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अभिज्ञानशकुन्तलम्-2

16 October 2023

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अनसूया (सविस्मयम्) कथमिव ।[कह विज ।] प्रिया - ( सस्कृतमाधिस्थ)

दुष्यन्तेनाहित तेजोबधना भूतये भुव ।

अहि तनया ब्रह्मग्निगर्भा शमीमय ॥४॥

शकुन्तला बाहुति और दुष्यन्त अग्नि के प्रतीक है अथवा शकुन्तला की कामवासना धूम का उसका हृदयदान आहुति का तथा दुष्यन्त अग्नि का प्रतीक है। सुशिष्य- परिवत्ता योग्य शिष्य को दी गई विद्या जिस प्रकार अशोचनीय होती है उसी प्रकार विद्यारूपिणी शकुन्तला दुष्यन्तरूप शिष्य को प्राप्त होकर अशोचनीय हो गई है। "जशोच्या हि पितु कन्या सद्भतु प्रतिपादिता" कुमारसम्भव का यह भी इसी बात की पुष्टि करता है कवि ने रघुवश मे भी कहा है 'क्रिया हि वस्तुपहि8ता प्रसीदति"।

अनसूया तो (यह) समाचार किसने पिता काममप को बताया? प्रियम्बदा-यज्ञ शाला में प्रविष्ट हुये उनको अशरीरिणी छन्दोमयी वाणी

ने बताया

अनसूपा ( आश्चय के साथ) किस रूप में

प्रियम् (संस्कृत भाषा में)

दुष्यन्तेनेति अन्यया दुष्यन्तेन माहितम् तेज भूव भूतये दधानाम् तनयाम् अग्निगर्भा शमीम् इव अहि

न्याय वेता महर्षि कच्च दुष्यन्तेन दुष्यन्त के द्वारा आहितम् -निषिक या स्थापित किये गये, तेजीयको पृथिवी भूत कल्याण के लिये दधाना धारण करती हुई, तनयाम् ( अपनी ) पुत्री को अग्निगर्भा अपने भीतर अग्नि रखने वाले सभी समवृक्ष की तरह अहि-जानो।

अनुवाद हे ब्रह्म दुष्यन्त के द्वारा निषिक्त बीम को पृथिवी के कल्याण के लिये धारण करती हुई अपनी पुत्री को अपने अदर अग्नि रखने वाले शमीवृक्ष की तरह जानो ।

भावादप्रियम्वदा कहती है कि उस वाणी ने पिता काश्यप से यह कहा था कि है बहन, यह आपकी पुत्री शकुत्तला दुष्यन्त द्वारा स्थापित वी को उसी प्रकार अपने अन्दर धारण किये हुये है जैसे कि शमीवृक्ष के अन्दर अनि छिपी रहती है, अर्थात् यह गभवती है, फिर भी इसका यह गर्भ पृथिवी के लिये कल्याणकारी है अर्थात् इससे उत्पन्न पुत्र पृथिवी का कल्याण करने वाला ही होगा।

विशेष प्रस्तुत पथ मे इन द्वारा उपमानकार है और मार्ग नामक यभ  - संस्कृत-व्याख्या— ब्रह्मन्— द्विजोत्तमः महये । दुष्यन्तेन राजा दुष्यन्तेन आतिनु = गमधारणरूपेण स्थापितम् जीयम् भुवपृथिव्या भूतये- कल्याणाय दधानाम् धारयन्तीम्, तनयाम्-स्वपुत्री शकुन्तलाम् अग्नि अनल गर्भजन्त यस्यास्ताम् अग्निगर्भा, मीम्समीकृतम् इव अहि जानीहि ।

सन्धि का अंग है क्योंकि जहाँ पर वास्तविक बात का प्रकाशन किया जाता है वहाँ यह अग होता है। "तत्त्वापकथन माग सा०द० इसने अनुष्टम् नामक छन्द है ।

संस्कृत सरलार्थ सस्कृतभाषा मायित्व प्रियम्बदा रुपयति छन्योमय्या बाप्पा तातकाश्यप एव सूचित ब्रह्मन् । त्वदीया तनमा मकुन्तला दुष्यन्तेन गान्धर्य विधिना परिणीता सती तक्षिति दीर्य धारयति, तस्या एव गम पृथिया कल्याणाय भविष्यति यथा शमी वृक्षाभ्यन्तरेऽग्नि भवति तथैव तस्या उदरे गर्भो वर्तते इति भवानवगच्छतु ।

रणरण शब्द का अर्थ है "रण गृहरक्षित्रोत्र अत अग्निशरणम् का अर्थ है अग्निशाला या यज्ञशाला, प्रत्येक अग्निहोषी के घर एक अग्निमाला होती थी जिसमे गापत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि इन तीन अलियो के तीन कुण्ड होते थे जिनमे अग्निहोत्री प्रतिदिन हवन करता था। इन्हीं तीनो अग्नियो को बेता, कहा जाता था। ये सदा सुरक्षित रखी जाती थी। छन्दो मयी छन्दोबद्ध समाधित्यनाथ के नियमानुसार स्त्रीपाल प्राकृत भाषा मे बोलते है, पर यहाँ प्रियम्बदा उस अशरीरिणी वाणी को यथावत् उदधृत करती हुई संस्कृत भाषा का प्रयोग करती है, ऐसा करना नाट्यशास्त्र के नियम के विरुद्ध नहीं है, जैसा कि आवाय विश्वनाथ ने कहा है "कायतश्चोत्तमादीना कार्यो भाषा विषय " भुव भूतबे इससे ज्ञात होता है कि शकुन्तला पुत्र चक्रवर्ती राजा होकर भूतल का कल्याण करेगा । अवेहि अव + आ + इग् गी लोट् मध्यम पुरुषेक वचन । अग्नि गर्भा शमीम हामी वक्ष के अन्दर जिस प्रकार अग्नि छिपी रहती है उसी प्रकार शकुन्तला के उदर में तेजोमर जीव गम मे छिपा हुआ है। महाभारत के आख्यान देवप्राथना पर पहने अग्नि ने विवीय को धारण किया था, पर रोज के बस होने से उसने पहले पीपल वृक्ष में तबनु शमील में प्रवेश किया, देवताओ ने रामवृक्ष मे ही उसे स्थायी बना दिया था  समीक्ष की लकड़ी रगडने पर उससे आग उत्पन्न होती है अन्यत्र यह भी उल्लेख है कि मृगु के साथ से भयभीत अग्नि शमीवृक्ष मे छिप गई थी। इसी प्रकार की यम स्थिति का वर्णन कालिदास ने 'रघुवश' में इस प्रकार किया है।— के अनुसार,

निधान गर्भामिव सागराम्बरा समीमिवाभ्यन्तरलीनपावकम्

नदी भिवान्त सलिला सरस्वती नृप सत्त्वा महिषीमनन्त ।

अनसूया - ( प्रियवदानाशिलय) सखि, प्रिय में किन्येव शकुन्तला नीयत segenerसाधारण परितोषमनुभवामि। [सहि पि मे किदु अज एव्व सउन्दला णीअदि ति उक्कण्ठासाहारण परितोस जगृहोमि ।]

प्रियवया सखि, आबा तावदुत्कण्ठा विनोदविध्याव । सा तपस्विनी निता भवतु। [सहि, व दाव उक्कण्ठ विणोदइस्सामी सा तवसिणी णिबुदा हो ।]

अनसूया तेन तस्मितशाखावलम्बिते नारिकेलसमुद्ग एत- झिमितमेव कालान्तरक्षमा निक्षिप्ता मया केसरमालिका । तदिमा हस्तनिहिता कुरु । यावदहमपि तस्यै गोरोचना तीर्थमृतिका दुर्वाकिसल- यानीति मङ्गलसमालम्भनानि विरचयामि। [तेग हि एदस्सि चूदसाहावलम्विये पारिएरसमुग्गए एतणिमित एव्व कालान्तरक्तमा गिखित्ता भए केसर मालिजा ता इम हृत्यसणिहिद करेहि जाव अपि से गोरोभण तित्थ- fifer दुव्वाकिसलआणिति मंगलसमालभणाणि विरएमि ।

प्रियवदा तथा क्रियताम्। [तह करोअदु] (अनसूया निष्क्रान्ता । प्रियवदा नाट्येन सुमनसो गृहाति ।)

अनसूया ( प्रियम्वदा को गले लगाकर ) सखी में हर्षित है। किन्तु कुता

आज ही (पतिगृह को ले जाई जा रही है अत ( मैं ) विषादमिति सन्तोष का

अनुभव कर रही है।

प्रियम्वदासी, हम दोनो तो अपने विवाद को दूर कर लेगी, वह बेचारी ( किसी प्रकार ) सुखिनो हो ।

अनसूया तब तो इस नाम की माया से लटकते हुये नारियल के सम्पुटक मे (डिब्बे) इसी अवसर के लिए समय के अन्तर को यह लेने वाली अर्थात् देर तक कुम्हलाने वाली मौलसिरी (होली) की माला को मैने रखा है, तो इसको तुम हाथ में ले लो तब तक मैं भी उसके लिये गोरोचना, तीयों की मिट्टी, दूब के अकुर आदिमा गलिक वस्तुओं को सजाती हूँ।

प्रियम्बदा ऐसा ही करो। ( अनसूया का प्रस्थान, त्रियम्वदा फूलों को लेने का अभिनय करती है)

आश्लिष्य आ + पियक्त्वा प्रिय मेयात् इस बात से मुझे बडीत हुई। उत्कण्ठाधारणम् उत्कण्ठवा विषादेन साधारण समानम् अर्थाद विषाद से मिश्रित दुख के समान परितोषम् सन्तोष को, यद्यपि के जाने से तो विवाद है, पर उसके भावी सुख की कल्पना से सन्तोष भी है। विनीय विध्यान अपने विवाद (उत्कण्ठा) को दूर कर लेगी, अपना मन किसी प्रकार बहता तेगी। तपस्विनी तपस् शामत्वर्थे विन् । 'तपस्वी चानुकम्याह' इस बचन के अनुसार यहाँ तपस्विनी का अथ अनुकम्पाही ही से है, तब साधिका से नहीं जैसा फि

- अनसूया सखि, एहि गच्छाव [सहि एहि । गच्छम्ह ।] (इति परिक्रामन )

(नेपथ्ये)

गौतम, आदिश्यन्ता शार्ङ्गरवमिश्रा शकुन्तलानयनाय । प्रियवदा (कर्ण दवा) अनसूये त्वरस्व स्वरस्व एते खलु हस्तिमापुरगामिन ऋषयशब्दारयन्ते अणसूए, तुवर, तुवर, एदे व हत्या उरगामिणो इसीओ सावन्ति ।]

(प्रविधय समालम्भनहस्ता)

प्रियवदा (1 1- ( विलोक्य) एषा सूर्योदय एवं शिलामज्जिता प्रतीष्टनी- बारहस्ताभि स्वस्तिवाचनिकाभिस्तावसोभिरभिनन्द्यमाना शकुन्तला तिष्ठति । उपसव एनान्। [ एसा मुज्जोदए एब्ब मिहामज्जिदा पडिदिशीवार- हत्याहि सोहि तावसीहि अहिणन्दीअमाणा सन्दला चिट्ठछ । उवसम्यम्ह ण। ]

(इत्युपसर्पत ।)

कुछ टीकाकारो ने माना है, वस्तुत यहा तपस्विनी का अब बेचारी, अनुकम्पनीया, दापात्र है. अब तक वह पतिविरह मे पीडित भी अत अनुकम्पनीया भी पति से ] वह सुखी होगी, उसका भला होगा यह प्रियम्वदा की कामना है। चूतशाखावलम्विते नम्र  हुये समुद्ग सम्प उद्गच्छतीत्पर्ये सम् + उद् + गम् प्रत्यय दिला, तत स्वायें कन् सप्तम्यैकवचने । नारियल के ऊपर से छीनने पर जो भीतर एक सा गोना निकलता है जिसने गिरी रहती है उसको बीच से काटने पर दो प्यासे से नहाते है यही नार समुदयक कहलाता है पहा इसका अर्थ या या दोना नहीं है। कालान्तर- क्षमावानी जिसकी सुधि एवं सरसता देर तक ठहरती है। केसर-कुलमा मौसिरी, मौलश्री गोरोचना यह गाय के मूत्र से तैयार होती है और इसका रंग पीला होना है मालिक अवन पर इसका प्रयोग किया जाता है। समाम्नानि समानयनेमि समालम्भनानि गवार्य समानानि मलसमानम्भनानिमन्+आ+लभ + ल्युट् किलानिके अकुर, यह भी मालिक वस्तु होती है मालिक अवसरों पर ग्राम माला में दूब के अकुर लगा दिये जाते है पविनां राािलका"।

(नेपथ्य म

[: गौतमी मा आदि का कुल को (पतिगृह) ले जाने के लिये

बाजा दो । प्रियम्वदा (कान लगाकर ) अनसूया, जल्दी करो मे हस्तिनापुर को जाने वाले ऋषि लोग बुलाये जा रहे है।

(तत प्रविशति यथोद्दिष्टव्यापारासनस्था शकुन्तला )

तापसीनामन्यतमा (शकुन्तला प्रति) जाते भतु बहुमान तृतीया - वत्से, भमता भव । [च्छे भतृणो वहुमदा होहि ॥] (इत्याशियो दवा गौतोमयजं निष्क्रान्ता ।)

महदेवशब्द लभस्व । [ जाये, भतृणो बहुमाणसूजन महादेईसह लहेहि ।] द्वितीया - वत्से, वीरप्रसविनी भव [बच्छे वीरप्पसविणी होहि ।]

( मालिक वस्तु हाथ मे लिये हुए प्रविष्ट होकर ) अनसूयासंबी, आओ, चने ।

(यह कह कर दोनो धगती है)

प्रियम्बदा ( देखकर ) यह मकुन्तला सूर्योदय के समय ही शिखा सहित स्नान किए हुये अर्थात् पूर्ण स्नान करके, नीवार धान्य हाथों में लिये हुए, स्वस्ति वाचन करने वालो वासियों से अभिनति की जाती हुई बैठी है। हम इसके पास चलती हैं।

(यह कह कर दोनो जाती है) (इसके बाद यथाकथित अर्थात् पूर्वोक्त रूप मे आसन पर बैठी हुई शंकुतला एक तापसी (मकुन्तला से) पुत्री पति के अति सम्मानसूचक महारानी शब्द

का प्रवेश)

को प्राप्त करो।

दूसरी पुत्री वीरपुत्र का जन्म देने वाली बनो । तीसरी पुत्री पति के बहुत अधिक सम्मान को प्राप्त करो। (इस प्रकार आशीर्वाद देकर गोतमी को छोड़कर बम सभी का प्रस्थान ) आदिश्यन्ताम् आदिश कमवान्य लोट प्र० पु० बहुवचन

गाङ्ग वमिधा शाङ्ग व आदि मान खेग नियामा खमिया शारव नामक ऋषि से मिश्रित अवाद साथ, अथवा मा र प्रधान पूज्यो वा येषान्ते शारमिश्रा नित्यसमास इस प्रकार मिश्र के दो जय है, इत्यादि और प्रमुख पूज्य प्रधान आदि। हस्तिनापुरगामिन–हस्तिनापुर को जाने वाले महाभारत के अनुसार भरत के प्रयोग हस्ती ने इस नगर को बसाया था अतएव इसका नाम हस्तिपुर पड़ा है, यह वतमान दिल्ली से ५६ मी उत्तर पूर्व की ओर गंगा की एक सहायक नदी के तट पर था पर वायु विष्णु और हरिवंश पुराणों के अनुसार हस्ती नामक राजा भरत से सातवा राजा था, कुछ भी हो, पर ऐसी स्थिति मे दुष्यन्त की राजधानी हस्तिनापुर कैसे हो सकती है जबकि भरत दुष्यन्त का पुत्र था ऐसा प्रतीत होता है कि कालिदास ने अपने समय में प्रचलित नाम ही दुष्यन्त की राजधानी के रूप में प्रयोग किया है, दुष्यन्त के समय यह अन्य किसी नाम से प्रसिद्ध रहा होगा। गम् धातु से णिनि प्रत्यय करने पर गामिन रूप होगा, पर

(उपसृत्य ) सखि सुखमज्जन ते भवतु [महि सुमज्जण

[दे हो ।]

शकुन्तला स्वागत मे सख्यो इतो निषीदतम् [साजद मे सहीण। इदो गिसोदह।]

उभे (मङ्गलपात्राण्यादाय उपविश्य) हला, सज्जा भव यावते मङ्गलसमालम्भन विरचयाव । [हला, सज्जा होहि । जाव दे मङ्गलममा- लम्भण विरएम।]

शकुन्तला इवमपि बहु मन्तव्यम् दुर्लभमिदानों मे सखीमण्डन भविष्यति । [ इदपि बहु मन्तब्ध दुल्लह दाणि मे सहीमण्डण भविस्सदि ।] (इति वाष्प विसृजति ।)

समस्त पद में कुमति य' से नकार को गत्य होकर गामिण बनना चाहिए था, किन्तु साहित्य में कालिदास तथा अन कवियों की रचनाओं में भी गामि ही प्रयाग मिलता है अत इसे सहसा अशुद्ध नहीं कहा जा सकता से नरा स्वगगामिन" स्रोतोया- सागरगामिनीव" "पूर्व सागरगामिनीम्" फालिदास व्याकरण प्रत्थो मे भी कतु गामिनि क्रियाकले ।" शब्दायते सब्द करोतीत्य सब्द रेत्यादिना स्य प्रत्यये शब्दायते जिन्ता कमवा मन्दाय पिच नद्दास्यते शिणामजिता शिखाया स्नान कारिता, शिर धोकर नहलाई गई प्राय स्त्रिया प्रतिदिन शिर धारूर नही नहाती मागलिक उत्सवो पर या विशेष स्थिति में ही शिर धोकर नहाती है। प्रतीष्टनीवारहस्ताभिप्रतीष्टा गृहीता मीवारा तृणधान्यविशेषा हस्तेषु करेषु पासा वा साभिनवारो को हाथ में लिये हुए नीवार पवित्र धान्य माना जाता था। स्वताचा स्वस्तिवाचनम् स्वस्तिवाचनात्मक वेदपाठ करण प्रयोजन यासा ता वामि अत्र प्रयोजनार्थ "अनुप्रमादिभ्यष्ठ सूत्रेण छ प्रत्यये पुण्याहवचनादिभ्य इति वार्तिकेन तस्य लोचे तदनु स्वार्थे कन् प्रत्यये स्वस्तिवाचनिका, यह कथन इस ओर भी सकेत करता है कि कालिदास के समय में स्त्रियों को वेद पढने का अधिकार प्राप्त या विधातो भावे युधि वाचनम् स्वस्ति इति याचन स्वस्तिवाचनम् विनर प्रभूते अशी वीरप्रसविनी वीर++ धातु से ताच्छील्य गिनि अयतमा जयाद तापसियों में से एक बहुमान- चकम् बहुमान जयंतीनिमान महादेवीम्यम् महनी देवी महादेवी,  रानी को महा जाता था देवीकृताभिषेकायामितरासु च भट्टिनी" महादेवी प्रधान महिषी मतुवमताभ इत्यत्र भूतु पष्ठी एकवचन, बहु+ मन+टा बहुमता, यहा "वस्य च बतमाने" अतएव भर्तुरित्यत्र अनुक्तं करि मोनोलिया ( पास जाकर ) बली, तुम्हारा स्नान सुखकर हो, अर्थात्

इस स्नान से सदा सुखी रहे। सकुन्तला-मेरी सखियों का स्वागत है। इधर बैठिये

उमेस उचित न ते मङ्गलकाले रोवितुम। [सहि उण देण मङ्गलकाले रोइदु । ] (इत्यभूणि प्रमुज्य नाट्येन प्रसाधयत )

प्रियवदा- आभरणोषित रूपमाधमसुलभ प्रसाधने विकार्यते । [ आहरणीय रूप असमनुल हेहि प्रसाहणेहि विप्पजाराजदि । ]

(प्रविश्योपायनहस्तावृषिकुमारको) उभौ- इदमलकरणम् । अलिपतामत्रभवती ।

(सर्वा मता 1)

गौतमो वत्स नारद, फुत एतत् [वच्छ पार, कुदो एद ।] प्रथम तातकाश्यपप्रभावात् ।

गौतमी कि मानसी सिद्धि [ कि माणमी सिद्धी ।]

दोनो (मार गलिक पात्रो को लेकर और बैठकर) शकुन्तला प्यार हो जाओ। (हम लोग ) अब तुम्हारा मालिक करण (प्रस्थानकालिक प्रसाधन

-सजावट) करती है। शकुन्तला यह भी बहुत माननीय है। अब मेरे लिये सखियों द्वारा अलकरण

दुलभ हो जायेगा।

नही है।

(यह कहकर आसू गिराने लगती है अर्थात् रोती है)

दोनो ससी (दस) मंगल के अवसर पर तुम्हारा रोना उचित

(यह कहकर आसुओ को पोछकर अलत करने का अभिनय करती है) प्रियम्बदा आभूषण के योग्य (यह दर रूप आश्रम न प्राप्य अनकारी

से विकृत किया जा रहा है।

(भेंट मे रूप प्राप्त आभूषणो का हाथो मे लिये हुये दो ऋषिकुमाराका प्रवेश) दोनो ऋषि कुमार आभूषण हे (इनसे) इस देवी को करें। (सभी देखकर आश्चयाबित हो जाती है)

गौतमीपुत्र नारद । ये कहाँ से प्राप्त हुये) 1

प्रथम ऋषि कुमार पिता काश्यप के प्रभाव से ।

गौतमी क्या यह मानसी सिद्धि है अर्थात् क्या दे आभूषण उनके मानसिक सकल्प के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुये है?

टिप्पणी मुखम-तुम्हारा स्नान सुखमय हो, सवियाँ मन में इच्छा करती है

विशेष प्रस्तुत पथ मे आम्र और नवमालिका पर नायक-नायिका का आरोप होने से समासोक्ति अलकार, शकुन्तला और वनज्योत्स्ना दोनो प्रस्तुतो का वीतचिन्त " से सम्बन्ध होने के कारण तुल्ययोगिता अलकार, दोनो को अनुरूप पतियों के मिलने के कारण सम अकार, दोनो का पतियों से मिलन होने का कारण है, अंत काव्यलिङ्ग अलकार है। भावावनि, प्रसाद गुण और वैदभी रीति का सुन्दर उदाहरण है। मानव और प्रकृति के तादात्म्य को दिखलाया गया है। वसन्ततिलका छन्द है।

शकुन्तला (सख्यौ प्रति) हला, एषा द्वयोर्युवयोर्हस्ते निक्षेप । [हला, एसा दुवेण वो हत्ये विखेवो ॥] rent अय जन कस्य हस्ते समर्पित । [ अन जणो कस्स इत्ये समप्पिदो ।]
संस्कृत व्यायाममा काव्यपेन तवार्थत्वत्रिति प्रमेय  कल्पितम् मनसा विनिर्णीतम् आत्मसामु स्वमन्यगुरगुरूपम् भर्तारम्- पतिम् + आत्मकृतपुत्वम्-कुतता गता प्राप्ता पम्पा नवमामिका – वनज्योत्स्ना, चूतेन आण, सवितवती सम्मिलिता, सम्प्रति + इदानीम् अहम् अस्याम् नामान्त्यपि मकुन्तलायाम् च चिन्तव्यपगतचिन्त (जात)।
संस्कृत सरलाय कुनमाया बनज्योत्स्नानतालियन मवलोक्य तत्स्व मायप्रकृतिप्रेमाद्वहृदय arrest मुनि कथयति वत्से, तच पितृस्थानीयेन मया येन तव विवाह प्रथममेव मनसा यद् विनिर्णीतम् तदेवेदानी समटितम् त्वमात्म- कृतपुष्पै रेवात्मसीनुरूप पति प्राप्तासि इन पुर स्थिता तब भी स्कृतमधेया वनज्योत्स्नेति भारमानुरूप पति माचवृक्ष सम्मिलिता, अतोऽहमिदानी मस्या परिणयविषये तब परिणयविषये च निश्चित जात ।
टिप्पणी
जमन्त्रयिव्ये मन्त्र निम् । विदाई लुगी । अर्थमि–बजा इ गती जानता हूँ। सोस्नेहम् समाने उदरे शमितेत्यर्थे (सोदराच ) इति यप्रत्यये 'विभाषोदरे' इति समानस्य सादे मोय समानोदर्या वा सोदर्यादा स्नेहस्तमु, गावाबाहा मासा रूपी बाहुल से, "वाहा तु नाही स्वाद" वाहा का अथ वाह है। प्रत्यालिक प्रति + आ + निगि नोट् तथायें- 'अर्थ' लिये अब मे अव्यय है, तब निमित्तमित्यथ । सथितवती सम्+च+ क्त (मावे) + सचितम् तदस्या अस्ति इत्यर्थे मतुप दीप सथितवती कवतु प्रत्ययान्त मानने पर धातु के कमक होने से भूत सचितवती होगा, भूतेन नही जत मतुप् करना ही ठीक है। अस्याम त्वयि च यहाँ विद्वानों की दृष्टि मे प्रक्रम भग दोष है शकुन्तला का प्रथम दो पक्तियों में उपादान करके भी यहां अस्यामु को पहले रखा गया किन्तु यहाँ यह दोष नहीं होगा, क्योंकि काश्यप मुनि मानव की अपेक्षा प्रकृति को ही अधिक प्राधान्य देते हैं, से सच शकुन्तला के लिए प्रकृति से ही सहानुभूति माँगते हैं मानव से नही, उन्हें मानव से बढकर प्रकृति से प्रेम है, लता के विवाह की अर्थाद आश्रय की उन्हे शकुन्तला से भी अधिक चिन्ता थी और उस पर प्रेम या इसीलिए उन्होंने उसका प्रथम प्रयोग किया है, कवि का यहाँ यही आशय है। वीतचिन्त चीता व्यपगतो चिन्ता यस्य स वि + इ गतौ कटा इस इति अब इधर से मार्ग पर चलो। ● शकुन्तला - (दोनो सक्षियों से) सखियों, इस (लता) को तुम दोनों के हाथ मे धरोहर के रूप मे ( रख रही हूँ)
(इति वाष्प विहरत ।)
काश्यप-अनसूये अल रवित्वा ननु भवतीभ्यामेव स्थिरीकर्तव्या शकुन्तला । (सर्व परिक्रामन्ति ।)
शकुन्तला-तात, एवोटजपर्यन्तचारिणी गर्भमन्थरा मृगवधूवान प्रसवा भवति, तवा मा कमपि प्रियनिवेदक विसर्जयिष्यथ । [ताद, एसा उपजतचारिणी गन्भमन्थरा मअवहू जदा अगधप्पसवा होई, तदा मे कपि पिaणिवेदइत्तअ विसज्जइस्सह । ]
काश्यप ने विस्मरिष्याम ।
शकुन्तला (गतिभङ्ग रूपयित्वा ) को न खत्येष निवसने मे सज्जते । [ कोक्सो विस मे सज्जइ । (इति परावर्तते ।
दोनों सहियाँ जय जन हम दोनो को किसके साथ में छोट दिया है।
( यह कह कर आंसू बहाती हैं)
काश्यप- अनुसूया, (तुम लोग) मत रोबो, क्योंकि तुम दोनो को हो तो शकुन्तला को चैव वैधाना है। ( सब चारों ओर घूमते हैं)
शकुन्तला हे तातपर्णमाला के समीप विचरण करने वाली गम (भार) से मन्दगति वाली यह हरिणी जब सुख से प्रसव करे तब (इस) शुभ समाचार को कहने वाले किसी व्यक्ति को मेरे पास भेज देना । काश्यप हम इसे नहीं भूलेंगे।
शकुन्तला ( चाल मे अवरोध का अभिनय करके) यह कौन मेरे वस्त्र को
खींच रहा है।
( यह कह कर पीछे मुडती है)
निशेष ग्यास वा धरोहर बाप विहरत आंसू डालना यह एक मुहावरा है। वह धातु से अल के योग में निषेधाय मे 'अलमल्यो' से पत्या प्रत्यय स्थिरीकर्तव्य-स्थिर-नि उटजपच तचारिणी—उटजपयन्त+चर धातु से ताच्छील्यै णिनि ही अनयसमा अनध प्रसव यस्य सा विपत्ति रहित प्रसव बाली अर्थात् जब बिना किसी कष्ट के इसके सन्तानोत्पत्ति हो अघ का अप दुस भी होता है "दु सेनोव्यसनेष्वषम् ।" कच्चित् मृगीणा मनषा प्रसूति रघुवश । निवेदक प्रिय+नि+बि+ णिच्+ तु सम्म स+नद
काश्यप्र. वत्से, त्वया व्रणविशेषणमिङ्ग दोनां तेल व्यषिच्यत मुझे कुशसूचिविद्धं । श्यामाकमुष्टिपरिचितको जहाति
सोsय न पुत्रकृतक पदवी मृगस्ते || १४ ||
= शब्दार्थस्य जिसके कुणसूविवि कुणों के (नुकीले) अग्रभाग से विधे हुए, मुझे मुख मे व्रणविशेषणम् पावो को भरने वाले, इड गुदीनाम् इद, गुदी  नामक वन्य फलो का तेल त्वया तुमने व्यषिच्यत लगाया था स अयम् वह यह श्यामाकमुष्टिपरिधिश्यामा (सावा या वन्य धान्य) की मुठियों से पाला गया (और) पुत्र कृतक पुत्र तुल्य माना गया मृग- मृग, ते पदवी न जहातितेरे मान को नहीं छोड़ रहा है
काश्यप हे पुत्री,
पश्येति अवयव कुसुचिविद्धे मुळे त्वया व्रणविरोपणम् इट गुदीनाम् तैलम् व्यषिच्यत स अयम् श्यामाकमुष्टिपरिधितक पुत्र मृग ते पदवी न जहानि
अनुवाद के अग्रभाग से विधे हुए जिसके मुख मे तुमने भावो के भरने वाले हिंगोट फलों के तेल को लगाया था, वह यह स्पामा धान्य की मुहिम से पाला गया तथा पुत्रवतु माना गया मृग तुम्हारे भाग को नहीं छोड़ रहा है।
भावाय शकुन्तला के यह पूछने पर कि कौन मेरे वस्त्र को खीच रहा है, काश्यप मुनि कहते है कि यह तुम्हारा पुषवद माना गया वहीं मृग तुम्हारे माग को अब नही छोड़ रहा है और तुम्हारे वस्त्र को खीच कर तुम्हे वापस लौटाना चाहता है, जिसके कुशाग्रभाग से छिदे हुए मुख पर तुम पाव भरने वाले हिंगोट के तेल को लगाया करती यो तथा जिसे तुमने श्यामाक धान्य की मुट्ठियों से पाना था, अब उसी मातृप्रेम के कारण यह तुम्हे नहीं छोड़ रहा है।
विशेष प्रस्तुत पद्य में मृगस्वभाव का वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलकार है और बसन्ततिलका छन्द है।
संस्कृत व्याख्या यस्य मृगस्य कुमानाम् दर्भाणाम् ग्रचिभि तीयाप्रभारी विद्धं पाते-कुशसूचिविद्धं मुझे आनने वया-वाकुन्तलया व्रणाना क्षताना विशेषण विशोषक-वणविशेषणम्, इड, गुदीनाम् इक गुदीत्या ताना तापसत-कलाना स्नेह न्यषिच्यत निषिक्तम् । अस्यामाकाना वन्यधान्यानामुष्टिमि मुष्टिपरमिता परिवर्धितक परिपोषित–स्यामाकमुष्टिपरिर्वाधिक पुत्र कृतकपुत्र स्वीकृत, मृगणिते शकुन्तलाया पदवी-मागम्, न जहातिन त्यजति ।
शकुन्तला वत्स, कि सहवास परिस्यागिनों मामनुसरसि । अचिरप्रसू- तथा जनन्या विना aftत एव इदानीमपि मया विरहित त्वां तातश्चिन्त- यिष्यति। निवतस्य तावत् [वच्छ, कि सहवासपरिच्चाणि म अणुसरसि । अचिरप्पनूदाए जणणीए विणा वढियो एव्व दाणि पि मए विरहिद तुम तादो चिन्तादि । वितेहि दाव ॥]
(इति रुदती प्रचिता)।
बाप कुरु स्थिरतया विरतानुवन्धम् । अस्मिन्प्रललितनतोतभूमिभागे मार्गे पदानि खलु ते विषमो भवन्ति ५॥
संस्कृत सरला शकुन्तला पृष्ठ कायपो मुनि कथयति वदय स एव मृnere मा न परित्यजति अपि तु तव निवसने सज्जते यस्य कुतीक्ष्णाग्रभाग अते मुले त्वया fशोपकम् मुदीरयामातaraneer a frषक्तम्, त्वामायटिभ परिपालितवती पश्च तव पुत्रकृतोऽस्ति ।
विशेषण - व्रणानाम् विशेषणम्, विरह, घातो शिबू तत करणे स्ट "ff art हकारस्य "व्ह पो यतरस्यामिति पकारादेश विकल्पत अत विशेषणम् अथवा विरोहणम् विरोपयति जय विराहयति रूप होते है। न्यषिच्यत नि+मित्र कमवाच्ये लद, प्राह सितादिति पत्वम् कुशमूनिषिद्ध कुशाना चिनि - सम्प्रसारण विधिना यकारम्बेकारे। परिवधितक परिव + णिच् + तनु अनु कम्पायें क प्रत्यय पुत्रकृतक कृत पुत्र पुत्रकृतक मयूरव्यसकादित्वात् समासे पदस्य प्रयोगे पुत्रकृतक अथवा पुत्र कृत पुषकृत सुप्युपेति समास तत स्वार्थे कन् पुत्रकृतक जहाति ओहार त्यागे ल पदवीम् माग अवनवत्म मागध्वपन्थान पदवीति ।
शकुन्तला पुत्र, सहवास को छोट देने वाली मेरा (तुम) क्यो अनुगमन कर रहे हो? जन्म देने के बाद ही मृत माता के बिना (तुम) पालित हो किये गये हो, अब भी मुझ से वियुक्त हुये तुम्हारी पिता जी देख भाल करेंगे। अत लौट जाओ।
(रोती हुई प्रस्थान करती है)
काश्यप-
उत्पन्नमोरिति मन्यय-उत्पक्षमणो नमनयो उपद्धति वाण्यम् स्थिरता विराध कुछ अनक्षितनतो नतभूमिभागे अस्मिन् मार्गे ते पदानि लुमि चयन्ति ।
शब्दाच उत्पक्ष्मणो पर उठी हुई विरौनियों (नेव सोम) वाले (पश्म नेत्रको केबल ने लाम) अथवा विरोनी नयनयो नेत्रो की, उप वृत्ति देखने की शक्ति को रोकने वाले वाणम् मासु को, स्थिरतया धैय से, विरतानुव धनप्रवाहरहित शुरू करो, अर्थात् आसुओ को बार बार बढ़ने से रोक लो (क्योंकि) अलनिनोन भूमिभागेन दी हुई थी-नीची भूमि भा वाले मार्गेइम माग पर ने पदानि तुम्हारे चरण अनुवस्तृत तिला रहे है।
अनुवाद हुई विरोतियो (नेत्र लोम ) वाले नेत्रो को देखने की शक्ति का रोकने वाले आसू को से प्रवाह रहित करो, क्योंकि न देखी हुई कभी-नीची भूमि वाले इस भाग पर तुम्हारे चरण वस्तुत लडखड़ा रहे हैं
भावाच कुतता को रोती हुई प्रस्थान करते देखकर काश्यप मुनि उस कहते है कि पतिगृहगमनकाल में यपि अन वारणार्थं तुमने अपतन को रोकने के लिये अपने नेत्र सोनी को ऊपर उठा लिया है जिससे कि अपन न हो किन्तु फिर भी लगातार रोने के कारण जो आसू आ जाते है उनसे तुम्हारी माग देखने की शक्ति एक जाती है, अत धीरज धारण कर इन लगातार बहने वाले आसुओं को रोको, केवल अमगलवारणाथ नेत्र लोगो का ऊपर उठाना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि जिस माग पर तुम चल रही हो, यह कथा नीचा है और तुमने इसके पहले कभी इसे देखा भी नहीं है, अतएव इस पर चलते हुये तुम्हारे पैरा रहे हैं।
अथवा 'अलक्षितनतनत भूमिभागे यह पद मकुतला के लिये सम्बोधन है, जिससे तात्पय यह होगा कि यह प्रेम माग जिस पर तुम चल रही हो, बहुत ही ऊँचा नीचा है और तुमने कभी इसका अनुभव भी नहीं किया है, अतएव तुम्हारे पैर जा रहे है।
विशेष प्रस्तुत पद्म मे आसू रोकने में स्थिरता कारण है अत rain अकार उत्तरार्ध मे मानू रोकने का कारण बतलाया गया है बतकाव्यलिङ्ग, अनकार वसन्ततिलका छन्द है ।
संस्कृत व्याख्या उद्गतानि पक्ष्माणि नेलोमानि ययोस्तयो उत्पक्ष्मण, नमनयोग उपडा प्रतिहता यत्ति वनव्यापारो येन तमु उपरुद्धवृत्तिम वाक्यम अब जलम् स्थिरतयाचैण विरतानुवधम्- चिरतवित निवृत्ती वा अनुवच प्रवाह यस्य विनावाह कुरु विधेहि (यत) न लक्षित अनि निम्न उन्नत उस्थित व भूमे भाग भूप्रदेश यस्मिद तस्मिन्न तनतनत भूमिभागे, अस्मिन् मार्गे एतस्मिन् पथि तब पदानि वासा, विषमोमयन्ति नतोजना भवन्ति स्वतन्ति था।
संस्कृत सरलार्थ रोदनपरा प्रस्थिता शकुन्तला मवलोक्य राज्य मुनिस्ता कमल दरसे उ स्वनेत्र दशनव्यापार शप्प व धैर्य
- ( आत्मगतम्) कि नु खलु तत्रभवतो दुष्यन्तस्य युक्तरूप-
शारव भगवन्, ओवकान्त स्निग्धो जनोऽनुगन्तव्य इति श्रूयते । तविद सरस्तीरम् । अत्र सदिश्य प्रतिगन्तुमर्हति ।
काश्यप तेन हीमा क्षीरवृक्षच्छायामायाम । (सर्वे परिक्रम्य स्थिता ।)
मस्माभि सवेष्टव्यम् ।
(इति चिन्तयति ) । शकुन्तला (जनान्तिकम्) हला, पश्य । नलिनी- पत्रान्तरितमपि सहचरमपश्यन्यातुरा चक्रवाक्यारटति, दुष्करमह करोमि। [हला, पेक्ख। गणतन्तरि वि सहजर अदेवखन्ती आदुरा चक्कवाई आरवदि, दुक्कर अह करेमि ति ॥]
अनुसूया सखि, मेव मन्त्रस्य
वापि प्रियेण बिना गमयति रजनीं विषाददीर्घतम् । गुर्वपि विरह खमाशावन्ध साहयति ॥१६॥
मवलम्ब्य वितप्रवाह विधेहि यतोहि अदृष्टनिम्नोन्नत भूप्रदेोऽस्मिन् पथि तव चरणविन्यासा मन्ति।
टिप्पणी
सहवासपरित्यागिनी सहवास परित्यजती त्यर्थे सहवारा+परि+त्यज धातो साधुकारिष्प 'सम्पचानु इत्यादिना घिनुण (इन्) प्रत्यय तदनु दोष सहवास सहवास इत्यत्र सुप्युपैति समास वास इत्यत्र व धातो पत्र प्रत्यय अचिरप्रभूतया अबिर प्रसूता तथा कमधारय चिन्तयिष्यतिचिती सज्ञाने पिष । निवर्तस्व न द + बाट उपवृत्तिम् उपरुद्धा वृत्ति पेन । उप + क् + क्तिन् वृत्ति अर्थात् वनव्यापार विरतानुबन्धम् विरत अनुवता यस्य तम् । विरम् + क्तविरत । वितानुबन्धम्' यह भी पाठ है पर अथ ने कोई अन्तर नहीं है। विषमाभवन्ति-विषम + णि भूधातुयोगे । महर्षिम्य निपतति न कह कर यात्राकालीन अमगल वारणाय विषभी भवन्ति कहते हैं, निपतन्ति कहने पर शुकुन्तला को भी बगल की शका होती, अत विषमी waf ही कहा है। नयनयो वा नयन के बिना नहीं हो सकते जत अविनाभाव सम्बन्ध से नवन पद तो आक्षिप्त हो ही जाता पुन नयन पद प्रयोग से अथगत पौनरु रूप दोष की यहाँ आपका न होनी चाहिये क्योकि उपमणो इस विशेषण के लिये यहाँ नयन पद का उपादान किया गया है।
शाहू र भगवन् प्रियजन का जल के किनारे तक अनुगमन करना चाहिये, ऐसा सुना जाता है, तो यह सरोवर का तट है यहाँ पर (हमे अपना सन्देश देकर सौट जाना उचित है।
[सहि, मा एव मन्तेहि ] एसा वि पिएण विणा गमेइ रक्षण विमानदीहअर गरम पि विरहदु कल आसावन्धी सहावेदि ।।]
काश्यप काश्यप ( मग ही मन ) हमे माननीय दुष्मत को क्या उचित सन्देश
तो (हम) इस पीपल वृक्ष की छाया में बैठते है। ( सब लोग चारा और घूम कर स्थित हो जाते हैं)
देना चाहिये।
(इस प्रकार सोचने लगते हैं)
(हा की आट करके) सखी (इधर देखो कमलिनी के पत्ते की आट में स्थित भी (अपने ) सहचर (चकवा) को न देखती हुई, व्यथित यह पकवाकी चिल्ला रही है। (पर) मैं बहा दुष्कर काम कर रही हूँ अर्थात् जब यह चकवाकी, कमलिनी पत्र मात्र व्यवधान होने पर भी अपने सहचर के लिये व्यथित होकर चिन्ता है, तब में तो चिरविरहित हाकर भी अब तक जी रही हूँ, वास्तव में यह मेरा बडा दुष्कर काम है।
अनसूया सखी, ऐसा न कहो । एवेति-अन्वय- एषा अपि प्रियेण विना विषाददीधवरा रजनीम् गमयति । आशाब गुरु, अपि विरहदुधम् साहयति
शब्दार्थ एषा अपि यह चक्रवाकी भी प्रियेण बिना अपने प्रिय सर के बिना, विपाददीधराम् = विरह दुख के कारण अधिक लम्बी प्रतीत होने वाली रजनीम् रात्रि को, गमपतिव्यतीत करती है। आशावन्ध पुनर्मिलन की बाजा का बन्धन, गुरु अपि असह्य भी विरहदु बम् विरह के दुख को साहयति सहन करा देता है।
अनुवाद – यह चक्रवाकी भी अपने प्रिय सहचर के बिना, (विरह) दुख के कारण अधिक लम्बी प्रतीत होने वाली रात्रि को व्यतीत कर देती है ( पुनर्मिलन की आशा का बन्धन असह्य भी दुख को सहन करा देता है।
भावाय अनुसूया शकुन्तला से कहती है कि तुम ऐसा मत सोचो, यह चक्रवाकी भी तो अपने प्रिय सहचरस वियुक्त होकर उस सम्पूर्ण रात्रि को अकेले ही व्यतीत कर देती है जो कि बिर व सम्बी प्रतीत होती है। वस्तुत पुनर्मिलन को आशा का बन्धन अझ भी विरह दुख को सहन करने की शक्ति देता है।
विशेष प्रस्तुत पद मे विशेषाय के द्वारा सामान्याय का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास मलकार, आमाबन्ध मे रूपक अलकार तथा आर्याजाति है।
संस्कृत व्याख्याएपाद्रवनक्रवाकी अपि प्रियेण विना स्वप्रियेग चक्रवाकेन विना विषादेन बिरहजन्येन दुखेन दीपतरा अधिक दीघत्वेन प्रतीयमाना ताम्---विषाददीधतराम्, रजनीम् रात्रिम् गमयति-यापयति (मत) आशामा
काय शाङ्गव इति त्वया मवचनात् स राजा शकुन्तला
पुरस्कृत्य वक्तव्य ।
शाहूदेव आज्ञापयतु भवान् ।
अस्मात् साधु विचिन्त्य सयमधनानुच्चे कुल चात्मन-
स्त्वय्यस्याः कथमप्यवान्धवकृता स्नेहप्रवृत्ति च ताम् ।
सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकमिय दारेषु वृक्ष्या त्वया
भाग्यात्तमत पर न खलु तद्वाक्य वधूवन्धुभि ॥१७॥
पुना बन्धनम् आशा गुरु-अम् अपि विरहदु बिरहपीडा, साहयति सहनयोग्य विदद्वाति
संस्कृत सरलाय कुन्तोदात दुष्टरम करोमीति वनमा नया कथयति सखि चैव मन्त्रयस्वयत इय चक्रवाकी अपि स्वप्रियेण सहबरेण चजवाकेन बिना रात्रिकालीनविरह लेताधिकत्वेन प्रतीयमाना रात्रि दापयत्येव यत बन्ध सामपि विनोदुख सहनयोग्य विधाति अतस्त्वयापि पुनर्मिलनाशया विरपौडेय सोडल्या
टिप्पणी
तम् उदकस्य अन्त उदात्त ना उदकान्ता इति का 'आठ मर्यादाभिविष्यो' इति अव्ययीभाव समासाभावे ओदाता आ त्वादनन प्रज्ञा अतो नाम सन्धिनिषेध, स्वचित् उचकान्तमित्यपि पाठ । यहा धमका प्रतिरूप भार इस धम वचन की ओर संकेत करता हुआ कह रहा है "ओव कान्त प्रिय प्रोष मनुब्रजेत्" manacks wear "अतिथि श्रोत्रिय तृप्त मासीमान्त मनुव्रजेद" प्रियजन को विदा करने के लिए यहाँ तक उसके पीछे जाना चाहिए जहाँ तक नदी जलाम आदि न मिले ऐसी ही परम्परागत बात प्रचलित है अत अब सरोवर का तट मिल गया है आप लोट जाइये सविश्य सम् + विश्व- ल्यपू, रवृक्ष- दूधवान यक्ष पीपल पट आदि वृक्ष क्षीर वृक्ष कहा जाता है। युक्तरूपम् अति उचित अत्र साप प्रत्यय रजनीम् गणपति अब गतिबुद्धि- इत्यादिना द्वितीया "आशाबन्ध पुनर्मिलन की आशा का बचन कठोर यातनाको को भी सहने की शक्ति देता है। इसी भाव की अन्य सूक्तियाँ भी प है "आशाबन्ध कुसुमसदृश प्रायो ह्यट बनाना सद पाति प्रति हृदय वियोगे रु | शक्य त्यागशाव घेनारमान धारवितुम' विक्रमवणीय
शान रव आप आज्ञा दीजिये ।
काश्यप-
अस्मानिति अन्य सयमधनानु जस्मा आत्मन उ कुलच त्वयि अस्माकमपि अवधता ता स्नेहप्रवृत्तिम्य साधु विचिन्त्य त्वया इदारेषु सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकम् दृश्या अत पर भाग्यामतनु तद् व वधूवभिन वाच्यम् ।
शब्दाय—समराधनान— इन्द्रियनिग्रहरूपी धन वाले अस्मान हम लोगों का, आत्मन उच्चै कुल और अपने उन का त्ववि तुम पर अस्या = इस शकुन्तला के कदमपि किसी अज्ञान कारणवश हुए अवान्धवकृताम्वध्रुजनो द्वारा न किये गये, ताम्—उस स्वाभाविक, स्नेह प्रतिप्रणय प्रवाह का साधु विचिन्त्यतीति विचार करके त्वया तुम्हारे दुष्यन्त के द्वारा श्यम् पह शकुन्तला दारेषु अपनी अय रानियों में सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकम्म समान आदरपूर्वक दृपया देखी जानी चाहिए। अत पर भाग्वायनम् इसके आगे (सब) भारपाधीन (है) सेल के सम्बन्धियो द्वारा नायम् कहा जाना चाहिए।
अनुवाद इन्द्रियनिग्रहरूपी धन वाले हम लोगो का और अपने उच्च क्ष का, तथा तुम पर इन शकुन्तला के किसी अज्ञात कारण हुए, बहुजनो द्वारा न किये गये उन स्वाभाविक प्रणय प्रवाह का भली-भाँति विचार करके, तुम्हारे द्वारा यह कुतला, अपनी अप गनियों के बीच सबके समान आदरभाव पूर्वक देखी जानी चाहिए, इसके आग (सब कुछ) भाग्याडीन (है) वह वधु के सम्बंधियो द्वारान कहा जाना चाहिए।
भावाय राजा दुष्यन्त को संदेश देते हुए काश्यप मुनि कहते है, कि फार तुम मेरी ओर से राजा से यह कहना कि हम लोग केवल सममधनी है अर्थात् निग्रह साधना के अतिरिक्त हमारे पास और कुछ नहीं है, यौनुदान के लिए तो हमारे पास सम्पत्ति नहीं है पर हम लोग निग्रहानुग्रह समय अवश्य है, तुम्हे इस बात को अच्छी तरह समझ मेना चाहिए और तुम्हे स्वयं अपने उच्च एवं गौरव- झाली की मर्यादा का भी ध्यान होना चाहिए जिसमे किसी निरपराध व्यक्ति के दण्द अपमान आदि की सम्भावना नहीं होती। इसके अतिरिक्त तुम्हे कुरा के उस अज्ञात कारण जय स्वाभाविक प्रणा का भी ध्यान होना चाहिए जो कि के सम्बंधियों द्वारा नहीं कराया गया था जी ला का तुम पर अमि प्रेम था इन सभी बातो पर सम्यक विचार कर तुम्ह इन प्राकुन्तला को अपनी परिगहनतमा पनि परियो मेरो मन पर भाव से देखना चाहिए। इसके आगे जो कुछ इसके वहा उसे इस समय हम लोगों के द्वारा कहने की आवश्यकता नहीं है।
विशेष प्रस्तुत पद्य में 'माम्' न कहकर सममधनान् वरमा कहा गया है, अत विशेष के लिए सामान्य का प्रयोग होने मे अप्रस्तुत प्रशसा अलकार, "विचिन्त्य" इस एक क्रिया के साथ अस्मान् आदि तीन कर्मों का सम्बध होने से, तुल्ययोगिता अलकार, न खलु तद्वाक्य वधूवन्धुभि' इस पदाथ के प्रति भाग्यावत्तम्' यह पदार्थ कारण है व्रत पदार्थहेतुककाव्यलिङ्ग अलकार, बुति वृत्ति अनुप्रास अलकार तथा शाविति नामक छन्द है।
संस्कृत व्याख्या सयम इन्द्रियनिग्रह एवं धन येता समधान् अस्मात् तपस्विन, आत्मन स्वस्य उच्चैौरवशाल कुन त्वि त्वद्विषये, अस्या शकुन्तलाया, कथमपि तापशातवारणेन, अनधवकृतान- वजन प्रयत्नेन विनैव घटिताए, ताम् अकुशिमाम स्नेहप्रवृत्तिम्प्रणय प्रनाही- त्यत्तिम् च साधु सम्यक विधित्यविश्वाय त्वयानुपण दुप्पन इय शकुन्तला दारेषु वासु परिगृहीतामु परिमाणासु वा पत्नी मामान्या साधारण समानरूपा वा प्रतिपत्ति समादर नत्थूचक सामान्यरिनिपूर्वकम् दृश्यायतनीया, अतः परम् इतोऽधिकम भाग्यायत्तम्-वानम्, तद् - नियमेन बधूबधुभि कयासभ्वधिनिरस्माभि न वाच्यम्ची ।
संस्कृत सरलार्थ राजा दुष्यन्त सदिशन् काश्यपा मुनि कथयति-वयमत्रत्या स्तपस्विन केवलमिन्द्रियनिसान स्म नास्माकोकरूपेण देय लौकिक सत्कारार्ह सम्पदादिविद्यते पर पम तपोवनेननिग्रहानुग्रहमा स्म विषये सम्यग्विनिर्णीय, स्वकीयस्य च पौरव, गौरवशानि अथ चाचित्यानी चित्यवि शालि कुल मनुचिनय एवम् त्वद्विपचेऽस्या कुनाया नदियज्ञातकारणेन समुद्भूता तामकृत्रिमा कन्यासम्बन्धिना सम्माक प्रयत्नेन विनैव सघटिता वही त्यतिञ्च सम्यग्विवाय खयेतना परिगृहीतासु परिमाणानु या भार्यासु समानरूणदरभावनयावलोकनोया बनवासिनीय लोकश्वसानपरिवजितेयमिति कृत्वा नापेक्षणीया इतोऽधिक पत्किमपि भावि तत्सम वैवाधीनमस्ति न तदय मस्माभि किमपि चिन्तनीय नापि कथनीयम् ।
टिप्पणी
सबवचनात् अत्यन्तोपे कमणि पञ्चमी पुरस्कृत्य पुरम त्वा- ल्यप् । सधना सम्यम्+अहम लोग मयमी एवं निग्रहानुग्रह समय तपस्वी हैं जल तुम्हे कोई ऐसा व्यवहार न करना चाहिए जिससे हम लोगा का अपमान हा तपस्वियों के पास अनुग्रह के अतिरिक्त और होता ही क्या है जाने दे सके, पर अपमानित होने पर उनमे सापादिनिग्रह की भी क्षमता होती है, और वे अपराध को भी क्षमा कर सकते है क्योकि समन होते है। वस्तुत कर यह कथन बडा गम्भीर एव चातुयपूर्ण है और राजा के लिए एक गम्भीर चेतावनी है। अवयवानाम्जन द्वारा न कराया गया। विवाह परस्परानुराग ने ही सम्पन्न होता है, बन्धुजनो का इसमे हाथ नहीं होता। स्नेह शाङ्गरव-गृहीत सन्देश ।

काश्यप वत्से, स्वमिदानीमनुशासनोयाऽति । वनौकसोऽपि सन्तो सौकिकता वयम् ।

शाङ्गरवन खलु धीमता कश्चिदविषयो नाम । काश्यप सा त्वमित पतिकुल प्राप्य-

शुभ व गुरु कुरु प्रियसीवृत्ति सपत्नीजने

विप्रकृताऽपि रोषणतया मा स्म प्रतीप गम ।

भूभित्र दक्षिणा परिजने भाग्येवकिनी यान्त्येव गृहिणीपद युवतयो वामा कुलस्याधय ॥ कथ वा गौतमी मन्यते १

प्रवृत्तिम् शकुन्तला का दुष्यन्त पर स्वाभाविक प्रणय प्रवाह या सामान्यप्रतिपत्ति पूरकम सामन्या तुल्यरूपा प्रतिपत्ति गौरवम् सामापतिपति सा पूर्वा पस्मिन् तत् पत्नी जैसा साधारण एव समान व्यवहार भाग्यायत्तम् भाग्ये आयत्तम्- + यत्+क्त] वन्धुभिकश्या बन्धव । यद्यपि महर्षि कण्व स्नेह अपनी कन्या के लिए भावी मुख और शान्ति की आकाक्षा रखते हैं उसके लिये उच्चपदवी की भी उनके मन में इच्छा है पर वे इसे यहाँ व्यक्त नहीं करते और इसे भाम्प पर छोड़ देते हैं। कालदर्शी महर्षि के सामने शकुन्तला के भावी जीवन का चित्र है, अंत दे अधिक कुछ नहीं कहना चाहते, वे जानते हैं कि आगे क्या होता है, उन्होने अपने वरदान और आशीर्वादो मे ही उसे सब कुछ दे दिया है अत से दुष्यन्त से उसके लिए कुछ भा याचना नहीं करना चाहते, जैसा कि जिन करते है।

चतुर्गा के चार प्रसिद्ध क्लाको में से यह एक लोक भी है। महर्षि क का दुष्यन्त के लिए यह सन्देश विनम्र होता हुआ भी गम्भीर भावो से एवं पाय से पूण है, मर्यादित है और महनीय भी वस्तुत यह श्लोक भारतीय संस्कृति पर आधारित पति पत्नों की पारस्परिक आचार साधना का अच्छा निवेशन है।

शाङ्ग र ( आपका सन्देश (मैंने ठीक समझ लिया है। काम्यय-पुत्री अब तुम्हे भी कुछ) शिक्षा देनी है। वनवासी होते हुये भी हम लोग तोक व्यवहारों को जानते है।

शाङ्गरववस्तृत विद्वानों के लिए कोई बात अज्ञात नहीं होती। काश्यप वह तुम यहा से पतिगृह में पहुँच कर

शुश्रूषस्वेति गुरून् शुश्रूपस्य सपत्नीजने प्रियसीलिए कुछ विकृता पि शेषणतया तु प्रतीपमा स्म गम परिजने भूयिष्ठ दक्षिणा भव, भाग्येषु अनुत्से किनी एव युवतय गहिणीपदम् मान्ति नामा कुलस्य बाध्य ( भवन्ति । सार्थ गुरून् गुरुजनो की शुश्रूषस्व सेवा करना, सपत्नीजने प्रिय सीसिपीजनो (सोतों) पर प्रियसी के समान व्यवहार करना विप्रकृता

अपि तिरस्कृत होने पर भी रोपणतया क्रोध करण प्रतीत मा म गम पति के प्रतिकूल मत जाना। परिजने भूयिष्ठ दक्षिणा नव अपन सेवकादि पर बहुत अधिक उदार रहना भाग्येषु अनुलोकिनी पदादिप्राप्ति रूप अपने भाग्य के विषय मे निरभिमानिनी रहना एवम् इस प्रकार (आवरण करने वाली युवलय स्त्रिया गृहिणीपद पातली या सुगंहिणी पदो प्राप्त होती है । वामा इसके विपरीत आचरण करने वाली स्त्रिया कुलस्यपितृ- कूल एवं पतिकुल के लिए आपक-मानसिक व्यथा (का कारण होती है।

अनुवाद जुम यहा से पतित मे पहुँच कर गुरुजनों की सेवा करना, सीजन पर प्रिय सखी जैसा व्यवहार करना, तिरस्कृत दान पर भी फोन के कारण पति के प्रतिकूल काम मत करना, अपने आवितजनो पर अत्यधिक उदार रहना, अपने सौभाग्य के विषय में निरभिमानिनी रहना। इस प्रकार ( आचरण करत पानी feast सुगृहिणी पद को प्राप्त होती है, इसके विपरीत अमर करने वाली दानी ही कुली के लिए मानसिक व्यथा (का कारण होती है

भावार्थ- पतिग्रह जाती हुई कुता को अनुशासित करते हुए महर्षि कण्य कहते हैं कि तुम पतिगृह में पहुँच कर वहाँ सास ससुर आदि गुरुजनों को सेवा करना, अपनी पत्नियो पर भी तुम ईसा ही व्यवहार करना जैसे कि तुम अपनी प्रिय सखियो पर करती हो। जब कभी स्थितिन तिरस्कृत होकर भी को पति के प्रतिकूल आचरण न करता । अपने परिजन सेवकाविजना पर बहुत अधिक उदारता का व्यवहार करना यदि तुम्हे उच्चपद प्राप्त होने का सौभाग्य मिले तो घमण्ड न करना, और न उच्च पद प्राप्ति हेतु सदा उत्साह ही दिखाना, भाम्यत जो जय प्राप्त हो उसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना जो युवती जन इस प्रकार का आचरण करती गृहलक्ष्मी बहलाती है परंतु इसके विपरीत आचरण करने वाली पतिकूल एवं पितृकुल दोनो ही के लिए मानसिक व्यथा का कारण बनती है।

विशेष प्रस्तुत पद्म मेवामा स्त्रियों पर अधित्य का आरोप होने से रूपक जलकार, वामा को आधि का कारण बतलाया गया है तु कायभूत आधि पद के साथ कारणभूत बामा का अभेद निर्देश किया गया है अन हेतु अलकार, चरणगत सामान्याथ से पादत्रयगत विशेषाच का समयन होने से अरपास अकार, पत्नी के साथ प्रिय सखी जैसा व्यवहार करना का असम्भव वस्तु सम्म रूप विना अलकार और इन सब में परस्पर निरपेक्षतास समृष्टि है। प्रसाद गुण एव वैदर्भी रीति है। शास्वानुकूल सुपर वन होने के कारण उपदिष्ट नामक नाट कीय लक्षण है। "उपदिष्ट मनोहारिया पात्रानुसारत " जादूल विक्रोतिनामक छन्द है। और शाकुन्तल के चारो में से एक है। इसम के माध्यम से हार के लिए एक सा व्यवहरी मनोहर उपदेश दिया है जिससे कि उनका भावी हो सके जो दिया इसमें वर्णित अनेक उदात्त आदतों एवं भारतीय संस्कृति द्वारा अनुमोदित

इन नियमों का पालन करेंगी के गृहलक्ष्मी पद को प्राप्त कर सुख और गतिमय जीवन बिता सकेगी, इनके विपरीत आचरण करने वाली स्त्रियाँ पितकुत एवं पतिकूल के सोचनीय होगी। वस्तुत महाय का कुन्तला के लिए यह अनुगासन शिचिता नवयुवतिया के लिए एक उत्तम दीक्षान्त भाषण ही है अतएव यह सत्यका अन अग है तथा सबके लिए विस्मरणीय है।

संस्कृत [ गुरु श्वशुरादिना शुषम् सेवस्व संपली हसपत्नी प्रिया भासतो त्यात तामप्रियसखीवृत्तिम् प्रयस्या- व्यवहारम् कुछ विधेहि विकृत अधि-तिरस्कृता अपि मनी रोपणकोधावेन भतु स्वपत्यु प्रतीपम् प्रतिकूल विरुवा मा स्म गमन पाहि परिजने-  काम, भूयिष्ठम् अत्यधिकम् दक्षिणा-उदारामा भव भाग्येषु = उच्चपदादिप्राप्तिगौभाग्येषु परमेश्वयसम्पत्सु वा अनुत्सेनी- पिता (व) एम् पूर्वोक्तविधिना (सावरल्य) युवतय-रमण्य मुद्दिष्या पद स्थानम् गीपदम् लक्ष्मीस्थानम् सुगृहिणीपाच्या वा यानि प्राप्नुवत्ति बामा प्रतिकूलाचरणवनय स्त्रियस्तु कुलस्य वस्न पत्युरेव नापि पतिकुलस्यैव अपितु पितृकुलस्यापि आधय मानसिकव्ययाकारणानि, भवन्तीति शप

संस्कृत सरलाय पति यान्ती शकुन्तला मुद्दिश्य काश्यप कथयति स्वमित पतिगृह प्राप्य श्वशुरादिपूज्या सेवस्व सपत्नीवर्ग प्रियसीवद् व्यवहार कुष्य । यदा-कदा स्थितिवशात् तिरस्कृता अपि सती कोपावेशेन स्वपत्यु प्रतिकूलाचरण मा कुरुष्व । आश्विन चामधिकमु दारागया भव, सौभाग्येषु गर्नेध्यविशेषपरिवजिता भव । एतदाचरणेन रमथ्यो गृहिणीस्थान प्राप्नुवन्ति विपरीताचरणवत्यस्तु स्त्रिया न केवल पत्रे मनोव्यवाकारणानि जायन्ते ।

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बनौकस बनवासिन  लो भव लौकिक लोकम् - एक लौकिक जानन्ति इति लौकिकालौकिक शाक (अ) शुश्रूषस्व धातु से सन् प्रत्यय नोट पु० एक वचन सन् प्रत्यय करने पर "स्मासन" सूत्र से आत्मनेपद गुश्रूषा सेवा शुश्रूधु सदा रोगी या गुरुजनो को आवश्यकताओं को सुनने एवं उन्हें पूरा करने की इच्छा रखना है, इस प्रकार धात्वय सुरक्षित रहता मनोजने समान पति पासा ता सत्य यहा "निन सपल्यादिषु' से समान कोस आदम नया पनि के को न तदनुप्रेभ्य ते डीप होकर सपत्नी बनता है प्रवृत्तिम् या सख्या वृत्तिम् "शुश्रूषस्व गुरुम् प्रियसखीवृत्ति सपली जने कुरा दोनो कथन कामसूत्र के इन सूमो पर आधारित है "गुत्यु भूत्यषु च यथाई प्रतिपति श्वश्रूश्वशुरपरिचर्या आगता चैना ( सपत्नीम् ) भगिनिकावदीक्षेत " विकृता वि+++ था- कृषु धातु से युरोपणम् तत भावे तन् रोषणता तथा प्रतीपम् प्रतिनम्

। गौतमी- 1- एतवान् वधूजनस्योपदेश । जाते, एतत् खलु सर्वमवधारय । [एत्तिम बहुजणस्स उवदेसो जाये, एव क्खु सव्य ओधारेहि ।] काय वत्से, परिव्वजस्व मा सखीजन च । शकुन्तला तात, इत एव कि प्रियवदाऽनुसूये सख्यौ निर्यातयेते । [ताद, इदो एव्व क पिवदाजणसूआओ सहीओ णिवत्तिरसन्ति । ]

काश्यप बसे, हमे अपि प्रवेयेन युक्तमनयोस्तत्र गन्तुम्। त्वया सह गौतमी यास्यति ।

शकुन्तला - ( पितरमाविलय) कथमिदानीं तातस्याङ्कात् परिभ्रष्टा मलयतरुन्मूलिता चन्दनलतेव देशान्तरे जीवित धारयिष्यामि [कह दाणि तावस्स अकादो परिभट्टा मलअतरुम्मूलिआ चन्दणलदा विज देसन्तरे जीविअ पारइस्स

अपाम् अथवा प्रतिगता आपा यंत्र प्रति + अ + अच् अप के को प्रतीका अक्षरा तो जलवेग के प्रतिकूल चलता है, यहाँ इसका अथ विपरीत या प्रतिकूल दखना है पति के अनुकूल चलना पत्नी का परमकर्तव्य है, जैसाकि इस श्लोक मे उपदेश है-

अभ्युत्थानमुपागते गृहपतौ तद्भावणे नम्रता, तत्यादापितदृष्टिरासनविधि- स्तस्योपचर्या स्वयम् सुप्ते तत्र शयीत तत्प्रयमतो जह्माच्च शन्यामिति, पाय पुत्रि निवेदित कुलवधूसिद्धान्तधर्मागम ॥

मा स्म यम अप न मारयोगे इति अभाव भूपिष्ठम् बहु सुन् इष्टस्य मिटच से बहू को भू आदेश और के स्थान पर विट आदेश अनु लोकिनी+सच+अन कुत्व उलोक घमण्ड, न उत्सेक विद्यते यया सा अनुत्से- किनी । इस प्रसग मे भी कामसूत्र के ये सूत्र द्रष्टव्य है "न चोपालमेत वामताञ्च न यशयेत्" भोग्नुपरिजने दाक्षिण्यम् भाग्येषु के स्थान पर क्वचित् भोगेषु भी पाठ है। युवती स्त्रियाँ युवन् शब्द से स्त्री लिङ्ग मे यूनस्ति से ति प्रत्यय-युवति तरुणी स्त्री, युवद से दीप करने पर युवती भी होता है जिसका अ है पतिवाली या विवाहिता । वस्तुत युवा का स्त्रीलिङ्ग युवति है। यामा-मति स्नेहा बम +ण (अ) वढी वाम स्त्रीत्वे आवामा अथवा नाम काम अस्था "प्रतीपदर्शनी नामा" आधय आ+था+उपराधो कि इति कि प्रत्यय । आधीयते दुखमनेनेनि माथि पुस्याधि मानसी व्यथा ।" =

कथमिति गौतमी का ( इस उपदेश के सम्बन्ध में क्या विचार है, अर्थात् यह कहाँ तक पर्याप्त और उपयुक्त है?

