओर दबाया। परिणामस्वरूप कैलास तो बैठ ही गया साथ ही रावण भी उसी में कुचला जाने लगा। तब रावण के बहुत प्रार्थना करने पर शिवजी ने उसे बचा लिया। कैलासः केलीनां समूहः कैलम् " तस्य समूहः " इस सूत्र से अणू प्रत्यय हुआ और कैलेन जास्यते अस्मिन्निति "कैलास:" 'कैल' उपपदक "मास" धातु से "हलाल" इस सूत्र से अधिकरण में "चत्र" प्रत्यय करके "कैलास" यह रूप निष्पन्न होता है। अतिथिः-विध माना तिथिर्यस्य स अतिथिः जहाँ नत्रोस्त्वयना वाच्यो वाचोत्तरपदलोपः ' इस वार्तिक से न बहुव्रीहि समास हुआ है तब "अतिथि" ऐसा रूप बनता है। राशीभूतः - अराशि: राशिः यथा सम्यद्यते इति राशीभूतः "अभूततद्भाव" अर्थ में 'वि' प्रत्यय हुआ है। धायाः भवणानि बाधा सेवा अर्थ में विद्यमान 'बि' धातु से 'बिणीभुवोऽनुपसर्गे इस सूष से पञ्' प्रत्यय करके 'चाय' ऐसा रूप बनता है। एवं उद्गताः श्रायाः उच्छ्रायाः 'कुगतिप्रादय:' इस सूत्र से समास हुआ है।
अलंकार:- प्रस्तुत पद्य में 'कुमुदविवादे' यहाँ उपमा एवं 'अट्टहास इव' यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है और दोनों अङ्गाङ्गिभाव रूप से विद्यमान हैं। अतः 'संकर' कार है ।। ५८ ।।
उत्पश्यामि त्वयि तटगते स्निग्धभिन्नाञ्जनाभे
सद्यः कृत्तद्विरददशनच्छेद - गौरस्य तस्य ।
शोभामः स्तिमितनयन-प्रेक्षणीयां भवित्री-
मसंन्यस्ते सति हलभूतो मेचके वाससीव ॥ ५९ ॥
अन्वयः -- स्निग्धभिन्नानामेववि तटगते सद्यः कृत्तद्विरददशनच्छेद- गौरस्य तस्य अद्रेः मेचके वाससि असंन्यस्ते मति लभृत इव स्तिमितनयन- प्रेक्षणीयाम् शोभाम् भवित्रीम् उत्पश्यामि ।
व्याख्या स्निग्धमिवाऽजनाऽऽभे चिक्कणमदित कलकान्तौ त्वयि मेथे, सटगते सानुगते, (सति) सद्यः तत्क्षणम् कृतद्विरददनछेद- =

= = - गौरस्य छिनहस्तिदन्तस्य तस्य पूर्वोक्तस्य पर्वतस्य, कैलासस्येतिभावः । मेचकेयामे वाससि वस्त्रे, असंत्यस्तै अपरित्यक्ते स्कन्धस्यापित इत्यर्थः सभृत इव रामस्येव स्तिमित- नयनप्रेक्षणीयाम् निश्चलनयनदर्शनीयाम् भवित्रीम् भाविनीम् शोभाम्यम उत्प श्यामि तर्कयामि ।
= = - शब्दार्थ :- स्तिग्धभिनाजना में पीने गये चिकने सुरमे के समान कान्ति वाले स्वयि तुम्हारे, तटगतेसमीप जाने पर सद्यः कृतद्विरद- दशनच्छेदगौरस्य तुरन्त काटे गये हाथी के दांत के समान उजले तस्य उस पर्वत के कैलास के), मेबकेकाले वाससि कपड़े के असंन्यस्ते नहीं छोड़ने पर अर्थात् कन्धे पर रखने पर लभृतः बलराम के समान स्तिमितनयनप्रेक्षणीयाम् नि नयन से देखने योग्य भवित्रीम् होने बाली शोभाम्मुन्दरता की उत्पश्यामि संभावना (मैं) करता हूँ ।
भावार्थ: आर्य ने चिक्कणमतिको त्वथि कैलाससमीपगते सति तत्क्षणकृत हस्तिदन्तस्य तस्य पर्वतस्य श्यामवसन्यस्तस्क- बलरामस्य निपनदर्शनीया शोभा तर्कयामि ।
हिन्दी बिकने सूरमे की चमक के समान चमक वाले तुम्हारे समीप जाने पर तुरन्त काटे गये हाथी के दाँत के समान उजले उस कैलास पर्वत की सुन्दरता का कंधे पर रखे काले कपड़े से होने वाली बलराम की नि से देखने योग्य शोभा के समान में संभावना करता
समासः स्निग्धं च तदभिन्नम् स्निग्ध भिन्नम् (कर्म) स्निग्धभिच तदञ्जनम् स्निग्धदिनाज्जनम् (कर्म० ) तस्यैव जाभा यस्य स स्निग्धभिन्ना- नाभः (बहु० ) तस्मिन् तटंगतः तटगतः (द्वि तद्०) तस्मिन् डो रौ यस्य स द्विरदः (बहु० ) द्विरदस्य दशनः द्विरददशन (प० त०] ) सच कृत्तः सद्यः कृतः ( सुप्सुपैति समासः ) सद्यः कृतवासी द्विरददशनम कृत्तद्विरददशन: (कर्म० ) तस्याच्छेदः (प० तत्०) दिव गौरः सद्यः कृत द्विरददशनच्छेदौर (उपमानकर्मधारयः ) तस्य स्तिमिते च ते नयने स्तिमितनयने (कर्मधारयः) ताम्यां प्रेक्षणीयाम् स्तिमित- नयन- प्रेक्षणीयाम् ( वृ० तद०) ।

= टिप्पणी- स्निग्धः "हि" धातु से "" प्रत्यय करके स्निग्ध ऐसा रूप निष्पन्न किया जाता है। स्निग्धभिन्नाज्जनाने यहां "सप्तमी विशेषणे बहुव्रीहो" इस सूत्र के "सभी" पद से शापित व्यधिकरण बहुव्रीहि समास हुआ है। कृतः कृत् धातु से "क्त" प्रत्यय करके "कुत्तः" ऐसा शब्द निष्पन्न होता है। हलतः बिभर्तीति "मृत्" मरण अर्थ में विद्यमाने "" (ज) धातु से 'वि' प्रत्यय करके "भृत्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। हलं विमति इति हरु यहाँ "उपपद समास" हुआ है।
कोश:- चिनकर्ण मसृणं स्निग्धम् इत्यमरः सद्यः सपदि तत्क्षणे इत्यमरः । रचना दशना दन्ताः इत्यमरः कृष्णे नोलासितवयामकालस्यामल- मेचकाः इत्यमरः । स्कन्धो भुजशिरोमोऽस्त्री, इत्यमरः ।
बल दूर:- यहाँ कज्जल की तुलना मेघ से और काले वस्त्र से भी मेघ की तुलना की गयी है एवं हिमालय की तुलना बलराम से की गयी है अतः उपमालङ्कार है ।। ५९ ॥
हित्वा तस्मिन् भुजगवलयं शम्भुमा दत्तदस्ता
क्रीडा-शैले यदि च विचरेत्पाद-चारेण गौरी ।
भङ्गी भक्त्या विरचित वपुःस्त भतान्तजलौघः
सोपानत्वं कुरु मणितटा- रोहणायाप्रयायी ॥ ६०॥

अन्वयः - तस्मिन् क्रीडाले शम्भुना भुजगवलयम् हित्वा दत्तहस्ता गौरी पादचारेण विचरेत् यदि अपाय स्तम्भिताऽन्तर्जलीयः भीभक्त्या विरचितवपुः मणितटारोहणाम सोपानत्वम् कुरु ।
व्याख्यातरिम पूर्वोक्ते क्रीडाकेलि पर्वते कैलास इति यावत् । शम्भूनाशिवेन भुजगवलयम् अहिकदुणम्, हित्वा परित्यज्य दत्तहस्ता= करालम्बा (सती) गौरी पार्वती, पादचारण-चरणः संचारण, विचरेत् चले यदि चेद ( तहि ) अग्रयायी अग्रेसरः, स्टम्भितान्तलोपः अवर- द्वान्तरतोय वेग भङ्गीभक्त्या पर्वरचनया, विरचितवपुः निमितशरीरः

= ( स्यम् ) मणितटारोहणाय रत्न-सटाऽऽरोहणाय सोपानम् शृङ्खला भावम् कुरु विधेहि सोपानरूपस्त्वं भव इति भावः ।
शब्दार्थः तस्मिन् उस क्रीडाले लिपर्वत ( कैलास ) पर भुजग वलयम्स के कंगन को हित्वा छोड़कर पाना शिवजी के द्वारा, दत्तहस्ता हाथ का सहारा दी गयी, गौरी पार्वती, पादचारेण पैरों से, विचरेत् चलें, यदि तहितो अग्रयायी आगे आगे चलते हुए, स्तम्भ- तान्जली: भीतर जल के प्रवाह को रोके हुए, भंगीभवस्था पौड़ियों के क्रम से, विरचित वपुः शरीर की रचना वाले (तुम) मणितटारोहणाय मणि तट पर चढ़ने के लिए, सोपानत्वम् कुरुसीड़ी का काम करना ।
भावार्थ:- हे मेघ । तस्मिन् पर्व फैलाने ( भयापनोदनाथ कर्ण परित्यज्य शिवेन प्रातरावस्था पार्वती यदि पद्भ्यां विहरेत् तर्हि अग्रेसर अवरुद्धान्तसमूहस्त्वं स्वशरीरेण पर्वरचनां कृत्वा मणितटारोहणाय सोपानरूपो भव ।
हिन्दी - हे मेम ! उस क्रीड़ा पर्वत (कैलास ) पर साँप के कंगन को छोड़कर शिवजी के द्वारा हाथ का सहारा दी गयी पार्वती यदि पैदल चले तो तुम आगे-आगे चलते हुए भीतर जल के प्रवाह को रोके हुए अपने शरीर के द्वारा पौड़ियों की रचना कर मणितट पर चढ़ने के लिए सीड़ी का काम करना ।
= समास: क्रीडायाः पत) तस्मिन् भुजग एव वलयम् भुजगवलयम् (कर्मधारण) दत्तः हस्तो यस् सा दत्तहस्ता ( बहु० ) जलानाम् ओषः = जदोषः (० ० ) अन्तः स्थितः जलौघः अन्तर्जलौघ (मध्यपदलोपी) स्तम्भितः अन्तोषः येन सः स्तम्भितान्तलोपः (बहु० ) । विरचितं वपुर्येन सः विरचितवपुः (बहु० ) भङ्गीनां भक्ति = भङ्गीभक्तिः ( [ष० त०) तथा मणीनां तम् मणितम् (प० सत्०) मणिवटे आरो हणं मणितटारोहणम् (प० तत्० ) तस्मै । =
कोश:- आवापकः परिहार्यः कटकी बलवोऽस्त्रियाम् इत्यमरः । निकर- व्रातवारांपात सन्चयाः इत्यमरः आरोहणं स्यात् सोपानम् इत्यमरः ।

टिप्पणी- क्रोडाशैले कैलास पर्वत को क्रीडापर्यंत कहने में शम्भु रहस्य का उत्त श्लोक प्रमाण है-
कैलाश: कनकाऽद्विपच मन्दरो गन्धमादनः । निर्मिताः शम्भोदेवैः क्रीडाद्रयोऽभवन् ।।
पादचार:- चरण पार गत्यर्थक "ब" धातु के भाव में "हलय" इस सूत्र से धन् प्रत्यय करके "चार" ऐसा शब्द निष्पन्न होता है। अप्रयायी- अग्रे यातीति तच्छीलः इस विग्रह में अय उपपदपूर्वक गत्यर्थक "या" धातु से " णिनि' प्रत्यय करके वृद्धादि करके अग्रवादी" ऐसा रूप बनता है। भक्ति:- "भज्धालू से वितन् प्रत्यय करके "भक्ति" ऐसा शब्द बनता है। विरचितम्- "वि" उपसर्गपूर्वक "र" धातु से कर्म में प्रत्यय करके "विरचितम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। आरोहणम्"आह" उपपूर्वक "ह" धातु से "ल्यूट" प्रत्यय करके "आरोहणम्" ऐसा रूप बनाया जाता है।
अलङ्कार:- यहाँ भुजग में वलय का आरोप किया गया है अतः "रूपक" अलङ्कार है ।। ६० ।।
तवश्यं वलय कुलिशोद्घट्टनोद्गीर्णतोयं
नेष्यन्ति त्वां सुरयुवतयो यन्त्रधारागृहत्णम् । ताभ्यो मोक्षस्तव यदि सखे ! धर्मलब्धस्य न स्यात् क्रीडालोला: श्रवणपरुषः गर्जितैर्भाययेस्ताः ॥ ६१ ॥ अन्वयः -- तत्र अवश्यम् सुरयुवतयः वलयकुलिशोदमनोद्गीर्णतोयम् स्वाम्यवधारागृह्त्वम् नेष्यन्ति । हे सखे! पस्य तब ताभ्यः मोक्षः न स्यात् क्रीडाः ताः ताः श्रवणपरुष भाययेः ।
व्याख्या- हे मेम !) तर कैलासे अवश्यम् नूनम् सुरयुवतयः देवलखना, जलकुलिशोषकृतोद्गीर्णवोयम् कङ्कणकोटिताडनोत्सृष्टम् त्वाम्मैधम्, परधारागृहत्वम् कृत्रिमधाराने हत्वम् नेष्यन्ति प्रापविष्यन्ति । है स [ भित्र ! धर्मस्वातपातस्य तव मेघस्य, ताभ्यः देवयुवतिभ्यः, मोक्षः मुक्ति न स्यादन] भवेत् (वेद) "हि" क्रोडालोला: - =

सहायाः वेदवाओं अर्थात् बधाराओं के साथ, बालापाः वार्ताप करते

=
हुए कामिनःकामुक लोग प्रत्यहम् प्रतिदिन, रक्तकण्ठे मधुर स्वर से, धनपतिषथः कुबेर की कीर्ति का उद्गायद्भिः स्वर में गान करते हुए, किन्नरैः किन्नरों के सार्धम् साथ, वैचाजारूपम्प्राजनामक बहिरुप वनम् बाहरी उद्यान का ( कुबेर के उद्यान का) निविशन्ति उपभोग करते हैं ।। ८ ।। = - =
भावार्थ: स्थालका गृहाभ्यन्तरेऽपरिमित संग्रहीत संपत्तयः कामिनः अप्सरोभिः सह वार्तालापं कुर्वन्तः कुबेर कीर्तिम् मधुर-तार स्वद्गायद्भिः किम्पुरुषः सह प्रत्यहं वैभाजनामकस्य बाह्योद्यानस्योपभोगं कुर्वन्ति ।। ८ ।।
हिन्दी - जिस अलका में जिनके घरों में अपार सम्पत्ति भरी पड़ी है, ऐसे कामुक लोग देवाङ्गनारूपी वेदयाओं अर्थात् अप्सराओं के साथ प करते हुए कुबेर के यश का मधुर एवं ऊँचे स्वर में गान करते हुए किन्नरों के साथ वैप्राज नामक बाह्य उद्यान का आनन्द लेते हैं।
= समासःन जय्या अक्षय्या ( नव्०) भवनेषु इति अन्तर्भवनम् ( अव्ययीभाव विभक्त) बन्ने निद्ययः अन्तर्भवनप्रियः (स० ४०) अक्षय्याः अन्तर्भवनिद्ययः येषां ते वननिधयः (बहु० ) विबुधानां पतिताविधवनिता (प० त०), वारे मुख्याः वारमुख्याः (स० त०) विबुध वनिता एवं वारमुख्याः विबुध वनिता वारमुख्या (रूपक० ) ता एव सहाया वेषां ते विबुधनिता चारमुख्या सहायाः ( बहु० ) बद्धः आलापो यस्तैः बद्धालापाः (बहु० ) । अनि अति इति प्रत्यहम् वीप्सापा sourभाव ) रक्तः कण्ठः येषान्ते रक्तकण्ठाः ( बहु०) ते धनानां पतिः। धनपति ( प० त०) तस्य यशः धनपतियशः (प० तद्०) तद्वैभ्रायम् यस्य तत् वैजाप (बहु० ) । -
कोश: वारस्त्री गणिका वेश्या रूपाजीवाद सा जनैः सवृत्ता वारमुख्या स्वात् इत्यमरः स्यात्किन्नरः किम्पुरुषः तुरङ्गवदनो मयुः इत्यमरः पुमाना क्रीड उद्यानं राजः साधारणं वनम् इत्यमरः ।
टिप्पणी योग्यम् इस विग्रह में 'क्षि' धातु से "क्षय्यजम्यो शक्यायें "

इस भूग से "पद्" प्राय करके धातु को गुण, अयादेश आदि करके "क्षय्य" रूप  किया जाता है। अन्तर्भवनस्-यहाँ यं विभक्ति समीप" इत्यादि सूत्र से विभक्त्यर्थं में नित्य अव्ययीभाव समास हुआ है। बालापा:- "ब्राह" उपसर्गपूर्वक "" धातु से भाव में "भव" प्रत्यय करके वृद्धपादि करके "आलाप" शब्द निष्पन्न होता है, उक्त रूप प्रथमा के बहुवचन का है। बद्धालापाः- इसके स्थान पर "बडापानम्" ऐसा भी पाठान्तर मिलता है। यहाँ बद्धम् आपानं यस्मिस्तद बढापानम् ऐसा विग्रह करके और वह बहिरूपवनम् का विशेषण होगा। उद्गायद्भिः उद उपसर्गपूर्वक "" धातु से लट् लकार के स्थान पर प्रत्यय करके तृतीया विभक्ति के बहुवचन का यह रूप होगा। वैभ्राजम्-विभ्राजस्येदम् इस विग्रह में "विभ्राज" शब्द से "तस्येदम्" इस सूत्र से "अन् " प्रत्यय करके "वैभ्राजम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है ॥ ८ ॥
अलङ्कार - यहाँ पर भी "उदास" बलद्वार है ॥ ८ ॥
गत्युत्कम्पादक- पतितैर्यत्रमन्दारपुष्पैः,
पत्रच्छेदैः कनककमलैः कर्णविभ्र शिभिश्च ।
मुक्ताजाले, स्तनपरिसर छिन्नसूत्रंश्च हार- शो
मार्गः सवितुरुदये सूच्यते कामिनीनाम् ॥९॥

अन्वयः -पत्र, कामिनीनाम् नैशः मार्गः सवितुः, उदयेत्युकम्पाद अलक पतितै, मन्दारपुष्पैः परच्छेदः कर्णविशिभिः कनक कमल, मुक्ता- जाते, स्तनपरिसरनिसूत्र हारंभ सूभ्यते ॥ ९॥
व्याख्या पत्र बलकायाम्, कामिनीनाम्प्रभिसारिकाणाम्, नैश: निशासम्बन्धि मार्गः अध्वा सवितुः दिनकरस्य उदये-उदिते सति मत्लु- [त्कम्पात् = गमनसन्चलनाद, अलक पतितैः पूर्णकृन्स्ः मन्दारपुष्पैः मन्दारकुसुमैः पत्रच्छेदैः किसलयमण्ड, कर्णविभ्रंशिभिः कनक- कमलैः स्वर्णपदमैः, मुक्ताजाले मौक्तिक-सरे, स्तनपरिसरभि सूत्र:- कुच प्रदेश-वृति तन्तुभिः हारमभिन्न, सूभ्यते शाप्यते ।। ९ ।। = -

- - शब्दार्थः यत्र जिस अलका में कामिनीनाम् अभिसारिकाओं का, नैयो मार्गः रात्रि का मार्ग, सवितुःसूर्य के उदये उदित होने पर, मत्युत्कम्पात् चलने के समय हिलने के कारण, अलक- पतितः घुंघराले बालों से गिरे, मन्दारपुष्पैः मन्दार के फूलों के द्वारा पत्रच्छेदःपत्तों के टुकड़ों से, कर्ण विप्रचिभिःकान से गिरे, कनक कमलः स्वर्ण कमलों के द्वारा, मुक्ताज मोतियों को सरियों से स्तनपरिसर छिन पूर्व और स्तन- प्रदेश से टूटे हुए सूत्र वाली, हारंभ मोती की नालाबों के द्वारा, सूच्यते सूचित होता है ।। ९ ।॥ - - - =
भावार्थ:- हे मेघ ! यस्यामलकायामविसारिकाणां रात्रिपन्थाः सूर्योदये सति गमन-काले सन्चलनेन पूर्ण वस्तैः मन्दारकुसुमैः मन्दार-किसलय- सकलैः, योगर्तः स्वर्ण-पर्यः मौक्तिकसरे कुचप्रदेशेषु विच्छिन्नतन्तुभिः मौक्तिकसम्म सूयते ॥ ९ ॥
- समासः - गत्या उत्कम्पः गत्युत्कम्पः (०] तत्०) तस्माद अलकेभ्यः पतितानि अलकपतितानि ( प० ० ) । मन्दारस्य पुष्पाणि मन्दार- पुष्पाणि (प० उत्) ते पत्राणां छेदाः पत्रच्छेदाः ( च० तत्) स्तनयो: परिसरः स्तनपरिसरः (प० तद्०) छिनानि सूत्राणि येषां ते छिन्नसूत्रा: (बहु०), स्तन-परिसरे खिन्नसूत्राः स्तनपरिसरच्छिन्नसूत्राः (स० तद्) । कोशः मन्दारः पारिजातकः इत्यमरः सकारपूर्ण-कुन्तलाः इत्यमरः । = -
हिन्दी - मेघ ! जिस बलका में अभिसारिकाओं का रात्रि का मार्ग चलने के समय बालों से गिरे हुए मन्दार के फूलों से, मन्दार के पत्तों के टुकड़ों से, कान से गिरे स्वर्ण-कमलों से ( बालों में युथे) मोतियों के लड़ों से एवं स्वनप्रदेश पर टूटे हुए सूत्र वाको मोती की मालाओं से दिन में सूचित ( अनुमानित) होता है ।। ९ ।।
पर्यन्तः परिसर, इत्यमरः स्वर्ण व इत्यमरः ।

टिप्पणी-कामिनीनाम् प्रशस्तः कामोऽऽस्यासामिति कामिन्यः तासाम् ॥ चाणक्य ने "आहारो द्विगुणः स्त्रीणां बुद्धिस्तासां चतुर्गणाः पद्गुणी व्यवहाराध कामष्टगुणः स्मृतः " ऐसा स्त्रियों के सम्बन्ध में लिखा है। अतः स्त्री को कामिनी कहा जाता है, क्योंकि उनमें पुरुषों की अपेक्षा बाठगुणा अधिक कामाऽऽवेश रहता है। यहाँ कामिनी का अर्थ सर्वसाधारण स्त्री नहीं अपितु "अभिसारिका" का ग्रहण होता है। नैश:-निशायां भवः सः यहाँ निशा" शब्द से " भव:" इस सूत्र से अन् प्रत्यय और वृद्धि की गयी है। उत्कम्पः- "उद" उपसर्गपूर्वक "कम्प" धातु से भाव में घञ्प्रत्यय करके "उत्कम्पः " ऐसा रूप निष्पन्न होता है। पतितःपद" धातु से 'क' प्रत्यय करके "पतित" शब्द निष्पन्न होता है। कर्णविनंशिभिः कर्णेभ्यः विश्यन्तीति तच्छीलानि इस विग्रह में कर्म उपपदक एवं "वि" उपसर्गपूर्वक "" धातु से "णिनि" प्रत्यय करके उपपद समास करके "कर्णविभ्रंशिन्" ऐसा शब्द निष्पन्न होता है। उता रूप तृतीया के बहुवचन का है। सूच्यते सूच्' धातु से "हेतुमति च" इस सूत्र से पिच् प्रत्यय लाकर पुनः धातु संज्ञा करके ल लकार "चिच" इस सूत्र से आत्मनेपद हो जायेगा, प्रथमपुरुष के एकवचन में सुच्यते ऐसा रूप बन जायेगा |
अलङ्कारः - हाँ रात्रिमा सूचन रूपी एक कार्य के लिए अलक से गिरे हुए मन्दार पुष्प आदि अनेक कारणों का कथन होने के कारण "समुच्चय" अलङ्कार एवं गिरे हुए मन्दार पुष्पों के द्वारा रात्रि मार्ग रूप साध्य का शान होने से "अनुमान" अलङ्कार है ।। ९ ।।
मत्वा देवं धनपतिसखं यत्र साक्षाद्वसन्तं
प्रायश्वापं न वहति भयान्मन्मथः षट्पदज्यम् ।
स्तस्यारम्भश्चतुर- वनिता विभ्रमरेव सिद्धः ॥ १०॥
अन्वयः -पत्र मन्मथः, धनपतिसाम् देवम् साक्षाद, बसन्तम् मत्वा