गौतमी—इतना ही वधुओ के लिए उपदेश है, अर्थात् जितना जो कुछ आपने कहा है, वह उतना ही पूजन के लिए उपयुक्त और पर्याप्त है, इससे अधिक की आवश्यकता नहीं। पुत्री, तुम इन सब बातो को ठीक स्मरण कर लो। ) मुझ से और अपनी सखियो से गले लगकर मिल तो

किमेव कातराऽसि ।

तो भतुं लाध्ये स्थिता गृहिणीप विभवगुरुभि कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला ।

तनयमचिरात् प्राचीवार्क प्रसूप च पावन मम विरजा न त्व वत्से शुच गणयिष्यसि ॥ २१

॥ (शकुन्तला पितु पादयो पतति ।)

शकुन्तला-तात, मेरी सखियाँ प्रियम्वदा और अनसूया क्या यहाँ से लौट जायेंगी?

काश्यप पुत्री भी तो देना है अर्थात् इन दोनो का भी तो विवाह करना है इनका वहाँ जाना उचित नहीं है, तुम्हारे साथ गौतमी जायेगी।

शकुन्तला (पिता से लिपटकर ) किस प्रकार में अब पिता की गोद से छूटी हुई, मलय तह से उखाड़ी गई चन्दनलता के समान, दूसरे देश मे जीवन धारण करूँगी

टिप्पणी

एतावान काश्यप के उपदेश का पूर्ण समर्थन करती हुई गौतमी कहती है कि नववधू का दी जाने वाली शिक्षायें इतनी और ऐसी ही है। वृद्ध तपस्विनी गौतमी नवचित शिक्षाओं को विशेषरूप से जानती है अतः उससे सम्मति मांगी गई थी और उसने अपनी सम्मति दे दी।

अवधारण अ++ णिलोट इस सबको गाँठ बाँध लो हमे प्रवेये- इनका भी विवाह करना है अत इनका वहाँ जाना लोक व्यवहार की दृष्टि से उचित नही। इस स्थान पर कवि का नाट्य कोण दृष्टव्य है, उसने पडी चतुरता से सक्षियो को रोक लिमा है अन्यथा शाम की बात प्रकट हो जाती और सब कथानक होगा जाता। विवाह मे केवल कन्यादान ही नहीं होता अपितु कन्या का प्रदान होता है aaya भारतीय विवाह अविच्छेद माना जाता है, प्रदेये शब्द मे यह स्पष्ट ध्वनि है। चन्दनलता यह शब्द प्रयुक्त तो अन्यत्र भी हुआ है पर पन्दन की लता नहीं होती उसका वृक्ष ही होता है।

काश्यप-पुत्री, तुम इस प्रकार दुखित क्यों होती हो

इति त्वम् भिजवत भवाध्ये गृहिणीपदे स्थिता, तस्य विभवगुरुकृत्ये प्रतिक्षणम् आकुला (सती) अचिरात् प्राची इब अ पावन तनयम् प्रय च मम विरहजाम् शुचम् न गणमिष्यति ।

सदावत्से पुत्री लम् तुम, अभिजनवत महाकुलीन मनुं पति के श्लाध्ये प्रससनीय गृहिणीपद गृहस्वामिनी (महारानी) के पद पर स्थिता अधिष्ठित (होकर) विभवमुभि ऐश्वर्य के कारण महत्वशाली कुकार्यों से, प्रतिक्षणम्प्रतिपल, माकुला कायव्यस्ता (सती रहकर ) अचिरादीध ही, "

प्राची पूर्वदिशा, पावनम् अर्क इव जिस प्रकार जगत् को पवित्र करने वाले सूब को, उसी प्रकार पावनम् तनयम् निष्कलक एवं धार्मिक पुत्र को प्रसूय उत्पन्न करके मम विरह मेरे विरह से उत्पन्न दुख को न गगमिष्यत्ति नही विनोगी अर्थात् भूल जोगी ।

अनुवाद-पुत्री, तुम, महाकुलीन पति के प्रशसनीय गृहस्वामिनी के पद पर अधिष्ठित होकर, (और) उनके ऐश्वय के कारण महत्वशाली पार्यो से प्रतिपत काव्यस्त रहकर शीघ्र ही जैसे पूर्व दिशा जगत्पावन सूप को जन्म देती है उसी प्रकार लोक कल्यानकारी पुत्र को जन्म देकर मेरे विरह से उत्पन्न शौक को न गिनोगी अर्थात् भूल जाओगी

भावाय महर्षि क शकुन्तला को आश्वस्त करते हुये कहते है कि तुम इतनी दुखित क्यों हो रही हो, पुत्री तुम अपने महाकुलीन पनि के प्रशासास्पद महस्वामिनी के पद पर प्रतिष्ठित होगी अर्थात् महारानी बनोगी और उनके ऐवम पूर्ण महत्वशाली मोत्सवादि कार्यो मे प्रतिपल व्यस्त रहोगी। शीघ्र ही तुम उसी प्रकार निष्फल एवं धमपरायण पुत्र को जन्म दोगी जिस प्रकार पूर्व दिशा जगत्पावन सूप को उत्पन्न करती है. इस प्रकार तुम मेरे विरह से होने वाले दुख को भूल जाओगी।

विशेष प्रस्तुत पद्म मे न गगविष्यति" के स्थिता आला, आदि तीन कारणो के होने से काव्यलिङ्ग अलकार 'इ' द्वारा उपमालकार तीन कारणों के एकत्र होने से समुच्चय अलकार है। हरिणी नामक छन्द है न सम रस लागा प ये हरिणी मता ।"

संस्कृत व्याख्या--- वत्से पुत्रि शकुन्तले, त्वम अभिजनवत महाकुलीनस्य, भर्तु पयु श्लाध्ये प्रशसनी, गृहिणीपदे गृहलक्ष्मीपदे स्थिता अधिष्ठिता सती, तस्य पत्यु दुष्यन्तस्य विभर्व समृद्धिमि गुरुभि महनीये विभावगुरुभि यशोत्सवादिविशिष्टकायें प्रतिक्षणम्प्रतिपलम् आफुला व्यस्ता सतो अचिरात् शीघ्रमेव प्राची पूर्वा दिशा, पाचन-जगत्पविकारनाम, कम् सूयम्, हब, पावनम् जगत्— कल्याणविधायकम् — धनयम् पुत्रम प्रसूय उत्पाद च मम काम्यस्य विरजाम् वियोगजयाम् शुचम् गोकम, न वर्णयिष्यसिन चिन्तविष्यति विस्मरिष्यसीत्यच ।

सस्कृतसरला पतिगृह पाती t मुनि कथयति वत्से मि पतिगृह प्राप्य तत्र महाकुलोत्पन्नस्य स्वम प्रशसास्पदे गृहलक्ष्मीस्थाने असती, तस्य समृद्धिपूर्ण महनीय यज्ञोत्वादिकार्य प्रतिपल कामव्यस्ता सती, पूर्वा दिजगास्कर भास्कर जनयति सबैव त्वमपि जगद्रक्षक सुतः समुसाब मम काश्यपस्य विरहेण जातामिमाशु न चिन्तयिष्यसि मम विरहोत्पन्नमम शोक सर्वथा विस्मरिष्यसीति ।

कुन्तलेति (शकुन्तला पिता के पैरो पर गिरती है अर्थात्-वरण वन्दना करती है।

काश्यप यदिच्छामि ते तदस्तु ।

शकुन्तला ( सख्यायुपेत्य) हला, अपि मा सममेव परिव्वजेथाम् । [हला , दुवे विम सम एव्व परिस्सजह ]

सयौ (तथा कृत्वा) सखि, यदि नाम स राजा प्रत्यभिज्ञानमन्यरो भवेत्, ततस्तस्मा इदमात्मनामधेयाङ्कितमङ्गगुलीयक दर्शय । [सह, जइ णाम सो राजा पञ्चहिष्णाणमन्यरो भवे, तदो से इम अत्तणामहे अअकिम अगुली- अअ दसेहि।]

शकुन्तला - अनेन सन्देहेन वामाकम्पिताऽस्मि । [ इमिणा सदेहेण वो आकम्पिदम्हि ]  मा भैषी । अतिस्नेह पापशकी ॐनमा भागाहि । अदिसिहो पावसकी ।] शाङ्ग रव युगान्तरमारूड सविता त्वरतामत्रभवती ।

शकुन्तला - (आश्रमाभिमुखी स्थित्वा) तात कदा नु नूयस्तपोवन प्रेक्षये । [साद, कदा णु भुओं तयोवण पेक्खिस्स ।]

टिप्पणी

कातरादु खाभिभूता अभिजनवत- अभिजन्यते जनोऽस्मिथिति अभिजन वंश - अभि + न् + ञ् 'अनिवध्योश्चेति वृद्धिनिषेध' 'अभिजना वय' इत्यमर प्रशस्त अभिजन इत्यर्थं अभिजनन्दासाथ मतुप् प्रत्यय - अभिजनवान् तस्य । श्लाध्ये – बहुजनहितकारिणि अतएव प्रणसनीये प्राचोद पावन जिस प्रकार सूप स्वयं तेजस्वी जगद्धितकारी होता है उसी प्रकारी तुम्हारा पुत्र भी तेजस्वी प्रतापी एवं जगद्रक्षक होगा, यह साभिप्राय उपमा है। प्रसूप प्रमू+ क्त्वास्यप ।

पतिगृहगमनोत्सुका भी शकुन्तला के मन मे बहुविध समय तक वितर्कों एवं सकल्प-विकल्पो तथा प-विवादों का होना स्वाभाविक है लौकिक जीवन की यही यथायता है, अत ऐसी स्थिति में उसका अधीर होना लौकिक स्त्रियोचित काय है। महर्षि निवासी एवं विरागी है तथापि लौकिक होने से उन्हें इस प्रकार की स्थिति का ज्ञान है। प्रथम बार की विदाई के समय नववधू की क्या स्थिति होती है, इसे वे खूब समझते हैं, अतएव वे उसका विवाद एवं भय दूर करते हुये उसके सामने उक्त तीन तक रखकर उसे आश्वस्त करते हैं कि रुद से बिछुट कर भी वह राजभवन में चिन्तित न होगी।

काश्यप मैं तुम्हारे लिए जो चाहता हूँ, वह पूण हो ।

शकुन्तला ( सखियों के पास जाकर) सखियो, तुम दोनों एक साथ ही मुझ से गले मिली ।

दोनों सखियाँ (जैसा करके) ससी, यदि वह राजा (तुम्हे) पहचानने मे शिथिल हो तो उसे अपने ही नाम से प्रति इस अंगूठी को दिखा देना ।

कुता तुम दोनों के इस संदेश से मैं बता गई हूँ। दोनों मत डरो, अत्यधिक प्रेम अनिष्ट की आमका करता है। सार-सूब दूसरे प्रहर मे पड गया है (आप) कुकरे (आश्रम की ओर मुह किये हुये स्थित होकर) तात, अब मैं फिर कम (इस) तपोवन को देगी

टिप्पणी

यदिच्छामि वस्तुत वहाँ कहना तो यह चाहिए कि तुम जो चाहती हो यही हो, पर ऐसा न कहकर महर्षि उसकी चरणवदना के उत्तर ने कहते हैं कि जो मैं चाहता हूँ यह हो, सम्भवत इससे त्रिकालदर्शी महर्षि के मन मे यह विचार रहा होगा कि मैं इसके भविष्य को जानता हूँ पर यह नहीं जानती, इसको शाप जो वियोग दुख भोगता है, वह तो भोगना ही पडेगा, उसका इसकी इच्छामान से निराकरण नही हो सकता, यदि मैं पदिन्छसि तदस्तु कहता हूँ तो वह यह भी कह सकती है कि मैं तपोवन मे ही रहना चाहती हूँ और ऐसा ही हुआ तो शाप का प्रभाव ही न रह जायेगा, इसीलिए ये पदाभि कहत है और उसको तपोवन निवास की इच्छा के सम्बन्ध मे उसको उचित समय का निर्देश करते हैं। प्रत्यभिज्ञानम पर प्रति + अभिज्ञा + ल्युट् पहचान वस्तुत प्रत्य fwara, यह एक दानिक शब्द है, इसमें स्मति और प्रत्यक्ष दोनों का सम्मिश्रण रहता है, जैसे सोऽय देवदत्त यहाँ स स्मृति मुचक है अर्थात् दृष्ट देवदत्त, और अयम् मह प्रत्यक्षानुभव का द्योतक है अत महाँ प्रत्यभिज्ञान का अर्थ है पूर्वदुष्ट वस्तु का प्रत्यक्ष अनुभव करना, सामन त्वना यहाँ इस कथन द्वारा सखियाँ उसे अप्रत्यक्षरूप मे शाप की बात बतला रही है और उसे समझा रही है कि यदि वह तुम्हें पहचानने में कुछ आनाकानी करे तो यह अंगूठी उसे दिखा देना इस पर उसका नाम भी लिखा है। ऐसा करने पर वह जानती थी कि शाप दूर हो जायेगा और वह उसे पहचान लेगा अतिस्नेह पापशकी अति स्नेही जन अपने प्रियजन के लिए ष्ट की आशा करता है और ऐसा करना अतिस्नेह स्वाभाविक ही होता है। अतिस्नेह के कारण ही ऐसी आशका करती हैं कि राजा कही उसे भूल न जाम और उसका साधन भी बतलाती है, प्राय देखा जाता है कि जब किसी व्यक्ति का कोई प्रियजन परदेश जाता है, तब उसके कुटुम्बीजन उसके लिए अकारण ही किसी न किसी अनिष्ट की आशका करने लगते हैं, भले ही वह सुखी रहे। युगान्तरम् अन्यद युग युगान्तरम् - युग पहर, तीन पण्टे का एक प्रहर होता है। इस प्रकार रात दिन मे प्रहर होते हैं, यहाँ युगान्तर से तात्पय है कि अब सूब एक प्रहर पार कर दूसरे शहर मे पहुँच रहा है अर्थात् दुपहरी का समय हो रहा है। आ आ + + सविता सुबति प्रेरयति कर्माणि सू+तु तुम उदित होकर लोगो को कर्म मे प्रवृत्त होने की प्रेरणा देता है।

काश्यप भूयताम् चिराय चतुरन्त होसपत्नी दध्यग्तिमप्रतिरथ तनय निवेश्य । भर्चा तपितकुटुम्बभरेण सार्धं शान्ते करिष्यसि पद पुनराचमेऽस्मिन् ॥२०॥

काश्यप सुनो।

भूवेति अजय वराय चतुरतमहीसपत्नी भूत्वा अप्रतिरथम् तनयम दष्यति निवेश्य तदर्पितकुटुम्बभरेण भर्चा साधम् शाते अस्मिन् आपमे पुन पदम् करिष्यसि।

शब्दाय विराय बहुत समय तक चतुरन्तमहीसपत्नी भूत्वा बारी समुद्रो तक विस्तीर्ण पृथिवी की सपत्नी होकर मप्रतिरथम् भद्वितीय महारथी, तमयम् दोष्यन्ति अपने दुष्यन्त के पुत्र को, निवेश्य राज्य पर बिठाकर पित कुटुम्बभरे उम पर कुटुम्ब के (रक्षण) का भार समर्पित करने वाले भर्चा पति के साथ शाते अमिन् आपने इस शान्त सांसारिक काय जालो से रहित आम मे पुन पदन् करिष्यसि फिर अपना निवास स्थान बनाओगी।

अनुवादकाल तक, चारो  पृथिवी की सी होकर अद्वितीय महारथी दुष्यन्त पुत्र को राज्य पर बिठाकर उस पर कुटुम्ब का भारसमर्पित कर देने वाले पति के साथ, इस शान्त आश्रम मे पुन अपना निवास स्थान बनाओगी अर्थात् यहाँ आकर रहोगी।

भावाय शकुन्तला के "तात, कदा नु भूयस्तपोवन प्रेक्षिष्ये" इस कथन कर उत्तर देते काम्यप कहते है कि तुम बहुत समय महरानी पद पर रहकर अपने अद्वितीय महारथी दुष्यन्त पुत्र को राज्य देकर और उसी पर राज्य भार सौंप कर अपने पति ने साथ पुन इस तपोवन में आकर रहोगी।

विशेष प्रस्तुत पद्म में सपत्नी शब्द से पृथिवी पर पत्नीत्व का आरोप व्यज्जित होने से यहाँ वस्तु से रूपकालकार ध्वनि है पृथिवी पर सपत्नीत्व का आरोप, फिर उस पर पुत्र का सन्निवेश और फिर उस पर भी मार का निवेश बतलाया गया है अत मालावीपक अलकार है। "त मालादीपक पुन, धर्मिणा मेक धर्मेण सम्बध पद योत्तरम्" वसन्ततिलका नामक छन्द है।

संस्कृत व्याख्या चिराय बहुकाल यावत् चत्वार समुद्रा अन्ता प्रान्ता यस्या तादृश्या मह्या सपत्नीपतुरन्तमही सपत्नी समग्रपृथिवीसमान का मृत्वा न विद्यते प्रतिरव प्रतिद्वन्द्वी यस्य तम् अप्रतिरथम् — अद्वितीयवीरम् दोष्यन्तिम्- [- दुष्यन्तपुत्रम् तनगम्सुतम्, निवेश्य राज्ये प्रतिष्ठाप्य तस्मिन् अर्पित व्यस्त कुटुम्बस्य वधुवयस्य पर भार येन तेन तदर्पितकुटुम्बभरेण भर्मा, पत्या स्वामिना वा साधम् सह शान्ते निरुपद्रवे पवित्रे च अस्मिन् आश्रमे-एव- स्मिन् तपोवने पुनभूय पदम् स्थानम् करिष्यसि विधास्यति ।

गौतमी जाते, परिहीयते गमनवेला । निवर्तय पितरम् । अथवा चिरेणापि पुन पुनरेव मन्त्रयिष्यते । निवर्तता भवान्। [जाये, परिही अदि गणवेला । वितेहि पिर अवा विरेण वि पुणो पुणो एसा एव्व मन्त-

इस्सदि । निवत्तदु भव ।] काश्यप वत्से, उपरुध्यते तपोऽनुष्ठानम् ।

शकुन्तला (भूम पितरमाश्लिय) तपश्चरणपोडित तातशरीरम् । सम्माऽतिमात्र मम कृत उत्कण्ठस्य [तवश्चरणपीडिद तादसरीर ता मा अदिमेत मम किदे उक्कण्ठस्स ।]

सस्कृत सरनाथ ताठ, कदा नु भूयस्तपोवन प्रेक्षिष्ये" इति शकुन्तला वाक्य माण्य काम्यो मुनिस्ता कथयति बरसे बहुकाल यावद आसमुद क्षितीमस्य दुष्यन्तस्य गृहलक्ष्मीपद मधिष्ठाय अद्वितीयवीर दुष्यतनय राज्ये प्रतिष्ठाप्य, भारसमप्य भर्त्रा सह शातेऽस्मिन् तपोवने निवास करिष्यति ।

टिप्पणी

चिराय यह अव्यय है, इसी अर्थ मे चिरेण चिरात् चिरम् चिरस्य नादि शब्द भी प्रयुक्त होते हैं, जोकि इस बात की पुष्टि करते है कि अव्यय भी पहले साधारण शब्दो के ही समान थे और इनके भी सभी विभक्तियों में रूप चलते थे। चरन्तमहीसपत्नी— चारो समुद्र  चारो दिवन्त जिसकी सीमा है ऐसी पृथिवी की सपत्नी सपत्नी इसलिये कि राजा पृथिवीपति कहलाता है, अप्रतिरथम्- प्रतिगत रम यस्य स प्रतिरय प्रतिदी- विपक्षी न विद्यते प्रतिरथ यस्य तम् अप्रतिरथ दौष्यन्ति दुष्यन्तस्य पुत्र दौष्यतस्तम्- दुष्यन्त मन्दात् अत इति इन् प्रत्यये बढी दुध्यतपुत्र अब तक यह हुआ ही नहीं था। अतएव उसका नाम अज्ञात था निवेश्य नि+विरा+पि+ क्त्याय इसका अर्थ राज्य पर बिठाकर और विवाह कर दोनो ही होते है, पहा इस श्लोक में दोनों ही अर्थों मे निवेश्य का प्रयोग है। इस निवेश्य कुशावत्याम्" रमय भवेश्य चतुरोऽपि तत्र स" रघुवश, प्रथम से राज्य पर बिठाकर द्वितीय में विवाह करके अर्थ है। सत- कुटुम्बमरेण प्राचीन काल मे राजा वृद्धावस्था में तपावन में जाकर तपस्वी का जीवन व्यतीत करते थे जैसाकि मनु का वचन है- "गृहस्थस्तु यदा पश्येद् वली पतितमारमन अपत्यस्यैव चापत्य तदारण्य समाधयेद सत्यज्य ग्राम्य माहार सर्वचैव परिच्छदम्। पुत्रेषु भाय निक्षिप्य वन गच्छेत्सवा" प्रस्तुत पद्म मे भारतीय आश्रम व्यवस्था की ओर संकेत किया गया है।

गौतमीपुत्री, प्रस्थान का समय बीतता जा रहा है। अपने पिता को लौटा। अथवा यह तो चिरकाल तक बार-बार ऐसा ही कहती रहेगी (अत) आप लौट जाइये।

काश्यप पुजी, मेरा तप का अनुष्ठान एक रहा है (अब मुझे जाने दो) ।

-काश्यप (सनिवासम् )

यति मम शोक कप न वत्से त्वया रचितपूर्वम् । उटजद्वारविरूद्ध नीवारवलि विलोकयत ॥२१॥ 7

गन्छ। शिवास्ते पन्थान सन्तु

(निष्कान्त शकुन्तला सहपाविनश्च ।)

शकुंतला (पुन पिता सकर) आपका शरीर तपस्या से हम है, अन आप मेरे लिए बहुत हा

काश्यप (लम्बी नाम लकर)

शममिति अवधारतिर उटजद्वारविश्य नीवारवलिम्

शम्याय चलो पुत्री वा पुम्हारे द्वारा रचित ( पूजा के रूप में) पहले डाले गए और अब उटजद्वारविरुशोपडी के द्वार पर उगे हुये, नीवार- यति नीवारवति (उपहार) को देखते हुये नमो मेरा शोक, कब नु समम् एष्यति कैसे?

अनुवाद-पुत्री तुम्हारे द्वारा (पूजा के रूप में) पहले गये और अब झोपडी के द्वार पर उसे पनीरको (बनि उपहार) देखते हुए मेरा शोक किस प्रकार शान्त हो सकेगा

भावार्थ- काश्यप मुनि करते हैं कि पुत्री का तुमने बलि के रूप में मीवार- धान्यो को झोपडी के द्वार पर डाला था वे अब उ आये है, उन्हें देखता हुआ मैं तुम्हे कैसे मूल सनूगा और अपने शोक को कैसे शान्त कर सकूगा।

विशेष प्रस्तुत पद्य में शोक दूर न होने का कारण नौवारवलि का विलोकन बतलाया गया है, अत महा पदार्थ हेतु काव्यलिङ्ग लकार है, आर्या जाति छन्द है ।

संस्कृत व्यापा-त्से पुत्रि स्वया कुतनया, पूर्व रचितम् इति रचितसूत्रम् == प्रामुपकल्पितम् उदस्य पणालामा द्वारे विरम् अकुरितम् --- उद्वारविवम् नौबाणा यतिन्तगु नीवारवलिनीवारधा योपरत्नभूतधनिम् विलोकपत प्रेक्षमाणस्य, मम, काश्यपस्य, शाक द्वयविपार कम् केन प्रकारेण थमम् शान्तिम, एप्यति गमिष्यति दूरी भविष्यतीत्य ।

काश्यप मुनि कययति पुनि त्वया यत् भूताद्दिश्य नौवारधान्यानि पणशालाया द्वारे विक्षिप्तानि तापधुना जलससगमवाप्य अब फुरितानि सति तानि प्रतिदिन द्वारेऽवलोकयत मम शोक कप दूर मपयास्यति तान्यवलोकयतो मम स्मृतिपय त्वप्रतिक्षण मायात्पत्ति अत कथ मह त्वा विस्मरिष्यामि ?

टिप्पणी

परि परि + हा+कर्मकतरि लट उपवध्यते—उप + वधू+कर्म  - ( शकुन्तला विलोक्य) हा धिक्, हा धिक्। अन्तहिता शकु तला वनराज्या [हद्धी, हदो । अन्तलिहिदा सउन्दला वणराईए।] कात्रप ( सनि श्वासम् ) अनसूये, गतवती वा सहचारिणी । निगृह्य

शोकमनुगच्छ मा प्रस्थितम् ।

उमे तात शकुन्तलाविरहित शून्यमिव तपोवन कथ प्रविशाव [ताद, सउन्दलाविरहिद सुण्ण विभ तवोषण कह पविसामो ।] काश्यप स्नेहप्रवृत्तिरेवदर्शिनी । (सविमर्श परिक्रम्य )

हन्त भो शकुन्तला पतिकुल विसृज्य लग्धमिदानीं स्वास्थ्यम् ।

कुत

वाच्ये लट इससे स्पष्ट है कि मुनि, शकुन्तला के प्रति अत्यधिक स्नेह रखते हुये भी, और करण से द्रवित होते हुये भी अपनी तपस्या में किसी प्रकार का अवरोध नहीं होने देना चाहते थे। तपश्चरणपीडित तातशरीरम् इससे कुतला का ऋषि के प्रति प्रेम प्रकट होता है, यह उसे अपने कारण किसी भी प्रकार दुसित नहीं होने देना चाहती थी। रवितपूर्वमपूत्र रचितमिति रमितपूरम सुप्युपेति समास भूतपूर्वडिति निर्देशात्वस्य पर प्रयोग ।

विवयम् कुरित वक्त नोवारवतिम वश्विद अथवा भूतबलि के उद्देश्य से अर्पित किये गये नीवारधाय शमम् एष्यति गात होगा। वस्तुन यह कथन जितना सामयिक एवं जनोचित वातावरण के अनुकूल है उतना ही इसने भाषा और भाव सौन्दय भी है। सम्पूर्ण श्लोक करणाप्नाति है, ऋषि कहते हैं कि अकुरित तणधाय को जब-जब पणाला से निकलता हुआ और भीतर जाना हुआ मैं देखूंगा तब तब तेरा स्मरण मुझे फोक सतप्त करता रहेगा अत यह कैसे सम्भव है कि मैं तुम्हारे लिए उत्कण्ठित न हो। करुण रस की इतनी गम्भीर अभिव्यक्ति अन्यत्र मिलना कठिन है, कवि ने मानी ऋषि के हृदय में प्रवेश कर जो कारणिक अनुभूति प्राप्त की थी उसे ही उसने तयनुकूल भाया और भावो म यहाँ किया है।

गच्छेति अपने करुणावित हृदय को दबाकर, नियति की अपरिहायता से विवश होकर अन्त में वे प्राकुन्तला से कहते है, जाओ, तुम्हारा माग कल्याणकारी हो। (कुन्ता और उसके साथ जाने वाले गाङ्ग रव आदि का प्रस्थान ) दोनों सखिया (कुतता को देखकर) हा, हा, शकुनक्ति में (आखो से ओझल हो गई।

काश्यप ( लम्बी सास लेकर अनसूया, तुम लोगो की सभी बली गई. अब मैं चल रहा हूँ, तुम लोग अपने शोक को दबाकर मेरे पीछे आओ। दोनों तात कुतता से रहित इस नूने से तपोवन में हम

प्रवेश करें।

अर्थी हि कन्या परकीय एव तामच सप्रेष्य परिग्रहीतु जातो ममाय विवाद प्रकाम प्रत्यपितन्यास इवान्तरात्मा ॥

॥ (इति निष्क्रान्ता सर्वे) इति चतु

काश्यप प्रेम सचार इस प्रकार दिखाता है, अर्थात् यह प्रेम की ऐसी ही ति हाती जससे सभी पाच मून से दिखलाई पडन लगते हैं। प्रियजन से रहित स्थान, सब कुछ रहते हुये भी सूना सा जान पड़ने लगता है (विचार पूरक चारो ओर घूमकर) आह, शकुन्तला को पतिगृह भेज कर मुझे आज मानसिक शान्ति प्राप्त हुई है। क्योंकि

अथ इति अन्वय कन्या हि परकीय एवं अप, अब ताम परिवही समेष्य मम अयम् अन्तरात्मा प्रत्यर्पित यास इव प्रकामम् विशद जात

शब्दाच या हि कथा वस्तुत, परकीय एव अपराया (दूसरे का ) ही है (अ) अथ आज, ताम्-उसको, परिग्रहीतु उसके पति के पान सप्रेष्य भेजकर मम अयम् अन्तरात्मा मेरा यह अतमन, प्रत्यर्पितम्यास किसी की धरोहर वापस कर देने वाले व्यक्ति के समान प्रकामम् अत्यन्त विवाद स्वच्छ एवं प्रसन्न जातहो गया है।

अनुवादकथा वस्तुत दूसरे को मम्पत्ति ही होती है, आज उन कया को ( उसके पति के पास भेजकर मेरा यह अमन उसी प्रकार अत्यन्त स्वच्छ एवं प्रसन्न हो गया है जैसे कि किसी की धरोधर को मासकर्ता को लौटा देने वाले व्यक्ति का मन हो जाता है।

भावाय कन्या वस्तृत परकीय सम्पत्ति ही होती है, उसे कन्या का  सुरक्षित रखता है और समय जाने पर उसे उसके अधिकारी को उसी प्रकार लौटा देता है जिस प्रकार किसी यातकर्ता की धरोधर कोई व्यक्ति अपने पास सुरक्षित रख कर मागने पर उसे लौटा देता है, इस पास की सुरक्षा करने से कष्ट और चिता अवश्य होती है पर यथा समय उसे याम कर्ता को लौटा देने पर उस का मन बडा प्रसन्न एवं स्वच्छ हो जाता है। आज परकीय धन रूप अपनी काया शकुन्तला को उसने परि होता दुप्पा के पास भेजकर मर का भी मन उतना ही प्रसन्न और स्वच्छ हो गया है।

विशेष प्रस्तुत पद्य में 'व' द्वारा उकार है और दवा छन्द है "स्याचिन्द्रा यदि गाव" ।

संस्कृत व्यापारया दुता हि वस्तुत परकीय एव = अन्यस्य = जनस्य एवं जयचनम् (भवति) जया कन्या कुलान् परिग्रही परिणेतु समीपे सप्रेच्य विसृज्य प्रत्यर्पित प्रतिदत पास निक्षेप पेन स प्रत्यपिन्यास व ममाश्यपस्, अयम्-ए अन्तरात्मा अतमन प्रकामम्- अत्यधिक विशद निमल वा जात सम्पन्न ।

सस्कृत सरलाय कन्या वस्तुत परकीया सम्पत्ति रेव भवति चाहता कन्या शकुन्तला तस्या पत्यु दुष्यन्तस्य पार्श्वे विसृज्य तथैव प्रसन्नोऽस्मि यथा करिय ज्जन न्यासीकृत वस्तु प्रतिदाय प्रसन्नो भवति ।

अन्तहिता-अतर + धा धा हि आदेश पेटो को ओट महो जाने से आँखो से बोल हो गई है। सहचारिणी यह चरतीति महचारिणी - सह + र् + ताच्छील्यै गिनि निगृह्यनि ग्रह क्त्या स्नेहप्रवृत्ति स्नेहस्य प्रवृति प्रेम का प्रवाह या सवार एववशिनी एवं दशयतीत्य एवं दृश् + मिच् ताच्छील्ये णिनि दीपू, इस प्रकार दिलाने वाली हन्त सूचक अव्यय परिग्रहीतुपरिग्रह+ तू षष्ठ्येक वचन, विवाह के समय पति कया का हाथ पकड़कर अति परिक्रमा करता है अतएव वह परिग्रहीता कहा जाता है. इसी अथ में परिता का भी प्रयोग होता है। प्रत्यर्पित यास प्रत्यर्पित प्रतियत पास निक्षेप येन स प्रति + ऋ + न्यते इति यास नि + बस + धत्र कमणि। विशद- स्वच्छ भारमुक्त प्रसन्न ।

यथ पथमोऽङ्कः

(तत प्रविशत्यासनस्थो राजा विदूषकश्च ।) विदूषक (कर्ण ear) भो वयस्य, संगीतशालान्तरेऽवधान देहि । कलविशुद्धाया गोते स्वरसयोग भूपते जाने तत्रभवतो हसपदिका वर्णपरिचय करोति । [ भो अस्म, तसानन्तरे अवधाण देहि कलविमुढा गोदीए सरसजोओ नूणीअदि । जाणे तमहोदी हसवदिना यणपरिअन करेदिति ॥]

राजा तुष्णी भव यावदारुणयामि । (आकाशे गीयते ।) अभिनव भवस्तथा परिध यूतमञ्जरीम् । कमल वसतिमानि तो मधुकर विस्मृतोऽस्येना रूपम् ||१|| [अहिणवलोलुवो भव तह परिचुविज श्रमजरि । कमलसमेतदिदो महुअर । विम्हरियो सि ण कह ॥]

अथ पञ्चमा

(तवनतर आसन पर बैठे हुये राजा और विपक का प्रवे

विदूक (कान लगाकर ) हे मित्र गीता के भीतर ध्यान दो अस्पष्ट मधुर तथा शुद्ध गीति की स्वरयाजना सुनाई पड़ रही है। ममता हूँ कि पूजनीया सपादिका स्वरसाधना कर रही है।

राजा चुप हो जाओ तोमे गुनू

( आकाया में गाया जा रहा ह अभिनवेति-अन्वय-- मधुकर अभिनयधुलो भवाम् नमज्जरी तथा 1 परि कतिमानिवृत एताम् कम विस्मृत अि

शब्दामधुकर भ्रमर, बिनदमलो नूनन पुष्प रंग के लिए लालायित भाआप भूतमञ्जरीम् आम्र की मरी की तथा उस प्रकार परिचुम्परिचुम्बन करके रसास्वादन करके, कमलवसतिमात्रनिवृत कमल पर रहने मात्र से ही सदुष्ट होकर एनाम् कम विस्मृत असिइसको कैसे भूल गये हो।

अनुवाद अमर नूतन पुष्पपराग के ( रसास्वाद) के लिए (सपा) लालायित रहने वाले) पापा की नजरी का उस प्रकार रसास्वादन कर ( और अब कमल पुष्प पर निवास मात्र से सतुष्ट होकर इम (आश्रमरी) को कैसे भूल गये हो।

ware सपदिका के इस गीति द्वारा भ्रमरवत्ति राजा के लिए एक तीखी व्यग्योक्ति है। सपदिका राजा को एक रानी का नाम है, जोकि एकवार ही उपभुक्ता होने के बाद उपेक्षित कर दी गई है। ठी उसी प्रकार जैसे कुलको एकवार उपभाग कर राजा उसे भूल गया था, यहा मरी पदमपत्रिका एवं मला दोनो ही आरकेत करता है, इसी प्रस्तु का 'कमन' शब्द भी, राजा की पट्टराशी अर्थात् महारानी वसुमती का सरत करता है गतिमान का जन है सावन मान से निवृत शेर नाम पद पाएको लिए है क्या राजानो न गया या नाटकीय व पद जति महत्वपूर्ण है। भ्रमर पाय कम पुल पराग रा इच्छुक होता है, फिर भी ना स्वनाववश अन्य पुप्पो व या के लिए रहता है, केवल कमल रंग से ही मनुष्ट नहीं रहना पर जब उसे अप पुण्य करन नहीं मिल पाता तब वह पुन उसी उपयुक्त कमल के पास आ जाता है। प्रस्तुत गीति द्वारा हसपदिका अमर में कहती है वि तुम सदा नवीन पुणों के करने के लिए लालायित रहते हो कभी एवं पुण्य रस में संतुष्ट नहीं होते, तुमन एक बार माम्वादन कर फिर उसे भुला दिया और फिर उपभुक्त व परागरहिन भी दस कमल पर केंवर रहन मान से सतुष्ट हो गये हो। राजा भी अमर के समान ही केवल रानी में हो तुष्ट रहने माना नहीं है, अतएव यह भी आश्रम रूप सपदिवा एवं कुता का एकवार रंगास्वादन कर भूल गया है और अब न ही अपनी सक्या उपक्ता न वसुमती के साथ रहन मान तुष्ट है।

इस प्रकार प्रस्तुत नाक में जब गाम्भीय के साथ साथ उच्चकादि पा कौन भी है। राजा के चरित्र टि भी यह महत्वपूर्ण है। वि नेहा की स्मृति विमान लिये और गाय के प्रभावकादियाने के लिये इस नोक को बिना भाव सौ दय की दृष्टि से पर उसम है। पदिका राजा की एक उपक्षिता रानी है यह इमे गया है। असे कुठला का और पुन जपतपुर की निगाह

प्रक्लाम अथरवक्त्र नामक छद है। यहाँ निम्ति नामक ग का अग है "रहस्यासाय मेव शिप्ति म्याद सा ददरूप के अनुमार यहा आक्षेप नामक गभग है "मी समुदादाने परिपीति"। ततीय पत्तास्थान भी है "पक्षेपक यनु लीन सविनय निवेदन प्रत्युतरोपेन ततीयमिदमुच्यते" सा० द० हेतु और अनुप्रास अलकार है।

संस्कृत व्यापा मधुकर भ्रमर अभिनवे नूतने मधुनि पुष्परस ला अभिनवमधुलो भयात् पूतस्य वक्षस्मतामू जरी तेन प्रकारण मस्नेह मित्यम परियरसाम्वादन विधाय कमले पद्मं वसति निवास तत्मात्रेण निबृत सन्तुष्ट कमलवसतिमात्रनिवृत ७५

सन् एनाम् पुनवरीम् (हसपदिकाम् शकुन्तनाम् वा) रूप केन प्रकारेण, विस्मृत असि न स्मरण करोषि ।

संस्कृत सरलाथ इसपदिका कथयति अमरत्वम नूतनपुष्परसास्वा दाभिलाषी अमि, अतएव त्वं पूर्व सहकारकालिका परिय्य अनुनाद्यनिवा मात्रेण सन्तुष्टो भूत्वा आश्रम मिया न स्मरसि ।

टिप्पणी

आसनस्थ आसन तिष्ठतीति आस्था + आगतस्वागतस्य का प्रतिगति के साथ प्रयाग सम्भव नहीं है बैठा हुआ प्रवेश नहीं कर मरना, पर वहाँ इसे नाटकीय रंगनिर्देशन में त्रुटि नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'प्रविशति' यह का पारिभाषिक शब्द है जो कि समय पर पात्र की उपस्थिति मात्र का सूचक होता है प्रवेश पद का सामान्य अथ पहा महीत नहीं है, यह केवल इसका इतना अथ है कि जब राजा और विदूषक दशका के टिम जान है इसलिये इनका अप किया गया है राजा और विद्रूपक का प्रवेश अर्थात् अब अमनस्य राजा और विदूषक रंगमन्च पर दिखाई पड़ते है गोताला इससे ज्ञात होता है कालिदास के समय राजप्रामादो मे एक गीतमा भी हानी जहा संगीत का अस्पात विमानम अब +बा+ युट्यान । कमर पर अस्पष्ट अनि कहनाती है तो तु मथुरा- स्कुटे" इत्यमर विशुद्ध हा अय निर्दोष भी है, पर यहाँ यह संगीत शास्त्र के पारिभाषिक राज्य के रूप में प्रयुक्त हुआ है गौतम पर गुद्धामा भित्रा गौडा निवेसरासरी विशुद्धा स्वावलम्व वीरनार इस गीति के पास भेदो मे से विद्या नामक गीति का यहा प्रयोग है जिगन सरल एवं जल स्वर होते है। संगीत म गीत बाय एवं नृत्य नीनो ही सम्मिलित रहन है "गीत वाद्य नृत्य च जय संगीत मुच्यते" संगीत ग्लायर कता बानो विशुद्धा च तस्या कलविशुद्धाय । स्वर सयोग स्वरों का मजवरी का मिलाना या आमा । स्वरसान होते है पहन भगा बार मध्यम और निषाद रही के प्रमाण को लेकर स र म प ध, निमित है। वण परिचयम्-वण का अ अक्षर भी है और संगीत स्वर भी है महागोर से है गायन व स चतुर्धा निपितवाराही सवारी बेनि"-- स्थायी भाराही बयरोही जार सवारी नराम मी मी को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा गया है स्वीकारी समारोह वरोहण वगात्वादेव का अथ है कि हसपदिका रे ग म आदि मगीतस्वरो का भोजन गीत क्रमानुसार कर रही थी। अब मधु हिलो भूप धातु से यह प्रत्यय करने पर लोलुप बनेगा इससे पुन भी या लालायित अभिनव मन्मधु तस्य तत्र वा [लोलुप परिम्य रसास्वादन पा

राजा अहो, रागपरिवाहिणी गीति । fagun कि तावद् गीत्या अवगतोऽक्षराथ:

[कि दाव गोदीए अवगओ अक्खरस्यो ।]

राजा- स्मित कृत्वा) सकृत्कृतप्रणयोऽय जन । तदस्या देवी वसुमती- मन्तरेण महदुपालम्भन गतोऽस्मि ससे माधव्य, मद्वचनादुच्यता हसपदिका निपुणमुपालब्धोऽस्मीति ।

भाज्ञापयति (उत्थाय) भो वयस्य, गृहीतस्य तथा परकीये के ताड्यमानस्याप्सरसा वीतरागस्येव नास्तीदानी मे मोक्ष । [ज भव आणवेदि भो वजस्म, गहीदस्स ताए परकीएहि त्यहि सिड ताोगमाणम्स अस्यगए वोदराम्स विञ नत्यि दाणि म मोक्खो ।]

राजा गच्छ नागरिकस्वा सज्ञापयताम् ।

विदूषक का गति [का गई ।] (इति निष्क्रान्त ।)

सम्भोग करके मतिमाननिय तहमने या वसति स एवेति कमल- यतिमात्र तेन नि विस्तृत निरम तरि वर्तमान में राजा ओह, कैमा अनुराग की धारा को प्रवाहित करने वाला संगीन है । आपने नीति का अक्षराम (यस्याय नमः

लिया है?

राजा - ( मुस्करा कर ) यह व्यक्ति अर्थात् मपदिका मे मन केवल एक बार ही प्रणाम किया है ( और अब म महारानी वसुमती सप्रेम करने लगा हूँ) तय इसने देवी मतीको लक्ष्य बनाकर मुझे बहुत बडा उपालम्भ उलाहना या ताना) दिया है। मित्र मान्य मेरी ओर से इसपदिका से कह दो कि तुमने मुझे बही निपुणता से उपालम्भ दिया है।

विदूषक जो महाराज की आशा (उठकर ) हे मित्र जैन किसी अप्सरा द्वारा कहा गया का विरक्त  नही पाता है और उसे मुक्ति नही मिल पाती, उसी प्रकार उसके द्वारा (सेविका आदि के दूसरे के हाथो द्वारा पाये गये (और) चोटी पकड़ कर पिटवाये गये मुझ प्रेमरहित विदूषक को अ मुक्ति (छुटकारा) न मिल सकेगी।

राजाजानो और शिष्ट हा कुशल व्यवहार द्वारा उसे समझा देना । विदूषक और (अब) क्या उपाय है।

(यह कह कर प्रस्थान ) टिप्पणी अनुरागपरिवाहिणी राग परिवहनीति रागपरिवाहिणी राग शब्द का अर्थ अनुराग और राग रागिनी भी होता है, अतः यहाँ 'अनुराग' का

राजा - (आत्मगतम्) कि नु खलु गीतार्थमाकपष्टजनविरहाचलेऽपि

अथवा

उम्पाणि वीक्ष्य मधुराश्च निशम्य शब्दान्

पर्युत्सुको भवति यत्सुखितोऽपि जन्तु ।

तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्व

भावस्थिराणि (इति पर्याकुलस्तिष्ठति ।)

जननान्तरसौहृदानि ॥२॥

प्रवाहित करने वाली अथवा रागिनियों के प्रवाहवाली अक्षराय गीति के प्रत्येक शब्द के प्रत्येक अक्षर का अथ वस्तुत यहा तात्पय स्थान से है। सकृत्कृतप्रणय- सकृत् कृत प्रणय यस्मिन् स जिससे एक ही बार प्रणय किया गया है। प्र+नी+ अच् प्रत्यय वसुमती मतरेण अतरेणयोगे वसुमतीमित्यन द्वितीया अन्तरेण- लक्ष्य करके । देवीम् कृताभिषेका महारानी उपालम्भनम् उप + आ + लभ् अथ उपासम्म उलाहना होता है। उपाय + परकीय दूसरे सेविका आदि के गृहीतस्य मनोरनाथ पकड लिये जाने पर वीतरागस्य- बीत व्यपगत राग सामारिकानुरागमस्य तस्य विरागिण अप्सरसा यद्यपि अार शब्द स्त्रीलिङ्ग एवं नित्य बहुवचनात है तथापि कवि ने यहाँ इसका प्रयोग एक वचन मे किया है। तपस्वी विश्वामित्र को भी मेनका अप्सरा ने इसी प्रकार पकड़ा था विदूषक के पक्ष मे मीतराग का अब प्रेमशून्य है मोक्ष का अय वीतराम सन्यासी के पक्ष में मुक्ति है और विदूषक के पक्ष मे छुटकारा पाना है। नागरिक- वृत्ति पतुरता पूर्ण व्यवहार, जब जैसा अवसर हो उसी के अनुकूल व्यवहार करना, विदूषक इस बात में निपुण होते है का यति क्या नारा है यदि जाना ही होगा, बचने का कोई उपाय नहीं।

राजा - ( मन ही मन ) यह क्या कारण है कि मैं गीत के भाव को सुनकर प्रियजन के वियोग के बिना भी अत्व लिन्न हो रहा अथवा ऐसा भी होना सम्भव है क्योकि-

रम्याणीत अवय- रम्याणि वाक्य, मधुरान् शब्दान् निम्न सुखित a जयतु भवनिन् नूनम भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि जोधपूर्वम् भेतसा स्मरति ।

शब्दाच रम्याणि मनोहर वस्तुओं को वीक्ष्य देखकर मधुरा दा निशम्य च और मधुर शब्दो को सुनकर, सुचित अपितु प्रसन्नचित न भी, यत्पत्सुक भवति जो उत्कण्ठितया हो उठता है तो नूनम् निश्चय ही (वह भावस्राणि सरकार रूप मे बतमान जननान्तरसौहृदानि =

पूर्वजन्मों के प्रेम व्यवहारों को अवोधपूरम्ठीक-ठीक जाने बिना ही चेतसा स्मरति अपने मन से, स्मरण करता है।

अनुवाद सुनीहर पदार्थों को देखकर और मधुर शब्दों को सुनकर प्रसन भी जन, जोकि (सहसा ) उत्कण्ठित हो उठता है, तो अवश्य ही (यह) सस्कार रूप में दृढ विद्यमान पूर्वजो के प्रेम व्यवहारी को बिना ठीक ठीक समझे हुये ही, अपने मन से स्मरण करता है

भावाय गीता को समझकर सहसा उत्कण्ठित हुआ राजा सोचता है कि किन्ही रमणीक वस्तुओं को देखकर अथवा मधुर शब्द को सुनकर प्रियवियोगादि चिताओं के रहित अतएव सवथा प्रसन्नचित मनुष्य भी यदि सहसा उत्कण्ठित पा नि हो उठता है, तो यह निश्चय है कि वह मनुष्य अपने संस्कार रूप मे स्थिर, अपने पूर्व जन्म मे किये गये प्रेम व्यवहारो को बिना ठीक ठीक समझे हुये भी अपने मन से स्मरण कर रहा है। यदि प्रत्यक्षत मनुष्य को किसी वियोगादि कारण के न होते हुये भी सिता सहसा होने लगती है तो इसमे यही समझना चाहिये कि वह अपने पूज के प्रेम व्यवहारो को मन से स्मरण करता है और इसीलिये यह विशुब्ध होता है, दुख प्रत्यक्ष कारणों से भी होता है और स्मृति जन्य कारणो से भी।

विशेष प्रस्तुत पद्य में पूर्वाधगत विशेषाय के द्वारा उत्तरागत सामान्याय का समथन किया गया है मत अप्रस्तुत प्रशसासकार, पूर्वाध के कथन मे उत्तराध कारण है, अत काव्यलिङ्ग अलकार, बोध रूप कारण के अभाव मे भी स्मरण रूप काय का होना बतलाया गया है वत विभावना अलकार, नूनम से उत्प्रेक्षालकार, अनुप्रास, प्रसादगुण, वैदर्भी रीति है वसन्ततिलका नामना छद है।

संस्कृत व्याख्या रम्याणि चन्द्रोद्यानादिमनोहरवस्तुजातानि वीषय अवलोक्य मधुरानुभूतिखकरान् प्रियान् शब्दाद-आलापान् गीतिशब्दान् वा निगम्य आकल्प, सुलित इष्टजनविरहाद्यभावजनितसुख अपि जन्तु प्राणी, यद्यस्मात् कारणात् पर्युत्सुक भवति उत्कण्ठित विशुब्ध ो वा जायते तत्तस्मात् कारणात् (स) नूनम् अवश्यमेव भावस्थिराणिभावै सम्हा स्थिराणि दृढere frद्यमानानि वासनावसाद] दृढमवस्थितानि जगत् जनन जननातरम तस्य सौहृदानि जनता तरसौहृदानि पूर्वज मानुभूतप्रणयादिसम्बन्ध विशेषान् बोध पूर्व यथा स्यात्तथा बोधपूर्व न बोधपूर्वम् अनोधपूर्वम् विषय विशेषस्याज्ञानपुर सरम् चेतसा मनमा स्मरति ध्यायनि =

संस्कृत सरलार्थ यतो हि प्राणित चन्द्रोदयोद्यानादिमनोहर वस्तु जातान्यवलोक्य श्रुतिसुखकरान् प्रियान् शब्दान् गौताविक माकप, प्रणयिजनवियोगाभावत्याद् सवमा सुखिता भूत्वापि सहसैव समुत्कण्ठिता विक्षुब्धचित्ता वा जायते अनेन जायते पत्तेश्यमेव स्वचेतोभ कमान्तरानुभूतप्रणयादिव्यवहारान् ये खलु वासनावलास-

पञ्चमा
७६
हृदयेषु मवस्थिता भवन्ति विषयविशेषस्याज्ञानपुर सरम स्मृति प्रापयन्ति अतएव प्रसन्ना अपि ते विक्षुधा भवति ।
टिप्पणी
इष्टजनविरहादतेऽपि प्रियजन के वियोग के बिना भी राजा के इस कथन से प्रतीत होता है कि वह शापवश यद्यपि शकुन्तला को भूल गया था तथापि उसका सस्कार उनके हृदय में विद्यमान या जिसे मानायलात् स्मरण कर वह वियोग के अनुभव मे उत्कंठित हो रहा था। रम्याणि बीयरमत् रम्याणि वि + ई-पत्वा पप-बीक्य। वस्तुत – रम्याणि यह विशेषणवाची पद है, अत इसके लिये रूपाणि वस्तुनि आदि किसी विशेष पद का उपादान किया जाना चाहिये था परतुवामन के इस कथन के अनुसार "विशेषणमात्रप्रयोगो विशेष्यप्रतिपत्त पान नही किया है जैसा कि उसने मधुरा में किया है, इस दृष्टि ast seene नहीं है। पर्युत्सुक भवति कही पर पकी यह चिपत्ययान्त भी प्रयोग है पर प्रस्तुत प्रसन में यह अच्छा नहीं लगता, दुष्यन्त मे औत्सुक्य पहले ही जागत हो चुका था। इष्ट वस्तुवियोग से औत्सुक्य उत्पन्न होता है "कालाक्षमत्व- सौत्सुक्य मिष्टवस्तुविगत तदशनादरम्ययस्तुदिक्षादेव" चेतसा स्मरति- वस्तु न मन की वृत्तिया वातावरण पाकर जागृत हो उठती है जैसा कि मनोविज्ञान का सिद्ध है, अत स्मरण मन से ही होता है, पर कवि ने चेतना का प्रयोगकर सम्भवत यह सूचित किया है कि मनुष्य के न चाहते हुये भी उनका चित्त स्मरण करता है अर्थात् तस्य चितमेव न तु स स्मरति । अतएव अयोधव कहना भी संगत होता है व्यक्ति नहीं जान पाता कि दिल क्यो उत्कण्ठित हो रहा है। भावस्थिराणि- सिद्धान्तत मनुष्य जो कुछ देवता या सुनता है, वह सूक्ष्म सस्कारों के रूप में उसकी आमा मे पता रहता है, अनुकूल वातावरण पाकर मनुष्य जब कभी उस अतीत का स्मरण करता है तब से सस्कार उद्बुद्ध हो जाते हैं और उसे अतीत की बातो का शान हो जाता है, भावस्पराणि का यहाँ यही तात्यय है भाव अर्थात् सत्कार । जननान्तरसौदानि अन्यत् जनन जननान्तरम मयूरव्यकादित्वात् समास तस्य सौहृदानि सौहाद और सौहद दोनों का एक ही अर्थ है कवियों ने दोनों का ही प्रयोग भी किया है। हृदय के अप मे हृदय और हृद दो दो का प्रयोग होता है। जब for अथ मे हृत शब्द का प्रयोग होता है तब सुहृद भाव इस अम मे सुहृदय को अणु प्रत्यय करने पर हृद आदेश एवं आदि स्वर को वृद्धि होकर सौहृद बनता है इसके लाक्षणिक होने से उभयपद वृद्धि नहीं होती और जय स्वतन्त्र हृद शब्द से अणु प्रत्यय होता है तब उभयपद वृद्धि होकर सौहाद बनता है। पूवम् विषय को ठीक-ठीक जाने बिना ही कालिदास ने रघुवश मे भी इसी भाव को प्रगट किया है "मनो हि जन्मान्तरसगतिज्ञम तथा सस्कारा प्राक्तना दव" ।
इतीति ( यह सोचकर खिन्न हो जाता है)
(तत प्रविशति कचुकी ।)