भयात् पदम् चापम्, प्रायो न वहति तस्य आरम्भः समज- तनयः कामयेषु अमर्षः, चतुर वनिता विभ्रमः एवं सिद्धः ॥ १० ॥
व्याख्या हे मेघ ! पत्रस्यामकायाम्, मन्मथः मदनः धनपति- कुबेर-मित्रम् देवम् शिवम् साक्षात् सद्यः वसन्तम् वर्तमानम्, मत्वाज्ञात्वा भयात् श्रासाद, पपदस्यम् भ्रमरमौविकम्, चापम् धनुः प्रायः =अधिकांशतः, न वहतिब्न धारयति यदि मन्मयः धनु धारयति तस्प कार्यसिद्धिस्तहि कथं भवतीत्याकांक्षायामाह तस्य कामस्य आरम्भः व्यापारः श्रूभङ्गहितनयनैः धूमङ्गसहितप्रजिमा-वलोकनैः कामि लक्ष्येषु कामुकवारम्येषु, अमोषैः सफलः, अनिष्फलेरिति यावत् । चतुर- वनिताविभ्रमैः पटुविलासिनीविलासः एव सिद्धः साधितः ॥ १० ॥ - = -
शब्दार्थः यत्र जिस अलका में मन्मयः कामदेव, धनपतिसम् कुबेर के मित्र देवशङ्कर को साक्षात् शरीर रूप से, बसन्तम् = निवास करते हुए, मत्या जानकर ( न कि देखकर ) घमात्र से षट्पदज्यम्- भ्रमरों को क्या ( दोरी) वाले, चापम् धनुष को प्रायः न वहति प्रायः नहीं धारण करता है, तस्य कामदेव का आरम्भः कार्य ( तो ) स भङ्गम् -- घूमङ्ग के साथ प्रहितनयन: फेंकी गयी दृष्टि वाले ( कटाक्ष ), कामिलक्ष्येषु कामुकपुरुष रूपी लक्ष्यों पर अमोषैः निष्फल नहीं होने वाले, चतुर वनिता विश्रमैः चतुर स्त्रियों के विलासों से ही, सिद्धः- पूरा हो जाता है ।। १० ।। = =
भावार्थ: है मेघ ! यस्यामकायां कामदेवः स्वसुहृद् प्रेम्णा शङ्कर शरीरेण 1 वसन्तं ज्ञात्वा भीमा प्रायः अमरमौविकं चापं न धारयति तस्य व्यापारस्तु भूमङ्गसहित प्रतिवृष्टिभिः कामिजनेष्वनिमषः पटुविलासिनी-विलासः निष्पन्नो भवति ॥ १० ॥
हिन्दी - हे मेघ जिस बढका में कामदेव कुबेर के मित्र शङ्कर को शरीर धारण कर निवास करते हुए जानकर डर के कारण भ्रमरों की डोरी वाले धनुष को नहीं धारण करता है। उसका काम तो भूम के साथ फेंकी

- समासः - मतो मयः सन्मयः ( च० तत्०) धनस्य पतिः धनपतिः ० द०) धनपतेः सखा धनपतिसख (द० त०) तम् पद् पदानि येषान्ते षट्पदा ( बहु० ) पट्पदा एवं श्या यस्य स षट्पदज्य ( बहु० ) तम् । योङ्ग (प० तत्) भूमङ्गेन सहितम् भूभङ्गम् ( तुल्ययोग बहु० ) सभङ्गं प्रहितानि सधूभङ्गप्रहितानि ( नुप्युपैति समासः ) सधूम- जानि नयनानि येषु सहितनयन (बहु० ) कामिन एवं यानि तेषु कामिलक्ष्येषु ( रूपeo ) न मोचा: अमोधा: ( नम्० ) : चतुरायच ताः वनिता चतुर वनिता: (कर्म) तासां विभ्रमाः चतुर वनिता विभ्रमाः ( च० त०)
यी दृष्टि वाले कामी लोगों पर अमोध चतुर स्त्रियों के विकास से ही पूरा हो जाता है ।। १० ।।
कोश:- कुबेरस्यम्बकखः इत्यमरः । मदनो मन्मयो मारः इत्यमरः ॥ धनुश्चापौ धन्वशरासन कोदण्डकार्मुकम् इत्यमरः । स्त्रीणां विकास-विव्योक- विश्रमाः इत्यमरः ।
टिप्पणी- देव:-- दीव्यतीति देवः "दिव्" धातु से "पचाद्यच् करके
गुण करके देव बनता है। वसन्तम्- निवासार्थक 'वस्' धातु से सट् लकार के स्थान पर "श" आदेश करके नुमादि करके द्वि० विभक्ति में "वसन्तम्" ऐसा बनता है षट्पदज्यम्-कवि-प्रसिद्धि है कि अमरों की पंक्ति ही कामदेव के धनुष की प्रत्यचा है। यह उचित भी है। यदि उसका धनुष "पुष्प" का है तो प्रत्यया भ्रमर की होगी ही कामी कामोऽस्त्यस्येति “कामी" यहाँ "" इrिont" इस सूत्र से इनि प्रत्यय हुआ है। सिद्ध:- "सि" धातु से
त प्रत्यय लाकर "सिद्धः" निष्पन्न होता है।
अलङ्कारः इस श्लोक में कामियों में लक्ष्यत्व का आरोप होने से रूपक एवं भ्रमररूपी प्रत्यचावाली धनुष यद्यपि धारणयोग्य है फिर भी उसका निषेध अर्थात् सम्बन्ध में असम्बन्ध की उक्ति होने के कारण अतिशयोक्ति अलार

है एवं दोनों के बङ्गाङ्गिभावतया रहने के कारण "संकर" अवार है ।। १० ।।
वासचित्रं मधु नयनयोर्विभ्रमादेशयक्षं
पुष्पोद्भेदं सह किसलयैभूषणानां विकल्पात् ।
लाक्षारागं चरणकमलन्यासयोग्यं च यस्या-
मेकः सूते सकलमबलामण्डनं कल्पवृः ॥ १२ ॥
अन्वयः - पस्याम् चित्रं वासः, नयनयोः विश्रमाऽऽदेशदशम् मधु, किसलयैः, सह, पुष्पोदद्भेदम्, भूषणानाम्, विकल्पात् चरणकमलन्यासयोग्यम्, लाक्षारागम्, च सकलम्, अबलामण्डनम् एकः कल्पवृक्षः सूते ।। ११ ।।
- व्याख्या यस्याम् अलनायाम् चित्रम् विविध-वर्णम बास:- वस्त्रम्, नयनयोः अदणोः विप्रमादेवदशम् विलास-शिक्षण-चतुरम् मधु- मथम्, किसलयैः नूतनपल्लवैः सह साकम् पुष्पोद्भेदम्कुसुमोद्गमम् भूषणानाम्=ब्रलङ्काराणाम्, विकल्पान् प्रकारान् चरणकमलन्यासयोग्यम् = पादपद्मालङ्कृतियोग्यम्, लाक्षारागम् अलकतरागम्, तपासल सम्पूर्णम्, चतुविधमपीत्यर्थः अबलामण्डनम् पनिता-प्रसाधननिचयम् एकः केवलः, एकाकीत्यर्थः कल्पवृक्षः कल्पतरः सूते उत्पादयति ।। ११ ।। - =
= - शब्दार्थः स्याम् जिस अलका में, चिवं रंग विरंगे, वासः वस्त्र, नयनयो: आंखों को विभ्रमादेशदक्षम् विलासों की शिक्षा देने में निपुण, मधुमद्य, किसलये नवीन पल्लवों के, सहसाथ, पुष्पोद्भेदम्= फूलों का आविर्भाव, भूषणानाम् गहनों का विकल्पान् भेद ( प्रकार ) । चरणकमलन्यासयोग्यम् और चरण-कमल में लगाने योग्य लाक्षारागं च = महावर (बाला) रंग, सकलम्समी, अलामण्डनम् स्त्रियों की प्रसाधन सामग्री, एक: एक कल्पवृक्षः कल्पवृक्ष ( ही ), सूते उत्पन्न करता है ।। ११ ।। -

भावार्थ: हे मेघ | ः कल्पल एवं विविध-वर्णं वस्त्रम्, नेत्रयोः विलास शिक्षण निपुणं मचम्, किसलये साकं कुसुमाविर्भावम् सूचनानामनेकमेवान् पादपद्मातियोम्यमाकरमित्यर्थः सर्वमेव वनिताप्रसाधन-समूहमुत्पादयति ।। ११ ।।
हिन्दी - हे मेघ ! जिस अलका में एक कल्पक्ष हो, अनेक रंग के वस् आंखों को विलास की शिक्षा देने में कुल मद्य, नवीन पत्तों के साथ फूलों का आविर्भाव अनेक प्रकार के आभूषण और चरण-कमल में लगाये जाने योग्य महावर या मेहदी, इस तरह स्त्रियों की सम्पूर्ण प्रसाधन सामग्री को उत्पन्न करता है ।। ११ ।।
- विभ्रमादेशer: (स०] तत्० ) । पुष्पाणाम् उद्भेदः पुष्पोदमेव ( ब० तद०) तम् । चरणौ कम इव चरणकलम् (उपमितकर्म ) तयोन्यसः चरणकमल- म्यासः (१० तत्०) तस्मिन् योग्यम् चरणकमलन्यासयोग्यम् (स० तद्०) तम् । अविद्यमानं बलं या सा अबला (१०] बहु० ), तासां भवानां मण्डनं नव- सामण्डनम् (प० तत्० ) 1
समासः - विभ्रमाणान् आदेशः विभ्रमादेशः (५० तत्०) तस्मिन् दक्षः
कोशः वस्त्रमाच्छादनं वासश्चलं वसनमंशुकम् इत्यमरः । मधुमये पु रसे क्षपि इत्यमरः परिष्कारो विभूषणम् मण्डनन्च इत्यमरः एकाकीत्वेव
एकक:, इत्यमरः ।
टिप्पणी-आदेशः "आ" उपसर्गपूर्वक "दिथ्' धातु से धन् प्रत्यय करके
"आदेश" ऐसा निष्पन्न होता है। उद्भेद:- "उ" उपसर्गपूर्वक "विद" धातु"
से "च" प्रत्यय करके "उमेद" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। भूषणम्-
"नूष्" धातु से करण में "करणाधिकरणयोश्च" इस सूत्र से "युद्ध" प्रत्यय
करके "भूषण" शब्द निष्पन्न होता है। रामः रज्यतेऽनेन इस विग्रह में
रागार्थक "र" धातु से करण वर्ष में "घ" प्रत्यन से "रागः" रूप निष्पन्न

हुआ है। सूते - अभिषव "पूद" धातु के लट्लकार के प्रथम पुरुष के एक- वचन का यह रूप है।
अलङ्कार:- यहाँ बंग, वास, अलङ्कार, पद आदि बहुत से कार्य एक कल्प- वृक्ष के है, अतः तुल्ययोगिता" अलङ्कार है। तथा "चरणकमल" यहाँ कुसोपमा है, एवं अलङ्कारों का बङ्गाङ्गिभाव होने से "शंकर" अलंकार है ।। ११ ।।
तत्रागारं धनपतिगृहानुत्तरेणास्मदीयं दूराल्लक्ष्य सुरपतिधनुश्चारुणा तोरणेन । यस्योपान्ते कृतकतनयः कान्तया वर्धितो मे हस्तप्राप्यस्तवकनमितो बालमन्दार वृक्षः ॥१२॥
- व्याख्या- इतः पूर्व अलकावर्णन कृतमतः स्वभवन वर्णनरोति यक्षः तंत्र अलकायाम्, धनपतिगृहान् कुबेरहम्पन् उत्तरेण उदीच्या, अस्मदीयम्मामकीनम् आगारम् गृहम् सुरपतिधनुश्वारुणा इन्द्रचाप- मनोहरेण, तोरणेन हरिण, दूरालयम् विप्रकृष्टावपि दृश्यम् (अस्ति ) । यस्य भवनस्य उपान्ते समीपे मे मम कान्तया प्रियया वद्धित: एति पोषित इत्यर्थः कृतकतनयः कृत्रिमपुत्रः हस्तप्राप्यस्तवक-तमितः:- राम्बयोग्य कदम्बकन श्रीभूतः, बालमन्दारवृक्षः बाल सुरतरुः (विद्यते) । ==
अन्वयः तत्र धनपतिगृहान्, उत्तरेण, अस्मदीयम्, आगारम्, सुरपति धनुधारणा, तोरणेन दूराद्यम्यस्य उपान्ते में कान्तया, वद्धितः, तनयः हस्तप्राप्यस्तवक नमित बालमन्दारवृक्षः, ( वर्तते ।। १२ ।।
शब्दार्थः तत्र उस मलका में धनपतिगृहान्कुबेर के घर से, उत्तरेण उत्तर दिशा की बोर, अस्मदीयम् मेरा आगारम्पर, सुरपति- धनुवाणा इन्द्रधनुष की तरह सुन्दर, तोरणेन बाहर के दरवाजे के द्वारा, दूरात् दूर से भी लक्ष्यम् देखने योग्य (जिसे देख सकते हैं। स्यजिस, मेरे घर के उपान्ते समीप में, मेमेरी, कान्तया प्रिया के द्वारा

बद्धित: पाला गया ( बढ़ाया गया), कृत्रिमपुत्रः दत्तकपुत्र हस्तप्राप्य स्तवनमितः हाथ से पाने योग्य गुच्छों से झुका हुआ, बालमन्दारडुलः नया मन्दार का वृक्ष है।
भावार्थ:- हे मेघ ! धनगृहादुत्तरस्यां दिशि इन्द्रचाप-सुन्दरेण बहि- रेण दृश्यं मे गेहमस्ति । यस्य समीपे मत्प्रिया दत्तकपुत्रवतिमन्दार- वृक्षोऽस्ति ।। १२ ।।
हिन्दी - हे मेथ, कुबेर के घर से उत्तर दिशा की ओर, इन्द्रधनुष के समान बाहरी दरवाजे के द्वारा दूर से भी देखने ( पहचानने ) योग्य मेरा घर है। जिसके समीप मेरी प्रिया के द्वारा दसक पुत्र को तरह बढ़ाया गया, हाथ से पाने योग्य गुच्छों वाला नया मन्दार का वृक्ष है ।। १२ ।।
समासः धनानां पतिः धनपति ( प० द०) तस्य गुहा धनपति हा (प० त०) तान् सुराणां पतिः सुरपति ( ० ० ) तस्य धनुः सुरपतिधनुः ( ० ० ) तदिव पायसुरपतिधनुवार ( उपमितकर्म० ) ते कृतवासी तनयः कृतकतनयः (कर्म) हस्तेन प्राप्या: हस्तप्राप्याः (तृ० तन्०) हस्तप्राप्यास ते स्तबका: हस्त प्राप्यस्तवका (कर्म) नमितः हस्तप्राप्यस्तवकनमितः ( तृ० तत्०) बालासी मन्दारवृक्ष बालमन्दारवृक्ष (कर्म० )|
कोश: गुहाः पुंसि च भूम्येव इत्यमरः निशान्त-वस्त्यसदनं भवना- गारमन्दिरम् इत्यमरः । स्याद्गुहवस्तु स्तकः इत्यमरः विद्यावगारमागा- रम् इति द्विरूप कोश: ।
टिप्पणी- धनपतिगृहान् यहाँ "एनपा द्वितीया" से द्वितीया विभक्ति हुई है, क्योंकि "उत्तरेग" इस एनप् प्रत्ययान्त का योग है। अस्मदीयम् = अस्माकमिवम् इस विग्रह में "बस्मद्" शब्द की "त्यदादीनि च" इस सूत्र से वृद्धिसंज्ञा करके "वृद्धाच्छ" इस सूत्र से "प्रत्यय हुआ और उसके स्थान १३ मे० ०

पर "बायनेयीनीवियः फलमा प्रत्ययादीनाम्" इस सूत्र से ई बा करके "अस्मदीय" ऐसा रूप निष्पन्न होता है ( अस्मद् +ई ) । लक्ष्यस् णिजन्त लक्षि धातु से "म्यत्" प्रत्यय करके "लक्ष्य" ऐसा रूप साधु होता है। वर्धितःवर्धनार्थ "" धातु से "क्त" प्रत्यय करके मुवादि करके "बंधित " ऐसा रूप बना है। कृतकःकृत एवं कृतकः "कुत" शब्द से स्वार्थ में कन् प्रत्यय हुआ है। नमितः णिजन्त "नमि" धातु से "क" प्रत्यय करके "नमितः " ऐसा रूप बनता है। -
अलङ्कार:-"सुरपति-धनुवारणा" यहाँ "लुमोपमा" बलद्वार है ।।१२।।
वापी चास्मिन् मरकत - शिलाबद्ध सोपान मार्गा  स्निग्धवैदूर्य-नालेः ।
यस्यास्तोये कृत-बसतयो मानसं सन्निकृष्ट माध्यासति व्यपगतस्त्वामपि प्रेक्ष्य हंसाः ॥ १३॥
अन्वयः - अस्मिन् मरकत-शिला-बद्धसोपानमार्गा, स्निग्धा हे विकचकमलैः खन्ना, वापी च यस्याः तोये, कृतवसतयः, हंसा, स्याम्, प्रेक्य, अपि व्यपगतशुचः सन्निकृष्टम्, मानसम् न अध्यासन्ति ।
व्याख्या अस्मिन् मद्भवने मरकतशिला व सोपानमार्ग माद मणिसिकानिनिताम्यतरणमा निवेदना: मसृणविदूरमशिनाः,
हेमै: सौवर्णैः, विकचकमलैः प्रफुल्लप, छन्नाचियाला वापी -
दीर्घिका च ( बस्ति) यस्याः दीर्घिकावा दोये बचे य
रचित निवास, बास्वाम् क्यचिष्ट्वा
व्यपवतः बाक्सम् मानव-
सरोवरादिस्वरिवन्ति ॥ २३ ॥

शब्दार्थ :- अस्मिन्
इस मेरे घर में मरकतशिला-बद्धसापानमागा मरकतमणि से निर्मित सीढ़ियों वाली स्निग्धवंदना चिकने वैदूर्य रत्न के नावाने स्वर्णनिर्मित ( सुनहले) विकचकमलैः प्रफुल्लितकमलों से, की हुई, बापी बावली ( है ) यस्याः जिस वापी के तोये जल में कृतवससय रहने वाले हंसा हंसगण स्वाम् तुमको, प्रेक्ष्य अि देखकर भी, व्यपगतशुचः शोकरहित होकर संनिकृष्टम् समीप में विद्यमान, मानसम् मानसरोवर को, न अध्यायन्ति स्मरण नहीं करेंगे ।। १३ ।।
भावार्थ:- मदर मरकतमणि-मयसोपानपन्या मसृणवैदूर्यमणिनाले सौवर्णः विकसितपद्मः व्याता वापी बस्ति यस्याः जले निर्वासिता हंसा त्वाम- surse समीपस्थमपि मानसं सरः दुःखाः सन्तः न स्मरिष्यन्ति ।। १३ ।।
हिन्दी - ( हे मेव 1 ) मेरे घर में मरकतमणि से बनी सीढ़ीवाली, चिकमे वैदूर्यमणि के नाम वाले विकसित स्वर्ण कमलों से व्याप्त वापी है। जिस वापी के जल में निवास करने वाले हंस शोकरहित होकर, तुमको देखकर भी समीप में स्थित मानसरोवर का स्मरण नहीं करेंगे ।। १३ ।।
समासः मरकतान्येव शिलाः- मरकतविला. (रूपक) तारिः बद्धः मरकतशिलाबद्ध (तत्) सोपानानां मार्गः सोपानमार्ग (प० सद), मरकतशिलाबद्ध सोपानमार्गों यस्याः सा मरकतशिला-बद्ध-सोपान-मार्ग (बहू) स्निग्धानि वैदूर्याणि नाकानि येषां तानि स्निग्धनालानि (बहु० ) सः। विकचानि च तानि कमलानि free (कर्म) । कृता वसति तमः (बहु व्यपगता शुरु येषां ते व्यपगतमुचः (कर्म० ) ।
कोश:-- बारोहणं स्यात्सोपानम् इत्यमरः । वात्मतं मरकतमणिरश्मगर्भो
हरिम्मभिः इत्यमरः । वापी तु दीपिका, इत्यमरः । मन्युशोको तु सुक

टिप्पणी-वैदूर्या विदूरात्प्रभवन्ति इस विग्रह में "विराय" इस सूत्र से "विदूर" शब्द से "य" प्रत्यय करके आदिवृद्धि करके "" शब्द निष्पन्न होता है। "विदूर" एक पर्वत है। वहाँ पर होने वाले मणियों को वैदूर्यमणि कहते हैं। हैम: हेम्नो विकार: इस विग्रह में "तस्य विकार:" इस सूत्र से "ब" प्रत्यय करके "हेम:" शब्द निष्पन्न होता है। खन्ना- भिजन्त "छवि" धातु से "त" प्रत्यय करके "छन्न" रूप बनाया जाता है। प्रेक्ष्य:-"" उपसर्गपूर्वक "सि" धातु से क्त्वा प्रत्यय करके उसके स्थान पर "स्यप्" करके प्रेक्ष्य रूप निष्पन्न होता है व्यपगतः " वि" एवं "अप" उपसर्गपूर्वक गम्' धातु से "ड" प्रत्यय करके "व्यपगत" शब्द निष्पन्न होता है। संनिकृष्टम् "कृ" धातु से "क" प्रत्यय करके "सन्निकृष्ट रूप निष्पन्न होता है। ऐसी कवि प्रसिद्धि है कि वर्षा में जल के गन्दा हो जाने के कारण हंस लोग "मानसरोवर चले जाते हैं, परन्तु यहाँ के घर की वापी का ज हो इतना स्वच्छ है कि हंस लोग मेघ को देखकर अर्थात् वर्षाऋतु जानकर भी मानसरोवर जाने की कौन बात, उसका स्मरण भी नहीं करते हैं।
अलङ्कारः- यहाँ वर्षा रूप कारण के होने पर भी मानसरोवर स्मरण रूप कार्य के न होने से "विशेषोक्ति" अलङ्कार है एवं लोकोत्तर सम्पत्ति का वर्णन होने से "उदात्त" अलङ्कार भी है। इस तरह दोनों के मांगि- भावतया स्थित होने से "शंकर" बलद्वार हुआ ।। १३ ।।
तस्यास्तीरे रचितशिखरः पेशलैरिन्द्रनीलैः
क्रीडाशैलः कनककदलीवेष्टन प्रेक्षणीयः ।
मद्गेहिन्याः प्रिय इति सखे ! चेतसा कातरेण
प्रेक्ष्योपान्तस्फुरिततडितं त्वां तमेव स्मरामि ॥ १४॥