कञ्चकी अहो नु खल्वीदृशीमवस्था प्रतिपन्नोऽस्मि ।
आचार इत्यवहितेन मया गृहीता
या वेrयष्टिरवरोधगृहेषु राज्ञ ।
काले गते बहुतिथे मम सेव जाता प्रस्थानविक्लवगतेरवलम्वना ॥३॥
(तदनन्तर कञ्चुकों का प्रवेश)
१ मै अब ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गया हूँ। आचारइति अन्वय-राज्ञ अवरोधहेषु आचार इति अवहितेन मया या पष्टि महता सा एक बहुतिथे काते मते (गति) स्थानगते मग अवलम्वनाथ जाता।
शवाय रामराजा के अवरोध गरेषु वातपुर में आधार इति= अन्तपुर मे आने जाने माने ककियों की यह परम्परागत मर्यादा है कि वे य को धारण किये रहे, यह मन में विचार करके, अवहितेन सावधान अथवा शक्त रहते हुये भी, मया मैने मा वैश्यष्टि जो वेत का वण्ड गृहीता धारण किया = था सा एव = वही क्षेत्रयष्टि, बहुतिये काले गते बहुत समय बीत जाने पर प्रस्थानविकलयते ममलने में लाती हुई चाल जाने मेरे चुकी के लिये, [अवलम्बनार्थी जाता सहारे के लिये हो गई है।
अनुवाद-ध्यान के अतपुर मे कञ्चुकियों की यह परम्परागत मर्यादा है कि वे वेषयष्टि धारण करें" यह सोचकर सावधान और समय रहते हुये भी मैने जो नेत्रमष्टि धारण की थी, बद्दी (अब) बहुत समय बीत जाने पर चलने में लाती हुई चाल वाले मेरे लिये सहारा के लिये हो गई है
भावाय की अपने मन मे सोचता है, जब मे जवान मा शक्ति भी रखता था तब तो मैने इस त्रयष्टि को इस लिये धारण किया था क्योंकि राजा के अतपुर मे आने जाने वाले की लोगों के लिये वह परम्परागत मर्यादा थी, तु अब मैं बहुत समय बीत जाने के बाद बुढा हो गया हूँ अत अब चलने फिरने में मेरे पैर लडखडाते हैं अतएव अब नही यह वेष्टि अब मेरा चलने फिरने में सहारा देने अर्थात् मेरे शरीर को गिरने से बचाने वाली बन गई है। इस प्रकार की अपनी वृद्धता पर सोच रहा है।
विशेष प्रस्तुत पद्य में अधिक समय बीतना प्रस्थानविक्लवगति का कारण है अकाल अकार एक ही यष्टि के अनेक रूपों में प्रयुक्त होने से विशेषानकार उत्तराद मे वृद्ध के गम रूप काय मे सहायक रूप से पति का उपादान किया गया है अत समाहित अलकार पूर्वाद्ध में उक्तनिमित्ता विभावना लकार छेक, वृत्ति तथा सुनि अनुप्रास और सन्तति है।
२ चुकी भो, काम धर्मकार्यमनतिपात्य देवस्य । तथापीदानीमेव धर्मासनादुत्थिताय पुनरुपरोधकारि कण्यशिष्यागमन मस्मं बोत्सहे निवेदयितुम् । अथवाऽविमोऽय लोकतन्त्राधिकार । कुत
संस्कृत व्याख्या--राज दुष्यन्तस्व अवरोधहेषु अत पुरगङ्गेषु आचारइति= सौदिनानामिय परम्परागत मर्यादति मनसि विषाम अविहितेन सावधानेन नापि मया युकिता वा यष्टि यो नेत्रत्वण्ड गृहीता-धृता, सा एक सैव वेत्रलता बहुतिथे बहुसख्यके, काले-यौवनादिसमये गते ती (सनि) प्रस्थाने गमनारम्भे विक्लवा-स्वलिता, गति गमनक्रिया यस्य तस्य प्रस्थान विश्यगते मम बुकिन अवलम्बन आश्रय अ प्रयोजन पत्या सा अवलम्वनाथ अवलम्बना, जाता अभूत् ।
संस्कृत सरनाथ-आत्मान यद्ध मत एवं यष्टि बिना पदमपि चलितुमसमर्प निरी की मनसि चिन्तयति-गोष्य तस्यान्त पुरेषु निमिय परम्परानना मर्यादति हेतो मशक्तेनापि मया यो वेदष्ट प्रत स एवाय दण्डवानी सकेकाले व्यपगते, मनारम्भतिगते ममाम्नाय जात ।
टिप्पणी
कञ्चुकी-कञ्चुक पादावलम्बि परिधानीय वस्त्रम तदस्यास्तीति सात्विक वृद्ध ब्राह्मण होता था, और रानियो का सन्देशवाहक एव अगरक्षक होता था, यह एक लम्बा कुर्ता पहनता था और वेष्टि धारण करता था जैसा कि उसका लक्षण है अत पुरचरों वृद्धो विप्रो गुणगणान्वित। नायकथकुशल कम्यूकीत्यभिधीयते" ये नित्य सत्यसम्पा कामदोषविवजिता ज्ञानविज्ञानकुशला कल्चुकीयास्तु ते मता ।" "अत कञ्चुकिकस्य विमति वासाय जामन" रत्नावली नाटिका अवरोधगृहेषु बध्यन्ते राजदारा यंत्र अवरोध अव + रध+ पञ् अवरोधहपुर बहुलिये बहुना पूरण इत्य गणइत्यादिना तिथुक्क् प्रत्यय तदनु तस्य पूरणे' इत्यादिना ट (अ) प्रत्यय बहुतिय तस्मिन् वनाय अवलम्वनाथ इममिति अवलम्बनाप अर्थेन farmeret विशेय लिङ्गता । इस नियम से यहा नित्य समास और सस्त्र प्रस्थान विल यहाँ अथगत पुनरुक्ति नहीं है क्योंकि यदि प्रस्थान और गति दोनों का ग्रहण न किया जायेगा तो बिह्वलता तो मनोगत भी मानी जा सकती है, अथवा गति शब्द को शानाम वापी मानकर दोष का परिहार हो सकता है अथवा 'वृद्धस्य विगते' पाठ मानकर भी दोष परिहार हो सकता है।
२ की धने ही यह ठीक हो कि महाराज के धामिक कर्तव्यो मे सम्ब नहीं करना चाहिए, फिर भी अभी कभी धर्मासन (न्यायासन) से उठे हुए उन्हे
2
मा
कृक्ततुरङ्ग एव रात्रिदिवगन्धवह प्रयाति । शेष सवैवाहित भूमि भार षष्ठाशवृत्तेरपि धर्म एव inar
लिए (मैं) समर्थ नही हूँ। अथवा प्रजापालन अधिकार में विश्राम कहाँ होता है अर्थात् नही होता। क्योकि
भानुरिति-अन्वय- भानु युक्ततुरग एवं गन्धय रात्रिदिवम् प्रयाति शेष सदैव भूमिभार पष्ठा अपि एवं धम (भवति)
शब्दार्थ भानु सूप सकृयुक्ततुरङ्ग एवं एक बार ही अम्बो को (सदा के लिए) जोतने वाला, गन्धवह वायु रात्रिन्दिवम् रातदिन प्रयाति चलता है। शेष शेषनाग सदैव हितभूमिभार सदा ही पृथिवी का भार उठाने वाले, = वष्ठांगते उपज के षष्ठभाग से निर्वाह करने वाले राजा का अपि भी, धर्म एव वही कर्तव्य ( भवति होता है)
अनुवाद सूर्य एक बार ही अम्बो को (सदा के लिए) जोते रहने वाला (होता है) बायु रात दिन चलता रहता है। शेषनाग सदैव पृथ्वी के भार को उठाये रहने वाले होते हैं। (उपज के षष्ठ भाग से निर्वाह करने वाले राजा का भी यही कर्तव्य होता है।
भावार्थ-चुकी सोरता है, कि यदि राजा को कम्पनियों के आगमन को कमी सूचना भी दे दी जाय और राजा के विश्राम मे बाधा भी पड़े तब भी कुछ अनुचित न होगा क्योंकि प्रजापालन के भार को ग्रहण करने वाले राजा को अपने विश्राम की चिन्ता न करके, प्रजा का रक्षण करना ही प्रमुख कतव्य होता है, क्योंकि प्रजापालन के अधिकारी अन्य सभी भी ऐसा ही करते है, लोकरक्षक सूर्य भी अपने रथ ने जब एक बार अश्वों को जोत लेता है तो फिर वह उसे कभी नहीं बोलता अर्थात् सदा चलता ही रहता है। वायु भी लोकरक्षा के लिए रातदिन बहता रहता है, क्षणमात्र को भी नही रुकता अतएव वह सततगति कहा जाता है, शेषनाग ने जो एक बार भूमि का भार अपने सिर पर उठा लिया है, तो फिर वे कभी उसे नही उतारते, प्रजाजनो से उनकी उपज का केवल पष्ठ भाग कर रूप से ग्रहण कर अपना निर्माह करने वाले राजा का भी यही तय होता है कि वह अपने विश्राम कौ चिन्ता न कर निरन्तर प्रजापालन में लगा रहे।
विशेष प्रस्तुत पथ में अविश्रम रूप सामान्य धर्म का, भानु गन्धवह शेष आदि के कतव्य मणन रूप भन भन शब्दो मे पृथक् निर्देश किया गया है अत यहाँ माता प्रतिवस्तूपमालकार है 'एव' द्वारा कादाचित्क भी तुरङ्गादिमोक्षण का निषेध किया गया है मत परिसख्यानकार है। विशेष दुष्यन्त के स्थान पर सामान्य राजा का कपन होने से अप्रस्तुत प्रशंसानकार भी है। इन्द्रवा नामक छन्द है ।
(३ कचुकी--यावन्नियोगमनुतिष्ठामि । (परिक्रम्यावलोक्य च एष देव-
अजा प्रजा स्वा इव तन्त्रयित्वा
निषेवते श्रान्तमना विविक्तम् । यूथानि सचार्य रविप्रतप्त शोत दिवा स्थानमिव द्विपेन्द्र ॥५॥
(उपगम्य) जयतु जयतु देव । एते खलु हिमगिरेरुपत्यकारण्यवासिन काश्यपसन्देशमादाय सस्त्रीकास्तपस्विन समाप्ता भुत्वा देव प्रमाणम् ।
संस्कृत व्यायामानु सूर्य सकृत् एकवारमेव युक्ता रथे नियमिता तुरगा अश्वा येन स युक्त एवं अस्ति वह वायु रात्रिदिवम् अहोरात्रम, प्रयातिप्रचाति शेष-अनन्त सदैव सततम् माहित शिरनि नास्त भूमे भूमण्डलस्य भार येन आहितभूमिभार त्यस्तपृथिवीभार ( तिष्ठति) पठाण प्रजाजनोत्पादित वस्तु जाताना षष्ठो भाग स एव वृत्ति जीविका यस्य तस्य षष्ठाशवृत्ते अपि राज्ञ एवं धम एतदेव प्रधान कतव्यम् (मस्ति)
संस्कृत सरलाब-प्रजापालनाधिकारिणो नृपस्य कुतो विश्रम इति चिन्तयन् कञ्चुकी कथयति सूप एकवारमेव स्वरयेऽश्वान् सयोज्याकाममार्गेण गच्छन् प्रजा- पालन विद्यते न कदापि सोवमोक्षण करोति वायुरपि अहोरात प्रवाति न विश्राम लभते पृथिव्या भार स्वशिरसि निधाय न विश्राम करोति अपितु तथैव तिष्ठति, rega राजोऽपि एतदेव तस्य भवति ।
टिप्पणी
काम यह अभ्यय है। धर्मकार्यो का स्वागत करना राजा का धार्मिक कर्तव्य माना जाता है। अनतिपात्यम् अतिपात विनम् अनतिपात = विलम्ब न करना, अनविपात्यम् विलम्ब न करना चाहिए न + अति + यद् + मि यत् धर्मासनात्यापासन से इसे व्यवहारासन भी कहा जाता है। अविश्रम व + म् + चन् नोदात्तोपदेशस्येत्यादिना वृद्धिनिषेध । लोकतन्त्रा धिकार लोकाना प्रजाजनाना तन्त्रस्य अधिकार कतव्यम् । सद्गुक्ततुरङ्ग - तुरेण गच्छतीति तुरङ्ग र गमो वा स युक्ता तुरङ्गा येन रात्रिविधम्-रात्रौ च दिवा च तयो समाहार गन्धवह वहतीति वह पचाद्यच् गन्धस्य वह गन्धवह
३ की तो (मैं अब अपने कर्तव्य का पालन करता हूँ (चारो ओर घूमकर और देखकर) यह महाराज
प्रजा इति अन्ययस्वा प्रजा इव प्रजातन्त्रयित्वा श्रान्तमना दिवा यूपानि सचाय रविप्रतप्त द्विपेज सीतम् स्थानम् इव विविक्तम् आसेवते । सदाम वा प्रजा इव अपनी सन्तानों के समान प्रजा प्रजाजनो को = तन्त्रयित्वा अनुशासित करके अर्थात् उनकी मुव्यवस्था करके आतमना धके हुये चित्त वाला। दिवा दिन मे यूपानि हाथियों के शुट को साधर are चरागाहो मे छोड़कर रविप्रतप्तधूप से पीडित द्विपेन्द्र गजराज, सीत स्थानम इव जैसे उठे स्थान में, विविक्तम निषेवते एकात शास स्थान का सेवन करता है।
अनुवाद अपनी सतानी के समान (अपने) प्रजाजनो को अनुशासित करके (उनके लिये सुव्यवस्था करके) बातमन (यह राजा) उसी प्रकार एकात स्थान का सेवन करता है, जैसे दिन मे अपने झुण्ड को यथायोग्य चरागाहो पर भेजकर धूप से सन्तप्त हुआ गजराज शीतल स्थान का सेवन करता है।
भावाथ राजा की तत्कालीन अवस्था का वर्णन करता हुआ कञ्चुको कहता है कि अपने प्रजाजनों को अपनी सन्तान की ही तरह शासन द्वारा उचित माग पर  होकर यह राजा अब उसी प्रकार एकात एक शात प्रदेश मे आकर विधाम करता है जैसे दिन मे अपने झुण्ड के हाथियों को यथायोग्य चरागाहो पर भेजकर धूप से सन्तप्त हुआ गजराज किसो शीतल स्थान पर जाकर विश्राम करता है।
विशेष प्रस्तुत पद के प्रजा प्रजा मे fearer होने से समकालकार, तथा इव के द्वारा उपमानकार एवं अनुशास बनकार है। इन्द्रवचा तथा उपेन्द्रवजा के मिश्रण से यहाँ उपजाति नामक छन्द है।
संस्कृत व्याख्या वा स्वकीया प्रजा सन्ततय इव प्रजा व प्रजा- जनान्, तन्त्रयित्वा स्व शासनेन नियम्य यान्त मन यस्य स आन्तमना विश चित, (एष देव) तथैव विविक्तम ऐकान्तशातच स्थानम, निषेवते आथवते, यथा दिना दिने यूथानि गजसमूहान् सचायायोग्यक्षेत्राविषु सप्रेष्य, रविप्रतप्ततपपीडित द्विपेन्द्र गजराज शीतम शीतलम स्थानम् = प्रदेशम (निषेवते ।
संस्कृत सरलावा दिने महराज स्वकीयगजसमूहान् यथायोग्य- क्षेत्रेषु सप्रेष्य सूर्यकिरणसन्तप्त सत्कविद शीतल प्रदेशमाश्रित्य विश्राम करोति तवा राजा अपि स्वकीयसन्ततय एव स्वप्रजाजनान् स्वधमशासनेन नियम्य परिभ्रमेण विचित सन् एकान्त स्थान मेत्य विधाम करोति ।
(उपगम्य ) ( पास जाकर महाराज की जय हो ये हिमालय की तराई के जगल मे रहने वाले स्त्रियों के साथ तपस्विजन, महर्षि कश्यप का संदेश लेकर आये है, यह सुनकर महाराज जो ठीक समझें, करे।
टिप्पणी
नियोगम्— अपना कतव्य — नियुज् + पञ् । तन्त्रयित्वा न्यायपूर्वक शासन के द्वारा सभी कार्यों को ठीक करके भ्रान्तमना धमक्त विविक्तम्- एकान्त, शान्तविवि+सारामू+++ क्त्वात्यपू ।
पचमोऽ
राजा - ( सावरम) कि काश्यपसन्देशहारिण । कचुको-अथ किम् । राजा तेन हि मद्वचनाद विज्ञाप्यतामुपाध्याय सोमरात । अमुना- श्रमवासिन श्रतेन विधिना सत्कृत्य स्वयमेव प्रवेशयितुमहसोति । अहमप्यत्र तपस्विदर्शनोचिते प्रवेशे स्थित प्रतिपालयामि ।
कञ्चुकीयदाज्ञापयति देव । ( इति निष्क्रान्त ।) राजा - (उत्थाय) वेत्रवति, अग्निशरणमार्गमादेशय । प्रतीहारी इत इतो देव [इदो हदो देवो ।]
द्विपानामि रामः । उपत्यका उप + स्य समीप वथम उपाधि च्या सकन-
अधिक भूमि | राजा (आदर देश देकर आये है? का और क्या।
राजा तब ता मी आस उपायाय सोमरात से यह कह दो कि इन वासियों का वेदविहित विधिकार करक स्वयं ही इनका प्रवेश कराये।
म भी यहाँ तपस्वियों के वजन योग्य स्थान पर बैठा हुआ प्रतीक्षा करता हूँ। कञ्चुक जैसी महाराज की आज्ञा
(यह कहकर प्रस्थान )
राजा (उठकर पाना माग बाला । प्रतीहारी महाराज, इधर सेश्वर से बाइये |
टिप्पणी
उपाध्याय आधार की अपेक्षा उपाध्याय का स्थान कुछ निम्न श्रेणी का माना जाता था, मनु ने उपाध्याय का लक्षण प्रकार दिया है "एकदम तु वेदस्य वेदा गान्यपि यो पुन योध्यापति नृत्यधमुपाध्याय स उच्यते। उप अधि+ इह अध्ययने धातो 'इश्वेति च प्रत्यय बीतेन धूती दिति श्रीत स्तन श्रुति अणु सद्या "आदरानादरमा से सत् की गति सज्ञा होने से समास अग्निशरणम-यज्ञशाला जहाँ विविध अनिय की स्थापना की जाती है, राजा के लिये महणाला मे ही तपस्वियों से मिलने का विधान है "अग्न्यासात काय पश्यद्वैतपस्विनम्" ।
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1 औत्सुक्य मात्रमिति-अन्वय प्रतिष्ठा औत्सुस्यमात्र अवसाययति । सन्ध परिपालनवृत्ति एनम् नाति स्वस्तधृतदण्डम् आतपत्रम इव राज्यम् अतिधमा- पनयनाय न पथा श्रमाय (भवति)
राजा - (परिक्रामति अधिकारवेद निरूप्य ) सर्व प्रापितमर्थमथि गम्य सुखी सम्पद्यते जन्तु राज्ञा तु चरितार्थता वु खोत्तरं । सुरमात्रमवसाययति प्रतिष्ठा
क्लिश्नाति लब्धपरिपालनवृत्तिरेनम् । नाति मापनयनाय पथा श्रमाय राज्य स्वहस्तदण्डमिवतपत्र
राजा - (चारो ओर घूमता है (और) अपने अधिकार के दुख का अभिनय करके) सभी प्राणी अपनी मनोवान्छित वस्तु को प्राप्त करके सुखी हो जाते है किन्तु राजाओं को चरितायता अर्थात् कार्यसफलता दुख प्रधान ही होती है।
शब्दाच प्रतिष्ठा उच्च पद आदि की अथवा अप्राप्त यस्तु की प्राप्तिजन्य प्रतिष्ठा प्रसिद्धि अथवा गौरव, औत्सुक्यमात्रम्, केवल उत्सुकता को (वस्तु की प्राप्ति से उत्पन्न उत्कण्ठा करो) अवसाययति ज्ञात करती है। लब्धपरिपालन- वृत्ति प्राप्त वस्तु की रक्षा का काय, एनम् इसको राजा आदि को नाति दुखित कर देता है। स्वस्तधृतदण्डम् जिनका दण्ड (स्वयं अपने हाथ से पकड़ा गया है ऐसा, आतपत्रम् एव राज्यम् छाते के समान राज्य, अतिश्रमापनयनाय न कान को उतना अधिक दूर करने के लिए नहीं होता था मायजितना कि और अधिक थकान के लिए होता है।
अनुवाद पदादि की प्राप्तिजाम प्रसिद्धि केवल उत्सुकता को ही गात करती है (किन्तु) प्राप्त वस्तु की रक्षा का काय इस राजा को दुखित ही करता है अपने हाथ से (स्वयं)  है ऐसे छन के समान राज्य कान को उतना अधिक दूर नहीं करता जितना कि थकान को उत्पन करता है
भावाय अधिकार प्राप्ति जय सिता को प्रकट करता हुआ राजा कहता है कि राज्यादि उच्च पद की प्राप्ति से जो व्यक्ति को गौरव प्राप्त होता है, वह केवल उसकी इष्ट वस्तु प्राप्ति जन्य उत्सुकता या दमन को ही मात करता है और कुछ नहीं, इष्ट वस्तु पाकर उसकी उमग समाप्त हो जाती है कि तु प्राप्त हुई वस्तु की रक्षा करने का भार उसे अत्यधिक दुख ही देता है, अत राज्य वस्तुत उस छाते के समान है freere दण्ड उसने स्वयं धारण किया है। ऐसा छाता व्यक्ति की मकान को उतना अधिक दूर नहीं करता जितना कि उसे थकान स्वयं देता है। कहीं 'नाति मापनयनाय न च श्रमाय भी पाठ है, वहाँ इसका अर्थ है कि स्वहस्तदण्ड बाला छ न तो अधिक थकान दूर ही करता है और न अधिक थकान देता ही है अर्थात् दण्डधारण मे जितना कष्ट होता है उतना भी आराम नहीं मिलता है पर लाभ कुछ नहीं होता ।
(नेपथ्ये)
वैतालिको विजयतां देव ।
प्रथम --
स्वसुखनिरभिलाव दिसे लोकहे तो प्रतिविनमथवा ते वृत्तिरेवविव ।
विशेष प्रस्तुत पद्म मे उत्तराध वाक्पा के प्रति पूर्वार्धापा हेतु है अत काव्यलिङ्ग अनकार, चतुप चरण मे उपमा 'धमापनयनाय वमाय' विरोधाभास, दण्ड शब्द के दो अर्थ है, दण्ड विधान और डण्डा मत श्लेव यमासवय अनुप्रास अलकार, बसन्ततिलका छन्द प्रसादगुण, पाञ्चाली रीति है।
संस्कृत व्याख्या-प्रतिष्ठा राज्यलाभादिजन्यगौरवप्रसूता प्रसिद्धि औत्सुक्यमेव औत्सुक्यमात्रम् उत्कण्ठामात्रम् विविधपदाय भोगेच्छामात्रम् या अवसाययति समाप्ति नयति । लब्धस्य प्राप्तराज्यादे परिपालनीय सर्वतोभावेन सरक्षणाय या वृत्ति व्यापार लब्धपरिपालनवृत्ति एनम् राजानम् विलम्नाति पीडयति । स्वहस्तेन स्वकीयकरण घुत गृहीत दण्ड छत्रदण्डमस्मिन् तद् स्वहस्तण्ड आतपत्रम् - छत्रम् इव राज्यम्, अत्यधिक भ्रमस्य वेदस्य अपनयनाय विनाशाय अतिश्रमापनयनाय न तथा भवति यथा येन प्रकारेण श्रमाय वेदाय
(भवति) । संस्कृत सरलाच महाम्यपदादिप्राप्तिजन्यप्रविष्ठा केवल मुत्कण्ठामात्रमेव समाप्ति नयति पर प्राप्तवस्तुसरक्षणकार्य मेन राजान दुखवत्येव स्वकरगृहीत नदण्डमिव राज्य मतिवेदनाशाय तथा न भवति यथा वेदाय भवति ।
टिप्पणी
अधिकारवेवम् अधिकार की प्राप्ति से उत्पन्न दुख चरितार्थता सफलता- चरित अम येन स चरिताय तस्य भाव अपने अभीष्ट प्रयोजन को प्राप्त कर लेना। दुबोतरा-दुख उत्तर प्रधान मस्या सा— जिसमे मुख्यत दुख हो रहता है। औत्सुक्यमात्रम्-औत्सुक्य मेव स्वयमानम् मयूरव्यकादयश्चेति एवार्थ मायन सह नित्यसमास किसी वस्तु का प्राप्त करने की इच्छा या उत्कष्ठा मात्र को अवसाययति समाप्त करती है। अब सो (सा) + णिच् + लट्, मि के पूर्वयुक् का आगम प्रतिष्ठा प्रतिस्था+अड (अ) लापरिपालनवृत्ति प्राप्त को गह वस्तु की रक्षा का भार जब तक इष्ट वस्तु पाप्त नहीं होती तब तक तो उसकी प्राप्ति की उत्सुकता रहती है, प्राप्त हो जाने पर उत्सुकता तो मान्त हो जाती है पर उस प्राप्त वस्तु की रक्षा का भार उस पर पड़ता है अत इस रक्षा मे उस दुख बढाना पडता है। स्वहस्तम्यहाँ दो दण्डदण्डावधान, व्यायदण्ड जिसे राजा को धारण करना पडता है और द अर्थात् छदाम् आतपातु जायते इति आतपत्रम् छत्रम् आतप++
(नेपथ्य मे) दो स्तुतिपाठक चार महाराज की जय हो।
अनुभवति हि मूर्ध्ना पादपस्तीतमुष्ण शमयति परिताप छापया सचितानाम् ॥७॥
प्रथम चारण
स्वमुचेति अन्ययस्वमुखनिरनिना सोता प्रतिदिनमखिने अथवा ते वृति एवंविधा एव हि पादमून ती उष्णम अनुभवति छायमा नवितानामू परितापम् समयति
शब्दाय स्वरि भिजाय अपने मुख की निरखन बाने, लोकहेती प्रजाजनो के हित के निय प्रतिदिनम प्रतिदिन यातु निरतर खिद्यसे कष्ट सहते हो, अथवा तेा तुम्हारा पति कायव्यापार या व्यवहार एवविधा एक ऐसा ही है क्योंकि पापवृक्ष मूर्गा अपने सिर पर तीनम् उष्णमप्रम धूप का अनुभवतिसहता है, छाया अपनी छाया देकर, सचितानाम अपन बाधय मे आये हुए लोगो के परितापम्स ताप, पोटा को, रामयतित करता है।
अनुवाद अपने सुख की इच्छा न रखने वाले (आप) प्रजाजनो के (हिल साधन के लिये प्रतिदिन कष्ट सहत हो अव तुम्हारा व्यापार ऐसा ही है अपाद अपने सुख की चिता न कर निरतर प्रजाजनों के मुख के लिये कष्ट सहते रहना आपका प्रतिदिन का काम ही है क्योंकि वक्ष अपने सिर पर प्रचण्ड धूप का सहता है ( फिर भी अपने आप मे आये हुये लोगों को छाया देकर सप्ताप को दूर करता है।
भावाय प्रथम वैतानिक महना है कि आप अपने सुख के लिया न कर के निरंतर प्रजाजनो के हित के लिये नाम करते हुये कष्ट उठाते है अथवा ऐसा करना आपके सम्बन्ध में काई आश्चय को वात नहीं, आप जैसे लोकरक्षक सम्राट का तो यह काम ही है कि वह अपने सुख की चिन्ता न कर प्रजाख के लिये ट सहन करे जैसा कि आप करते है। क्योंकि वृक्ष भी तो प्रतिदिन अपने सिर पर कहो धूप सहन करता है परंतु फिर भी अपने यहां आये हुये धूप से सतप्त जनो को छाया देकर उनके साप को दूर करता है।
विशेष प्रस्तुत पद्म मे पादप' शब्द साभिप्राय है राजा भी पाइप ही होता है पादान चरणभूता आधारभूता वा प्रजा पातीति रमतीति पादप प्रजाजन राजा के आधारभूत पैर ही होते है, वह वही के सहारे चलता फिरता तथा काय करता है अत वह उनकी रक्षा भी करता है, राजा पादतुल्य अपने नाति प्रजाजनो का रक्षक होता है। पक्ष के अय में पादप का अर्थ है-पाद पिवति जो जन्म के द्वारा जल या रस का पान करता है, मक्ष अपन जड़ा से ही जल खीचकर हरे भरे होत है। इस प्रकार यहाँ वृक्ष पर लोकरक्षक राजा क व्यवहार का समारापण ज्ञान से समासोकि अलकार, छाया, ताप, शान्ति का कारण है जत काव्यलिङ्ग जलकार, द्वितीय पति में द्वितीय नियमयसि कुमार्गप्रस्थितानात्तदण्ड प्रशमयसि विवाद कल्पसे रक्षणाय ।

अतनुषु विभवेषु ज्ञातय सन्तु नाम, त्वयि तु परिसमाप्त बन्धुकृत्य जनानाम्

= संस्कृत व्याख्या स्वस्य यवन निरसनान्मच्छारहित, लोकस्य प्रजाजनस्य नानक जनहिनसम्पादनायम प्रतिदिनम प्रत्यह निरतमिति पाचिकमनुभवाने नव राम दुष्यनस्पति काव्यापार एवंविधा एव एतावास एवं स्वनिव्यापरोपद एव ते पतिरितिभाव हिताहि पादन स्वरिता, वौद्रम दु] [सहम्, उणाम आतपम, अनुभवति श्रायना गीत छायादानेन, गधितानाम- आत्माश्रितानासनोपविष्टाना जनानाम, परितापम आतपन यम ताप रामपति निवारयति ।

अथवा के द्वारा स्वाति का प्रतिपेधमा किया गया है, अत आक्षेप जयकार, उत्तराध म उपमान के धम का प्रतिविम्व होने मे दृष्टान्त अनवार वृत्यनुपान धुत्यनुप्रास वैतालिकनिष्ठ राजविषयरतिभा को अभिप्रमाण और मालिनी नामक छ है "ननमयय युतेय मानिनी ।"

संस्कृत सरलाय प्रथमा वैतालिका दुष्यन्त राजानमुद्दिश्य कथयति मात्मसुखेच्छाविरहितो भूत्वा प्रजाना हितसम्वधनाव मेव निरंतर कष्टमनु भवमि अथवा नाच किमप्यादद्भुत कतव्यमवेद भवत तोहि पादचाऽपि स्वशिरसा दुह मातप सहते पर मशीनलच्छायादानन आत्माश्रिताना जनाना सातपजय परिताप निवारयत्येव ।

टिप्पणी

बतालिका—ये राजस्तुतिपाठक एवं निश्चित समय की सूचना देने वाले धारण होते है, यही रानि व्यतीत होने पर स्तुति द्वारा राजा को जगाने भी है अतए वैतालिका बाधक तत्कयो रागस्तत्तत्कालवाचिनि । सरभसमेव वितान गायन तालिम भवति" अर्थात् प्रत्येक प्रहरोनित रागो ने तथा भिन्न-भिन्न काल निर्देशक से जादिकमरहित समयानुसार गाते ह बहे मालिक कहा जाता है। विविधानान प्रयोजनमस्येत्य विना शब्दा "प्रयोजनमिति उ (क) अथवा विधाजमान मित्यस्यैपटक विद विधातोरात्मनेपदे लोको भुवने जने।" वृत्तिवत् क्तिन् पादप पाई पिजतीति पाइप वक्ष पादान् चरणभूता आधार भूता वा प्रजा पाति रातीति वा पादप प्रजापालन राजा परितापन प्रजाजनाना सत्तापदुवा अपन आत्मतापविष्टाना बनाना मातपजय तापम द्वितीय- दूसरा वैतालिक कहता है-

नियमयतीति अन्वय- आत कुमास्थितान् नियमयति विवादम् प्रशमयसि, रक्षणाय कल्पसे अतनुषु विभवेषु ज्ञातयः सतु नाम प्रजानाम् व तु त्वयि परिसमाप्तम् ।

शब्दार्थ- आतदण्ड राजदण्ड को धारण किये हुये कुमागप्रस्थितानुबुरे मार्ग पर चलने वालो को, नियमयसि नियत्रित कर सन्मान पर लाते हो विवाद प्रजाजनो के आपसी कलह अथवा वादविवादों को पूर्णतया मान्त करते हो। रक्षणाय कल्पसे (प्रजाजनो की रक्षा के लिये समय होते हो। अतनुषु पर्याप्त, विभवेषु सम्पत्तियों के होने पर ज्ञातय स नाम भले ही बहुत से सम्बन्धी हो जायें, (कितु) प्रजानाम् वत्पम् प्रजाजनो का बघुवाधवी द्वारा करणीय काम तो परिसमाप्तम् आप ने ही पूर्ण होता है।

अनुवाद -राजवण्ड धारण करने वाले (आप) कुमाग पर चलने वाले अति कमों को करने वाले लोगों को नियंत्रित कर माग पर लाते हो (प्रजाजन के पारस्परिक विवादों एवं कलह कोशात करते हो (और उनकी रक्षा के लिये समय होते हो। पर्याप्त सम्पत्तिया के होने पर तो भले ही अन्य सम्बन्धी जन हो जाएँ पर प्रजाजनो का बघुजनो द्वारा करणीय कार्य तो आप पर ही पूर्ण होता है।

भाषाय-राजस्तुति करता हुआ द्वितीय वैतालिक कहता है कि आवश्यक होने पर आप राजदण्ड धारणकर अनुचित काय करने वाले लोगो को दण्ड देकर सन्मार्ग पर लाते हो, जब कभी प्रजाजनो के बीच कोई विवाद या झगडा होता है तब आप उसको भली भाँति मात करते हो और उनकी रक्षा करने में समय हा हा. यह सम्भव है कि विशेष धनवान लोगो के अनेक स्वजन कुटुम्बी बन जायें पर साधारण प्रजाजनो के लिये तो आप ही उनके माता पिता भाई होते हो अर्थाद साधारणजन तो आप से ही रक्षित होते हैं अपने निजी कुटुम्बी कह जाने वाले लोगो से नही

विशेष प्रस्तुत पद्म में अतिम चरण के प्रति वाक्य हेतु है अत याक्या हेतुक काम्यलिङ्ग अलकार नियमयसि आदि तीन क्रियाओं का कर्ता एक 'त्वम्' है अत दीपक अतकार, बाजो की अपेक्षा राजा में अधिनय का कथन है ar व्यतिरेक अलकार, अनुप्रास, वैतालिकनिष्ठ राजविषयक रवि भाव की अभिव्यक्ति है। मालिनी नामक छन्द है।

संस्कृत व्याख्या आत्त गृहीत दण्ड राजदण्ड येन स तदण्ड गृहीत राजनियमदण्ड (स्वम्) कुत्सितो माग कुमाग तेन कुमार्गेण प्रस्थितास्तान- पिका कुमागगामिन इत्यच निगमयति-स्वशासनदण्डेन सत्पथगामिन करोषि । विवादम् धनादिकारणजय पारस्परिक विरोध कलहम् वा प्रशमयसि निवारयसि रक्षणाय प्रजाजन रक्षाकार्याय कल्पसे प्रभवति अतनुषु प्रभूतेषु विभवेषु धनधान्यादिषु सत्गु ज्ञातय कुटुम्बिन स्वजना वा सन्तु नामभवन्तु

राजा -- एते क्लान्तमनस पुनर्नवीकृत स्म । (इति परिक्रामति)

प्रतीहारी - एषोऽभिनवसमार्जनसीक सनिहित होमधेनुरग्निशरणा- लिन्द | आरोहतु देव [एसो अजिवसम्म जग सस्सिरी सम्मिहिवहो- मषेणू अभिसरणालिन्दो आरोहदु देवो]

राजा - (आरुह्य परिजनाशावलम्बी तिष्ठति) वेत्रवति, किमुद्दिश्य भगवता काश्यपेन मत्सकाशमृषय प्रेषिता स्यु |

नाम अमानाम् प्रकृतीनाम व कृत्यमव घुकरणीय काय, तुष्पि

- नाम अजानाम् प्रकृतीनाम वजनकरणीय कामम् तु त्वमिष्यते एवं परिसमाप्तम् पूर्णतया सम्पन्न भवति ।

संस्कृत सरलार्थद्वितीयो वैतालिक राजान प्रस्तौतिगृहीत राजनियम स्वनिषिद्धाचारपरायणान् कुमानो जनान् शासन दण्डेन वशीकृत्य सत्पथगामिनो  प्रजाजनाना पारस्परिक विवाद कलह वा निवारयति एवं सदा जनाना रक्षाकार्याय प्रभवसि सम्भवत्येतद् यद् प्रभूतेषु धनधान्यादिषु सत्सु प्रजानाम में स्वजना सम्बधिन भव पर सामाजनाना बन्धुवान्धवकरणीयकार्य साहाय्य वा स्वपि एवं नान्यस्मिन् तथामिते बन्धुजने पूणतया सम्पन्न भवति, जनएव त्वमेव वस्तुतो बन्धु नाम ।

आतवन्त दण्ड देन जादा, 'जब उपसर्गात्त' इति धातोरा- कारस्य तु गृहीत राजा को समयानुसार दण्ड भी देना पड़ता है, और आत ऐसा करना शास्त्रसम्मत भी है अपराध नही "समये यश्च तनोति तिग्मताम् प्रजानां विधानात् " वड देना मास्मम्मत है "तदर्थ सवभूनाना गोप्तार धममात्वम् । बहलवेजोमय दण्ड संसृजत्परमेश्वर" भूगुसहिता "स्वराष्ट्र न्यायवृत्ति स्यादुपदण्डश्च शत्रुषु" कुमागप्रस्थितान् कृतिमत माग कुमाग प्रादित्यस्य तेन प्रस्थितास्तान् । मृज+धमाग नियमपतिनियम् लिट अमिता ह्रस्व इति ह्रस्व । विवायम वि+ बद्+ धञ् प्रणयसि+राम+णि टाढी कृतायामपि मिता हम् इति हस्वत्य कल्व कप सम्पति स्नूप धातु योगे रक्षणात्य चतुर्थी जतनुषु तुम, अनु अधिक ज्ञाप -कुटुम्बी स्वजन सन्तु नामनामेति सम्भावनायाम् कृत्य का उत्स व्यसने चैव दुमिले राष्ट्रविप्लवे राजद्वारे माने च यस्तिष्ठति स बान्धव, परिसमाप्तम परि+सम्+आ+

राजा (वैतानिककृत स्तुति को सुनकर ) विमन हुआ मैं पुन नवीन उत्साहसम्पन हो गया है।

(यह कहकर चारों ओर घूमता है)

प्रतीहारी अभी हाल ही स्वच्छकर (साट बुहार कर मनोहर बनायी

तावद यतिना मुपोढतपसा विघ्नस्तपो दूषित,  प्राणिष्वसच्चेष्टितम् । आहोस्वित् प्रसवो ममापचरितविष्टम्भितो वीरुधा- मित्याहुतक मपरिच्छेदाकुल मे मन ॥ ॥

और जिसके समीप ही हवन के लिये घत दूध आदि के लिये उपगी हुई है ऐसी यह अग्निमाला की वेदिका (च) है महाराज उस पर

राजा - (राजा पडकर और सेविका के लि जाता है) किस उद्देश्य से भगवान् काश्यप ने रामरूपिया ने होगा ?

किमिति अवय-विमुताब उपोदनपसा प्रतिनाम तपम धर्माचर प्राणिषु नेनचित् अगत् चेष्टितम् स्वित् मम अप (अस्ति)।

मा०दार्थवि तावत् तीय उपाधि उच्च तप करन बाले जतिनाम्ती पियो का तप तप विवो कारण निम्= कलुषित हो गया है। उस अथवा धमारण्यचरे प्रसरण करन प्राणियो (गो आदि) पर केनचिद किसी ने अनुचितचेष्टितम् = पेष्टा की है आहोस्वित् अथवा मममरे (दुष्यन) उपचरितम ateur लताओ का प्रसव पर फूल विष्टतिर गया है। इति = य प्रकार तक बहुत सी मकाओ स व्याप्त मे मनमरागन, अप दाकुलम् = किसी निणय पर न पहुँचने के कारण व्याकुल है)।

अनुवाद क्या अत्यधिक उच्च तप करने वाले प्रतीतपदिय का प दिन के कारण हो गया है, अथवा तपोवन में विचरण करने वाले (मृगादि) जीवो पर किसी ने अनुचित चेष्टा की है, अथवा मेरे कुकृत्यों से बनाना का फलना- फूलना रुक गया है. इस प्रकार अनेक मकाओ से व्याप्त नरा मन कुछ निगय पर न पहुँचने के कारण व्याकुल (हा रहा है)।

भावाथ राजा जवती में पूछता है कि ऋपिया के आने का क्या कारण हा सकता है, फिर वह स्वयं सोचता है कि तो क्या उपयो न तप का विनोद्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है अथवा तपोवन जीव पर मीन अनुचित चेष्टा की है अथवा मेरे ही दुष्कृत्वों से लताओं का फलना फूलना बन्द हो गया है इस प्रकार की अनेक कार्य मेरे मन में उठ रही है किन्तु मैं किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रहा है अतएव मेरा मन व्याकुल हा रहा है।

विशेष प्रस्तुत पद्य में जातक मन की व्याकुलता का कारण बताया गया अत काव्यकारक वृत्ति एव भूनि अनुप्रास, चिन्ता, विषाद,

1 संस्कृत व्याख्या कि तावत् किमिति, उपरा तप यागादितपश्चरण पातेषाम् उपोतपसाम् आरब्धयामादितपश्चरणनाम्, दतिनाम् अग्निष्टोमादि- योगनियमताम् तप तपश्चरणम्, विघ्न राक्षसाविकृतान्तरापै पित विनितम् अस्ति । उत अथवा धर्मारण्य नरेषु तपोवनविहणशीलेषु प्राणिषु मृगादिजीत्रेषु केचित् केनचिदपि व्याधादिना असत् अनुचितम् पेष्टितम् = आचरितम् आहोस्वित् अथवा मम दुष्यन्तस्य अपचरितै दुष्कृत्यै पा areery सताना, प्रसव फलपुष्पा द्गम विष्टम्भित सरुिद्ध इति- एवंप्रकारेण आदा उता बहव अनेक प्रत समया मस्मिन् तद् आवड- अतक मष्पतस्य मन मानसम् अपरिन्छेन विषयविशेषस्य अनवधान आकुल व्याकुल अपरिच्छेदाकुलम्। वतने।

आदि भाव धमवार रस के पोषक है, प्रसाद गुण, पाञ्चाली रीति शाबू विक्री हित छाद है।

संस्कृत सरलाच राजा स्वमनसि चिन्तयति किमिति भारस्ययज्ञीयविधीना तपश्चर्या रायसादिवि दूषितास्ति अथवा तपोवन विचरणगीनेषु मृगादिजीयेषु केनापि दुष्टेनामुचितमा परितम् अथवा मम दुष्क लताना पराग निरुद्ध इति समुद्भूतानेकलजय ने मानस विषयविशेषस्थ निणयाभावेनादिव्याकुल वतत ।

टिप्पणी

तान्तमनसा चित्र मनो येषान्ते नवीकृता उत्साहसम्पन्ना कृता यद्यपि मेरा मन अब तक उदास था पर बैतालिकों की स्तुति सुनकर फिर उत्साहित हो गया है।

प्रतीहारी-सधिविग्रह सम्बद्ध नानाकायसमुत्थितम् निवेदयति या काम प्रतीयस्तु ता मता नाना कार्यों की सूचना देने वाली राज सेविका प्रतीहारी कहलाती है। अभिनयसमार्जनसीक अभिनवेन समाजनेन श्रिया सहित होम- धेनु – होमार्या धेनु । अलिद असद का अय वस्तु देहली अथवा ऊंचा प्रवे द्वार है यहा प्रसंगत इसका अर्थ यशवेदिका या चबूतरा लिया गया है। उपोलप साम् उप + बहत सम्प्रसारण इत्यधत्त्य आदि-उप इसका अबधारण करता है "उपासन्या न मय कुल आय टीकाकारों ने इसका अय अत्य धिक तथा उच्च भी लिया है पर धाम के अनुसार धारण करना ही अब उचित है, प्रसगानुकूल यहा इसका अब आरब्ध किया गया है और तप का अर्थ पा लिया है। व्रती का अर्थ नियमवान् या मशदीक्षित करना ही प्रसंगानुकूल है।

चितम् + + दोषोणी' इति उकारस्य दीपः । अपवरित ऐसी मान्यता थी कि राजा के दुष्कर्म से ही प्रजा पर आपत्ति आती थी राजाऽपचारात् पृथिवी स्वल्पमस्या भवेत् । अल्पायुष प्रजा सर्वा वरदा व्याधिपीडिता । न राजापचारमतरेण प्रजासु अकाल मृत्यु सवरति"

प्रतीहारी- सुचरितनन्दन ऋणयो देव सभाजयितुमागता इति तर्कयामि । [सुचरिणन्दिणो इसीओ देव सभाजइदु आजदेति तक्केमि ।] ( प्रविशन्ति गौतमोसहिता शकुन्तला पुरस्कृत्य मुनय । पुरश्चैषां कञ्चुकी पुरोहितश्च ।) कञ्चुकी- इत इतो भवन्त । शाङ्ग र शारद्वत, उहाभाग काम नरपतिरभिन्नस्थितिरसौ,

न कश्चिद वर्णानामपथमपकृष्टोऽपि भवते । भजते । तथापीय शश्वत् परिचितविविक्तेन मनसा, जनाकीणं मन्ये हुतवहपरीत गृहमिव ॥१०॥

मन्यवपरीत गृहम

मचरित)" राजदोष विपद्यन्ते प्रजा विधिपानिता रामायण प्रसव++ अप् । आय–आ + वह + क्त अपरिच्छेदपरिच्छेद–परिचिकाटना विवेचन करना अतएव निर्णय करना ।

प्रतीहारी यह समझती हूँ कि आपके ) सचरित्र से प्रसन्न हुये ऋषिजन महाराज का अभिनन्दन करने के लिए आये है।

(तदनन्तर गौतमी के साथ, शकुन्तला को आगे करके, मुनिजन प्रवेश करते हैं और इनके आगे की तथा पुरोहित )

चुकी आप लोग इधर से आइये इधर से

बारव हे शारत ।

महाभाग इति अन्वय-कामन अभिन्नस्थिति असो नरपति महाभाग, वर्णा- नाम् अपकृष्ट अपि कश्चिद् अपयम् न भजते । तथापि शम्वदुपरिचित विविक्तन मनसा जनाकीणम् इदम् हुतवहरीतम् गृहम इस मन्ये ।

साथ काम भले ही अभिस्थिति मर्यादा को न तोड़ने वाला अर्थात् मर्यादापालक असौ नरपति यह राजा महाभाग महाभाग्यशाली या महायशस्वी (है) और (इसके राज्य में) वर्णानाम् अपकृष्ट अपि ब्राह्मणादिवर्णों में निकृष्ट बन शूद्रादि भी, कविच कोई, अपय न भजते कुमाग को नहीं अपनाता है। तथापि फिर भी मश्वत्परिचितविविक्तेन मनसा निरन्तर एकान्त से अभ्यस्त मन से, जनाकीणम् इदम् = भीडभाड़ से युक्त इस राजगृह को (मैं) हुतवहपरीत गृहम् इव अग्नि से घिरे हुए घर की तरह मन्ये मानता हूँ। =

अनुबाद - मते ही मर्यादापालक यह राजा महाभाग्यशाली है (इसके राज्य मे) ब्राह्मणादि वर्णों मे निकृष्ट शूद्रादि भी कोई कुमाव पर नही चलता है, तथापि निरन्तर एकान्त से अभ्यस्त मन से में इन लोगो से भरे हुए राजगृह को अग्नि से गिरे हुए पर के समान मानता हूँ।

भावार्थ राजद्वार पर लोगो की बड़ी भीड़ को देखकर अपने ret ऋषि शारद्वत से कहता है कि भले ही यह मर्यादापालक राजा परम सौभाग्यशाली और महायशस्वी हो तथा इसके राज्य मे निकृष्ट वर्ग मुद्रादि भी कोई कुमागगामी न हो, इस प्रकार यह राजा पूर्ण धार्मिक, न्यायप्रिय, मर्यादापालक एवं प्रजाजनरक्षक हो, परन्तु यह राजगृह जो कि अनेक लोगों से भरा हुआ होने के कारण सवया अशान्त एव कोलाहल पुण है, मुझे वैसा ही समान्त एव विक्षुब्ध लग रहा है जैसे कि यह arrera से घिरा हुआ हो, इसका कारण है कि मेरा मन एकान्त में रहने का अभ्यासी है।

विशेष प्रस्तुत पद्य में अशांति का कारण न होने पर भी निशुधता बतलाई गई है अत विभावनालकार यद्यपि राजा महानुभाव धार्मिक एवं परमशान्ति है, तथापि शाति का अनुभव नही हो रहा है a विशेष अवकार, 'इन' के द्वारा उपमालकार, और 'म' से बोधितउत्प्रेक्षातकार, उत्क्तविभावना और विशेषोक्ति के पचपि निमिक्त बतलाये गये तयापि दोनो मे साधक और बाधक प्रमाणो का निर्देश न होने से सन्देहसकर है। यद्यपि इस म यहाँ पर 'म' पद से उत्प्रेक्षानकार जान पड़ता है तथापि यहाँ उत्प्रेक्षा की अन्य सामग्री न होने से उत्प्रेक्षालकार न होकर केवल उपमानकार ही है, ऐसी कुछ टीका- कारो की मान्यता है। प्रसादगुण तथा वैदर्भी रोति है। साज रव के इस सम्पूर्ण कथन से शकुन्तला के प्रत्याख्यान रूप अमगल को भी सूचना मिलती है अन्यथा सुन्दर मी राजभवन मारख को क्यो उद्वेगजनक एव त्याज्य लगता, जिसे उसने पहले ही त्याज्य मान लिया वह राजभवन अन्त मे सबके लिए त्याज्य ही प्रमाणित हुआ प्रस्तुत पद्य में शिखरिणी नामक छन्द र वमन सभागा freefरणी ।"

संस्कृत व्याख्या— कामम् भवतु नामैतद् यत् न मित्रानोडिया स्थिति लोकमर्यादा येन स अभिनस्थिति - मर्यादापालक असौ नरपति - एष दुष्यन्तो राजा महान् भाग भाग्य वस्य महाभाग प्रशस्तभाशाली महायशस्वी वा (वतते) (राज्येऽस्य) वर्णाना ब्राह्मणादिवर्णानामध्ये अपकृष्ट अििनकृष्ट शूद्रादिरपि कश्वित् अपय न भजते कुमारा नायते तथापि, शम् निरन्तर परि चित अभ्यस्त fare निजन स्थान येन तेन परिचितविविक्तनजन्मा- भ्यस्तविजनस्थानेन मनसा चित्तेन ( अहम् ) जनै लोके वाकीर्ण व्याप्तम् जना कीमम् जोककुलम् राजगृहम् हुत हवनीयस्य वहति तत्तदेवेभ्य समर्पयति तव अग्नि [अग्नि] तेन परीवम् समत आक्रान्तम्-तवपरीत- परिव्याप्तम् गृहम् भवनम् इव मन्ये सभावयामि ।

संस्कृत सरनाथ राजद्वारमुपेत्य तपत्य जनसमुदाय विमा शाङ्ग र शारद्वत कथयति मात्र काचिदपि शीति मदय राजर्षि दृष्यन्तो धर्मनिष्ठ वाद प्रजापालक वाल्लोकमर्यादासरक्षकत्वा न्यायप्रियशासत्वाच्च महानुभावो महामाया महायशस्वी वा चतते अस्य सद्गुणत्वाच्छासनभयत्वान्चास्य राज्ये  शारद्वत स्थाने भवात् पुरप्रवेशादित्यभूत सवृत्त । अहमपि - अभ्यक्तमिव स्नात शुचिरशुचिमिव प्रबुद्ध इव सुप्तम् । यद्धमिव स्वैरगति जनमिह सुखसङ्गिन मवैमि ॥। ११शा

निष्ट विरान याति किमत वालवर्णाना निकृष्ट विरपि कवितायेन याति किमुत ब्राह्मणाद्युस्वर्णाना विषये । तथापि परितो जनसकुलमिद राजभवन मह विराभ्यस्तविजनस्थानेन मनसा वह्निपरिव्याप्तमिव सम्भावयामि

टिप्पणी

सुचरितनन्दिन - शोभन चरित सुचरित तेन साधु नवतीत्येव शीला इति सुपरिचित चरित+नन्द धातो साधु करिष्य कर्तरि गिनि । सभाजयितुम- स्वागत सत्कारायक चौरादिकात् समाज इत्यस्माडातो णिचि तुमुन्। महाभाग महान् प्रशस्त भाग भागधेय भाग्य वा यस्य "आरम्पोत्पत्तिर्मामृत्यो कलो यस्य न भवेत् । स्याच्चैवानुपमा कोति महाभाग स उच्यते" कामम-सम्भावना एक मव्ययमेतत् । अभिस्थिति न भिद + स्था क्तिन्, स्थिति मर्यादा । अपथम-न-पन्या तत्पुरुष व पथो विभाषा' इति समासात अप्रत्यय अपय नपुंसकमिति निव्यक्लीवत्वम्। परिचितविविक्त ने परिचित वि + विच्+क्त परीतम परि + द + शरबत निरन्तर ॥

शारद्वत- यह उचित ही है कि आप नगर में प्रवेश करने से इस प्रकार के हो गये हैं। मैं भी

अभ्यक्तमिति अवय-सुखरादि जनम जनम इह स्नात अभ्यक्तम् दवि

अशुचिम्प्रवुद्ध सुप्तम् इव स्वंरगति बद्धम् इवं अमि

सदाय इह यहाँ इस राजभवन में मुखसहि गनम जनम ऐहिक सुखो मे आसक्त जन को स्वात स्नान किया हुआ व्यक्ति, अभ्यक्तम इव जैसे तेल लगाये हुये व्यक्ति को पवित्र व्यक्ति अशुचिम्ब जैसे अपवित्र व्यक्ति को, प्रबुद्ध जागा हुआ व्यक्ति, मुलम् इव जैसे सोये हुये व्यक्ति को स्वैरगति स्वच्छन्द गामी जन, वज्रम् इव जैसे समझता है।

अनुवाद) लौकिक सुख में आसक्त लोगो को महाँ राजभवन मे (ऐसा ही समझता हूँ, जैसे नहाया हुआ व्यक्ति तेल लगाये हुये व्यक्ति को, पवित्र व्यक्ति अपवित्र को जागा हुआ व्यक्ति नाम हु को और स्वच्छाद विचरण करने वाला बँधे हुये व्यक्ति को जानता है।

भावाय लौकिक आमोद-प्रमोदो मे तथा सुखो मे आम राजभवन के लोगों का देख कर ऋषिकुमार शारत कहना है कि मैं इन लोगों का उसी प्रकार देखता हूँ जैसे कि कोई नहाया हुआ व्यक्ति किसी तल लगाये हुये व्यक्ति को देखता है, पवित्र जन अपवित्र को और जगा हुआ सो हुये को तथा स्वच्छन्दारी किसी

1 विशेष प्रस्तुत पथ मे एक सुसर गीजन के अनेक उपमानो का वजन होने से यहाँ मानोपमानकार है और अनुप्रास भी प्रस्तुत पच और उक्त महाभाग आदि पथ मे दोनो ऋषिकुमारों के कवन से दोनों का चारित्रिक अन्तर स्पष्ट झलकता है गाङ्ग र मे जहा बाह्यनिरीक्षण वृत्ति है वहा शारदत की सूक्ष्म दृष्टि जनमानस के भीतर प्रवेश कर सूक्ष्म अन्तर्भावनाओं का परिवीक्षण करने वाली है अतएव शा र जनाकीण राजभवन को बेलकर एकान्त प्रदेश मे भाग जाना चाहता है पर era इस स्थिति का गम्भीरतापूर्वक सूक्ष्म निरीक्षण करता है उसके कपन मे सुखसद गजनी के प्रति जहाँ एक ओर उद्वेग है, यही दूसरी ओर उनके प्रति करणभाव भी है। एकात मान्त वातावरण मे आजन्म रहने वाले तपस्वीजनो की दृष्टि मे सासारिक भोगासक्त जन कैसे होते हैं, इसका वडा ही भव्य वणन इन श्लोको मे किया गया है। कवि ने यहाँ हिदूदशन के अनुसार शरीर शुद्धि मन शुद्धि प्रबोध (ज्ञान) एवं माक्ष की और सूक्ष्म संकेत किया है, कवि मे तपोमय ऋषि जीवन के अति कितनी आस्था है यह इससे स्पष्ट हो जाता है। प्रस्तुत पद्य में आयाति है।

संस्कृत व्याख्या ( अहम् अपि ) सुखमजिनम् लौकिकसुखासम् जनम नागरिकलोकम इह राजभवने स्नातकृतस्नानाचारपरिग्रह अभ्यक्तम् कृततैलमदन जनम् इव यथा, शुचि पवित्र अशुचिम्— अपवित्र जनम् इव प्रबुद्ध जागरितो जन, सुप्तम् शक्तिम् इव स्वैरा गति यस्य स्वैरगति रक्त स्वच्छदगामी जन बद्धम् निगडितम् इव जानामि ।

हुये व्यक्ति को देखता है, अद मेरी दष्टि मे ये लोग अपवित्र प्रसुप्त आबद्ध एवं सवमा अशुद्ध है।

संस्कृत सरलाथ लौकिकामोदप्रमोदासक्त राजभवनलोक मवलोक्य शारद्वत पति अहमपि यथा त्वं तथैव भौतिकसुण्यात राजभवनलोक तथैवावगच्छामि यथा मातो जनतेससिक्त जन गणयति यथा न पवित्रो जनोऽपवित्र जनमवलोकयति, एवं यथा जागरितो जनो निद्रितजन मवैति एवमेव यथा स्वच्छन्दगति जनो निगवादिभिरावद्ध जन जानाति

टिप्पणी

स्थाने समुचितमेतद्यदभिहित भगता - अव्ययम्। अभ्यन्तम्-अभि+ + गाकर स्नान न करने वाला अथवा स्नान करके तेल लगाने वाला व्यक्ति देहशुद्ध रहित माना जाता है "तैलाभ्यडगे चिताधूने मैथुने रकमणि द चाण्डालमा स्नान माचरेत्" स्नात कृतस्नान स्नान करने से देहवि होती है जो कि मुमुक्षु की चार अवस्थानी में से प्रथम अवस्था है प्रबुद्ध प्रबुध्+ तत्वज्ञानी व्यक्ति, जहाँ तत्वज्ञानी व्यक्ति प्रबुद्ध तत्त्वज्ञाता कहा जाता है, वहाँ विद्या से ग्रस्त व्यक्ति सुप्त कहा जाता है "यस्पा जायति भूतानि सा निशा पश्यतो गुने या निवासभूताना तस्पा जाति समनी गीता। इस कथन से मुमुक्षु की तृतीय अवस्था, शान वैराग्य अवस्था की ओर संकेत किया गया है। सुधि

शकुन्तला (निमित्त सूचयित्वा अहो, कि मे वामेतर नयन विस्फुरति ? [ अम्महे, कि मे वामेदर अण विष्फुरदि ? ]

गौतमी जाते, प्रतिहतममङ्गलम्। सुखानि ते भर्ती कुलदेवता वितरन्तु [जादे, पडिहद अमंगल सुहाई दे भत्तकुलदेवदाओ वितरन्दु ।] (इति परिक्रामति)

पुरोहित ( राजान निविश्य) भो भोस्तपस्विन अस्ताव भवान् वर्णाश्रमाणा रक्षिता प्रागेव मुक्तासनो व प्रतिपालयति । पश्यर्तनम् । शाङ्ग रवभो महाब्राह्मण, काममेतदभिनन्दनीय तथापि वयमत्र मध्यस्था । कुत

अवन्ति नचास्तरव फलागमे- वाम्बुभिरविलम्बिनो घना | अनुद्धता सत्पुरुषा समृद्धिभि स्वभाव एवं परोपकारिणाम् ॥१२॥

1 वचन, कर्म से पवित्र व्यक्ति, इस कथन से मुमुक्षु की द्वितीय अवस्था मन शुद्धि को बतलाया गया है। गति ऐहिक विषयों से विरक्त व्यक्ति ही स्वच्छदगामी होता है, विषयासक्त जन व या परतन्य होता है. इस कथन से मुमुक्षु की अन्तिम चतुच अवस्था tity को बतलाया गया है स्व + ईस्वदीरेरिणो वृद्धिस्वर कवि का यह लोक दानिक दृष्टि से बडा ही उत्तम है, इसमें सक्षेप में मुमुक्षु की चारो ही अवस्थाओं का उल्लेख है।

- शकुन्तला ( अपशकुन का अभिनय करके) ओह, मेरी वाहिनी आँख क्यो है ?

फटक रही गौतमीपुत्री, अमङ्गल नाश हो तेरे पतिकूल के देवता तुझे सुख प्रदान करें।

(यह कहकर चारो ओर घूमती है)

पुरोहित ( राजा की ओर संकेत करके) हे तपस्वियों (चारो) वण (एव चारो) बाथम के रक्षक महाराज पहले से ही अपना आसन छोडे हुये आप लोगो की प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप लोग इनसे मिलिये।

शाह रहे थेष्ठ ब्राह्मण भले ही यह (राजा द्वारा हमारे प्रति शिष्टाचार का प्रदर्शन) प्रशसनीय हो तथापि हम लोग इस विषय मे उदासीन ही हैं, क्योकि- 1

भवन्तीति अन्यतरय फलागमै नम्रा भवन्ति घना नवाम्बुभि विलम्ब (भवति) सत्पुरुषा समृद्धिभि अनुद्धता ( भवन्ति ) एष परोपकारिणाम् स्वभाव एव ।

शकुन्तला - (मन मे) (देखे) अब आयपुत्र क्या कहते हैं राजा यह क्या बात मेर अनुमोदनाथ सहसा ) उपस्थित की गई है।

राजा - किमिदमुपन्यस्तम्

दशकुन्तला (आत्मगतम्) पावक खलु वचनोपन्यास [ क्वणोवण्णासो ।]

शाङ्गरेव कथमिव नाम ? भवन्त एवं सुतरा लोकवृत्तान्त निष्णाता ।

सतीमपि ज्ञातिकुलं कसलया

जनोऽन्यथा भतृमत विशङ्कते। प्रियाऽप्रिया वा प्रमदा स्ववन्धुभिः ||१७||

अत समीपे परिणेतुरिष्यते

शकुन्तला (मन ( मन में) राजा की बात का यह कथनारम्भ वस्तुत अग्नि (के)

तुल्य है।

शारव आप यह कैसे कह रहे है. आप तो स्वयं ही मोकव्यवहार को अच्छी तरह जानने वाले है ।

सतीमिति अन्वय-मभ मती ज्ञातिकुलकसा सतीम् अपि जना विशते । अत स्वव प्रमदा या अमावा परिने समीपे इष्यते ।

= = = = = शब्दयतु] [मती सधवा ज्ञातिकुनैकथयाम्ब कुल में ही सदा रहने वाली, सतीम् अपि सती साध्वी भी को, जन सांगा कुछ और ही इसके विपरीत व्यभिचारिणी विशद फतेगका करते है। अत इसलिए, स्ववन्धुभि वधू के बन्धु बाधवों द्वारा प्रमदा युवती स्त्री प्रियाया (पति को) प्रिया हो अथवा अप्रिया हो, परिणेतु पति के समीप इष्यते समीप ही (रखना चाहा जाता है।

अनुवाद-सवा] ( होकर भी) बन्धुकुल में ही एकमात्र सदा रहने वाली सती साध्वी स्त्री को भी लोग अन्यथा समझने लगते है अर्थात् उसके अतीत्य की का करने लगते हैं, अत वधू के बधुजन युवती वधू को, चाहे वह प्रिया हो अथवा अप्रिया उसके पति के पास ही रखना चाहते है।

भावाय सा रख राजा से कहता है कि आप तो स्वयं लोक व्यवहार की बातो को अच्छी प्रकार जानते है, लोक व्यवहार के अनुसार विवाहिता सधवा स्त्री भले ही वह सती साध्वी क्यों न हो किन्तु यदि वह सदा अपने बघुजनो के साथ ही रहती है तो लोग उसके असती होने की आागका करने लगते है, अत वधू के बन्धुजन युवती स्त्री को उसके पति के पास ही रखना चाहते है, भले ही वह प्रिया अथवा अप्रिया ही हो, अत शकुन्तला चाहे तुम्हे प्रिय हो अथवा अय इसे आपको अपने पास ही रखना उचित है।

विशेष प्रस्तुत पद्म मे शकुन्तला को तुम्हारे पास रहना चाहिए इस विशेष के स्थान पर यहा सामान्य वर्णन किया गया है a weegranatenre है । उत्तराध के प्रति पूर्वाध कारण है अत काव्यलिङ्ग अलकार 'सतीमपि' से यदि असती हो तब तो कहना ही क्या, यह अथ प्रतीत होता है, अत अर्थापति बलकार, अनुप्रास प्रसादगुण, वैदर्भी रीति विशेषण नामक नाट्यासकार "उक्तस्यायस्य वस्तु स्या स्कीतनमनेकधा । उपातमस्वरूपेण तत्स्यादथविशेषणम्" सा० द० वतस्य नामक छन्द है "जती तु वशस्थ मुदीरित जरा ।"

संस्कृत व्याख्यातुमतीम् जीभ काम सधवानित्यय जातिकुक- संयाम् ज्ञाते कुत्ते एक hae aor marter स्यास्ताम् पितृका याम्, सतीम् अपि पतिव्रतामसामीम् अपि स्त्रियम् जनलोक अन्यथा- अन्य प्रकारेण असतीत्वेनेत्यय विथ कते सम्भावयति । कारणाद, स्वधुभिज प्रमदा कामिनी त्रियास्वर्तुरभिगता अप्रिय अभिना वा (स्वाद) परिणेतु स्वभ समीपे पाश्वं इष्यते = वायते । अत एतस्मात

संस्कृत सरलाय का कामिनी यदि सदा स्वपितृकुले एव निवमति नहि पतिव्रतामपि ता जन असतीत्वेन सम्भावयति तस्याश्चरित्रविषये का विध अतो वधूव जनास्तस्या स्वभर्तु समीप मेव निवासमिच्छति सा स्वचतुरभिमता अन- भिमता वा भवेन्।

टिप्पनी

उपायस्तम उपायाम का अर्थ है किसी बात के अनुमोदनाय उसे सामने प्रस्तुत करना उप+नि+अस + यह नया अनोखी बात मेरे सामने उपस्थित की गई है। वचनोपपासात का सामने रखना राजा के उपयस्तम को ही लक्ष्य कर वचनोपन्यास कहा गया है-उप+नि+घञ सुतरामू बहुत अधिक- सु+तरप किमेतिडव्यय' नून मे अंत मे आग प्रत्यय लोकवृत्तान्तनिष्णाता- लोकस्य बताने व्यवहारे निष्णाता कुशला निस्ना+क्त 'निनदीभ्या नाते कोमले से कुमाला में धातु के सकार को पत्व परि परि + नी + च षष्ठ्येक यचने विवाह के समय वर अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करता है कया उसकी अनुगामिनी बन साथ पलती है अत पति को परिणेता कहा जाता है। यह क्लोक तत्कालीन सामाजिक स्थिति पर भी प्रकाश डालता है मधवा स्त्री का अधिक समय पितृकुल में रहना उचित नहीं माना जाता था, पद्मपुराण की भी यही मापता है "कन्या पितृग व सुचिर दास महति लोकापवाद सुमहान् जायते पितृवेश्मनि । कामसूत्र उसे विशेष अवसरों पर ही पितृगृह जाने के लिए कहता है "जातिकुलस्थान- भिगमनमन्यन पनोत्सवाभ्याम्।"

राजा कि चात्रभवती मया परिणीत पूर्वा ? शकुन्तला (सविषादम् आत्मगतम्) हृदय, साम्प्रत ते आशङ्का ।

[ संपद दे असा ।] शाङ्गरेव – कि कृतकार्यद्वेषो धर्म प्रति विमुखता कृतावज्ञा राजा कुतोऽयमसत्कल्पनाप्रश्न १

शाङ्ग रवमूर्च्छन्त्यमी विकारा प्रायेणैश्वर्यमतेषु ॥ १८॥

राजा - क्या मैने इसकया (कुतला ) के साथ पहले कभी विवाह भी

किया था ?

शकुन्तला (विवादपूवक मन मे ) हृदय, तेरी आशा उचित ही थी।

शाहू रख- अन्वय- किं कृतकाय द्वेष धर्म प्रति विमुखता कृतावा

शब्दार्थ किम् क्या किये गये काय के प्रति अरुचि, धर्म =

प्रति विमुखताकतव्य पालन से मुख मोहना, कृतावजा किये हुये काय का जान बूझकर निरादर करना।

अनुवाद क्या किये हुये काम के प्रति अब आपको रुचि हो रही है अथवा आप कतव्य पालन की ओर से मुख मोड़ रहे है, अपना आप (जान सकर) किये हुये काय का निरादर कर रहे है।

राजा- झूठी कल्पना पर आश्रित यह प्रश्न कहाँ से उपस्थित हुआ ?

गाङ्ग रख-

अन्वय-- ऐश्वयमतेषु प्रायेण अभी विकारा मूच्छन्ति ।

शम्दार्थ ऐश्वयमत्तेषु वैभव के कारण मदाय (लोगो मे प्रायेण प्राय अमी विकारा ये मन के विकार, मूच्छन्ति बढ़ते ही है।

अनुवाद-वैभव के कारण मदान्ध aधकतर ये ( कृतकाम पादि) मनोविकार बढते ही रहते है।

भावाथ— राजा के यह कहने पर कि क्या मैंने कभी इससे विवाह भी किया या शाङ्गव कहता है कि अब ऐसा कहकर क्या आप अपने किये हुये काय के प्रति अपनी अरुचि दिखला रहे है, अथवा यह आपका कतव्य से गुल मोडना है अथवा अब आप जान कर अपने किये हुये काम को ही दुष्कम समझकर उसका तिरस्कार कर रहे है?

शाङ्ग रव की ये बातें सुनकर (राजा बीच मे ही उसे रोक कर कहता है कि मेरे विषय मे ऐसी झूठी कल्पना का तो प्रश्न ही नहीं उठता, पर शाङ्ग रख अपनी बात को पूरा करता हुआ आगे कहता है कि ऐसा प्राय देखा जाता है कि जो लोग वैभव से मदान्ध हो जाते है उनमे कृतकामद्वेष आदि मनोविकार प्राय उत्पन्न होते ही

है जैसा कि आज आप मेहता से विवाह करने के बाद भी अब आप उसका निरादर कर रह है।

विशेष प्रस्तुत पद्य में सामान्यास वापत विशेषाय का समयन होने स अर्थात यास बजार प्रवोध में सदेहालकार, अप्रस्तुत एवगमन मामा य से प्रस्तुत ऐश्वयमत्त दुष्यात मी हा रही है जन अप्रसार हेतु और अनुप्रास अलकार तथा आया जादि है।

संस्कृत पाया रिम निर्मिति हमेच्या नि िवार निरूपमणि अविरत वामप्रति विस्वतस्य पलन प्रति विमुखता पर बना हृतस्य विचारूपस्य रमण वा अनादर किम एश्वर्येण वि भवन सत्तमदा एम्यम से दो- जन प्रायेण बाधकपन अभी विकारात मनाविवा प्रबंध ते एवनि ।

संस्कृत सरलाय कि भारतीय परिणीतपुर्वेति राजवचन मारण्य गाङ्ग र वचयति रि भवानधुना स्वेच्छ्या त गा धनवाहरूपमणि वाच प्रदrयति अथवा स्वतस्यपालन प्रति वैम्रय्यम् अथवा स्वकृतकार्यावधीरणा या दतियाँ व तयापि नास्त्य निर्माण विवाह प्रभुत्वमदमतेषु जने- व्यवप्राया मनोविकारा प्रबंधात एव

टिप्पणी

परिणीत पूर्वा पूर्व परिणीता इति परिपूर्वा भूतपूर्व चरदिति ज्ञापका शब्दस्य परनिपात साम्प्रतम इसना अ4 एहि सनीवानी मधुना माम्प्रतम् तथा" के अनुसार "उस समय" होना है पितु जब इसका प्रयाग विशेषणवत् होता है तब जसा कि कहा है, दूसरा जय उचित' होता है। सविवादम विपादेन सहि तम यथा स्वात्तथा ।

कृतका द्वेषस्वेच्छया कृते गा विवादेष पुणा दिसु धन-द्वेष फिर भी ऐसा करना प्राय होने से कुछ अंश तक क्षम्य माना जा सकता है। कृतावज्ञा=कृतस्य अवज्ञा असदभावना से प्रेरित होकर विवाह करना और फिर उसका तिरस्कार करना सवया अक्षम्य अपराध है। धर्मप्रतिविमुखता - धनविधि से शकुन्तला को पत्नी रूप मे स्वीकार करने अब उसने उत्तरदायित्व के वहन करने से पराह मुख होना सवमा अनुचित है। असत्कल्पनाप्रश्न सदधा असत्य कल्पना पर आधा रित यह प्रश्न उचित नही ( असती या कल्पना अगम्भस्तुविषयिणी कल्पना सवा निराधार कल्पना मूलक प्रान अथवा असती या कल्पना तथा (कृत) प्रश्न मूच्छन्ति मूच्छ धातु के दो अर्थ होते है छित होना और बढना, 'मूर्छा मोह उच्छ" प पर इसका अर्थ वदना है कालिदास ने अपन भी इस अर्थ मे प्रयोग किया है "शिलोच्चये मुण्डति मारुतस्य तीयस्वन प्रच्छति म गलायें रघुवोधयुक्त कथन होने से यहाँ त्रोटक नामक गम का अंग है "त्रोटक पुन सरब्धवा" सा० द० ०

राजा विशेषेणाधिक्षिप्तोऽस्मि ।

गौतमी जाते, मुहूर्त मा लज्जस्व अपनेष्यामि तावत् तेऽवगुण्ठनम् । तत्या भर्ताऽभिज्ञास्यसि [आये मुहमत्र मा जज्ज अवणइस्स दाब दे ओढण्ठण तदो तुम भट्टा अहिजाजिस्मदि । भ्रमर इव दिभाते कुन्दमन्वार परभक्त व शक्नोमि हातुमे ॥ १६ ( इति विचारयन स्थित 1)

(इति यथोक्त करोति

राजा - (शकुन्तला निर्वर्ण्य आत्मगतम)

पनतमेव रूपमक्लिष्ट कान्ति

प्रथमपरिगृहीत स्यानवेत्यव्यवस्थन्।

A = शब्दाय एवम् इस प्रकार, उपनगर, इदम् इस अष्ट कान्ति निर्दोष गाभाशाली रूपम् सौदय से व्यक्ति को प्रथम- परिगृहीतम् पहले कभी ( विवाह रूपम) स्वीकार किया है, न बाबा नही इति अव्ययस्य इस प्रकार freee पर सकता हुआ, विभातेप्रातकाल अन्तस्तुषारम् ओत से भरे हुए कु कु के पुष्प को, भ्रमर भ्रमर के समान (मैं) परभक्त बनो तो इसका उपयोग ही कर सकता हूँ, नैनोहा (और) न (इसे छोट हो सकता है।

राजा - ( इस कथन से ता) मै अत्यधिक हुआ है।

गौतमी (पुत्री, पोडी वर केला व तो मैं तेरे घूंघट को ही हूँ तब तेरा पति तुझको पहचान लेग (यह हर पैसा ही करती है) राजा - ( मकुतला को ध्यान से देखकर मन ही मन )

इदमिति अन्य उपनतम् इदम् कतिपय प्रथमपरिगृहीतम् या नया इति अस्वस्थ विभात अक्षरम कुम्भ्रम इव न परिभोक्तम् नैव हातुम् शक्तीमिः ।

अनुबाद - प्रकार प्राप्त हुये इस निर्दोष शोभाशाली सौन्दय को अर्थात् सौम्यशाली व्यक्तित्व को (मैंने कभी पहले (पत्नी रूप में स्वीकार किया था अथवा नहीं, इस प्रकार निश्चय न कर सकता हुआ प्रात काल ओस से भरे कुन्द पुष्प को अमर के समान में न तो (इसका उपभोग ही कर सकता है और न (इसे छोड ही कता है।

माया कुन्तला को ध्यानपूर्वक बेचकर राजा अपने मन मे सोचता हुआ कहता है कि इस प्रकार अपात् गर्मी रूप प्राप्त हुये इस निर्दोष शोभा सम्प इस सुन्दरी को मैंने कभी पहले पत्नी रूप में स्वीकार किया था अथवा नहीं इस प्रकार किसी निर्णय पर न पहुँचता हुआ में उसी प्रकार न तो इसका उपभोग हो कर चा

हूँ और न इसे छोड़ हो सकता है जैसे अमर उस कुद पुष्प को जिसमें कि ओस भरा हुआ है, तो उपभोग ही कर सकता है अर्थात् न तो उसके रस को ही ग्रहण कर सकता है और न उसको छोड़ हो सकता है।

उपमा और संदेह अलकार है और अनुप्रासकार है मालिनी नामक छन्द महासय नामक नाटकीय भूपण है "अनिश्चयात यद्वाक्य संगम सनिगयन" प्रसाद गुण, वैदन रीति ।

संस्कृत व्याख्या एवम अन्न प्रकारेण उपननम्प्राप्नम्टा अनिष्ट अाना निर्दोषा वा कांति शोभा यस्य तत् अलिकति इदम्- पुरोवति रूपम् सौदयम क्षणमात्र सुन्दरी रमणी नित्य प्रथमपरिगीत पत्नीरूपेण स्वीकृतम् स्थान भवेत् नानाभवेइति- एतत् अन्यवयम् नि विमानन पा हिमन्यतद्वाम्म्मम्म पपइच - परिभा त्वम् गक्नोमि सम

संस्कृत सरला थापा कुमारस्यासा त्या मनोगतात नित्रयात्तत् परित्यज्य गमपि पारयति तवामिदानीमेव समुपगत मनि सुन्दरी मिमाम् मयय व गाधविवाह विधि पत्नोत्येन स्वीकृता भवेदिति निमान् नैवापभोक्ता नैव च परित्यतुमपि प्रभवामि ।

टिप्पणी

विशेषेण अधिक्षिप्ताऽस्मि में विशेष रूप से निरहुआ है। प मारव का कचनसामा करनी है इसमे राजा के तिरस्कार की कोई बात नहीं है तथापि परिस्थिति एव ने यह सदन सम्राट को लक्ष्य करके कहा है, अत राजा के लिये ऐसा सोचना भी स्वाभाविक है पिशा रख दे वचन विशेष रूप से उत्तेजक है फिर भी राजा सहन करके केवल हानाह कहना है कि इस कथन से मेरा निरस्कार किया जा रहा है वह भी नही होता और न कुछ उत्तर ही पता है इससे राजा की धीरता गम्भीरता मुनिजनो के प्रति आदर भावना तथा शान्तिप्रियता सजिना का पता चलता है। अवगुण्ठनम इससे ज्ञात होता है कि इस समय उप कुलों में विशेष अवसर पर घूंघट डालने की प्रथा थी, महाकवि मास के नाटका से भी ऐसी हो परम्परा ज्ञान होती है "सक्षिप्यताम् जवनिका" देव्योऽवगुण्ठन मपनयामि स्वप्न एक प्रतिमा० ।

क् करोति यह कहकर गौतभी उसके पथ को हटा देती है जिसने कि दुष्यन्त उसे पहचान ते पस्तुत गौतमी द्वारा इस स्थिति मे घूंघट हटाना, जिससे कि उसका पति उसके उसी सौदय को पुन अपनी उही आँखो से जिनसे कि उसने उसे पहले देखा था और आकृष्ट होकर विवाह किया था, देख ले और पहचान ले,

गौतम की हीजनोचित बुद्धिकुशलता की चरम सीमा का परिचायक है, साथ ही इससे पवि का रचना कौशल, मनोवैज्ञानिक अवसर प्राप्त सूक्ष्म निरीक्षण भी दोलित होना है।

गौतम के इस कथन से लेकर की समाप्ति (अयम) सधि है, क्योंकि यहा शाप के कारण शकुन्तला को पहचानने में विघ्न उपस्थित हा है "यत्र मुख्यफलोपाय उभिन्नो भोक  [न्तरायम्पस  इति स्मत "वा" कोनावमृधन यानाद्वा विलोभनात गमनिचिन्न सोध्वमय इति स्मृत" यहाँ शाप रूप see से अवश है। यहां प्रकरी नामक अपप्रकृति और नियतानि नामक कार्यावस्था है।" मामा वैदिकाना यथा पुष्पक्षतादय । अवणनादिस्तु प्रसगे प्रकरी भवेत" यहा प्रसगत ऋतुवणनावि करी के अगत है। जैसा कि पष्ठ अंक में "तत प्रविशति भूताव कुरम्" से लेकर "पये तक प्रकरी बनती है किन्ही आचायों ने षष्ठ के मत को प्रकरी माना है। "नियता तु फलप्राप्ति यदा भावेन पश्यति" अर्थाद जहा फल प्राप्ति का निम्मित निर्धारण हो वहा नितान्त नामक कार्यावस्था होती है अवशद्धि के १३ जग होते है पासफेटो विद्रवद्रवशक्त युति sent यवसायो विरोधनम्। प्ररोचनाविचलन मादानञ्च प्रमोद एवम् यद्यपि इसका स्पष्ट अप है, क्योग से, बिना किसी उद्योगविशेष के ही प्राप्त हुई. पर कुछ टीकाकारों ने इसका तात्प आसरा रूप मे लिया है और इसके प्रमाण रूप मे रख के फवन 'सत्या' इस प्रतिह्यताम् " को बताया अतएव उपमा मे कु द को अतस्तुधार कहा गया है। प्रत यह अब भी ठीक है। अलिकति इससे शकुन्तला की प्रथम पीवन विकासशालिवा तथा अप्रूवलावण्यशालिता द्योतित होती है और यही राजा के त्याग न कर सकने मे कारण भी है। रूपम् इस पद से लक्षणशक्ति द्वारा रमणी का ग्रहण है क्योंकि रूप परिगृहीत नहीं होता। अत लक्षणा द्वारा इसका अर्थ है- रमणी मूर्ति अव्यवस्थन- वि+अथ+ सो सदनसमास विभाते अन्तस्तुषारम्-इससे योतित होता है कि fre प्रकार प्रra write तुषार से आवृत कुछ पुष्प के रस को भ्रमर नहीं ग्रहण कर पाता उसी प्रकार शापात शकुन्तला के सौदर्य रस का पान राजा नही कर पाता । कुन्द पुष्प यथा तुषारात है कुतला भी आया है। तुषारस्प के असह्य होने से अमर उस पर नहीं बैठता, इसी प्रकार आपserer रमणी का ग्रहण धर्मात्मा राजा भी नहीं कर सकता है। विभाते' से तात्पय है कि जिस प्रकार, प्रात कालीन तुषार जब सूप किरणो से नष्ट हो जायेगा तब भ्रमर को उसका रस अवश्य प्राप्त होगा उसी प्रकार जब अभिज्ञानदशन द्वारा शाप निवृत्त हो जायेगा तब राजा को शकुन्तला का उपभोग अवश्य प्राप्त होगा। इससे स्थायी भाव रति की दृढता ध्वनित होती है। परिमोभ्रमर तो पारस्पश के अमा होने से और राजा आपनत्व और परकीया होने से उपभोग नहीं कर पाता हाम्रो पुष्परसास्वाद में लालायित होने के कारण नहीं छोड़ पाता और राजा उसके अपूर्व

प्रतीहारी (स्वगतम्) अहो धर्मापेक्षिता भईया नाम सुखोपनत रूप कोम्यो विचारयति ? [अहो धम्मावेजा भट्टिणीस नाम मुहोबगद रु देखिन को अविआ) शाह रवभो राजन् किमिति जोमारयते ?