अन्वयः तस्याः तीरे, इन्द्र रचित-शिखर:, दीवेष्टन-

प्रेक्षणीय:, : (अस्ति) हे सते ! उपान्तस्फुरिततडितम् त्वाम्, प्रेक्ष्य महिन्याः प्रिय इति कातरेण, चेतना, तमेव स्मरामि ।। १४ ।। 3
- = व्याख्यातस्याः दीर्घिकायाः तीरे तटे पेश सुन्दर, इन्द्रनी == इन्द्रनीलनामकर, रचित शिखनिर्मितशृङ्गः कनककदलीवेष्टन- प्रेक्षणीय: हैमरम्भापरिवेषावलोकनीयः क्रीडाकेलिगिरिः मस्तीति भावः । हे सखे! हे मित्र ! उपान्तस्फुरितवदितम् समीपस्फुरित विद्युतम् स्वाम् = मेचम्, प्रेक्ष्य = दृष्ट्वा महिन्याः मत्प्रियायाः प्रियः अभिष्टः, इतिमतः कातरेण कार्यगुक्तेन चेतसा मनसा, तमेव क्रीडापर्वतमेव, स्मरामि स्मरणरोमि । १४ ।। =
शब्दार्थः तस्याः उस वापी के तीरेतीर पर पेशले सुन्दर इन्द्रनीलः इन्द्रनीलमणियों से, रचितविचारः बने हुए शिखरों वाला, कनक कदलीवेष्टन प्रेक्षणीयः स्वर्ण (सुनहले) केले के वृक्षों से परिवेष्टित होने से देवनेयोग्य, कोडाकेलिएवंत (खलक पर्वत) है है स ! मित्र ! उपजिनके समीप चमकती हुई बिजली है (ऐसे), वाम् तुमको देखकर, महिन्याः मेरी प्रिया का प्रियः पर्वतप्रिय है, इति इस कारण, कातरेणकावर चेतसा-मनसे, तमेव उसी क्रीडापत का, स्मरामि स्मरण कर रहा हूँ ।। १४ ।। -
भावार्थ : हे मेघ ! मद्नेहवतियाप्याः सटे इन्द्रनीलमणि-विरचितवङ्गः स्वर्णरम्भापरिवेष्टन-दर्शनीयः क्रीडापर्वतो विद्यते हे मित्र ! पार्श्वस्फुरित विद्युतम् (कान्तासहितमितिभावः) त्वां विलोक्य सः क्रीडापर्वतः मत्प्रियाया: प्रिय इति हेतुना क्रीडापर्वतमेव कातरेण मनसा स्मरामि ॥ १४ ॥
हिन्दी - ( हे मेम ! ) मेरे घर की बापों के तट पर इन्द्रनीलमणि से बने
शिखरों वाला, स्वर्ण (सुनहले ) केले के वृक्षों से घिरे होने के कारण दर्शनीय

क्रीपर्वत है। हे मित्र ! जिसके पास में बिजली चमक रही है ऐसे तुम्हें देखकर यह क्रीड़ापर्यंत मेरी प्रिया का प्रिय है, इसलिए उसी का स्मरण कर रहा हूँ ।। १४ ।।
1 = समासः - रचितानि शिखराणि यस्य सः रचितशिखरः (बहु० ) कनकस्य कदल्यः कनककदस्यः (प० त्०) तासां वेष्टनम् कनकवलीवेष्टनम् (प० तत्) तेन प्रेक्षणीयः कनककदलीवेष्टनप्रेक्षणीयः ( तृ० त० ) । क्रीडायं लाल (मध्यमपी) स्फुरिताः तडितः यस्य स स्फुरित- fe ( बहु० ) उपान्तेषु स्फुरिततडित् उपान्तस्फुरित (स० ० ) तत् तम् । मम मेहनी मगेनी ( [ष० त०] ) तस्याः ।
कोश: पाद पेशल: इत्यमरः । चित्तन्तु चेतो हृदयं स्वातं हृन्मानसं मनः इत्यमरः । कदलीवारणसा रम्भामीचांशुमत्फलाः इत्यमरः ।
टिप्पणी प्रेक्षणीयम्"" उपसर्गपूर्वक "ई" धातु से "वय- तव्यानीयर" इस सूत्र से "अनीयर् प्रत्यय होकर प्रेक्षणीयम् ऐसा रूप निष्पन्न होता है। प्रेक्ष्य यह शब्द भी प्र" उपपूर्वक "ईश्" धातु से वत्वा प्रत्यय लाकर उसके स्थान में स्यप् करके "प्रेम" ऐसा रूप बनता है। गेहिनी- मेहमत्स्यस्याः इस विग्रह में "गे" शब्द से इनि प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में कोपू करके "नेहिनी" शब्द निष्पन्न होता है एवं "एव सदका (1) यवच्छेद (२) अन्ययोगव्यवच्छेद (३) अत्यन्ताऽयोगव्यव छेद इस प्रकार तीन व्यवच्छेद अर्थ समझे जाते हैं। प्रकृत में "तमेन स्मरामि" यहाँ अन्ययोगव्यवच्छेद है, अर्थाद उस क्रोडापर्वत से अन्य दूसरे पर्वतों का व्यवच्छेद हो रहा है, अभिप्राय यह है कि "उस क्रीड़ापर्यंत का स्मरण कर रहा हूँ, किसी दूसरे पर्वत का नहीं ।"
बखङ्कारः - इस श्लोक में "तमेव स्मरामि" इस जगह "स्मरण" है एवं इन्द्रनीले रचितशेखरः" इत्यादि स्थलों पर "उदात्त" है एवं दोनों का अङ्गाङ्गिभाव होने से "शंकर" जलद्वार है ।।१४।

रक्ताशोकश्चलकिसलय: केसरश्चात्र कान्तः
प्रत्यासन्नौ कुरवकवृतेर्माधवीमण्डपस्य ।
एक: सख्यास्तव सह मया वामपादाभिलाषो
काङ्क्षत्यन्यो वचनमदिरां दोहदच्छद्मनाऽस्याः ॥१५॥

- - - - व्याख्या अत्र क्रीडारीले कुरबकवृतेः कुरवकपरिवेष्टनस्य माधवी- मण्डपस्य प्रतिमुक्त निकुञ्जस्य प्रत्यासन्तीसमीपस्यो, चलकिसलयः चन्चल नूतनपल्लव, रक्ताशोकः अशोकवृक्षविशेषः कान्तः सुन्दरः, केसर- बकुलवृक्षश्च (स्तः) । एकःतयोरन्यतरः मयायक्षेण सह साम् तब मेषस्य, सख्याः सवित्रियायाः, मत्प्रियायाः इति भावः । वामपादा मिलावी सव्येतरवरण-प्रहारच्छुकः अन्यः बकुलवृक्षः, दोहदाद्यताः वृक्षादिसंस्कारम्याजेन, अस्याः त्वत्सख्या, वदनमदिराम्मुखमद्यम्, काङ्क्षति अभिलपति ।।
अन्वयः - मंत्र, कुरबरुढते, माधवीमण्डपस्य प्रत्यासन्नो चलकिसलयः रक्ताशोकः कान्तः, केसर, एकः मया सह तब संख्याः वामपादाभिलाषी, जन्यः, दोहा, बस्याः, वदनमदिराम, काङ्क्षति ।। १५ ।।
शब्दार्थः अत्र उस क्रीडा-पर्वत पर कुरबकवृतेः कुरवक के घेरा वाले, माधवीमण्डपस्य माधवी ( अतिमुक्ता) के निकुञ्ज के प्रत्यासन्न समीप में, चलकिसलय किसलय वाला, रक्ताशोकः साल अशोक का कान्तः सुन्दर, केसरराचबकुलवृक्ष है एक उन दोनों में पहला अशोक, मया सह मेरे साथ, तब तुम्हारी, साक्षी के (मेरी प्रिया का ) वामपादाविलाषीमायें चरण के प्रहार का इच्छुक (है), अन्यःर दूसरा मकुसल दोहदछपना दोहव संस्कार के बह बस्याः उस तुम्हारी ती के, वदनमदिराम्मुँह की मदिरा की, कांति= चाहता है ।रक्ताशोकश्चलकिसलय: केसरश्चात्र कान्तः प्रत्यासन्नौ कुरवकवृतेर्माधवीमण्डपस्य ।
एक: सख्यास्तव सह मया वामपादाभिलाषो काङ्क्षत्यन्यो वचनमदिरां दोहदच्छद्मनाऽस्याः ॥१५॥
- - - - व्याख्या अत्र क्रीडारीले कुरबकवृतेः कुरवकपरिवेष्टनस्य माधवी- मण्डपस्य प्रतिमुक्त निकुञ्जस्य प्रत्यासन्तीसमीपस्यो, चलकिसलयः चन्चल नूतनपल्लव, रक्ताशोकः अशोकवृक्षविशेषः कान्तः सुन्दरः, केसर- बकुलवृक्षश्च (स्तः) । एकःतयोरन्यतरः मयायक्षेण सह साम् तब मेषस्य, सख्याः सवित्रियायाः, मत्प्रियायाः इति भावः । वामपादा मिलावी सव्येतरवरण-प्रहारच्छुकः अन्यः बकुलवृक्षः, दोहदाद्यताः वृक्षादिसंस्कारम्याजेन, अस्याः त्वत्सख्या, वदनमदिराम्मुखमद्यम्, काङ्क्षति अभिलपति ।।
अन्वयः - मंत्र, कुरबरुढते, माधवीमण्डपस्य प्रत्यासन्नो चलकिसलयः रक्ताशोकः कान्तः, केसर, एकः मया सह तब संख्याः वामपादाभिलाषी, जन्यः, दोहा, बस्याः, वदनमदिराम, काङ्क्षति ।। १५ ।।
शब्दार्थः अत्र उस क्रीडा-पर्वत पर कुरबकवृतेः कुरवक के घेरा वाले, माधवीमण्डपस्य माधवी ( अतिमुक्ता) के निकुञ्ज के प्रत्यासन्न समीप में, चलकिसलय किसलय वाला, रक्ताशोकः साल अशोक का कान्तः सुन्दर, केसरराचबकुलवृक्ष है एक उन दोनों में पहला अशोक, मया सह मेरे साथ, तब तुम्हारी, साक्षी के (मेरी प्रिया का ) वामपादाविलाषीमायें चरण के प्रहार का इच्छुक (है), अन्यःर दूसरा मकुसल दोहदछपना दोहव संस्कार के बह बस्याः उस तुम्हारी ती के, वदनमदिराम्मुँह की मदिरा की, कांति= चाहता है


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भावार्थ: है मेथ! तस्मिन् क्रीडापर्वते कुरवकावेष्टितस्य मालती
निकुञ्जस्य चन्चलकिसलयः रक्ताशोकः मनोहर बकुला समीपस्थ वर्तते । तयोरेकः रक्ताशोकः मया सार्क त्वरया (मप्रियायाः ) वामचरण-प्रहारम् अपरी बकुला मुखमाकाङ्क्षति ।। १५ ।।
हिन्दी - हे मेष ! उस क्रीड़ापर्वत पर कुरबक के बाड़े ( पेरे) से घिरे मालती निकुज के समीप किसलय वाला रक्त अशोक और सुन्दर बकुल वृक्ष हैं। उनमें अशोक मेरे साथ तेरी तो अर्थात् मेरी प्रिया के बायें पैर के प्रहार को एवं बकुल उसकी मुंह की मदिरा को चाहता है।
समासः - कुरबका एवं वृत्तिः यस्य सः कुरवकवृत्ति (बहु० ) तस्य । माघवीनां मण्डपः माधवीमण्डप ( ष० त० ) तस्य बलानि किसलयानि यस्य सः चलकिसलय (बहु० ) रक्तश्चासी अशो: रक्ताशोकः ( कर्म० ) वामश्चासौ पाद: वामपादः ( कर्म० ) वामपादमभिलपति तच्छीला इति पदाभावी (उपपद०) । दोहदस्य पदोछद्म (१० त०) तेन । =
कोशः अतिमुक्तःकल्पाद्वासन्ती माधवी लताः इत्यमरः । अय केसरे बकुलो वज्जुः इत्यमरः कपटी व्याजदम्भपद्मकैतवे इत्यमरः ।
टिप्पणी- कुरबक यह वसन्तऋतु में खिलनेवाला पुष्प-विशेष है। प्रत्यासन्नो प्रति एवं "ब" उपसर्गपूर्वक "सद्' धातु से 'क्त' प्रत्यय लाकर द्विवचन में प्रत्यासन्नो ऐसा रूप बनता है माधवीमधी भवा इस विग्रह में "मधु" शब्द से "तत्र भव:" इस सूत्र से अन् प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में को करके उद्धघादि करके मानवी रूप निष्पन्न होता है। चलानि चलन्तीति चानि संचलन अर्थ में विद्यमात "चल" धातु से "नन्दिग्रपिचादिभ्यः” इस सूत्र से पचादित्वाद अच् प्रत्यय करके नपुंसकत्व की विवक्षा में बहुवचन "चलानि" रूप निष्पन्न होता है। रक्ताशोक:- अशोक दो प्रकार के होते हैं (१) पत पुरवला (२) रक्त पुष्पवाला श्वेत पुष्पवाला मनुष्ठान में

(सिद्धि का उपयोगी है और रक्ताशोक कामवर्द्धक है। कान्तान्त अय में विद्यमान "कम्" धातु से “णिच्” प्रत्यय करके "काम" धातु बनाकर तब "क्त" प्रत्यय करके "कान्त" रूप निष्पन्न होता है। दोहद-यह एक कवि- प्रसिद्ध क्रियाविशेष है अर्थात् असमय में पेड़ों में फूल को विकसित करने के लिए जो क्रियाएँ स्त्रियों द्वारा की जाती है वह "दोहद" कही जाती हैं। यह भिन्न-भिन्न फूलों के लिए भिन्न-भिन्न तरीके से किया जाता है। अतः अशोक के लिए बाएँ चरण का प्रहार और बकूल के लिए मुखमदिरा का कथन किया गया है। किसी ने लिखा है-
स्त्रीणां स्पर्शात् प्रियविकसति बकुलः सोधुगण्डूपसेका । पादाघातादशोकस्तिलक करवको वीressलिङ्गनाभ्याम् । मन्दारी नर्मवाक्यात् पद्महसायम्पको वस्त्रवाता न्यूतो गीतान्नमेरुविकसति च पुरो नर्तनाद कविकारः ।
इसका अर्थ है स्त्रियों के स्पर्श से प्रिय वृक्ष, गण्डूष मद्य सेवन से बकुल वृक्ष, पैर के प्रहार से अशोक वृक्ष, तिलक वृक्ष दृष्टि से कुरबक आलिङ्गन से, मन्दार वृक्ष नर्मवाक्य से सुन्दर मधुर हँसी से चम्पक वृक्ष, मुँह से गाये गीत के द्वारा नमेव वृक्ष और समझनृत्य से कणिकार विकसित होता है।
यहाँ 'मया सह इसलिए दिया गया है कि यक्ष भी रतिसमय में प्रिया- पादापात से रोमान्चित हुआ करता था, इस बात को ध्वनित करना था महाकवि को
अलङ्कारः- यहाँ "मया सह इस कथन के अनुसार “विशेषोक्ति" बलद्वार है ।। १५ ।।
तन्मध्ये च स्फटिकफलका काञ्चनी वासर्याष्ट-
मूले बद्धा मणिभिरनति प्रौढ-वंश प्रकाशैः ।
नाले: शिञ्जावलयसुभगैनंतिंतः कान्तया मे
यामाध्यास्ते विवसविगमे नीलकण्ठः सुहृद्धः ॥ १६४

अन्वयः - च तन्मध्ये अनतिप्रौढवंश प्रकाशः, मणिभिः मुले, बढा, स्फटिकफलका काचनी, वासयष्टिः शिजावलयसुभगै ताले में कान्तया, नतिः वः सुहृद, नीलकण्ठ, दिवसविगमे, याम्, अध्यास्ते ।
- = - = व्याख्याच तन्मध्ये रक्ताशोक बकुलमध्ये, अनतिप्रौढवंशप्रकाशः: नातिष्टिकान्तिभिः मणिभिः रत्नः मूलेपादे, बचा संबद्धा, स्फटिक- फलका स्फटिकमणिमय-पीठिका, कान्वनीन्हेमी वासयष्टिः निवासदण्डः, वर्तत इति शेषः शिजावलय सुभयैः ध्वनिमत्कङ्कणान्त्य, तालैः करतल- ध्वनिभिः मे मम कान्तया प्रियया नर्तितःतृत्वङ्कारितः वः युष्मा- मेघानामित्यर्थः सुहृद मित्रम्, नीलकण्ठ:: कम् 5: मयूरः, दिवसविगमेदिन- समाप्ती, प्रदोष इति भावः याम् वासयष्टिम्, अध्यास्ते अनुतिति ॥१६॥
शब्दार्थ और भी, तन्मध्ये उस बशोक और बकुल वृक्ष के बीच में, अनतिप्रौढवंशप्रकाशः कोमल बाँसों की कान्ति वाले, मणिभिः = मणियों से, मुझे जड़ में, बद्धा बैधी, स्फटिक फलका स्फटिक मणि की वेदिका वाली, काचनी सोने का, वासयष्टिनिवासदण्ड (है) शिवा- सुभकों की वनियों से सुन्दरताकै हाथ की तालियों से, मे मेरी कान्तया प्रिया द्वारा, नविदः नचाया गया, वः तुम लोगों का, सुहृद मित्र, नीलकण्ठःमोर दिवसवियमे संध्याकाल में या जिस निवासदण्ड पर मध्यास्ते बैठता है ।। १६ । = =

भावार्थ:-- हे मेघ! तयोः रक्ताशोक बकुल-वृक्षयोर्मध्ये मरकतमणिभिः
बामूलस्फटिकमणिमीठा हाटकमय बासमष्टिविद्यते सायंकाले मत्प्रियया
सुन्दरः करतलवादन: नतितो मयूरो यामधिति ।। १६ ।।
हिन्दी - हे मेघ उन रक्त अशोक और बकुल वृक्ष के बीच में कोमल
बाँस की प्रथा से युद्ध बनियों की वेदिकावादी और स्फटिकमणिमय पीठ से
युक्त होने की बासयष्टि है। शब्दायमान कणों से कर्णप्रिय करताल बजाकर
मेरी प्रिया के द्वारा नचाया गया तुम लोगों का मित्र मयूर सायकल जिस पर
आकर बैठता है | १६॥

= = समासः वयोर्मध्ये तम्मध्ये ( ० तद्) न बतिप्रौढाः जनतिप्रौढाः (नम्०) बनतिप्रोडाल ते वंशाः अनतिप्रौढवंशाः (कर्म०) अन विप्रोड शानामिव प्रकाशो येवान्ते मनतिप्रौढवंश प्रकाशा (व्यधिकरण बहु तैः स्फटिकं फलकं यस्याः सा स्फटिकफलका (बहु०) वासस्य यष्टि: वास यष्टिः ष० त०) शिवा प्रधानानि वलयांनि शिवालयानि ( मध्यम- पोपी०), शिजवल सुभमा विलयमुभगाः (तृ० स० ) तैः दिवसस्य विगमः दिवसविगमः ( ष० त० ) तस्मिन् ।
कोश:- भूषणानान्तु शिजितम् इत्यमरः । मयूरो बहियो वहाँ नीलकण्ठो भुजङ्गमुक् इत्यमरः । जयमित्रं सखा सुहृत् इत्यमरः
टिप्पणी- प्रौढाः "" उपसर्यपूर्वक "वह" धातु से "क्त" प्रत्यय करके "हो ढ:" इस सूत्र से धातु के आकार को ढत्व करके "व" को सम्प्रसारण करके "सम्प्रसारणाच" इस सूप से पूर्वरूप करके अब ऐसी स्थिति में "प्राहोढोयेषैष्येषु" इस सूत्र से वृद्धि करके बहुवचन में "प्रौढाः " ऐसा रूप निष्पन्न होता है। अनतिप्रौढवंशप्रकाशः " पन्ना" नामक रत्नविशेष की कान्ति हरी होती है, उसकी हरियाली कच्चे बाँस के समान होती है, क्योंकि पके बॉस की हरियाली मलिन हो जाती है, अतः कवि ने "अनतिमोद" ऐसा विशेषण लगाया वंश में बद्धा" बन्धु' धातु से एक प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में टापू करके "बद्धा" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। बासबास "बस" धातु से भाव में कन् प्रत्यय करके वृद्धि करके "बास" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। शिक्षा-अव्यक्त अर्थ में विद्यमान "हजि" धातु से की इत्या होने के कारण "इदितो नुम्धातोः " इस सूत्र से नुम् करके परसवर्ण वादि करके "विदिषदादिभ्योऽङ" इस सूत्र से अ प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में "टाप्' करके fear ऐसा रूप निष्पन्न होता है। कहीं कहीं "" ऐसा पाठान्तर मिलता है, परन्तु वह पाठ अशुद्ध है क्योंकि "ट शानचावप्रथमाऽसमानाधिकरणे" इस सूत्र से जो घट्ट और शानच् प्रत्यय होता है यह क्रम से परस्मैपदी धातु से सतृ और आत्मनेपदी से "शानच् प्रत्यय

होता है। प्रकृत धातु बनुदात्तेत होने के कारण "अनुदात्तङित आत्मनेपदम्" इस सूत्र से आत्मनेपदसंज्ञक ही है। अतः शान ही होगा या नहीं। यामध्यास्ते यहां "अधि" उपसर्गपूर्वक "आस्" धातु के योग में "अधिवासां कर्म" इस सूत्र से आधार रूप "यत्" शब्द को कर्मसंज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति हुई है।
अलङ्कारः- यहाँ लोकातिशय समृद्धि का वर्णन होने के करण "उदात्त" एवं अनतिप्रौढवंशप्रकाश " यहाँ "लुप्तोपमा अलङ्कार" है ।। १६ ।।
एभिः साधो हृदयनिहितलक्षणलक्षयेथा
द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शङ्खपद्म च दृष्ट्वा ।
क्षामच्छायं भवनमधुना मद्वियोगेन नूनं सूर्यापाये न
खलु कमलं पुष्यति स्वामभिल्याम् ॥ १७॥

= - मषौ पोष्ट्वा, नूनम् अधुना मडियांगेन, क्षमच्छायम् भवनम् रुक्षयेथाः, सूर्यापाये, कमलम्, स्वाम्, अभिख्याम्, न पुष्यति खलु ॥। १७ ।। व्याख्या हे साधो ! हे भद्र !, हृदयनिहितः चित्तसवितः एभिः पूर्वोक्तैः लक्षणे द्वारोपान्ते कपाटपार्श्वयोः लिखित-
अन्वयः - हे साधी | हृदयनिहित, एभि: लक्षण, द्वारोपान्ते, लिखित-
वपुषो चित्रितशरीरौ शङ्खपयो एतन्नामकनिधिविशेषो च दृष्ट्वा अवलोक्य च नूनम् अवश्यम् अधुना इदानीम्, मद्वियोगेनमम विरहेण, सामच्छायम् कृपान्ति भवनम् गृहम् लक्षयेयाः जानीहि सूर्यापाये दिनकरास्ते, कमलम् पद्मम् स्वकीयाम् अभियाम् कान्तिम् न पुष्यति न धारयति ॥ १७ ॥ = =
-
शब्दार्थ : हे साम्रो देसजन ! हृदयनिहितैः हृदय में रखे एभिः
पहले कहे गये, लक्षणे: चिह्नों से, द्वारोपान्ते दरवाजे के दोनों ओर

C forest चित्रित आकृति वाले, रापयो और पद्म इन दो
= - - विधि-विशेषों को, चदृष्ट्वा देखकर, नूनम् अवश्य ही अधुना इस समय, मडियोगेन मेरे प्रवास रूप वियोग से, क्षमच्छायम् मलिन कान्तिवाले, भवनम् = (मेरे) घर को, लक्षयेथाः जानोगे। सूर्यापाये सूर्य के न रहने पर अर्थात् सूर्यास्त हो जाने पर, कमलम् कमल, स्वाम् = अपनी स्वाभाविक, अभिस्याम् - शोभा को न पुष्यति धारण नहीं करता।
भावार्थ:-भद्र हृदयस्यैः पूर्वोक्तस्तोरमादिभिचि द्वार पादयोरा
लिखित निधी चावतोयाना मत्प्रवासरूप-विरहेण मलिन- शो में गृहं निश्चितु सूर्यास्ते कम स्वकीय स्वाभाविकी शोभा न धारयति ।। १७ ।।
हिन्दी - हे मन ! हृदय में रखे पहले कहे गये तोरण आदि चिह्नों से तथा दरवाजे के दोनों और चित्रित शुद्ध और पद्म नामक विधिविशेष को देखकर इस समय मेरे प्रवाद रूप विरह के कारण क्षीण कान्ति बाले मेरे घर को जानोगे सूर्य के न रहने पर कमल भी अपनी शोभा को नहीं धारण करता ।। १७ ।।
समासः - हृदये निहितानि हृदयनिहितानि (स० त०) द्वारयोः
उपान्तद्वारोपान्त (प० तत्०) तस्मिन् लिखिते वपुषी ययोस्तो विचित
वपुषो (बहु०) पद्म- शची ( इवरेवखनाः ) वो मम
वियोग: मद्वियोग (प० उद्) तेन क्षामा छाया यस्य तद् क्षामच्छायम्
( बहु० ) । सूर्यस्य अपायः सूर्यापायः ( ष० त० ) तस्मिन्
कोशः साधुः समर्थो निपुणो वा इति काशिकायाम्। निधिर्ना शेवधि-
मेदाः पादयो निधेः इत्यमरः । अभिख्या नाम शोभयोः इत्यमरः ।
टिप्पणी- निहितम् नि उपसर्वपूर्वक धारण एवं पोषण अर्थ में विद्य
मान "धा" धातु से "क" प्रत्यय करके "दधातेहि" इस सूत्र से धातु के स्थान
में "हि" आदेश करके "निहितम्" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। प
-

कुबेर के नव निधियों में से दो निशियाँ हैं। कुबेर के नव निधियों के नाम इस प्रकार है-
"महापद्मश्च पद्म मकरकच्छपी। मुकुन्दकुन्द नीलाम सर्वच नियो नव ||
दृष्ट्वा - दर्शनार्थक "दृश्' धातु से क्त्वा प्रत्यय करके "दृष्ट्वा " ऐसा निष्पन्न होता है। वियोग:- "वि'' उपसर्गपूर्वक "योगार्थक "पुज्' धातु से "भाव में चम्प्रत्यय करके वियोगशब्द निष्पन्न होता है। क्षामः"" धातु से "क्त" प्रत्यय करके धातु को वाव करके "क्षायो म:" इस सूत्र से प्रत्यय के तकार को "म" आवेश करके "क्षामः" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। लक्षषा:- णिजन्त 'लक्ष' धातु के मध्यमपुरुष के एकवचन का यह रूप है।
अलङ्कार यहाँ "बिम्बप्रतिविम्ब भावमूलक वैधर्म्य दृष्टान्त" बार है यहाँ सूर्य के न रहने से कमल की शोभा का ह्रास रूप व्यतिरेक दृष्टान्त को देकर यक्ष ने अपने विरह में अपने भवन की कान्ति की क्षीणता का प्रतिपादन किया है ।। १७ ।।
मत्वा सद्यः फलभतां शीघ्रसम्पातहेतोः क्रीडाले प्रथमकथिते रम्यसानो निवण्यः ।
अहंस्वन्तर्भवनपतितां कर्तुमपापभा खोतालीविलसितनिभां विद्युन्मेषदृष्टिम् ॥१८॥
अन्वयः - शीघ्र सम्पातहेतोः सदः, कलपतनुताम् गत्वा प्रथमकविते
रम्यसानी, क्रीडा, निमण्यः बल्पाल्पथावर, सोनभद
विदुषदृष्टिस्, अन्तर्भवनपतिवार कर्तुम् बईसि । १८ ।।
व्याख्या है ! शीअसम्पातहेतोः स्वस्तिप्रवेशार्थम् च तत्क्षणम्
पतनुधाम् करियाक्क शरीरता, मत्वाभासाय प्रथमपदिन

- रम्यसानी - मनोहर शिक्षरे, कीडाकेलिपर्वते निषण्णः उपविष्ट (सन् अल्पाल्पमासम्मन्द-मन्द-प्रकाशन, सद्योताली विलसित निभाम्योतपङ्क्ति- स्फुरित समाम विदुन्मेषदृष्टिम् ज्योति दृशम्, अन्तमेवनपतिताम् गृहमध्यप्रविष्टाम् कर्तुम् सम्पादयितुम् अर्हसि समर्थोऽसि ।। १८ ।।
शब्दार्थः शीघ्रसम्पातहेतोः शीघ्र प्रवेश के लिए, तत्काळ, कलमतनुताम् हाथी के बच्चे के शरीर के तरह शरीर को गत्वा बनाकर, प्रथमकविते पहले कहे गये रम्यसानी सुन्दर शिखर वाले हीटाले कोडापर्वत पर उपविष्टः (सन्) बैठे हुए ( स्थित होकर, अल्पाल्पमासाम् मन्द मन्द प्रकाश वाली खोतालीविलसितनिमाम् जुनुनुओं की पति की चमक के समान, विद्युदुन्मेष दृष्टिम् बिजली की चमक रूपी दृष्टि को बन् भवनपतिताम् बीच पर में डालने के लिए, (तुम) मर्हसि योग्य हो ( समर्थ हो) ।। १८ ।।
भावार्थ:- हे मेष ! शीघ्र प्रवेशार्थं करिशिणु-शरीर सदृशं स्वशरीरं कृत्वा पूर्वणि रम्य शिखरे क्रीडा पर्वते स्थितः सन् ज्योतिरिङ्गणस्फुरितसम प्रकाशरूपां दृष्टिमध्ये पातयितुं त्वं समर्थोऽसि ।। १८ ।।
हिन्दी - हे मेघ ! शीघ्रप्रवेश के लिये तुरंत हाथी के बच्चे के समान
अपने शरीर को बनाकर पहले कहे गये सुन्दर पिचर वाले कीड़ापर्यंत पर
स्थित होकर मन्द मन्द प्रकाश वाली, गुलों की पंकि की टिमटिमाहट के
समान बिजली की चमक रूपी दृष्टि को घर के भीतर डालने में तुम समर्थ
हो ।। १८ ।।
समस्स: श्री सम्पातः श्रीसम्पातः (सुप्सुपा० ) सीधसम्पात एवं
हेतुः शीघ्रसम्माव्हेतुः (रूपक) तस्य कस्यैव स्वतः
( व्य० बहु० ) तस्य भावः कलमतनुता ताम् प्रथमं कथितः प्रचरूषितः
( सुप्सुपा ) रम्यः सानुर्यस्य सः रम्यसानुः (बहु०) तस्मिन् क्रीयाऽयं सः
क्रीडा (मध्यपदलोपी) तस्मिन् पाल्पामा यस्या सा बल्पाल्प
पासा (बहु) ता से चीनी इति वचोदाः (स० तद्०) पचोतानाम् माडी

सद्योवाली (१० तत्०) तस्याः विलसितम् सद्योताली विसितम् (००) तेन सदृशी खद्योताली विलसितनिया (तृ० तत्०) ताम् विद्युत उन्मेषः विद्युदुन्मेषः (ष पद०) विद्युदुन्मेष एव दृष्टि: विद्युदुन्मेषदृष्टि ( रूपक) ताम् । भवनस्य वन्तः अन्तर्भवनम् (प० तद् ) अन्तर्भवनं पतिता अन्त भवनपतिता (डि० तत्०) ताम् ।
कोशः- सम्पातः पतने देगे प्रवेशे वेद संविदे इति शब्दार्णवः कलम: करिशावकः इत्यमरः । भाश्छविद्युतिदीप्तयः इत्यमरः । तत्सदामिनी विद्यु- चपला अपि इत्यमरः निम-संकाशनी काशप्रतीकाशोपमादयः, इत्यमरः ।
टिप्पणी- संपातः संपतनं संपातः "सम्" उपसर्गपूर्वक पतनार्थक "पद" धातु से भाव में ""प्रत्यय करके "संपात " ऐसा रूप ष्पन्न होता है। "सम्पातहेतो: " यहाँ "बष्ठी हेतुप्रयोगे" इस सूत्र से षष्ठी विभक्ति हुई है। गत्वाम्" धातु से क्या प्रत्यय करके गत्वा रूप बनता है। कलमबत्तीस साल की उम्र के हाथी के बच्चे को "कल" कहते हैं। निषण्णः नि उपसर्गपूर्वक "सद्' धातु से "क्त" प्रत्यय करके नृत्य षत्य गत्व बादि करके "निषण्ण" ऐसा रूप निष्पन्न होता है। अल्पाऽल्पभासः यहाँ "अतिशयेन अल्पा" इस विग्रह में "प्रकारे गुणवचनस्य" इस सूत्र से "अल्प" की हुई है। अन्तर्भवनम् - यहाँ "राजदन्तादिषु परम्" इस सूत्र से "अन्तर" इसका
पूर्व निपात हुआ है। अलङ्कारः प्रस्तुत पथ में "कलमनृताम्" एवं "खोतालीसित- निमाम्" इन दोनों जगह उपमा एवं "विद्युदुन्मेषदृष्टिम्" यहाँ रूपक अलङ्कार है तथा दोनों अलङ्कारों का बङ्गाङ्गिभाव होने के कारण "संकर" बरुद्वार है ।। १८ ।।
तम्बी श्यामा शिक्षा रिवशमा पक्वबिम्बाधरोष्ठी
मध्येक्षामा चकितहरिणी प्रेक्षणा निम्ननाभिः ।


श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां
या तत्र स्याद्युवतिविषये सृष्टिराचेव धातुः ॥ १९॥

= == = = = व्याख्या स्वभवन वर्णनानन्तरं प्रिया स्वरूपपरिचयं ददाति श्लोक- इयेन (हे मेघ !) तम्बीकृशाङ्गी न तु स्थूला, श्यामा तप्तकाञ्चनवर्णाभा युवतिर्वा शिखरिदशना = सुदती पक्वविम्बाधरोष्ठी परिणतविम्ब फलोष्ठी मध्येक्षामा कृशोदरी, पक्तिहरिणीप्रेक्षणाभयमीतकुरङ्गी नयना अनेनाऽस्याः पद्मिनीत्वं व्यज्यते । निम्ननाभिः गम्भीरनाभिः श्रोणी-भाराद= नितम्बथोल्या, अलसगमना मन्दगामिनी, स्तनाभ्याम्कुचाभ्याम्, स्तोक- नम्राईषदवनता। युवतिविषये ललितासम्बन्धे धातुःषष्टुः ब्रह्मणः इति भाव:, आद्या प्रथमा सृष्टिरिवरवनेव "वर्तमानेति शेषः" तादृशी या = पूर्वोक्तगुणसम्पन्ना स्त्री, तमगृहे भवेत् स्यात् ॥ १९ ॥
अन्वयः - तन्वी, श्यामा, शिखरिदशना, पक्वदिम्बाधरोष्ठी मध्येक्षामा, चकित हरिणी प्रेक्षणा, निम्ननाभिः श्रोणी-भारात्, अक्षसगमना, स्तनाभ्याम् स्टोकन, गुवतिविषये, धातु, आया, सृष्टि, इव या तत्र स्यात् ।। १९ ।।
शब्दार्थी दुबली, श्यामा तपाये हुए सोने के रंग की अथवा युवती, शिखरिदशनातीले दाँतों वाली, पक्वबिम्बाधरोष्ठीपके इए बिम्ब के समान अग्रवाल, मध्येक्षामापतती कमर वाली चकितहरिणी प्रेक्षणा= डरी हुई मृगी के समान (चन्चल) गांवाली, निम्ननाभिः बहरी नाभि- बाली; प्रोणीभारात् नितम्ब के भार से अलसगमना मन्द मन्द चलने बाली, स्तनाभ्याम् स्तनों से, स्तोकना कुछ-कुछ झुकी हुई युवतिविषये= स्त्रियों के विषय में, धातुः स्रष्टा (ब्रह्मा) की, आधा-पहली, सृष्टिरिव रचना की तरह, या जो स्त्री, तत्र वहाँ मेरे घर में, स्यात् हो । = = - = -
भावार्थ: हे मेघ कृशाङ्गी युवति, दाडिमबीजेवदन्तशालिनी, कृशोदरी, बिम्बाधरोष्ठी, भयभीत मृगीय चलनयना गम्भीरनाभिः, नितम्बभारात्मन्द- गामिनी, चमारणेपदवनता, युवतिविषये ब्रह्मण: प्राथमिकी रचनेव या स्त्री मदगेहे भवेत् (तां मत्पत्नी जानीयाः) इत्यनेन श्लोकेन सम्बन्धो विद्यते । १९० १४ मे० ०

हिन्दी है मेघ! दुबली युवती, टीले दांतों वाली, पके हुए बिम्ब (कुंदरू
के समान निचले होंठ वाली पतली कमर वाली भयभीत मृगी के समान चल
आँखों वाली, गहरी नाभि वाली नितम्बभार से धीरे-धीरे चलने वाली,
स्वनभार से ( आगे की ओर) कुछ झुकी हुई-सी स्त्रियों के विषय में बह्या
की पहली रचना की तरह जो स्त्री वहाँ मेरे घर में हो ( उसे मेरी पत्नी
समझना, यह आगे से सम्बद्ध है) ।
समासः शिखरिणो वरताः यस्याः सा शिखरिदशना (बहु० ) प च तद् विम्बं पविम्बम् (क० धा० ) अधराबासी ओ अधरोष्ठः (कर्म० ) यो यस्याः सा पक्वबिम्बाधरोष्ठी ( बहु० ) मध्येक्षामः यस्याः सा मध्येक्षामा ( स्प० बहु० ) पकिता चासो हरिणी चकितहरिणी (कु० घा० ) वतिहरिण्या इव प्रेक्षणं यस्याः सा चकितहरिणीप्रेक्षणा (व्यधि० बहु० ) । निम्ना नाभिर्यस्याः सा निम्ननाभिः ( बहु० ) बोण्याः भार श्रोणीभार: ( प तद्) बलसं गमनं यस्याः सा बलसगमना ( बहु० ) । स्तोकं गम्रा स्तोकनम्रा ( सुप्सुपा० ) युवतयः विषयः युवतिविषयः (रूपक०) तस्मिन् ।
कोशः - लक्षणं कृशं तनु इत्यमरः । श्यामा योवनमध्यस्था इत्यु- त्पलमाला "गीते सुखोष्णा सर्वाङ्गी ग्रीष्मे या सुखशीतला तप्तकाञ्चन वर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते ।।" इत्याहुः भट्टिकाव्यस्य टीकाकृतः । शिखरं पुलककोटिषु इति विश्वः ।
टिप्पणी- तन्वी "तनु" यह दौर्बल्यरूप गुण का वाचक शब्द है-अतः "वोतो गुणवचनाद" इस सूत्र से कीप हुआ है। श्यामा इस स्त्री की विशेषता होती है कि गर्मी के महीनों में इनके शरीर शीतल और ठंडे समय में उष्ण हो जाते हैं। जैसा कि कहा भी गया है-
कूपोदकं बटच्छाया श्यामा नारीष्टिकागृहम् ।
शीतकाले भवेदुष्णं उष्णकाले च शीतलम् ।।


अर्थात् कुएँ का जल, वट (बरगद) को छाया, श्यामा स्त्री और इंटे का घर ये सब ठंडे समय में गर्म और गर्म समय में ठंडे हो जाते हैं। शिखरिदशनाः- अभिधानचिन्तामणिकार 'शिखर' पाब्द का अर्थ पके हुए दाडिम का बीज करते हैं। वे कहते हैं पक्वदानी माणिक्यं शिखरं विदुः पक्व- बिम्बाधरोष्ठी - यहाँ अधरोष्ठ में धरतो व इस तरह कर्मधारय समास हो जाने पर प्राप्त वृद्धि को रोककर : समासेवा' इस सूत्र से ( घर + ओठ ) यहाँ विकल्प से पररूप हुआ है। एवं पक्व बिम्ब के साथ पुनः समास होने के पश्चात् नासिकोदान्त कर्णशृङ्गाच' इस सूत्र से विकल्प से 'को' हुआ है तब 'पश्वविम्बाधरोष्ठी' रूप बना है, 'बिम्ब' कुंदरू फल को कहते हैं। यह लाल रंग का होता है, अतः यहाँ उसे उपमानरूप में ग्रहण किया गया है मध्येक्षामा यहाँ 'मध्य' शब्द से आयी सप्तमी विभक्ति का समाम होने पर भी 'अमूर्धमस्तकातु स्वादकामे' इस सूत्र से बलुक हो गया है। आया जादो भया आया आदि' शब्द से 'दिगादिभ्यो यद इस सूत्र से यत् प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टापू हो गया है। -
अलङ्कारः- यहाँ 'अघर' एवं 'ओष्ठ' इन दो पर्यायवाची शब्दों की आवृत्ति होने से 'पुनरुक्तवदाभास' 'क्वबिम्बाधरोष्ठी' यहाँ लुतोपमा 'चकित- हरिणी प्रेक्षणा' यहाँ पर भी लुतोपमा और सृष्टिराग्रेव' इस जगह 'उत्प्रेक्षा' अलङ्कार है। पर इन सब अलङ्कारों की परस्पर निरपेक्षता होने से संसृष्टि अलङ्कार है ।। १९ ।।
तां जानीया: परिमितकयां जीवितं मे द्वितीयं
दूरीभूते मयि सहचरे चक्रवाकीमिवैकाम् ।
गाढोत्कण्ठां गुरुषु दिवसेष्वेषु गच्छत्सु बालां
जातां मन्ये शिशिरमवितां पद्मिनों वान्यरूपाम् ॥२०॥

अन्वयः - सहचरे, मयि दूरीभूते, चक्रवाकीम्, इव, परिमितकथाम् एकाम्
सामू, मे, द्वितीयम् जीवितम् जानीयाः । गाढोत्कण्ठाम् बालाम्, गुरु, ए,
दिवसेषु गच्छतु शिविरमथिताम् पचिनीम् वा अन्यरूपाम् जाताम् मन्ये ।

= = व्याख्या (हे मेघ !) सहचरे सहगामिनि मयिपत्य, यज्ञे दूरी- भूते दूरङ्गते मति, चक्रवाकीमिव चक्रवाक प्रियामिय, परिमितकथाम् - अत्पस्पभाषिणीम् एकाम् एकाकिनीम्, ताम् पूर्ववणि मत्प्रियाम् मे पक्षस्य द्वितीयम् अन्यम्, अपरमित्यर्थः जीवितम् जीवनम् जानीथा: अवगच्छे। एतेन तस्यां मृतौ मद्जीबननाशोऽवश्यम्भावीति व्यज्यते गाठणे- स्फष्ठाम् = अत्युत्सुक्याम्, बालाम् नवोढाम् अष्टदशहायनामित्यर्थः । गुरुषु = दीर्घेषु वर्तमानेषु दिवसेषु शापदिनेषु गच्छत्सु यातेषु सत्सु शिशिर- मषिताम् = तुषारपीडिताम्, पद्मिनीम् कमलिनीम्, वा=पया, अन्यरूपाम्= अपराकृतिम् जाताम् भूताम् मन्ये संभावयामि हिमविकृतरूपा सा दिर- हिमी अन्यथा भविष्यति इति तर्कयामि इति भावः ।। २० ।। = = =
= = = पर, चक्रवाकीमिव चकई के समान परिमितकथाम् बहुत कम बोलनेवाली, एकाम् अकेली, ताम्-उस सम्बी आदि श्लोक से वर्णिता मेरी प्रिया को, मे मेरा द्वितीयम् दूसरा जीवितम् जीवन (प्राण), जानीया: समझना । गाढोत्कण्ठाम् (मेरे विषय में) अत्यधिक उत्सुक बालाम् (अट्ठारह वर्ष की नवोढा को, गुरुषु लम्बे दुर्बह एषुइन, दिवसेषु शाप के दिनों में, गच्छर बीतने पर शिशिरमपितामहिम से पीडित पद्मिनीकमलिनी के, वासमान, अन्यरूपाम् किसी दूसरे ही रूप को जाताम्प्राप्त, अर्थात् कुछ की कुछ बन गयी होगी ऐसा, मन्ये सोचता हूँ ।। २० ।। D
शब्दार्थ:- (हे मेघ !) सहचरे साथी, मयि मेरे, दूरीभूते दूर होने
भावार्थ: है मेघ सहगामिनि मयि दूरस्थिते सति सहवियुक्तां चक्रवा-
कीमेकाकिनीं तो पूर्वप्रकारेण वर्णितां मत्प्रिया मेsपरं जीवनं जानीयाः । मद्विषये अत्युत्सुक नवोदामष्टादशवर्षीयां (बम) एषु दुर्वहेषु चाप दिवसेषु गच्छतु दुपारपीडितो कमलिनीमिवाम्यरूपा तर्कयामि ।। २० ।।
हिन्दी - ( हे मेघ !) मुझ साथी के दूर हो जाने पर चकई के समान कम बोलने वाली बकेली उस पूर्ववणिता स्त्री को मेरा दूसरा जीवन (प्राण) समझना बर्षात् मेरी प्रिया समझना शाप के इन दुर्वह दिनों के बीतने पर

(मैं तो उस नवोढा को पाले की मारी कमलिनी की तरह कुछ की कुछ हो गयी होगी, ऐसा अनुमान ( सोच रहा ) कर रहा हूँ।
समासः परिमिता कया यस्याः सा परिमितकथा तान् बहु० ) गाढा कण्ठायाः सा गाढोत्कण्ठा (बहु०) ताम्र शिशिरेण मथिता शिशिरमपिता ( वृ० तद्०) तामू बन्यं रूपं यस्याः सा अन्यरूपा ( बहु० ) ताम् ।
कोश:-इब बद् वा यथा धन्दाः इति दण्डी उपमाया विकल्पे वा त्य मर गाढ वाढ दूढानि च इत्यमरः हेमन्त शिशिरोऽस्त्रियाम् इत्यमरः । उत्कण्ठोत्कलिके लिके समे, इत्यमरः ।
टिप्पणी- सहचरे सहचरतीति इस विग्रह में 'सह' उपपदपूर्वक चर धातु से अन् प्रत्यय करके 'सहचर' ऐसा शब्द निष्पन्न होता है। उक्त रूप सप्तमी विभक्ति का है। दूरीभूते अदूरं दूरं यमा सम्पाद्येत इस विग्रह में 'दूर' उपपदक 'भू' धातु से क्त प्रत्यय करके एवं 'दूर' शब्द से 'च्वि' प्रत्यय करके 'वीच' इस सूत्र से दीर्घ होकर दूरीभूत' शब्द निष्पन्न होता है। उक्त रूप सप्तमी विभक्ति का है। चक्रवाकी-चक्रवाकत्वजातिविशिष्टा स्त्री इस विग्रह में 'चक्रवाक' शब्द से 'जातेरस्त्रीविषयादयोपधाद' इस सूत्र से 'डी' प्रत्यय होकर चक्रवाकी बनता है। कविप्रसिद्धि है कि चक्रवाक और चक्रवाकी रात में वियुक्त हो जाते हैं, यहाँ तक कि यदि इन्हें एक पिंजरे में भी बन्द कर दिया जाय तो वे आपस में दोनों दो तरफ मुँह करके रात व्यतीत करते हैं। इस उक्ति में सत्यता कहाँ तक है यह भगवान् ही जाने ।
इस वियोग के सम्बन्ध में एक लोककथा भी सुनी जाती है कि 'सीताहरण' के पश्चात् रामचन्द्रजी ने सीताजी की खोज बोर उनका पता बन उताबों से पूछते हुए एक चक्रवाक दम्पति से भी पूछा पर उन दोनों ने इनका उपहास करते हुए नकारात्मक उत्तर दिया, इस पर दुःखित होकर रामचन्द्रजी ने शाप दे दिया कि तुम चक्रवाक दम्पतियों का प्रति-रात वियोग हुआ करे और तभी से ये दोनों रात में नहीं मिलते हैं।

कथाकथनं कथा वाक्य-प्रबन्ध अर्थ में विद्यमान 'क' धातु से भाव में चिन्तिपूजक' इस सूत्र से अप्रत्यय करके स्त्रीत्यविवक्षा में 'टा' करके 'कथा' शब्द निष्पन्न होता है। द्वितीयम्- 'द्विः' शब्द से पूरण अर्थ में 'द्वेस्तीय' इस सूत्र से 'दीय' प्रत्यय करके 'द्वितीयः' ऐसा बनाया जाता है। यह नपुंसकलिङ्ग का रूप है। जीवितम् - प्राणधारण अर्थ में 'जीव' धातु से भाव में 'नपुंसके भावे ः 'जीवितम्' रूप निष्पन्न होता है। उत्कण्ठाद्यपि 'उत्कण्डा का प्रसिद्ध वयं 'औत्सुक्य' है, परन्तु महामहो० मल्लिनाथजी ने "रागे स्वविषये वेदना महती तु पा inter तु गात्राणां तामुत्कण्ठां विदुर्बुधाः ।।' इस कोश का उद्धरण देकर उसका अर्थ 'विरहवेदना' किया है। बालाम्-यहाँ 'बाला' शब्द का अर्थ अविवाहित कुमारी नहीं समझना चाहिए प्रत्युय १८ वर्षकी किशोरी' ऐसा समझना चाहिए।
महाकवि का इस श्लोक का मूल आधार वाल्मीकि रामायण के अशोक- वाटिकास्थित सीता के वर्णन प्रसंग में कहा गया श्लोक ही जान पड़ता है-
हिम-हतनली नष्टोमा, व्यसनपरम्परमा निपीडमाना
सहचररहितेय चक्रवाकी, जनकसुता कृपणां दर्शा ददर्श ॥
( सुन्दर०, १६४० )
अलङ्कारः - प्रस्तुतः पद्य में यक्षपत्नी का एवं यक्ष (जीवित) का अभेद कथन भेद रहने पर भी किया गया है, अतः भेद में अभेद अध्यवसायमूलक 'अतिशयोक्ति', 'दूरीभूते चक्रवाकोमिकाम्' यहाँ पूर्णोपमा एवं 'पदमनी वायरूपाम्' यहाँ भी उपमा है और लोनों निरपेक्ष भाव से है अतः 'संसृष्टि
बलकार है ।। २० ।।
नूनं तस्याः प्रबलवदितोच्छूननेनं प्रियाया
निःश्वासानामशिशिरतया भिन्नवर्णाधरोष्ठम् ।