राजा भोस्तपोधना चिन्तयति न खलु स्वीकरणमत्रनवत्या स्मरामि भिव्यक्तमवलक्षणा प्रत्यात्मन क्षेत्रमाशङ्कमान प्रतिपत्स्ये

शकुन्तला (अपवाय) आर्यस्य परिणय एवं गन्दे कुत इदानी मे दूराधिरोहिण्याशा ? (अार परिणए एव्व सदेहो कुदी दाणि में दूराहिरोहिणी आणा ?]

शारव माता

सुतस्य नाम मुनि विमान्य मुष्ट प्रतिपादयता सम पात्रीकृतोदपुरियासि येन ॥२०॥

वो शरण नहीं पता। सामा छोडी मे पाप का भी है।

प्रतीहारी (मा) महारानी (2) उपयो देस बारा वाज लावण्यवती रमणीक नया प्राप्त करनारे क

मारव

राजा तपासाची (अप) कार करने का स्मरण इसके प्रति अपा हो देवी (पा

शकुन्तला (एक और मुह कर) महाराज (ग) विवाह मही T सदेह है तो फिर (अप) मेरी (प)

शात २४ तुम्हारा हा प्रम

कृति अवाभिमान सम्मान पुन विग नाम । वन गुष्टस्वम् जाम् ।

सध्या कृताभिमशा तुम्हारे द्वारा बताए उपा (मी) सुता (अपनी पुषी को अनुमन्यभाग (तुम्हार लिए) अनुमति दे दा मुनि ( उस) = = काश्यप मुनि का दया तुम्हे विनान्य नामवस्तुत अपमान ही करना चाहिए।

११७

जिसके द्वारा गुप्टर राग अन्न (रूपी धन को पतिब्रता तुम्हे ममपण हद चोर या समान तुम ) पात्रीकृत अपाय पान बताए गए हो।

अनुवाद (तुम्हार द्वारा बना उपता (भी) (अपनी पुत्री को (तुम्हारे लिय) अनुमति दे देने बाल (न) मृति कायम तुम्ह वस्तुत अपमान हो करना चाहिये जिस द्वारा सुराग भी अपन (अकृतना रूपी घर को (तुम्हे) समर्पण करते हुये पोर पे समान तुम यान्य पात्र बनाय गये हो।

भावाब- राजा का का सुनकर शान कहता है कि तुम्हारा ऐसा कहना प्रस्तुत प्रसंग सबथा ठिक है, तुम्ह ऐसे उन मुनि काश्यप का अपमान ही करना चाहिये जिसने कि तुम्हार द्वारा तात् उपभोग की नई भी अपनी पुत्री का तुम्ह समर्पित कर दिया है जया जाए आदि न देकर इस का को भी अनुमायित करते कुता को समर्पित कर दिया है। वस्तुत व की यह व्याक्ति है जमरा नायक तुम्ह उस मुनि का कदापि अपमान न करना चाहिए। वस्त मूनि तुम्हारे साथ जैसा ही उदार व्यवहार किया है जैसा व्यक्तिसार जपने घर से चुराये को उसी और को समर्पित कर देना भी करता है।

विशेष-पदवि' में उपमालकार इम उपमा से दुध्यत की निकृष्टता परिजनवार से वस्तु ध्यनि हे अत सूक्ष्मा लकार, अपराधी दुप्पन को सतायाच कया कर भी तो नहीं हुबा afia f अरवृत्ति अनुप्रास, उपजाति नामक

संस्कृत व्यायात अनुजिनिम बलात् ताद वा उपभोग यस्यास्ताम् उतभिशाम सुताम् स्वकाया पुत्री मा अनुमन्यमान ल गायनुमोदमान मुर्ति महर्षि काश्यप स्वया पुष्यन्तेन विमान्य नाम = अवमाननीय एवं मन नियमापि दयालुना मुनिना मुष्टम्भोखिम, स्वमथम्स्वनीय कुता धनम् प्रतिआत्मविदत्वा तवाधीन काश्यता पुरुषेण त्वम् दुष्यन्तदस्सीय पात्रोकृत सुपायतानीतोऽसि तत्परा विस् या मुनिना स्वनयात्समीपमय fear तस्यावमानना म वया वायति नाव ।

संस्कृत सरलाय राजरचन मारण्यास कपयति यत्नमा छाप भुक्तामपि स्वसुता तथा हि एवं विस्मृत्य वा विवाहमा त्विया न तावदयमानीय पापादिनिग्रह समताप याना बेन मुनिना चारित स्वीय साधन प्रतिग्राहयता स्व इत्युरिव पात्रत्व प्रापिताऽसि ।

- शकुन्तला (अपवार्य) इद मवस्थान्सर पते सानुरागे कि वा स्मारितेन ?

आत्मैदानों मे शोचनीय इति व्यवसितमेतत् (प्रकाशम्) आर्यपुत्र ( इत्यर्धोक्त) सावित इदानीं परिणये नव समुदाचार ।

-- पौरव न युक्त नाम ते तथा पुराश्रमपदे स्वभावोसानहृदयभिम जन

शारद्वतशाङ्गरव, विरम त्वमिदानीम् । शकुन्तले, वक्तव्यमुक्तम- स्माति सोऽयमभवानेवमाह । दीयतामस्म प्रत्ययप्रतिवचनम् ।

टिप्पणी

धमपिशिता-धममपेक्षते विचारयति इति धर्मापेशी-धम अप + ईश वालो वाच्छील्ये गिनि तस्य भाव तल धमपेिक्षिता धमनिष्ठता धार्मिकता, यदि ऐसा न होता तो कौन दूसरा व्यक्ति इस प्रकार से अपने आप प्राप्त अपूर्व लावण्यवती रमणी को स्वीकार करने में आगा पीछा सोचता अर्थात् कोई न सोचना, तुरत स्वीकार कर लेना, क्षेत्रिणम क्षेत्रम (पत्नी) यस्य तने बेदारे" परपत्नी मे समाधान करने वाला व्यक्ति क्षेत्री कहलाता है बीजी नहीं, झारो उत्पन्नात कही जाती है जो कि औरस सतान को अपेक्षा निम्न मानी जाती है गमव स्वीकार करने पर मै इसका क्षेत्री पति कहलाऊँगा और यह मेरी क्षेत्र पत्नी होगी धमपत्नी ही इस प्रकार यह कथन भी मान हो सकेगा प्रतिगाना चरणाय जहा क्षेत्रिय पाउ है वहा इसका अय है परस्त्रीगामी इसमे राजा का धीरू होना afte होता है। अपवार्य रहस्य कथ्यतेऽयस्यापवारितम्" ।

राधिरोहिया परिग्रह प्रतिष्ठे कुलस्य न" राजा इन कथन के अनुसार कुता को वह महावाक्षा थी पर राजमहिन बनेगी। मातायत इसके यहां दो अहो सकते ऐसा न कहिये अथवा आप कुला को स्वीकार न करें। विना नाम उपमान करो और यदि माता को यहाँ लगा लिया जाय तो अप होगा, मुनि का अपमान न करो वस्तुत जाह्नव इस कथन मे यहाँ कठोर व्यय ही ध्वनित होता है और यह गानुकूल भी है 'नाम' को यूवक भी होता है जत इसका तात्पय होगा कि मुनि का तुम्हारे द्वारा अपमान तो होना ही चाहिये और तुम से क्या आया की जा सकती है पर यह भी न भूलना चाहिये कि मुनि वह समय भी है। एक बार तो क्षमा कर दिया पर यदि अब तुमने तिरस्कार किया तो दण्ड नागी भी होगे अनुनयमान मन् - कमणि मानच, सुष्टम मुस्तेयतप्रति प्रतिष्पत पहिच

शारद्वत- शाङ्ग रव । तुम अब चुप हो जालो (जो कुछ भी) हमे कहना था कह दिया यह राजा इस प्रकार कह रहे है। अब तुम विश्वम नौम उत्तर दो।

शकुन्तला (एक और मुह करके) जब वैसा (प्रगाड ) प्रेम इस विपरीत दशा तक पहुँच चुका है तो (अब) याद दिलाने से क्या लाभ है अब यह तो निष्य है कि

समयपूर्व प्रतापॅरारक्षरं प्रत्याख्यातुम् [इम अवत्थन्तर गंदे तारिसे अणुराए कि वा सुमराविदेण अत्ता दाणि मे सोबणीओ त्ति वयसिव एव ।
अज्जउत्त- ससइदे दाणि परिणए ण एसो समुदावारो
पोरव, ण जुत्तणाम दे तह पुरा अस्समपदे सहादुताणबिअ इम जग समअपुब्व पतारि ईदिसेहि अक्षरेपिच्चाचखि ।]
राजा - ( कणों पिचाय) शान्त पापम् ।
व्यपदेशमाविलयितु किमीहसे जनमिम च पातयितुम । कूलकवेव सिन्धु प्रसन्नमम्भस्ततच ॥२१॥
मुझे अपने आपकी ही निन्दा करनी पड़ेगी अर्थात् अपने भाग्य को ही कोसना पड़ेगा। (प्रकट) आयपुन ( इतना आधा ही कहकर बीच में ही रुक कर ) अब तो विवाह केही सदिग्ध होने पर यह सम्बोधन उचित नहीं है पौरव आपके लिये यह 1 उचित नहीं है कि इस प्रकार पहले आम स्थान में स्वभाव से ही गाम्भीपरहित- जति सरल ए हृदय वाले इस व्यक्ति को (मुझे) शपथपूर्वक, अथवा विवाह वा समयपूर्वक धोला देकर इस प्रकार के वाक्यों से उसक निराकरण करें।
राजा - (कानों को बाद करके पापा हो । व्यपदेशमिति अन्य किम् (a) व्यपदेशम् आविलयितुम् इमम् जन - पातयितुम् व से दूलकपास परापम् जम्भ तच द
शब्दाय किम् क्या, (तुम) व्यपदेशम् कुल को आविधिकलकित - करने के लिये इमम् जनम् इस जन अर्थात् मुझ दुष्यन्त को, पातयितुम् पतित बनाने के लिये इसे पेष्टा करती हो, कूलकया अपने किनारों को तोडने वाली = सिन्धु नदी, प्रसन्नम् अम्भस्वच्छ जल को आलम तटतरम् न पातवितुम् = गन्दा करने के लिये और किनारे के वृक्ष को गिराने के लिये (इहते चेष्टा करती है।
अनुवाद क्या (तुम) अपने कुल को कलकित करने के लिये और इस जन अर्थात् मुझ दुष्यन्त को पतित बनाने के लिये उसी प्रकार चेष्टा कर रही हो, जैसे कि (एक) किनारों को तोडने वाली नदी स्वच्छ जल को गदा करने और किनारे के वृक्ष को गिराने के लिये चेष्टा करती है।
भावार्थ- शकुन्तला की बात सुनकर दुष्यन्त कहता है कि क्या तुम उसी प्रकार अपने कुल को कलमिन करने की एवं मुझको भी पतित बनाने की चेष्टा कर रही हो जैसे कि एक अपने किनारों को तोडने वाली नदी स्वच्छ जल को गन्दा करने की तथा किनारे के वृक्ष को गिराने की चेष्टा करती है, जल प्रवाह के आधिक्य से जैसे नदी अपने किनारों को लाने से मिट्टी गिराकर जल को गदा कर देती है और मिट्टी के बह जाने से कमजोर हुआ किनारे पर खड़ा हुआ भी वृक्ष उसमे गिर पड़ता है उसी प्रकार तुम स्वयं पतिता होकर जो यहाँ मेरे पास भाई हो इससे प्रकट है कि
तुम अपने कुल को भी कर रही और मुझे भी पतित बनाने की प्र
रही हा विरोध जनमेजनमा ममुष्वय यथासम और अनुप्रास जनकार है,
विमिति व्यादेश नृम्स एवम् म्म्म्मान पनि रासपतीति स्वकीयनपातनमा निनदी, निमजनम् मिमविनीतम्
संस्कृत सरलाय वा स्वपातनशीना नदी स्वच्छ स्वीय जन तोत्पाटन कि जातपति यच्छाचारिणी भूमीपमागमनेन स्वनिमत कुल एवं मा
टिप्पणी
प्रतिमय विश्वास प्रतिवचनम् उत्तर ऐसा उत्तर को विश्वास के प्रति मध्य आत्मा- अपन का दो शोचरीय चिक्कारना है अपने ही भाग्य का कोमना है इसम अन्य किमी पायी यह मेरा भाग्य दोष ही है। जन्यत्र शाधनीय भी पाठ है इसका जबरन का नियन करना है अवस्थामामवस्थामिति मनित्यसमान अत्तर शस्यस्य परनिता पौरव पुर राजन में उत्पन्न होकर जो तुम आपका पर रहे यह सब अनुचित है, अपने नका कर अपने को पति बना रहे हम यही नहीं आप जैसे ही लोग वारी हान है, पर नहीं स्वभावोसानहृदयम- नमपि हृदय न आश्रम होने के कारण मेरा राहा पर मन से मुख एवं है।
उत्पादि अथवा निश्चित समय पूर्वक क्रम दिवसे दिवसे मदीय इत्यादि अथवा रासकर मुग्ध को पारित कर न खलु निवीकरण मंत्र भरत्या ममि इत्यादिवास्यो द्वारा प्रत्याख्यातुम्- निराकार करना प्रतायत तु क्त्वा पपवेशय- पदिय अपरिचीयतेनानेन वि+अ+ विश्+मपदेश वश या कुल विजयिनुम् आनि करोति तचष्ट इति

शकुन्तला भवतु यदि परमार्थत परपरिग्रहाडिकना त्वयैव वक्तु प्रवृत्तम् तदभिज्ञानेनानेन तवाशङ्कामवनेष्यामि । [हो । जइ परमत्यता परपरिग्गहसकणा तु एव्व वत्तु पवन वा अहिमाणेण इमिणा तुह आसक अवणइस्स । ]
राजा उदार कल्प
शकुन्तला (नुहारथान परामृश्य) हा धिक अगुलीयकशून्या मेss तिही अली अण्णा मे अगुवो || (इति तविषाद गौतमीमवेक्षते ।)
गौतमी नून ते शकावताराभ्यन्तरे चीतीर्थसलिल पन्दमानाया वन्दमा भट्ट अली ॥]
राजा - ( सस्मितम) इव तत् प्रत्युत्पन्नमति स्वणमिति यदुच्यते । शकुन्तला अत्र सायद विधिना दर्शिन प्रभुत्यम् अपर ते कथयिष्यामि ।
( एत्य दाव विहिणा दसिद पण जवर के कहिस्स ।]
राजा श्रोतव्यमिदानी सम्वृत्तम् ।
"काऽस्य व्यपदेश " विधायन समिते अारोप अपिधाय इत्यपि शान्तम्- शम् गिता पालयितुन परतफूल +
अच्छा यदि वस्तु (सु) परी की मारने वाले आपने ऐसा कहना नारम्भ किया है तो रंग भर (परिचायक अंगूठी से आपकी का को दूर करती है।
राजा यह उत्तम प्रस्ताव
(अंगूठी पहनने के स्थान अर्थात् अंगुनि का स्पशन) हाय मेरी अंगुनी जंगूठी में सूनी है।
(यह वरदानमी की जोर दन्दना है)
गौतमी निकम ही सावतार मोनपरी के जल को वदना करती तुम्हारी अंगूठी गिर गई है।
हुई राजा - (गुस्कराकर) को यह कहा जाता है कि स्त्रिया तुरत बुद्धि
(पति) होती है, यही यह बात है ।
शकुलता इस विषय में तो भाग्य ने अपना प्रभाव दिखा दिया, जब मैं दूसरी बात तुम से कहती हूँ।
राजा अब गुनना ही रह गया है।
टिप्पणी
परमायत जन्तु परपरिका परम्प जत्पत्य परिषद् कम
1 राजा शृणुमस्तावत् । शकुन्तला तत्क्षणे स मे पुत्रकृतको दीर्घापागो नाम मृगपोतक उपस्थित स्वयाय तावत् प्रथम पिवत्वित्यनुकम्पिनोपच्छन्ति उदकेन न पुनस्तेऽपरिचयाद्वस्ताभ्याशमुपगत पश्चातस्मिन्नेव मया गृहीते सलिलेऽनेन कृत प्रणय तदा त्वमित्य प्रहसितोऽसि सर्व साधे विश्वसिति । द्वावप्यत्रारण्यकाविति । [तक्खण सो मे पुसकिदओ दीहापगो णाम मिअपोदना उवट्ठियो तुए अअ दाव पडम पिवति अणुअfont उबच्छन्दिदो उअएण । ण उण दे अपरिचआदो हत्यभाम उवगद पच्छा तस्सि एव्व मए गहिदे मलिले पेण किदो पणओ। तदा तुम इत्य पहमिदो सि । सो सगन्धे विसिदि । दुवैवि एत्थ आरण्णा ति ।]
शकुन्तला - नन्वेकस्मिन् दिवसे नवमालिकामण्डपे नलिनीपत्र भाजन- गतमुवक तव हरते समितिमासीत् [ण एक्रम दिउहे गोमालिआ- मण्डवे गणपतभाग उन तुह हत्थे सणिहिद आनि ।]
राजा - एवमादिभिरात्मकाय निर्वातिनीनाममृतमयवाड मधुभिराकृ-
व्यन्ते विषयिण ।
गौतमी-महाभाग, नास्येव मन्त्रयितुम्। तपोवनसर्वाधितोऽभिनय जन सवस्य [महाभाज ण जस्म एवं मन्तिदु तवोवणसवद्विदो अणभिण्णी अन जणो पदवरूप ।]
ते इति परपरि + + णिनि अभिज्ञाने परिचीयते बने नेति अपनेष्यामि अपनी बेचारे कमणि" इति नानात्मनेपदम् सत्यपि अशरीरे कर्माणि नानाविधतामा पार कल्प वह एक मुहावरा है इसी अन्य ने प्रथम प्रति है। शुक्रावताराम्यतरे- यह एक विशेष का ताजा कि पवित्र माना जाता वा शचीतीय सलिलम दाणी घाट के को हरिनापुर के समीप शावतार पाट के पास ही यह घाट वा वदमानयात्रा ने समय अनुलोम-जिह्वामुनाङ्ग लेख से प्रत्यय (ई) तत स्वाय के प्रत्यय प्रत्युत्पन्नमति तात्कालिको तु प्रतिभा प्रत्युत्पन्नमति स्मता।" इस मुहावरे का पार यह अप लिया जाता है कि निया स्वभाव से ही हाजिर जबाव या बात बनाने में चतुर होती है। स्वणमस्त्री जाति, स्त्री+समूहार्थे नत्र श्रीतथ्य सम्वतम-जब दिलाने की बात तो नहीं रही नेवल सुनना ही शेष रह गया है वस्तु पर राजा का यह कमरा है जो मन मे आये हेजाजी में सुन रहा है। 1
शकुन्तला एक दिन नवमालिका के मण्डप मे कमलिनी के पत्तो के दाने मे स्थित जर तुम्हारे हाथ में रखा हुआ था।
राजाहा, सुन रहा हूँ (आग कहा
शकुन्तला उस समय मेरा कुनिस पुत्र दोषा नामक मृग का बच्च
राजा-तापसद्ध सदस्यते किमुत या प्रतिबोधयत्।
प्रागन्तरिक्षगमनात् स्वम्पत्यांत-
मन्य द्विजे परभृता खलु पोषन्ति ॥ २२॥

यहा आ गया था। नव दयावशीन आपने यही पहले दिये (यह सोचकर उसे जस पीने के लिए सहमत किया था, कि तु आपसे अपरिचित होने के कारण वह आपके हाथ के पास नहीं आया था, बाद में उसी जन का मेरे द्वारा ग्रहण कर लेने पर (वह स्वय (पोने के लिये करने लगा था तब तुमने इस प्रकार उपहास किया था सभी अपने निकट सम्बधिन पर विश्वास करते है तुम दोनो ही यहाँ बनवासी हो।
राजा अपने स्थान को सिद्ध करने वाली स्त्रियों के इसी प्रकार के अमत से भरे हुये मोठे वचनों से विपय लोग आकृष्ट होते है। गौतमी महोदय आपको ऐसा कहना उचित नहीं है, तपावन मे पता हुआ यह व्यक्ति ला) छल गट का नहीं जानती है।
टिप्पणी नलिनीपत्रमाजनगनमपि निर्मित भाजनम् तस्मिन् गतम् नलिनी- पभाजनम्। मगपोतकस्य पन एवं मृतक स्थान कन् धणुमस्ता यह वाक्या सब कुछ पूने हुये राजा की उपेक्षा वृष्टि का सूचक है, उसका है कि तुम कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं देगी अब घटना सुनाने मात्र से मुझे विश्वास दिलाने का प्रयास कर रही हो, कोई दान नहीं, कहो, उसे भी सुन रहा है। उपच्छन्दित आमंत्रित किया-बुलाया। प्रहसित अकमक स्वाद इस धातो कतारे इट समान ग सम्बन्ध गुण वा पंचान्ते तेषु साथियो सहवासिया या सम्बधिना पर काय "क आमोदे तेथे साग के अनुसार यहा सम्बधी हे "समानस्य छन्दति" अम योगविभागात् समानस्य स आदेश अथवा सदृशान्यनेन सह सह अस्वपदबहुब्रीहि समासे 'दोषमजनस्येति तदादेश आरण्यक - अरण्ये भव इत्यये 'अरण्या मनुष्ये' इति वृत्र (अरु) वृद्धि अथवा अरण्यस्यायमित्यर्थे जज आरण्य तत स्वायें कन् आरण्यक तो आत्मकानि विनीनाम् आत्मन कार्य नियन्ति या वासान् । अमृतमयवाह मधुभि अमृतमयनाथ एवं मधूनि अत्र अमृतमयेत्यपि पाठ वहाँ इसका अर्थ है, सत्यपूर्ण तथापि मधुर बचना से विणसासारिक सुखोप भोगासक्त जन अर्थात् कागुकान आकृष्यन्ते आ + कृ + कमणि सटकतवस्य- fere arrer कम कैवम् तस्य तस्य अभिभा 1
राजा हे वृद्ध तपस्विनी । स्त्रीणामिति-अवय-रवीनाम् जमानुषीषु (अ) अि
= शब्दाय स्त्रीणामुनिया व मध्य अमानुषीषु रातय जाति भन स्याम (अभी) निक्षितपटुमणि के निता ही चतरा (बागी) दृश्य देखी जाती है। यानि मानुषा) ( नाही? पायी जन निगमनात् आव आणण मन की शक्ति होत) में पूनम उपत्य जामुनेची का दिनिया (710) द्वारा, पान कराती है।
या धावत परता अन्तरिक्षमा उपत्य जानम् जयपापयति ।
अनुवाद स्निया (पशु जादि) की स्त्रिया भी कही (मी) दी जाती जानी मानी स्त्रियों (है) उनका बना है क्या? विहानको सामन्य नाम पनिया जीवापा पापण करानी है।
भावाय गठनमा सविता पानी की म परीने र कहने पर ही गिरामी राजा उसकी नीनाचिन नाकारा कि यता स्त्रीजातिको स्वाभावित बुद्धि किव माने पर पाबत म बढी त्रिया नहीं है जब प पक्षिया आदि की पोनिन उत्पन्न भी जबकि जमात मालाकी देखी जाती है तब भी तुरंत वृद्धि मानना त्रियों के विषय मे तो बना ही क्या? न जान रितनी चालान एवं बुद्धि होगी। राजा कहता कि तुम जानती हो कि ये उन बच्चे जापान में उड़ना नहीं सीस जाते तब तक में उनका पालन पोषण कर कराती है, (और फिर अपना बना लेनी है।
विशेष प्रस्तुत उतगत विशेषाने वागा सामान का समधन होने से अतरवास जलकार सतना सामाज्य का वर्णन करने से अप्रस्तुतप्रसता अलकार विद्युत का था से अधिक का रणन हास व्यतिरेश जलकार, प्रसाद गुण, वैदर्भी रीति, अवधारण नामक सन्धि मग हे निश्चय हेतुनापस्य मत रयधारणमा जानुस प्रयोजन का निश्चय दिया जाय। छकानुप्रास, वृत्यनुप्रास,
संस्कृत व्यापण स्त्रीणामू नारीणाम ये जमानुषीषु मानवजाति समुद्भूतपशुपक्ष्यादिस्त्रीषु (अपि) अपि न शिक्षण निशाप बना चातुव्यम् सदृश्यते आज यहा बुद्धिन (नासाम् ज्ञानसम्पन्नाना स्त्रोणान् किमुतनमित्यथ
परभूता पाहता शान कामगमन मामालामा पूर यान स्वयम् अपना अत्यसम् नमिले पतितानियोगपतियति।
संस्कृत सरलाबापु निक्षिपति काश्च कृष्णवणसाम्यात्तापत्यानि यान्यग शिशुकरान पावद पानयति इति प्रतिनिनादयत कि बक्तब्य तामा मानुषीया स्त्रीणा विपने या सति अनान सामान्य सोनीय वचनमिति ।
टिप्पणी
तापसद्ध वृद्धासी कमधारय द्वारा कमधारये इति पुद्धशब्दस्य विकल्पत परनिपात बहुतापनी शब्द ही पद्यपि अधिक प्रचलित है, पर यहाँ राजा गौतम लिए सह सम्बोधन राजा के कौन का सूचक है, क्योंकि उस कुल की ही बात का समन किया था अमानुषीषु मानवेतरजातिसमुत्पन्ना स्त्रीषु । मनोरपत्यानि मानुन मानुष्य अमानुष्य वा अशिक्षितपटुत्वम्-अमि fare अनुपरिष्टानयम्ययोश्ते 'निमगनिपुणा स्त्रिय" मावि, "त्रियो हि नाम नेता नियगादेव पण्डिता पुरुषान् पाण्डित्या पदिश्यते" मृच्छ प्रतिधत्व प्रतिदुपज्जेति प्रतिशोध प्रति + बुध + पत्र समित्यमनुमति--सुदितात्रियों के विषय में तो कहना ही अन्तरिक्षगमनात प्राजक्तरपदयोगे गमनादित्यपञ्चमी । वामध्ये जवन व कर्माणि जालक और के बीच दिनाई पड़ता है, मत उक्त व्युत्पत्ति में अतरीक्ष प्रयोग होता है पर वेव में छाय होकर अतरिक्ष प्रयोग हुआ है, कुछ टीकाकारो ने अन्त मध्ये ऋणि नक्षत्राणि वरय तत् यह भी व्युत्पत्ति की है और पोदरादित्या सिद्ध किया है। परभूताने शिकायते इति परभूता कोकिला अर्याल जातिवाची तथापि अजादित्वात्रा दीप प्रत्यय प्रिय परभूत कोfor पिक इत्यपि इत्यमर डिजे द्वि बन्ड-द्विज पक्षी और ब्राह्मण आदि भी अपत्यसन्तति समूह को पोषमति पालन- पोषण कराती है। वस्तुत यहाँ परभूत, अपत्य दिन, पोषयन्ति आदि शब्दों का प्रयोग प्राय है, कवि यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से शकुन्तला की उत्पत्ति की ओर गकेत करता है, अमानुष और परभुता के द्वारा मेनका की ओर संकेत है, वह अप्सरा होने के कारण अमानुषी और वेण्या होने के कारण परता (पर कामुकै म्रियते भी है। स्वमपत्यम् से कुतला का निया है, अन्ये द्विजे से कब का है जिनके द्वारा उसका पालन किया गया था। प्रागन्तरिक्ष आदि सेल को जन्म दकर मेनका के आका माग से जाने का संकेत है। इससे यह तात्पय निकलता है कि शकुन्तला यापुत्री अनएव अकुलीन है। कुछ आचार्यों ने इस श्लोक को पानी कमा क्याः।
शकुन्तला - ( सरोषम् ) अनार्य, आत्मनो हृदयानुमानेन पश्यसि क sarain धमकप्रवेशिनस्तृणोपमस्य तथानुकृति प्रतिपत्स्यते ? [अणज्ज, अत्तणो हिमाण पेपस्खसि को दाणिअण्णो धम्मकअप- वेणि तिच्णवमरम एव अणुकिदि पडिवदिस्सदि २]
राजा - ( आत्मगतम्) सन्दिग्धबुद्धि मा कुर्वत इवास्या कोपो लक्ष्यते तथा हनिया-
मय्येव विस्मरणवारुणचित्तवृत्ती
वत रह प्रणयमप्रतिपद्यमाने । मेदाद् वी कुटियोर तिलोहिताक्ष्या
भग्न शरासनमिवातिश्या स्मरस्य ॥ २३॥ (प्रकाशम्) भद्रे, प्रथित दुष्यन्तस्य चरितम् । तथापीद न लक्षये।
का सूचक भी माना है। परभूत पद से शकुतला की, स्वमपत्यातम् पद मे शकुन्तला पुत्र भरत को अन्ये द्विजै पद से नारीचाश्रमवासी मुनिजनो की ओर प्रागतरिक्षगमनाद पदसे माल के साथ दुष्य के मारीचा में आने की प्रतीति होती है, इस प्रकार यहाँ कवि ने मारीचाश्रम में मुनियों द्वारा सुरक्षित पुत्र सहित सतना का निवास तथा लोक से लौटते समय राजा का वहा जाना और कुता तथा भरत से मिलना, इस भावी कथा का सकेत किया है।
राहुलला (क) अन्नाय अभद्र (तू) अपने हृदय में अनुमान से ही (सबको देखता है अर्थात् जैसा [ हृदय है वैसा ही तु यूरेको (शुद्ध हृदय वाली मुझ को भी) सममता है तेरे अतिरिक्त और कौन अब धमका चुक (योगा) (बाह्यावरण, झग, पाखण्ड) धारण करने वाले (तथा) पाच फूल से ढके हुये कूप के समान तुम्हारा अनुकरण करेगा ? अथाद कोई नही
राजा - ( अपने मन मे मुझे सदिग्ध बुद्धि बनाता हुआ इसका शोध निष्कपट जान पड़ता है, अर्थात् मकुन्तला का फोध बनावटी नहीं अपितु परिस्थिति के अनुकूल स्वाभाविक प्रतीत होता है जो कि मुझे और भी सन्देह मदान रहा है। क्योकि इसके द्वारा-
मयीति — अन्वय विस्मरणदार चित्तवृत्त (अतएव रहवृत्तम् प्रणयम् अप्रति पद्यमाने मवि एम अतिरथा अतिलोहिताया (जनया) कुटिलयो भयो भा स्मरस्य शरासनम् भग्नम् इव ।
शब्दार्थ-विस्मरणदारुणवितवृत्ती (माधवविवाह की विस्मृति के कारण कठोर चित्तवृत्ति वाले, (अतएव) रह वृत्त एकान्त मे घटित हुये, प्रणयम्प्रेम वृतान्त को अप्रतिपद्यमाने स्वीकार न करने वाले एवं मेरे ही ऊपर, अतिरथा अतिक्रोध के कारण, अतिलोहिताक्ष्यात्पन्न(फोधनम) लाल नेवो बाली (अनया इस शकुन्तला के द्वारा) कुटिलयो अबो भेदात् तिरछी भौहों के पढ़ा लेने से इवमानों, स्मरस्य कामदेव का शरान् धनुष, भग्नम्== तोड दिया गया है।
अनुवाद (गाव विवाह की विस्मृति के कारण कठोर चित्तवृत्ति वाले ( अतएव ) एकात में पटित हुये प्रेमात को स्वीकार न करने वाले मेरे ही ऊपर, अतिक्रोध के कारण, अति साल नेत्रो बाली (इम सकु तला के द्वारा तिरछी भौहा के चटा लेने से मानो कामदेव का अनुप ही तोड दिया गया है।
भावाथ राजा अपने मन में सोचता है कि कुतला यह समझ रही है कि मैं आश्रम में किये गये प्रणयवहारो को भूल गया हूँ और इसीलिये इसके प्रति इतना कठोर बन गया और इसके साथ किये गये गन्ध विवाह को अब स्वीकार नहीं कर रहा हूँ, इसी अपराध के कारण यह मुझ पर इतनी क्रुद्ध हो गई है और व इसकी आंखे लाल हो गई है तथा इसको भी तन गई है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो इसने कामधनुष को ही तो दिया है।
विशेष प्रस्तुत पद्य में इसका क्रोध तात्विक है कृत्रिम नहीं, यह जलकार से वस्तु ध्वनि है और इससे स्थापिनी रति का अनुसन्धान होता है। भग्नमिव से उत्प्रेक्षालकार है अतिरुया पद अतिमहिनाया का कारण है अत पदाम हेतुक काव्यलिङ्ग अलकार है. छेक और वृत्ति अनुप्रास प्रत्येक पंक्ति में है बतला नामक छन्द है।
संस्कृत व्याख्या विस्मरणेन गान्धवाविवाहविस्मृत्या दारणा कठोरा चित्तस्य मनस वृत्ति व्यापार यस्य तस्मिन् विन्मरणदाचित्तवृत्ती (अतएव रहवृत्तम् = एकान्ते सम्पन्न, प्रणयम् परस्परप्रणयफलभूता विवाहादिकायजातम् अप्रतिष द्यमाने धर्माविश्वममियास्वीयमाणे मयि दृष्यन्ते एवं अतिक्ष्या अतिशोधन, अतिलोहिते अत्यात रक्तवर्णे भक्षिणो ने स्वास्तपा अतिलोहिताय्या ( अनया) कुटिलयो स्वभाववक्रयों व भेदात् भगव्याजात् स्मरस्य कामदेवस्य शरासनम् धनु भग्नमिव नोटितमिम ।
संस्कृत सरलाथ दुष्यतो मनसि चिन्तयति यदस्या कोपस्तात्विक प्रतीयते न तु कृत्रिम सम्यमिदमवगच्छति वद (दुष्यन्त) जाधम सम्पन्न प्रणयव्यवहार frenerate aa rवानया सह कृत गान्ध विवाहमिदानी न स्वीकरोमि, अस्मादेवापराधादेषा फोधमागता sोधवशादेवाच्या नेत्रे रक्तवर्ण जात, एव मस्या भोऽपि जात ऐतेनैव प्रतीयते यदनया कामधनुरेव श्रोतिम् ।
टिप्पणी
सरोषन रोषेण सहित यथा स्यात्तथा राजा ने गौतमी के समाधान पर आपत्ति करते हुये जो उसे कोकिला से उपमित कर उसका अपमान किया था और उक्त कथन से जो यह ध्वनित किया था कि शकुन्तला वस्तुत देण्या पुत्री होने से अकुलीन है अत जा है। इससे न केवल अपने पर अपितु समस्त स्त्री जाति पर लग्न देखकर उसे विशेष क्रोध उत्पन्न हो गया था अतएव यह उसे बनाय कह कर

शकुन्तला- सुष्ठु तावदत्र रयच्छन्दचारिणी कृतास्मि । याऽहमस्य प्रत्ययेन मुख दयस्थितविषस्य हस्ताभ्याशमुपगता ।
[सु दाव तारिणीहि जा जह इमन पुरुवसमुहम  भास उबगदा ।]
(इति पटान्तेन मुखमावृत्य रोदिति ।)
शारव इत्यात्मकृतमप्रतिहत चापन वहति ।
अत परीक्ष्य कतव्य विशेषात् सगत रह अज्ञात हृदयेष्वेव वैरीभवति सौहृदम् ||२४||
सम्बोधित करती है। धमकप्रवेशिन मस्य चुमितीत्यर्थे मिति तस्य । तुच्छकूपोपमम्मत छन म धूपस्तस्य उपमा यस्य तस्य शत्रुला के कोधयुक्त के कारण "सप से यहाँ तक सफेट नामक वा तलाया गया है "सफेटो  अथवा रात्रमितवाक्यतु सफेट परिकीर्तित"। याद से यह सूचित किया गया है कि विस्मृति ही वह इतनी निष्ठुरता दिना रहा था अन्यथा यह अनूदरी के प्रति कठोर कभी न होता स्मरस्य शरासन भग्नमिका ने कामधनुष को ही तोड दिया तब वह मुझ पर प्रहार तो कर ही न सकेगा, जत अब इसको मनाने की भी आवश्यकता नही और इसका इतना बढ़ गया हूँ कि अब किसी प्रकार का अनुनय काम भी न देगा, इसका नाति है कृत्रिम नहीं इससे यह भी ता है कि उसको नता जनमादकारिणी है जिसने नाम धनुष को तिरस्कृत ही नहीं, बाद भी डाला है, वस्तु कवि का यह उत्प्रेक्षा का प्रयाग अति रमणीय, मार्मिक, गम्भीर एवं रचनावैष्टिय का परिचायक है।
(राजा ने इतना तो मन मे मोघम प्रकट रूप से
करता है।
प्रकाशन कल्याणी, दुष्यन्त का चरित्र सर्वत्र प्रसिद्ध है, अर्थात् यह सब है कि मैं कभी भी भ्रम से भी परस्त्री का स्पा नहीं करता और न चना ही कर सकता हूँ। तथापि (तुमने जो मेरे सामने अपने मुझसे विवाहिता होने के प्रमाण प्रस्तुत किये और मुझे यक ठहराया इस बात को मैं अपने अन्दर नहीं देखा, मैंने अब तक किसी को धोया नहीं दिया है।
शकुन्तला अच्छा तो (अब) मे यहा स्वच्छ दविहारिणी, अनियन्त्रिता अथवा या घोषित कर दी गई हूँ। जो मैं पुरुष के विश्वास के कारण मुख ने तो मधु बाले अर्थात् ऊपर से मुज से मीठे वचन बोलने वाले (तु) हृदय में विष भरे हुए इस (राजा) के हाथ पड गई थी।
( इतना कहकर आप से मुख ढक कर रोती है)

शाहू रइस प्रकार अपने आप की गई दाहक होती है। अत इति अन्य समनपरी तव्यम गि
(परीतव्यम् अदषु एवम् भवति।
दाएमा प नकुलाचार आदि का भीभाति निगय करने या करना चाहिए रह एका सग तो विशेष रूप से परीक्षा करने के बाद ही करनी चाहिए (अयथा बाहयेषु जिनके हृदय---आचार विचार व्यवहार आदि का ज्ञान न हो ऐसे जागो के साथ किया गया सौहृद प्रेमप्रणय एव 4 बैरी भवति इसी प्रकार जैसा कि तुम्हारे साथ इस समय हुआ है, विद्वेष संता का कारण होता है।
अनुवाद-अत मित्रता या प्रथम व्यक्ति विशेष के कुलाचारादि की परीक्षा करके करना चाहिए, एकान्त सतोष रूप से परीक्षा करके ही करना चाहिए अथा (जिस व्यक्ति विशेष के) आभार-विचार व्यवहारादि का शान न हो ऐसे व्यक्ति के साथ किया गया प्रणय इसी प्रकार द्वेष का कारण होता है।
भावार्थदुत और केको गुनकर अपने अन्तिम निर्णय के रूप में रख कहना है कि इसीलिए तो यही सवा व्यक्तिविशेष के कुलाचार आदि की प्रेम परीक्षा करके करना चाहिए किन्तु एका यो विशेषरूप से व्यक्ति के विचार व्यवहार आदि की सवा ग परीक्षा करके ही करना चाहिए, अन्यथा इसका परिणाम द्वेष का कारण होता है, जिस व्यक्ति के आचार विचारों को अछी तरह नहीं समझा देखा, सुना गया है ऐसे व्यक्ति के साथ मह किया गया प्रणय परिणामत दुखद ही होता है, जैसा कि इस समय तुम्हारे सोहा है
विशेष—यहा प्रस्तुत विकेमनको नकोत सामान्य मनसा को बताया गया है अत अशाकार उत्तराय मे अन्य रूप से सामान्य के द्वारा विशेष का समर्थन किया गया है अत अर्थातरन्यास अकार पूर्वाध के प्रति परागतवान्या हेतु है, अता काव्यलिङ्ग अंलकार है। प्रसाद गुण, वैदर्भी रीति पावन नामक छन्द है, मस्त श्लोक writer के लिए एक चेतावनी है, सम्भवत कालिदास के समय में भी श्रेष विवाहो के सुष्परिणाम दिखलाई पड़ने लगे होगे प्रेम विवाह प्रचलित रहे होने पहा कवि ने इस ओर संकेत किया है और अप से प्रेम विवाह के प्रति अपनी रुचि प्रदर्शित की है वस्तुतप्रेम विवाह के लिए प्रेमीजन में उत्कृष्ट विवेक की आवश्यकता है, ऊपरी पण या अन्य किन्ही कारणवश किया गया प्रणय विवाह विद्वेष का ही कारण होता है।

राजा अपि भो मित्रभवतीप्रत्ययादेवास्मान् सयुक्तदोषाक्षर
शारव (सूयम्) भूत भवरधरोत्तरम- आ जन्मन शायपि स्तस्याप्रमाण परातिसम्धानमधीयते पै विद्येति सन्तुलिप्तवाच ॥२॥ वचन जनस्य ।
संस्कृत व्याख्यात अस्मादेव कारणाद, संगतम् मंत्री प्रणयसम्म ध रह संगत (तु) एकागम् (तु) विशेषात् विशेषण परी कम्प तम् अपरीक्षित त्यम्मन व्यक्तिविशेषस्पासारविचारादिकायेषा हृदयेषु सौगमगम् एवम् बैरी भवा कल्पते ।
संस्कृत सरला कुत्ता बार्तालाप ध्यानमा र पति मदस्मादेव कारण ते सामान्य समतमा व्यक्ति विशेषस्य गुसम्म निविष्य कतव्य किंतु एका तमनन्तु विशेषतो वा विधेयम् मा सास्य दुष्परिणामी जायते त विशेषस्याचारविचारादीना विवेक व समन त्वदीयन्तावदेव दुष्परिणाम मान जायते।
स्वच्छ दचारिणी-कुछ टीना ने इसका अर्थ ही या व्यभिचारिणी किया है पर यहाँ त है इसका अब केवल मनमानी करने वाली पा अनिता ही उचित है, विवाह उस समय प्रचलित वा गाविवाह की करने वाली स्त्री कोरी नहीं कहा जा सकता। विवेक परिणाम पर विचार न करने के कारण ही अथवा जन की अनुमति लेने के कारण यहा उसे स्वच्छ [चारिणी कहा गया है। मुमो हृदयस्वतविषस्य यत्र भी कहा गया है "जयेत् तादृe fis fuकुम्भ पोमुख" अप्रतिहतम अनियमितता- असमयकारितासहसा विदधीत न क्रियामविवेक परमापदा पदम् भारवि अतएव सिल परीयपरित नग +
राजा महानुभावी इस (कुत्ता) पर विश्वास के कारण से ही क्यों (आप लोगों से व्यथित कर रहे है? हा एव (ई) आप लोगो ने यह उत्तर सुनी।
आज इति ययय आगमनाय अनिक्षिततनम् प्रमाण पनि नया इति
शाजिस आजभन से लेकर गायधृतता, नहीसा तस्य जनस्य व्यक्ति का वचन कथन प्रमाणप्रमाणरहित बिन लोगों के द्वारा परातिसमानम परवञ्चना दूसरो को धाया देना, विद्या इति नधीले एक विद्या के रूप में सीला जाता है, वस्तुतप्तवान एवं विश्वसनीय बात कहने वाले माने जायें।
जसे कभी नहीं सीखी है। सा व्यक्ति का कम तो प्रमादित वितीय माना जाय कि जिन लोगी के द्वारा दूसरी को धोखा देना (एक) विद्या के रूप मे सीता है ये लोग वस्तुत सत्य एवं विश्वसनीय बात कहने वाले माने जायें (वस्तुताङ्ग र की यह उत व्यक्ति है कि यह है कि वास्तव में सभी से रहित कुन्तलाका न ही सत्य है, न कि इस राजा का जिसने जन्म भर प्रवचन का ही अभ्यास किया है।
मन कहता है कि नही इस सम्बध म सत्य एवं प्रामाणिक है क्योकि जन्म से लेकर यह अब तक हो रही है जहा तो सभी प्रकार के दूर रहने वाले होते हैं, इस सम्बन्ध मे राजा का मन नियत विश्वास योग्य नहीं है कि राजा जीवन परचना का ही अभ्यास करते है।
विरोधस्तु पच जायादान करके जन आदि प्रस्तुत का वन किया गया है अतयुक्त असाकार है। पतिसन्धान पर तादात्म्येन विद्या का आरोप करने से रूपकालकार, यदि तस्य वचन प्रमाणमतिन प्रकार योजना की जाय तो साम्य प्रयुक्त भी है। प्रसादगुण, वैदर्भीति उपजाति छन्द है। " तावत्" शकुन्तला के इस कथन से लेकर यहा तक क्वचन होने के कारण अस का इस नामक अग है, "यो यतिति शोकावेगादिसम्भवा सादा की इस क से निरीहता एवं स्पष्टवादिता तथा स्वाभिमानता प्रकट होती है।
संस्कृत व्याख्यान आसन जन्मत प्रभूति] अद्यावधि सायम् वाचा अतिमनुपदिष्ट अनभ्यस्तच तर जनस्य कुतना रूपस्य जनस्य वचनम् कथनम अप्रमाणमप्रमाणरहितम् अविश्वसनीय वा 4नुपादिभि परासि धानमपरतारणम् विद्या इति विद्या ते नृपादयति सत्यवादिन विश्वा- साचोकार सन्तु ।

राजा भो सत्यवादिन्, अभ्युपगत तावदस्माभिरेषम् कि पुनरिमा- मतिसन्धाय लभ्यते १ शाङ्ग र विनिपात ।
राजा विनिपात पौरवं प्राप्यंत इति न यमेतत् ।
शारद्वता रव किमुत्तरेण ।
अनुष्ठितो गुरो सन्देश ।
प्रतिनिवर्तामहे वयम् ( राजान प्रति)
संस्कृत सरलार्था एवं यति पदमान पर कि यि पद पर पादित प्रमाणपति पर सत्यवादी पूर्ती वा प्रमाण भर परवचन कौटिल्य वाहिति वस्तुतस्तु त मेवात्वस्य राज्ञपरासियानमेव राजनीतवान्।
टिप्पणी
अत्रभवतीत्ययात शनाया करने विश्वासात्तदाता सयुक्त परिपूर्ण दोषा मे सदोष अक्षदोषपूर्ण वचन द्वारा। शिव-व्यक्ति करते हो यहां पर भी सूचक है, राजा काय है कि वह कुन्तलाभही तुम्हारे लिये पूजा हो, पर मेरी दृष्टि से तो यह परम होने से प्रतारिका ही है, फिर भी आप लोग इसका ही एकमात्र विश्वास करते है, यह की बात है अनुपा सह यथा स्यातचा गुणेषु दोषाविष्करणमसूया शिद्रा गुणो मे भी बुराई ना अधरम अउत्तर देवघर देव उत्तर है यही तो उल्टा है नीच है वही तो श्रेष्ठ और जो सत्य बोलता है नहीं भी समान अर्थात् विपरीत वचन भगवा यहाँ कमधारय समास मानकर इसका अर्थ निकृष्ट उत्तर भी हो सकता है अपर बहुतरम् आजन्म जन्म अभिव्या-अभ्ययाभाव 'आनद वचने कम प्रवचनीयत्वेन पञ्चम्पाङ परिभिरिति पञ्चमी शाहयस्वभाव क सठप्पज अशिक्षितादिकमणि क्त प्रत्यय परातिसन्धानमपरेषा मति अति+साट अतिमन्धान पोला देगा आन्तवाच माता वा पावाय बात कहने वाले
राजावादी हमलोग हम ऐसे ही है, किन्तु इस कमी को धोखा देकर हमे क्या मिलेगा?
शाङ्ग र पतन (नरक) मिलेगा।
राजा पुरावशी राजा (जपना) जन पतन चाहते है, यह बात य
नहीं शाखा र अब उत्तर देने से क्या (लाभ) हम लोगो ने (क) का पूरा कर दिया अब हम गौटते हैं। (राजा के प्रति


संदेषा भवत कान्ता स्पज देना गृहाण वा उपपन्ना हि दारेषु प्रमुख ||
|| गौतमि गच्छत । (इति प्रस्थिता ।)
= तोकिएका यह शकुन भक्त आपकी ता विवाह से परिणीता पत्नी अग्नि है) नाम्या हा इसे छोड़ दीजिये व स्वीकार कीजिये क्याकि दारे पत्नी पर तो मुखी (मति को सब प्रकार की प्रताधिकार उपस्वीकार की गई है।
एषा भक्त बाता एना व्हावा ह दारेषु सवतोमुखी प्रताप
अनुवाद फिर यह आपकी गायन विवाह विधि में परिणीता पत्नी (है) बाप चाह इसे छोड़ दे अवीकार करें क्योकि पत्नी पर (पत्रिका) सब प्रकार का अधिकार माना जाता है।
भावाच— शारद्वत कहता है कि हम जा कुछ कहना था कह दिया, और जन्नत में हमारी ओर से यहीं कला जिसके साथ आपने साधव विधि से विवाह किया था जापकीरनी है, जब पाहे आप इस पानी को छोड रेकीपन पर प्रकारका अधिकार माना जाता है।
विशेष प्रस्तुत पय उत्तराममाया से  का समय होने से अन्तरन्यतमतकार और पम्पा नामक छन्द है।
संस्कृत व्याख्यातुम सहारे इत्येवम एवा गुरोवतमाना बहुजना भवतस्य काताविवाहविधिना परिणीता पत्नी, मस्तीति शेष नानाम्यविमुमा गृहण बास्वीकुरु मा हितोहि पारे भायायाम् समतोमुखी सविधा, प्रभुता प्रभुत्वम् उपपास्वीकृता।
संस्कृततरामा नियति शब् एका तला भवन दुधनस्य गवािविपरिणीता स्व बस्थामा  परित्यज स्वीकरोतु वा अस्या परिरयागाय स्वीकाराय या भक्त पूर्णधकार शारदा का स्व समागच्छामो वयम्।
अभि+उ+म+स्वीकृत अर्थात् हमने यह स्वीकार कि हम लोग परप्रतारणा मन पर यह ता बताय कि इस स्वी

शकुन्तला कमनेन कितवेन विप्रलब्धाऽस्मि ? धूपमपि मा परित्यजय? [ह इमिणा किवेण विप्पल हि ? तुम्हे विम परिवह
(इत्यनुप्रतिष्ठते)
गौतमी (स्थिरवा) पत्ता व अनुगच्छतीय खन करुणव रिदेविनी शकुन्तला प्रत्यादेशपये भतरि कि या में पुत्रिका करोतु [ सगरव, अगच्aदि इस खुणो करुणवरदेवणी वन्दना । पाक वा मे पुलिआ करे ?]
बारव (सरोव निवृस्य कि पुरोभागे, स्वातन्त्र्यम्ब (शकुन्तला भीता वेपते ।)
प्रतारित कर हमे क्या नाम होगा, यदि कोई अन्य राजा आदि होता तब ना ठीक भी था कि राज्यादि की प्राप्ति होती पर इस स्त्री से हमे क्या मिलेगा? इसके उत्त रहता है, अवश्य मिलेगा और यह अपन होगा ऐसी पत्नी का परित्याग पतन अधोगति का देने वाला होगा न अधम- अर्थात् पुरवी राजा अपनाया विश्वास नहीं भो सत्यवादिन से न अयम" तक अक्षमा नामक नाटकात्परिभव त्योऽपि न विते।"
ताहुनि पत्नी भी पाठ है पर कम कापी से ही पहा[क्त प्रेम की गई अव प्रेम के  विवाह किया था महा विवाह नही बा भीत हो जानते थे कि यह विवाह है, ताकि उक्त उपपन्ता दारेषु भावावामदार पुल्लिङ्ग निल बहरा है, लिवासकालीन सामाजिक स्थिति का भी परिचय मिलना है उन पर पति का पूरा अधिकार माना जाता था और इससे भी ब की स्थिति ऐसी ही नामादिना भर्ती ह
देवता न हि गतिरते"अग्नि पुराण गौतमी गौतमी, तुम साग आगे बता
(यह कहकर सबका प्रस्थान )
(4) 42 (4) इसके द्वारा में उगी गई है, आप लोग भी मुझे छोड़ रहे है
( महर (उनक) पीछे नती
गौतमी (कर) मारा करती हुई यह कुता मला पोछे जा रही कानापति द्वारा परियाग कर दिये जान पर जारी गरी पुती कर
शाश्वकुलले । यदि यथा वदति क्षितिपतया त्वमसि कि पितुरात्कुलया त्वया। अब तु वेत्सि शुचिव्रतमात्मन पतिकुले तव दास्यमपि क्षमम् ||
|| तिष्ठ साधयामो वयम् ।
शार- (काम कर बरी दुष्टे, क्या तू (अन) स्वच्छता का रही है?
(कुतला भीत होकर काँपने लगती है
पदीत अन्य पथा वदति यदि लम तथा अतिवा पितु किम, अब आत्मन व्रत शुचिसि पतित दास्यम अक्षिमम् ।
शब्दार्थनितिपराजान पथावदति जैसा रहता है, यदि त्य जवा जमि पदि तुम वैसी ही हा उत्कृन या पितु किय कुलमर्यादा का उनका कुपादाने तुझसे पिता को क्या करता है कोई नहीं अयदि आरमनप्र अपन आचरण का मत पतिकुने ताम अपि अमम तो पतिपरिवार में तुम्हारी दाना भी उ
अनुचा राजा दुष्य जैसा कहता है यदि तुम वैसी ही हो तो कुल मर्यादा तुझ पिता (का? यदि तुम अपने आचरण को पतिपरिवार में तुम्हारी दासता भी उचित है।
भावार्था र कहता है कि हमें सभी सोचा और कहा है यदि वस्तुत तुम वैसी ही छन्दचारिणी होने प हुई तुमसे पिता को भी क्या प्रयोजन है अर्थात् भी तुझसे कोई सम्बन्ध रखना कि यदि तुम अपने आचरण को पवित्र समझती हो, तो राजा सेहो कुछ कहे तुम्ह पतिकुल में ही रहकर दासता करना भी उचित है।
काकथनादिकालीन समाज मे स्त्रियों की दशा की और संकेत करता है समपत्नी पति की इच्छानुगामिनी बन कर ही रहती थी पति का उस पर पूर्ण अधिकार था वह पाह उसके साथ कैसा भी व्यवहार करे स्त्री के लिए स्वावजित था
विशेष प्रस्तुत द्वितीय और चतुथवर का कारण प्रथम और तृतीय बताया गया है. जयकार, अनुजास, पताद युव, वैदर्भी रीति और इति गायक है 'तिमा भी घरों" अशा प्रत्यक्ष भगम से १२ अक्षर होते है।

राजा भोस्तपस्विन् भवती भिसे कुमुदादेव  योधयति पजान्येव ।
शिना हि परपरिग्रहसलेवराहमुखी वृति ॥
यहा पर की समाप्ति दिलाई गई है अत महाप्रोमा नामक अ राधिका बना तु विज्ञेया सहारा प्रदर्शनी" ( मा० द०) ।
संस्कृत व्याप्याजिति भूपति दुष्यन्त वा वदति नया यदि तथा हिउ मर्यादा - दामन स्वस्थ तारणम चिपवित्रम् बेि जानासि पनि स्वभ गृहे एव शत्रु चलाया दास्यदासभावेना- स्थानमपि गति (अ)।
परिणीत अपितु वारीत मला पिरपिक म चरणी त्या न गृहीष्यति। यदि त्वमात्मन आचरण पनि स्वा परिकुल एवं स्थातम्यम् स्विदाम्यमपि काय तुम ही हो हम लोग जा रहे है।
यह इसका है कि इस स्थिति में मैं कैसे क्या करूँ क्या उपाय प्रतिवेनन के द्वारा अनुतिष्ठते समय स्व" सूत्र से प्रस्था को कम पद परिदेविनी यथा स्यातमा परिदेविनो परि+दिन+दि [[परिदमन] विलाप करना प्रत्याशेन निराकरणेन पये निष्ठुरे पुरोभावेपुर भाग वा सावत्सम्बुद्धौपुरोभागादीठ, लि नीच इसका भी होता है "राम" स्वयम् स्व आरमा प्रधान मस्य स स्वतः तसा भाव मनमानी अवधारण करी हो का यह है कि स्वतन वह जैसा कहता है नहीं करता है जैसे जादा है "पिता रति कौमारे भर्ता रक्षति परस्त्रीस्वात महत" वा "वास्तुपास्य बना भूमि होने से इस तुम्ह भी सर मिलेगा। कुलाकुलाकुल वातमा क्षमम् पोम्पम्नतम दास्यम्- दास्य भाव कम था। =
तपस्वी आप क्यो दूसरी का पाया रहे है, अर्थात् आपन से बाकर पहले तो मुझे धोखा देना चाहा पर मेरे करने पर अब इसे यहाँ बोकर ना रहे. वही के साथ है।
भुवनविमुमुदानि एवं सविता पानो हि विना वृति परपरि भवति।
शनाया कुमुदानिक ( पानिपत करता है। हि क्योंकि, वशिनान्यजना को वृत्ति मनावृत्ति पीपी के विरहनी
अनुबाद - पत्रमा दो को ही (और) मनाना ही विषमित करवा
हे इसके विपरीत रही की नाति परीक
(गदा) विमुख रहने वाली होती ह
कहना है जिसमें नायत स्थापित है यह उसी को करताना कुमुद को हो कमलो को ही न करता है इसके विपरीत यदि यह समझो ना रहे हो कि हमे वीकार कर नूगा तो यह तुम्हारा प भ्रम है, मुजसे पीसेस बाली होती. असे कभी स्वीकार करेगा। राजा के मनोर अभिव्यक्ति होती परत में ही परामुख नही उस भी रहने वाला है।
द्वारा के प्रस्तु पर भी जो सामान्य का कप दिया गया है अन पूर्ण दष्टान्तमवार, जोवयति इस एक दिया से तालु एव ताका सम्बन्ध होने से ययोगिताकार तथा समाच समय होने से अर्थान्तिरन्यास अनुकार है, छेक यत्ति अनुप्रासाद रीति एव है।
संस्कृत व्यायाम कुमुदानिए कमान संचिता पर कामिनानि एवं नतु नियति- हिना प्रवृत्ति मनाि परेषा मा परिमाणाभासने = विमुखी परीभतः।
सरकत सरलाय कुमुदाय विति नतु कमलानि सविता कुनामा जनानाम सदैव परपरा मुखी भवति अतएव परस्त्रीभिमाना कदापि स्वीकरिष्यामि
तितविकत

शाखपदा तु पूर्ववृत्तमन्यसाद् विस्मृतो भवास्तवा राजा - (पुरोहित प्रति) भवन्तमेवात्र गुरुलाघव पृच्छामि ।
मूद स्वामहमेषा वा वदेमध्येति सदाये। वारत्यागी भवाम्या हो परस्त्रीस्पर्शपाल ॥२॥

वारस्यागी भवाम्या हो पराल ॥२॥
विपरिग्रह पत्नी परिक कारण
रजबकि आप पटना को आय (स्त्री अनया कार्य) मे के कारण गोम सेसे? ततो भी नहीं कह जा सकते।
राजा (पुरोहित से) में इस विषय मे आप ही उचित और गौरव और समय की बात पूछता है।
मूढ इति अहम् भूयामा एसिया इति गी माही परी
अहम्मत नवा विमाना हो गया हूँ वा एषाकुलता मिल्याही इति इसमें पात्यागी भवामि पानी परिया अपना परस्त्रीपणपासून परस्त्री के पक्ष से पित भवामि हो ।
अनुवाद ही वरील गति हो गया है अथवा वह बोल रही है इस स मे (मे) या मनपरी के पास दूषित हो
मावाच राजा पुरोहित पूछता है कि जब तक किया तो मैं भूल गया है पाग कर मुझे बनना चाहिए अथवा परस्त्री के पक्ष से दूति बनना चाहिए. क्योंकि इसके पराग कर देने पर पत्नी ओर लेने पर दगा आप बता मेरे लिए उचित है।
इस कवन से राजा का इस अनिश्चितताको स्थिति तो यही दलित है कि इसकी के क्ष नया से कम ही होगा।
विशेष प्रस्तुत पद्य में निक नामक मनिभाव है और मद नित्यादि लेकर यह उत्तर नसे राज नामक मन्त्रि का जन विरोध इति"।
संस्कृत दुपट वरणात स्याम्=

फुल पुरोहित (पिचाय) पदि तावदेष क्रियतम्। राजा- अनुशास्तु मा भवान् ।
पुरोहित अत्रभवती सावदाप्रसवादरमगृहे तिष्ठतु ।
मुच्यते इति चेत्त्व साधुभिरादिष्टपूर्ण प्रथममेव चर्यातिन पुत्र जनयिष्यसीति सचेन्मुनिदा हस्तलक्षणोपपो भविष्यति, अनिन् शुद्धान्तमेना] प्रवेशयिष्यसि विपर्यये तु पितुरस्या समयमवस्थितमेव ।
राजा यथा गुरुभ्यो रोचते ।
पुरोहित बरसे, अनुगच्छ माम् ।
शकुन्तला भगवति वसुधे देहि मे विवरम् [भवदि हे वैि
मे विवर।]
(इति स्वती प्रस्थिता निकासह पुरोधा तपस्विभिश्च ) (राजा शापतिस्मृति कुलतमेव चिन्तयति ।)
भवनमा पालना, मि. अस्थमा इवि त्यागी-पत्नी-पानी (वाम) आम परस्य या पान ( भवामि ।
परम पिता पाएन परिभवामि यतो कुमवादिनीति ।
अन्य गात महान शब्द का अना बाद रानियाँ अथवा अन्य दाना भी होता है। उत्तष्ठति निष्वा अनुचित काय गुरु चैति गुरुराया रूप होना चाहिए था किंतु "दातीत योगानुरोधादन] उत्तरपद अन गुलाम पत्र भी यह प्रोमिला है "मेत कायमचिन्ताचयम" मधु । 'विमृश्य ताप रामायणम्+अब पासुन पातु-- धूति अनाति ।
पुरोहित (साच कर) यदि ऐसा तो ऐसा कीजिए।
राजा आप मुझे आजादी
पुरोहितपर पूजनीया नातिज तक पर घर में रह (उत्तर) बनाया जा चुका है प का जन्म यदि वह गुनि कान का दाहिन (पुरी का पुत्र)
आश्चयमाश्चर्यम् । राजा - ( आकण्य) कि नु खलु स्यात्
(चक्रवर्ती राजा के लक्षण से युद्ध होगा, तो आप इस मकुलाको भिनदित करके अपने अपने पिता के पास भेजना निश्चित ही है।
राजा जैसा आपको।
पुरोहितजी मेरे पीछे जाओ 1
शकुन्तला पृथिवी, मुझे अपन भीतर स्थानी हुई है। पुरोहित और उपाउन ( के कागजात नही साता
टिप्पणी
सामानमा पनिरिति पन्चमी म विज्ञान दिनानि पनि के अनुया उपयुक्त इसका यहा मेन राजा को आमादा है मौत जति महि" नादिष्टपूर्व पूनम् रति निर्देशादस्य परनिपातनिसभामा भूपतयति इति ++ गिग की मृदु" यस्य पालन प्रथम वधवाय तारापुत्र युद्ध++, पुनानगर मे बाबा "पुनानोपर तइति प्रोक्तमुनिदीहिन कस्य दीि पुष । तल्लक्षणोपपत्र साद उक्त विषय पर ब केहि विवरमा फारसे समाजा शाह स्मृति की स्मृति तो परान उस दिया वाजत वह काि नाम है "ती"।
(सुनकर क्या बात ह