हस्तन्यस्तं मुखमसकल-व्यक्ति लम्बालकत्वा- दिन्योन्यं त्वदनुसरण क्लिटकान्तेविति ॥ २१ ॥
अन्वयः - प्रबल रुदितोच्छूननेत्रम् निःश्वासानाम् अशिशिरतया, भिन्न- वर्णाम् हस्तन्यस्तम्, सम्बलकत्वाद,  तस्याः मुखम् त्वदनुसरण विलष्टकान्ते, इन्दो, दैत्यम् विभर्ति नूनम् ।। २१ ।।
व्याख्या प्रतिच्छूननेत्रम् अत्यधिकरुदितोनियनम् निः श्वासानाम् वदनश्वासप्रश्वासानाम् अशिशिरतया उष्णतया भिन्नवर्णा- धरोष्ठम् विच्छायमधरोष्ठम् हस्तन्यस्तम् हस्तस्यापितम्, लम्बालकत्वाद दोस्तपूर्णकुलरवाद असकलपति असम्पूर्णाभिव्यक्ति, तस्याः मप्रियायाः, मुखम् वदनम् त्वदनुसरण क्लिष्टकान्तेः मेघानुगमनक्षीणद्युतैः, इन्दो: चन्द्रमसः चैन्यम् दीनताम् विभर्ति धारयति नूनम् निययेनेति = = = = = भावः ।। २१ ।।
शब्दार्थः - प्रबलरुदितोडून नेत्रम् - बहुत रोने से सूजे हुए नेत्रों वाला,
निःश्वासानाम् निश्वासों के अशिशिरतयागरम होने के कारण, भिन्नवर्णा- धरोष्ठम् जिसके निचले होंठ का रंग फीका पड़ गया है (ऐसा ), हस्तन्यस्तम् मेली पर रखा हुआ लम्बालकत्वाद-सटकते हुए बालों के कारण, असकल- व्यक्ति असम्पूर्ण रूप से दिखाई देने वाला, तस्याः उस मेरी प्रिया का 'मुखम् मुख, त्वदनुसरणष्टिकान्तेः तेरा अनुगमन करने के कारण फीकी पड़ी कान्तिवाले, इन्दोः चन्द्रमा के दैन्यम् दैन्यभाव को विमति धारण करता है, नूनम् निश्चय ही ।। २१ ।। = =
भावार्थ:- हे मेष | अधुना मद्वियोगेन अत्यधिक रोदनादुच्छ सिलनेत्रमु 1 व्यनिःश्वासैर्विवर्णाधरोष्ठं करतलस्थापितं सम्मायमानैरलकेर सम्पूर्णाभिव्यक्तं मप्रियामुखं त्वदनुसरणात्कान्तिहीनस्य हिमांशोः दीनभावं धारयति नूनम् ।। २१ ।।

- समासः प्रकृष्टं बलं यस्मिस्तत् प्रबलम् (बहू) प्रतद् वित्तम्प्रवलरुदितम् (कर्म) उच्छूने नेत्रे यस्य तद् उच्छून नेत्रम् प्रबलरुदितेन उच्छूननेषम्प्रतरुदितोडून नेत्रम् ( तृ० त०) न शिशि- रता अशिशिरता ( नव्०) तथा भित्र वर्णो यस्य सः वर्णः (बहु० ) घरयासी अधरोष्ठ ( कर्म० ) भिन्नवर्ण: अधरी यस्य तदभिन्न- वर्णाधरोष्ठम् (बहु०), न सकला असला (न) बसकला व्यक्तिः यस्य तत् सकलव्यक्ति ( बहु० ) तव अनुसरणं त्वदनुसरणं ( प० त० ) । faster fort सः कान्तिः (बहु० ) त्वदनुसरणेन विष्टकान्ति त्वदनुसरण क्लिष्टान्ति ( वृ० तद्०) तस्य -
हिन्दी - हे मेघ ! अत्यधिक रोने के कारण सूजी हुई बलों वाला नि:- वसों के गरम-गरम होने के कारण विवो वाला होली पर रखे हुए लटकते हुए रूटों के कारण सम्पूर्ण रूप से दिखाई नहीं देने वाला उस मेरी प्रिया का मुख तुम्हारे आवरण के कारण मलिनान्ति वाले चन्द्रमा के दीन- भाव को निश्चय ही धारण करता होगा ।। २१ ।
कोश: नूनं निइत्यमरः
टिप्पणी- रुदितम् रोदनमेव रुदितम् रुद् धातु से भाव में क प्रत्यय करके 'रुदितम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उच्छून उच्छून' शब्द की निष्पत्ति के विषय में महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने 'उद्' उप सपूर्वक 'दुओदिव' धातु से 'एक' प्रत्यय करके 'वो गूढनुनासिके व से 'क' बागम करके 'उच्छूत' शब्द निष्पन्न किया है, परन्तु यह प्रक्रिया प्रामादिकी है; क्योंकि 'वि' धातु के अन्त में 'द'कार है न कि कार है यतः इस प्रक्रिया को छोड़कर यदि उद्दव + क्त' ऐसी स्थिति में धातु के बजादि गणपति होने के कारण 'चिस्वपिजादीनां किति इस सूत्र से 'व' को 'उकार सम्प्रसारण करके 'सम्प्रसारणान्च इस सूत्र से पूर्वरूप करके 'श्वीदितो निष्ठायाम् इस सूत्र से इटागम का निषेध करने 'हरू' इस सूत्र से सम्प्रसारणरूप से आये हुए 'उ'कार को दी करके 'ओदित'

इस सूत्र से निष्ठा के 'त'कार को 'न'कार आदेश करके छत्यादि करके 'उ' ऐसा रूप निष्पन किया जाय तो प्रक्रिया शुद्ध होगी। अशिशिरता- शिशिरस्य भावः इस विग्रह में 'तस्य भावस्त्थती' इस सूत्र से तत् प्रत्यय करके स्वत्वविवक्षा में टापू करके 'शिशिरता' रूप निष्पन्न होता है, न शिशि रता अधिशिरता यहाँ हेतु में तृतीया विभक्ति है। न का अर्थ यहाँ विरोध में विवक्षित है। असकलव्यक्ति पक्ष पत्नी के मुंह पर सवा लटें लटकती रहती थी अतः उसके मुँह को सम्पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती थी। इससे यह अनुमानित होता है कि वह केशों को नहीं संवारती थी। केश का न संवारना उसके लिए उचित भी था, क्योंकि वह प्रोषिता थी जिसका पति परवेश में हो उसे प्रोषित का कहते हैं एवं धर्मशास्त्र में प्रोषितभर्तुमा के लिए शरीर को संवारने का निषेध किया गया है। जैसा कि महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी स्मृति में लिखते हैं-
क्रीडां शरीरसंस्कार समाजोत्सवदर्शनम् । हास्यं परगृहे मार्ग त्वत्प्रतिभा |
इसका अभिप्राय यह है कि सती प्रतिभा कौड़ा, शरीर- संस्कार ( शरीर को सँवारना ), समूह में जाना, उत्सव देखना, हास्य (मजाक ) करना, दूसरे के घर में जाना-इन सबों का परित्याग कर दें।
अलङ्कारः - प्रस्तुत पद्य के भिन्न-वर्णाऽधरोष्ठम्' इस पद में पौनरुक्त्य प्रतीति होने के कारण 'पुनरक्तवदाभास असङ्कार है। एवं प्रिया का मुँह चन्द्रमा के दीन भाव को धारण कैसे कर सकता है ? इस शब्द का समाधान 'बिम्बप्रतिविम्वभाव' की कल्पना के द्वारा करने से 'निदर्शना' बलकार है।
इन दोनों अलङ्कारों के परस्पर निरपेक्ष भाव से रहने के कारण 'संसृष्टि' अलङ्कार है ।। २१ ।।

आलोके ते निपतति पुरा सा बलिव्याकुला वा मत्सादृश्यं विरहनु वा भावगम्यं लिखन्ती ।

पृच्छन्ती वा मधुरवचनां सारिकां पञ्जरस्यां
 स्मरसि रसिके ! त्वं हि तस्य प्रियेति ॥

अन्वयः - सा बलिव्याकुला, वा विरहतनु, भावगम्यं मत्सादृश्यम् लिखन्ती, वा मधुरवचनम्, पञ्जरस्थाम्, सारिकाम्, हे रसिके भर्तुः, स्मरसि ? हि त्वं तस्य प्रिया,' इति पृच्छती वा ते लाखो, पुरा, निपतति ।। २२ ।
व्याख्या सामप्रिया, बलिव्याकुला नित्यनैमित्तिक देवपूजन तत्परा, वा अथवा विरहृततु वियोगक्षीणम् भावगम्यम् सम्भावनानुमेयम्. मस्सादृश्यम् मदाहत्यनुरूपम्, लिसन्तीचित्रयन्ती वा अथवा मधुर- वचनाम् = मधुरभाषिणीम्, पञ्जरस्याम् पिञ्जरद्धाम्, सारिकाम्शुक- प्रियाम्, 'हे रसिके ! हे विदग्धे भर्तुः स्वामिनः स्मरसि faraufa, कवित् किम् ? हियतः त्वम् सारिका, तस्य स्वामिनः प्रिया अभीष्टा इति इत्यम्, पृच्छन्ती = जिज्ञासन्ती प्रश्नं कुर्वतीत्ययं वा अथवा ते मेघस्य, आलोके ष्टिमार्गे पूरा सद्यः निपतति आगमिष्यति इति = = भावः ।। २२ ।।
शब्दार्थः सा वह मेरी प्रिया, बलियाकुला नित्यनैमित्तिक देवपूजा में संलग्न, वा अथवा विरहृतनु वियोग के कारण कृश, भावगम्यम् अनुमान से जानी जाने वाली, मत्सादृश्यम्-मेरी आकृति (चित्र) को, लिखन्ती लिखती हुई, वाया रसिके! हे रसीली । भर्तुः स्वामी को, स्मरसि स्मरण करती हो, कच्चित् क्या? हि क्योंकि, त्वम् तुम, तस्य उनकी प्रिया प्यारी थी' इति इस प्रकार, मधुरवचनम् मधुर बोलने वाली पञ्जरस्याम् पिंजरे में रहने वाली सारिकाम्मैना को पृच्छन्ती पूछती हुई, या अथवा ते तुम्हारे बालोके दृष्टिपथ पर पुरासद्यः निपद्धति बायेगी ।। २२ ।। = = = - =
भावार्थ:- हे मेष ! सा मत्प्रिया नित्यनैमित्तिक देवपूजायां संलग्ना वा विश्लेषकथामनुमेयां मत्प्रतिकृति चित्रयन्ती मा 'हे रसिके ! स्वामिनं स्मरसि,

किम् ? यतो हि त्वं तस्य fप्रया' इति परस्यां मधुरभाषिणों सारिकां वृच्छन्तो वा सद्यस्तव वृष्टिपये आगमिष्यति ॥ २२ ॥
हिन्दी है मेघ वह मेरी प्रिया नित्यनैमित्तिक देवपूजा में संलग्न या वियोग से दुर्बल तथा अनुमान से जानने योग्य मेरे चित्र को लिखती हुई अथवा मधुरभाषिणी पिजड़े में हुई मैना को 'हे रसीली ! स्वामी का स्मरण करती हो क्या ? क्योंकि तुम उनकी प्यारी हो' इस प्रकार से पूछती हुई स तुम्हारे दृष्टिपथ पर आयेगी ।। २२ ।।
समासः बलिषु व्याकुलावलिव्याकुला (स० त०) विरहेण तनु विरह (०) भावेन गम्यं भावगम्यं तत् ( वृ० तद०) । मधुरं वचनं यस्याः सा मधुरवचना ( बहु०) ताम्
कोश: कश्चित् कामप्रवेदने इत्यमरः । उपमा किवा इत्यमरः॥ स्पात्प्रबन्धे पुरती निकटागामिके पुरा इत्यमरः । मालोको दर्शनोतो, इत्यमरः ।। २२ ।।
= गम्यम्' ऐसा रूप सिद्ध होता है। लिखन्ती-लिल' धातु से वर्तमान काल में लट् के स्थान पर यह आदेश करके नुम् करके स्त्रीत्यविवक्षा में करके 'लिखन्ती' रूप निष्पन्न होता है यहाँ 'लिखन्ती' इस शब्द के प्रयोग से यह ध्वनित होता है कि वह पक्षप्रिया वारंवार पक्ष का चित्र बनाती थी परन्तु अधुरात रात आदि से वह चित्र मिट मिट जाता था, वह पुनः उसे चित्रित करती श्री पञ्जरस्याम्—उपपद समास करके पजर' उपपदक 'स्पा' धातु 'सुपिस्थः' से 'क' प्रत्यय करके ह्रस्व करके स्त्रीत्वविवक्षा से टापू करके द्वितीया विभक्ति में 'पजरस्थाम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। रसिके रसोऽस्ति यस्याः इस विग्रह में 'रस' शब्द से मत इति नो' इस सूष से "छन्" प्रत्यय करके उसके स्थान पर 'उस्पेक:' इस सूत्र से 'इक' आदेश करके स्त्रीत्वविवक्षा में टापू करके 'रसिका' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। इसी सन्द से
टिप्पणी- गम्यम्- गन्तुं योग्यं गम्यम्गम्' धातु से यत् प्रत्यय करके
के सम्बोधन में 'रसिके ! ऐसा रूप निष्पन्न होता है। कहीं-कहीं रसिके !

- स्थान पर 'तुमने ऐसा पाठ मिलता है। भर्तुः विभति इति 'मता सृ' धातु से कर्ता में 'तृच्' प्रत्यय करके भर्ता' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उक्त रूप पष्ठी विभक्ति का है। यह षष्ठी 'अधीगदपेश कर्मणि' इस सूत्र से 'स्मृ' धातु के योग रहने के कारण कर्म में हुई प्रिया प्रीणाति इति इस विग्रह में भी धातु से इगुपधज्ञाप्रीकिरः क इस सूत्र से 'क' प्रत्यय करके इस आदेश करके स्त्रीत्व विवक्षा में टापू करके 'प्रिया' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। बालोके उपसर्गपूर्वक 'लोक' धातु से भाव में 'च' प्रत्यय करके सप्तमी विभक्ति में 'आलोक' ऐसा रूप निष्पन्न होता है।
अलङ्कार:- इस श्लोक में तुल्यबल वाले पदार्थों का विरोध चातुर्यपूर्ण ढंग से प्रदर्शित होने के कारण 'विकल्प' बलकार है ।। २२ ।।
उत्सङ्ग वा मलिनवसने सौम्य ! निक्षिप्य वीणां मद्गोत्रा' विरचितपदं गेयमुद्गाकामा ।
तन्त्रीमार्द्रा नयनसलिलैः सारयित्वा कयंचिद् भूयो भूयः स्वयमपि कृतां मूच्र्छनां विस्मरन्ती ॥ २३॥
अन्वयः - हे सौम्य ! मनिबसने उस बीणाम्, निक्षिप्य मद्गो- जाम् विरचितपदम् गेयम् उद्गातुकामा नयनसलिल आर्द्रा तन्त्री, कचित् सारयित्वा भूयो भूयः स्वयम् कृताम् अपि मूर्च्छनाम, विस्मरन्ती, बा, ( सा ते बालोके, पुरा निपतति ) । (सा ।
-
व्याख्या हे सौम्य है भद्र [ मलिनवने मलीमसाम्बरे उत्सङ्गे
कोडे, वीणाम् = वल्लकीम, निक्षिप्य स्थापयित्वा मदमोत्रम्-मदभिषे
पान्वितम् पास्यात्तया विरचितपदम् रचितम् यम् गातुं योग्यम्
उद्गातुकामा उच्चैर्गातुमभिलषन्ती, नयनसलिले: नेत्राम्बुभिः, अभि-
रित्यर्थः । बाम् क्लिन्नाम्, तन्त्रीम्बीणागुणम्, कचित् येन केनापि
प्रकारेण कष्टेनेत्यर्थः सारवित्वा करेण सम्मेध्य, भूयो भूयः पुनः पुनः
=

= स्वयम् आत्मना कृतामपि विहितामपि मूर्च्छताम् स्वराऽधरोहावरोह क्रमम्, विस्मरन्ती विस्मरणं कुर्वन्ती 'ते मालोके पुरा निपतिष्यति' इति पूर्वश्लोकेनान्वयः ।
शब्दार्थ: है सौम्य सज्जन । मलिनयसनेमे वस्त्रोंवाली, उत्सङ्गे गोद में, बीणाम्बीणा को निक्षिप्य रखकर, मदगोवाम्- मेरे नाम से युक्त, विरचितपदम् बनाये गये पदवाले, गेयम् गीत को, उद्गातुकामा गाने की इच्छाबाली नयनसलिलों से बाम् भाँगी हुई, लन्त्री तारों को, कथंचित् किसी तरह सारयित्वा मिला करके भूयो भूयः बार-बार स्वयम् अपने आप कृठामपि बनाये गये भी मूर्च्छनाम् स्वरों के आरोह-अवरोह कम को, विस्मरन्ती भूलती हुई ( तुम्हारे दृष्टिपथ पर आयेगी ) ।
भावार्थ:- हे भद्र एवं च सा मे प्रिया मलिनवर स्वाके बीग संस्थाप्य मन्त्रमान्वितं गानं गान्धारस्वरेण गातुमिच्छन्ती अभिः क्लिन्नं वीणा- गुणं कचित् सम्मेत्य वारंवारं स्वेन विरचितमपि स्वराऽऽरोहावरोह-क्रम विस्मरन्ती स्वद्दृष्टिपये आगमिष्यति ।। २३ ।।
हिन्दी-हे सजन बोर वह मेरी प्रिया मैले बस्त्रों वाली गोद में बीणा को रखकर मेरे नाम से युक्त पदों वाले गीत को गान्धार स्वर में माने की इच्छा वाली आंसुओं से भींगी हुई तारों को किसी तरह मिलाकर अपने ही द्वारा बनाये गये स्वरों के आरोह-अवरोह क्रम को पुनः पुनः मूलती हुई ( तुम्हारे दृष्टि पथ पर आयेगी ) ।। २३ ।।
समास: मलिनं वसनं यस्मिन् सः मलिनवसन (बहु० ) तस्मिन् मम गोत्रं मद्गोत्रम् (प० तत्) मदोषं मधु यस्मिन् तद् मद्गोषाम् ( बहु० ) विरचितानि पदानि यस्य तत् विरचितपदम् (बहु० ) उदगातुं कामो यस्याः सा उदगातुकामा ( बहु०) नयनयोः सहिखानि नयनसलि सानि ( ० त ० ) -

- कोश: गोत्रं नाग्नि कुलेऽपि च इत्यमरः स्वराणां स्थापनाः सान्ताः मूर्च्छनाः सप्त हि इति संगीतरत्नाकर: आलोको दर्शनोद्यत इत्यमरः ।
- टिप्पणी- मलिनवसने पतिव्रता प्रोषितभर्ता को मेला ला वस्त्र पहनना चाहिए उसे तो पति के पीड़ित रहने पर पीड़ित पति के प्रसन्न रहने पर प्रसन्न, पति के प्रवासी होने पर मलिनवस्त्र एवं कृशाङ्गी और पति के मर जाने पर प्राणत्याग कर देना चाहिए वही स्त्री पतिव्रता कहलाती है-
'आत मुदिते हृष्टाः प्रोषिते मलिना कृशा । मृता भवेत या पत्यो सा स्त्री या पतिव्रता ॥
महाकवि को उत्कृष्ट रचना अभिज्ञान शाकुन्तल की नायिका शकुन्तला की स्थिति देखिये, दुष्यन्त से परित्यक्ता होने पर
'बसने परिघूसरे बसाना नियमज्ञाममुखी धूर्तवेणिः । अति निष्णस्य शुद्धशीला मम दीर्घं विरतं विमति ॥
निक्षिप्य 'नि' उपसर्गपूर्वक 'क्षिप्' धातु से क्या प्रत्यय करके स्वप् आदेश करके 'निक्षिप्य' रूप निष्पन्न होता है। गेयम् गातुं योग्यम् इस विग्रह में '' धातु से यत् प्रत्यय करके धातु के ऐकार को आकारादेश करके 'इति' इस सूत्र से ईत्व करके गुण करके 'गेयम्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। उद्गातुकामा यहाँ (i) 'पा' धातु से विहित तुमुन् प्रत्यय के मकार का 'तुं काममनसोरपि' इससे लोप हो गया है 'काम' पद आगे होने के कारण। कचित् सम्मेल्य- अपने प्रियतम के नाम से युक्त गीत को गाने की इच्छा यद्यपि पक्षपत्नी करती थी, परन्तु प्रियतम के स्मरण से आंखों में बाँसुओं के मा जाने से वीणा की तारें भींग पाती थीं, जिसे वह किसी तरह मिलाती थी। परन्तु प्रियतम की याद में इतना निमग्न हो जाती थी कि वह स्वरचित मूर्च्छना को भी अन्यमनस्कता के कारण भूल जाती थी।
स्वर के आरोह-अवरोह क्रम को मूर्च्छना कहते हैं 'क्रमयुक्ताः स्वराः सप्तमूर्च्छना परिकीर्तिता' इति भरतः ।
अलङ्कारः यहाँ भी पूर्वलोक के समान विकल्प बलर है ।। २३ ।

शेषान्मासान्वि रहदिवसस्यापितस्याव घेव
विन्यस्यन्ती भुवि गणनया बेहलीदत्त पुष्पैः ।
मत्सगं था हृदयनिहितारम्भमास्वादयन्ती
प्रायेणते रमर्णावि रहेष्वङ्गनानां विनोदाः ॥ २४॥

अन्वयः या विरहृदिवसस्यापितस्य, अवधेः शेषान् मासान, देहलीदत्त- पुष्पैः गणनया, मुवि विन्यस्यन्ती वा हृदयनिहितारम्मं मत्सङ्गम्, आस्वाद- यन्ती ( ते आलोके पुरा निपतति ) प्रायेण अङ्गनानां रमणविरहेषु एते, विनोदा: ।
व्याख्या वा अथवा विरहृदिवसस्यापितस्य वियोगदिनादारभ्य निश्चितस्य, अवधेः समयसीमायाः शेषान् अवशिष्टान् मासान् त्रिशद् दिनात्मकान् कालविशेषान्, देहलीदत्तपुष्पैः सदनाऽग्रणी स्थापितकुसुमैः गणनया एक द्वावितिक्रमेण संस्थानेन, मुवि पृथिव्याम् विन्यस्यन्ती स्थापयन्ती वामथवा हृदयनिहिताऽऽरम्भम् चित्तसङ्कल्पितोपक्रमम् मत्सङ्गम् मत्सम्भोगम्, आस्वादयन्तीमनुभवन्ती वा (ते बालो पुरा निपतति) प्रायेण बहुशः अङ्गनानाम् कामिनीनाम् रमण विरहेषु प्रियतमवियोगेषु एते पूर्वोक्ता, विनोदा: काठात्ययोपायाः भवन्तीति शेषः ।
शब्दार्थः चा अथवा विरहृदिव सस्थापितस्य वियोग के दिन से निश्चित, अवधेः समय की सीमा के शेषान् बचे हुए मासान्महीनों को, देहलीदत्तपुष्पैः देहली पर रखे हुए फूलों के द्वारा, गणनया एक दो इस प्रकार गणना करके, मुवि पृथ्वी पर विन्यस्यन्ती रखती हुई, वा अथवा हृदयनिहिताऽऽरचन् मन में कल्पना के द्वारा आरम्भ किए हुए, मत्सङ्गम मेरे सहवास का आस्वादयन्तीअनुभव करती हुई (तेरे दृष्टिपथ पर सहता आयेगी ) प्रायेण अधिकतर अङ्गनानाम् कामिनियों के रणविरहेषु प्रियतम के वियोग के दिनों में एवे पहले कहे गये, विनोदा: मन को बहलाने वाले साधन हुआ करते हैं।