(प्रविश्य) पुरोहित देव, परावृतं कण्वशिष्ये सा निन्दन्ती स्वानि भाग्यानि वाला बाह्रक्षेप कन्दितु च प्रवृत्ता । राजा कि?
पुरोहित (सविस्मयम्) देव, अद्भुत व सत्तम् । राजा- फिमिय ?
पुरोहित
स्तोमारा- दुक्षिप्यंना ज्योतिरेक जगाम ||२०|| (सर्वे विस्मय रूप)
पुरोहित (आलय के माथ महाराज बजाय की बात हो गई है।
पुरोहितमहाराज, नच शिष्यों के लौट जाने पर
अवयावाला स्वाति भाग्यविपदि प्रत अप्सरस्ती जारा स्वीस्थान एक ज्योति मा उत्क्षिप्य जगाम च ।
शब्दावाला स्थानिय अपने भाग्यो को E कोसती हुई,पहा उठाकर तारोन जी अप्परस्तीयम् बारामती के समीप ही स्वस्थानी जैसे शरीरावयवो को धारण करने वाली एक स्पाति एक एनाम उसको उठाकर जगाम चला गया।
अनुवाद और पहला aपने भाग्य को कोती हुई भुजाये उठा कर रोने लगी।
राजा और फिर..
पुरोहित-अपारा तीच के पास ही स्त्री जैसे आकारवाला एक तेज समूह उसे उठाकर चला गया।
(अप्रतीम् आद) की व्याख्या टीकाकरों ने प्रकार से की है किन्तु अपरस्ती का अब सिद्ध करना यहाँ किसी प्रकार संगत नही हो सकता, यह कोई दूसरा ही बप्तरा सरोवर हस्तिनापुर के पास ही रहा होगा. यहाँ पर्याप्त दूरी पर था, वहाँ तक पुरोहित के जाने का कोई अनसनमा बस्तु इसका अर्थ यह तो सम्भव है कि कोई तेजोमयी मूर्ति उसे अप्सरस्तीय की ओर लेकर चली गई।
विशेष-कार द्वारा कियासकार स्वीस्थानम्' मे उपमा- कार हेतु तथा अनुप्रास अलकार ध्वनि प्रसाद गुण वैदर्भी

राजा भगवन् प्रागपि सोऽस्माभिरचं प्रत्याविष्ठ एवं कि तणाव ? विश्राम्यतु भवान् ।
पुरोहित ( विलोक्य) विजयस्य । ( इति निष्क्रान्त ।) राजा-येत, पर्याकुलोऽस्मि शयनमि मार्गमावेशय ।
प्रतीहारी इस इतो देव [इदो दो देयो] (इति प्रस्थिता ।)
नाम "मातोलो बंद नो" अर्थाद जिस मे जो गुणों के कम से दम तथा एवं सप्तम वापर यति हर वह मालिनी छन्द होता है 'नेपथ्ये से लेकर यहा तक रोशन से गया है।
विशेवणस्तु सा तिरिति कीर्तिता"। (सभी लोग करते है
सरकत व्यायामा, स्वाति भाग्यात स्व लादिविधिमा साम कृतिमतजीसथानम कलाकारमित्यथ एक ि काममूर्ति तवस्थापण जगाम निरोदधे ।
रायपुरोहित] यति सानुमती सफा जी मूर्तिरता मुस्याप्य निरोदरस्तीय नामक प्रदशविशेष कृतिरा बभू
सावाला पति एवं वधुवी से गरार अने [ मत ++ 'बावामुन (बम) स्त्रीस्थानम सस्थान स्त्रिया सवानमिवसानयस्तउत्त
(सभी लोग का अभिनय करते हैं) राजा भगवतो पहले ही (स्तु) का
निराकरण कर दिया है। अब यही तक द्वारा उसे क्यो योजने अजय म विषय में तमनन करने जब उसका निराकरण ही कर दिया तर उसे कौन गया, वहा ले गया नादि बातो पर विचार करना है आप विचाम करे।

राजा- काम प्रत्यादिष्टा स्मरामि न परिग्रह मुनेस्तनयाम् ।
बलवन्तु दूपमान प्रत्याय पती मा हृदयम् ||३१||
(इति निष्क्रान्ता सर्वे 1) (इति पञ्चमो )

पुरोहित (राजा की ओर देखकर महाराज की जय हो।
(यह कहकर प्रस्थान ) रात में हो रहा है का साग बनाओ। प्रतीहारी महाराज से
(हरपल देती है
राजा-
काममिति अनाम प्रत्यादिष्टाम सुने तनयाम् परिम् स्मरामि । मानम् हृदयम् माम् प्रत्याययति ।
काही (अपने द्वारा परि नाम महाँका की पुत्री को परिग्रहम अपनी विवाहिता पत्नी के मे = न स्मरामि नहीं स्मरण कर रहा है। किंतु आप दुखित होता हुआ मेरा हृदय माम प्रत्याययति इस मुझे ऐसा विश्वास मा करा रहा है।
अनुवादही (भरे द्वारा परिपक्ता मुबिया को (मैं) विवाहिता पत्नी के रूप में स्मरण नहीं कर पा रहा है। अत्यधिक श्री मेरा हृदय (ऐसा विश्वास करा रहा है (यही ही है।
भाबाधा आदि के पते जाने पर व हृदय राजा सोचता है कि यद्यपि मैं यह स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ कि मेने कभी इस मुनि कपा सेवा कर इसे पत्नी रूप में स्वीकार किया था, तथापि इस भटना से म जो मेरा हृदय जो इससे मुझे ऐसा भी विश्वास हो रहा है कि यह मेरी पत्नी ही होगी।
विशेष प्रस्तुत पद्म में प्रत्याययति मे उत्प्रेक्षाकार और इससे स्था यिनी रति का अनुसधान भी ध्वनित होता है। स्मृतिरूप कारण के भाव से भी मानव रूप होने से मानव हेतु से प्रत्या साध्य है अतुलकार निवासे के उल्लेख के कारण, प्रसन नामक का अंग है (सात) आछिन्द है। प्रसाद गुण, सम्पूर्ण अ मे वीर रस प्रधान है सारी वृत्ति है रे केकी मीरे सात्वती आरभटी पुन रसेन वृत्ति भारती ।
संस्कृत व्याख्या कामाप्रत्यादिष्टामपरित्यक्ता मुने कण्वस्य तनयाला परमद में परिणीता पत्नीति न स्मरामि विभावयामित्यधिनयमान मानम हृदयमवित्तम् मान प्रत्यायनि विश्वास मि नि यदेषा या परिणीति ।
सस्कृत हरायकु वलाया निगरस्थान-तर राजा विनयति यि निदानी पनि तु कदापि पूर्वमा मुनियाकुला पत्नी स्वीकृत हृदयमान [enee gee a fere पदपा गया परिणीत इति।
टिप्पणी
दिष्ट निराकृत प्रति+आ+दिशता कि वा राजा का अ मैंने इसका प्रत्याख्यान कर ही दिया है तब उसे बौन कहा किस प्रकार से गया अवका उसका क्या हुआ? इन सब पर fare करना है। इसमें राजा का के उपाय प्रकट होता है। काम यह है इसक भले ही मैं ऐसा मानता हूँ यह सत्य है आदि होता है। कुछ टीकाका ने इसका 'अधिक' किया है, वह प्रस्तुत प्रम के अनुसार नहीं जान पड़ता। परिग्रहम् इसका जब विवाहितानी" है परिने पत्न स्वीकयने इति परिग्रह अप्रत्यातिप्रति निद् प्रति- जागा या दिवाम करना होता है, न परतिकोन विश्वास नहीं करता। इधातु से फिर पर होने के कारण यहाँ 'गोधने से इसको नही है। गामने बुद्धि, मूत्र से द्वितीया विभक्ति हुई है। मानव मुक
(इसके बाद सबका प्रस्थान
(समाप्त)



(लत प्रविशति नागरिक दयाल पश्चात् बद्धपुरुषमादाय रक्षियो ।)
रक्षिणी (crafter) अरे कुम्भौरक, कथयत्र त्वमणि- मनोत्कीर्णनामधेय राजकीयमङ्ग लीक समासादितम् [अ कहि कहि हुए एवो मणिबन्धणुक्किण्णणामहे साकीजए अगुलीए समानादिए ।
पुरुष ( भीतिनाटितन) प्रसीदन्तु भावनिक्षा अह कर्मकारी। पशीदन्तु भावमि ह ण विमाली ।]
प्रथम शोभन ब्राह्मण इति कलयित्वा राज्ञा प्रतियहो त ? [[कि शो बह्मणेति कलिम रण्णा पाहे दियो ?]
(तदनन्तर राजा के साले कोतवाल का था उसके पीछे, (एक) बंधे हुये पुरुष को लेकर दो सिपाहियों का प्रवेश
दोनों सिपाही ( मारकर ) बरे पोर बताओ ने मजिवि एवं जिस पर (राजा का नाम अंकित (खुदा हुआ) है (ऐसी) यह राजकीय अंगूठी कहाँ पाई?
पुराव (भय का अभिनय करता हुआ आप आदरणीय बन प्रसन्न हो ऐसा काम करने वाला नही हूँ।
समझ प्रथम सिपाही तो क्या तू येष्ठा है, ऐसा स कर राजा ने 'तुझे उपहार दिया है।
नागरिक नगर क्षति वा नगरे नियुक्त इत्ययं रामं रजतीतिमेच या 'वन नियुक्त इति सूत्रे नगर सदा बुद्धि नागरिक की रक्षा के लिये नियुक्त अधिकारी कोतवाल या पत्नी भाई इसे हो जाल या राजमालक, राष्ट्रीय या राष्ट्रिय अवार बी कहा जाता है। पृभकटिक में कार का विस्तृत है. कार इसे इस कहा जाता है क्योंकि यह नीच कुल की स्त्री से उत्पन्न हुआ व्यक्ति होता है और
प्रयोगवत्या सारा गष्टिय मृत प्राय नगर नियुक्त किया जा का दन मिलता है, महानगर कहा गया है, का भी प्रयामी एक पोर को रक्षिणाही कि नगर क्षमावा के सहायक होते है। मोर पार गडद चार, तर निम्म आदि इसक है। दादी + तरि अणु-कुम्भीर स्वायम्मारक तत्सम्बुद्धी-भीरक (कुल स्थान बीर) भारत का मुजब मगर होता है पर उसके चोरी के स्वभाव कारण भोष रूप से इसका अचार भी होना कुम्म अर्थात् हाथी को देता है। मित्र से भी ना मह बनता है कु का मुदाच तो पृथिवी है पर दो अथ से इसका प्रयाग मिट्टी और मिट्टी की दीवार भी होता है पर दीवार तोडकर सेलरी करता है. अत कुमार का अौर होता है। इसको व्युत्पत्ति इस प्रकार भी है— कुम्भी स्वस्य कुम्भपटपूर्ण रात पारयति असीम एवं कुम्भीरक मणिबन्धनको नामबचन अर्थात् पर मणि जादा था उनी नाम यत्र तत् अर्थात् जिस पर राजा का नाम ख़ुदा हुआ था ऐसी अत उत्पनामधेय कमधारय पुरुष - इसका अर्थ यहा धीवर है जिसे राजनामाङ्कितवार से पकड़ी हुई मछली के पेट से हुई थी। मुनि के कनानुसार रामादि को भाषा मागणी होती है अर्थात् नाटकों से ये मग बोलते है, भीम "मागमा स्पाइस और एच एक होता है जैसे इसके भाव इंशिकम कालीदेखा जाता है। राजकीयमराज प्रत्ये राज इदम् मीनामिति भटकते यह भी करता हुआ भावमा भवन्तु भावमा म शम मरणीय तत्पुरुषादृशकमकारी कम अर्थात् जोरी कम करने वाला सोमनाथ म गुण कलयित्वा समय कर प्रतिग्रह उपहार अथवा दान धीवर के इस कथन मे पडिमा दिष्णे प्रथम वर के प्रयोग है। यह मागधी की विशेषता है।


पुरुष शृणुतेदानीम। अह शक्तावताराम्यन्तरालवासी धीवर । (erve हवालदारावासीले ।]
द्वितीय-, स्माभि जांति पृष्टा ? [ि
दयाल सूचक, कथयतु सर्वमनुक्रमेण मैगमन्तरा प्रतिवधान । [] अकमेण मा ण अन्तरापविवह ।]
उभौ वदाबुत आज्ञापयति कथय [ज आते आणवेदि । कहेहि।]
पुरुष अह जालोद्गालादिनि मत्स्यबन्धनोपायें कुटुम्बभरण करोमि । [अहके जालूगालादिहि मच्छन्मनोवाहि कुटुम्बभलण कलेमि ।] श्याम (विहस्य) विशुद्ध ददानीमाजीव (विमुद्धी दाणि विशुद्धानीमा । आजीवो।]]
सुनिता मैं शावतार नामक दो पर रहने वाला पर हूँ। सिपाही राम तेरी त पूछी राजक (सिपाही का नाम) से सब कुछ क्रम से कह लेने दो, इसे बीच ही मे मत रोकी
दोनो सिपाही जो जैसी बाप आता देते है। (तुम धीर अपनी बात कहो।
टिप्पणी
पुरुष – सुनिये जा, मैं शकावतार नामक तीद पर रहने वाला हूँ।
पाही अरे हमने तेरी पूछी है? सिपाही का नाम) से सब कुछ कम से कह लेने दो, इसे बीच ही मे मत रोको।
दोनो सिपाही जी जैसी आप बता देते है तुम धीवर अपनी बात कही।
रामावतारान्यतरालवाली नाम सोच के क्षेत्र मे रहने वाला। सकस्य अवतार शावतार नाम होने से नित्यसमास, अब तु+पञ्अवतार घाट धीवर मत्लाह "स्वदासीवरी" त्यावर बोरा -उत्पादन वा परत विचरन प्रति पाटम्बर यहाँ पृषोदरादित्वात् कार की लोग कर पाटम्बर बनता है, अर्थात् जो घर या दीवार आदि में सेंध लगाना आता रहता है, और इस प्रकार चोरी करता है अथवा व परति विचरति इति पटवर पटम्बर एवं पटवायें। वस्तु पत्र पाटचरमनिम्बुवा" इत्यमरमा प्रतिवधान मन रोको, नाम आवृत्तभगिनीपतिरात इत्यमर यहाँ पर इसका प्रयोग आदर सूचनाथ है। अब मे
मैं कांटा आदि मनियों के पकड़ने के साधनों से अपने कु का पालन करता है। श्वास करत तो बताना है।

किन यह निति न तु तत्कर्म विवर्जनीयम् ।
[हजे कि जे विणिन्दिए ण हू दे कम्म विवज्जणी आए।
पशुमाल कम्मदानेएम् शोतिए ।]
पुष
समिति अन्य विनन्दितय कम सहजन वि नीयम्। पशुमारकमदाय घोषिय अनुनयामू एव
सध्या विनिन्दितम लोकनिदित (भी) पद कमी कम सहज स्वाभाविक अथवा कुल परमागमन करत तत् कम व कर्म = अवश्य ही न विसनीयम्न छोडना याहिये पशुमारकमदार (यशो में पशुवध कम के कारण र (भी) भौजियवेदपाठी ब्राह्मण अनुकम्पामू एवं tree से ही भवति होता है)
अनुवाद (लोक मे ) निन्दित (भी) जो कम वस्तुत स्वाभाविक एक कुल परम्परागत होता है उस काम को यही न छोड़ना चाहिये (मेधी कर्म से रहब भी वेदपाठी (सामान से कोमल हृदय होता ही है।
भावादरम्यान कामे कथन सुनकर बन्दीपुर कहता है, मान्यवर आपको ऐसा न कहना चाहिये, क्योंकि जिसका जी स्वाभाविक परम्परागत कम होता है उसे उसको कदापि न छोडना चाहिये ही लोग उस कम की निन्दा करें देखिये जीव पर दालु होने के कारण स्वभाव केही कम भी वेद ब्राह्मण कम मे पशुवध करके कठोर हो जाता है. क्योकि यह उसका कुलकमागत है और उसका का साधन है मह दयालु होकर भी इस कठोर रूम को करता है छोड़ता नहीं इसी प्रकार मैं tan के साधन एवं कुलक्रमागत सत्यधन रूप कम को नहीं छोड़ता हूँ और मुझे इसे छोड़ना ही चाहिये भले ही अहिंसावादी जन इस नमकीन करें आपको मेरे आजीविका के साधन की हँसी न उड़ाना चाहिये।
विशेष प्रस्तुत पद में सामान्याय के द्वारा विशेषाय का समचन किया गया कार, मृदु होकर भी दारुण इस कमन में विरोधाभास असकार मृदु घोष से errere free गुगोत्पत्ति का कमन होते से विषमालकार, धीवर, इस प्रस्तुत विशेष के रहते भी सामान्य का कथन किया गया है त arge [Tere जिस प्रकार मृदु दोष पदम नहीं छोडी प्रकार मुझे भी लोकनिन्दित भी अपना गहन कम नहीं छोरा चाहिये, इस प्रकार यहाँ भी लोग एवं वस्तुत इन के अमे है, माकार भी है। प्रसाद गुण तथा वैदर्भी रीति है सुन्दरी नामक छन्द है। इसका लक्षण है "जो पैदि सो गयी, जो सयदि सुन्दरी मता" अर्थात् छन्द के विषम चरणो मे कम दो सगण, जगण तथा एक गुरु वण हो, और समचरणो मे समन,

भगण, रंगन तथा एक लघु एवं एक गुरु वण हो तो वह सुन्दरी नामक विषम छन्द

होता है। किन्तु उक्त लक्षण का प्रस्तुत पय मे सपदित करने के लिये इसके द्वितीय

वरण को "न तु तत्कम विवजनीक के रूप में रखना पड़ेगा जैसाकि अन्यत्र पाठ

भी फिर भी अर्थ मे कोई अत्तर न पड़ेगा यथा

कल वस्तुत यत्कम स्वाभाविक कुलप्रसादागत्त वास्ति तद बलून विजनीयम् कम अवश्यमेव न परिस्वाण्यम् पना यज्ञीयपशुना मारण वरूप यत्कर्म कार्य न दारुण र पशुमारकमदार (अपि) श्रोत्रिय वेदपाठी ब्राह्मण, अनु त्या दया मृदु कोमल अनुकम्पामृदु कृपापरिप्लावितहृदय एव (भवति) संस्कृत सरलाथ-यस्य

जनस्य किमपि नित्य स्तुत्य वा स्वाभाविक कुलवर- पराप्राप्त कम भवति तद् कम तेन अन लोकनि दामीत्या न कदापि परित्याज्यम्, वस्ति तत्कम तस्य जीविकासाधनमपि तहि तु तत्कम न कदापि परित्याज्यम् अपितु वयमेव तदेव करणीयम् निन्दातु धमज्ञा स्तुवन्तु वा यतोहि करुणापरप्लावित- योऽपि षट्कम निरतो नि निष्ठुर एव भवति, दयालुरपि किमणि दयाविरहित सन् पशूना बधे प्रवतत एवातोन राज्य लोकविरुद्धमपि सहज कर्मेत्यभिप्राय ।

जालोवगालाविभि जलानि च उद्गालाश्वेति समाहारइन्द्रे 'जातिरप्राणि- [मित्येकवचनम् जालोदमानमादि वान्तं जालोद्गालादिभि उद्+ धातो. उन्नया इनि पनि अचि विभाषेति रेफस्य वैकल्पिक तत्वे उदगाव मछली पकड़ने काटा मत्स्यबन्धनोपाय मत्स्यानान्नस्य उपायास्तं विशुद्ध बाजीव- स्तुत प्रयाजन वा धीवर के लिए यह कथन व्यथा पूण है, उसका अधि- कि तुम्हारा यह जीवित का हत्यारूप सावन बडा ही मिष्ट है

झ्याल ततस्तल [तदो लदो ]

पुरुष एकस्मिन् दिवसे खण्डशो रोहितमत्स्यो मया कल्पितो यावत् ।

तस्योदराभ्यन्तरे इव रत्नभासुर मद्गुलीयक हवा पश्चादह तस्य विक्राय दर्शयन गृहीतो भावमिश्र मारयत वा मुञ्चत वा अपमस्या- गमवृत्तान्त ( दिने खण्डशो लोहिमच्छे म वपदे जाव। उदन्तले एद लदणभाशुल अगुलीअअ देखि पच्छा अहके शे दशअते गहिदे भावमिश्ोहि मालेह वा मुचेह वा । अब शे आमत्तते ।]

श्याल जानु, विगन्धी गोधावी मत्स्यबन्ध एव नि सशयम् । गच्छाम ।

अडगुलीयकदर्शनमस्य विमशयितव्यम् । राजकुलमेव

अतएव तुम नीच हो। सहजम सह जातमित्यय सह जनु - (अ) प्रत्यय टि तोप जन्म सिद्ध कम भने ही निन्दनीय हो पर उसे छोड़ना नहीं चाहिये इस सम्बन्ध मे अनेक सूक्तियाँ देखी जाती है और धमवचन भी सहज कम कौठेव मदोपमपि त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता । यान् स्वधर्मो विगुण परधर्मात् स्वनुष्ठिता । स्वधर्मे निधन श्रेय परधर्मो भयावह ॥ स्वभावनियत कम कुवप्राप्नोति क्लिविषम् । गीता । वर स्वधर्मो विगुणो न पारम्य स्वनुष्ठित । परधमण जीवन हि तच पतति जातित ॥मनु । येनास्य पितरी पाता येन माता पितामहा तेन यायात् सदा सोऽपि तेन गच्छन्न दुष्यति। देशानुशिष्ट कुलममय स्वगोधन हि सन्त्यजेत् स्मृति वचन भीत्रिय छन्दोऽधीते "श्रोत्रिय छन्दोऽधीते" इति निपातनाद छन्द प्रदेश पत्र प्रत्यपश्च-अमिय "जमना ब्राह्मणो शेय सरकारे डिज उच्यते विद्याभ्यासी भवेद विप्र योत्रियस्त्रिभिरेव हि।" एका शा परीत्यच कमतरतो वो नाम धमवित्।

प्रस्तुत पद में वैदिकमाण्ड का समयन किया गया है और बोत्रा के तक के विरुद्ध वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति का समय किया गया है अनिष्टामीय पशुमालभेत श्रुति को प्रमाण माना गया है तत्कालीन वर्णाश्रम का भी अनुमोदन किया गया है कुछ टीकाकारी की यह भी मान्यता है कि गत शाम कभी प्रचलित नही थी और न कालिदास ने इस पद्म द्वारा उसका अनुमान किया है अग्निष्टोमीयम् आदि श्रुति का अर्थ पशुपालन एवं सरक्षण है, हनन नहोल तो मासाहारी बाममागियों की देन है अन सवा त्याज्य है, क्लोक का नाम केवल इतना ही है कि जैस पशुहत्या करने वाला भी ब्राह्मण पणित दृष्टि से नही दागा जाता उसी प्रकार मेरा भी यह कम उपेक्षणीय है निती नहीं ।

स्वाल हो तब फिर ? पुरुष एक दिन मैने (एक) रोहू मछली के ज्योहि टुकडे टुकड़े किये उसके पद के भीतर रत्नोस चमकती हुई यह अंगूठी दलकर बाद में उसके बचने के लिए

विम्मगन्धी गहादी मच्व एव णिस्मअम अगुलीजअदसण से विमरिदिव्य गजल एव गच्छामा ।]

रक्षिणी तथा । गच्छ अरे गण्डभेदक [ तह गच्छे अने

गडभेदन ||

( सर्व परिक्रामन्ति ।)

दिलाता हुआ में बाप माजना द्वारा पकड़ लिया गया। मारिये अथवा छोडिये। इसके मिलने का यह बात है।

स्थान जानुक (नक सिपाही का नाम) कच्चे मान की गधवाना निश्चय ही यह खाने वाला डीवर ही है इसका अंगूठो पाना विचारणीय है, अच्छा हम राजकुल का ही चलते है। दोनो सिपाही जैमी वा अरे गिरहकट चल ।

(सब घूमते हैं)

टिप्पणी

कल्पित पत आगमवतात मिलने की बात दिगन्धीविन शब्द का अर्थ असरकाश के अनुसार मास की वाला है जिन स्यादामगन्धि यतु" इस प्रकार जब बिल का ही अथ कच्चे मांस की वाता है तब दिन शब्द के आगे गन्ध शब्द का प्रयोग अनावश्यक प्रतीत होता है, सम्भवत कालिदास के समय विव शब्द का प्रयोग केवल कच्चे मास के ही अथ मे प्रचलित रहा होगा पर अमर काकार अमर्गम के समय इसका अब ये मान की गन्धवाना हो गया होगा, इसीलिए यह भिन्नता है। विस्रस्य गय अस्ति अस्त्यर्थं विगन्ध शब्दात् मत्वर्थीय इनि गोधावी गाधाम् अशु गीतमस्वत्य गावाबद्द भक्षणे आता तर तान्छी स्पे पनि प्रति णिनि प्रत्यय गावादी विन्तु सुप्यजाती गिनिस्ताच्छील्ये" सूत्र से यहाँ प्रिय नहीं हो सकता क्योंकि शब्द जातिवाचक है, गाधा या गोह एक छोटा सा जीव होता है जानि बगल में खाह में रहता है, धोवर पाय इसे मानकर वाते है, अत महापौर अयमगिनि प्रत्यय मानना सगत होगा। पौन पुन 'बहुनामी' सूत्र से णिनिप्रत्यय होकर साधावी रूप बनेगा असरबार गाधा का पाने वाला। कुछ टीकाकारों ने पाणिनीय प्रयाग मानवस्वान पर जा गोवानी पाठ माना है वह समा असंगत श्रीराग कभी माहत्या नहीं करते और न गामास ही बात है अतरीही या दीर हे मला मास्या व नातीत्य मत्स्य पन्ध शयितव्यमवि मगच तव्यत् विचारणीय राजा गण्डमिन गण्डभि अच्छे भी पाठ मिलता है। खाता

श्याल सूचक, इम गोपुरद्वारेऽप्रमत्ती प्रतिपालयत पावविय argetes turant भतुं निबेध तत शासन प्रतीषय निष्कयामि । [सूमअ, इम गोपुरदुआरे अप्पमत्ता पढिवालह जाब इम अगुलीअज जहागमण भट्टिणो णिवेदिअ तदो सासण पडिणिक्कमामि ।]

उभौ- प्रविशreign स्वामिप्रसादाय [पविशदु आबुले शामिप

शादर। ]

(इति निष्क्रान्त इमाल )

प्रथम जनुक, चिरायते बल्बावुत [जाणुभ, बिलाजदि खु आबुसे ।] द्वितीय - नन्ववसरोपसर्पनीया राजान [ण अवशलोवाप्पणीआ

लाभाणो ।]

प्रथम - जानुक, स्फुरतो मम हस्तावस्य वधार्थं सुमनस पिनम् । [जाब, फुल्लन्ति मे हत्वा दमश्श वहरा शुमणा पिण ।] ( इति पुरुष निदिशति )

पुरुष नाहति भाषोऽकारणमारण भावयितुम् [ण अनुहदि भावे अकालमाoण भविदु]

द्वितीय ( विलोक्य) एष न स्वामी पत्रहस्तो राजशासन प्रतीये- तोमुख ते।

गृभवति भविष्यति, शुनो मुख वा अध्यति ।

[ एव अम्हाण शामी  पनि इदोमुहे देखीअदि ।

गुणो मुह वा क्रियाशि।]

स्याल सूचक इस की नगर द्वारे पर सावधान होकर देखभाल करना, जब तक कि मैं इस मिल का बचावत् समाचार राजा से बताकर और उनकी मात्रा प्राप्त करके जाता है।

दोनो सिपाही - महाराज की प्राप्त करने के लिये प्रवेश कीजिये । (स्थानका प्रस्थान )

महला सिपाही (कातवाल साहब) विलम्ब कर रहे है।

दूसरा सिपाही बस्तुन राजाओ के पास अवसर पाकर पहुँचा जाता ह ( राजा पास उचित पाकर ही पहुँचा जा सकता है, सवदा नहीं पहला सिपाही मेरे हाथ इसके के लिये इसे फूलो की माला पहनाने के लिए फड़क रहे हैं।

(यह कहकर का और संकेत करता है) पुरुष आपका, मुझे बिना कारण ही वध के लिए सोचना उचित नहीं है। दूसरा सिपाही (दल कर) यह हमारे स्वामी पत्र हाथ में लिए हुए राजा का आदेश प्राप्त करके इधर की ओर मह किय हुए (आते) लाई परहे है (नू अब गिद्धों की बलि (भोजन) बनेगा अता ने का मुदखेगा।

( प्रविश्य)

श्याल - सूचक, मुख्यतामेव जालोपजीवी । उपपन्न खल्वस्याङ्गुलीय-

कस्यागम । [सूअअ मुचेदु एमो जालोअजीवी । वणो क्खु से अगुली आमो ।]

सूचक – यथावुतो भणति । [ जह आयुक्ते भणादि । ] द्वितीय एवं यमसदन प्रविश्य प्रतिनिवृत्त । [एंगे जमशदण पविशित्र पडिणिवृत्त ।]

( इति पुरुष परिमुक्तबन्धन करोति ।)

इस कोम गोपुरद्वारे — नगर के मुख्य द्वार पर पुरद्वारन्तु गोपुरम् इत्यमर के अनुसार नगर का मुख्यद्वार गोपुर कहा जाता है। गोपायति पुरम प्रच प्रत्ययजा नगर की रक्षा करता है। पुराने पि गोपुरम्' इस कोश के अनुसार गोपुर शब्द का अर्थ केवल नगर भी होता है अत गोपुरद्वार का अय है, नगर का मुख्य द्वार। गवा पुरम गोपुरम जहा गायें बाधी जाती है, पर यहाँ गोपुरद्वार का अ नगर का मुख्य द्वार ही है अथवा इसका जय गोपुर नामक द्वार पर भी हो सकता है, नगर के प्रवेश द्वारों मे से एक मोपुरद्वार। अप्रमती प्रमद् + क्त करि--- प्रमत्त यहाँ न व्याख्याप मूच्छिमदाम" सूत्र नियम से प्रत्यय का नकारादेश नहीं होना -न प्रमत्त अप्रमत्त सावधान प्रतिपालयतम प्रति प्रतीक्षा करना होता है पर वहा उसका अब निगरानी करता है जिससे कि चार भाग न जाये। भतु राजा के लिए राजकमचारी एवं नागरिक भर्ती पालन का जब्द का प्रयोग करते हैं। शासनय— राजाजा को प्रतीक्ष्य प्रतिक्षत्वात्यप्रतीक्षा करके पर महा इसका अभिप्राय है-प्राप्त करके, 'प्रतीप्य' भी पाठ है-प्रति- द्वक्त्या त्यप लेकर स्वामिप्रसादाय स्वामिन प्रसाद तस्मै स्वामिन [प्रसाद प्रसन्नता कृपा वा सम्म अत्र क्रियायोपपदस्येति चतुर्थी चिरायते विनस्प स्पेत्पर्थे रिअर सारी चिरन आत्मनेपदम् । उपसपणीया उप+सूप अनीयर सुमनस पिनद्धम प्राचीन काल मे राजनिय मानुसार अपराधी को लाल पुष्पा को माला पहना कर फाँसी दी जाती थी। यहा सुमन का अय पुण माला है "दनकरवीरदामा पितृवनसुमनोभिष्टिनम मटिक) पिनद्धम-पहनाने के लिए आयुक्त प्रतिमुक्तम् पिढवत्" अमरकाट वलित प्राचीनदण्ड प्रथा के अनुसार का फासी देकर उसके शव को गौधो को खिला दिया जाता था। तोमुखमवृत्ताका मुल अथवा अपराधी का आधा गा कर कुसे छोड़ दिय जात थे और वे उसे जीवित ही मा =

(प्रवेश करने)

सूचक मानावा (मनियों का कर जलान बाले (धीवर) का छाया इसके मन का वृत्तात सत्य

पुरुष - (श्याल प्रणम्य) भतं अब काम आजय भट्टा अह कोलिये मे आजीवे

दयाल एव भगुलीयकमूल्यसमित प्रसादोऽपि वापित। एसो भट्टिणा अमुल्लसम्मिदो पसादो वि दाविदो ।]

(इति पुरुषाय स्व प्रयच्छति ।)

पुरुष - ( सप्रणाम प्रतिगृह्य) भत अनुगृहीतोऽस्मि । भट्टा, अनुमहिंद

म्हि ।]

सूचक एवं नामानुग्रहो यच्छूलादवताय हस्तिस्कन्धे प्रतिष्ठापित । [एगे णाम अनुग्गहे जे लादो अवदालिहत्यिक पट्टाविदे ।]

जानुक - आवृत, पारितोषिक कथयति, सेनाद्गुलीयकेन भतु समतेन भवितव्यम् [आत पालिदोशिअ कहेदि, तेण अगुलीअएण भट्टिणी शम्मदेण होदव्य ॥]

सूचक जसा आपका आज्ञा दूसरा सिपाही यह यमलोक में पहुंचकर आया है। (यह कहकर धीवर को व वन से छोड़ देता है)

कैसी है

पुरुष- ? (श्यात का प्रणाम करके) स्वामी (जब कहिये) मेरी आजीविका

जपान महाराज न अंगूठी के मूल्य के बराबर का यह पारितोषिक भी

दिलवाया है।

(यह कहकर पुरुष को धन देता है)

पुरुष (प्रणाम पूर्वक (धन) लेकर) स्वामी म अनुग्रहीत है। सूचक वस्तुत यह अनुपही कि इस पर से उतार कर हावी

पीठ बैठा दिया गया है।

जानुश्री पारितोषिक यह बतलाना है कि वह अंगूठी महाराज का

बहुत प्रिय होनी चाहिए।

टिप्पणी

मुच्यताम्] कर्माणि लाट लोपजीवीसेन उपजीवते, जीव गिनि । उपपद रदाभ्यामिति प्रत्ययस्य धातारम्य नत्यमत्य प्रमाणित हुआ। आगम प्राप्ति यवमदनपोर अभाय यह कि इसका वस्तु मृत्युदण्ड मिलना था परन्तु यह निर्दोष मुक्त हो गया कोशालक ने = विशुद्ध वानीमाजी" बहकर धीवर पर व्यय किया था, अब निर्दोष प्रमाणित हान पर बावर भा उस पर करता हुआ का जिलाइ गरी जीवस सोय मूरयसमित न भीमस्य मूदन समिन जमूठ मूल्य के बराबर (समित तुल्य) मूल नारास पादिना जानाम्यम्

। स्याल न तस्मिन् महाहं रत्न भ बहुमतमिति तर्कयामि । तस्य दर्शनेन भर्तु रभिमतो जन स्मारित मुहूर्त प्रकृतिगम्भीरोऽपि पयथुनयन आसीत् [ण तम महारण भट्टिणो बहुमत तक्केमि । तस्म दसणेण भट्टिणो अभिमदो जणो सुमराविदा महत्तव पकिदिगम्भीरो वि पज्जस्सुणअणो अमि ||

सूचक सेवित नामायुतेन [दोविद णाम आवृलेण । ] जानुक - ननु भण। अस्य कृते मात्स्यिकभतु रिति । ण भणाहि । ster or a तृणोति ।]

(इति पुरुषमा पति ।)

पुरुष भट्टारक, इतोऽर्थं युष्माकं सुमनोमूल्य भवतु [भट्टालक,

इदो अद्ध तुम्हाण शुमणोमुल्ल हो ।

जानुक - एतावद् युज्यते । [ एत्तके जुज्जइ । ]

दयाल धीवर, महत्तरस्त्व प्रियवथस्यक दवानी मे सवृत्त ।

कादम्बरीसाक्षिकमस्माक प्रथमसौहृदमिष्यते तच्छण्डिकापणमेव गच्छाम । [धीवर, महत्तरो तुम पिअवसस्स दाणि मे सत्तो । कादम्बरीसक्ि अम्हाण पढमसोहि इच्छीअदि । ता साण्डिआपण एव गच्छामो ॥]

( इति निष्क्रान्ता सर्वे) (इति प्रवेशक )

अर्थ मे यत् प्रत्यय प्रसाद पुरस्कार दापित दाणिच कम मेरे द्वारा बनवाया है। प्रतिष्ठापित प्रति स्थाणि कमणि क्. उपसर्गात्नोतीत्यादिनापत्यम् पारितोषिकम् परि तुष चक्र परितोष हार्दिकता परितोष प्रयोजन सम्यत्यव प्रत्यय (एक मकारलोप पारिवारिक जो हार्दिक सना दन वाला हा

श्यामै तो एसा गया कि उग में बहुमूल्य रत्न महाराज को अधिक प्रिय नहीं था (अपि) उनन महाराज को किसी की दिला दी श्री (अब स्वभावम्भीर हान पर महाराज) लभर मे पूर्ण व वाले हो गये जात आला आ

सूचक पन्तृत आपन (राजा की सेवा जानुयह कहा कि इसी है,

अपन लिए नहीं ।)

(यह कहकर जीवर का उ पुरुष स्वामी, इसम से आधा भाग जाया की (जल) पुष मुख्य रूप होगा की है बत जाप लाग मेरे पूज्य पूज्य वना लिए पनि यहा

उनके स्थान पर फूलों के मूल्य रूप मे मैं आपको इस धन का आधा भाग बे

रहा हूँ।)

जानुक इतना ठीक है।

समाधीवर अब तुम हमारे बहुत बड़े प्रियमित्र हो गये हो, (अत) हमारी प्रथम मित्रता, कादम्बरी (शराब) को साक्षी करके होनी चाहिए, अत जब हम लोग शराब देखने वाले की दुकान पर ही चले ।

(यह कहकर सबका प्रस्थान )

टिप्पणी

इणनेत अभिमत जन स्मारित प्रेरणावक प्रयाग अचात् अंगूठी के देखने ने इष्ट जन की याद दिलाई अभिमत अभिमत् मतिबुद्धीति बतमाने क्य यतमाने - इति मतुरित्यन पष्ठी स्मृणिय स्मारित। पयधुनयन परिगतानि अश्रूणि वयोस्ते पवधुणी तादृशे नयने यस्य स मारियकम मत्स्यान् घ्नन्तीत्यर्थे पक्षिमत्स्यमृगान् इति" इति ठक (इक) वृद्धि मात्स्यिका तेषा म पालन तस्य, कुछ टीकाकारो ने 'मलये जीवति मात्स्यिका भी विग्रह किया है। अनूपपईर्ष्या से क्योंकि पारितापिक धीर को मिला था, सिपाहियों को नही, अत सिपाहियो को ईर्ष्या होना स्वाभाविक था। सुमनोमूल्यमो के मूल्य स्वरूप, सुमन का अर्थ दयालुता सद्भावनादि भी होता है, अत इसका अर्थ होगा कि आपकी मुझ पर दयालुता के मूल्य स्वरूप क्वचित् सुरात्यमित्यपि पाठ कादम्बरीसाक्षि- मदिरा को साक्षी बनाकर व कादम्बरीसखित्वमित्यपि पाठ कुत्सितम् अम्बर वस्त्र यस्य में कदम्बर तन्मेय कादम्बरी कदम्बर अण डीप डि कापणम् गुण्डा सुरा पण्यम् अस्य इत्यर्थे नदस्य पण्यमिति तक एक वद्धि शौकि - शराब बेचने वाला आपण दुकान गुण्डा का अय गुरा होता है 'गुण्डा पानगृहे मता।"

( यहा प्रवेशक समाप्त हुआ)

"प्रवेोदात्तायामीपात्र प्रयोजित अद्रयात विशेषमविष्कम्भ यथा" सा० द० प्रवेश सदा दो अंको के बीच में रखा जाता है और यह भूत और भावी कथाओं का सूचक होता है, इसने पात्र निम्न श्रेणीक व्यक्ति होते है और वे प्राकृत ही बोलते हैं।

इस प्रवेश से तत्कालीन वैदिकी हिंसा के विषय में तो सूचना मिलती ही है, साथ ही चापराध के लिए कठोर दण्ड एवं रक्षाधिकारिया के जीवन एक उनके आचरण, मद्यपान, धूस लता व्यवहार आदि का भी पता चलता है. इस दष्टि में भी यह प्रवेशक उपगी है।

(ततः प्रविशत्याकाशयानेन सानुमती नामाप्सरा ।) सानुमती नियंतित मया पर्यायनिर्वर्तनीयमप्सरस्तीसानिध्य यावत् साधुजनस्याभिवेककाल इति । साम्प्रतमस्य राजर्षेरुवन्त प्रत्यक्षीकरिष्यामि । मेनकासबन्धेन शरीरभूता मे शकुन्तला तया च दुहितृनिमित्तमाविष्ट  ( समन्तादवलोक्य) किं नु खलु ऋतुत्सवेऽपि निसवारम्भमिव राजकुल इयते । अस्ति मे विभव प्रणिधानेन सर्वं परिज्ञान । किन्तु सच्या आवरो मया मानयितव्य । भवतु अनयोरेवोद्यानपालिकयोस्तिरस्करि- प्रतिच्छा पार्श्ववर्तिनी सूत्वोपलप्स्ये ।

[व्विति मए पजाअभिव्यत्तिणिज्ज अच्छरातित्यसनिन जाब ति पद इमरस राएसिणो उदन्त पञ्चखी- करिस्त मेणसवन्धेण सरीरभूदा मे सउन्दला ताए अ दुहिदुणिमित्त आदिम्ह । for क्ख उदुच्छवे वि णिरुच्छवारम्भ बिज रामउल दीमइ । अस्थि मे बिब पणिघाणेण सब्द परिण्णाद्। कि दु महीए आदरो भए माणइदव्वो । होदु, इमाण एव्व उज्जाणपाणिआण तिरक्खरिणीप- हिच्छणा परसवत्तिणी भविअ उवलहिस्स ।]

(इति नाट्यनावतीर्य स्थिता ।)

(इसके बाद विमान से सानुमती नामक अप्सरा का प्रवेश) सानुमती साजनी के स्नान के समय तक, अप्सरस्तीय के सामीप्या में बारी- बारों में उपस्थित रहने के नियम को (आज) मैंने पूरा कर लिया है (अत) अब मैं इस दुष्मन के वृत्तात को (स्वयं) देखूंगी मेनका से (उसका ) सम्बध होने मे (अब) कुता (भी) मुझे स्वशरीरवत् प्रिया है और उसने अपनी पुत्री के लिये पहले ही कह रखा है (कि मैं उसकी देख भाल रखू) (पारो ओर देख कर क्या बात है कि बस के उत्थान के उपस्थित होने पर भी राजपरिवार उत्सवारम्भ रहित सा दिखलाई पड़ता है। ध्यान से ही सब कुछ जान लेने के लिये मुल में सामय्य है कि तु सखी के मादर अनुरोध को भी मुझे मानना चाहिये। अच्छा, तो इन ही aur frerant को समीपवर्तिनी होकर तिरस्करिणी विद्या से अपने को अदृश्य रखती हुई, (सब समाचार ) प्राप्त करूँगी।

(विमान से उतरने का अभिनय करके स्थित हो जाती है)

टिप्पणी

आकाशयानेनात्पनेनेत्य में पाघात करणे ल्युट यानम्-समारी, भाकाशयान- अकाशगामी यान अर्थात् विमान अथवा आकाशयान का अथ आकाश माग या आकाश गमन भी हो सकता है क्योंकि अप्सराओ मे पक्षियो की भाति आकाश में उड़ने की शक्ति थी। नीयम बारी-बारी से नहा उपस्थित रहने का नियम अन्स स्तीय की सरक्षिकार्य अधारा श्री अत वहा प्रति दिन एक अप्सरा को तब तक

तत प्रविशति लाडकुरमवलोकयन्ती चेटी । अपरा च पृष्ठतस्तस्या 1)

प्रथमा--

जीतातिपाण्डुर जीवित सत्य वसन्तमासस्य ।

टोsसि चूतकोरक ऋतुमङ्गलत्वा प्रसादयामि ॥२॥

आतम्महरिअर जीविद सन वानन्तमासस्स ।

दिट्ठो सिदको उमगल तुम पसाएमि ॥]

उपस्थित रहना पड़ता था जब तक साधुजन रहा स्नान करे, जिससे कि उनके स्नान म कोई बाधा न हो। परि ण धाना परावनुरात्ययण" इति वृद्धि पर्याय तेन नियतनीयमुनिर यत् अनयर सान्निध्यम सम् निधा कि- सनिधि तत भावे प्यन उदत्तम उद्गत प्राप्त अत घटनावर यस्य स उदन्त- समाचार प्रत्यक्षीकरिष्यामि अणा प्रतिप्रति अक्षिसमासान्तष्ट प्रत्यक्षम् अप्रत्यक्ष प्रत्यक्ष करिष्यामात्यर्थे विप्रत्यय। मेनकासम्वर्धन- इसका यह अथ हो सकता है कि मेनका के साथ मेरा मंत्रीम्बध होने से शरीरभूता मरीरस्य भूतातुल्या अर्थात् शरीरस्वरूप शरीरसमाना या अथवा अशरीर शरीर त्य श्रेण्यादय कृताविभि से समास होगा क्योंकि यह गम आकृतिगण है अथवा इसे शिष्ट प्रयोग माना जा सकता है जैसा कि अभी "आश्रमललाम भूतामित्यादिस्यल मे देखा जाता है प्रणिधान ध्यान भक्ति, यह देवयोनियो अप्सराओ और योगियों को प्राप्त होती है जो कि ध्यान से ही भत, भविष्यकाल की बात जान लेते हैं। आदर - आ| द-अप यह इसका अप सादर अनुरोध है तिरस्करिणी–अदृश्य हो जाने की विद्या, तिरस्करिणी विद्या प्राप्त व्यक्ति को तो कोई नहीं देख पाता पर वह देखता सुनता रहता है। तिरस्क दिदीप निपातनात्य भाव अथवा caryant विधिरनित्य ।

(इसके बाद आम को देखती हुई एक दासी का और उसने पीछे दूसरी दासी का प्रवेश

पहली दासी-

आता ति अन्वयाता बहरिनार बमतमामस्य सत्यम् जीवित अम त्वाम प्रसादयामि। शब्दाय नाताहरितपाण्डुर कुछ कुछ राल हरित एवं श्वेतरण वाले वसन्तमासस्य सत्यम् जीवित बसत नाम के वस्तुत जीवनस्वरूप चुतकीरक आम के दृष्ट (तुम मुझे जान) दिखलाई पडे हा ऋतुम गल हेतु (बसन्त ऋतु) ने मगलरूप लामु प्रसादयामि (मै) तुमका प्रम करती है। चतकोरक दृष्ट

अनुवाद कुछ-कुछ नात हरित एवं वाले मतमास के वस्त

द्वितीया परभृति, किमेकाकिनी मन्त्रयसे? [परहृदिए, कि जाइमन्तेनि ]

प्रथमा - करिके, चूतकलिका रवोन्मत्ता परभृतिका भवति । [ क्लिन उन्मत्ति परहृदि होदि । ] द्वितीया ( सहर्ष स्वरयोपगम्य) कथमुपस्थितो मधुमास [ कह उवविदो महमासी 2.

= दर छहै। संस्कृत व्याख्या आता हरितपाण्डुरपितरितश्वेतवर्णे समन्वित वसन्तमासस्य == चैत्रमानस्य सत्यम् वस्तुत जीवित जीवनस्वरूप, यूतकोरक अवलोक्ति अति है तुम मनस्वरूप त्वामु प्रसादयामि हत्वा प्रीणयामि ।

गोवस्वरूप है यार (तुम मुझे आज दिवाल पता बसंत ऋतु महरू (मे करती हैं।

भावाबभाग में छा गया अपहरित एवं पाण्डुर वन की मोजा अय वासनिक पुष्पा के रहते हुए भी बसन्त में सर्वोत्तम मानी जाती है अतः यह वसन्त का जीवन सदस्य कही जाती है सम्बधित करते हुये बेटी रहती है आज तुम विरप्रतीक्षा के बाद दिखलाई पडे हो त मै तुमको करती हूँ तुम गन्न हो इसलिय में तुम्ह प्रणाम करती है।

विशेष प्रस्तुत पथ में स्वभावांक्ति एवं रूपन अनकार है तथा आर्या जाति

सरकत सरला नोकमनाय चेटी पयति वोरक वमन्ततमह] [गलस्वरूप | तोऽसि त्वमसि वस्तु चरान्त मासस्य प्राणस्वरूप अथ व लोहितहरिवंत व किञ्चित् समचित, अह प्रसादनाय

टिप्पणी

आता ति—प्रस्तुत पद मे आईपद का सम्बन्ध तीनो ही वर्गों से है. पाण्डुर शुक्ल कुछ पीलापन लिये हुये शुक्र व पाण्डर कहलाना है यहाँ पा शब्द से त्वमे र प्रत्यय होता है तो हरितवर्णों वर्णनेति कमधारय के साथ इनमे सुप्पा में समास हो गया अस्त्यम प्रत्यय गुणवचनेभ्यो मोटि में लोगो हरित जादि बनेग

बसन्तमासस्य चै और साइन का महीनो को वसन्त ऋतु माया गा है यहाँ सन्तापय चैत्र मान से है इसी मान में प्रथम आश्रम देखी जाती है।

दूसरी बेटी परभूतिका तू क्या असी गुनगुना रही है ?

प्रथमा-मधुकरिके तवेदानों काल एष विभ्रमगीतानाम् ।

[महजरिए, तब दाणि कालो एसो मदविन्भसगीदाण । ]

द्वितीया सखि, अवलम्बस्व मा यावदप्रपादस्थिता सूत्वा चूतकलिका गृहीत्वा कामदेवार्बन करोमि ।

[ सहि अवलम्ब म जाव अगपादट्ठि भविजा वृदकलिल गेव्हिअ कामदेवच्चण करेमि ।]

प्रथमा-यदि ममापि खल्वर्धमचंनफलस्य (ममवि अद्ध जच्चणफनम्स ||

प्रथम टीमधुकरिका, कोवल कली को देखकर हो जाती है अता ने परमतिका भी मतवाली हो रही है।

दूसरी बेटी (हपपूनक शीघ्र पास जाकर क्या मधुमास आ गया है ? प्रथम देवे-मधुरिका, अब तुम्हारे मतवाले विलासी और गीतो का यहाँ नमय है (मधुकर अर्थात् भ्रमरी इस समय मतवाली विलासक्रीडायें एवं मधुर गीत गाती है।

दूसरी बेटी सखी मुझे जरा सहारा दो जिससे कि मैं पैरों के अग्रभाग पर (जो पर खडी होकर आम्रकली को तोड़कर कामदेव की पूजा करें।

प्रथम बेटी यदि पूजा के फल का भाग मुझे भी मिले तो मैं तुम्हे सहारा दे सकती है।

टिप्पणी

मधुकरिका और परभतिया के मुख्या कम भ्रमरी और कोयल है पर यहाँ कवि ने इन नो का साभिप्राय प्रयोग किया है। इन दोनो बेटियो (सेविकाओ) के नाम भी यही है अर्थात् एक का नाम मधुकरिका और दूसरी का परभतिका है, यहाँ दही दोनों का व्ययपूर्ण वाताला है व परस्पर एक दूसरे को सखी है। मधुकरिका एस परभतिका दान हो वासन तु में आनवत होती है अतएव बसात मे मधुर कोकिल ध्वनि सुनाई पडती है और पुष्पी पर भ्रमरी गुजार करती है। उक्त दोनो ही शब्द श्लिष्ट है मधुकर सेवा कन् और स्वीत्व विवक्षा मे दोष होकर मधुकरिका तथा परभत से भी इसी प्रकार परभृतिका होगा मदविश्वमगोतानाम् विभ्रमाव atarria विभ्रमगीता मदेन विभ्रमगीता तेषाम् अग्रपादस्थिता अग्रोव तो पादी यो स्थिता। कवि ने यहाँ इन दोनों के बालानाम से प्रियम्वदा और अनसूया जैसा ही दोनो का स्वभाव चित्रित किया है, परमतिका जहा हास्यप्रिय और अधिक बात करने वाली है वहाँ मधुकरका गम्भीर और कम बोलने वाला है, दोनों का यह पारारिक स्नेह एवं दोनों की वचनबडि गमा दमनीय है, इस प्रकार कवि ने यहाँ पचम अप के गम्भीर वातावरण को कुछ मनोर बना दिया है और कथा सूत्र से सम्बद्ध कर दिया है।

द्वितीया अकथितेऽप्येतत् सपद्यते यत एकमेव नौ जीवित द्विघा स्थित शरीरम् (सी मवलम्ब्य स्थिता ता र गृह्णाति । अये, अप्रतिबुद्धोऽपि चूतप्रसवोss बन्धनभङ्गसुरभि भवति । (इति कपोतहस्तक कृत्वा) स्वमसि मया ताड़कर दन कामाय गृहीतधनुये। पथिकजनप्रतिक्ष्य पञ्चाभ्यधिक शो भव ॥३॥ वहिदे दिज । जदो एक एव्य णो जीविद बुधादि अए, आप विवाणभगसुरभी होदि । तुम सिमा कुर दिगो कामस्य गहीद धणुअस्स । हिजो पचान्महिओ सरो हाहि ||३||] (इति चूताकुर क्षिपति

दूसरी बेटी की जाना है। क्योंकि हम दोनो के = राग स्थित है। इसी का सहारा रही एक कर न हुआ भी यह आम का बौर पर यह कहकर कपोलावर हाय को

बताया गुदीन कामाय वन अि

तुम मेरे द्वारा गृहीन कामदेव का इन सिसमर्पित किये गये हो। पविवजन तिपदिकयों के वाले पञ्चाभ्यधिक पर भव कामदेव के बाणो मे श्रेष्ठ बाण बना।

ना मैंने तुमको धनुष धारण करने वाले कामदेव को मर्पित कर दिया है अब तुम पथिकों की युवतियों को (अपना) लक्ष्य बनाने काम पाँच वा श्रेष्ठा बनो।

भावाद-पेटी करती है जी और मैंने तुमको उस कामदेव को मत कर दिया जी के मान भग करने के लिए और दिन तू का नायिकाओं का अपने वामपीति करने के लिए प्रस्तुत है अब तुम परिकीतियाँ अपना क्ष्य बनाकर मदेव के प्रसिद्ध पाच बाणो मे श्रेष्ठ बाण बनो, वहाँ काम के वे अपने बाण छित हो जायें वहाँ तुम उसकी सहायता करो।

विशेष प्रस्तुत पद्य में, यद्यपि नामदेव के पाच बाथ ही प्रसिद्ध है तथापि आठ कुर रूप एक अतिरिक्त बाण की कल्पना की गई है त यहाँ सम्बन्ध में

संस्कृत व्याख्याताब कुर है आपकोरक त्वम् मया द्वितीयया उद्यान- पालिका, गहत धनुर्येन तस्मै गृहीतधनुषे सज्जीकृतचापाय कामाय दत अति समर्पितोऽसि पचिका पान्या च जना पथिकजना तेषा युवतय रमस्य एवं लक्ष्य पस्य स परिजनवतिलक्ष्य प्रोपित माहृदयपीडक पञ्चभ्य प्रसिद्धेभ्य अरविदादिपव्यसख्यम्य कामाणेभ्य अभ्यधिक पञ्चवाणव्यतिरिक्त= समश्रेष्ठ शरमाण भ =

सात सरलार्थ द्वितीयोधानपालिका कथयति है कोरक स्व गया मानिनी मानदलनशीला प्रोपित काणाञ्च हृदयोत्पीडकाय धूतपापाय मदनाम समर्पितोऽसि अना व प्रोषितभ काणा garrettes स तस्य कामस्य प्रसिद्धेभ्य अरविन्दादिपञ्चसख्यमाणेभ्य व्यतिरिक्त सर्वश्रेष्ठ र भद

टिप्पणी

- नौ आवयो जीवित जीवनम [प्राणा वा अप्रतिबुद्ध प्रतिबुध्+ प्रतिबुद्धविकसित प्रफुल्लित न प्रतिबुद्ध अप्रतिबुद्ध जो जिला इला न हो बन्धनभङ्ग सुरभि बच्चनादन्तात् भङ्गन सुरभि अपने से टूटने पर जो सुगन्धित हो रहा है। कपोतस्तक का कपोत इव स्थिती हस्तौ यस्मिन् तत्— कपोतहस्तकम् । जब कोई किसी को प्रणाम आदि करता है तब अपने दोनो हाथो को इस प्रकार जोडता है कि हाथो का मूलभाग एव अग्रभाग तो जुड जाता है पर बीच में कुछ अवका रह जाता है, इस प्रकार बीच के भाग के कुछ उठे होने के कारण ही इसे कपोताकार हस्तबधन कहते हैं "कपोतोस करो वलिष्ट मुनापार्श्वदी" सगीत रत्नाकर कपोताकार हस्तप्रयोग "भीती विज्ञापने विनये प्रयुज्यते" प्रस्तुत प्रसंग में पैटी कामदेव के प्रसादन के लिये कपोता- कार हाथ जोडकर विनय करती है। गृहीतधनुषं गृहीत धनुर्येन तस्मै वस्तुत यहाँ इस बहुबीहि समास में 'धनुष' सूत्र से समासान्त अनड होकर गृहीतधन्वने रूप बनना चाहिये था परन्तु समासान्त विधि के अनित्य होने से यहाँ अनद न होकर धनुषे भी शुद्ध है "समासान्तविधेरनित्यत्यामानानुपपत्ति। अन्य कवियो ने भी ऐसा प्रयोग किया किया है "घृतधनुष रघुनवन स्मरामि " उ० रामचरित । अश्वत्थामा करभूतधनु वेणीसहार पचिकनवतिसक्य पन्यान गच्छतीत्य पद शब्दात् [ ( क) पधिकारच ते जना रोया युवतम लक्ष्य यस्य स पचाभ्यधिक पञ्चानामभ्यधिक यांची वाणी मे श्रेष्ठ कामदेव के पञ्चवाण-

(क)

"अरविन्दमशोकञ्च भूतच नवमल्लिका।

नीलोत्पलञ्च पञ्च पञ्चवाणस्य सत्यका ।

सम्मोहनोन्मादौ च शोषणस्थापनस्तथा । स्तम्मनाचेति कामस्य पञ्चवाणा प्रकीर्तिता ।

(प्रविश्यापटीक्षेपेण सुपित 1) कञ्चुकीमा तावत् अनात्मज्ञे देवेन प्रतिषिद्ध वसन्तोत्सवे aartereres किमारभते ?

उमे ( भीते) प्रसीदस्वार्य अगृहीतायें आवाम् [ पसीद अज्जो अम्मीदत्थाओ व ]

युकीन किल त युवाभ्या यद् वासन्तिकस्तरभिरपि देवस्य शासवं प्रमाणीकृत तवायिभि पत्रिभिश्च । तथाहि-

तानां चिरनिर्गताऽपि कलिका बन्नाति न स्व रज, सन यदपि स्थित कवक तत् कोरकायस्यया। कण्ठेषु स्खलितं गतेऽपि शिशिरे पुस्कोकिलाना शके सहरति स्म चकितस्तुणाकृष्ट शरम्

अपने नाम के अनुसार ही ये वाण प्रभाव डालने वाले होते [ पञ्चाभ्यधिक का अर्थ किन्ही टीकाकारो ने बाण भी किया है। इससे दस्त का उद्दीपक- तिशय भी ध्वनित होता है

अपने नाम के अनुसार हो ये बाण प्रभाव डालने वाले होते । पञ्चाभ्यधिक का अर्थ किन्ही टीकाकारों ने बाग भी किया है। इससे दस्त का उद्दीपका- तिज भी ध्वनित होता है। (यह कहकर आमरी बाल देती है)

(परदे को एक ओर हटाकर क्रोध सहित प्रविष्ट होकर ) ज्यूको जरी नासमझ, ऐसा न कर महाराज के द्वारा वसन्तोत्सव के रोक दिये जाने पर तू आज तोड़ना क्यो आरम्भ कर रही है? दोनों (भयभीत होकर) a आप क्षमा करें। हम दोनो को यह बात

ज्ञात न थी। कञ्चुकी – क्या तुम दोनो ने नहीं सुना है कि बसन्त ऋतु के हो और उन पर रहने वाले पक्षियो ने भी महाराज की आज्ञा का पालन किया है। क्योंकि- धूतानामिति-अन्यय-यूनानाम् भिरनिगता अपि कलिका स्व रज न नाति कुरवकम् दपि सद्धम् तत् कोरकावस्था स्थितम्। मिमिरे गते अि पुस्कोकिलानाम् तम् कण्ठेषु स्वलितम् श के स्मर अपि चकित तूणाष्टरम् सहरति

शब्दार्थ-पूतानाम् आम्रवृक्षो की चिरनिगंता अबहुत समय से निकली हुई भी कलिकाकली, स्व रज न पनाति = अपना पराय धारण नहीं कर रही है। कुरवकम् कुरवकपुष्प, यदपि यद्यपि, सनद विकसित होने के लिये प्रस्तुत है परन्तु तद्वह, कोरकावस्यया स्थितम् = कमी के स्थित रह गया है। शिगिरे गये अपि मिशिर ऋतु के बीत जाने पर भी पुस्को- किलानाम् छतमनरजातीय कोयलों की ध्वनि कण्ठेषु स्खलितम् (उनके) कठो में ही अवरुद्ध हो गई है के मैं सोचता हूँ कि, स्मर यपि कामदेव भी चकित स्तब्ध होकर गुणाधेकृष्ट शरम्तूणीर से आये निकाले हुये (वपने) वाच को, सहति (पुन) रोक लेता है।

अनुवाद - आम्रवक्षो की बहुत समय से निकली हुई भी कली अपने पराग को धारण नहीं कर रही है, कुरवक पुष्प यद्यपि विकसित होने के लिए प्रस्तुत है (तथापि ) यह कली के रूप में ही स्थित रह गया है। शिशिर ऋतु के बीत जाने पर भी न जातीय की ध्वनि (उनके) रुष्ठी मे हो अव (रह गई है) मे साचता हूँ कि कामदेव भी स्तब्ध होकर तूणीर से आये निकाले गय (अपने वाण को (पुन) रोक लेता है।

भावाय कञ्चुकी ने कहा था कि महाराज की आशा का वासंतिक पक्षा ने उन पर रहने वाले पक्षियो न भी पालन किया है, अपनी इसी बात की पुष्टि करता हुआ वह कहता है कि आम्रवृक्षों में बहुत समय से कलिया निकल आई है तथापि अब भी अपने स्वाभाविक पराग को धारण नहीं कर रही है। कुरवपु पिलिन के लिये प्रस्तुत है तथापि वह राजाज्ञाण अब तक कली के रूप में ही स्थित है विकसित नहीं हो रहा है, इसी प्रकार यद्यपि अब शिशिर कान समाप्त हो चुका है, बात आ गया है, तथापि कोयल की मधुर ध्वनि उनके गले में हो रुकी हुई है, बाहर नही निकल रही है, इतना ही नहीं मुझे ता ऐसा प्रतीत होता है कि स्वय कामदेव भी इस राजाज्ञा को सुनकर स्तब्ध रह गया है अतएव वन अपन तूणीर से आधे ही निकाले गये बाण को पुन अपने तरकस में ही बाद कर रहा है। इसमें स्पष्ट है कि बस रोक देने को राजाशा का प्रभाव न केवल वासनिक दक्ष पुष्पों पर ही पड़ा है किलो की मधुर ध्वनि भी सुनाई नहीं यह रही है इतना ही नही कामदेव भी राजाज्ञा से भयभीत एवं चकित होकर अपन निकाले गये भी बाण को पुन तरकस मे बाद कर रहा है।

प्रस्तुत पद्म के कलिका, कुरवकम् तम् को जाति जब मे एकवचन मानना चाहिये अथात् इनका अनमत्रा कलिया, पुष्प और ध्वनिया है। प्रस्तुत पद के रज पदका अब रजादरान भी हो सकता है अत ममामोति अवकार द्वारा इसका अथ यह भी होगा कि जैसे कोई वाला प्रा होकर भी रजा दशन (रजस्वला) भाव को प्राप्त नही करती उसी प्रकार कलिका भी अपने स्वाभाविक पराग को धारण नही करती। कचुकी का आशय यह है कि जहाँ अचेतन धनादि चेतन पक्षी आदि तथा महामहिमशाली कामदेव भी राजाज्ञा का पालन कर रहे है वहा तुम लोगों ने राजाज्ञा न सुनी हो, ऐसा सम्भव नहीं । अतएव तुम अनात्मा अर्थात् अपनी स्थिति को न समझने वाली मूल हो ।

विशेष प्रस्तुत पथ मे "रज नबध्नाति मे उक्त प्रकार से चेतन व्यवहार समारोपण द्वारा समासोक्ति बलकार चिरनिगता आदि कारणों के रहते हुये भी परागादि कार्यों की उत्पत्ति का निषेध किया गया है, अत मालाविशेयोक्ति अतकार 'के' पद के प्रयोग से वाच्या उत्प्रेक्षा अलकार, प्रथम तीन चरणों के तीन वाक्य चतु चरणगत कामदेव के शरसहरणात्व में कारण है अत वाक्या हेतुक काव्यलिङ्ग अलकार है छेक वृति श्रुति अनुप्रास, शार्दूलविक्रीडित नामक है।

सस्कत व्याख्यातानामचिरनिगता अपि चिरादु- जरी स्वकीय स्वाभाविक परागम, न वनाति न धारयति (यथा काचन वाला प्रौढावस्था गतापि रजावान न लभते पिपराग न उसे कुम्म्म कुरवपुष्पम, यदपि यद्यपि, मनम आत्मविकास सज्जीभूतम ( तथापि तत् कुवर कुसुम, कोरकावस्या कलिका- रुपेण, स्वितम अविकसितमेव स्थित शिशिरे गतेऽपि गते वसन्तार- पिपुरुकिलानाम (पुमासश्चत काफिला तपाम) पुजातीय पिकानाम् नमकूजितम कण्ठेषु (तपाम) गलविलय एवं स्वतितम समवरुद्धम शके= एतेनाह मन्य, स्मरोऽपि मदनाऽपि चकित भया, तूणाघ्र- पृष्टम् = स्वनिपड गा नियमित न राम, सहति पुनरेव स्वनिपग एवं निक्षिपति = = =

सरकत सरलाय बनतोत्सवप्रतियेामका राजासामनुरूप चिरायुभि- आपि मानवीय स्वाभाविक पराग तथैव न समाधत्ते यथा काचन वासा त्वमा नया रजोदर्शन न लभने वनकुसुममपि प विमायापि गजानु तत्तथैव को पेवाविसितावस्थाया- मैव स्थित मस्ति स्कोरिवाना वमतारम्थति स्ववीय स्वाभाविक मधुर कूजित । मपि तदभावेव सम न तद् महिनियतम एतसब माना मह मदनापि भयभीत सद् स्वनिपडगाव अमुद्धतमपि स्वकीय र पुनरेव स्वनिष एव निक्षिपतिः ।

अपटीक्षेपेण राजाज्ञा के विरुद्ध काय करती हुई उद्यानपालिकाओं को देखकर हुआ यू स्वयं परदे को हटाकर सहसा प्रवेश करके कहता है, अतएव यहाँ are प्रवेश की सूचना नही दी गई है। अगृहीतार्थ गहन अर्थ माझ्या ते अग्रहीतार्थ अब बात बास तर्फे वसन्ते जाता इत्यर्थ वसताच्चेति छन् क हस्त वैदिक प्रयोग है, कालिदास ने बहुत से वैदिक शब्द का प्रयोग किया है उन्ही में से यह भी एक प्रयोग है नाक मे बसत से अण प्रत्यय होकर वास प्रयोग होगा। रवकम् कु कुत्सित भ्रमर ध्वनि, कुरवक पुष्प में जल्प मकरन्द होते के कारण इस पर अगर गुजार कम होती है। पुस्कोकिलानाम्-युवक फोलो के पुस्कोकिल की ही अधिक स्पष्ट होती है और बसन्त मे स्वभावत स्त्रीजाति की अपेक्षा पुरुष जाति में ही अधिक मद होता है इसीलिये सामान्य कोयल न कहकर कालि युवक का ही प्रयोग किया है। सनन सन् वह + शब्दे [क्त

नास्ति सन्देह महाप्रभावो राजर्ष । [ णत्थि सदेहो महा- प्पाजो राएसी ।]

प्रथम आर्य, कति दिवसान्यावयोनिश्रावसुना राष्ट्रियेण भट्टिनीपाद- मूल प्रेषितय इत्य च मी प्रमदवनस्य पालनकर्म समर्पितम्। तदागन्तुकतया- पूर्व आवाभ्यामेष वृतान्त (अज्ञ, कदि दिजहाद अम्हाण मित्तावसुणा रट्ठिएण भटिट्णीपाअमूल पेसिदाण इत्थ अ णो पमददणस्स पालणकम्म समपि वा तुजवाए अस्मुदपुष्षा अम्हहि एसो वुत्तन्तो ।] कबुकी-भवतु न पुनरेव प्रवर्तितव्यम् ।

उसे आर्य, कौतूहल नौ पद्यनेन जनेन श्रोतव्य कथयत्वार्य निमित भर्ना वसन्तोत्सव प्रतिषिद्ध [अन्ज, कोहल णो । जइ इमिणा जणेण सोदव्व कहेदु अज्जो किनिमित्त भट्टिणा वसन्तुस्तवो पविसिद्धो । सानुमती उत्सवप्रिया खलु मनुष्या । गुरुणा कारणेन भवितव्यम् । [ उसवपि मम्सा गुरुणा कारण होदव्य ।]

कम्बुकी बहुलीभूतमेतत् कि न कथ्यते। किमत्र भवत्यो कर्णपय

उमेत राष्ट्रियमुखाद्याववङ्ग लीयकवर्शनम् [सुद रद्विअमुहादो

जाव जगुलीबदसण ॥]

दोनों (इसमे कोई सन्देह नहीं, राजपि दुष्यन्त महाप्रभावशाली हैं।

पहली आर्य, राजम्यातक मित्रावसु द्वारा महारानी के चरणों में भेजी गई हम दोनो को (अभी कितने दिन हुये हैं और इस प्रकार हम दोनो को इस प्रमद י वन की सुरक्षा का कान सौपा गया है अत नवागन्तुक होने के कारण हमने यह समाचार पहले नहीं सुना है।

कचुकी अच्छा, अब फिर ऐसा न करना चाहिये।

दोनों जाय हम दोनों को कुतूहलता है। यदि हम दोना यह सुन सकती तो आप कृपा कर कहे कि महाराज ने किसलिये बसन्तोत्सव रोक दिया है सानुमती - मनुष्य ( स्वभावत) उत्सवप्रिय होते हैं, अत (इस रोकने मे )

कोई बड़ा कारण होगा।

की यह बात बहुत फैली चुकी है, तो ( भी ) क्यो न बता दूँ क्या आप लोगो ने शकुन्तला के परित्याग से (उत्पन्न) जननिन्दा (की बात नहीं सुनी है (आपके कानी तक नहीं पहुँची है ?)