--
भावार्थ:-- हे मेघ ! अथवा विरहविनादारभ्य निविचतावशेरवशिष्टान् मासान् गृहदेहल्यां स्थापितकुसुमैणयन्ती अथवा मनः संकल्पितोपक्रमं मत्संभोग- सुखमनुभवन्ती (सा मत्प्रिया तव दृष्टिपथे मागमिष्यति ) बाहुल्येन वधूनां दयितविरहेषु पूर्वोक्तोपाया: कालक्षेपोपायाः भवन्ति ।
हिन्दी - हे मेघ ! अथवा वियोग के दिन से प्रारम्भ समय की सीमा के बचे हुए महीनों को घर की देहली पर रखे हुए फूलों के द्वारा गिन-गिन कर पृथ्वी पर रखती हुई अथवा मन में कल्पना के द्वारा आरम्भ किए हुए मेरे सहवाससुख का अनुभव करती हुई ( वह मेरी प्रिया तुम्हारे दृष्टि पथ पर आयेगी ) प्रायः स्त्रियों का प्रियतम के वियोग के दिनों में ये मनोविनोद हुआ करते हैं।
- समास: विरहस्य दिवसः विरहृदिवसः (प० तत् ० ), तस्मात् स्थापितः = विरहृदिवस स्थापित: ( ६० तत्०) तस्य देहल्यां दत्तानि देहलीदत्तानि (स० त०), देहलीदत्तानि च पुष्पाणि देहलीदत्तपुष्पाणि ( कर्म० ) तैः । हृदये निहिताः आरम्भाः यस्य सः हृदयनिहितारम्भ: (बहु० ) तम् रमणस्य विरहः रमणविरह: ( ६० तत्० ) तेषु । =
कोश:- गृहावग्रहणी देहली, इत्यमरः परिच्छेदे बिलेऽवधिः इत्यमरः । स्त्रियः सुमनसः पुष्पं प्रसूनं कुसुमं सुमम् इत्यमरः स्वान्तं हृन्मानसं मनः, इत्यमरः ।
टिप्पणी- स्थापितस्य- णिजन्त 'स्थापि' धातु से कर्म में 'क्त' प्रत्यय करके 'स्थापित:' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। देहलीदत्तपुष्पैः– यहाँ हेतु में 'ती' इस सूत्र से तृतीया हुई है। विन्यस्यन्ती- 'वि' एवं 'नि' उपसर्गपूर्वक 'अस्' धातु से धतृ प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में द्वीप करके 'विन्यस्यन्ती' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। यक्षपत्नी अंगुली पर भी महीनों को गिन कती थी, परन्तु 'देहली पर रखे हुए फूलों को गिनकर पृथ्वी पर रखती हुई ऐसा लिखना मुग्धता के आधिक्य को द्योतन करने के लिए ही है।

- मतङ्गमनमङ्गः परमङ्गनम् आस्वादयन्ती आङ' उपसर्गपूर्वक free के स्थान में प्रत्यय करके स्त्रीत्वविवक्षा में करके आप ऐसा होता है। रमणविरहेषु कहीं- कहीं 'रमणविरहे ङ्गनानाम्' ऐसा पाठ मिलता है। उनका कहना है 'विरह' एक है, अत: एकवचनान्त पाठ होना चाहिए परन्तु बहुवचनान्त पाठ ही यहाँ युक्तियुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि विरह के एकत्व रहने पर भी उसकी दुःसहता के कारण अतिशय दीर्घता का द्योतन बहुवचनान्त पाठ से होता है। काम की दशा के दश भेद हैं-
चक्षुरागस्तदनु मनसः सङ्गतिर्माना च व्यावृत्तिः स्यात्तदनु विषयग्रामतचेतसोऽपि । निद्राच्छेदस्तदनु तनुता निस्त्रत्वं ततोsa- न्मादो मूर्च्छा तदनुमरणं शिरसा प्रक्रमेण ॥
साहित्यदर्पण के निम्नलिखित नियम के अनुसार यहाँ २२ श्लोक से २४ श्लोक तक कुल तीन श्लोकों का 'आलोके ते निपतति पूरा इस अंश के माध्यम से परस्पर सम्बन्ध होने के कारण यहाँ 'सन्दानितक' है। जैसा कि
छन्दोबद्धपदं पद्यं तेनैकेन च मुक्तकम् । द्वाभ्यां तु युग्मकं सन्दानितकं निभिरिष्यते । कलापकं चतुभिच पत्चभिः (तदूवं वा ) कुलकं मतम् ॥
अलङ्कारः - पूर्व श्लोकों के समान यहाँ भी 'विकल्प' एवं सामान्य से विशेष का समर्थन होने से 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है। परस्पर दोनों
अलङ्कारों का अङ्गाङ्गिभाव होने से 'संकर' अलङ्कार है ।। २४ ।।
सव्यापारामहनि न तथा पीडयेन्मद्वियोनः
शके रात्री गुरुतरशुचं निविनोदां सखीं ते ।
मत्सन्देशैः सुखयितुमलं पश्य साध्वों निशीथे
तामुनिद्राभव निशयनां सौधवातायनस्थः ॥ २५ ॥
१५ मे० दू०

अन्वयः - (ह 1) बहान सव्यापारात सखा मदियोग तथा न पीडयेद, रात्री निविनोदाम, गुरुतरशुचम्, शङके, निशीथे, उन्निद्राम, अवनि- शयनाम् साध्वीम् ताम्, मत्सन्देशः, बलम्, सुखयितुम्, सौधवातायनस्यः पश्य ।। २५ ।।
= = = = व्याख्या ( हे सखे 1) अनि दिवसे सव्यापाराम् पूर्वोक्तचित्रलेख- नादिव्यापारसंहिताम्] ते मेघस्य सखीम् = सखिप्रियाम् मद्भार्यामित्यर्थः । मद्वियोः मदीयविरहः, तथा तेन प्रकारेण न पीडयेत्न संतापयेत् (किन्तु ) रात्री निशायाम्, निविनोदाम् = विनोदव्यापाररहिताम् गुरुतरशुचम् =अतिदुःसहशोकाम्, शङ्के = तर्कयामि । ( अतः ) निशीथे मध्यरात्री, उनि द्वाम् भग्ननिद्रां जागरितामिति भावः । अवनिशयनाम् भूमि शायिनीम्, साध्वीम् = पतिव्रताम्, ताम् मत्प्रियाम् मत्सन्देशः मदीयवार्ताभिः, = पर्याप्तम् सुखयितुम् आनन्दयितुम्, सौधवातायनस्थः (सन् ) पश्य अवलोकय ।। २५ ।
शब्दार्थः -- ( हे सखे !) बह्नि दिन में सम्यापाराम् = काम में लगी हुई, ते तुम्हारी, सखीम्सखी को, अर्थात् मेरी प्रिया को, मद्वियोग: मेरा विरह, तथा उस प्रकार न पीडयेत् नहीं पीड़ित करता होगा, ( किन्तु ) रात्री- रात में निविनोदाम् समय-यापन के साधनों से रहित ( प्रिया को ) गुयतरयुचम् =बहुत बड़े शोक से युक्त होगी ( ऐसा ) शके अनुमान कर रहा हूँ। निशीचे मध्यरात्रि में, उनिद्राम् भग्न निद्रावाली ( जागती हुई ) अवनिशयनाम् - पृथ्वी पर सोयी हुई, साध्वीम् पतिव्रता, ताम्स मेरी प्रिया को, मत्सन्देशः मेरे सन्देशों से अलम् पर्याप्तरूप से सुखयितुम् - खुशी करने के लिए, सोधवातायनस्यः मटारी की खिड़की पर स्थिर होकर, पश्य देखना ।। २५ ।। = म - = =
भावार्थ: है मित्र ! दिवसे बलिचित्रलेखनादिव्यापारसंलग्न ममाय मद्विरहेण तेन प्रकारेण न पीयते यथा विनोदरहितरात्री सा पीड्यते । मध्य- रात्रौ भग्ननिद्रां भूमिशाविनी पतिव्रतां वा मत्प्रियां मत्सन्देशः हम्मेवातायनस्यः सन् पर्याप्तमानन्दय ।। २५ ।।

हिन्दी - हे मित्र दिन में चित्र लेखन आदि कामों में लगी मेरी प्रिया को मेरा विरह वैसा पीड़ित नहीं करेगा, जैसा कि मनोविनोद के साधनों से रहित रात्रि में, अतः वह और भी दुःखी होगी, ऐसा मैं अनुमान करता हूँ। इस लिए मध्यरात्रि में जागती हुई, पृथ्वी पर सोयी हुई पतिव्रता उस मेरी प्रिया को, महल की खिड़की पर स्थित होकर (तुम) मेरे सन्देशों से पर्यात सुख पहुँचाने के लिए देखना ।। २५ ।।
समासः व्यापारः सहिता सव्यापारा ( तुल्ययोग बहु० ) ताम् । मम वियोग: मद्वियोगः ( प० त०) निरंतो विनोदो यस्यः सा निविनोदा ( बहु० ) ताम् गुरुतरा शुरू यस्याः सा गुस्तरशु (बहु० ) तो गुरुतरशुचम् । उत्सृष्टा निद्रा यया सा उन्निद्रा (बहू) ताम् अवनिरेव शयनं यस्याः सा अवनीशवना ( बहु० ) ताम् । मम सन्देशा मत्सन्देशाः ( प० त० ) । वातस्य आयनं वातायनम् (प० तत्०) सोधवातायने तिष्ठतीति सौधवाता- = 1 = नस्य ( उपदः ) ।
कोशः शङ्का भयोः इति शब्दार्णवः । साध्वी पतिव्रता इत्यमरः । अर्धरात्रं निशीयौ द्वौ इत्यमरः दमावनिमेदिनी मही, इत्यमरः । अलं भूषणं पर्याप्त शक्तिवारण वाचकम् इत्यमरः ।
टिप्पणी-व्यापाराम् वि एवं आ उपसर्गपूर्वक 'पृ' धातु से भाव में
चन् प्रत्यय करके स्त्रीत्व विवक्षा में टापु करके 'व्यापारा' ऐसा रूप निष्पन्न
होता है वियोग'वि' उपसर्गपूर्वक 'युथ्' धातु से भाव में पम् प्रत्यय करके
'वियोग' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। कहीं-कहीं 'विप्रयोगः' ऐसा पाठ भी
मिलता है। अर्थ में कोई भेद नहीं, व्युत्पत्ति में केवल धातु के पहले 'प्र'
उपसर्ग और अधिक लगाना पड़ेगा तथा तेन प्रकारेण इस विग्रह में तद् [शब्द
से 'प्रकारवचने बालु' इस सूत्र मे बाल प्रत्यय किया गया है। निविनोदास्-
'निर्' एवं 'वि' उपसर्गपूर्वक 'नुदु' धातु छन् प्रत्यय करके निविनोदाम् रूप
निष्पन्न होता है। उक्तरूप द्वि० विभक्ति का है। गुरुतरशुचम् - अतिशयेन गुर्वी
इति गुरुतरा गुरु शब्द से तर प्रत्यय एवं स्त्रीत्वविवक्षा में टापु होता है ।

शोचनं शुक्, 'शुच्' धातु से स्विम् प्रत्यय करके उसका सर्वापहारी कोष होकर चायें होकर शुक्' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। अवनिशयनास्पतिव्रता प्रोषितभर्तृका के लिए पर्यङ्कादि पर सोना निषिद्ध है, अतः यक्षप्रिया पृथ्वी पर सोती थी। साध्वी 'साधु' शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में गुणवाचक होने के कारण 'बोतो गुणवचनात्' इस सूत्र से 'डी' प्रत्यय किया गया है। सन्देश- 'सम' उपसर्गपूर्वक 'दिस' धातु से धन् प्रत्यय करके 'सन्देश' रूप निष्पन होता है। सौधवातायनस्यः - 'सौध' शब्द का अर्थ अमरकोष के अनुसार चुने की लेप वाला महल होता है। यहाँ उक्तपद का प्रयोग 'कुबेर के राज- भवन के समान ही यक्ष का भवन भी था इस बात को अभिव्यक्त करने के लिए किया गया है।
यहाँ काम की दश अवस्थाओं में 'जागरण' अवस्था का वर्णन है ।। २५ ।।
आषिक्षामा विरहशयने सन्निषण्णैकपाव
प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः ।
नीता रात्रिः क्षण इव मया सार्धमिच्छारतैर्या
तामेवोष्णव रहमहती मधुभिर्यापयन्तीम् ॥ २६ ॥
अन्वयः - अधिक्षामाम्, विरशयने, सन्निषण्णैकपादर्याम, प्राचीमूले, कला- मात्रशेषाम, हिमांशी तनुम् इव या रात्रिः मया सार्धम्, इच्छारतः क्षण इव नीता, विरहमहतीम्, ताम्, एव, उष्ण, अश्रुमि:, यापयन्तीम् (तां पश्य ।।२६।।
व्याख्या - आधिक्षामाम् मानसिकव्यथाक्षीणाम्, विरहशयने वियोग
तल्पे, सन्निषण्णैकपादम् सम्यनिलीन कपाश्वम्, प्राचीमूले= पूर्वदिङ्मूले
कलामात्रशेषाम् कलामात्रावशिष्टाम् हिमाशोः इन्दोः, तनुम् = शरीरम्
इव यथा स्थितामिति शेषः यापूर्वोपमुक्ता, रात्रिः रजनी, मया-
यक्षेण, सार्धंम्===साकम्, इच्छारतः अभिलषितसुरतैः, क्षण व स्वल्पकाल
इव, नीता व्यतीता, विरहमहतीम् वियोगविशालाम्, तामेव तज्जातीयामेव


- याय्या पर सन्तिषष्ण कपार्श्वाम् एक ही करवट से सोयी हुई, प्राचामूल पूर्व दिशा के मूल में, कनामात्रशेषाम् कला मात्र ( सोलहवाँ अंश ) अवशिष्ट, हिमांशोः चन्द्रमा के नुम् शरीर के इस तरह बाजो रात्रिः रात, मया मेरे मार्धम् माथ, इच्छारः अभिलषित संभोगों के द्वारा क्षण इव = एक जण के समान, नीता व्यतीत की गयी थी, विरहमहती वियोग के कारण लम्बी, तामेव उसी रात को उष्णैः गरम, अबुभिः आँसुओं से, यापयन्तीम् बिताती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ।। २६ ।।
भावार्थ:- हे मेघ ! मानसिकव्याकृषां विरहृतस्यैकपार्श्वेन शयानाम् पूर्वदिग्मूले कलामात्राऽवशिष्टामिन्दुमूर्तिमिव स्थिताम् मया सह या रात्रिः सुरतक्रीडादिभिः क्षण इव नीता वियोगगुर्वी तामेव रात्रिमुने: नेत्राम्बुभिर्गम- यन्तीं तां मत्प्रियां पश्य ।। २६ ।।
हिन्दी - हे मेघ ! मनोव्यथा से दुबली विरहशय्या पर एक ही करवट से सोयी हुई, पूर्व दिशा के मूल में कलामात्र बची हुई चन्द्रमा की मूर्ति के समान जिन रातों को मेरे साथ संभोगों के द्वारा एक मिनट के समान बिताया था, बिरह के कारण लम्बी उन्हीं रातों को गरम-गरम आंसुओं से बिताती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ।। २६ ।।
समास: आधिना लामा अविक्षामा (तृ० त०) ताम् विरहस्य शयनम् विरहशयनम् ( [ष० त०) तस्मिन् मम्यक् निषण्णं सन्निषण्णम् ( कुगतिप्रादय इति समासः), सन्निषण्ण मेकपा यस्याः मा सविणेपाश्र ( बहु० ) ताम् प्राच्या मूलं प्राफीमूलम् ( ष० तत्०) तस्मिन् कला एवं कलामात्रम् ( मयूर व्यं० ) कलामात्रं शेषो यस्याः सा कलामात्रशेषा ( बहु० ) हिमा अंशवो यस्य स हिमांशुः ( बहु०), इच्छया रतानि - इच्छारतानि (० त०) तैः । विरहेण महती विरहमती (तृ० तत्०) ताम् । = =
कोश:- पुंस्याधिर्मानसी व्यथा इत्यमरः हिमांशु चन्द्रमाञ्चन्द्रः इत्यमरः ।

नगरस्थित कालविशेत्क्षत्रः स्त्रियां मूर्तिस्तनुस्तनूः इत्यमरः ।
टिप्पणी- आधि आइ उपसर्गपूर्वक 'घा' धातु से भाव में 'कि' प्रत्यय करके 'आधि' रूप निरस्त होता है। निषण्ण नि' उपसर्गपूर्वक 'सद् धातु से प्रत्यय तत्व णत्वादि करके 'निषण्ण' ऐसा रूप बनता है प्राची- 'प्र' उपसर्गपूर्वक '' धातु से कर्ता में प्रत्यय करके उसका सर्वापहार लोप करके मलोप करके स्त्रीत्व विवक्षा में छो करके 'प्राची' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। यापयन्तीम्या' धातु से मि करके पुगागम करके वर्तन काल में लट् लकार लाकर उसके स्थान पर 'शत्रु' आदेश करके स्त्रीत्व विवक्षा में कीप करके नुमादि करके 'यापयन्ती' ऐसा रूप बनता है। यह रूप द्वि० विभक्ति का है यहाँ क्षीणावस्या का कथन है।
अलङ्कारः यहां चन्द्रमूर्ति के समान पक्ष पत्नी के होने के कारण 'उपमा' अलङ्कार है ।। २६ ।।
पादानिन्दोरमृत शिशिराज्ञ्जालमार्गप्रविष्टान्
पूर्वत्रीत्या गतमभिमुखं संनिवृतं तथैव ।
चक्षुः खेदात् सलिलगुरुभिः पदमभिश्छादयन्तीं साम्रीव
स्थलकमलिनीं न प्रबुद्धां न सुप्ताम् ॥ २७॥

अन्वयः - जालमार्ग प्रविष्टान् अमृत शिशिरान् इन्दोः पादान् पूर्वप्रीत्या
मुखम् गतम् तचैव संनिवृत्तम् चक्षु, सेदाद, सलिल गुरुभिः पदमभिः,
छादयन्तीम् साsss. ह्नि न प्रबुदाम्, न सुताम् स्थलकमलिनीम् इव
( प ) ।। २७ ।।
व्याख्याजालमा प्रविष्टान् गवाक्षपणान्तर्गतान्, अमृतशिशिरान्
सुधाशीलान् इन्दो: हिमांशी, पादान्मयूतान् पूर्वप्रीत्या प्राचीनस्नेहेन.
मुखम् सम्मुखं यया स्यात् तथागतम्प्राप्तम् चैतेनैव प्रकारेण


- - = = संनिवृत्तम् = प्रत्यागतम् चक्षुः- नेत्रम् वेदाद दुःखाद, सलिलगुरुभिः अडुमरे, पदमभिः निमेषैः नयनरोममिरित्यर्थः छादयन्तीम् पिहित कुर्वन्तीम्, साजतधने, अह्निदिवसे न प्रबुद्धान्न विकसि ताम्, न सुमान मुकुलिताम्, स्थतकमलिनीम् भूमिपद्मिनीम् इव पथा स्थितामिति शेषः तां प ) ।। २७ ।।
= = = = - शिशिरान् अमृत के समान शीतल, इन्दोः चन्द्रमा को पादान् किरणों को, पूर्व-प्रीत्या पहले के स्नेह के कारण अभिमुखम् सम्मुख गम् तथैव (तत्क्षण ) उसी तरह संवृत्तम्टी हुई चक्षुः को, छेदात् दुःख के कारण, सलिल गुरुभिः असुओं से मारी, पश्मभिः पलकों के द्वारा छादयन्तीम् बन्द करती हुई, साउने मेम से युक्त, अह्नि दिन में, तो प्रति न सुमाम् और न ही मुकुलित, स्थलकम थि नीम् स्थलकमलिनी के समान ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ॥ २७ ॥ -
शब्दार्थ:- जालमा प्रविष्टालिड़की के मार्ग से भीतर प्रविष्ट, अमृत
भावार्थ:- हे मित्र ! गवामार्गान्तर्गतान् पीयूषन्द्रमखान् प्रति प्राचीनस्नेहेन अभिगमपि विरहदुःखेन तत्वाणमेव प्रतिनिवृत्तं भ दुर्भर: पक्ष्मभिराच्छादयन्तीं मेघाच्छन्ने दिवसेऽविकसिताममुकुलिताच स्थल पद्मिनी ( तो मत्यपश्य ) ।। २७ ।।
हिन्दी - हे मित्र लिड़की के मार्ग से भीतर प्रविष्ट अमृत के समान शीत चन्द्रमा की किरणों के सम्मुख प्राचीन स्नेह के कारण जाकर भी विरह- यश तत्क्षण प्रतिनिवृत्त बाँड को आंसुओं से बोझिल पलकों के द्वारा बंद करती हुई, मेघ से युक्त दिन में न तो विकसित और न ही मुकुलित स्थलकमलिनी के समान स्थित ( उस मेरी प्रिया को देखना ) ॥ २७ ॥ समासः - जालस्य मार्गः जालमार्ग ( च० द० ) तेन प्रविष्टा: बाल-
प्रविष्टाः (० त०) तान् अमृतानीव शिशिराः अमृतशिशिराः
( उपमान कर्मधारय ) तान् पूर्वा वासी प्रीतिः पूर्वप्रीतिः (कर्मधारय) तथा ।

सलिलेन गुरुमितगुरू ( ० त० ) । सहि माम् = अ (पयोग बहु० ) तस्मिन् ।
कोशः पादाइत्यमरः नासिलोनिक वाणी इत्यमरः ।
टिप्पणी- प्रीत्या प्रीणन प्रीतिः प्री धातु से किन् प्रत्यय करके
'प्रीति' ऐसा रूप बनता है। यहाँ तृ० विभक्ति का रूप है जो चन्द्रमा की किरणें पास के समय अत्यन्त सुख देती थीं, यही किरणें आज प्रिय- विरह के समय दुःखद हो गयी है, अतः क्षत्रिया की आंखें उसकी ओर जाकर भी तत्क्षण लौट आती है। छादयन्ती से करके लट् के स्थान में शतृ आदेश करके नुम् करके की करके 'छादयन्ती' ऐसा रूप बनता है। प्रबुद्धाम्- ('प्र' उपसर्गपूर्व' धातु से 'क' प्रत्यय करके टापू करके 'प्रबुद्धा' ऐसा रूप बनता है। यह कर द्विविभक्ति का है। यहाँ 'विद्वेष' नामक कामदशा का कपन है।
अलङ्कार:- 'अमृतशिशिराम्' यहाँ सामान्य वचन का लोप होने से मोपमा एवं स्थलनीमिव श्रोती उपमा है एवं दोनों निरपेक्ष भाव से है अतः यहाँ संसृष्टि अलङ्कार है ।। २७ ।।
निःश्वासेनाधर किसलयले शिना विक्षिपन्तीं शुद्धस्मानात्परमकं नूनमागण्डलम्बम् । मत्संभोगः कथमुपनयेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रा-
माकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
अन्वयः - शुद्धस्नानात् पुरुषम् गण्डलम्बम् अलकम्, अधरकिसलय
क्लेशना, निःश्वासेन, विक्षिपन्तीम्, स्वप्नजोऽपि मत्संभोगः कथम्, उपनयेद
इति नयनसलिलोद्धावकाशम्, निद्राम्, माकाङ्क्षन्तीम् ( पश्य ) ॥२८॥

- व्याख्या शुद्धस्नानावादिरहितमज्जाद, पप, गण्ड-
- = [लम्बम् = कपोलावलम्बि अलकम चूर्णकुन्तलम्, अधर किसलयनले शिना अधः दायिता, निःश्वासेनासेन, विशिपन्तीम् बालपन्तीम् कम्पयन्तीमिति भावः (तथा) स्वप्नशोऽपि स्वप्नावस्थोद्धवोऽपि मत्संभोगः मत्समागमः, दूरस्थत्वेन साखात्संभोगासम्भवाद रूपम् केन प्रकारेण उपनयेागच्छेद इतितीच्या नयनसलिलोपीहरुद्धावकाशाम्=अश्रु- प्रवानिरुद्धस्थानाम् निद्राम् संवेशम् आकाक्षरी (at प्रियां पश्य ) ।। २८ ।।
= शब्दार्थ:-शुद्धस्नानादादि के बिना स्नान के कारण परचम रूक्ष, आगण्डलम्बम् गालों तक लटकते हुए, अलधुंधरा बालों को अधर लेनिनूतन पल्लव के समान कोमल एवं रक्त निचले होंठों को कष्ट देने वाली निःश्वासेन साँसों से विक्षिपन्तीम् इतस्ततः बिखेरती हुई, (और) स्वप्नोऽपिवप्न में ही होने वाले, मत्संभोगः मेरा सहवास, क किस तरह उपनवेद प्राप्त हो, इति इसलिए, नयनसलिलोपीडावका- शाम मुओं के प्रवाह से स्थान बाली निद्रामुनोंद को आकाङ्क्षन्तीम् चाहत हुई उस मेरी प्रिया को देखना ) ॥ २८ ॥ -
भावार्थ: है मेघ आकपोतावलम्बि क्षरिपूर्णकुन्तलान् अधरपल्लव- दुसेन परिचालयन्ती तथा स्वप्नावस्थायामपि मत्सहवाससुखं प्राप्नुयादिति हेतोः जलप्रवाहावरुद्धात निद्रामभियन्तीम् मत्प्रियां पश्य ।। २८ ।।
हिन्दी बिनालादि के स्नान करने के कारण एवं गालों तक लटकते हुए राले बालों को नीचे के होंठों को झुलसाने वाले निःश्वासों से इधर-उधर हिलाती हुई तथा स्वप्नावस्था में भी मेरा सहवास सुख कैसे प्राप्त हो जाए, इसलिए प्रवाह से की निद्रा को चाहती हुई ( उस प्रिया को देखना ) ।। २८ ।
समासः युद्धं च तत् स्नानं शुद्धस्नानम् (कर्म) तस्मात् गण्डा

भ्यामिति आगण्डम् (अभ्ययीभाव ) । आगण्ड लम्बः आगण्डलम्ब ( सुप्पा ) तम् अधर: किसलयमिव अधर किसलयम् (उपमित कर्म ), अधरलियं नाति इति अधरकिसलयलेशी (उपपद स०) मम संभोगः संभोग (००) नयनोः सलिलानि नयनसलिनानि (१००) तेषामुत्पीय: नयनसलिलोपीड: ( ब० स० ) रुद्धः अवकाशो यस्याः सा द्धावकाशा (बहु०), नयनसलिलोत्पीडेन रुद्धावकाशा नयनसलिलोत्पीडा- वकाशा ( ० उद्०) ताम्
कोश:- मोठा तु रदनच्छदो दशनवाससी, इत्यमरः पल्लवी किसलयम् इत्यमर:
टिप्पणी- शुद्धस्नानात् पतिव्रता प्रोषितभर्तृका के लिये शरीरसंस्कार
का निषेध किया गया है, अतः यक्षपत्नी आदि का उपयोग नहीं करती । इस बात को ध्वनित करने के लिए 'शुद्धस्नानाद' ऐना पढा गया यहाँ हेतु में पचनी है। लम्बः सम्बत इति, इस विग्रह में अवसायक 'बि' धातु से 'नन्दिग्रहिपचादिभ्यों इत्यादि सूत्र से व प्रत्यय हुआ है एवं धातु के इदि होने के कारण 'इदितो नुम्बातो:' इस सूत्र से नुमादि करके 'सम्ब' ऐसा बनाया जाता है अलकम्यहाँ केशों के अधिस्य होने के कारण बहुवचन का प्रयोग होना चाहिए, परन्तु जातिवाचक होने के कारण एकवचन का प्रयोग किया गया है। क्योंकि
'जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम् ।'
इस सूत्र से विकल्प से बहुवचन का विधान किया गया है। कथम् किम्
शब्द से 'केन प्रकारेण' इस विग्रह में 'किम' इस सूत्र से पम् (च
प्रत्यय करके एवं क्रिमः कः इस सूत्र से किम् के स्थान पर 'क' देश
करके 'कपम्' ऐसा रूप बनता है। यह अव्यय पद है अतः सुप् का सुरू हो
जाता है। उपनयेत् -'उप' उपसर्वपूर्वक 'भी' धातु के सिंह तकार का
यह रूप है। यद्यपि 'नी' धातु का अर्थ ले जाना है परन्तु 'उप' उपसर्ग के

लग जाने से उसका अर्थ दूसरा हो गया है। धातोरन्तरेइत्यादि पहले ही निर्देश किया जा चुका है।
यहाँ अत्याग के द्वारा पा  नाश नामक कामदशा का कथन है।
अलङ्कार:- 'अधरकिसलय' यहाँ सुमोमा है । २८ ॥
आये बद्धा विरहविव से या शिलादाम हित्वा
शापस्यान्ते विगलितशुचा तां मयोद्वेष्टनीयाम् ।
स्पर्शक्लिष्टामयमितनखेनासकृत् सारयन्तीं
गण्डाभोगात्कठिन विषमामेकवेणीं करेण ॥२९॥

अन्वयः -- आये, विरहृदिवसे, दाम, हित्वा या, शिक्षा, बढा, शापस्य, बन्ते विगलितचा मया, उद्वेष्टनीयाम् स्पक्लिष्टाम् कठिनविषमाम्, एकवेणीम्, ताम्, अयमितनवेन करेण गण्डाभोगाद, बसकृद, सारयन्तीम् तो ।। २९ ।।
= = = व्याख्या माद्ये प्रथमे विरहदिवसेवियोगदिने दाम पुष्पमालाम् हित्वा त्यक्त्वा, या शिवाय केशपाशी, बद्धा निवडा पवितेत्यर्थः शापस्य अभिशापस्य अन्ते अबसाने, विगलित सुभाविनष्टशोकेन मया प्रियेण पक्षेणेत्यर्थः उद्वेष्टनीयाम् =मोचनीयाम्, स्पर्श क्लिष्टाम् संस्पर्शेण दुःखाविनीम्, कठिनविषमाम्पपोच्चावचाम्, एकवेणीम् एकबन्धनवत वेणीम्, ताम् केशपाशीम् अयमितनवेन अकुत्तानसेन करेणहस्तेन, गण्डाभोगात् कपोल-प्रदेशात् असकृत् भूयोभूयः सारयन्तीम् अपसार- यन्तीम् ( तो पश्य ) ।। २९ ।। -
शब्दार्थ : माघे पहले, विरहदिवसेवियोग के दिन, दाम पुष्पमाला को, हित्वा छोड़कर, या शिखाओ चोटी, बद्ध:-यूँची थी, सापस्यान्ते- छाप के बीत जाने पर, विगलितचा अपगत सोक वाले, मया मेरे द्वारा, उद्वेष्टनीयाम् = खोली जाने वाली स्पर्थक्लिष्टाम्-छूने से व्यथा पहुँचाने वालों


= = (दुःखने वाली), कठिनविना रूक्ष एवं ऊँची-नीची एकवेणीम् एक ही उड़वाली, ताम्र उस केश की चोटी को अमितन सेन विना काटे हुए नख वाले, करे हाथ से, गडाभोगात् बड़े गालों पर से, असकृत् बार-बार, सारयन्तीम् हटाती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना ) । २९ ।।
- हिन्दी मेघ पहले वियोग के दिन पुष्पमाला को त्यागकर जो बालों की पोटी सूची थी, शाप के बीत जाने पर शोकरहित होकर मेरे द्वारा खोली जाने वाली छूने से क्लेश देने वाली, रूक्ष और ऊँची नीची एक लड़ वाली उस छोटी को बिना कटे नाखूनों वाले हाथ के द्वारा अपने विस्तृत गालों पर से बराबर हटाती हुई ( उस मेरी प्रिया को देखना )
भावार्थ: है मेष! प्रथमे विरहदिने पुष्पमालारहिता या केवापाशी गुम्फिता पावसाने विगतशोकेन मयोद्वेष्टनीयां रूा निम्नोant तामेव  aeतितनसेन हस्तेन कपोलविस्तारात् पुनः पुनः अपसारयन्तीम् ( तां मत्प्रियां पश्य ) ।। २९ ।।
समासः - विरहस्य दिवसः विरदिवसः ( ब० तत्०) विगलिता शुक् यस्य स विगलितशुक् (बहू) तेन उद्गतं वेष्टनं यस्याः सा उद्वेष्टनीया ( बहु० ) ताम् स्पर्शे क्लिष्टा पक्लिष्टा (स० स०) ताम् कठिना पास विषमा कठिन विषमा (कर्म) ताम् एका चासो वेणी एकवेणी (कमै०) ताम् अयमिताः नखाः यस्य स अयमितनखः (बहू) तेन गण्डस्य जाभोग: गण्डाभोगः ( च० त०] ) तस्मात् । = = =
कोश:- वेणी नदीभेदे कयोच्चये, इत्यमरः । गण्डी कपोलो इत्यमरः । पुनर्भव: कररु: नख:, इत्यमरः ।
टिप्पणी-दाम- यह 'दाम' शब्द के द्विविभक्ति के एकवचन का रूप है, यह शब्द नपुंसकलिंगी है। हित्वा त्यागने के वर्ष में विद्यमान बोहा धातु से 'क्वा' प्रत्यय करके 'जहातेहि' इस सूत्र से 'हो' को 'ह' बादेश करके 'हित्या' रूप निष्पन्न होता है। बद्धा: 'बन्ध' धातु से

'क' प्रत्यय करके नलोपादि करके स्त्रीत्व विवक्षा में 'टापू' करके 'बड़ा' ऐसा रूप बनता है। उद्वेष्टनीयास्— 'उद्वेष्टनं करोति' इस विग्रह में 'उद्वेष्टना' शब्द से 'तत्करोति तदाचष्टे' इस सूत्र से मिच् प्रत्यय होता है। पुनः उसका 'आख्यानात् कृतस्तदाचष्टे कुल्लु प्रकृतिप्रत्ययापत्तिः प्रकृतिवच कारकम्' इस बात से कुद् प्रत्यय का लोप हो जाता है, तब 'उद्वेष्ट' इस नाम धातु से तम्पत्तम्यानीयर:' इस सूत्र से 'बनीय' प्रत्यय करके स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप करके 'उद्वेष्टनीया' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। यह ० विपति का रूप है। कठिनविषमा यहाँ दोनों पद विशेषणवाचक हैं परन्तु पूर्वपद को विशेषण एवं उत्तरपद को विशेष्य मानकर "विशेषणं विशेष्येण बहुलम् इससे समास हुआ एकवेणीम् एका चासो देगी ऐसा विग्रह जहाँ किया जाता है वहाँ 'पूर्वकालं सर्व जर पुराणन व केवलाः इत्यादि सूत्र से समास होता है एवं पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु' इससे 'एका' को पुंवद्भाव किया जाता है।
यहाँ "चित्तविभ्रम" नामक कामदा स्वनित होती है। अलङ्कारः - यहाँ 'स्वभावोक्ति' नामक अलङ्कार है ।। २९ ।।
सा संन्यस्ताभरणमवला पेशलं धारयन्ती
शय्योत्सङ्ग निहितमसकृद् दुःखदुःखेन गात्रम् । त्वामप्यन नवजलमयं मोचयिष्यत्यवश्यं
प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्तिरार्द्रान्तिरात्मा ॥ ३० ॥
अन्वयः -- मला संन्यस्ताभरणम्, बसकृत् दुःखदुःखेन, पोस निहितम्, पेशलम् गात्रम् धारयन्ती सा त्वामपि नवजलमयम्, अस्रम्, अय- श्यम्, मोषविष्यति, प्रायः भाद्रन्तिरात्मा सर्वः करुणावृत्तिः भवति ॥ ३० ॥ व्याख्या- मला दुर्वा, संन्यस्ताभरणम्-परित्यक्ताऽलङ्कारम् असकृद पुनः पुनः दुःखदुःखेन तायक्लेशेन शम्पोत्सङ्गे म्यामध्ये निहितम्

= - = स्थापितम् पेशलम् कोमलम् गावम् शरीरम् धारयन्तीविभ्रती सा = मन्त्रिया, स्वामपि मेधमपि नवजलमयम् नूतननीरमयम् बम् वाष्पम् अवश्यम् = नूनम, मोचविष्यतित्याजविष्यति। अर्थान्तरेण द्रढयति [ease] प्राय इति प्रायः बहुश: आर्द्रान्तरात्मानमहृदयः सर्वः निखिल, करुणावृत्तिः दयामयचित्तवृत्तिः भवति वर्तते ॥ ३० ॥
- = = = - = = - शब्दार्थ:- अदला-दुर्बल, संन्यस्ताभरणम् गहनों से रहित, असकृत्= बार बार दुःखदुःखेन पोर कष्ट से शय्योत्सा पर निहितम् रहे हुए, पेशलम् कोमल, गात्रम् शरीर को धारयन्ती धारण करती हुई, सा वह मेरी प्रिया, स्वामपि तेरे द्वारा भी नवजलमयम् नवीन जलमय, बसम आंसूओं को अवश्यम् निश्चित हो, मोपविष्यति गिरवायेगी। प्रायः प्रायशः, आइतरात्मा कोमलहृदयवाले, सर्वः सभी, करुणावृत्तिः कर स्वभाव के भवति होते हैं ।। ३० ।। - =
भावार्थ: है मेघ दुर्बला, परित्यक्ताऽलङ्कारं बहुशः महत्कष्टेन तल्प मध्यस्थापित कोमल शरोरं धारयन्ती सा मत्प्रिया त्वामपि नवतोय रूपेणा- बुगा sarastra यतो हि प्रायः सर्व एव आहृदयः दयालुस्वभावो भवति ।। ३० ।।
हिन्दी - हे मेघ ! दुर्बल, आभूषणों से रहित, बार-बार अत्यन्त कष्ट से शय्या पर रखे अपने कोमल शरीर को धारण करती हुई वह मेरी प्रिया तुम्हें श्री नवीन जलरूपी आँसुओं से रुलायेगी, क्योंकि आहृदय वाले प्रायः सभी
करुण स्वभाव के होते हैं ॥ ३० ॥
समासः - अविद्यमानं बलं यस्याः सा अबला ( न० बहु० ) संन्यस्ता यामरणानि यस्य तद् संन्यस्ताभरणम् (बहु० ) न सकृत् असकृत् (नब्०), शय्यायाः उत्सङ्गः शम्योत्सङ्गः (प० तत्०) तस्मिन् नवच तज्जलम् - नवजलम् ( कर्मधा० ) तदेव नवजलमयम् आईः मन्तरात्मा यस्य सः आर्द्रा- उन्तरात्मा ( बहु० ) । करुणायां वृत्तिर्यस्य सः करुणावृत्तिः ( बहु० ) ।

कोश: गात्रं वपुः संहननम् इत्यमरः स्त्री योषिदबला इत्यमरः चोरः इत्यमरः ।
टिप्पणी 'अबला' यहाँ का नव् अत्यार्थक है, इसका अर्थ दुर्बल होगा दुःखदुःखेन यहाँ दुःखप्रकारमिति दुःखद् सम्' ऐसा होता है क्योंकि प्रकारे गुणवचनस्य' इस सूत्र से दुःख को द्वित्व एवं कर्मधारय- बभाव हुआ है। नवजलमयम् - यहाँ 'नवजड शब्द से प्रचुर अर्थ में "तत्प्रकृतवचने मय इस सूत्र से ममट प्रत्यय हुआ है। मोचयिष्यति- मिजन्त 'मोद' धातु के लट् लकार के प्र० पुरुष के एकवचन का यह रूप है। यहाँ इस क्रिया के कर्ता 'स्यम्' इस पद से द्वितीया विभक्ति हुई है। इसको उपपत्ति महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी ने 'मुच्' धातु को पचादि गणपठित मानकर, अतएव द्वियक होने के कारण 'द्विकर्मसु पचादीनामुपसंख्यानम्' इससे द्वितीया हुई है, ऐसा बताया है परन्तु भारदारकजन राय ने उक्त वार्तिक के सिद्धान्तकौमुदी या काशिका आदि प्रामाणिक ग्रन्थों में न होने के कारण इसकी उपपति दूसरे प्रकार से बताई है। उनके मतानुसार 'मुच्' धातु के अयवस्था का कर्ता जो 'स्व' यह पद है उसकी व्यन्तावस्था में गतिबुद्धि- प्रत्यवसानार्थ शब्दकर्मकाणामणि कर्ता व इस सूत्र से कर्म संज्ञा हो जाती है, तब द्वितीया विभक्ति होगी। यहाँ यह जान लेना चाहिए कि राय जी ने 'मुष' धातु को भी गत्यर्थक ही माना है।
इस लोक में 'दुःखदुःखेन शरीरं धारयन्ती' इस कथन से मूच्छ' नामक कामदक्षा अभिव्यक्त होती है जो नवीं दशा है। महाकवि ने यहाँ आठ ही कामदशाओं का वर्णन किया है, जबकि 'साहित्य-शास्त्र' के अनुसार काम की १० दशायें होती हैं। प्रथम 'पराग' और अन्तिम 'मृत्यु' इन दो दशाओं का वर्णन नहीं किया है। प्रथम का तो इसलिए नहीं किया कि नयनप्रीति अर्थात् समागमन जिनका पहले होगा उन्हीं का वियोग होगा और यह काव्य वियोगावस्था से हो प्रारम्भ होता है और बन्तिम दशा का कथन रसभङ्ग के भय से नहीं किया।

अलङ्कार:- इस लोक में 'अनमवश्यं मोचविष्यति सा इस कथन को 'प्रायः सर्वः' इत्यादि वाक्य के द्वारा समर्थित किया गया है। अतः यहाँ 'अवन्तिरन्यास' नामक अलंकार है । ३० ॥
जाने सध्यास्तव मनः मयि सम्भूतस्नेहमस्या- बित्यंभूतां प्रथमविरहे तामहं तर्कयामि ।
गावालं मां न खलु सुभगंमन्यभागः करोति प्रत्यक्षं ते निखिलमचिराद्भ्रातरुतं मया यत् ॥ ३१॥
अन्वयः - तब संख्याः, मनः मवि, संमृतस्नेहम्, जाने ।
अस्माद, अहम्, प्रथमविरहे साम इत्यंभूताम् तर्कयामि
सुभगं मन्यभाव:, माम्, वाचाल, न करोति खलू हे! प्रातः
मया यद उक्तम् निखिलम् अचिराद, ते प्रत्यक्षम् ।। ३१ ।।

व्याख्यातव मेषस्य सरूपाः मद्भार्यायाः, मनःचेतः, मदि मद्विषये संभृतस्नेहम् संवलितानुरागम् जाने जानामि अस्मात् अतएव, अहम् पक्षः, प्रथम विरहे आद्यवियोगे, ताम्स्वप्रियाम् इत्यंभूताम् पूर्वक पिताप्राप्ताम् पानि अनु मिनोमि । सुभगम्मत्यभावः= सुभगमानि- त्वम् माम्यक्षम् वाचालम् वाचाटम्, न करोति न सम्पादयति, खलु निपेन हे प्रातः [हे] बन्धो ! मयायक्षेण यत् तद्दीनदशा- दिकम् उक्तम्कषितम्, (तद्) निखिलम् सम्पूर्णम्, अचिरात्त्वरितम्, मेघस्य प्रत्यक्षम् नेत्रसम्मुखम् (भविष्यति इति शेषः ) ।। ३१ ।। = = = = - -
शब्दार्थ: तब तेरी सख्याः सखी (मेरी प्रिया) का, मनः • चित्त, मेरे प्रति संमृतस्नेहम् अनुरागपूर्ण ( है. ऐसा ), जाने-जानता है अस्मात् इसलिए प्रथमविरहे प्रथमवियोग में, ताम्र उसे इत्यम्भूताम्- पहले कही गयी दीनदशा को प्राप्त हुई होगी (ऐसा ) अहम् नै तर्कयामि अनुमान कर रहा हूँ सुभगंमन्यभावः अपने को सौभाग्यशाली समझने का - =

- अहंकार, मामू मुझे, बाबालम् अधिक बोलने वाला, न करोति नहीं बना रहा है, (बिन्दु) हे भ्रातः बन्धु यद जो कुछ भी गया मैंने उक्त कहा है। वह निखिलम् सभी अचिरात् शीघ्र हो, ते तुम्हारी प्रत्यक्षम् नों के सामने आएगा ।। ३१ ।।
1 भावार्थ: है मे मत्प्रिययातिं मयियेऽत्यन्तानुरागपूर्णमस्तोत् जानामि अस्मादहं वो स्वप्रियामस्मिन्नभूतपूर्व वियोगे लागवस्थाप्राप्तां संभावयामि श्रात्मानं सौभाग्यशालिनं मत्वा नाहं बहु भावयामि अपितु ) हे धानः । यन्मयोक्त तन्निखिलं त्वद्दुग्गोचरीभविष्यति ।। ३१ ।।
हिन्दी मे मेरी प्रिया का मन मेरे प्रति बहुत ही अनुरागपूर्ण है, ( इस बात को ) मैं जानता हूँ इसलिए इस अभूतपूर्व वियोग में वह मेरी प्रिया ऐसी हो गयी होगी' ऐसा अनुमान करता हूँ। हे भाई! मुझे अपने को सौभाग्य समझने का अभिमान' अधिक बोलने वाला नहीं बना रहा है, (अपि) जो कुछ भी मैंने उसकी दीन-दशादि का वर्णन किया है वह शीघ्र ही तुम्हारी आँखों के सामने आ जायेगा ।। ३१ ।।
समासः संमृतः स्नेहो यस्य तत् संभृतस्नेहम् (बहु० ) प्रथमभावो विरहः प्रयमविरहः ( कर्मचा० ) इत्यं मृतामिति (सुप्नुषा)। सुभगम्मत्यस्य भावः सुभगम्यम्यभावः (प० तत्०) अक्षं प्रति इति प्रत्यक्षम् (अत्यादयः कान्ता द्वितीययेति समासः ।
कोशः स्याज्जल्पाकस्तु वाचालो वाचाटो बहुवा इत्यमरः । टिप्पणी-संभूतः सन्' उपसर्यपूर्वक भू' धातु से 'क' प्रत्यय करके 'सभृत:' ऐसा रूप उपरत्न होता है स्नेह प्रीत्ययंक 'स्निह' धातु से 'च प्रत्यय करके स्नेह ऐसा रूप उपपन्न होता है। अस्मात् यहाँ 'देवी' इस सूनेपनी हुई है सुभगम्मन्य आत्मानं सुभगं मन्यत इति 'सुभगम्यः' यहाँ 'सुमन' उपपदक 'मन्' धातु से 'आत्ममाने वर' इस सूत्र से 'व' प्रत्यय करके 'अवद्विषदन्तस्य मुम इस सूत्र से मुमागम १६ मे० ० -