दोनों हमने राजा के मुख से अंगूठी मिलन तक की बात सुनी है। टिप्पणी

नास्ति सन्देह इस वाक्य मे उद्यानपालिका द्वारा राजा के लिए राजपि शब्द का प्रयोग कुछ सन्देहास्पद है, क्योकि दासी लादि राजा के लिए सब देव या धर्ती

कीतेन कथयितव्यम् । पर्ववतु स्वाम्गुलीयकदर्शनाथ- स्मृत देवेन सत्यमुडपूर्वा मे तत्रभवती रहसि शकुन्तला मोहात् प्रत्याविष्ठेति । तवानृत्येव पचात्तापमुपगतो वेब । तथाहि-

राष्टिपथा पुरा प्रकृतिभि में प्रत्यह सेव्यते, शय्यान्तविवर्तन विगममत्युलित एवं क्षपा । दाक्षिण्येन ददाति वाचमुचितामन्त पुरेभ्यो यदा,  भवति च वीडाविलक्षश्चिरम्॥

का ही प्रयोग करती है राजय का प्रयोग नहीं, अत ऐसा प्रतीत होता है कि मह सानुमती का वाक्य है, पेटी का नही कति दिवसानि कितने दिन हुये है? इसका अथ "कई दिन हो चुके है" यह यहा पर प्रसगानुकूल न होने से ठीक नहीं है, जैसा कि अन्य टीकाकारों ने समझा है दिवस शब्द का प्रयोग सामान्य पुलिस मे ही होता है पर यह सभ्य अधर्मादिगण मे होने में नपुसकलिङ्ग भी हो सकता है जैसा किम इसका प्रयोग है। मित्रावसुना मित्रावसु राजस्थान का नाम है राष्ट्रियेण राष्ट्रिय राजपालक का पर्यायवाची शब्द है "राजस्तु राष्ट्रिय" इत्यमर । राष्ट्र अधिकृत राष्ट्रमन्दात् 'राष्ट्रावारपाराखी सूत्रे व प्रत्यये तस्य इयादेशे श्रोत- व्यम्-यदि यह बात हमारे सुनने योग्य हो तो कि निमित्तवनिमय प्रयोग सही विभक्ति का प्राय प्रयोग देखा जाता है । उत्पावधिया उत्सवा प्रिया येवान्ते उत्+उत्सव प्रिय शब्द के साथ समास होने पर 'वा प्रियस्य' वातिक से प्रिय शब्द का पूर्वा पर प्रयोग होता है, मिना उत्सवप्रिय बहुलीभूतम् अवल यल भूतमित्य प्रत्यय कोलीनम कुनै भय कुलीन कुल सईन, तस्य भाव इत्यर्थे कुलीन + अ ोलीनम् कुल की गोपनीय बात यहाँ इसका ज लोकनिन्दा है।

चुकी सब तो बहुत थोड़ा ही कहना है, ज्योंही अपनी अंगूठी को देखने से महाराज को (यह ) स्मरण हुआ कि वस्तुत मैंने माननीया शंकुतला से पहले एकान्त मे विवाह किया था और अज्ञान के कारण परित्याग कर दिया है, तब से लेकर ही महाराज पश्चात्ताप में पड़ गये हैं क्योंकि

रम्यमिति-अन्वय- रम्य द्वेष्टि यथा पुरा प्रकृतिभिः प्रत्यहम् न सेव्यते । एवं प्रान्तविक्षपा समपति यदा दाक्षिण्येन जन्त पुरस्य उचिता बाचम् ददाति तदा गोत्रेषु स्वत चिरम् ब्रीडाविलक्ष] च भवति ।

शब्दाच --- रम्यम् द्वेष्टि रमणीक वस्तुओं से घृणा करते हैं। यथा पुरा= पहले की तरह, प्रकृतिभित्रियो आदि से प्रत्यहम प्रतिदिन न सेव्यते नही मिलते हैं। उनि एव ( रातभर जागते हुये ही शय्याप्रान्तविवर्तन या के किनारो पर करवट बदलते हुये ही, अपा गमयति रात्रियां व्यतीत कर देते हैं। पदा-जब दाक्षिण्येन निष्टता के कारण, अन्त पुरेभ्यअन्तपुर की रानियो को,

उचिना च ददाति उचित उत्तर (भी) देते है तदा तब गोत्रे स्वलित = नामोच्चारण कर देते है (अपार किसी रानी के नाम के स्थान पर से जब कुता का नाम लेन है (और तब) चिम्म् बहुत दर तक प्राविला च भवति सा सेवित हा जाते हैं।

अनुवाद (वह रमणीक वस्तुओं मे दणा करन है, पहले जैसे जादि से प्रतिदिन नही मिलते (रात्रिमर) जागते रहत पप्पा के दिवारों पर बदलते ही गजिया व्यतीत कर देने है। जय नानपुर की रानियो का (उत्तर (भी) ते नव नामोच्चारण मे गलती हो जाने से, (व) देवास चितित हो जाते है।

मादाय राजा की पश्चाताप की स्थिति का वर्णन करता हुआ कञ्चुकी कहना है कि यह किसी भी सुन्दर वस्तु को देखकर प्रमन नही हात अपितु उनमें माही करते है जो पहले आदि से प्रतिदिन मिलने में उसी प्रकार नही मिलते अपने बिस्तर के किनारो पर बदलते ही जागत तुम हो सम्पूर्ण रानिया बिता देते है। जब कभी वे आने अपुरी रानियों को सा बात का उत्तर भी देते है तो जब वे नामोच्चारण म गलती कर द किसी रानी के नाम के स्थान परतला के नाम का उच्चारण कर जाते है तब उहे वही लज्जा होती है इससे वे बड़े चिचित एवं विक्षुब्ध हो जाते हैं।

विशेष प्रस्तुत पद्य में पचात्ताप आदि का कारण न बता कर जो उनके कायभूत रम्यष्टि आदि का कथन किया गया है जतपय अकार परमात्ताप के प्रतिपादक अनक कारणो के उल्लेख होने से समुच्चय अलकार प्राविलक्ष का कारण गावस्था या गया है अत कम्पनि बलकार अनुप्रास त विविध अनुभा और चिता विषादादि भावो से यहा विप्रलम्भ गृहगार व्यजित होता है। प्रसाद गुण, वैदर्भी रीति एवं शाल विक्रीवित छ है।

संस्कृत व्याख्या रम्यम मनोहारि अकचन्वन गीतवादिनादिकमद्वेष्टि= नाभिनति अपि इदमपि नेच्छति यथा पुरा वत् प्रकृतिमि अमात्या दिनि प्रत्यहन प्रतिदिनम न मेव्यते राजकाय सम्पादनाय नोपास्यते । शय्याया शयनीयस्य प्रातेषु उन्तभागेषु विवर्तनानि परितुण्डनानि शय्याप्रातरित निद्रा पेन स उचित निद्रायून्य जागरित एवं क्षपा राषी विगमयति= अतिवाह्यति यदा दाक्षिष्येन उदारतया शिष्टतया स्वावर भागोगनाथ चापण वा अत पुरम्य अवराधस्तिका मिनीभ्य उचितामाचिताम्पस्ता भा वाच ददाति उत्तर प्रयच्छति तदा नाम स्खलित वस्त कुलायचित्तस्वात् अन्यस्था वाम या नामाचारका मन्तानामो वारा इत्यय बहुकाल यावत् क्रीडाविलीया तज्जया  मियाना वा च भवति जायते।

सानुमती प्रिय मे [पिन मे । ]

कञ्चुकी अस्मात् प्रभवतो वैमनस्यादुत्सव प्रत्याख्यात ।

उसे पुज्यते । [ जुज्जई ।]

(नेपथ्ये)

एवं एवं भवान्। [ एडु एदु भव । - (कर्ण ) अये इत एवाभिवर्तते देव । स्वकर्मा-

ष्ठताम् ।

उमे तथा [ह]] (इति निष्क्रान्ते ।)

सरल सरलाय राशी दुष्य तस्य पश्चातापस्थिति वजय कञ्चुकी वयति स स राजा इवानी रसिक तनाव र मातिरेकान्नज्ञाप्यवलोकयितु नेता राज्यामात्यादिभिरपि प्रतिदिन राज्यका विज्ञानाय नोपायत रात्रि वनीयोपभागेषु परिण्डने पनि रानीपापति पदा शिष्टतावशेन स्वकीयानपुरका मिनीमा स्तरकालोपित मुतरमपि ददाति तदा अनामीपारण का कुत्ता नामोच्चारणात बहुतायास्तु लज्जामाता जायते ।

टिप्पणी

ऊडपूर्वा-पूनम ऊढा कपूवा मुप्युपैति समान प्रकृतिभि --- प्रकृति का अर्थ माजी और प्रजाजन भी होता है। विगमयति-वि+इस+चिलटी मि 'बोध' इत्यस्य माया दाक्षिण्येन दक्षिणस्य भाव दाक्षिण्यम, दक्षिण नायक का एकमहिला समरागोद क्षिण रचित " अन्त पुरेभ्य यहाँ लक्षणा द्वारा अतपुर का अब त पुरस्थित रानिया है गोगो का जय नाम है, गो न का नाम भूल जाना गोनस्थलन सस्कृत कवियो को बडा प्रिय रहा है अजय कवियों ने भी इसका उल्लेख किया है "स्मरति स्मरमेललगुणैत

गोवस्वलितेषु वचनम् । कु० स० जगद गोम्प सानुमती यह बात मेरे लिए अतिप्रिय है।

की इस मानसिक ग्लानि के कारण महाराज ने उत्सव राक

दिया है।

दोनो यह उचित है।

( नव्यम)

आप इधर से बाइवर से

( काम नगाकर) आह महाराज इधर हो जा रहे है (जाओ) अपना

काम करो।

दोनो बहुत अच्छा (दोना का प्रस्थान )

(तत प्रविशात पश्चात्तापसवेषो राजा  प्रतीहारी ।)

चुकी (राजानमवलोक्य) अहो, राहु रमणीयत्वमा- ताणाम्। एवमुत्सुकोऽपि प्रियदर्शनो देव । तथाहि- राष्टिविशेषमण्डनविधि प्रकोष्ठापित,

विभ्रत्काञ्चनमेकमेव वलय श्वासोपरक्ताघर | जागरणप्रतान्तनयन स्तेजोगुणावात्मन, सस्कारोल्लिखितो महामणिरिव क्षीणोऽपि नालक्ष्यते ||5||

टिप्पणी

राजाकोला के परित्याग का पश्चाताप हो रहा है अतएव नकी यह स्थिति है, यह बात जान कर मुझे असता है वैमनस्यात् विकृत मन न तस्य भाव इत्यर्थे विमनस् यत्र प्रत्यय प्रत्याख्यातप्रति आक्ष+ त्यस्य व्यादेश प्रविश्यापटीक्षेपेण से लेकर यहाँ तक ति नामक विगम काम है "नोजने प्रोक्ता युति ।"

( इसके बाद के अनुरूप वेष धारण किये हुये राजा का विदूषक प्रतीहारों का प्रवेश)

- ( राजा को देखकर) महो, सुदर अति वालो की सभी बस्थाओं मे रमणीयता (रहती है) इस प्रकार (शकुन्तला वियोग के कारण ) विशु महाराज देखने में सुन्दर प्रिय लगते है। क्योंकि

प्रत्याविष्टेति अन्यय-प्रत्यादिष्टविशेषमण्डनविधि वामप्रकोष्ठापितम् एकम् एव नवयम् विभ्रत वापरावर चिन्ताजागरणप्रतान्तनयन सरकारो नि महामणि व क्षीण अपि आत्मन तेजोगुणात् न आलश्यते ।

शब्दार्थ प्रत्यादिष्टविशेषविधिजसने (विरजन्य कृशतामण ब विशेषरूप से रणधारणादि काम बन्द कर दिया है, वाम- कोष्ठापितम्बाई कलाई मे डाले गये, एकमेव काञ्चन बलयम् केवल एक ही ककको वित्धारण किये हुये, श्वासोपरक्ताघर (विरजन्य उग्ण ) बासो से जिसका धरोष्ठ लाल वण पर हो रहा है। पिताजागरणप्रतान्तनयन = कुतलागत) चिन्ता के कारण ( रात भर जागते रहने से जिनके नेत्र त्यस्लान साये हुये हो गये है। सस्कारोल्लिखित महामणि दव (अधिक चमक बने के लिये) खराद पर काटछाट कर घिसे हुये बहुमूल्य मणि के समान / क्षीण पिडुबल होता हुआ भी आत्मन तेजोगुणात् अपनी सहल तेजस्विता के गुण कारण (ग) न आलक्ष्य से दिखाई नहीं पड़ते है। = =

अनुवाद विशेष रूप के अतकरण प्रसाधन का कार्य बन्द कर देने वाले, बाई, लाई मजाले हुये केवल एक ही स्वन कडबा को पहने हुये (कुतला के विरह से उष्ण श्वासो से जिनका अधरोष्ठ लाल पट गया है (और) (शकुत्तसामत) चिन्तावश ( रात भर जागते रहने के कारण जिनकी आने अत्यधिक म्लान एवं अलसाई हुई है (ase मक लाने के जिये) खराद पर घिसे हुये बहुमुल्य मणि के समान दुबले होते हुये भी (आ) अपनी सहज नेजस्विता के गुम के कारण (कृश) नहीं दिलाई पढ़ते है

भाषाय राजा की सर्वावस्वागत रमणीयता का वर्णन करता हुआ कञ्चुकी कहता है कि राजा ने अपन राजोचित विशेष प्रकार के अनकरणधारण एव प्रसाधनात्मक कार्यों को मिल्कुल त्याग दिया है, राजचिह्न के रूप मे जो केवल एक स्वress को ही अपनी कलाई में डाले इतना के विरह के कारण उष्ण निकलते हुये स्वास जिनका रोल पर गया है और म चिन्ता के कारण रात भर जागते रहने से जिनकी बहुत कुछ एकलाई प्रकार यद्यपि के अतिमान एवं दिमनाई पड़ रहे है उनकी यह दुलता, अपने स्वाभाविक तेज की विनता के कारण उनी प्रकार लक्षित नहीं होती जिस प्रकार अधिक चमक लाने के लिये पर काटछाट कर और घिसकर चमकाई गई महामणि कोण होने पर भी अपनी चमक के कारण क्षीण जैसी नहीं जान पड़ती है।

विशेष प्रस्तुत पद मे राजा के विशेषणी में स्वभावोक्ति जसकार और इनके साभिप्राय होने से परिकर अलकार भी है, 'महामगिरिव' मे उपमालकार सहन पावाली रीति, प्रसाद गुण और मालविक्रीवित है।

प्रस्तुत श्लोक मे प्रत्याविष्टत्यादि विशेषण से विपम निवत्त वित्यादिपद से चिन्ता, जागरण से निद्रानाश क्षीण पद से तनुता, नामक काम दबाओ का निर्देश किया गया है, ये कामदशाये दस होती है "जयनप्रीति प्रथम चिन्तासह मस्ततोऽथ सकल्प । निद्रावस्ता विषयनिवृत्तिस्थपनास उन्मादी मूर्च्छा इत्येता स्मरणा दर्शव स्युरित्या चक्षते" अन्यत्र दही को इस प्रकार बतलाया गया है "मन स सकल्पो जागर कृशतारति हीत्यागोन्माद छाता इत्यनड गदशा दश" इनमें ह्रीत्याग उमाद आदि कुछ कामदशाओं का वर्णन गत श्लाको में भी किया गया है। इसमे जगत चिन्ता ग्लानि आदि भाव है किन्तु चुकीगत हप विस्मय जादि भाव है।

संस्कृत व्याख्या प्रत्याविष्टविरहजन्यतया अरया वा निराकृत विशेवस्य मण्डनस्य अलकारधारणस्य प्रसाधानस्य वा विधि कार्य येन स प्रत्याविष्टविशेष- safar arrearer तस्मिन् अति समर्पितम् परिवृत वा-याम प्रकोष्ठापितम् एकम् मुख्य एका वनम् स्वणमपम् वनयम् करकटकम्, विश्रद्दधत् व्यवहारविरुद्धेन वामहस्तकधारणेनास्योन्यादावस्था मुच्यते) स्वारी विरजम्यान स्वारी उपरत पाटलित अधर अधरोष्ठप- vetavarr चिन्तया प्रान्त लागतचिन्तया यज्जागरण तेन प्रकर्षणाने म्लाने नयन यस्य स चिन्ताजागरण प्रतान्तनयन स्वाराष] उल्लिखित उद्धृष्ट सस्कारो

सानुमती (राजान वृष्टवा) स्थाने खलु प्रत्यादेशविमानिताऽप्यस्य कृते शकुन्तला क्लाम्यतीति [ठाणे क्यू पच्चादेविमाणिदा व इमस्स

किद सउन्दला किलम्मदिति।।

राजा - (ध्यानमन्द परिक्रम्य) प्रथम सारङ्काया प्रियया प्रतिबोध्यमानमपि सुप्तम् । अनुशय खायेव तदय सम्प्रति

लिखित = तेजोविशेोपलब्धणापरिदिन अनय क्षोणता गमित महामणि हब बहुमूल्य रत्नमिन क्षीण प्राप्त जमिन स्वकीयस्य तेजोगुणान् = सहजशरीरान्तिप्रभावातून आपत

संस्कृत सरला राजा दुस्सर्वानागमणीयत्व व चुकी प्रतिपद्यपि विरहात्या वाचैव निराकृत मेव वश्या धारयन्नम्ति मनाविरहन यानि मराठा पारियो सतते जन जागरयेनास्य नये पिपराग एवं मोतियावित्यमस्य बहुमूल्य र कुनामा भूत्वा न माय वया आगो स्थात एव प्रभाविज्ञानमात्य महार नस्तुत्य नावबुध्यते सहसा तथैव भासितस्याङ्गस्यापि रा का स्वजाति सत् ना इति भाव

टिप्पणी

पश्चातापसवेष पश्चाताप पश्चात्ताप तेन सदन वर्ष यस्य स । स्वस्थता अवस्था नासु साम्य किमय हमरा मण्डन नातीनानु– माकु० "अहा सवस्यवस्था जनता पम्प मालविकारि मिनम्। रमणीयत्वमरम् अनीयर व उत्सुक इसका महा विनित या विनता है अवाद फक्त की प्राप्ति के लिए मनानेत्यादिष्ट— प्रतिदिन वामको दायें हाथ में पहनना राजा की मादा का कश्यपादिविग्ग्राम व उष्ण भी खाना से उस नही या प्रत्यु यह लाल था जिससे उसका नाम प्रकट होता है, नाकि अर ला ही मामाधायन होता त्यान या बसाय टु विश्रुत। विभू

सानुमती ( राजा का दर) ( द्वारा किय गय ) परित्याग अपमानित भी शत्रुता यदि इनके लिए लिखती है ता यह उचित है।

राजा - (ज्यान म मन वीरे-धीर चारा और मकर)

प्रथममिति अन्वय- प्रथमम नारायण धियया प्रतिदीयमानम अपि गुप्तम उदयप्रति अनुभवसाय विबुद्धम ।

शब्दाय प्रथमम पहले तो प्रामृगनयनी प्रिया शकुन्तला के द्वारा प्रतिबोध्यमानम अपि जगाया जाता हुआ होकर भी सुप्तमथा उदहृतहृयम (मेरा) दृप्त हृदय मम्पनि अब इस समय, अनुगपदु वाय पश्चात्तापक्ष के लिम, विजाग गया है।

अनुवाद पहले तो मृगनयनी प्रिया कुला के द्वारा जगाया जाता हजा होकर भी सो गया था यह मेरा) दुष्ट हृदय अब पश्चात्ताप के के जाग गया है।

मायादुपन मन ही मन कहता है कि वस्तुत यह मेरा हृदय अति नीम दुष्ट क्याकि जब पहने प्रिया कुना न वहा स्वयं आकर इसे जगाया तथ तो यही किन्नु अजब बनी गई है यह पुष्ट हृदय मुझे पश्चा ताप के अनुमान के लिये जाग गया है।

विशेष जगाने पर भी नहीं जागा अपितु सो गया अर्थात् कारण के होने हुये काम नहीं हुआ जत विसयोक्ति नकार अत्र हृदय बिव है पर विवोधन कारण नहीं है जन विभावना जनकार मानायामनुप्तोपमा अनुप्रास राजग निवेद चिता आदि भाव प्रमादगुण वैदर्भी रोगि आर्या जाति छ है ।

संस्कृत व्यायामपूवम सारङ्गस्य मुगम्यते क्षणी पत्त्या सा गया सारनाथ्या हरिणतोचनया, प्रिया तिचा कुला प्रतिवध्यमानम-बहुविध माध्यमानम अपि सुप्तम माह मुपगतम दमन अनहृदयम— अमहृदयम् सम्प्रति अनुरादाय पश्चात्ताप मानुभवाय विबुद्धम- जागरितन ।

संस्कृत सरलाथम तथा प्रत्याख्यानेन पश्चातापमनुगता राजा निन्नपति यद वस्तु मम हृदयम् अथ यती हि यथा प्रथम प्रिया मला स्वागत्येतद्बहुविध शापितवती तदद तमाशापन मन मोहमुपगत परमबुना हृदय प्रियावियोगे जात पश्चाताप मानुभवा नागरि मस्ति टिप्पणी

स्वाने यह उचित अभयानक है, मामनी का अभिप्राय यह है राजा ने इस हार से यह सवया स्पष्ट हो गया है कि यह समये हृदय म कुन से प्रेम करना है और अब उसके परित्याग के कारण घोर पश्चाताप का अनुभ रहा है महृदय एवं अनुपम सौ दयानी राजा के लिए प्रत्याच्या नापमानित होकर भी यदि मतना इसके लिये बिलखती रहती है, तो उसका ऐसा होता या उचित ही है क्लाम्यति कलम नट दुखी होती है। प्रथममकुला के त्याग के समय, सारङ्गाक्षी मार+भनिन् समासान्त पंच प्रत्यय डी [लहून तक दग्ध आदि शब्दो का प्रयोग

सानुमती नम्बीवृशानि तपस्विन्या भागधेयानि [ण ईदिसाणि रमणीय भामहे आाणि । ] विदूषक - (अपवार्य) लषित एवं भूयोऽपि शकुन्तलाव्याधिना । न

चिकित्सितव्यो भविष्यतीति । [सधिदो एषो भूओ वि सन्दला णि आणे कह चिकिच्छिदो भविस्सदि ति ।]

को- (उपगम्य) जयतु जयतु वेव महाराज, प्रत्यवेक्षिता काममध्यास्तां विनोदस्थानानि महाराज ।

राजा- वेत्रवति, मदवचनादमात्यमार्यपिशुन ब्रूहि चिर तमस्माभिरद्य धर्मासनमध्यासितुम् । यत्प्रत्यवेक्षित पौरकार्यमार्येण भारोप्य दीयतामिति ।

प्रतीहारी- यद्देव आज्ञापयति। [जं देवी आणवेदि ।) राजा - वातायन, स्वमपि स्व नियोगमम्य कुरा । चुकी- यदाज्ञापयति देव (इति निष्कान्त ।)

(इति निष्क्रान्ता ।)

निष्ट बच मे होता है, 'अस्य स्यार्थे, दुर्योधनक धिलविताना हि  माप, कुर्यामुपेक्षा हतजीवितेऽस्मिन् रघुवश विजन-वि+ मुखजागा है, होश में आया है।

सानुमती उस बेचारी के भाग्य ही ऐसे हैं (क्या  जाय, पहले तो बात हो उसे भूल गया और जब उसे याद आई तब वह चली गई, यह सब उसके भाग्य का हो परिणाम है)।

विषय- (एक ओर मुंह करके, अपने आप ही शकुन्तला की बीमारी फिर

श्री सताने लगी है, पता नही इस रोग का कैसे इलाज होगा।

की ( पास जाकर ) महाराज की जय हो जय हो महाराज, प्रमदवन के सभी स्थानों का भलीभांति निरीक्षण कर लिया गया है. अब महाराज अपनी इच्छा के अनुसार मनोरञ्जन के स्थानों पर विराजें

राजा देवी, मेरी आज्ञा के अनुसार मन्त्री आप पिसुन से कहना कि आज देर से उठने के कारण धर्मासन पर बैठना हमारे लिए सम्भव नहीं है, अतएव आपने नगर का जो कुछ काम देखा है उसे पत्र पर लिखकर दे दें। प्रतीहारी जी महाराज को बाज्ञा ।

( यह कहकर प्रतीहारी का प्रस्थान )

राजा वातायन, तुम भी अपना काम पूरा करो ।

जो महाराज की आशा ( यह कहकर प्रस्थान ) टिप्पणी ईशान ऐसे अर्थात् प्रतिकूल भाग्य तपस्विन्यादापात्र बेचारी के विदूषक -कृत भवता निर्मक्षिकम्। साम्प्रत शिशिरातपच्छेदरमणी- येsस्मिन् प्रमदवनोद्देश आत्मान रमयिष्यसि। [किद भवदा rिeafvछ । सपद सिसिरातन्छेअरमणीए इमस्सि पमदवणुद्द से अत्ताण रमइस्ससि ।] राजा-वयस्य, रन्नोपनिपातिनोऽनय इति यदुच्यते तदव्यभिचारि

बच । कुल

मुनिसुताप्रणयस्मृतिरोधिना,

मम च मुक्तमिद तमसा मन । मनसिजेन सचे प्रहरिष्यता, धनुषि वृतशरश्च निवेशित ||८||

"तपस्वी चानुकम्पा इत्यमर " तपस्वी तापसे दीने, तपस्वी तापसे मनुकम्पं त्रिषु इति च काश । भागधेयानि नाम और भाग शब्दो से धेय प्रत्यय होकर नामय भागधेय शब्द होते हैं। सधिसकुन्तलारूप वातव्याधि से अभिभूत या जान् हो चुका है, बातव्याधि से ग्रस्त व्यक्ति ऊटपटांग बनने लगता है और कुछ खाता- पीता भी नही अर्थात् नमन करता है, राजा भी रम्प द्वेष्टि आदि के द्वारा सब कुछ छोट चुका है और गोलन भी करता है। चिकित्सितम्यचिकित्सा योग्य होगा किए धातु से व्याधिप्रतीकाराय में 'गुप्सियस से सन् प्रत्यय द्विष चिकित्स सभ्यत् (चिकित्सितव्य, तात्पय यह कि इसका इलाज तो शकुन्तला ही है और वह अथ मिन नही सकती अत अब यह व्याधि कृच्छ साध्य ही नहीं असाध्य ही है। प्रत्ये जिला - प्रति अव + ईश नीति निरीक्षित, पूण सुरक्षित है, किसी चोर शत्रु आदि के भय से सर्वथा रहित प्रभवयनम-प्रमदावनम् प्रमदवनम् । वर्या- सनम् न्यायासन अन अधिशी, इत्यादिना कर्मणि द्वितीया एवमेव विनोदस्थाना नीत्यत्रापि । अमात्यम्मा सह भव इत्यस्यास्य इति त्यप् प्रत्यय मन्त्री राजा के साथ रहता है अतएव यह अमात्य कहा जाता है। आर्यन-पन मी का नाम है आर्य आदरापक है। सम्भावितम् सम् भूगिन् कर्मणि त । यहाँ इसका गोण अर्थ है मुख्याच तो पूज्य या मान्य होता है। पत्रमारोप्य पर चढ़ाकर मर्या free, अभ्यासितुम् अनमय योगे तुमुन्। मव्वचनात् ज त्यलोपे कर्मणि पञ्चमी वातायन कञ्चुकी का नाम है।

(अच्छा हुआ जो आपने सब मक्सियाँ उड़ा दी अर्थात् सबको मे कर यह स्थान एकात बना लिया। अब शोत और गर्मी के अभाव के कारण रमणीक इस प्रमदवन के प्रदेश मे अपना मनोविनोद कीजिये।

राजा मित्र, जो यह कहा जाता है कि विपत्तियाँ छिद्र पाकर या पेरती हैं अर्थात् एक विपत्ति होने पर अन्य अनेक विपत्तियां आ जाती है, यह बात सत्य है ( अर्थात या विपत्तियाँ, न्ध छिद्र, उपनिपातिन घुस पढने वाली- विपत्तियाँ सदा अवसर की ताक में रहती है, जहाँ भी जरा सा भी अवकाश या छिद्र

कमजोरी मिली कि वे अ आ सकती है जन कहा जाता है " बहुत भवन्ति । ")

मुनीतिअन्वय-ससे मुनिसुतारमृतिरोधिना तमता मम इव मन मुक्तम् च प्रहरिष्यता मनसिजेन धनुषि तर निवेशित न

शवाय सर्वत्र मुनिमुताप्रणयस्मृतिरोधिना वपुषी कुलना पर प्रेम स्मरण का रामन वाले तममा मोह या अमान ने मम इद मन पर इस मन को मुक्त कर दिया है। प्रहरिष्यता ( मुख पर प्रहार करने मनसिजेन देव ने धनुष अपने धनुष पर धूतर आममञ्जरी रूपी बाप, निवेशित है।

अनुवाद मित्र मुनिसुता कुता पर (मेरा) प्रेम स्मति को रोकने वाले (य) मेरे मन की मुक्त किया (त्यो हो) (मुझ महार नामदेव पर रामराण चटा लिया।

याचायापनिपातिनोलया इस बात का पता राजा विदूषक न कहता है कि क्याही ना की प्रणयस्मृति को देन सम मो मेरे मन को मुक्त किया था हो कामदेव न तु मुझ पर प्रहार करण के लिये अपने धनुष पर राम का बाण चहा लिया अर्थात् अभी प्रिया को भुला देन वाला मग माह पूर्णतया उत्तर भी न पाया था कि कामदेव भी मरमधान कर या धमका एक और ताप्रिया की वियोग विपत्ति हुई और दूसरी ओर यह बम काम आ पहुँचा दियागी के लिये कहने के कारण बस काम हो होता है, काम मुझ पर प्रहार करन को ताक मे तो बैठा ही था पर उसे उपयुक्त अवसर न मिल पा रहा था अब ज्यो ही मोह दूर हुआ, दिया की स्मृति जाग्रत हुई त्यही उपयुक्त अवसर पाकर कामदेव न भी परसवान कर लिया, अंत ठीक ही है तोपनिपातिनोऽनर्था एक अन्य के साथ दूसरा अनय लगा मला जाता है।

विशेष प्रस्तुत पद्य भिम मे प्रयुक्त काय मोचन और निवेशन क्रियाओ का योगve fचत करते हैं, अत समुपपालकार है, यहा पर मन का मोह रहित होना कारण है और काम का काम है, पर यहाँ का कारण का एक साथ होना दिखलाया गया है. बत अतिशयोक्ति अलकार है अथवा त मूलक समुचय है भोजराज न इस स्मरणाकार या उत्कृष्ट उदाहरण माना है, क्योंकि अदा कारण से भी स्मरणानकार होता है 'अष्टावपि स्मरणे स्मरणा नकार" अनुप्रास निम्ति नामक छन्द है।

संस्कृतग्याच्या मध्ये वयस्य, मुने वण्यस्य सुना पुत्री तस्या व प्रणय प्रेम तस्य स्मृतिम् [स्परम् हि वणोति तेन मुनिगुताप्रणयस्मृतिरोधिना शकुन्तलानिलोपना नमसा ज्ञानेन मोहन था (देव) नम दुष्यन्तस्य दमननित्तम एतद मुनाम चत्यताम न (देव) प्रहरिष्यता

विदूषक - तिष्ठ तावत् । अनेन दण्डकाष्ठेन कन्दर्पवाण नाशयिष्यामि ।

[चिट्ठ दाव इमिणा दण्डक ेण कन्दप्यवाण णासइस्स ।] राजा - ( सस्मितम् ) भवतु । राष्ट ब्रह्मवर्चसम्। सखे, क्योपविष्ट प्रियाया forecastfootषु लतासु दृष्टि विलोभयामि । विदूषक - नन्वासन्नपरिचारिका चतुरिका भवता सन्दिष्टा ।

(इति दण्डकाष्ठमुयम्य जूता र पातयितुमिच्छति ।)

वाण प्रहतु मिच्छता, मनसिजैन कामटेवेन धनुषि स्वशरासने, चूतशररसानमब्जरी निवेशित समारोपित ।

1 निमक्षिकम् — मक्षिकाणामभाव इत्यर्थे अव्ययौभाव । अनावश्यक लोगो से रहित अतएव एकान्त शिशिरा० शिशिरश्च तपश्च तयो छेदेन रमणीये- bus और गर्मी के अभाव के कारण रमणीय, कुछ टीकाकारो ने छेव का अर्थ अवकाश मध्य भाग मान कर शिशिर और ग्रीष्म का मध्यभाग अर्थात् वसन्त अर्थ किया है आत्मानम् अत्र गतिबुद्धीति कमणि द्वितीया पर छिद्र न अर्था अनर्थाविपत्ति या दुख इसी भाव को अन्य सूक्तिया "क्ष प्रहारा निपतन्त्य भीक्ष्णम् पञ्चतन्त्र प्रायो गच्छति यत्र भाग्यहतकस्तत्रैव यान्यापद नीतिशतक, तथा मनुष्यस्य विपत्तिकाले विनय बहुली भवति मृन्छ। अन्यभिचारितो साध्याभाववत्तित्व व्यभिचार यह न्याय का पारिभाषिक शब्द है—व्यभिचार- दोष या अपवाद, अव्यभिचारि अपवादरहित, सवथा दोष रहित "म रूपमित्य व्यभिचारित कुमार रोधिना धातो ताच्छील्ये चिनि । मनसिजेन--- तत्पुरुषे कृतीति सप्तम्या अनु महरिष्यता- शतृ तृतीयक वचन । प्रणय प्रनी । अन्तम्पु

सस्कृत सरलार्थ "रुद्रोपनिपातिनोऽन" इत्युक्तिसपप राजा विदूषक कथयति — देव] शकुन्तलाप्रणयस्मृतिविलोपना मोहेन ममेद मनो मुक्तम् तदैव कामेन मम तु मिच्छता स्वशरासने रसानमज्जरवाण समारोपित । एतेन शायते छिद्र न बहुली भवन्तीति ।

टिप्पणी

विदूषक जरा ठहरिये, (मे) इस काष्ठदण्ड से कामदेव के थाण को नष्ट करता हूँ ( अन्य कन्दर्पव्याधिम् भी पाठ है वहाँ इसका अर्थ है-कामव्याधि को नष्ट करता हूँ।

( यह कहकर दण्ड उठाकर आश्रमञ्जरी को गिराना चाहता है) राजा - ( मुस्कराकर ) बस करो, मैंने तुम्हारा ब्रह्मतेज देख लिया। मित्र । कहाँ बैठकर प्रिया का कुछ अनुकरण करने वाली लताओ पर दृष्टिकोन न्दित करूँ ?

विदूषक- आपने हो तो समीपवर्तिनी दासी चरिका को आदेश दिया था कि

माधवीमण्डप इमां बेला मतिवाहयिष्ये । तत्र मे चित्रफलकगता स्वहस्तलिखिता तत्रभवत्या शकुन्तलाया प्रतिकृतिमानयेति। [णआसण्ण परिमारिआ चदुरिआ भवदा सदिट्ठा। माहवीमण्डवे इम वेल अदिवाहिस्स तहि मे चित्तफल अगद

सहत्य लिहिद तत्तहोदीए सउन्दलाए पडिकिदि आणेहि ति ।] राजा ईच्छा हृदयविनोदनस्थानम् । तत्तमेव मार्गमादेशय ।

विदूषक - इत इतो भवान् । [ इदो इदो भव ।]

(उभौ परिक्रामत । सानुमत्यनुगच्छति ।)

विदूषक - एष मणिशिलापट्टकसनायो माधवीमण्डप उपहाररमणीय- या निःसशय स्वागतेनेव नौ प्रतीच्छति । तत् प्रविश्य निषीदतु भवात् । [एसो मणिसिलापट्ट असणाहो माहवीमण्डवो उवहाररमणिज्जदाए जिसस सामदेव विम णो पहिच्छदि । ता पविसिज शिसोददु भव ।] (उभौ प्रवेश कृत्वोपविष्टी)

मैं माधबोलता मण्डप में इस समय को बिताऊंगा। तुम चित्रफलक पर अपने हाथो से बनाये गये श्रीमती शकुन्तला के चित्र को लेकर बाना । राजा ऐसा मनोरञ्जन का स्थान है, तो उसी माग का निर्देश करो।

विदूषक आप इधर से आइये।

(दोनो चारो ओर घूमते हैं सानुमती अनुगमन करती है)

- यह मणिमय शिलापट्ट से युक्त माधवीलता का मण्डप (पुष्पों के) उपहारों से मनोहर होने के कारण निस्सन्देह मानो स्वागतपूर्वक हम लोगो को आमन्त्रित कर रहा है तो यहाँ प्रवेश करके आप बैठिये ।

(दोनो प्रवेश करके बैठते हैं)

टिप्पणी

कम्यवाणम् जन्यत्र कन्दपव्याधिम् भी पाठ है इसका अर्थ है काम के रोग की, पर इसका अर्थ यहाँ आश्रमक्जरी है, यही प्रसंगानुकूल भी है। ब्रह्मवर्चसम् ब्रह्मवर्च ते 'हस्तिभ्या वचस से समासान्त बच् प्रत्यय विलोमयामि- +++ तद् अन्यत्र विनोदयामि भी पाठ है, दोनो का तात्पय है आनन्दित करना या बहलाना वियोगावस्था मे मन बहलाव के चार साधनो मे से कवि ने यहाँ दो का निर्देश किया है, तत्सदृश वस्तु का देखना और आगे उसका चित्र बनाना । अन्य दो साधन है, स्वप्न मे उसको देखना जिसका भी आगे उल्लेख है और चौथा है उसके द्वारा हुई हुई वस्तु का स्पर्श करना, इसका भी आगे अन्य प्रकार से उल्लेख है। अतिवाहयिष्ये अत्र 'णिचश्चेत्यात्मनेपदम् " प्रतीच्छति-स्वागतपूर्वक बुलाने के अप प्रतिपूर्वक एवं धातु का प्रयोग होता है।

सानुमती लतासचिता प्रक्ष्यामि तावद सख्या प्रकृतिम् । ततोऽस्या भर्ती मुख मनुराग निवेदयिष्यामि । [लदासस्सिदा देक्खिस्स दाव सहीए पडिकिदि । तदो से भत्तणो बहुमुह अणुराज णिवेदइस्स ।]

(इति तथा कृत्वा स्थिता ।)

राजा सबे, सर्वमिदानीं स्मरामि शकुन्तलाया प्रथमवृत्तान्तम् । कथितवानस्मि भवते च स भवान् प्रत्यादेशवेलायां मत्समीपगतो नासीत् । पूर्वमपि न त्वया कदाचित् सकीर्तितं तत्रभवत्या नाम। कच्चिदहमिय विस्मृतवानसि त्वम् ।

विदूषक- -न विस्मरामि । किन्तु सर्वं कथयित्वाऽवसाने पुनस्त्वया परिहासविजल्प एव न भूतायं इत्याख्यातम् । मयाऽपि मृत्पिण्डबुद्धिना तथैव गृहीतम् । अथवा भवितव्यता खलु बलवती । [ण विसुमरामि । किंतु सब्ब कहिल अवसाणे उण तुए परिहासविअप्पओ एसो ण भूदत्यो त्ति आचिक्खिद । मए वि मिपिण्डबुद्धिणा तह एव्व गहीद अह्वा भविदव्वदा क्खु बलवदी ।]

सानुमती एव मेवैतत्-[एव्व णेद ।] राजा - ( ध्यात्वा सखे, त्रायस्व, माम् ।

fages – भो, किमेतत् । अनुपपन्न खल्वीवृश त्वयि । कदापि सद- शोक वक्तव्या न भवन्ति । ननु प्रवातेऽपि निष्कम्पा गिरय। [भो, कि एद । अव क्सु ईदिस तुइ कदा वि सप्पुरिसा सोमवत्तव्या ण होन्ति । ण पवादे वि णिवकम्पा गिरीओ।]

सानुमती - अच्छा तो पहले लता का सहारा लेकर सखी का चित्र देखूंगी। तब ( उसके पति के बहुमुखी प्रेम को उसे बतलाऊँगी। ( यह कहकर वैसा ही करके स्थित हो जाती है)

राजा मित्र, शकुन्तला का सम्पूर्ण प्रथम वृत्तान्त अब मैं स्मरण कर रहा हूँ। मैंने आप से भी कहा था वह आप ( उसके परित्याग के समय मेरे पास नहीं थे। पहले भी तुमने कभी उस माननीया का नाम याद नहीं दिलाया। सम्भवत मेरी ही तरह तुम भूल गये थे।

विश्वकमैं नहीं भूला हूँ, किन्तु सब कुछ कहकर के अन्त में फिर आपने यह कह दिया था कि यह हँसी की ही बात है, सच नहीं है मुझ अतिमन्दबुद्धि वाले ने भी वैसा ही मान लिया था अथवा होनहार प्रबल होती है।

सानुमती यह ऐसी ही बात है। राजा - ( सोचकर ) मित्र मुझे बचाओ।

विदूषक मित्र, यह क्या है? ऐसा आपके विषय में सर्वथा अनुचित है। ear कभी भी मोक मे दूसरो के द्वारा समझाने योग्य नहीं होते (अन्त्यषराजा वयस्य, निराकरणविक्लवाया प्रियाया समवस्थामनुस्मृत्य वरणोमि। साहि हुन

प्रत्यादेशात् स्वजनमनुगन्तु व्यवसिता, स्थिता तिष्ठेत्युच्चैर्वदति गुरुशिष्ये गुरुसमे

पुन दृष्टि बाष्पप्रसरकलुषामपितवती, मयि क्रूरे यत्तत् सविषमिव शल्य वहति माम् ॥

वास्तव्या भी पाठ है वहाँ इसका अशोक के आधार या स्थान नहीं होते ।) आंधी से भी पहाड़ विचलित नही होते है।

टिप्पणी

बहुमुलम् अनेक प्रकार से प्रकट किया गया। कच्चित्प्रश्नसूचक अव्यय । मिट्टी के ठेले के तुल्य मन्द बुद्धि वाला मृपिण्ड इव बुद्धि यस्प 'प्रभवति शुचि विम्वग्रामणि न मृदादय" भवभूति भवितव्यता-भूतम्य+ तू यावसाय की अन्य सूक्तिमा "सब कथा भगवती भवितव्यतेय" मालतीमाधव । नियति केन वायते" यत्पूर्व विधिना लिखित समाजिक अम (हितोपदेश) भवितव्य भवत्येव नारिकेलफलाम्बुवत् अनुपपन्नम् — अनुचित न उपपद् जल्पकथन-परिहासविजल्प- हंसी की बात, भूतार्थसत्य बात । -

राजा मित्र (मेरे द्वारा) परित्याग से विह्वल हुई प्रिया शकुन्तला की उस अवस्था का अनुस्मरण कर मैं बहुत अधिक असहाय या अधीर हो रहा हूँ।

क्योकि वह इत इति अन्वय इत प्रत्यादेशात् स्वजनम् अनुगम् व्यवसिता गुरुसमे गुरुशिष्ये तिष्ठ' इति उच्च वदति (सति) स्थिता वाष्पप्रसरकलुषा दृष्टियत् पुन

कूरे अतिवती तद् सविषम् सत्यम् इव माम् दहित ।

सन्यार्थ इत इस स्थान से प्रत्यादेशातु परित्यक्त होने के कारण, स्वजनम् अनुगन्तुम्=अपने कुटुम्बियों के पीछे जाने के लिये व्यवसिता प्रस्तुत हुई, गुरुसमे गुरुशिष्ये पिता के तुल्य पितृतिय के तिष्ठ इति उच्च यदति सति = (यही) 'उहरो' यह बात उच्च स्वर से कहने पर स्थित एक गई। वाष्पतरकलुषाम् = सुओं के प्रवाह से मलिन, दृष्टिम् दृष्टि को पद जो पुन मंदिरे अतिती = पुन त क्रूर पर डाली थी, वह उसका दृष्टि डालना, सविषम् सत्यम् दव शल्य ( वाणाप्रभाग) के समान, मामु दहनि मुझे जला रहा है।

अनुवाद- इधर से अर्थात् मेरे द्वारा परित्याग के कारण यह शकुन्तला ) अपने कुटुम्बियो के पीछे चलने के लिये प्रस्तुत हुई, (किन्तु पिता के तुल्य पितृशिष्य के उच्चस्वर से यह कहने पर कि 'ठहरो कहाँ जा रही हो (यह) रुक गई और फिर निवश उसने) अधुप्रवाह से मलिन दृष्टि को पुन जो मुझ निदम पर डाला था, वह (उसका दृष्टि डालना) विलेय की भाँति मुझे जला रहा है।

भावार्थ राजा प्रत्याख्यानकालीन शकुन्तला की स्थिति को बतलाता हुआ विदूषक से कहता है, मित्र, मेरे द्वारा परित्याग कर देने पर जब वह अपने कुटुम्बियो के पीछे-पीछे जाने लगी, तब ही कण्वशिष्य ने उससे जोर से कहा कि यही ठहर, कहा जा रही है, गुरुशिष्य को यह बात सुन कर भयभीत होकर वह वहीं खड़ी हो गई, फिर और कुछ उपाय न देखकर अप्रवाह से कलुषित दृष्टि को उसने पुन जो मुझ निदय पर डाला था, वस्तुत उसकी वह विवश दृष्टि मुझे अब भी विले सत्य के समान जला रही है, उस समय की उसकी उस दयनीय एवं विवश स्थिति का दृश्य मुझे अब भी सतप्त कर रहा है।

विशेष प्रस्तुत पथ के 'सवि त्यमय' में श्रीतोपनालकार, दृष्टि विशेष को पुरुष विशेष पर डालने से समालकार हरिणी नामक छन्द है। प्रत्यादेशाद स्वजन मित्यादि कथन से भर्ता राति बावने' के अनुसार राजा का उसे सर्वचा त्याग करना अनुचित तथा लोकद्वय विरोधी काय था, पतिपरित्यक्ता पतिव्रता के लिये स्वजनो की शरण के अतिरिक्त और उपाय ही क्या था, यह योतित किया गया "गुरुसमें पद से शिष्य के वचनो का अनुनीयत्व सूचित किया गया है, पद से राजयत निवद व्यज्जित होता है, वस्तुत गरे का अर्थ यहा वचक है अत अन्तरक्रमित वायव्वनि है, 'वहति' पद से अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य ध्वनि प्रकट होती है, क्योंकि दृष्टि दाहक नहीं हो सकती। वास्तव मे भाव सौन्दर्य रचध्वनि प्रसाद गुण, वैदर्भी रीति पदलालित्य आदि की दृष्टि से करुण विप्रलम्भ का यह सुन्दर श्लोक है।

संस्कृत व्याख्याइव अस्मात् स्थानात् प्रत्यादेशात् निराकरणहेतो, जनम् स्वबन्धुजनम् अनुगन्तुम् अनुसतु व्यवसिता उचुक्ता प्रवृत्ता या गुरुतमे= पितृवत्पूजनीये, गुरुशिष्ये पितृशिष्ये शाङ्ग रखे, "तिष्ठ" इहैव तिष्ठ, अनुगमना- विरम, इति उतारस्वरेण वदति (सति) = भाषमाणे (सति) स्थिता= गमनात् निवृत्ता । वाष्पाणाम् अधूणा प्रसरेण प्रवाहेण कलुषा आदिला मलिना वा दाम् वाष्पप्रसरकलुषाम दृष्टिम्लोचनम् पुन भूयोऽपि पद् मयि फूरे मयि निये दुष्यन्ते, अपितवती पातिती निप्तवती या तद्दृष्ट्यपणम् सविषम्= विषाक्तम्, शल्यम्-वाण इव, माम् दुष्यन्तम्, दहति सन्तापयति ।

संस्कृत सरलाय – प्रत्याख्यानसमये निराशामा निरुपायाया शकुन्तलाया दामनुस्मृत्य सन्तप्तहृदयो दुष्यन्तो विदूषक कथयति वयस्य तत्समये मया निराकृता सिर मे प्रिया नान्यमुपाय पश्यन्ती स्वबन्धुजन मातम्यादिकमनुस प्रवृत्ता पर तदानीमेव तिष्ठे विरमानुगमनाद' इति पितृतुल्यपूजनीवे पितृशिष्ये भाषमाणे सति, पितृतुल्यरूपाङ्ग र वचनानामनुतपनीयत्वात् सा तत्रैव स्थिता, अब "चानाया मरणामिदानी मा मे भर्ता स्वीकुर्यादित्याया सा यदपरिपूरिता दृष्टि मवि निदय निवती सावस्था दिवा दृष्टिरियानी या वाक्यान्तापयति,

सानुमती - अहो, ईदृशी स्वकार्यपरता । अस्य सन्तापेनाह रमे । [अम्महे, ईदिसी स्वकज्जपरदा इमस्स सदावेण अह रमामि ।] fages – भो, अस्ति मे तर्क केनापि तत्रभवत्याकाशचारिणा

नीति [भो, अत्थि मे तक्को, केण वि तत्तहोदी आबासचारिणा णीवे त्ति ।] राजा-क पतिदेवतामम्य परामष्ट्र मुत्सहेत ? मेनका किल सख्यास्ते जन्मप्रतिष्ठेति श्रुतवानस्मि । तत्सहचारिणीभि सखी ते हृतेति मे हृदय- माशङ्कते ।

सानुमतीसमोह खलु विस्मयनीयो न प्रतिबोध । [समोहो क्खु विम्हमणिज्जो ण पडिबोहो ।]

विदूषक - यवमस्ति खलु समागम कालेन तत्र भवत्या । [ जइ एम् अस्थि क्ख समाजमो कालेण तत्तहोदीए ।]

नया परित्यक्ताया स्वजनभत्सितायाश्च तस्या कातरा मधुभिराविता दृष्टि स्मार स्मार ने मनो व्ययते ।

टिप्पणी निराकरण निराकरणेन प्रत्याख्यानेन विकलना व्याकुला तस्या । समस्या-समान अवस्था अर्थ यहीं नहीं है क्योंकि प्रसवानुकूल यह अय सघटित नहीं होता, सम्भवत कवि ने सामान्य अवस्था अथ मे ही यहाँ समवस्था का प्रयोग किया है, अशरण अधीर या दुखी व्यवसिता वि+अब+सो द्यतिस्पती- त्यादिना धातोरोकारस्यात्वम् स्थिता—इसके स्थान पर 'मुह' यह पाठ भी मिलता है, पर यह पाठ मानने पर मकुन्तला की पितृतुल्य शारव के प्रति धृष्टता लक्षित होगी और उसके कथन का अनादर भाव सूचित होगा बत स्थिता पद ही प्रसगानुकूल है, उसे बार-बार नही कहना पड़ा अपितु उसके एक बार डाँटने पर ही वह रुक गई। वदति मतुप्रत्ययान्त सप्तम्यन्त रूप है।

सानुमती अहो, ऐसी (यह मुझे अपने कार्य साधन की तत्परता ( है ) (जिससे कि मैं इसके दुख से आनन्दित हो रही हूँ। विदूषक मेरा अनुमान है कि उस पूज्या शकुन्तला को कोई आकाशचारी

व्यक्ति उठा ले गया है।

रावा उस पतिव्रता को और कौन छूने का साहस कर सकता है, मैंने सुना है कि मेनका तुम्हारी सखी शकुन्तला की जन्मदात्री है, मेरे हृदय को आशका है कि उसकी अर्थात् मेनका की सखियाँ तुम्हारी सखी को ले गई हैं।

सानुमती ( इस राजा को शकुन्तला का) भूल जाना ही आश्चर्य योग्य बात है. (उसका स्मरण करना आश्चर्य की बात नहीं है।

विषयदि ऐसी बात है तो अवश्य ही कालान्तर मे आपका उन श्रीमती के समागम होगा।

राजा कथमिव ?

विदूषक न खलु मातापितरौ भतृ वियोगदु खिता दुहितर चिरं प्रष्टु पारगत । [ण व मादापिदरा भत विओोअदुक्खि दुहिवर चिर देक्खिदु

पारेन्ति ।]

ननु माया नु मतिभ्रमो नु

क्लिष्ट न तावत्फलमेव पुण्यम् ।

असत्रिवृत्यै तवतीतमेते

मनोरथा नाम तटप्रपाता ॥ १० ॥

टिप्पणी

स्वकायरता स्वस्य काम स्वकायम् तत् पर प्रधान यया सा स्वकायपरा तस्याभावइत्यर्थे तल टापू सानुमती को राजा की मसकुन्तला के प्रति मनोदशा को जानने के लिए भेजा गया था, वह समझती थी कि राजा को शकुन्तला वियोग से जितना अधिक दुख होगा उतनी ही जल्दी इसका उससे समागम हो सकेगा अतएव उसे दुखी देखकर अपने स्वाथ ही सिद्धि जानकर वह प्रसन्न हो रही थी पतिदेवतान् - पति देवता यस्यास्ताम् पतिव्रता पतिव्रता में सहज तेज होता है उसे कोई दुर्भावना से छू नहीं सकता, राजा को उसके पातिव्रत्य का विश्वास था परामष्टं मृ- छूने के लिए जन्मप्रतिष्ठा जनदात्री प्रतिस्था-अ, (अ) प्रतिष्ठा, जन्मन प्रतिष्ठा जन्मप्रतिष्ठा कालेन यथा समय, अत्रापवर्गे तृतीया मातापितरौ माता पिता चेति इन्द्रे "आनङ ऋतो इन्द्रे' इत्यान

राजा- यह कैसे ? विश्र्षक वस्तुत माता-पिता पतिवियोग से दुखित पुत्री को अधिक समय

तक नहीं देख सकते ।

राजा - मित्र,

स्वप्न इति--अन्वय-तद् स्वप्न नु माया क्लिष्ट पुष्यम् . असनिवृत्यै अतीतम् एते मनोरमा नाम तटप्रपाता । मतिभ्रम नु.