करके 'सुभगम्मन्य ऐसा रूप उपपन्न होता है यस्य इस विग्रह में 'कुत्सायामिति वक्तव्यम्' इस यांतिक से कुत्सा अर्थ में 'बा' धन्य से 'आलजाटची बहुभाषिणि' इस सूत्र से 'आलच्' प्रत्यय हुआ है।
अलङ्कारः यहाँ तृतीय चरणोक्त अर्थ का चतुर्थ चरण कथित वाक्यार्थ हेतु है अतः यहाँ 'काव्यलिङ्ग' बङ्कार है ।। ३१ ।।
रुद्धापाङ्गप्र सरमलकर जनस्नेहशून्यं
प्रत्यादेशादपि च मधुनो विस्तृत विलासम् । त्वय्यासन्ने नयनसुपरिपन्वि शके मृगाक्ष्या मीनक्षोभाच्चलकुवलयश्रीतुलामेष्यतीति ||३२||
= - व्याख्या सर्क: चूर्णकुन्तले, रुद्धापाङ्गवसरम् अवरुद्ध कटाक्षप्रक्षेपम् जनस्नेहशून्यम् जलस्निग्धरहितम् अपि चन्तथा च मधुनः मद्यस्य, प्रत्यादेशात्त्यागाद् विस्मृतभूविलासम्प्रस्मृतभङ्गम् त्वयि मे आसन्ते समीपस्थे ( सति ) उपरिस्पन्दि उमा स्फुरशीलम् मृगाक्ष्याः- हरिणनेत्रायाः, नयनम् लोचनम्, मीनलोभात् मत्स्यस चरणात्, चलकुवलय- श्रीतुलाम्चचनीलपद्मशोधोपमाम् एष्यति गमिष्यति इति पा इति संभावयामि ।। ३२ ।। = - - =
अन्वयः - अलापाङ्गप्रसरम् अञ्जनस्नेहशून्यम् अपि च मधुनः
, प्रत्यादेशाद, विस्मृतविलासम् त्वयि बासन्ते, उपरिस्पन्दि
, मृगाश्या, नयनम् मोनक्षोभाद, चलकुवलयश्रीतुलाम् एध्यति इति शके ।। ३२ ।।

शब्दार्थः - अलकः घुंघराले बालों से, रुढापाङ्गप्रसरम् जिसके कटाक्ष-
विशेष अवरुद्ध हो गये है, स्नेहशून्यम्-काजल की चिकनाहट से विहीन,
अपि और भी मधुनः मदिरा (शराब) के प्रत्यादेशात्-त्याग से विस्मृत-
विलासम्जो भौहों की भङ्गिमा को भूल गया है, स्वतुिम्हारे बस=

= = - - समीप आने पर उपरिस्पन्दि ऊपरी भाग में स्पन्दनयुक्त, मृगाक्ष्याः मृगनयनी का (यह) ने नेत्र, मीनक्षोभादली के चलने के कारण, चलकुबल- पत्रीला हिलते हुए नीलकमल की शोभा की उपमा को, एष्यति प्राप्त करेगा, इति शके ऐसा में अनुमान कर रहा हूँ ।। ३२ ।।
भावार्थ: है मेच [ कटाक्षशून्यं कमलस्नेहरहितं विरहे मयपरित्यागात् परित्यक्तविलासं मृगनेवायाः मत्रियायाः वामनेत्रं त्वथि समीपस्थे सति वं- भागे स्फुरण युक्तं सत् मत्स्यसारणेन सन्लीपद्मशोभोपमा प्राप्स्यतीति संभावयामि ।। ३२ ।।
हिन्दी हे मेघ ! कटाक्ष एवं काजल से रहित विरह में मद्यपान के परित्याग से जो भौहों की क्रीड़ा को भूल गया है वह मेरी मृगनयनी प्रिया का नेत्र तुम्हारे समीप माने पर ऊपर के भाग में फड़कता हुआ, मछली के चलने से हिलते हुए नीलकमल की शोभा की उपमा को प्राप्त करेगा ।। ३२ ।।
समासः अपाङ्गयोः प्रसरा अपाङ्गपसरा (स० तत्०) रुद्धा अपाङ्गप्रसरा यस्य तापाङ्गप्रसरम् (बहु० ) । अञ्जनेन स्नेहः अञ्जन- स्नेहः (तृ० त०) तेन शून्यम् अज्जनस्नेहशून्यम् (तृ० त०) बोविलासः विलासः (ष० त०) विस्मृतो विलासी येन तदविस्मृतबिलासम् (बहु० ) मृगस्य इव लक्षिणी यस्याः सा मृगाक्षी (म्यधिकरण बहु० ) तस्याः । मीनः क्षोभः मीनक्षोभ ( वृ० १०) तस्मात् चलन्च तत् कुवलयम् (कर्म) तस्य श्री: चलकुवलयश्री (प० तत्०) तस्याः तुलामू चलकुबल- पश्रीतुला ( ० तत्० ) । = = =
कोश: अपाङ्गगो नेषयोरन्त इत्यमरः । प्रत्यादेशो निराकृतिः, इत्यमरः ।
टिप्पणी-रुद्धापाङ्ग०-विरह-व्रत में शरीर संस्कार मात्र का निषेध होने के कारण यक्षपत्नी के बाल बिखरे हुए हैं अतः कटाक्ष प्रक्षेप अवरुद्ध है, यह इस वाक्य का भाव है। अञ्जनस्नेहः यहाँ भी उक्त कारण से ही यक्ष- प्रिया की आँखें कजल-विहीन है। विस्मृतभूविलासम्— मद्यपान केवल

ब्राह्मण के लिए निषिद्ध है, भोग-योनि यक्ष इत्यादि के लिए उसका निषेध नहीं यक्षत्रिया पी सकती है, परन्तु प्रोषितभतृका के लिए 'मंदिरा' स्याज्य होने के कारण वह मंदिरा नहीं पीती, इसलिए छोड़े हुए भूविलास को मानो वह भूल ही गयी है। उपरिस्पन्दि- इस वाक्य से इष्टप्राप्ति अर्थात् प्रियासमागम का साथ ध्वनित होता है; क्योंकि नेत्र के ऊपरी भाग के फड़कने से इष्टप्राक्ति होती है। जैसा कि निमित्तनिदान में लिखा है-
'इष्टप्रति दृशोर्वमपाङ्ग हानिमादिशेत् ॥ इति ।
मृगाक्षी बहुव्रीहि समास से बने 'मृगावि' शब्द से 'बहुवीही सय्यदणो स्वाङ्गात् पच' इस सूत्र से समासान्त 'पच्' प्रत्यय होकर 'मृगाक्ष' ऐसा रूप बनता है। पश्चात् 'विदगौरादिभ्यश्च' इस सूत्र से विवक्षा में '' होकर 'मृगाक्षी' ऐसा रूप निष्पन्न होता है।
अलङ्कारः- यहाँ उपमा अलङ्कार है एवं अन्यच्छाययोनि भी है, क्योंकि इसी अर्थ का rote areमीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड में आता है।
तस्याः शुभं वाममरालपक्ष्मराजीवृतं कृष्णविशालशुक्लम् । प्रास्पन्दते के नव सुकेश्या मीनाहतं पद्ममिवाऽभिठानम् ।। ३२ ।।
( वा० रा० सु०, २९२ )

ताजा चिरपरिचितं त्यानितो देवगत्या ।
सम्भोगान्ते मम समुचितो हस्तसंवाहनानां
यास्यत्पुरः सरसकबलीस्तम्भगौरश्चलत्वम् ॥३३॥

अन्वयः -- मदीयैः कररुह्पदैः मुख्यमानः चिरपरिचितम्, मुक्ताजालम्
देवगत्या त्याजितः संभोगान्ते मम, हस्तसंवाहनानाम्, समुषितः, सरसक
दलीस्तम्भगौरः अस्याः, वामः, ऊरुः चलत्वम्, यास्यति ।। २३ ।।

- - = व्याख्यामदीयैः मामकीन, कररुहपर्वः नचिह्न, मुध्यमानः परीयमाणः चिरपरिचितम् चिराभ्यस्तम् मुक्ताजालम्मौक्तिकसरम यम् देवगत्या भाग्यवधन त्याजितः मोचितः संभोगान्ते सुरतसमालो मम पक्षस्य हस्तसंवाहनानाम् करमर्दनानाम्, समुचितः योग्य, सरस कदलीस्तम्भगौरः रसाईकदलीस्तम्भपाण्डुरः अस्याः मत्प्रियायाः, वामः दक्षिणात्य, ऊसक्यि, चलत्वम् स्पन्दनं यास्यति प्राप्स्यति ।। ३३ ।।
शब्दार्थः मदीयः मेरे कररुप नखों के चिह्नों से मुख्यमन मुक्त, विपरिचितम् प्राचीन समय से अभ्यस्त मुक्ताजालम् गोतियों की सड़ी वाली ( करधनी) से दंबगत्या भाग्यवश, त्याजितः विमुक्त, संभोगान्रति (सुरत) क्रीडा के पश्चात् मम मेरे हस्तसंवाहनानाम् हाथों के मनों के समुचित योग्य, सरसकदलीस्तम्भ गौर रसपूर्ण केले के स्तम्भ ( तने) के समान गोरी, अस्याः इस मेरी प्रिया की, नाम बायीं करुः जाँच चम्बलता को यास्यति प्राप्त करेगी ।।३३।। 5
भावार्थ: है मेध ! त्यति समीपस्थे मदीयनखचिह्नरहितः, भाग्यवशात् त्याजितमुक्तामय कटिभूषणः सुरतसमासौ मदीयहस्तसंवाह्नयोग्यः सरसरम्भा- स्तम्भविवादो मम प्रियायाः वाम ऊरुः चावल्यं प्राप्स्यति ।। ३३ ।।
हिन्दी - हे मेघ! तुम जब मेरी प्रिया के समीप जाओगे उस समय मेरे नाखूनों के चिह्नों से रहित, भाग्यरण मोतियों की लड़ी वाली करानी से हीन, संभोग के पश्चाद मेरे हाथों द्वारा सम्मर्दन के योग्य गीले-गीले केले के तने के समान गोरी मेरी प्रिया की बायीं जाँच फड़क उठेगी ।। ३३ ।
- समासः करे वहन्तीति करहाः ( उपपद०) कररहाणां पदानि कररुह्पदानि ( प० तद्) । चिरं परिचितं चिरपरिचितम् (सुप्सुपेति समासः । मुक्तानां जालं मुक्ताजालम् (प० उद्) । देवस्य गतिः दैवगतिः ( च० तत्०) तथा संभोगस्य अन्तः संभोगान्तः ( च० तद्०) तस्मिन् । हस्ताभ्यां संवाहनानि हस्तसंवाहनानि (तृ० द०) या र

सरस: ( तुल्य० बहु०), कदल्याः स्तम्भः कदलीस्तम्भः ष० त०] ) सरसयासी कदलीस्तम्भः सरसकदलीस्तम्भ: (कर्म० धा०), सरसकटलीस्तम्भ इस गौरः सरसकटलीस्तम्भगौरः ( उपमान कर्म० धा० ) ।
कोश:- पुनर्भवः करवो नखोऽस्त्री नखरोऽस्त्रियाम् इत्यमरः संवाहन मर्दनं स्यात् इत्यमरः कदली वारणबुसा रम्भा मोइत्यमरः ।
टिप्पणी- मदीयैः मम इमानि मदीयानि यहाँ 'अस्मद् [शब्द का 'स्पदादीनि च' इस सूत्र से दृढ संज्ञा होती है, एवं 'वृद्धाच्छ' इस सूत्र से वृद्धसंज्ञक अस्मद् [शब्द से 'छ' प्रत्यय होता है और उसके स्थान पर 'आयनेयं नीवियः फडसपा प्रत्ययादीनाम्' इस सूत्र से 'ईयू' आदेश होता है पश्चात् प्रत्ययोत्तरपदयो' इस सूत्र से 'अस्मत्' के स्थान में 'मत्' आदेश करके मदीय' पद की सिद्धि होती है। उक्त रूप तृतीया विभक्ति के बहुवचन का है। कररहा कर रोहन्ति' इस विग्रह में कर उपपदपूर्वक 'रूह' धातु से 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः क ' इस सूत्र से 'क' प्रत्यय हुआ है। मुच्यमानः- मोचनाक 'मुच्' (ख) धातु से लट् लकार एवं कर्म में यह प्रत्यय लाकर 'लटः शतृशानचावप्रयमासमानाधिकरणे' इस सूत्र से 'ल' के स्थान में 'शान' वादा करके 'मुख्यमान' ऐसा शब्द उपपन्न होता है। स्याजितः- इस शब्द की उत्पत्ति के विषय में भी ३०६ श्लोक के मोचयिष्यति' पद की तरह महामहोपाध्याय मल्लिनाथजी एवं डा० शारदारञ्जन रायजी कामस्य है। मल्लिनाथजी ने 'द्विकर्मसु पचादीनां चोपसंख्यानमिष्यते' इस वार्तिक के आधार पर 'स्वज' धातु को द्विकर्मक माना है, परन्तु यह मत सिद्धान्तकौमुदीमान्य नहीं है। अतः रायजी ने 'त्यच्' धातु को भी गत्यर्थक मानकर इसे द्विकर्मक माना है। यहाँ 'हेतुमति च' इस सूत्र से 'णि प्रत्यय हुआ है। यह 'करु' का विशेषण है। यहाँ 'कर्मवाच्य' का प्रयोग होने से गौण कर्म 'क' में प्रथमा विभक्ति हुई है। संवाहनम् -'सम् उपसर्वपूर्वक 'वह' धातु से मिन् प्रत्यय करके फिर धातु वंशा करके 'कर- णाधिकरणयोग्य' इस सूत्र से 'युट्' प्रत्यय हुआ है। सरस इस शब्द से


अच्छी तरह परिपक्व हरे भरे केले के तने के समान न कि सूखे तने के समान' इस भाव को ध्वनित करना चाहता है।
- व्याख्या हे जलद ! हे मे ! तस्मिन् पूर्वोक्ते काले समये त्वयि समीपस्थ इति भावः । सामत्प्रिया, यदि चेत्, सम्पनिद्रासुखा प्राप्तस्वप्ना मोदा, स्यात् भवेत्, (हि) एनाम् मत्प्रियाम् अन्वास्थ पृष्ठदेशमुपविश्य, स्तनितविमुखः गर्जितरहितः, (सन्) तूष्णी मूत्वेत्यर्थः । याममात्रम् = प्रहरमा- नम्, सहस्य प्रतीक्षस्य अस्याः मत्रियायाः, प्रणयिनि वल्लभे, मयि यो भर्तरि चिकेनापि प्रकारेण स्वप्नलो=स्थापावाप्ते (सति) पाडो- पगूढम् दृढालिङ्गितम्, सद्यः तत्क्षणम् कण्ठच्युतवताप्रन्गिलस्रस्तबाहू- बल्ली ग्रन्थनम् मा भूत् न स्यात् ।। ३४ । = = -
अलङ्कारः यहाँ 'उपमा' अलङ्कार है ।। ३३ ।।
तस्मिन् काले जलद ! यदि सा लब्धनिद्रासुखा स्या- दन्वास्येनt स्तनितविमुखो याममात्रं सहस्व ।
मा भूवस्याः प्रणयिनि मयि स्वप्नलब्धे कथञ्चित् गाढोपगूढम् ||३४||
अन्वयः - हे जलद ! तस्मिन् काले सा, यदि धनिद्रा स्यात्, एनाम् अन्वास्य स्तनितविमुखः, पाममात्रम्, सहस्व अस्याः प्रणयिनि, कवि गाढोपगूढरम्, सद्यः कण्ठच्युतजलताग्रन्थि मा भूव ।। १४ ।।
शब्दार्थ: है जलद ! हे मेथ! तस्मिन् पहले कहे गये, काले समय में (तुम्हारे समीप जाने पर), सावह मेरी प्रिया, यदि लब्धानिद्रासुखा नींद के सुख को प्राप्त कर रही, स्यात् ही (तो), एनाम् उस मेरी प्रिया के अन्यास्य पीछे बैठकर स्वनितविमुखः गर्जन से रहित होकर (निःशब्द), याममात्रम् एक प्रहर मात्र, सहस्व ( उसकी प्रतीक्षा करना अस्याः मेरी प्रिया के प्रणमिति प्रियतम, मयि मेरे कचिद किसी प्रकार, स्वप्न- = =

लब्धे सपने में प्राप्त होने पर गाडोपगूढम् दृढ़ बालिङ्गन सच तुरत ही. कण्ठच्युतलताग्रन्थिले में बंधी लताओं जैसी भुजाओं का बन्धन विच्छिन न स्यातुन हो । ३४ ॥
भावार्थ: हे मेघ यदि तस्मिन् समये मत्प्रिया निमग्ना स्यात् तहि त्वं तस्याः पृष्ठदेशमुपविश्य निःशब्दः सन् याममात्रं तो प्रतीक्षस्व पती हि येन केनापि प्रकारेण स्वप्नलब्धे मयि प्रेयति सति (स्वद्गजितन) सद्यः मालिनं न स्यात् ।। ३४ ।।
हिन्दी है मेघ तुम्हारे समीप जाने के समय वह मेरी प्रिया यदि निद्रा- सुख के रही हो तो तुम उसके पीछे निःशब्द बैठकर एक प्रहर मात्र उसकी प्रतीक्षा करना, क्योंकि उसके प्रियतम मेरे किसी प्रकार से स्वप्न में प्राप्त होने पर ( तुम्हारे गर्जन से ) कण्ड में प्राप्त भुजलताओं का गाढ़ आलिङ्गन बन्धन- रहित न हो जाय ( टूट न जाए ) ।। ३४ ।।
= = समासः निद्रायाः सुखम् निद्रासुखम् (प० त०) निद्रासुखं या साम्नाखा (बहु०) स्वनितात् विमुखः स्तनितविमुखः ( पं० त०) पाम एव पाममात्रम् ( मयूरव्यंसकादयश्चेति समासः ) | स्वप्ने लम्ध: स्वप्नन्धः (स० तत्०) तस्मिन् गाढच तदुपदम् गाढाप गूढम् (क० धा०) कण्डात् चतः कण्ठतः ( पं० स० ) भुमी लते इव भुजलते (उपमित कर्म०) भुजलतयोः ग्रन्थिः भुजलताग्रन्थि (प० स० ) 1 सद्यः कण्ठतः सद्यः कण्ठतः ( सुप्सुवा० ) सद्यः कण्ठयुतो भुजलताग्रन्थिः यस्य तत्सद्यः कण्ठच्युतभुजान्थि (बहू)। - =
कोशः द्वौ यामप्रहरी समौ इत्यमरः वाढानि च इत्यमरः । स्वनितं गतिं मेघनिर्घोष रसितादि च इत्यमरः ।
टिप्पणी- जलदः जलं पदाति इति जलद उपपदपूर्वक दा' धातु से 'matsara क' इस सूत्र से 'क' प्रत्यय करके धातु के आकार का लोप करके 'जलद' ऐसा रूप निष्पन्न होता है। स्यात् सत्ता 'अ' धातु से ललकार का उक्त रूप है। अन्नास्य- 'अन्' उपसर्गपूर्वक 'आस्

धातु से 'क्वा' प्रत्यय करके उसके स्थान पर 'स्यप्' करके 'अन्वास्य' रूप निष्पन्न होता है। याममात्रम् - यहाँ 'कालाऽवनोरत्यन्तसंयोगे इस सूत्र से द्वितीया हुई है। सहस्व यह रूप मर्षणार्थक ( प ) सह धातु के लोट्लकार के मध्यमपुरुष के एकवचन का है। यक्ष मैच से एक प्रहर तक प्रतीक्षा करने को कहता है क्योंकि 'संभोग' एक प्रहर से अधिक नहीं हो सकता, उसके बाद यदि तुम गर्जन करोगे भी तो वह मेरे सहबास मुख को प्राप्त कर चुकी होगी अतः उससे कोई क्षति नहीं होगी, मध्य में गर्जने से वह उक्त सुख से चित रह जाएगी, यह भाव है। रतिविलास में संभोग की चरमावधि एक प्रहर माना गया है परमा तु रतिनामिष्टा यामावसायिकी' इति उपगूढम् - 'उप' उपसर्गपूर्व 'गु' धातु से 'नपुंसके भावे क्त' इस सूत्र ते 'क्त' प्रत्यय करके दव आदि करके 'ढो लोप:' इस सूत्र से धातु के डकार के छप हो जाने पर लोपे पूर्वस्य दीर्षोऽश:' इस सूत्र से धातु के 'उ'कार को दी करके 'उपगूढ' ऐसा बनता है।
अलङ्कारः- यहाँ 'याममात्र सहस्व के प्रति उत्तरार्ध का वाक्यार्थ हेतु है। अतः 'काव्यलिङ्ग' अलङ्कार है एवच 'मुगलता' यहाँ लुतोपमा है। इस प्रकार दोनों के अङ्गाङ्गिभाव रहने से शंकर' अलङ्कार है ॥ ३४ ॥
तामुत्याव्य स्वजल कणिकाशी तलेनानिलेन
प्रत्याश्वस्तां सममभिनवेजलकंमालतीनाम् ।
विद्युद्गर्भः स्तिमितनयनां त्वत्सनाये गवाक्षे
वक्तुं धीरः स्तनितवचनंर्मानिनीं प्रक्रमेयाः ॥ ३५॥
अन्वयः - ( हे मेघ !) ताम्, स्वजलकणिकाशीतलेन, अनिलेन, उत्पाय, अभिनवे, मालतीनाम् जालकैः समम् प्रत्यास्वस्ताम् त्वत्सनाथे गवाक्षे स्तिमितननाम्, मानिनीम् विद्युद्गर्म, धीरः स्तनितवचनैः, वस्तुम्, प्रक्रमेषा: ।। ३५ ।।
व्याख्या - ( हे मेघ !) तामप्रियाम् स्वजलनिकासीलेन

= = = = = = = = = निजोदक विन्दुशिशिरेण अनिलेन वायुना, उत्थाप्यप्रबोध्य, अभिनवैः- नूतनैः, मालतीनाम् = जातिकुसुमानाम् जालकैः कोरकैः समम् सार्धम्, प्रत्याश्वस्ताम् सुस्थिताम् स्वत्सनाये भवत्युक्ते गवाक्षे वातायने, स्तिमितनयनाम् = निष्पन्दलोचनाम्, नातिनीम् मनस्विनीम् (मत्प्रियाम् ) विद्युद्गमैः विद्युदात्मा धीर: दृढः (सन् ) स्तनितवचनैः जितवाग्भिः, वक्तुम्भाषितुम् प्रक्रमेयाः उपक्रमस्व ।। ३५ ।।
= = = शब्दार्थ:- (हे मेघ !) ताम् उस मेरी प्रिया को स्वजलकणिकाशीत लेन अपने वारि-बिन्दु से शीतल वायुना वायु के द्वारा उत्पाप्यजगाकर अभिनवे: नूतन, मालतीनाम्धमेली के, जातकैः कलियों से ( एवं ) प्रत्याश्वस्ताम् स्वस्थ स्वत्सनाये तुम से युक्त, गवाक्षे खिड़की पर स्तिमितनयनाम् निश्चल नेत्रों वाली गढ़ाकर देखती हुई), मानिनीम - मानिनी ( उस मेरी प्रिया को), विद्युद्गम अपने भीतर बिजली को छिपाए हुए, धीरधैर्यपूर्वक स्तनितवचनः गर्जनरूपीबाणी से, वस्तु कहना, प्रक्रमेया: आरम्भ करना ।। ३५ ।। = =
भावार्थ:- हे मेघ ! सुसा मत्प्रियां निजसलिलकणशिशिरेण वायुना प्रबोध्य जातिकुल साकं सुस्थितां त्वदाते वातायने नियतात्मा वं धीरः सन् जितवचोभिः स्वरूपनमारभस्व ।। ३५ ।।
हिन्दी - हे मेघ ! उस मेरी प्रिया को अपने जल-बिन्दु से शीतल वायु के द्वारा जगा कर चमेली की नयी कलियों के साथ सुस्थिता और तुमसे घिरी खिड़कों की ओर गड़ा कर देखती हुई मनस्विनी ( उस मेरी प्रिया ) को अपने भीतर बिजली को रखे हुए तुम पूर्वक अपने गर्जनरूपी वचनों से कहना प्रारम्भ करना ।। ३५ ।।
= समासः - जलस्य कणिका जलकणिका (प० तत्०), स्वस्य जलकणिका स्वजलकणिका (प० द०) ताभि: शीतलः स्वजलकणिकाशीतल (तृ. ० ) तेन नायेन सहितः सनाथः (तुल्ययोग बहु० ) त्वया सनाय स्वत्सनापः (तृ० त०) तस्मिन् । गवामशीद गवाक्षः ( उपमित कर्म० ) स्तिमिते नयने = -=

1 कोशः सुमना मालती जातिः इत्यमरः साकं सार्धं समं सह इत्यमरः । झारको जालक क्लीवे कलिका कोरकः पुमान् इत्यमरः सनायं प्रभुमित्याहुः सहिते चित्ततायिनी, इति शब्दार्णवः गमपवारकेऽन्तःस्ये कुलिस्थे पार्म के म इति शब्दार्णवः ।
- टिप्पणी-उत