राज्यात शकुन्तता से मिलन रूप वस्तु स्वप्त क्या स्वप्त था, माया नुक्या ऐन्द्रजालिक माया थी, मतिभ्रम = (अथवा ) नया यह मेरा बुद्धिभ्रम था, तावत्फलमेव क्लिष्ट पुष्पम् तु (अथवा ) क्या वह उतने ही फल वाला ( मेरा) अत्यल्प पुष्प था, अनित्ये अतीतम् वह फिर कभी न लौटने के लिए ही चला गया है। मनोरथा नाम (इसके बाद ये मेरे मनोरथ, तटप्रपातावट प्रपात के समान हैं।

अनुवाद वह शकुन्तला रूपी वस्तु, क्या कोई निद्रित अवस्था मे अनुभूत वस्तु अर्थात् स्वप्न थी, जथवा नया यह कोई ऐवजातिक माया थी, अथवा क्या यह मेरा बुद्धिभ्रम मात्र या अथवा क्या, (जितना जो कुछ उससे सम्भाषण आदि हो सका) उतने ही फल वाला मेरा वह अत्यल्प पुण्य था (जो भी हो किन्तु अब वह फिर कभी लौटने के लिए चला गया है (इसके बाद अब ये मेरे मनोरथ तट प्रपात के समान

भावार्थ- जगूठी मिलने के बाद जब राजा को शकुन्तला के विषय मे पूर्व- घटित सभी बातो का स्मरण हो जाता है तब वह उसके मिलन के विषय मे स्वभावत अनेक तर्क-वित करता है, कवि ने प्रस्तुत श्लोक मे उसके चार विकल्पो का निर्देश किया है वह कम अपने एक-एक विकल्प को काट कर दूसरा विकल्प प्रस्तुत करता जाता है और अन्त मे कह देता है कि अब पुन कभी न सोटगी प्रथम विकल्प में वह कहता है कि क्या यह शकुन्तला रूपी वस्तु अथवा वह मेरा शकुन्तला से मिलना और सुखानुभव करना, स्वप्न या अथवा कोई निद्रितावस्था मे अनुभूत वस्तुमात्र थी पर ऐसा नहीं था क्या मै उस समय सोया हुआ नहीं या यदि स्वप्न होता तब तो जागृत अवस्था में उसका अनुभव नहीं होना चाहिए था पर अनुभव तो हो रहा है अत स्वप्न नही हो सकता तो (२) क्या यह कोई ऐन्द्रजालिक माया यो ? “मन्त्रन्ना स्यामसत प्रकटन माया) मन्त्र तन्त्रादिक से असत् भी वस्तु को सत् सा दिखा देना हो माया है परन्तु उसका कोई वास्तविक स्वरूप नहीं होता परन्तु शकुन्तला के विषय मे वो यह माया नहीं थी, क्योंकि शकुन्तला का तो वास्तविक सत्स्वरूप था उसे तो मैंने साक्षात् देला था, मायिक वस्तु क्षणिक होती है, पर वह क्षणिक नहीं थी अत वह माया नही हो सकती । (३) तो क्या वह मेरा मतिभ्रम मात्र था, अर्थात् मैने अन्य किसी के स्थान मे शकुन्तला को समझ लिया था वह वस्तुत मकुन्तला नहीं थी, किन्तु ऐसा भी नहीं हो सकता क्योंकि भ्रम से उत्पन्न वस्तु से व्यवहार नहीं किया जा सकता पर मैने कुन्तला से बात लापादि व्यवहार भी किया था जन यह मतिभ्रम भी नहीं हो सकता । (४) तो क्या यह जितना भी उससे सम्भाषण आदि हो सका उतना ही फ्ल वाला मेरा अत्यल्प पुण्य था, और अब वह अत्यल्प पुण्य समाप्त हो चुका है, अतएव जब यह चली गई है। अर्थात् भव यह पुन कभी लौटकर न आयेगी जितना मेरा पुण्य था उतना उसका सम्पर्क मुझे मिल गया अतएव अब वह सदा के लिए चली गई है। आने व पिक से कहता है कि मित्र उसके चले जाने के बाद जो तुम्हारे द्वारा बतलाये गये ये मनोरथ है कि पतिवियुक्त कन्या को माता-पिता बहुत समय तक नही देख सकते बत आपका उससे अवश्य समागम होगा, इसके अतिरिक्त अन्य मनोरम भी जिनकी मैं स्वयं कभी कभी कल्पना किया करता हूँ, इस स्थिति मे अब में सब मनोरथ वस्तुत (५) तट प्रपात के समान ही है, इनसे कोई भी लाभ नहीं है, अर्थात् जैसे ना के समय में प्रबल जन प्रवाह के कारण नदी के किनारे एक-एक करके अहमहमि साथ गिरते जाते है एक गिरता है, दूसरा सामने आता है, उसके गिरने पर सोमण, और फिर बीना इत्यादि और इस प्रकार वे बाड़ी ही देर म सब गिर जात है ठीक इसी प्रकार सब मेरे मनारथ भी एक-एक करक उत्पन्न विदूषक - मैत्रम् । नन्वगुलीयकमेव निदर्शनमवश्यभाव्यचिन्तनीय समागमो भवतीति । मा एब्व ण अगुलोअन एव्व निदसण अवस्सभावी अचिन्तणिज्जो समाजमो होदि ति ।।

होते और विलीन होते जाते है अर्थात् इनका कोई अस्तित्व नही है तात्पय यह कि तुम्हारी ये सान्त्वनाये तथा उसके विषय में मेरी विविध आशायें, सब स्पथ है, अब वह पुन मिलने वाली नहीं है।

विशेष प्रस्तुत पद के चारो ही "तु" सन्देहासकार के ओतक है, लोक की प्रथम दो पक्तिमा असनिवृत्य मे कारण है अत काव्यलिङ्ग अलकार है। अन्यत्र "मनोरथानामप्रपाता" भी पाठ तथा प्रपात शब्द प्राय समानाथ वाची है अत यहाँ पुनरुक्त वदाभासालकार भी हो सकता है, "प्रपातस्त्वतटो भृगु " कोश, पर यह क्लिष्ट कल्पना है, वस्तुत 'नाम' यहाँ सम्भावना सूचक मात्र है। "यचैव से लेकर यहा तक सिद्धों के वचनों के तुल्य भावी मटना का संकेत मिलने से अम सन्धि का यह प्ररोचना नामक अंग है "सिद्धामन्त्रयतो भाविदर्शिका स्यात् प्ररोचना" । और समय होने के कारण समय नामक नाटकीय लक्षण भी हे "साततत्त्वस्य वाक्ये स्पाद मदनिश्चय "छेकानुप्रास नृत्यनुप्रास प्रसाद गुण, वैदर्भी रीति, उपजाति नामक छन्द है ।

संस्कृत व्याख्या तत् शकुन्तलासम्मिलनरूप वस्तु स्वप्नोतु किमिति मया स्वप्नेऽवलोकित वस्तु पर स्वप्नश्चेद जाग्रदवस्थाया नानुभूयेत, अत माया मु-किमिति ऐन्द्रजालिक प्रकटिता मिध्यापटना, पर यदि माया स्याततस्तदधिष्ठान न प्रतीत स्थावत मतिभ्रमो विमिति बुद्धिविपय अन्यस्थाने शकुन्तलाभ्रम इत्यच स्यादेव यदि व्यवहारायोग्यता स्थादत तावत्फलमेव क्लिष्ट पुण्य नु ताव देव फल यस्य तत् तावत्फलम् यावत् सम्भाषणदशनादिजनित स्तया सह व्यवहार तदेव फल यस्य तदित्य अत एवं क्लिष्टम् अत्यल्प पुष्प विम् असन्निवृत्यै= अपुनरागमनाय अतीतम् गतम् एतेइ मनोरथा ममाभिलाषा नाम प्रपात तटस्य तीरस्य प्रपात पतनम इव प्रपात वषान्ते पाता सति

सन्कृत सरलार्थ अडगुलीयकदजातस्मृति दुष्यन्त शकुन्तलाविषये अनेकान् विकल्पात् विधते तच्छकुतलालक्षण वस्तु तथा सह पूरकृत सम्भाषणादिकम्वा स्वप्न जानकल्पिता मिष्याघटना तु बुद्धिविषयो नु तायद कालमाभोग्यम अत्यल्प सौभाग्य तु तदिदानी मपुनरागमनाय व्यतीतम् इमे मनोरथा नाम तट प्रपाता एव सन्ति।

असन्नित्य-सम निवृत्मावे क्तिन् सत्रिवृत्ति न सन्निवृत्ति अत्र तादय चतुर्थी, प्रपाता प्रपतन्ति एम्य | पत्त्+प

विदूषक नहीं, ऐसा नहीं पस्तुत यह अंगूठी हो इस बात का प्रमाण है कि अवश्यम्भावी समागम अचानक ही होता है या जो प्राप्ति अवश्य ही छान को होती राजा - (अङ्गुलीयक विलोक्य) अये, इद तावद सुलभस्यानन शि शोचनीयम् ।

तब सुचरितमङ्गुलीय नून प्रतनु ममेव विभाव्यते फलेन ।

अरुणनखमनोहरासु तस्या- च्युतमसि लब्धपद यवङ्गुलीषु ॥ ११॥

है वह वैवगति से अपने आप ही होती है उसके विषय में पहले से भले ही कोई न सोच सके और इसका प्रमाण यह अंगूठी ही है।

राजा - ( अंगूठी को देखकर) ओह, दुर्लभ स्थान से गिर जाने वाली यह अंगूठी तो शोचनीय है (शकुन्तला की अंगुलि रूपी उच्च एव दुलभ पद को प्राप्त करके भी यदि यह उसे छोड़कर गिर पड़ी है तो यह अवश्य प्रशोचनीय है, क्योंकि अब इसे वह स्थान कभी न मिल सकेगा ) ।

सवेति-अन्वय हे अडगुलीय, तव सुचरितम् मम इब नूनम् प्रतनु ( इति ) फलेन विभाव्यते । यद् अरुणनसमनोहरा तस्या अडगुलीषु लब्धपदम् (अपि) च्युतम् असि ।

के समान भावार्थ राजा अंगूठी से कहता है कि तेरा भी पुण्य मेरे पुण्य स्तुत अत्यल्प हो या जैसा कि तेरे द्वारा अनुभूत फल से ज्ञात होता है, फल के अत्यल्प होने के हो कारण तू शकुन्तला की सुन्दर अंगुलियों मे पहुँच कर भी वहाँ से नीचे गिर पड़ी हो, जब तक तेरा पुष्प रहा तब तक तो तू उसकी अंगुली में बनी रही पर ज्यो ही पुण्य समाप्त हुआ तू मीचे गिर गई, पुण्य से स्वग प्राप्त कर भी लोग "क्षीणे पुष्ये मत्यलोक विशन्ति" अतएव तु शोचनीय है।

शब्दार्थ अडगुलीय हे अंगूठी, तब सुचरितम् तेरा सुकृत या पुण्य मम इव मेरे ही तरह, नूनम् अवश्य ही, प्रतनु अत्यल्प (है) 'यह' फलेन विभाव्यते= यह बात तेरे द्वारा अनुभूत फल से ज्ञात होती है। जो कि, (तू) अरुणनल- मनोहरासु तस्या जड गुलीषलास नखो से मनोहर, उसकी जद गुलियो मे लब्धपदम् == स्थान प्राप्त करके (भी) च्युतम् असि गिर गई हो।

अनुवाद है अंगूठी, तेरा पुष्प मेरी ही तरह अवश्य ही अत्यल्प है (यह तेरे द्वारा अनुभूत) फल से ज्ञात होता है जो कि तू लाल नसों से मनोहर उस सकुन्तला की अलियो मे स्थान पाकर भी ( वहाँ से) गिर पडी हो।

विशेष प्रस्तुत पथ मे अल्प फल से अल्प पुण्य का अनुमान होने से अनुमाना- लकार, अल्प पुष्प का कारण फल है अत काव्यलिङ्ग अलकार, अंगूठी के नीचे गिरने में क्षीणपुण्य जन ने अध पतन का आरोप किया गया है, अत समासोक्ति अलकार है, ममेव मे उपमानकार है, अनुप्रास पुष्पिताया नामक छन्द है।

सानुमती - यद्यन्यहस्तगत भवेत् सत्यमेव शोचनीयं भवेत्। [जद अष्णहृत्यगद भवे सच्च एव्व सोबणिज्ज भवे ।] विदूषक भी इस नाममुद्रा केनोबुद्घातेन तत्रभवत्या हस्ताभ्याश

संस्कृत व्याख्या हे अडगुलीय, तब स्ववीयम् सुचरितम् पुण्यम् मम दुष्यन्तस्य इव नूनम् —अवश्यमेव, प्रतनु अत्यल्पम् (अस्तीति) फलेन शकुन्तला- ड. गुलिवियोगरूपेण त्वयानुभूतेन परिणामेन विभाव्यते ज्ञायते । यत् यस्मात् कारणात् (त्वम्) अरु रक्तवर्णे न मनोहरा मनोरमा तासु अरुणनखमनोहरासु तस्या शकुन्तलाया, अडगुलीषु लब्ध प्राप्त पद स्थान येन तत्पदम् (सपि) युतम् - निपतितम् असि ।

संस्कृत सरलार्थ स्वकीय मह गुलीयक सम्बोधयन् राजा कथयति अड. गु- लीय, तवापि पुष्प मम पुण्यमिव अवश्यमेव अत्यल्प मस्ति इति त्वयानुगतफलेन स्पष्ट प्रतीयते । अल्पपुण्यत्वादेव स्वकुन्तलाया आरक्त वर्णे नये सुशोभितालु अडगुलीयु स्थान लम्वापि तत निपतितमसि ।

टिप्पणी

विमानम् इसका सामान्य अर्थ उदाहरण होता है, पर यहाँ प्रसगत इसका अथ प्रमाण है अर्थात् दैवगतिवश अवश्यम्भावी काम अचिन्तनीय रूप से अचानक ही हो जाता है, जैसे इस अंगूठी की प्राप्ति आपको अचिन्त्य रूप से हुई है। इसी प्रकार शकुन्तला का समागम भी अचानक ही होगा निर्दिश्यते अनेनेति निदर्शनम् - नि+ दृश् करणे - ल्युट् । अवश्यम्भवतीति अवश्यम्भावी - अवश्यम्भू "आवश्यका मध्ययो" इति आवश्यकार्थेऽत्र णिनि । समागम सम् + थागम् अप्-मिलना । अस्थानशि - असुलभ यत् स्थान तस्मात् प्रश्यत इति ताच्छील्ये पिनि असुलभम् + सु + सम् + सत् प्रतनु वस्तुत पुष्य अतीन्द्रिय पदार्थ होता है अतएव उसका न्यूनाधिक होना उसके फल से ही जाना जा सकता है। अगलीवु इसमे बहुवचन का प्रयोग यह बतलाता है कि शकुन्तला अंगूठी को कौतुकवत भिन्न-भिन्न अंगुलियो में पहना करती थी, अथवा अंगुलियों के पतले होने के कारण वह गिरने के डर से बार- बार भिन्न-भिन्न अँगुलियो मे पहनती रहती होगी, अथवा विरहसतावण मुकुलीकृत पाँचो ही अँगुलियों मे एक साथ पहनती होगी। अक्षण नसो का लाल होना सौन्दय का तथा सौभाग्य का भी द्योतक होता है। मनोहर से तात्पय सामुद्रिक शास्त मे मति "नातिस्वा नातिदीर्घा' आदि पद में निर्दिष्ट अंगुली के लक्षण से समन्वित होना है।

सानुमती यदि (यह ) किसी अन्य के हाथ पड जाती तो अवश्य शोचनीय

होती।

विदूषक मित्र, आपने यह नामाङ्कित अंगूठी किस प्रसव से उसके हाथ में पहुँचाई थी प्रापिता ? [भो, इअ णाममुद्रा केण उग्वादेण तत्तहोदीए हत्यान्भास पाविदा ]

सानुमती ममापि कौतूहलेनाकारित एथ [ मम वि कोहण

आभारदो एसो ।] राजा अयताम्। स्वनगराप प्रस्थित मा प्रिया सवाव्यमाह कियच्चि रेणार्यपुत्र प्रतिपति दास्पतीति ।

विदूषकततस्तत [तदो तदो २]

राजा - पश्चादिमा मुद्रा तदडगुली निवेशयता मया प्रत्यभिहिता- एकंकमत्र दिवसे दिवसे मदीय नामाक्षर गणय गच्छति यावदन्तम् । तावत् प्रिये मदवरोधगृहप्रवेश नेता जनस्तव समीपमुपष्यतीति ॥ १२ ॥

तच्च दारुणात्मना मया मोहान्नानुष्ठितम् ।

सानुमती मरी ही कुतूहलता से यह भी प्रेरित हुआ हे (भयात् मुझे भी यही

बात जानने की उत्सुकता हो रही थी, इसने भी यही बात पूंछी है)

राजा सुनिये अपने नगर के लिये प्रस्थान करते हुये मुझसे प्रिया शकुन्तला ने आँखों मे आसू भरकर कहा था 'आयपुत्र आप कितने दिनो में मुझे अपना समाचार देगे ।

विदूषक-तब फिर क्या हुआ राजा - इसके बाद इस अंगूठी को उसके हाथ मे पहनाते हुये मैंने उससे

कहा था--

एककमिति अन्यप्रिये, अत्र दिवसे दिवसे एकम् मदीय नामाक्षरम् गणय यावत् अन्त गच्छसि तावत् मदवरी गृहप्रवेश नेता जन तब समीपम् उपैष्यति इति । शब्दार्थ हे प्रिये शकुतले, अब इस अंगूठी पर दिवसे दिवसे प्रत्येक

दिन, एकैकम् = एक एक, मदीय नामाक्षरम् मेरे नाम के अक्षर को, गणय गिनना, यावत् अन्त गच्छसि जब तक तुम (उन अक्षरों की समाप्ति तक पहुंचोगी, तावत् तब तक मदवरोधगृह प्रवेश नेता जन मेरे अन्तपुर मे प्रवेश के लिये से जाने वाला व्यक्ति, तर समीपम् उपैष्यति इति तुम्हारे पास पहुँच जायेगा ।

अनुबाद - हे प्रिये कुले, इस अंगूठी पर प्रत्येक दिन एक-एक मेरे नाम के अक्षर को गिनना, जब तक (तुम उन अक्षरो को ) समाप्ति तक पहुँचोगी, तब तक मेरे अन्तपुर मे प्रवेश के लिये ले जाने वाला व्यक्ति तुम्हारे पास पहुँच जायेगा ।

भावार्थ-विदूषक द्वारा उत्सुकतापूर्वक यह पूछे जाने पर कि आपने किस प्रसंग से यह अंगूठो उसके हाथ तक पहुंचाई मौ, राजा कहता है कि जब मेने अपने नगर के लिये प्रस्थान किया तभी प्रिया ने आखो मे आसू भरकर मुशरा पूँछा था

सानुमतो रमणीय सत्ववधिविधिना विसवादित [ रमणीओ न वही विहिणा विसवादिदो ।]

कि आप कब तक अपना समाचार देंगे मैंने इसका उत्तर देते हुये उसकी अंगुली मे इस अंगूठी की पहनाते हुये कहा था कि इस अंगूठी में प्रतिदिन मेरे नाम के एक-एक अक्षर को गिनते रहना, जब तक तुम इन अक्षरों के अन्त तक पहुँच तब तक तुम्हे मेरे अंतपुर में पहुंचाने वाला व्यक्ति तुम्हारे पास आ जायेगा ।

विशेष प्रस्तुत पचने स्पष्ट पाच दिन न कहकर जो अप्रत्यक्ष रूप से नामा क्षर गणना को बताया गया है अत पर्याक्ति अलकार है "क्त पद या मन्यमेवाभिधीयते" अर्थात् सम्याय को ही वचन दिनमा से कहा जाय। किन्ही आभार्थी ने यहाँ कम्पनि अलकार भी माना है। वृत्ति अनुप्रय गुण, रीति, वसन्ततिलका छन्द है।

व्याख्या प्रियेकस्मिन्गुलीनिसेदिवसे प्रतिदिनम् एकैकम् एकम् एकम् मदीयम्मामकम् नामाक्षरम् नाम्नोऽक्षरम् 'दुष्यन्त' इति यचापि पादम् अक्षरगण- गाया समाप्ति प्राप्नोषि तावत्कान चतुभि पञ्चभियां दिरित्यय । मधगृहप्रवेश नेता जनमम दुष्यन्ास्य अवरोध बन्त पूरे प्रवेशम प्रवेशनम मदवरोधगृहप्रवेशम, नेता प्रापयिता जनत समीपम उपैष्यतीति तवकाश मागमिष्यतीति ।

सरलार्थ प्राधानुरोध सवास्पञ्च पृष्टे दुष्यतीप्रिया प्रति तदेव स इदानी विद्रूपक कथयतिवियेगुलीयकेऽस्मिन् मुद्रितानि मदीनामा क्षण एक प्रतिदिन गणय यावदारसमाप्ति प्राप्तोषि देवपुरप्रवेश समीपमुपागमयति ।

टिप्प

शोचनीय शोक की बात होती उद्घातेन प्रसंग से अथवा किस प्रकरण में कार आकृति प्रेरित हुआ है स बात को जानने के लिए मेरे हृदय में हुई भी नही बात इसने भी छी है। एकैकम् नाप्सा, नित्यवीप्सयोरिति द्वित्वम् अपि तु स्वधामा एक भवत इति वक्तव्यमिति एकस्य द्वित्वम् एवं एक मोहित सुपो सत्य दिवसे दिवसे नित्यवन्समोरिति वीप्सा द्वित्वम् गच्छसि अत्र यावत्पुरानिपात- योरिति भविष्यदल मदवरोधवेशन अवरोध प्रवेशम् अवस्य घात करने प्रवेश 'गुणकर्माणि यते इति द्वितीया ।

तच्चेति — और वह काय हृदय ने अज्ञानवश नहीं किया। सानुमती वस्तुत बहुत सुन्दर अवधि (भी, किन्तु भाग्य विवाह दी।

कम पीवरकल्पितस्य रोहितमत्स्य स्योदराभ्यन्तर आसीत् [हीलप्स लोहिम उपलम्भवले आणि १] राजा शचीती वन्दमानाया सख्यास्ते हस्ताद् गङ्गालसि परिभ्रष्टम् ।

विदूषक युज्यते। जुज्जइ । ]

सानुमती अत एव तपस्विन्या शकुन्तलाया अधर्मभीरोरस्य राजय परिणये सन्देह आसीत् । अयवेदृशोऽनुवोऽभिज्ञानमपेक्षते । कथमिवंत 7 [अयो एब्ब बरिसीए सन्दलाए अधम्मभीरुणो इमस्स राएसिणो परिणए सदेहो आसि अहवा ईदिसो अणुरानो अहिष्णाण अक्खदि। कह ि एव ?]

राजा-उपासपये तावदिवलीयकम्।

(आत्मगतम्) गृहीतोऽनेन पत्या उन्मत्तानाम् [गहीदो पेण पन्था उम्मत्तआण ।।

राजा - (अद्गुलीयक विलोक्य) मुनिके।

कप तु त धुरकोमलाङ्गुलि

कर विहायसि निमग्नमम्भसि

अथवा-

अचेतन नाम गुण न लक्षये-

मयैव कस्मादवधीरिता प्रिया ॥ १३॥

विदूषक— धीवर द्वारा काटी गई रोहित मछली के पेट के अन्दर यह पहुँची।

ना करती हुई तुम्हारी के हाथ की धारा में गिर पडी थी।

विदूषक यह ठीक है।

सानुमती इसीलिए (एस) अधर्म से डरने पनि राजर्षि को उस बेचारी कुता के साथ विवाह के विषय मे सन्देह हो गया था। अमवा इस प्रकार का प्रेम अभिज्ञान (विवाह परिचायक चिह्न) की अपेक्षा करता है। यह कहाँ तक ठीक है। राजा अच्छा तो अब में इस अंगूठी को उनहना बूगा ।

विषक (मन मे ) अब इन्होंने पागलो का रास्ता अपनाया।

राजा (अँगूठी को देखकर) हे मुद्रिके रूपमिति - अन्वयवत्सुरकोमा गुलित कर विहाय कथम् अि निमन्नम् असि वा अम् नाम गुणम् न लक्षयेत् मया एवं कस्मात् त्रिया धीरिता ।

शब्दार्थ-दरकोमलाङ लिम् सुन्दर एवं कोमलयवत उस, करम हाथ को विहाय छोडकर (तुम) कैसे अम्मति जत में, निमम असिब गई थी अथवा अचेतन नाम ही अचेतन वस्तु मुन लक्षयेद (किसी वस्तु विशेष के गुणो को न देखे, मया एवं करमात् प्रिया - रिता ही कैसे प्रिया कुत्ता का तिरस्कार कर दिया।

अनुवाद-सुन्दर एवं कोमल अंगुलियों वाले उस हाथ को छोडकर (तुम) कैसे जल से दूब गई थी। अथवा अमेन वस्तु भले ही (किसी वस्तुविशेष के पी की न देखें (किन्तु मैंने ही प्रिया शकुन्तला का कैसे तिरस्कार किया था।

भावार्थ अपनी अंगूठी को उलाहना देते हुये राजा कहना है कि है मुि सुन्दर और कोमल लियो वाले जिया कुन्तला के हाथ से छूटकर जन पी पी, इसके बाद वह स्वयं सोचता है कि इस अंगूठी का क्या दोष है, क्योंकि यह तो वस्तु है, अचेतन पदाथ किसी के गुणों की ओर ध्यान नहीं देता, पर मैं तो चेतन हूँ तो फिर मैन होला के जादि गुणी की ओर नही दिया और उसका परित्याग कर दिया अत बस्तु दोष तो मेरा है, इसका नहीं।

विशेष प्रस्तुत पद्य के तृतीय चरण मे सामान्य से विशेष का समयन होने से यार तुम चरण मे अगुलीयक की अपेक्षा अपना अधिe aur स्वीकार किया गया है वस्तु से व्यतिरेकालकार ध्वनि है। अवधीरणा के कारण के भाव मे भी अवधीरण कार्य की उत्पत्ति होने से विभावनालकार है। पूर्वाधमे ती पर चेतन व्यक्ति के व्यवहार का समारोपण कर उसके जल में डूबने का वर्णन किया गया है, अत समासोक्तिकार है। मृत्यनुप्रासत्यनुप्रास प्रसाद गुण, वैदर्भी रीति वशस्थ नामक छन्द है जो तु यमस्य मुदीरित जरा"

संस्कृत व्याख्या बनपुरा मोजता सुन्दरा वा कोमला मृदव अहमुलय यस्मिन् तम् कम्पुरकोमातम करम् शकुन्तलाया हस्तम् विहाय, परित्यज्य कय केन कारमेन, अम्मसिजले निमन्तम् अलि नितराम् यत्त अथवा अचेतनम्तनाग्रन्ययस्तु गुणम् सौन्दयादिक प्रेमादिकम्वा वस्तुगत वैशिष्ट्यम् नाम सम्भायत एतदन दुपारवेद (किन्तु) गया-सचेतनेन दुष्यन्तेन एवं कस्मादकेन कारणेन प्रिया- हृदयस्वभूताला धरिता तिरस्कृता ।

सस्कृत सरलार्थ स्वकीया मुद्रिका सम्बोधन राजा पयति-मुद्रिकेव कान्तायामाया सुन्दर कोमल कर परित्यज्य केन कारणेन जले निमग्न मसि । क्षणान्तरमेव स पुनचिन्तयति अथवा अचेतन वस्तु यद्यन्द वस्तुगत वैशिष्ट्य न पश्येत् तस्य वस्तुनो दोष, सचेतनेनापि मया केन कारणेन प्रिया तिरस्कृता ? मतोऽचेतनस्यापुलीयकस्य नाम कोऽपि दोष दोषस्तुतस्य वेति ।

(आत्मगतम्) रूथ बुभुक्षया खादितव्योऽस्मि । बुभुक्साए सादिदव्यो हि ।]

राजा प्रिये, अकारणपरित्यागानुशपतप्तहृदयस्तावदनुकम्प्यतामय जनननि । (प्रविश्यापटीक्षेपेण चित्रफलक हस्ता चतुरिका चित्रगता भट्टिनी। [इस चित्तगदा भट्टिणी ।] ( इति चित्रफलक दर्शयति ।)

( विलोक्य) साघु वयस्य मधुरावस्थान दर्शनीयो भावानु प्रवेश सलतीव मे दृष्टितोतप्रदेशेषु [साहू वअस्म महरावत्यागद-क्लदि दिन में दिट्ठी जिप्पवेसे ।]

सानुमती अहो, एषा राज निपुणता जाने सख्यप्रतो में वर्तत इति । [ अम्मी एसा राएक्षिणो णिउदा जाने सही अग्गदो मे वट्टदि ति ।]

विवादित व समवद् मित्र विगाब दिया। रमणीय कथायोगो से विवादित (स्थानमा० ) उम्मतानाम् उन्माद दशपत्रो का कामदाओं में से आठवी दशा उन्माद है, "अगेन सौष्ठव ताप पाण्डुता मताि अति स्यादनासम्ममा मृतिश्येति कमाया दम हमरा " सा० ० राजा द्वारा अंगूठी की यह उपालम्भ देना स्वाभाविक ही है क्योंकि समाज को अचेतन चेतन का मान नहीं रहता हि प्रकृति कृपणाश्चेतना चेतनेषु" मेष । बन्धुर इसका अम नतोषत और सुन्दर भी होता है "बघुर तानतम् मुन्दर रम्यम्-कोर

विदूषक ( मन ) या बात है मानो भूग मुझे खाये डाल रही हैं। राजा प्रिये बिना कारण परिया से उत्पन्न) सप्त

हृदयमान इस जन (दुष्यन्त) की पुन दशन देकर अनुगृहीत करो।

( को हाथ मे लिये हुये पर्दा को हटाकर प्रवेश करके)

रिका (यह चित्रलिखित महारानी है)

(यह कहकर चित्रफलक दिखलाती है)

विषक (देशकर) मित्र बहुत सुन्दर (इसमे आदि के प भय आदि) भावो का सचार, सुन्दर विन्यास के कारण दहनीय है। (इस दिन के ऊ नीचे स्थानो पर मेरी दृष्टी सो है।

सामुनी अहो, राजर्षि की यह चित्रकलानिपुणता (ही है ऐसा ज्ञात होता है कि मानो सली शकुनाना मेरे सामने ही वर्तमान है।

राजा--- पद्यत् साधुन चित्रे स्वाद क्रियते तत्तदन्यथा ।

तथापि तस्या लावण्य रेखया किचिदन्वितम् ॥ १४॥

राजा-

यदिति अन्य मित्रे यत् यत् साधु न स्यात् तत् तत् अन्यथा क्रियते । तथापि तस्था लावण्य रेखा कवि अन्वितम् ।

शब्दार्थ भित्रे चित्र में, पतन्यतु साधु न स्यात् जो-जो (शरीरावयव) सुन्दर न हो, तत् अन्यथा क्रियते वह वह अर्थात असुन्दर भी वह वह शरीरावयव सुन्दर बना दिया जाता है। तथापि तस्या वयम् तथापि उस शकुन्तला का सौन्दयरेखा अन्तिम निर्माणनिका की रेखाओ से कुछ ! ही प्रकट हो सका है।

अनुवाद चित्र में जो-जो (शरीरावयव) सुन्दर नहीं होते हैं. उन्हें सुन्दर बना दिया जाता है तथापि शकुन्तला पर तो सौन्दय विनिर्माण तुला की रेखाओ से (इस चित्र में कुछ ही जुड़ पाया है।

भावार्थ निर्माण की साधारण पद्धति तो यह होती है कि चित्रकार चित्र बनाते समय यदि किसी अंग विशेष को असुन्दर देखता है तो उसे अपने कौशल से रेवाओं द्वारा सुन्दर बनाकर दिखा देता है, अतएव कभी-कभी असुन्दर व्यक्ति का भी चित्र बहुत सुन्दर प्रतीत होने लगता है। दुष्यन्त कहता है कि इस कुता के fe मे तो उसका वास्तविक सौय चित्रलिका की रेखाओं से बहुत ही कम आ पाया है अर्थात् उसका पूरा नावष्य चित्र में नहीं दिलाया जा सका है। वस्तुत जिसे स्वयं ह्याने चित्रफलक पर रख कर अपनी तुलिका से बनाया हो, इतना ही नही जिलोक का सौन्दय एक कर जिसका निर्माण किया हो उसका कोई मनुष्य अपनी साधारण लिका से कैसे निर्माण कर सकता था, अत दुध्यन्त का यह कथन सत्य है। were free free foया ही नहीं जा सकता है क्योंकि वह तो क्षण-क्षण में नवीनता धारण करने वाला होता है महाकवि बिहारी का यह कथन सत्य हो है "लिखन बैठ जाकी सहि गहि गहि गरव मरूर, भयेन केले जगद के चतुर चितेरे बूर।" तात्पय यह निर्माण पद्धति के अनुसार उसको सुन्दर बनाने की बात तो दूर रही, उसका अपना ही पूरा सौन्दय में चित्रित नहीं कर पाया हूं, केवल उसकी मा कृति की रूपरेखा ही चित्रित कर सका हूँ।

विशेष प्रस्तुत पद्य में मनुष्य है।

स्कूल या विजेजले यद् यत् (अ) शरीरावय सस्थानम्, साधु सम्यक् न स्यादन] भवेत् तद् (अन्तत्तदवयवस्थानम्, अन्यथा मिते विकारेण विकस विपरीत या विधीयते परावृत्य चित्रे विलिख्यत इत्यर्थ तथापि एतादृस्या पद्धती सत्यामपि तस्यान्तरमा नाय

। विदूषक भो, इदानी विस्तत्र भवत्यो दृश्यन्ते सर्वाश्च दर्शनीया । फतमा तत्रभवती शकुन्तला ? [भी, दाणि तिहिओ तत्तहोदीओ दीसन्ति । सव्वाओ अ दसणीमाओ कदमा एत्थ तत्तहोदी सउन्दला ?]

सानुमती-सा मेतत् पश्चात्तापगुरो स्नेहस्यानवलेयस्य च । [सरिस एट पच्चादादगुरुणो सिणेहस्स अणवलेवस्स अ । ]

सानुमती अनभिज्ञ  रूपस्य मोघष्टिय जन । [ अणणो ईदिसस स्वस्स मोहदिट्ठी अम जणो ।] राजावाद कतमा तर्कपति ?

शिथिलबन्धनवान्तकुसुमेन केशान्तेनो- स्वेदविन्दुना यदनेन विशेषतोऽपसृताम्या बाहुभ्यामवसेकस्निग्धतरुण- पल्लवस्य धूतपापस्य पार्श्व ईषत्परिभ्रान्तेवालिखिता सा कुतला। इतरे सख्याविति [तक्केमि जा एसा सिडिलबन्धणुब्वन्तकुसुमेण केसन्तेण उब्भिण्ण-

अल्पमेव नतु साकल्येन अन्वितम् सम्यम् ।

संस्कृत सरलाय विदूषक मागण्य राजा कथयति यत् प्राय  व्यक्तिविशेषस्य यद्यमसुन्दर लक्ष्यते तदङ्ग सुदर विधीयते प्रायेण चिनिर्माणपद्धतिस्तथापि शकुन्तलाया अस्मिन् तस्यान्तुमालिकाविहितया रेखया अल्पमेव न तु साकल्येन सम्बद्धम् विस्मिनाति तस्मा लावण्य साकल्येन मिश्रीकृतम् - सामर्थ्यादिति ।

टिप्पणी

तिम्य राजा के ध्यान को अनाथ खोचने के लिए यह यह कहता है कि मूल मुझे खा जायेगी अर्थात् में वह भूला हूँ। ति चित्र मे शरीर के स्तनादि उत एन नाभि आदि न अगो को बडी साधानी से चित्रित किया गया था अत विदूषक की दृष्टि इन शरीरावयवो पर वक रुक कर पर रही थी।

सानुमती यह अर्थात् राजा का यह कथन उसके पाप के कारण बड़े हुये स्नेह और निरभिमान के अनुरूप ही है

मित्र, इस समय (इसमे ) तीन माननीय स्त्रियों दिखलाई पड रही

हैं और सभी सुदर है। इनमे से कौन सी स्त्री शकुन्तला है ? सानुमती इस प्रकार के रूप की पहचान न रखने वाला यह व्यक्ति अर्थात्

विदूषक निरक दृष्टि वाला है अर्थात् इसकी दृष्टि है। राजा अच्छा तो तुम किसको शकुत्ता समझते हो

विदूषकमै समझता हूँ कि जो यह जिसके जूड़े के ढीले एड जाने से (उसमे लगे हुये फूल गिर गये है, ऐसे केमपान से (युक्त) एवं जिसके मुख पर पसीने की बूंद

सेमबिन्दुणावणेण विसेसदो ओसरिआहि वाहाहि अवसे असिद्धित- पल्लवस्स अपाअवस्स पासे इसिपरिस्सन्ता विज बालिहिदा सा सचन्दना । इदराओ सहीओ ति ।]

राजा निपुणो भवान् । अस्पन्न मे भावचिह नम् स्विनागुलिविनिवेशो रेखामान्तेषु खयते मतिनः ।

चतुरिके । अर्धलिखित मेतद् विनोदस्थानम् गच्छ वर्तिका तावदानय ।

तक आई है तथा जिसकी भुजाये विशेष रूप से झुकी हुई है और जो जल सेचन से चिकने नवोपयो वाले आम्रवृक्ष के पास कुछ को हुई सी चित्रित की गई है, यह है और दूसरी दो उसको सखियाँ है ।

इस चित्र मे मेरे भात्रों का भी चिह्न है। स्विम वि-अन्वय रेखामा तेषु मलिन विम्राट, दुनिवेश दृश्यते पद कपोलपतितम्

शब्दार्थ- रेखामान्तेषु वित्र की रेखाओं के किनारो पर बलि मलिन कुछ काले का निसार मुनिविनिवेश स्वेद युक्त अंगुलियों का विन्दास, दूजयते दिखलाई पड रहा है इद कपोलपतितम् अबू और यह कपोल पर विरा वामादरंग के फँस जाने से, दृश्यम् दृष्टिगत हो रहा है।

अनुवाद चित्र की रेखाओ के किनारो पर कुछ काले वर्ग का मलिन, स्वेद युक्त अलियो का विन्यास दिखलाई पड़ रहा है, और वह कपोल पर गिरा हुआ सू रंग के फैल जाने से दृष्टिगत हो रहा है।

भावाथ राजा विषक से कहता है कि इस चित्र में मेरे सात्विक भानों का चिह्न भी देखा जा सकता है अर्थात् चित्र बनाते समय जो मुझमे स्वेद और बघु इन दो सात्विक भाव का उदय हुआ था वह दोनों ही इस vिe मे देखे जा सकते हैं, चित्र की रेखाओ के किनारो पर तो मेरी सस्वेदा गुलियो का रखना देखा जा सकता है इसीलिए रेखाओं के किनारे कुछ मलिन हो गये है, सस्वेद पुलियों के रखने से किनारों का मलिन (मैला गन्दा हो जाना स्वाभाविक ही है, यह मेरे स्वेदसात्विक का चिह्न है, और दूसरा सात्विक भाव है जो कि कुन्ता के कवोल पर गिरने से रंग के फैल जाने से स्पष्ट दिखलाई पड रहा है। आँसू के गिरने से रस का फैल जाना भी स्वाभाविक है।

इस प्रकार आठ सात्विक भावो मे से यहाँ मेरे दो (वेद और बालिक wrat का चिह्न स्पष्ट देखा जा सकता है।

विशेष सात्विक भावों का उदय, स्वेद से विवरेखाओ का मलिन का होना, पतन से रंग का फैल जाना, यह सब स्वाभाविक काय है, अत स्वभायो कार

सालिकमानोदय से राजा की भावना का भी अनुमान होने से अनुमानालकार भी है। वार्या जाति छन्द हैं।

सारेणाप्रान्तेषु चित्रफलकस्य प्रान्तभागेषु मलिन श्याम- वर्ण विद्यानाम् स्वेदयुक्तानाम् अ. गुलीनाम् विनिवेश विन्यास स्वधार वि बेक पते समवनश्यते । इदम् कपोलपतितम् विषयत या गडप्रदेशनिपतितम् बधुकोसादचा- भूतपणात् दयम् दृष्टु

स्कृत सरला राजा  कथयति यदस्मिन् चिये मदीयसात्विक मादामप्यस्ति चित्रगतरेखा प्रान्तभागेषु स्वेदयुक्ता गुलाम- लोक्यते पश्चात मयि स्वेदसात्विकभावोदयस्य सूचक fere कपोलदेशे निपतितमधु चिपसाधनौतपय प्रसरणाद दृश्यमेवास्ति

चतुरिये इति चतुरिके, जाओ यह मनोविनाद को वस्तु (अभी

ही है ( ) चित्र में रथ भरने की कुपी ले जाओ।

या परित्याग के पश्चाताप के कारण बडे हुये अथवा बुद्धि को प्राप्त हुये। पश्वात्ताप के कारण उसका अनुराग और अधिक बह गया था। नवपस्य+लिए+ अवलेप अभिमान, घमण्ड, रहित गोपवृष्टि मोषा दृष्टि यस्य स असफल या निरयक दृष्टि वाला, सानुमती विदूषक को मोदृष्टि इसलिये कहती है कि वह बनावयवती शकुन्तला की प्रथम दृष्टि में ही नही पहचान सका था, वस्तृत सानुमती का यह विचार उपयुक्त न विदूषक तो जान कर ही अनभिज्ञ बन रहा था, वह मकुन्तता को देखते ही पहचान गया था जैसा कि वह दूसरे वाक्य ने राजा से स्वयं कहता है। सिथिल यि बन्न ते उदान्तानि कुसुमानि यस्मासेन उद्भवेदना- [उदा स्वेदस्य विन्दवस्मिन् तेन विशेषतो यमृताभ्याम् सुन्दरी नायिकाओं की चुना स्वत एव कुछ झुकी हुई होती है, पर शकुन्तला की वे अत्यधिक अवनत भी जिस उसका सौन्दर्यातिशय प्रकट हो रहा था भावचिह्नम् भाव से तात्पर्य-सा भाव से है जोकि स्तम्भ, स्वेद, रोमाच्य, स्वरभङग, कम्प वैव न और प्रलय नाम से माठ होते है, यहाँ स्वेद और अबू दो का निर्देश किया गया है। विना स्वेदार्द्रा या अन तासा विनिवेश विधातो प्रत्यये, घातो दकारस्य प्रत्ययतकारस्य च नत्वे-स्विन्न, विनिवेश वि+नि+ विश् + षम् दृश्यम् द्रष्टु योग्य दृश्यत् वणिक वर्षा और दमक दोनों का ही अध रंग है उच्छ्वास फैलाउद++ कहीं का के स्थान पर 'वर्तिका' पाठ है-पतिका का अर्थ-चित्रपट का लेप या रग रग भरने की कूंची को भी कहते हैं गर्म मे कोई विशेष अन्तर नहीं है। ●

१२०

चतुरिका-आर्य माघव्य, अवलम्बस्व चित्रफलक यावदागच्छामि । [अज्ज माढव्ब, अवलम्ब चित्तफलभ जाव आअच्छामि ।]

राजा - अहमेवं तदवलम्बे । ( इति ययोक्त करोति ।

(निष्क्रान्ता चेटी ।) राजा - (निश्वस्य) यह हि

साक्षात् प्रियामुपगता मपहाय पूर्व, चित्रापिता पुनरिमा बहुमन्यमान । स्रोतोवहा पथि निकाला मतीत्य, जात सबै प्रणयवान्मृगतृष्णिकायाम् ॥ १६ ॥

बरिका माधव्य, (इ) को पकड़ लीजिये जब तक कि

(लौटकर आती हूँ।

राजा में ही इसे पकड़ लेता हूँ वह निपट को पकड़ लेता है)

(बेटी का प्रस्थान )

राजा (लम्बी सास लेकर मै तो

साझाविति पूसाहात् उपगताम् प्रियाम् अपाय पुन चिताम् मा बहुन्यमान पथि निकामजला तोवहा मतीत्य गृपतृष्णि- कायाम् प्रणयवान् जात

शब्दार्थ-मित्र, पूर्व पहने साक्षात् प्रत्यक्ष रूप से उपगताम् प्रियाम् समीप आई हुई  को अपहृत्य छोटकर, पुन अब इस समय, चित्रापिताम्] चित्रलिखित दमाइसकुन्तला को बहुमत्यमान अत्यधिक आदर देता हु ( मैं ) ममाग में निकामलाम्पुणतया जल से भरी हुई स्रोतहा नदी को, मतीपार करके छोडकर, मृगतृष्णिकायामु ममरीका में प्रणवदान् जातप्रेम करने वाला हो गया है।

अनुवाद मित्र, पहले प्रत्यक्ष समोआ प्रिया शकुन्तला को अब इस समय लिखित इस जन्ताको अत्यधिक आदर देता हुआ (मैं) भाग मे पूर्णतया जल से भरी हुई नदी को छोडकर  मे प्रेम करने बाला हो गया हूँ।

पर शकुन्तला के चित्र को बड़े प्रेमपूजक देखता हुवा राजा से कहता है, मित्र, जब मेरी प्रिया शाहले मरे त्यान में आई थी तब तो मैंने उसका तिरस्कार कर दिया था विन्तु मब विलिसी शकुन्तलाको मे बहुत बडा आदर दे रहा । ऐसा करते हुये मेरी नहीं थिति है जो उस प्यास व्यक्ति की होती है जो कि माग पढन वाली पूजता नदीको छोकर मृगतृष्णा मे प्रेम करने लगता है, अर्थात् जलपूर नदी का करा

से अपनी प्यास बुझाना चाहता है। विगत शकुन्तलाको अत्यादर की दृष्टि से देखना मृगवृष्णा से प्यास बुझाने के समान है, रत यह उपहासास्पद है।

विशेष मृगतृष्णा से प्यास माना असम्भव है, लोक के पूर्वाध एवं उत्तराध उपमा के रूप में समाप्त होते है त यहाँ असम्भवद वस्तु सम्बन्ध रूप निदर्शना सकार है, व्यति, वृत्ति अनुप्रास, प्रसादगुण, वैदर्भी रीति वसन्ततिलका छन्द है।

सकृत व्याख्यायस्य विदूषक, पूर्व सम्पन साझा प्रत्यक्ष उपगताम् मत्समीपमागताम् मिवाम् हृदयवल्लभा शकुन्तला, अपाय = अवगणस्य न तु स्यत्वा त्यक्तस्य पुनरुपादाने महापुरुषस्यानी- चित्यात् । पुन्तरम् एवानीनित्य विज्ञापिताम् चिलिखिताम्, इमाम् पुरोदृश्यमानाम् (शकुन्तलाम्) बहुमयमान अत्यादरेण प्रेम्णा बावलोक्यमान, म विकास प्रभूत जल सम्ययता निकाल परिपूर्णोदकाम, स्रोतोयाम्प्रहृपा नदीम् अतीत्य कायाम्मरुमध कायाम् प्रथमवान् सतुष्ण अभिताको जलार्थी वा जातसम्म ।

सरमार्थ समान मवलोकयन् राजा विदूषक कति दयस्य यदा प्रिया कुनला धाक प्रत्यक्षात मत्समीपमागता तदा ममा सा समुपेक्षिता परमिदानीमिमा चित्रलिखिता मत्यादरेणावलोकन तथैव स्वकीया प्रेमपिपासा ममने मुगुको जातोऽस्मि यचा पिपासाकुल कश्चिन्मार्गे परिपूर्णोदका प्रवहमाना नदी मुल्य मरमरीचिकयात्म पिपासाया feat भवति । प्रियामवगम्य कृत्रिम चित्रे मनो योजयन्त्र मूल एवास्मि इति भाव ।

अपाय + ओह त्यागे+नत्वात्यप् प्रियाम् धातो क पत्यये ईकारस्येव स्त्रीत्वे टापु उपगताम उगम्त खोतोवहाम्यहतोति हा पाय स्रोतसा वहा लोतीवातामुनिकामलाम्-निवृत्त काम यस्मात् या निकाम, निकाम न यस्यासा वा अपाय- इसका अर्थ यहाँ उपेक्षा करके है, छोड़कर नहीं एक बार छोटी गई वस्तु को पुन ग्रहण करना दुष्यन्त वैसे राज के लिये नुचित होगा। जतीत्यमति+इ+ क्या पप्पार करके बोच में ही छोडकर विभाषिताम् पित्रे अर्पिता लिखिता ताम् बहुमन्यमान- बहु+म+शान प्रणयवान प्रमीयते अनेनेति प्रणव प्रनो धातो 'एर' इति बच् प्रत्यय करणे प्रत्ययवाद अर्थात् प्रणयी प्रणाय + सुखादिभ्यश्चेति इनि यही शब्द प्रचलित है पर कालिदास ने दोनो ही शब्द का प्रयोग किया है अपना प्रणयिनीय नखक्षतमण्डनम् र० । इति मृगतृष्णा सा एवं मृग मृगतृष्णा से मत्यच मे अधू होकर मृगतृष्णा, पुन प्रथम टापू 'श्रृंगणा मरीचिका' इस कोश के अनुसार मृतृष्णा को मरमरीचिका

– ( आत्मगतम्) एवोऽभवान् नवीमतिक्रम्य मृगतृष्णिकां

सक्रान्त ( प्रकाशम्) अपर मित्र लेखितव्यम् ? [एसो अत्तभव दि अतिक्कम मितिहिआ सकती भो, अवर कि एत्थ लिहिदव्यम् ] सानुमती पोय प्रवेश सख्या मेऽभिरूपस्त तमालेखिकामो भवेत् । [जो जो पदेसी सहीए में अहिरुवो त त जालिहिदुकामो भवे । राजा भूयताम्,

कार्याकालीनमना स्रोतोवहा मालिनी, पादास्तामभितो निषण्णहरिणा गौरीगुरो पावना | शाखालम्बितवल्कलस्य च तरीनिर्मातुमिच्छाम्यथ, शृङ्ग कृष्णमृगस्य वामनयन कण्डूयमाना मृगीम् ॥१७॥

भी कहा जाता है। महस्थ ने सूद किरणों के संचार को समझ कर मृग अम अपनी प्यास बुझाने को उधर ही भागना है पर यहां जलन पाकर भीषण गर्मी ने स्वय मर जाता है। अत ममरीचिका या मृगतृष्णा शब्द झूठी तृष्णा के अर्थ मे प्रचलित है।

विक (मन में अच्छा यह महाराव नदी पार करके मृगतृष्णा मे प्रविष्ट ही गये है (क) महाराज अब आपको इसमें और क्या बनाना है तुमती मेरी सखी को जो स्थान पसन्द है, उनको यह बन

के लिये इच्छुक होंगे।

राजा सुनिये,

कायति समिना खोतोवा मालिनी कार्याला अभि विष्णहरिणा गौरीगुरो पावना पादा (कार्या) सावालम्बितकस्य तरो मध कृष्णमृगस्य वामनयनम्यमाना मृगी निर्मातुम् इच्छामि ।

शब्दार्थ तीनमिथुना जिसके रेतीले किनारे पर हसी के बड़े बैठे ये हैं खानी कार्या (ऐसी) मालिनी नामक नवी बनानी है ता अमित उसके दोनो बोर, निष्णहरिणाजिन पर हरिण हुये है (ऐसे गौरीगुरो हिमालय पवत को पावना पाचा कार्या पवित्र पहाडियाँ (प्रत्यन्त प) बनानी है। शाखालम्बित करस्य जिसकी मालाओ पर वल्कलवर लटके हुये है, तो ऐसे वृक्ष के नीचे कृष्णमृगस्य कृष्णमृग के सोग पर वामनायें नेत्रको कमाना सुजलाती हुई मृगी और मृगों को निर्मानामि बनाना चाहता हूँ।

अनुवाद जिसके रेतीले किनारे पर हो के जोड़े बैठे हुये हैं ऐसी मालिनी नामक नदी बनाना है, उसने दोनो और जिन पर हिरण बैठे हुये है ऐसे हिमालय की अपहानियां बनानी है जिसकी शाखाओं पर लटके हुये है ऐसे वृक्ष

के नीचे कृष्णमृग के सीग पर बायें नेम को लाती हुई हरिणी को भी बनाना चाहता है।

- संस्कृत व्याख्या संकालुकामये पुलिने, सीनानि उपविष्टानि मथुनानि हसाना इन्द्रानि पत्या सावलीत मिथुना खोतोवहा नदी, मालिनी मालिनीति नाम्नी नदी कार्याचितिच्या ता-मालिनीम, अमित उभयनिषण्णा विटा हरिणा मृगा येषु निपपरिया गोर्या शिवाया गुरु जनक तस्य गौरीगुरो हिमालयस्य पावनापविमापादाप्रत्यन्तपर्वता (कार्या=आलेख्या) शाखासु सम्बितानि अवसक्तानि कानि मुनिपरित्य यस्य तस्य तत्तस्य तरी बृक्षस्य अर्थ कृष्णमृगस्यः कृष्णसाराच्यविशेषस्य श्रृङगे विषाणे, धामनयनम् दक्षिणेत रनेत्रम् कण्डूय मानाम्यती मृगम्हरिणीम निर्मातुम्बालेवितुम् इच्छामि माछामि।

विशेष प्रस्तुत पद्म मे कार्यों इस क्रिया पद से श्रोतावा तथा पादा इन दोनो अप्रस्तुत पदार्थों का कमरूप में मम्बन्ध अतुल्ययोगिताकार है गौरी मे से उदाताकार ऐक वृत्ति भुतिमनुप्रासाविक्रीडित नामक छन्द है। इस पद्य से राजा साथमस्य पूर्वानुभूत तत्कालीन सभी उदीपन feat re करता है स्वमाण होकर ये सभी उपकपदार्थ सम्म प्रवाहेक विरह की पुष्टि करते हैं।

सस्कृत सरला दुष्यन्तो विदूषक कथयति पदस्मिन् चित्रे मया सा मालिनी नदी आयात या वालुकामयुनिप्रदेशेषु सइन्द्रानि उपविष्टानि सन्ति ता मालिनी नदी मुभयत मया हिमालयस्य ते पवित्रा प्रत्यन्तापयितव्याप हरिणा उपविष्टा सन्तिकस्य वृक्षस्याच कृष्णमृगस्य विषाणे रिसा स्वकीय वापयन्त मृगीमपि आलेखितु मिच्छामि ।

टिप्पणी

अभिरूप आलेखिकाममा काम यस्य स तु काम =

मनसोरपीति नियमादत्र महारतोय संकत सिकता सन्यनेत्या अणु सिकता शब्द का प्रयोग सदा स्त्रीलिङ्ग बहुवचन मे ही होता है। आप सुमनसो वर्षा eer feer मा एते स्त्रियाँ बहुवे स्युरेकत्वेऽप्युत्तरम्।" पाया समीप- तिनी छोटी पहाडियाँ अति इत्यस्य योगे तामित्यव द्वितीया । निषण्णनि सद् धातोदकारस्य प्रत्यय तकारस्य चेति नत्वम्यमाना हुई मृगी का कृष्णसार मृग के सौग पर बागतत्र खुजलाना उसकी रिरसा काया है रिश्ता पत्र जायेत कण्डूतिस्तव जायते मृगीया वामनव योषिता मदनाल" कुमारसम्भव में भी यही भाव व्यक्त किया गया है मधुद्विरेफ कुसुमैक पापी प्रिया वा मनुवर्तमान गृहण व निमीलिताक्षी मृगीमत कृष्णसार कार्य र निमातुमिच्छाम इन दो समानायक पर मिश्रभिद

२०१

free (आत्मगतम्) ववाह पश्यामि पूरितव्यमनेन चित्रफलक लम्बकूचना तापसाना कदम्बे [ अह अह देक्खामि पूरिदव्व णेण चित्तफलब

लम्बकुच्चाण तावसाण कदम्बेहि।] राजा-यस्य च शकुन्तलाया प्रसाधनमभिप्रेतमत्र विस्मृत-

मस्माभि ।

विदूषक कमिव ? (कि बिज) -

सानुमती वनवासस्य सौकुमार्यस्य विनयस्य च यत्सदृश भविष्यति । [बणवासस्स सोउमारस्त विणनस्स न ज सरिस भविस्सदि ।

राजा-

कृत न कर्णापितबन्धन ससे,

शिरीषमागण्डविलम्बिकेसरम् । न वा शरचन्द्रमरीचिकोमल,

मृणालसूत्र रचित स्तनान्तरे ||१८||

का प्रयोग यह सूचित करता है कि मालिनी और पादा तो कर्तुं शक्य, पर वामनयन का कपन विचित नहीं किया जा सकता, पप राजा ऐसा करना चाहता था। सीतोवा निहरिणा गौरीगुरो आदि शब्दो का प्रयोग उस स्थान की परम रमणीयता, उद्दीपकता निर्विघ्नविहारक्षमता एवं सुरत क्षमता का द्योतक है। विम् गार का उत्तम उदाहरण है।

वियक (मन में जैसा कि मुझे प्रतीत होता है कि (ब) यह (इस) चित्र फलको लम्बी वाडी वाले तपस्वियों के झुण्ड से पूरा करेंगे।

राजा मित्र और (अव) यह (करना है) को जो प्रसाधन (मजावट) हम करना चाहते थे (मह) इस विष मे भूल गये है। विवह नया ?

सानुमती (उसके वनवास, सुकुमारता एवं विनयशीलता के अनुरूप जो वस्तु होगी उसी वस्तु से यह उसकी सजावट करना चाहते होगे

राजा- मिति कर्णापिबन्धनम् गण्डावलम्बिकेसरम् शिरीष

न कृतम् । स्तनान्तरे शरच्चन्द्रम कोमलम् मृणालसूत्रम् न वा रचितम् । शवाय मित्र कन्निकानो मे फँसाये गये उठत बाला, बागण्डविलम्बि केस हुये पराग वाला गिरीषम् शिरीष पुष्प को, न कृतम् नही बनाया है। स्तनान्तरेनो के बीच शरण्यनगरीबि कोमलम् = मरतु कालीन बन्द्रमा की किरणों के समान कोमल, मृणालपुत्रम कमस माल का हार न वा रचित नहीं बनाया है।

अनुवाद- मित्र (इस चित्र में ) f मुलाग कानो में पटना गया

है और जिसका पराग कपोलों तक फैल रहा है ऐसा गिरीष पुष्य विवित नहीं किया है और मैंने) र कालीन चन्द्रकिरणों के समान कोमल मृणाल (कमल नात का) हार ही स्तनों के बीच चित्रित किया है।

गाव राजा कहता है कि इस विषमे में जोश के प्रसाधन को विदित करना चाहता था वह इसमें नहीं कर पाया हूँ, अत इसे अब पूरा करना है, जैसे कि, मैंने अब तक इसमे उस शिरीष पुष्प को चित्रित नहीं किया है जिसका कि मूल भाव मतना अपने कानो मे पहन लेती थी और तब उसके नीचे लटकने पर उसका पर उसके कपोतो पर फैल जाता था। इसके अतिरिक्त मैंने उसके स्तनो के बीच पहनने वाले कमल नाम के उस हार को भी विषित नहीं किया है जो कि मरकालीन चन्द्र किरणों के समान श्वेत वर्ग का एवं कोमल था।

विशेष प्रस्तुत पद्य में कृतम् व रचित कियाओ के समुचित होने के कारण साकार, हरन्द्रेत्यादि में लुप्तोपमालकार, छेक वृत्ति और भूति अनुपात और मग नामक छन्द है ।

कृपया यस्य पयोनियस्य वर्णा पितबन्धनम् घोषनिवेशितमुत्तम् आगण्डम् कपोलपपन्त बिलम्बिन प्रभृता रा कायस्य तदु-वागण्डविलम्बिकेसरम् शिरीषम् शिरीषकुसुमम् न. चितिमा किञ्च, स्तनयो यो अन्तरे मध्यभागे स्तनान्तरे रमन्द्रस्य गरदिन्दी मरीचिवत् कोमल मूल सुन परीमकोमल मृणालसूत्रम् विशतन्तुपटितो हार न रचितम् चित्रे लिखितम् एतदुभयमपि विस्मरणकारणात चित्रित मत सम्प्रति तत्कर्तुमिच्छामीति भाव।

संस्कृत सरसार्थ राजा यति वयस्य चित्रेऽस्मिन् मासानम- प्यामिति तद विस्मरणकारणात पूर्व चित्रितम् एतदिदानीतुमिच्छामि, कपोन्सर शिरीषपुष्प न मिति एवं शरदिन्दु- मरीको बिन्दुसुमपि न पूर्व विरचितम् एतदुभयदानी महर्तुमिच्छामि। टिप्पणी

पश्यामि इसका यहाँ तात्म्य है कि मुझे ऐसा प्रतीत होता है। लम्ब नाम्-लम्बा कूर्नामेवान्ते तेषाम् म् या समूह आगण्डविलम्बिकेसरम्- यहाँ पर और केसर का परस्पर भूय भूषण भाव सम्बन्ध प्रकट होता है जिससे व्यक्ति होता है कि शिरीषपुष्प न केवल कानो को ही आप वह गण्डस्थल को भी सुशोभित करने वाला था। इससे कुता का अतिमा भी ध्वनित होता है अतएव नह केवल शिरीष जैसे कोमल पुष्प को हो धारण करती काति से बाहर की पदरता के कारण केवल तिन् ही उनके अन्तरा श्री सकला स्वत एक के

विदूषक भोक तत्रभवती रक्तकुवलय पल्लवशोभिनाऽग्रहस्तेन मावार्य चकितचकतेव स्थिता (सावधान निरूप्य दृष्ट्या आ एव वास्था पुत्र कुसुमरसपाटच्चरस्तत्रभवत्या वदनकमलमभिलङ्घते मधुकर । [भो, कि णु तत्तहोदी रक्तकुवल अपल्लवतोहिणा अग्गहत्थेण मुह आवारिअ चइदचदा विअ ढिला । आ एसो दासीपुत्त कुसुमरसपाडच तत्त- होदीए अणकमल अहिल दि महुअरी ।]

राजा ननु वार्यतामेष पृष्ट । fague भवानेवाविनीताना शासिताऽस्य पारणे प्रभविष्यति । [भव एब्ब अविणोदाण सासिदा इमस्त वारणे प‌विस्सदि ।] राजा पुण्यते अयि भो कुसुमलताप्रियालिये, किमत्र परपतन- मनुभवसि

एवा कुसुमनिषण्णा तृषितापि सती भवन्तमनुरता। प्रतिपालयति मधुकरी न खलु मधु बिना त्वया पिवति ॥ १४॥

विदूषक--- श्रीमन, यह क्या बात है कि देवी सकुन्तला लकमल के पव के समान सुशोभित अगुलियों से अपने मुख को इक कर बहुत सी खड़ी हैं। (सावधानी से विचार कर और देख कर मेरे यह नीच, पुष्पों के रस को चुराने वाला भ्रमर इस देवी शकुन्तला के मुख कमल पर आक्रमण कर रहा है अर्थात् अमर इसके मुख को कमल समझकर इसके रसपान की इच्छा कर रहा है।

राजा इस पृष्ट ( अमर ) को रोक दो

विदूषक दुष्ट के शासक आप ही है (अत) इसको रोकने में आप ही समय होगे।

राजा ठीक है है पुष्पित नता के प्रिय अतिथि भ्रमर तुम क्यो एस शकुन्तला के मुख पर चारों ओर से गिरने का धम उठा रहे हो अर्थात् इसके मुख के

चारो ओर चाकार मैडराने का कष्ट क्यों उठा रहे हो ? देखो एवेति अन्यय-अनुरक्ता कुमुमनिषण्णा सती एका मधुकरी तृषिता सती -

अपि भवन्तम् प्रतिपालयति त्वया विना न खलु मधु पिवति । शब्दाच अनुरक्ता (तुमसे प्रेम करने वाली कुसुमपुरुष पर बैठी हुई, एषा मधुकरी यह भ्रमरी कृषिता सती अपि प्यासी होकर भी, भवन्त प्रतिपालयति आपकी प्रतीक्षा कर रही है, या बिना तुम्हारे बिना न खलु मधु पिवतिय वस्तु मधु का पान नहीं कर रही है।

अनुनाद तुमसे प्रेम करने वाली, पुष्प पर बैठी हुई यह भ्रमरी, प्यासी होकर भी आपकी प्रतीक्षा कर रही है और तुम्हारे बिना यह वस्तुत मधुपान नही कर ही है।

अमर को सम्बोधित करना हुआ राजा कहता है कि तुमसे अनुराग

२०८

रखने वाली, पुष्प पर बैठी हुई यह मधुकरीप मधुपान के लिए दूषिता हो रही है तथापि यह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है और तुम्हारे बिना अकेली यह वस्तुत मधुमान भी नहीं करना चाहती है, अत तुम शकुतला के मुख के आनपास मंडराना छोड़कर अपनी इस भ्रमरी के साथ यहाँ जाकर पुष्प रसपान करो, वहाँ घूमने से तुम्हे क्या मिलेगा।

विशेष प्रस्तुत पद्य में भ्रमर और भ्रम पर नायक-नायिका के व्यवहार का समारोपण होने से समासोक्ति अलकार, भिवस्य भ्रमरी का मधुपान न करना स्वाभा विक है पर यह कहना कि तुम्हारे बिना वह मधुपान नही करती कृत्रिम है, इस प्रकार दोनो मे अभेदाध्यवसाय होने से अतिशयोक्ति अलकार है, न वृत्ति अनुप्रास तथा आर्या जाति छन्द है। यहाँ कुसुमनिष में स्थानसाम्यता, अनुररका से सुगम्यता, प्रतिपालयति से प्रेमातिशय, न पिबति से पातिव्रत्य और विशेषानुराग ध्वनित होता है। प्रेमाभिभूत राजा का भ्रम पर कोमल भावीका बारोप करना कवि के प्रकृति एवलक्षणता का द्योतक है।

संस्कृत या अनुरक्ता अनुरागवती, एषापुर स्थितचित्रे निषिता मधुकरो भ्रमरो कुम्मणा सती पुण्योपरि स्थिता सती ear aft सुचिता पिपासिता भूत्या अभिनया धमरम् प्रतिपालयति प्रतीक्षते [eat] विया भ्रमरे बिना न तु मधु पिवति वस्तुत मधुपान करोति ।

संस्कृत सरलार्थ प्रेमभिता गजा चमर सम्बोधन यात अगर मंत्र शकुन्तलामुलकमले किमिति परिपतनखेदमनुभवसि पुष्पोपरि एकाकी निवा एषा तव प्रिया भवति अनुरागवती भ्रमरी तृषिता भूत्वापि भवन्त प्रतीक्षते अन् विहाय एकाकिनी मधुपान कर्तुं नेच्छति अतस्त्वमागम्य स्वप्रियया सह मधुपान करणीयम् ।

टिप्पणी

रक्तकुलपल्लवशोभिना – कुवलय, २०८

रखने वाली, पुष्प पर बैठी हुई यह मधुकरीप मधुपान के लिए दूषिता हो रही है तथापि यह तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है और तुम्हारे बिना अकेली यह वस्तुत मधुमान भी नहीं करना चाहती है, अत तुम शकुतला के मुख के आनपास मंडराना छोड़कर अपनी इस भ्रमरी के साथ यहाँ जाकर पुष्प रसपान करो, वहाँ घूमने से तुम्हे क्या मिलेगा।

विशेष प्रस्तुत पद्य में भ्रमर और भ्रम पर नायक-नायिका के व्यवहार का समारोपण होने से समासोक्ति अलकार, भिवस्य भ्रमरी का मधुपान न करना स्वाभा विक है पर यह कहना कि तुम्हारे बिना वह मधुपान नही करती कृत्रिम है, इस प्रकार दोनो मे अभेदाध्यवसाय होने से अतिशयोक्ति अलकार है, न वृत्ति अनुप्रास तथा आर्या जाति छन्द है। यहाँ कुसुमनिष में स्थानसाम्यता, अनुररका से सुगम्यता, प्रतिपालयति से प्रेमातिशय, न पिबति से पातिव्रत्य और विशेषानुराग ध्वनित होता है। प्रेमाभिभूत राजा का भ्रम पर कोमल भावीका बारोप करना कवि के प्रकृति एवलक्षणता का द्योतक है।

संस्कृत या अनुरक्ता अनुरागवती, एषापुर स्थितचित्रे निषिता मधुकरो भ्रमरो कुम्मणा सती पुण्योपरि स्थिता सती ear aft सुचिता पिपासिता भूत्या अभिनया धमरम् प्रतिपालयति प्रतीक्षते [eat] विया भ्रमरे बिना न तु मधु पिवति वस्तुत मधुपान करोति ।

संस्कृत सरलार्थ प्रेमभिता गजा चमर सम्बोधन यात अगर मंत्र शकुन्तलामुलकमले किमिति परिपतनखेदमनुभवसि पुष्पोपरि एकाकी निवा एषा तव प्रिया भवति अनुरागवती भ्रमरी तृषिता भूत्वापि भवन्त प्रतीक्षते अन् विहाय एकाकिनी मधुपान कर्तुं नेच्छति अतस्त्वमागम्य स्वप्रियया सह मधुपान करणीयम् ।

टिप्पणी

रक्तकुलपल्लवशोभिना – कुवलय,  होता है मत उरुके पल्लय रक्त वग नहीं हो सकते, रक्त कुवलय पल्लव के स्थान पर रक्तपल्लवशोभिना पाट ही उचित प्रतीत होता है। रक्त कुदलपस्य पत्लववतशोभीतेन आवाय आ++ गिच्क्त्वात्यप् माच्छादित करने, पक्तिचरिता चकितम् भयमीत सामान्य नपुसकम् पाद पकिता सहगुपतिसमास अत्यधिक भयभीत नाम प्रकारे गुग वचनस्येत्यनेन द्वित्वसम्भवति नाम सादृश्यबाधक इयादि शब्द प्रयुक्तास्वा पुत्र- अन निन्दायें पुज्यतरस्यामिति षष्ठ्या अन परिपतनखेदम्बारो ओर मंडराने का कुन-कुन प्रतिपालयति प्रति+पाि होता है मत उरुके पल्लय रक्त वग नहीं हो सकते, रक्त कुवलय पल्लव के स्थान पर रक्तपल्लवशोभिना पाट ही उचित प्रतीत होता है। रक्त कुदलपस्य पत्लववतशोभीतेन आवाय आ++ गिच्क्त्वात्यप् माच्छादित करने, पक्तिचरिता चकितम् भयमीत सामान्य नपुसकम् पाद पकिता सहगुपतिसमास अत्यधिक भयभीत नाम प्रकारे गुग वचनस्येत्यनेन द्वित्वसम्भवति नाम सादृश्यबाधक इयादि शब्द प्रयुक्तास्वा पुत्र- अन निन्दायें पुज्यतरस्यामिति षष्ठ्या अन परिपतनखेदम्बारो ओर मंडराने का कुन-कुन प्रतिपालयति प्रति+पाि

२०५

सानुमतो अभिजात सत्वेष वारित । [अज्न अभिजाद क्खु एमो वारिदो।] विदूषक प्रतिषिद्धाऽपि वामेचा जाति [पडिसिद्धा विधामा एसा

जादी ।"

राजा एवं भो, न में शासने तिष्ठसि ? तह सम्प्रति- पोत मया सवयमेव रतोत्सवेषु । बिम्बाधर स्पेशसि चेद् अमर प्रियाया त्वा कारयामि कमलोदरबन्धनस्यम् ||२०||

नया राजा अच्छा बरे तो तू मेरी आज्ञा नहीं मानता तो अब यह सुन-- अक्लिष्टेति अन्वय हे भ्रमर अष्टदालत पहलवनीयम् रतोत्सवेषु सदयम् एवं पीतम्, प्रियाया विम्बाधरम् स्पसि त्वाम् कमलोदर बन्धनस्थ कारयामि ।

सानुमती— इस समय इन्होंने इस अमर को कुलीनजनोचित शिष्ट एवं न्यायोचित से रोका है।

विश्र्वक रोके जाने पर भी विपरीत काम करने वाली यह जाति है। भ्रमर जाति नहीं काम करती है जिसके लिये इसे रोका जाय ।

शब्दार्थ हे प्रमर मधुकर अष्टिवल एपोनयन हुये नवीन तप केल्याक (तथा) मया रतोत्सवेषु सदयमेव पीतम् मेरे द्वारा रतिकाल में दवा ही पान किये गये, प्रियाया विस्वाधरम् प्रिया शकुन्तला के रोष्ठ का स्पेशल तुम यदि स्पन करते हो तो नै) लामु तुमको, कमलोदरबन्धनस्यम् कमल के मध्यभाग रूपी कारागार में बन्द कारयाम कराता हूँ।

अनुवाद हे मधुकर न मुझवि हुये नवीन तस् के समान आकर्षक (तथा) मेरे द्वारा रतिकाल मे सदयता पूर्वक ही पान किये गये प्रिया शकुन्तला केवल्य धरोष्ठ का यदि तुम स्पर्श करते हो तो मैं तुम्हे कमल के मध्य भागरूपी कारागार में बन्द कराता हूँ।

भावार्थ राजा भ्रमर को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि यदि तू मेरी बाजा को नहीं मानता तो फिर सुन, तेरे लिये यह राजदण्ड होगा, अगर तू मेरी प्रिया के उस निम्न तुल्य अधरोष्ठ का स्पश करेगा जो कि न झरि हुये नवीन महल के समान सुन्दर है और रतिकाल मे free मैंने भी तापूर्वक ही रान किया है तो मैं तुम्हे कमलोदररूप कारागार में बन्द करा दूंगा अर्थात राजमा करने के अपराध मे ले कारागार का कष्ट उठाना पड़ेगा।

सागर- मधुकर अक्लिष्ट अम्मान बाल नूतन में तरो वृास्य पत्लय किसलय तमिव लोनीयम् आकर्षकम् अक्लिष्टापत्सन लोभनीयम् अम्लाननूतनत परलववदाकर्यक्रम प्रियाया हृदयवल्लभाया शकुन्त साया विम्बाधरण पक्वविम्वलसदृशा रक्ताधरोष्ठम मया दुष्यन्तेनापि रमे सावस्तेषु रतोत्मचेषु सुरतकीडामहोत्सवेषु रविकाज इत्यच सदयम् एव सानुकम्ब मेव स्वाद स्वाद मेव, पीतम् आस्वादितम् चेत् यदि स्पृशतित्वम् सि त्वाम् तद्दित्वा भ्रमरम् अहम् कमलस्य वदरम अभ्यन्तरमेव वचनम् कारागृहम् तत्र तिष्ठतीति तम् कमलोदरवचनस्यम् कारयामि केनापि मदीयेन कमचारिणा करागृहे प्रापयामि ।

विशेष प्रस्तुत पद्य में अमर पर प्रतिनायक के व्यवहार का समारोपण होने समासोति नकार यद्यपि अमर के लिये कमलोदवनस्थ होना स्वाभाविक है तथापि यहाँ उसका अपने प्रयोजन का विषय बनाने से अतिशयोक्ति मलकार, ferrer तथा अलटेत्यादि पद मे समागता सुप्तोपमा, कमलोवरेत्यादिपद मे रूपक अलकार कमल शब्द का जल अथ भी है अत मे अलकार, क्लिष्टेत्यादि पदविधेय विशेषण है अत अमर के पक्ष मे हेतु होने से भ्रान्तिमान अनकार है, हेतु और अनुप्रास अलकार, प्रसाद युग, वैदर्भी रीति तथा बसन्ततिलका छन्द है। राजा की घोषणा होने के कारण यहाँ व्यवसाय नामक अवमश सन्धि का अ] है सायश्च विशेष प्रतिमा सम्भव।

सस्कृत सरमार्थ अमर सम्बोधयन् राजा कपयति मधुकर यदि व म हृदयवल्लभाया शकुन्तलाया तम् पचिम्नफलसदृशारताधरोष्ठ दशासि य अम्माननूतनतरपल्लवदाकवक स्तिरितिकाले सानुकम्पमेवास्य देव हि महत्व कमलोदरपकारागृहे प्रापयामि ।

टिप्पणी

भारत- अभिजात का अय है कुलीन अर्थात् कुलीन व्यक्ति के ममान उचित न्याय पूर्वक रोका गया, "अभिजात स्मृत न्याम्ये" यहाँ सानुमती काय है कि राजा ने अब भी अर्थात् इस अवस्था को प्राप्त होकर भी कितनी न्यायप्रियता सद्भावना सतर्कता एवं नम्रता के साथ प्रमर से बने जाने के लिये कहा है जब कि कोई विरह से व्याकुल साधारण व्यक्ति ऐसी विरहाकुल अवस्था में ऐसा नही कह सकता था इससे राजा की न्यायप्रियता एवं भत्ता ति होती है। पिटेरवा– इससे अधर की अता लानता रखता कोमलता प्रकट होती है। निपल का ही होता है तथापि यहाँ दोपादान से कवि का तर मे ला हुआ हो पल है क्योकि तर से टूटने पर पल्लव मे स्वाभाविक कोमलता नहीं रह जाती अस्तिष्टनिम्बशोभाधरस्य नागा। facerer विम्बाकार विन्यसदृशो वा अधर पार्थिवादित्वात् उत्तरपदसोप

विदूषकएव तीक्ष्णदण्डस्य किन नेत्स्यति ? (प्रहस्य आत्मगतम्) एष तावदुन्मत्त । अहमप्येतस्य सङ्ग नेवृशवर्ण इव सबुत (प्रकाशम्) भो, चित्र खल्येतत् [एव्व ण्डिस कि ण भाइस्सदि ? एसो दाव उम्मतो अह वि एस्ससगेण ईदिसवण्णो वित्र सवुतो भो, चित्त

क्खु एद ।] राजा-कम चित्रम्

मी- अहमदानीमवतार्वा । किं पुनर्ययालिखितानुभाव्यैव । [अपि दाणि अवगदत्था कि उण जहालिहिदाणुभावी एसो ॥]

विधानात् वि एक प्रकार का लाल फल होता है। अथवा यहाँ विम्य इव धर  विम्वमय ऐसा विग्रह करने पर विशेषण विशेष बहुत से कमधारय समास होकर मध्यमपदमाग भी हो सकता है। नवयुवतियों के अधर की तुलना प्राय कवियों ने विम्य फल से की हैती विम्वाधरवतुष्णम् रपु० विम्या घरात मावि वस्तुत इस समय राजा अन्यमनस्क था इसलिये वह चित भी प्रमर को वास्तविक अमर समझ रहा था। रतोत्सवेषु उत्सव परत क्रीडाओ मे सब एक होते हुये भी मेरे द्वारा जिसका धीरे-धीरे वाद- स्वाद से रसपान किया गया था न कि उसे इष्ट किया गया था। स्पृशति यहाँ राजा का तात्पर्य है कि यदि तुम उसे दृष्ट करोगे उस पर नियता पूरक दन्तक्षत करोगे । कमलोदरेति कमलस्योदररूप यद् बन्धन कारागृहम् नत्र तिष्ठतीति कमलोदर- +था+क वलयानन्द का इसी भाव का यह लोक द्रष्टव्य है। "रात्रि- यति भविष्यति सुप्रभात भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पक श्री विचिन्तयति- द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनी पर उज्जहार" वस्तुत राजा का तात्पर्य यहाँ यह है कि अत्यन्त कोमल होने के कारण जिस अधर का मैंने ही रतिकाल में धीरे- धीरे ही रसास्वाद मान किया था उसे यदि तु काटने का प्रयत्न करेगा तो तुझे भी परस्त्री लम्पट की भाँति मेरी राजकीय आज्ञानुसार जेल जाना पड़ेगा क्योकि मैं न्यायप्रिय राजा हूँ, पटी को दण्ड देना मेरा कर्तव्य है। इस प्रकार यह सब वर्णन यहाँ इसलिये अनुचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस से यहाँ कवि को राजा की उन्मादावस्था का वर्णन करना ही अभीष्ट है और उन्मादी के लिये ऐसा वाता स्वाभाविक ही है।

विदूषक इस प्रकार कठोर दण्ड देने वाले (आप से) यह स्पोन करेगा अर्थात् अय दरेगा। (हँसकर मन मे ) यह तो पागल हो गया है, मैं भी इसके साथ के कारण इसी प्रकार का (पागल हो गया हूँ ( प्रकट) श्रीमान यह तो चित्र है। अरे क्या यह विष है? सानुमती मुझे भी तो अब वास्तविक स्थिति का पता चला है अर्थात् में भी

जब समझ की हूँ कि वस्तुत यह चित्र का सालाद शकुन्ता नहीं तो फिर जैसा

राजा वयस्य किमिवमनुष्ठित पौरोभाग्यम्

साक्षादिव तन्मयेन हृदयेन । स्मृतिकारिणा त्वया मे पुनरपि वित्रीकृता कान्ता ॥२१॥

(इति वाष्प विहरति ।)

चित्र मे अति है उसी प्रकार का अनुभव करने वाले इस राजा के विषय मे तो कहना ही क्या ? अर्थात् जिसने स्वयं चित्र बनाया हो और वह उसे अपनी भावनाओ

के अनुसार उसी रूप में देखे तो इसमें माश्चय ही क्या राजा मित्र तुमने यह कैसी तार वाली

अन्य हृदयेन साखा इव दशना अनुभवत स्मृति-

कारिणा त्वया कान्ता पुनरपि चित्रीकृता ।

शब्दार्थ-तन्यमेन हृदयेन शकुन्तलाम पित्त के द्वारा साक्षात् द प्रत्यक्ष मानो दानसम् अनुभवतदशन का आनन्द प्राप्त करते हुये मुझे, स्मृतिकारिणा याद दिला देने वाले तुम्हारे द्वारा प्रिया कुला, पुनरपि फिर भी, चित्रीकृताभित्र में चित्रित कर दी गई है।

अनुबाद - शकुन्तलामय चित के द्वारा मानो प्रत्यक्ष ही दशनानन्द का अनुभव करने वाले, मुझे याद दिला देने वाले तुम्हारे द्वारा प्रिया मन्ना को फिर भी चित्रित कर दिया गया है।

भावार्थ मन होकर राजा विदूक से कहता है, कि जब कि मैं उम्मय अर्थात् मन से उसका मानो प्रत्यक्षात दर्शनानन्द प्राप्त कर रहा था उसी समय तुमने यह बार दिला कर कि यह तो चित्र है, साक्षात् शकुन्तला नहीं मेरी प्रिया को जो कि साक्षात् मेरे सामने थी, पुन भित्रित कर दिया है और इस प्रकार तुमने मुझे उसके दमन के सुख से चित कर दिया है, यह तुम्हारी बहुत बडी पुष्टता है।

विशेष— 'मालादिव मे बायोकार मे गम्पोनकार स्मृतिकारिणा विजीकृता मे शब्द-शक्तिमूलक विरोधाभासस्य है भोजराज ने दूसरे के द्वारा स्मरण कराने में भी स्मरणानकार माना है अन्य आचायों ने यहाँ धान्तिमान् अकार भी माना है, क्योंकि अविकल समानता के कारण चित्र में राजा को शकुन्तला का भ्रम हो रहा था। इसके अतिरिक्त यहाँ पर विप्रसम्म वार की अभी है क्योंकि पूर्वार्ध मे हर्ष तथा उत्तराध मे विवाद भावो की सन्धि है कति तथा भूति अनुप्रास, आर्या जाति नामक छन्द है।

राजा (ता से अस्त्र को रोकते हुये कोह आप मातलि हैं देवराज इन्द्र के सारथि आपका स्वागत है।

(प्रविश्य)
विदूषक अह येनेष्टपशुमार मारित सोऽनेने स्वागतेनाभिनन्द्यते । [ अह जेण इद्विपसुमार मारियो सो इमिणा साजदेण अहिन्दीअदि ।] मातलि - ( सस्मितम् ) आयुष्मन् भूयता पदर्थमस्मि हरिणा भवत्स- काम प्रेषित ।
राजा - अवहितोऽस्मि । मातलि अस्ति कालनेमिप्रसूति हुं जंयो नाम दानवगण । राजा अस्ति तपूर्व मया नारदात् । मातलि --
सति स किल शतक्रतोरनथ्य स्तस्य त्व रणशिरसि स्मृतो निहन्ता । उच्छेतुं प्रभवति यद्म सप्तसप्ति- स्व तिमिरमपाकरोति चन्द्र ॥३०
स भवानाशस्त्र एवं इदानीमेवरथमान्दा विजयाय प्रतिष्ठताम् ।
(प्रवेश करके)
विदूषक जिसने मुझे यज्ञीय पशु की मार से मारा है उसका यह स्वागत
के द्वारा अभिनन्दन कर रहे हैं।
मातलि (मुस्कराहट के साथ) युष्म, जिसके लिये ने मुझे आपके
पास भेजा है, वह सुनिये।
राजा में सावधान हूँ।
मातलि कालनेमि के वजन दुजय नामक दानवों का एक समूह है। मैंने से पहले उनके विषय में) मुना था। मातलि -
पुरिति अन्य किल ते सतत बजय्य लम् रणशिरसि तस्य निहन्ता स्मृत सप्तमप्ति मत् वैशम् तिमिरम् उच्छेतुम् न भवति तद् चन्द्र अपाकयेति ।
सकिन वह रामण वस्तु से मतको तुम्हारे मित्र इन्द्र के द्वारा अबजे (है) र रणशिरसि तुम (ही) युद्ध की अप्रभूमि मे [तर] निहन्ता स्मृत सिउसके मारने वाले माने गये हो। सप्तसप्तिसूय पदम् तिमिरम् रात्रिकालीन अन्धकार को उम् न प्रभवति नष्ट करने में समर्थ नहीं होता है, तत् चन्द्र अपाकरोति उसको चन्द्रमा नष्ट करता है।
अनुवाद दानवगण वस्तुत तुम्हारे मित्र इन्द्र के द्वारा अजेय (है) समरा भूमि में आप ही उसके मारने वाले माने गये है। खूब जिस रात्रिकालीन कार को नष्ट करने के लिये समर्थ नहीं होता है, उसको बन्द्रमा नष्ट करता है'

भावार्थ अपने आगमन का उद्देश्य बतलाता हुआ मातलि राजा से कहता है कि वह दानवगण वस्तुत तुम्हारे मिष इन्द्र के द्वारा नहीं जीता जा सकता, मत आप ही समर की अपभूमि मे उसके मारने वाले माने गये है। क्योकि जिस राि कालीन कार को नष्ट करने से समय नही होता, यह अन्धकार चन्द्रमा ही नष्ट करता है।
इस पद्य में मातलि का माषा और उसकी स्वामिभक्ति भी दी है, वह पद के प्रयोग द्वारा यद्यपि इन्द्र को राजा का मित्र बतलाता है तथापि वह इन्द्र की उपमासूम से देवर और राजा को पन्द्र से उपमित कर अपने स्वामी की छता प्रतिपादित करता है और मित्र की सहायता के लिये को प्रोत भी करता है, जो अपने मित्र से न हो सके उसे उसके मित्र को करना ही
चाहिये। विशेष प्रस्तुत पद्म मे दृष्टान्त अलकार है और प्रविण नामक छन्द है "पाशा नजरमा षिणीयम्" ।
संस्कृत व्याख्या दानवगण किलवस्तुतत दुष्यन्तस्य सख्यु मित्रस्य ततइन्द्रस्य रणशिरसि समरायभूमी, तस्य दानवगणस्य निहन्तापातक, स्मृखमत सप्तमप्तिसूय यत् नशम् तिमिरम्मत् रात्रिभवम् अन्धकारम् उच्छेत्तुम्== विनाशयितुम् न प्रभवति न समय जायते सनम चन्द्र अपाकरोति मिथु विनाशयति ।
सस्कृत सरलार्थ मातलि कथयति यस दानवगणी वस्तु तय मिषेण इन्द्रेणापि अजेयोऽस्ति स एव त्वमेव समरे सत्य विनाशक मतोऽसि । द्राभिव मन्धकारमपनेतु सूर्यो न भवति तन्देवापायिने, अतस्त्वत विनाश्य साहाय्य कुछ।
इष्टिपथुमार मारित इष्टिपशुवि मारित उपमा कम मुस्। पतितुष्टि इष्टिमृणिषु तदनुमुन्। कालनेमिप्रति कालनेमि एक राक्षस था जिसके अनेक सिर और हाथ थे, यह हिरण्यकशिपु का पुत्र था। इसके ही वज जय नामक errव से, दनु नामक दयापुत्री को सन्तान दानव कहे जाते हैं। पातु इन्द्र सौप करने वाला अधकारी होता यातु का अर्थ है अजय दायें से केव के स्थान पर निपातनात जन्म होता है। जेतु सय अन्य न जय्य अजय्य निहन्तानिह तृशम् निशा रात्रिभवम्। सप्तसप्तिराप्त गप्त यस्य सूप की सात रंग की किरणें उसके सप्त भाव माने गये है, का अर्थ- है। -
स इति मत अब आप अस्य लिये हुये ही इन्द्र के रथ पर चढ़कर विजय के लिये प्रस्थान कीजिये।


राजा अनुगृहीतोऽहमनया मधवत सभावनया अब माचव्यप्रति
भवता किमेव प्रयुक्तम्
मातलि तदपि कम्यते किचिनिमित्तादपि मन सन्ताषा दायुष्मान् मया विश्वो दृष्ट | पश्चात् कोपयितुमायुष्मन्त तथा कृतवानस्मि । -
कुत ज्वलति चलितेन्धनोऽग्नि विप्रकृत पद्मग फणा कुरुते । प्राय स्व महिमान शोभात् प्रतिपद्यते हि जन ॥३१॥
राजा इद्ध के इस सम्मान से में अनुगृहीत है किन्तु आपने माधव्य के प्रति ऐसा भावहार क्यों किया ?
माल वह भी बताता है किस कारणवश मानसिक सन्ताप से मैने आपकी देिखा था, उत्पान आपको क्रुद्ध करने के मैने किया था। क्योंकि
ज्योति अन्य अग्नि पतितेन्धन जनति, विकृत पच फा कुरुते हाय सोममहिमानम सम्वाद अग्नि पनि ज्वलति धर-उधर
हिला देने से जलता है। विकृत पत्रमा कुरुते दिये जाने पर रूप फन
को फैलाता है। हि जन प्राय सोमा इसी प्रकार मनुष्यप्राय उत्तेजित होने से,
स्व महिमान प्रतिपद्यते अपने पराप्राप्त करता है।
अनुवाद[सकडियो के हिसाब से अन्न जलता है देते से सब फल फैलाता है इसी प्रकार प्राय मनुष्य सक्षोभ से ही अपने पराक्रम को प्राप्त करता है।
भावार्थ-जिन प्रकार ईधन के उपर हिला से अम्मि जलने लगता है और छेने पर सफल उठाता है उसी प्रकार मनुष्यप्राय अपने भूले हुये पराक्रम को सक्षम से ही प्राप्त करता था।
विशेष—यहाँ भवान् के स्थान पर जन इस सामान्य का प्रयोग होने से प्रस्तुत प्रशसाकार तथा अति एक पत्र इन दो उपमानो के साथ प्रतिविम्बन के कारण दृष्टान्त अलकार है ते मतिर एक हा द्वारा निर्देश होने से प्रतिवस्तूपमाकार है, प्रसाद गुण, वैदर्भी रीति, आर्या जाति छन्द है।
संस्कृत याच्या पतितम् इन्धन यस्यासी नितेन इतस्ततो विपयान
काष्ठमन्निहि नतिदीप्यते विकृत कम संजित प
रूप, फणाम् कुरुते फटाटोप दशयति हिताहिप्राय
बाल्येन शोभा कुतश्चिदभिघातः प्राप्य स्वम् स्वकीयम्, महिमानम् प्रथत्वम्,
प्रताप, पराक्रम वा प्रतिपद्यतेासादयति ।
राजा - ( जनातिकम) वयस्य, अनतिक्रमणीया दिवस्पतेराज्ञा । तदत्र परिगतार्थ कृत्वा मवचनादमात्यपिशुन ब्रूहि ।
त्वम्मति केवला तावत् परिपालयतु प्रजा । अधियमिदमयस्मिन् कर्मणि व्यापूत धनु ॥३२॥
विदूषक - यद्भवानाज्ञापयति । [ज भव आणवेदि । ] (इति निष्क्रान्त ।) मातनि आयुष्मान् रथमारोहतु । (राजा रयाधिरोहण नाटयति ।) (इति निष्क्रान्ता सर्वे )
इति षष्ठोऽ
संस्कृत सरलार्थं यथा चलायमाने धनोऽग्निज्वलति ययाति प फटाटोप दमयति तथाहि जन प्रायेण वक्षोभ प्राप्य स्वभाव लभते ।
टिप्पणी
'वा बहुलम् सूत्र से विकल्पत मघवन का समय होता है अत एकवचन मेन और मत दोनों रूप बनते है सम्भवना आदर सम् भू+जि+थ्टा विक्सन सिन या व्याकुल प्रयुकम् ऐसा क्यों किया। को+म+ तुमुन् मा कुरुते फन फैलाता है, फण और फणा दोनों ही शब्द का प्रयोग होता है।
राजा - (एक ओर मुँह करके) मित्र, देवराज इन्द्र की आशा उतपनीय नहीं है। अत तुम इस समाचार से अवगत कराकर मेरी आज्ञा से मन्त्री पिशुन से
या वन्यति तावत् प्रजा परिपालयतु इदम् बधिज्यम् ध अन्यस्मिन् कमणि ( यावत्) व्याप्तम् ।
शब्दार्थ केवला त्यन्मति केवल तुम्हारी बुद्धि हो, तब तक प्रजा परिपालयतु प्रजाओ का पालन करे (पायजब तक कि इदम अधिज्यम् धनुयह प्रत्यया पढ़ा हुआ धनुष अन्यस्मिन् कर्मणि अन्य काम मे व्यापृतम् है।
अनुवाद केवल तुम्हारी बुद्धि ही तब तक प्रजाओ का पालन करे (जब
तक कि प्रत्यचा चढा हुआ मेरा यह धनुष जय काम मे सलग्न है।
माका राजा कहता है कि मित्र कि तुम मन्त्री पिन से कह दो कि जब तक मेरा यह प्रत्यान्चा चडा हुदा धनुष दानवगण के वध के काम मे सलग्न है तब तक केवल तुम्हारी अकेली बुद्धि ही प्रवाली का पालन करती रहे। मन्त्री की बुद्धि और राजा का धनुष यही दो प्रचारक होते हैं धनुष के अभाव मे मन्त्री की वृद्धि ही बजारक्षक रहेगी।
विशेष-काम्यलिङ्ग अलकार अनुष्टुप छन्द है। संस्कृत व्याख्या केवल एकाकिनी असहाया त्वमतिवदीया बुद्धि एवं तावत्मत्प्रत्यागमनकाल पातु प्रजा प्रजाजनान् परिपालयतु सरजतु, इदम् अधिज्यम् समारापितमयकम धनुकामुकम् (मावत्) अन्यस्मिन् कर्मणि दानववधरु अन्यस्मिन् कार्ये व्याप्तम् सम्नम् ।
संस्कृत सरलाच राजा पयति समापितवकम् इद कार्मुकम् दानरूपे अन्यस्मिन् कार्ये समस्ति तावत् त्वदीया बुद्धिरेव केवला जानवर |
दिवस्पते दिन पति तस्य 'सत्पुरुषे कृति बहुलम्' इति षष्ठ्या अ
परिगतार्थम् परिगत अवगत अर्थ येन तम केवल यह है कि राज्य और मन्त्री दोनों के परस्पर अनुकूल होने पर ही राज्य का रक्षण होता है, मन्त्री की बुद्धि और राजा का धनुष प्रजा की रक्षा करते हैं, धनुष के अभाव में केवल मन्त्री की बुद्धि ही राज्यसरक्षिका बनेगी कवि ने कहा है 'सदानुकूतेषु हि कुते रति नृपेष्यमात्येषु च सम्पद इससे राजगत उत्साह और शीय ध्वनित होता है। feree जो आप आज्ञा देते ह D
(यह कहकर प्रस्थान )
मातलि आप रथ पर चहिये।
(राजा रथ पर बढ़ने का अभिनय करता है)
( का प्रस्थान )

अथ सप्तमोऽङ्कः
(नेन रथाधिडो राजा मातलिश्च । ) राजा मातले, अनुष्ठितनिदेशोऽपि मघवत सत्क्रियाविशेषावनुपयुक्त-
मिवात्मान समर्थये ।
मातलि ( सस्मितम् ) आयुष्मन् उभयमप्यपरितोष समर्थये । प्रतिपत्या लघु मन्यते भवान् ।
गणपत्यवदानविस्मितो
भवत सोऽपि न सत्क्रियागुणान् ॥ १ ॥
अब सप्तमा प्रारम्भ
(इसके बाद रथ पर बैठे हुये राजा और मातलि का आकाशवान से प्रवेश)
राजमा (इन्द्र की आज्ञा का पालन कर देने वाला भी (मै) इन्द्र
के विशेष प्रकार के सरकार के कारण अपने आपको अनुपयुक्त सा मानता हूँ
यद्यपि मैंने इद्ध की आशा का पालन किया है तथापि उसके बदले जो उन्होंने मेरा विशेष
प्रकार का सम्मान किया है उससे मैं अपने को अनुपयुक्त सा समझता हूँ वर्षात् मुझे ऐसा प्रतीत होता है मैंने कुछ भी नहीं किया है। मातजि- ( मुस्कराहट के साथ) मै समझता हूँ कि आप दोनो ही...
तुष्ट है।
चमेति-अन्वय-भवान् मरुत्वतप्रतिपत्त्या कृतम् लघु मन्यते। सोऽपि  [ वस्मित क्रियागुणान् न गणयति ।
सदाभवाद आप दुष्यन्त मरत्यत प्रतिपत्या इन्द्र के गौरव के कारण, प्रथमोप अपने द्वारा किये गये पूत्र उपकार को लघु मन्यते तुच्छ समझते हैं। सोऽपि वह इन्द्र भी अनवस्मित आपके निस्वाच पराक्रम ( होकर) गुणान गणपति (अपने द्वारा किये गये सरकार महत्त्व को नहीं गिनता है।
अनुवाद आप इन्द्र के प्रति गौरव एव सागर भावना के कारण, (अपने द्वारा
किये गये) प्रथम उपकार को तुच्छ समझते है और वह इन्द्र भी आपके निस्वार्थ पराश्रम से विस्मित ( होकर) (अपने द्वारा किये गये आपके सत्कार के महत्व को नहीं गिनता है।
मावा मातनि कहता है, वस्तुत मै तो दोनो और ही असन्तोष देखता हूँ, क्योंकि आप इन्द्र के प्रति विशेष आदर रखते हैं जो आपने दानवगण का वध केन्द्रका उपकार किया है उसे आप तुच्छ समझते हैं, इसलिये तो आपको असन्तोष है और उधर भी आपने जो स्वभाव से पराक्रम दिलाकर का वध किया है इससे इन्द्र विस्मित हो गया है अतएव अपने उन सत्कार के महाव को जो कि उसने आपके प्रति दिखलाया है, कुछ नहीं समझता है, इस प्रकार इन्द्र को भीतोष ही है। इन्द्र का आदरण आपके काम के बागेछ है और इन्द्र के प्रति आदर भावना के कारण आपका उनके लिये किया गया काय आपको लगता है, इस प्रकार दोनो ही और अता है ।
विशेष—यहा सत्क्रिया कारण के रहते भी गणना रूप काय की अनुत्पत्तिविशेष अलकार है। गणनाभाव रूप काय की उत्पत्ति है पर इस भाव का कारण नहीं है अत विभावना जलकार है और दोनों में सन्देह सफर है। त्यनुप्रास, सुन्दरी नामक छन्द "अयुजो यदि सौ मी पुजा समराती यदि मुन्दरी मठा"
यहाँ से लेकर अ की समाप्ति तक सन्धि है तो सुखाच  एकापनीयन्ते य हण हि तत्" सा० द० अथवा मुखपत्र की योजता महाप्रयोजन यान्ति तणमुष्यते । सुधाकर वा स्थान निर्देश किया गया है। यहाँ पर शकुन्तला प्राप्तिस काय अय प्रवृति है-यदादिकास्तु सम्प्र प्रयुज्यते तव समारम्भ तत्कार्य कभ्यते इति दुष्यन्त को पुत्र के साथ पत्नी की प्राप्ति होती है मत फलागम नामक कार्यावस्था है "अभिप्रेत समर्थ च प्रतिक्रिया- फलम् इति तस्मिन् कनयोग कयते किन्तु आवाय विश्वनाथ ने सकुन्तला के अभिज्ञान के उपरान्त समाप्ति प्रयन्त निवहन सन्धि मानी है।
सरकून व्याख्या[[[भवान् दुष्यन्तइन्द्रस्य प्रतिपत्या गौरवेण प्रथम-पूर्व उपरथमो छन् मन्यते जानाति सोऽपि इन्द्रोऽपि भवतत दुष्यन्तस्य अवदानेन नि स्वायपराक्रमेण विस्मित अजदानविस्मित सत्याया सत्कारस्य गुणाद विनयादि प्रदर्शनस्य महत्व सत्यनाराणयतिन चिन्तयति।
संस्कृत सरलार्थ उभयमप्यपरितोष समयये" इति स्वकीय सम मातलि स्यति यद्भवान् मनी गौरवेण आत्मकृत दानववधरुप कार्यसाधनात्मक कृत उपकार हुन्छ जानाति इन्द्रोऽपि भवत निस्वायपराक्रमेण सत्कारत्वम् न विशेषेण विन्तयति।


राजा-मातले मा मैवम्। स खलु मनोरमानामप्यभूमिविसर्जनाव- सरसत्कार । मम हि दिवौकसा समक्षमर्धासनोपवेशितस्य- आमृष्टवक्षोहरिचन्दनाका मन्दारमाला हरिणा पिनद्धा ||२||
अन्तर्गतप्रापनमन्तिकस्य जयन्त मुद्दीयय कुतस्मितेन ।
-प्रति+ मवत्थत मस्त सन्त्यस्येति महत्वा तस्य मरुद वायु देवताओं का नाम है, वृत्रासुरबध मे मे इन्द्र के सहायक थे व इन्द्र को भी महत्वान कहा जाता है। प्रथमोपफत दानव रूप पहले किये गये उपकार को प्रतिपस्या- पदति प्रतिपत्तिगौरव आदरभावना तथा अवदान विस्मित अवदान - विशुद्ध कमनि स्वाय सेवा, अयदे (दा) पराक्रमोऽवदान स्यात्" मातलि के इस कथन से दुष्यन्तगत पराक्रम तथा गुणग्राहकता ध्वनित होती है। जो कि नायक के अदाय को प्रकाशित करती है।
टिप्पणी
राजा हे मातलि नहीं ऐसा न कहो मेरी विदाई के समय का (उनके द्वारा किया गया) सत्कार, आशातीत अथवा कल्पना से भी परे की वस्तु भी कि के सामने ही मुझे अपने आधे आसन पर बिठा कर
अन्तयतेति अन्वय अन्तिकस्यम् अन्तगतप्रायनम् जयन्तम् उदय भूत- स्मितेन हरिणा मुष्टवक्षोहरिचन्वना का मन्दारमाला पिना
गया— अन्तिकस्य समीप मे स्थित अन्तगतप्रायनम मन ही मन (मन्दार माता) के प्रार्थी जयन्तमजयन्त नामक अपने पुत्र को उद्घीक्ष्य देख करके, कुतस्मितेन कुछ मुस्कराकर हरिया इन्द्र ने मृष्टवचन्द नाका वक्ष स्थल पर लगे हुये हरिचन्दन से चिह्नित मन्दारमा मन्दार वृक्ष के पुष्पों की माला को (मुझे) पिनद्धा पहना दी।
अनुवाद समीप ने ही स्थित मन ही मन (मन्दार मामा के लिये) प्राची अपने पुत्र जयन्त को देखकर मुस्करा कर इन्द्र ने वक्ष स्थल पर लिप्त हरिचन्दन से चिह्नित मन्दारपुष्पी की माला को (मुझे पहना दिया था।
भावाथ त सत्कार को कल्पनातीत लाते हुये दुष्यन्तमालि से कहते हैं कि पास ही में सड़े हुये और मदार माला को पाने के लिये इच्छुक भी अपने पुत्र जयन्त की और देश करके इन्द्र ने उस माला की जोकि उनके वक्षस्थल पर लगे हुये हरिचन्दनस चिह्नित भी जयन्त को न देकर इन्द्र ने मुझे पहना दी थी। चातु अपने सामने स्थित देवताओं और अपने पुत्र जयन्त की भी उपेक्षा कर इन्द्र ने मन्दार माला को मेरे गले में डाल दिया था, यह मेरा कल्पनातीत सत्कार था।
विशेष गौरवाधिन का वर्णन होने से उदात्ताकार तथा कई वि प्राय होने से परिकराकार ऐक वृत्ति अनुप्रास, उपजाति नामक छन्द है। पिडा-पद से स्पष्ट है कि राजा ने माला दो नही अपितु अपने हाथो से उनके गले पहना दी, इससे उनका सम्मानातिमय प्रकाशित होता है। तस्मितेन से प्रकट होता है कि जयन्त की भी अपेक्षा दुष्यन्त अधिक स्नेह पात्र होंगे जयन्त के मनोगत भाव जान कर भी वह माला उन्हें नदी थी।
संस्कृतव्याडमा अन्तिकस्थमसमीपस्थितम् अन्तर्गत प्राथना स्तम् अन्तगतप्रायनम मनोगतमन्दारमानाभावालिनम् जयन्तम एतशामक स्वकीय पुत्रम्, उद्वीक्ष्य अवलोक्य severe सम्पात्येत्यच कृत स्मित पेन तेन कुस्मितेन कृतमन्दहासेन, हरिणा इन्द्रेण, आमृष्ट लिष्ट यद् बक्षसि चन्दनम तस्य अक चिह्न यस्या सामामृष्टवक्षोहरिचन्दना का मन्दारमाना मका पिता स्वहस्ताभ्यामेव मदुरसि परिक्षापिता ।
सस्कृत सरलाब - समीपस्थित मनोगतमन्दारमालाविताषशालिन स्वकीय पुष मन्दहासेनेन्द्रेण अनुलिप्तनोहरि पनचिह्निता मन्दार माला दुरसि स्वहस्ताभ्यामेव परिचापिता एतेन ज्ञायते ततोऽय सत्कार कल्पनातीतो बतते ।
अभूमि अपार अर्थात् तक किसी को भी न पहुँच सके। हियोकसाम्यो लोक गृह देषान्ते तेषाम् स्वयं मे रहने वाले अर्धासनोपदेशितस्य- ओके के न पर बैठना बड़े गौरव की बात थी, इससे दुष्या का देवताओं से अधिक आदर सूचित होता है, इसीलिये दुष्यन्त इस बात को अधिक महत्व दे रहा था जो ऊपर देखकर इससे ज्ञात होता है कि जयन्त नीचे उसे देखा और उसकी अन्तगत अभिलाषा को भी जान लिया था तथापि उन्होने अपनी माता उसे न देकर दुष्यन्त के प्रति आदर प्रकट करने के लिये उनके गले मे डाल दी थी। मासृष्ट का अर्थ पुछा हुआ भी है माता से हरिद छगया था अतएव वह मिति हो गई थी, पर मैंने प्रगत इसका अर्थ अनुलिप्त लिया है, के म स्थल पर चन्दन का लेप या इससे माला मे बदन लग गया था। इन्द्र को इस चन्दन के वृक्ष का चन्दन अधिक प्रिय होगा अतएव उसे हरिचन्दन कहा गया है, वैसे हरिचन्दन आदि कई देव दर है। हरिचन एक प्रकार का लेप होता था जो कि तुलसी, अगर, बेसर, कपूर आदि को विसे हुये चन्दन मे मिलाकर बनाया जाता था। मन्दार नामक एक देव है यह माला इसी के पुष्पो से बनी थी अतएव यह मन्दारमाला कही जाती थी। मन्दार, पारिजात कल्पवृक्ष सन्तान हरिचन्दन ये पाँच देव प्रसिद्ध है। पिनद्धा अपि नह + टापू भारिमत में अ] का लोप होता है।
सप्तमोऽ
मालि – किमिव नामायुष्मानमरेश्वराशार्हति ? प सुखपरस्य हरे रुभये त
विदितदानयकटकम् | वरना भ
पुरणच पुरा म ॥३॥
= शब्दाय-अधुना इस समय नमभिपाठी पर से हुये तय आपके परे वाणी के द्वारा पुरा और प्राचीन काल में पदमि गाँठ पर से मुझे हुये पुरुषकेसरिण भगवानद्वारा इन दोनों के द्वारा, सुखपरस्य सदा बोगी में आस रहने वाले हरेइ के, त्रिदिवम्को, उदानाय कर दिया गया है।
माता आप देवराज से क्या पाने योग्य नहीं है अर्थात् सब कुछ पाने योग्य है देखिये---
अन्य अनापयमि तव शरै पुरा च नतपवधि पुरुषकेसरिण न उभ मुखपरस्य हरे त्रिविमतदान कृतम् ।
अनुवाद इस समय तो गाँठो पर से हुए वाणी के द्वारा और प्राचीन काल में गांठ पर से मुझे हुए महाहार भगवान के द्वारा इन दोनो ही के द्वारा में रहने वाले के को दानव काटो से रहित कर दिया गया है।
मावा मान कहता है कि इन्द्र तो सदा सुखोपभोग में जिरहने वाला उसके स्वग की रक्षा दामन रूपी फोटो को उखाड कर इस समय आपके बागा द्वारा की गई है, और इस प्रकारका में हितार भगवान के नशों के द्वारा हिरण्य को मारकर की गई
विशेष प्रस्तुत पद्य में 'तम्' इस एक पिया से प्रस्तुत बाणों और अप्रस्तुत  गया है अत [ अलकार है, इतविलम्बित नामक है।
संस्कृत व्याख्यान तानि समातिनिर्माण स येषान् तव दुष्यतस्य शरेया पुरा प्राचीन काले च जवान ईषदातानि पर्याणि अभिषाप पुरवासी केसरी च तस्य पुरुषकेसरिण भगवत सिंहस्य ननइति उस एन [] [पर] [ [रास्यमुखपरस्य मुहरे इन्स्य दियउता उत्तानाष्टक व परमात्तद्दानव poren सम्मूतिदानकृतम्-विहितम् ।

= उभयस्य द्विवचन नास्तीति वटा अस्तीति हरदत्त द्वितीयमतमेव भाष्यसम्मतम । त्रिदिवम् अमरकोश के अनुसार यह शब्द पुल्लिंग है दि धातोति तरि क "जिद व जिदिया नया इसके अनुसार नपुसकलिङ्ग भी तृतीय for free seen we दीव्यति परिमन् तत् त्रिदिवम्।" जहाँ सदा सुख ही रहता है। पुरुषकेसरिणस्य यह विष्णू काच अवतार है, जिसमें उन्होने हिरण्यक कान से किया था नतपर्वभिमतया गाँठ
राजा खलु ततोरेव महिमा स्तुत्य । म्रियन्त कर्मसु महत्स्वपि पत्रियोज्या
सभावनागुणमवेहि तमीश्वराणाम् । फि वाऽभविष्यदरुणस्तमता बिभेत्ता तत् सहस्रकिरणो निरिष्यत् ॥
संस्कृत सरलामा कति बोगसत्यमन्द्रस्य शिवि मनात मारे विनाश्य रक्षितम् एवमेव पुरा हिस्से हिरण्यकशिपु विनाश्य संरक्षितम ।
टिप्पणी
राजा इस विषय मे तो वस्तु की ही महिमा है। सिकयन्तीति जन्दार महत् अपि कम नियोक्या सिध्यन्ति (इति) पद तम् ईश्वराणाम् सम्भावना कि वा अरुण तमाम विजेता अभविष्यत सहस्रकिरण सरिन अकरिष्यत् ।
सम्मान महामु कगमु [नियोज्या सिध्यन्ति यत् बडे-बडे भी कामो मे सेवक जन जो हफन हो जाते हैं, तम् ईस्वराणाम् सम्भावनागुणम् अनेहि उसको (आप उनके स्वामियों के गौरव प्रदान का ही फल समझे कि क्या अरण = अरुण सूप सारथि तमसा विभेत्ता अन्धकारों का नाशक, अभविष्यत् हो सकता था, तू नगर, सहकिरण सहसरमिक र अभाग मे, न अकरिष्यतुन किमी होता ।
अनुवाद भी कार्यों मे जो रोवक जन सफल हो जाते हैं, उसे (आप) सामय्यवान् स्वामियों का (उन्हें गौरव प्रदान का ही फल समझे ना कार का हुआ होता यदि उसको (अपने रथ के भाग न नियुक्त किया होता।.
भावार्थ-अरुण, सूप का सारथी कहलाता है अपन उनके रथ पर आगे बैठ कर चलता है सूप से भी पहले होता है. अरुणोदय होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है, इसी प्राकतिक उदाहरण को लेकर राजा कहता है कि बड़े-बड़े डू साध्य कार्यों मे भी यदि सेवक जन सफलता प्राप्त कर लेते है तो इसे उनके स्वामियो का
सस्कृत व्याख्या महत्तु गुरुतरे, अनि कमकार्येषु निपोक्त वम्या नियोज्या सेवकजना सिध्यन्ति फलमनोरा जातियत् तम् ईश्वरा गाम् = सामध्यवता स्वामिनाम् सम्भावनागुणम् गौरवप्रदानमहत्व बह== जानीहि (सम्भावना वासनाया गौरवस्यानकमणीति कोश) कि वा किमिति, अरुण = सूर्यसारथि तमसामु अन्धकाराणाम् विभेत्ताविनाशक बमविष्यत् बेद यदि सहस्रकिरणसूप तम् अरुणम् धुरि स्वरपत्यामागे न क रिददन] अयोजयिष्यत् ।
उन्हें गौरव प्रदान का ही फल समझना चाहिये, यदि सूप ने अरुण को अपने रथ के आगे न लगाया होता तो वह कार विभागक नही कहा जा सकता था, सूप द्वारा अपने सेवक अरुण को अपने आगे प्रतिष्ठित कर गौरव देने का ही यह फल है कि वह अन्धकारनाशक बन सका है। दुष्यन्त का अभिप्राय यह है कि यदि मैं दानवों का वध कर सका हूँ तो इसे इन्द्र द्वारा मुझे प्रदत्त गौरव का ही फल समझना चाहिये।
विशेष- यहाँ अप्रस्तुत नियोज्य सामान्य से प्रस्तुत राजा-रूप विशेष की प्रतीति होती है अतस्तु प्रशसामकार है तथा पूर्वाध सामान्य द्वारा उत्तराविशेष का समवन होने से अर्थान्तरन्यास अनकार है। इससे यहा राजन्त भूत्यत्व और इन्द्र गत स्वामित्व ध्वनित होता है एवं विनयातिशय द्योतक होने में यहाँ उदात्तासकार भी पम्प है। कुछ आचायों ने यहां उत्तराध मे कार भी माना है। अनुप्रास इन्द्रferre रति भाग वसन्ततिलका छन्द है।
संस्कृत सरलाब--- राजा रुपयति-सेवकाना व दुस्तरेष्वपि कार्येषु साफल्य स्वामिमानेन जायते न हित वा कवि गुण कारणम्। अरुणस्यान्धकारविभेदे न सहजा क्ति सा तस्मिन् स्वामिप्रदत्तगौरवेणैव समुदभूयते दुष्यन्तस्यायमभिप्राय यद देवराज तुम पराक्रमेणेति स्तम्वा महिमा स्तुत्य न में गुण ।
टिप्पणी
——इसका तात्पय है कि दानवों पर प्राप्त मेरी विजय के विषय मे नियोज्या निरोक्त योग्या इत्यर्थे नि पुज्यनियोक्य सेवक, पर यहाँ इसका वय अधीनस्थ जन है। सम्भावनाधम् सम् भूमिवि भावे पुष् टप् सम्भावना तथा गुणस्तम् सम्भावन क्रियासु योग्यताध्यवसान किसी से किसी बड़े काम को कर लेने की सम्भावना या बागा करना, कि वह इस काम को अवश्य कर लेगा। अत सम्भावना का अर्थ होता है किसी को बड़े काम मे सफलता मिलने पर गौरव प्रदान करना, गुग का अर्थ यहाँ महत्व या फल है। इसी भाव को द्योतित करने वाली ये सियाँ भी "तानुभावोऽयमवेदि यन्मया निमूढतत्व नयवरम विद्विषाम्" किरात "सव प्रसादान् कुसुमायुधोऽपि सहायक मधुमेवा" कुमार ननु दचिग एवं जीयमेतद् विजयन्ते द्विपदो यदस्य पक्ष्या "विक्रमो० अरुणो पदधतमस निषेधति स्फुरित नराधिप तदतेजसाम्। नव साहसहरू किरण. -
मातलि. सद्धमेतत् (स्तोकमन्तरमतीत्य ) आयुष्मन् इत पश्य
नाकपृष्ठप्रतिष्ठितस्य सौभाग्यमात्मस । विचिन्त्य गीतक्षममर्थजातचरित लिखन्ति ॥५॥
विच्छितिशेषं सुरसुन्दरीणा
वर्णरमी कल्पलताशुकेषु ।
सहखरश्मि सूप, सहस का यह है विनेाविमिदं करि तुम् स्तुत्यस्तु स्तुति करने योग्य
मातलि यह आपके अनुकूल ही है (थोड़ी दूर आगे चलकर ) मायुष्मन् आप स्वलोक मे प्रतिष्टित अपनी कीर्ति के सौभाग्य को देखें-- विच्छितीति अभी दिवस नीलमम् अर्थात विचिन्त्य सुरसुन्दरीणाम् विच्छित्तिशेष व कल्पलताशुकेषु त्वच्चरितम् निमन्ति । शब्दार्थ-अमी दिनोस देवता, गीतगमगाने योग्य, अर्थजातमु सायक पदावली को अथवा भाव समूह को विचिप सोन करके, सुरसुन्दरीणाम् देवसुन्दरियो के (देवना गनाओ के नहीं विच्छित्तिवेध अमरादि से बचे हुये, वर्णे रज्जन के साधनभूत रक्त पीतादि को रंगो से कल्पलतामुकेषु कल्पलता से उत्पन्न पर सम्आिपके जीवन चरित्र को लिि मिलते हैं।
अनुवाद पुर स्थित देवता गाने योग्य भावपूर्ण सार्थक पदावली को सोनकर, देवसुन्दरियों के अगरागादि बचे हुये रंगो से कल्पलता से उत्पन्न कौशेय वस्त्रो पर आपका चरित लिखते हैं।
भावार्थ मातलि कहता है कि राजद स्वगलोक में आपका यश फैला हुआ है  सामने स्थित देवगण, काव्यमयी भावपूर्ण सापक पदावली को सोचकर, सुरसुन्दरियों के अमराग से बचे हुये रंगो से कल्पलता से प्राप्त कौशेय बस्शे पर आपका परित लिख रहे हैं।
विशेष- यहाँ विच्छित्तिमेष अगराग का जिसने मे उपयोग किया गया है बत परिणामालकार है। यहा लिखने वाले भी विशिष्ट हैं चरित मी विशिष्ट आधार और लेखन साधन सामग्री भी है अतालकार है, और इससे देवताओ की सदा गारोपभोग योग्य स्थिति आपके पारित के कारण ही बनी रहती है, यह वस्तु ध्वनित होती है, अत यहाँ अरकार से वस्तुध्वनि है। श्रुति वृद्धि अनुप्रास, प्रसाद, वैदर्भी रीति दुष्मन्त का पराक्रम और यश ध्वनित होता है, उपजाति नामक छन्द है।
संस्कृत व्याख्या अभी पूरे दृश्यमाना दिवौकस देवा, गौतमम्= गीतियोग्यम्, जयंजातम् भावसमूहम् सायपदावली वा विभिन्त्वविचार्य, =

- राजा मातले असुरसप्रहारोत्सुकेन पूर्वेयुविवमधिरोहता मया न ति स्वर्गमार्ग । कतमस्मिन् मरता पथि वर्तामहे ? मातलि
त्रिोतस वहति यो गगनप्रतिष्ठा
ज्योतींषि वर्तयति च प्रविभक्तरश्मि । तस्य द्वितीयरिविक्रमनिस्तमस्क वायोरिम परिवहस्य वदन्ति मार्गम् ॥६॥
सुरसुन्दरीणाम् देना बनाना विधिस्था मगरागात् शेर्पा अशिष् विशेष वर्ण व रा था. कल्पलता कल्पलतोत्परमेषु
स्वरितम् त्वदीय जीवनचरितम् निसन्ति । सामानि कथयति राव अभी देवाय भावसमूह विचिन्त्य सुरसुन्दरीणाम् अव कत्यलोपत्रेषु जीवनचरित
लिन्ति।
माकपृष्ठ स्वर्ग लोक प्रतिष्ठित व्याप्त वितीय सौभाग्यम् महत्व जयना गौरव का मुख्याथ है, काटना, छाँटना, संभालना निवादि रचना यहाँ इसका अर्थ है काटछांट कर बेल बूटे बनाना, चित्र में रंगो के द्वारा बेल झूठे बनाये जाते है, स्त्रियाँ मेहदी से अपने हाथ पैरो पर बेस पतियों आदि बनाती हैं. यह सब रगो द्वारा की जाने वाली शारीरिक रचना विच्छित्ति कही जाती है। [देव] सुन्दरियाँ जो राग गाती थी उससे जो अमरान बच रहता था उसी रन से देवता दुष्यन्त के पति को लिखते थे। कल्पलतागु केषु का अब वस्त्र होता है कल्पवृक्ष सभी युवतीमण्डन प्रदान किया करता है, कालिदास की ऐसी मान्यता है। मका अर्थ कल्पता के अर्थात् "वस्त्ररूप पल्लवा पर" भी हो सकता है, यह भी अनुकूल ठीक है।
वातदिवस असुरो पर प्रहार करने के लिये उत्सुक मेरे द्वारा स्वर्ग पर चढते हुये स्वयं का माग नही देखा गया था (अत अब आप बतलाइये कि इस समय हम लोग वायु के किस मार्ग में चल रहे हैं।
मातलि-
समितिअन्य गगनप्रतिष्ठाम् त्रिस्रोतसम् वहति प्रविभक्त- ज्योतींषि यति च तस्य परिवहस्य वायो द्वितीयहरिविक्रमस्तिस्कम् इममागम्वदन्ति ।
दो गगन प्रतिष्ठा आकाश मे प्रतिष्ठित अ पार्क में रहने वाली मिलता को बद्धिधारण करता है। वित रमितो अपनी वायु रूपी किरणों को चारो ओर फैला देने वाला, ज्योतींषि

सप्तमा
यति को यथा स्थान घुमाता है। तस्य परिवहस्य बाबी उस परिवह नामक वायु का द्वितीय हरिविक्रमनिस्तमस्कम् (वामन रूपधारी) विष्णु के द्वितीय पदन्यास से पवित्र इस मार्ग वदति यह मार्ग कहा जाता है।
अनुवाद- जो मन्तरिक्ष नाग में बहने वाली मन्दाकिनी नाममा को धारण करता है और जो अपनी वायुरूप किरणो को चतुर्दिक प्रसारित करके नक्ष कोथा स्थान घुमाता है, उस परिवह नामक वायु का (वामन रूपधारी) विष्णु के द्वितीय पादस्यास से पवित्र, यह माग कहा जाता है।
भावार्थ यह परिवह नामक वायु का मार्ग है जो कि वामनावतार में विष्णु के द्वितीय पादनिक्षेप से पवित्र कर दिया गया है, यही मार्ग अन्तरिक्षगामिनी मन्दा-  नाम को धारण करता है अर्थात् इसी वायु माग मे मन्दाकिनी प्रवाहित होती है, और यही माग अपनी वायुरूप किरणों को चारो ओर फैलाता है और इस प्रकार यह नक्षी को कथा स्थान घुमाता है।
विशेष विशिष्ट नगन के कारण यहाँ उदात्तालकार है, अनुप्रास तथा वसन्त- तिलका छन्द है।
संस्कृत व्याख्या परिवहनामको वायु गगनप्रतिष्ठामू अन्तरिक्षमार्ग- गामिनीम्, स्रोतसम्= आकाश-गड ग्राम मदानीत्याख्याता वहति धारयति । प्रवक्ता समन्ततो विस्तृता समय वायुपा किरणा येन स प्रविभक्तारश्मि सन् ज्योतीष नक्षत्राणि यतयति ष यथास्थान प्रमयति च तस्य परिवहस्य परिनामकस्य बायोपचनस्य द्वितीयेन हरे वामनरूपधारिण विजयी विक्रमेण पादन्यासेन विस्तस्कम्, पवित्रीकृतम् द्वितीयरिविक्रमस्तिम मागम् वदन्ति एत पन्थानम् कथयन्ति । E
सस्कृत सरतार्थ भयमस्ति परिहास्यस्य वायो मांग द्वितीयेन वामन पधारिणो विष्णो पादन्या से नपवित्रीकृतोऽस्ति । अयमेव वायु मन्दाकिनीतिव्याच्यातास् अन्तरिक्षमा गगामिनी वगा धारयति एवम् स्वकीवान् वायुरूपकरणान् समन्तत प्रसाय नक्षत्राणि यथास्थान धमयति ।
असुर-असुरं दुर्जयाख्य दानवे सह सहारे पुढे उत्सुक औत्सुक्याभिभूत स्तेन । गुरा अमृतम् अस्यास्तीत्ययं मत्य अधि सुर देव न सुर नर अमृत पान करने वाले देवता तथा इनसे रहित असुर कहे जाते हैंत्य दानव राक्षस आदि सब असुर कहलाते हैं। हारम्+इ+ पत्र समहरन्ति अस्मिमिति सप्रहार युद्ध अनीस इत्यादिना निपातनात् पूर्वेद्य गत दिवस कतमस्मिन् सिमा है, यह माग किस वायु का है, अर्थात् सात में से यह माग किस वायु का है, कुछ प्रतियों में कतरस्मि' पाठ प प्रसग में वह ठीक नहीं, क्योंकि यहाँ सात में से एक का निर्धारण करना है अत तम शब्द का ही प्रयोग होना चाहिये कतरतु का नहीं मस्ताम् पथि आवह, प्रह

राजा-मातले अल खलु सवाान्त करणो ममान्तरात्मा प्रसीदति ।
(रमामवलोक्य) मेघपदवीमती स्व ।
मातलि कथमवगम्यते १ गतमुपरि बनाना वारिगर्भोदराणा, पिशुनयति रथस्ते शोकरक्लिनेमि ॥७॥
राजा अयमरविवरेभ्यश्चातर्कनिपतद्भि-
हरिभिररिभासा तेजसा चानुलिप्तं ।
उदय, गरिव, पराव, नाम के सात वायु है हिन्दू गास्त्रो की मान्यता के अनुसार अन्तरिक्ष सात भागो मे विभा किया गया है. प्रत्येक भाग एक एक वायु के अधिकार में है। कहा किस नाम का वायु है इसका विवरण सिद्धान्त शिरोमणि ने इस प्रकार है। पृथिवी से unvene आव नामक वायु है। सूक्ष्म प्रह नामक वायु में है। चन्द्र सय वायु से नक्षत्र वह वायु में यह विवहाक बा मे मिल परिवहनाकवा से परावह नामक वायु में है। ब्रह्माण्डपुराण में भी इन agar at नाम उल्लेख है पर नामो के म मे कुछ अन्तर है महाभारत और वायु पुराण में भी इनका उल्लेख है। परिवह नामक बाबु मे सप्तर्षि और काम गया है जिसका यहाँ वणन fear गया है frsोसम्बीगि स्रोतासि यथा ताम्गगा की तीन धारायें हैं, एक सरकाव में जिसे कान गना या साकिनी कहा जाता है। पृथ्वी पर जिसे भागीरथी तथा तीसरी पाताल में जिसे भगवती कहा जाता हैण्डपुराण और वायु पुराण से भी यह प्रमाणित होता है कि मन्दाकिनी और सप्तम परिवह नामक बायु के अतर्गत है "सप्तमगा पष्ठ परिवहस्तया" श्रेष्ठ परिवो नाम देषा वायु रपाय योऽसौ विभर्ति भगवान् गगामाकाशगोचराम्" ।
ज्योतींषि-नक्षत्र यहा तात्पय राजा मण्डल से है, क्योंकि ये परिवह नामक वायु से आते है। द्वितीय-हिरण्यकशिपु के बलि को मारने के लिये विष्णु ने वामन अवतार धारण किया था, उन्होंने तीन पैर पृथ्वी मांग कर तीनों लोकों को तीन पैर से नाम लिया या द्वितीय पैर से आकाश को अतएव दह पवित्र हो गया था इसी का यहाँ पौराणिक कथामों के आधार पर समेत है, वामन सम्बन्धी पौराणिक पायें वैदिक या का विकृत रूप ही है, वस्तुत यहाँ विष्णु से तात्पय सय से है उनके उदय, मध्य और अस्त रूप तीन पैर है जिनसे में तीनो लोको को नाम लेते हैं। •
राजा मातलि इसीलिये मेरी अन्तरात्मा बाह्य एवं सन्त इन्द्रियो सहित प्रसन्न हो रही है (वाह्य इन्द्रिया आदि दद्रियाँ अन्तन्द्रियमन, बुद्धि, चित्त अहकार) (रथ के पहिये को देखकर) जब हम दोनो मेघ माग पर उतर आये है।
मातलि आपको यह कैसे ज्ञात होता है।
राजा- जयमिति अन्य कर अरविवरेय निष्पत
= E शब्दार्थ मीकरमिजसकरणो से भीगे हुये पक के प्रान्तभाग वाला यह आपका र अदिवरेभ्यपड़ियों के बीच के बड़ो के छिट्टो से निपतदिचातयातको से अभिरभावा और जिससे हरिभिजित घोटो से पारिव दराणाणु धनानाम् उपरि भीतर जन से भरे मेषों के ऊपर पत विशुनपति (हम योगो के चलने को सूचित कर रहा है।
चातकै अरिभासा तेजसा अनुलिप्त हरिभि प पारिभदराणाम् धनानाम् उपरि गतम् पिनयति ।
अनुवाद-जल कणो से भीगे हुये प्रान्त भाग वाला यह आपका र अरो के छिद्रों से निकलते हुये जातको के द्वारा वलियों के तेज से रञ्जित अव के द्वारा जल पूग मेघों के ऊपर (हम लोगों के मलने को सूचित कर रहा है।
राजा मान रहा है, इस हमलोग जल से भरे हु मेथी के मार्ग पर चल रहे है, क्योंकि परम के पहियों के प्रान्त भाग भीग गये है, तथा रम के अरो के छिट्टो से भातक पक्षी निकल रहे हैं तथा बिजलियों के तेज से आपके रथ के घोडे रन्जित हो रहे हैं।
विशेष-पूर्वाध मे मेषमार्ग सूचन के प्रति दो कारण बतलाये गये हैं अत समुचयासकार शीकर क्लिन्ननेमि मे का कारण है अत काव्यलिङ्ग कतार मेघ पर गमन का अनेक हेतुओं से अनुमान किया गया है अत अनुमानालार है। वृत्ति अनुप्रास प्रसाद गुण वैदर्भी रीति, मालिनी नामक छन्द है।
[दस्य होकर क्लिनेमि अयम् एव ते तव र स्यन्दना छिद्रेभ्य रविवरेभ्य निष्यतमि निगच्छामि घातक चातकाख्यपक्षिविशेष अविरत wre प्रकाशा मासा ता तासामू -- अचिरभासाम् विद्युताम् [तेजसा कान्या अनुलिप्तैरश्विर्त हरिषि- अश्वे च वारिणमणि जलपूरितानि उदराणि अभ्यन्तराणि येषा तेषाम् पारिगम- दराणाम्, पनानाम् [मेवानाम् उपरि भागे, गतम् अस्मद्गमनम् पिशुनयति सूचयति ।
संस्कृत सरनार्थ राजा मातलि कपयति वदता आना [जनपूरितमेषपदवी- मीणों व पती हि तब रयस्य पकप्रान्तभागा जलेना सन्ति चातकपक्षिण तन रथस्य रविवरेय निष्यतन्ति तब रामा विद्युत्कानया रञ्जिता सन्ति, एतला पावानिदानी जलपरिपूणमेषमार्गे गच्छन ।
टिप्पणी
सवा बाह्यानि वन्त करणानि च सह करण का अर्थ इन्द्रिय होता है. १० पाच कर्मेन्द्रिय पाच ज्ञानेन्द्रिय) बाह्य इन्द्रियाँ तथा चार अन्त इन्द्रियाँ मन
- मातलि क्षणादायुष्मात् स्वाधिकारभूमौ वर्तिष्यते । राजा - (अधोऽवलोक्य) बेगाववतरणावाश्चर्यदर्शन सलक्ष्यते
मनुष्यलोक । तथा हि-
नामवरोहतीय शिखरादुन्मज्जता मेदिनी, पर्णाभ्यन्तरलीनता विहति स्यात् पादपा । सन्तानस्तनु भावनष्टसलिला व्यक्ति भजन्यापा केनाप्युपतेव पश्य भुवन मत्पाश्वमानीयते ॥
बुद्धि वित्त, अहकार "होती है। प्रसीदतिप्रसद् तद् प्रसन्न होती है।  पृथ्वी से मेषो तक के अवकाश में जय नामक भूषायु रहता है, यहीं पदवी है। भास्कराचाय ने कहा है कि पृथवी के बारह बाहर योजना तक भूवायु रहता है हाँ विद्युत् मेघ आदि रहते हैं "भूमेवहि इदिसयोजनानि भूवारा- [[म्बुविदाद्यम् अवती-जब तु+क, परिवहु नामक वायु के नीचे भावह वायुमाग तक उतर आये है। अरविवरेश्व पहियों के बीच में तिरछे दूर-दूर लगे ये कहलाते है, इन्हीं के बीच के अवकाश को विवर कहा गया है। अधिमासाम् बिजली का प्रकाश क्षणस्वामी होता है a fart को अचिरभास कहा जाता गतमगमन, भावेरियमदराणामारिषान्तानि बारिगर्माणि तामानि उदराणि येषा तेषाम् पिशुनपति-पिशुन वि
मातलि क्षण भर मे ही आप अपनी अधिकार भूमि में पहुँच जायेंगे। राजा (सीचे देखकर) मेग से उतरने के कारण मनुष्य सा दिवस पर रहा है। क्योकि
सानामिति — अन्य मेदिनी उन्मन्गताम् नाम शिखरा अबरोहति इस पापा स्कन्धोदयात् पर्णाभ्यन्तरनीनताम् विजहति । तनुपावनष्टसलिला  पक्तिम् भजन्ति पश्य, उत्पिता केनापि भुवनम् मत्याम् मानीयते इस
शब्दार्थ मेदिनीपृथिवी, उन्मज्जताम् प्रकट होते हुये शैलानाम् शिल- रावत के शिखर से अवरोहति इमानो (नीचे) उतर रही है। पाइपा मुझ कोदयात अपने तनो के दिखलाई पडने से वर्णान्तरमुपतों के भीतर छिपे रहने को विजति छोड़ रहे है तनुभावनष्टसतिला सूक्ष्मता के कारण जिनका जल दृष्टिगत नहीं हो रहा था ऐसी अब आपगा नदियाँ सन्तान विस्तार के कारण व्यक्ति भवन्ति प्रकट हो रही है। पश्य देखिये, उत्क्षिपता के ऊपर को उछालने वाले किसी व्यक्ति के द्वारा भुवनम् पृथिवीलोक को, इस मानोत्पाप्रेर पास, वानीयले जाया जा रहा है। E
जी प्रकट होते हुये पतों के शिकार से मानो (नीचे) उतर रही
है वृक्ष अपने तनों के दिखाई पड़ने से पत्तो के बन्दर अपना छिपा रहना छोड़ रहे हैं। सूक्ष्मता के कारण जिनका जन अब तक दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था ऐसी नदियाँ अब विस्तार के कारण प्रकट हो रही हैं देखिये ऊपर को उछाल-बाले किसी व्यक्ति के द्वारा मानो पृथिवी लोक मेरे पास से आया जा रहा है।
मावा - राजा मातलि से कहता है कि भू-लोक के समीप आ जाने के कारण मानो जब यह पथिवी प्रकट होते हुये तो केमिखर से नीचे उतर रही है और अब वृक्ष के तने दिखाई पड़ने लगे है जिससे ऐसा जात होता है कि जो वृक्ष ब तक पक्ष के भीतर छिपे हुये थे अब बाहर प्रकट हो रहे हैं. दूर से देखने के कारण जिन नदियों का जल जब तक बहुत ही सूक्ष्म दिखलाई पडता था अब पास भा जाने से विस्तार के कारण वे मंदिया स्पष्ट दिखलाई पडने लगी है, देखिये जब ऐसा प्रतीत होता है कि मानो कोई व्यक्ति मानव लोक को उठाकर मेरे पास फेंक कर मेरे पास ने आ रहा है। अर्थात् इस नोट मानव लोक के अति समीप आ गये हैं।
विशेष—इब के द्वारा उत्प्रेक्षालकार पच परण के प्रति अन्य तीन चरण कारण है, ताम्पसकार तथा मे स्वधायोक्ति अलकार है। शाल विति नामक छन्द है।
संस्कृत व्याख्या मेदिनीपृथिवी, उन्मज्जताम् प्रकटी भवताम् ना- नामपवतानाम् मिखरात् = अग्रभागात अवरोहति इन अयोग्यतरतीय पादपायूला स्कन्धानामुदयस्तस्मात स्वन्धोदयात्प्रकाप्राकट्या पर्णानाम् अरे मध्ये तीताम् गुप्ततामवर्णाभ्यन्तरलीनताम्, विजति परि- जन्ति तनुभावेनका श्रीमतया वा नष्टानि तानि अदुश्यानि वा वि लागि जसानि पासा वा अनुभावनष्टला आपणान सन्ताने= विस्तारै व्यक्तिम् प्रकटताम् भजन्ति प्राप्नुवन्ति । पश्यदलोकप, उत्पिता कन्दुकमध्ये प्रापयिता, केनापि कौतुकवता जनेन भुवनम् भूमण्डलम् मत्याश्वेम् मनिकटम् आनीयते प्राप्य इव ।
संस्कृत सरलार्थ — भूमण्डलसमीप मागच्छन् राजा मातनिरुपयति यश्चतु भवान् ददृश्यमानेव पृथिवी प्रकटी भवता पवतानामप्रमामेभ्योऽवतरतीवासयते । वृत्रकाण्डाना प्रकटनाद इमेोदृश्यमाना वृक्षा इदानी स्वपचाभ्यन्तरगुप्तता परित्य जन्ति अर्थात प्राकट्य मायान्तिष्टान्ते दूरादवलोकनात् मानवोऽि तवा सताए दानी म पूजा सत्य प्रकटतामाप्नुवन्ति एवम्भूतेना- मेन प्रकृतिगत परिवर्तनेनैव प्रतीयते यत्केनापि जनेन उप प्रक्षिपता भूलोकोज्य मथुना निकट प्राप्यते ।
टिप्पणी
भले ही कवि के समय वायुयान न चलते हो और कवि ने उनमें बैठकर इस प्रकार का स्वयं अनुभव न प्राप्त किया हो पर इस श्लोक का वर्णन वैसा ही है जैसा
मातलि साधु दृष्टम् (सबहुमानमवलोक्य) अहो उदाररमणीया
पृथ्वी।
राजा मातले । कतमोऽय पूर्वापरसमुद्रावगाढ कनकरसनिस्यन्दी साम्य इव मेघपरिध सानुमानालोक्यते ।
कि वायुयान द्वारा यात्राभ्यासी व्यक्ति वर्णन करता है, वायुयान से आकाश मे पा करते हुये व्यक्ति को यह भूलोक जैसा बिलाई पड़ता है, और फिर धीरे-धीरे उसके नीचे आते समय जैसा जैसा परिवर्तन पहाडो नदियों, वृक्षों आदि मे दिखलाई पडता जाता है कवि ने यहाँ वैसा ही किया है। पान से नीचे आते हुये दुष्यन्त हो पहले पवत शिखर दिखाई दिये तदनु उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो पृथिवी पवत शिखरों से नीचे उतर रही है, उन्मज्जताम ऊपर प्रकट होते हुये समीप आने पर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो अब तक दूर होने के कारण छिपे हुये से दिखाई पढ़ने वाले पवत [अ] प्रकट होने लगे है। मैविनी "मधुमोतीरमेदसैव परि तादेय मेदिनी देवी प्रोच्यते ब्रह्मवादिभि " इस पौराणिक मान्यता के अनुसार विष्णु मधु मल्मो को मारा था और तब उनकी दस से यह पृथिवी मर गई थी, तभी से इनका नाम मेदिनी पड़ गया है. देवी भागवत मे भी मधुकैटभयोर्मेद सयोमा मेदिनी स्मृता धारणाय धरा प्रोक्ता पृथिवी विस्तारयोगत " ऐसा ही माना गया है। पर्णाभ्यन्तरलोनताम अन्य पनतरलीनता भी पाठ है पर अब मे कोई अन्तर नहीं है दूर होने पर वृक्ष अपने पतों से ढके हुने प्रतीत होते थे, पास आने पर उनकी बाद प्रकट होने लगे थे प्रथम पति के प्रम भग दोष को मज्जा पाठ मान कर दूर किया जाता है वहा त्याने + बहुवचन सताने पाठ भेद-सन्तानात त्यथ में पन्नी और एकवचन होने से यह पाठ अधिक उपयुक्त है। तनुमाव नष्ट सलिला मुना भाव सामान्ये नपु सम्तनुभाव दूर से देखने पर नदियों अतिसूक्ष्म दिखाई पडती थी मानो उनल 1 था ही नहीं, पास जाने पर उनमें जल दिखाई पड़ने लगा था। व्यक्ति भजन्ति पूर्ण दिखाई पड़ने लगी थी स्कन्धोदयात वृक्षस्कन्धों के दिललाई पहने सेक का यह बता ही स्वाभाविक है, रेलयात्री या वायुयानमात्री को पूथिवी मुखादिभाषते हुये से दिखलाई पड़ते है। इसीलिये केनापि पिता यह कथन भी मत होता है। पिता उत्+पि+ तीन वचन, उन्मज्जताम् उत्+ षष्ठी बहुवचन व्यक्तिम् वि + अ + क्तिन, नष्ट अद वस्तृत कवि का यह बता ही स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक विषण है यह उनकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति एवं काव्य प्रतिभा का भी परिचायक है।
मातनि आपने ठीक देवा (विशेष आदर के साथ देख कर जो यहू पृथ्वीसी विशाल एवं सुन्दर है।
राजामातनि पूर्व और पश्चिम समुद्री तक फैला हुआ, स्वण रस को

सप्तमो
मातलि - आयुष्मद् एष खलु हेमकूटो नाम पुरुषपर्वतस्तप सिद्धिक्षेत्रम् पश्य-
स्वायमुवान्मरीचे में प्रबभूव प्रजापति । सुरासुरगुरु सोऽत्र सपत्नीकस्तपस्प्रति ॥६॥
= शब्दार्थ स्वायम्भुवाद स्वयम्भू ब्रह्मा स्वायम्भुवाद मरी मरीचि नाम से जो प्रजापति प्रवभूव प्रवास मारीच मा कम उत्पन्न हुये थे। सुरासुरगुरु देवताओं और असुरो के जनक, सह पत्नीक अपनी पत्नी अदिति के साथ अब यस्यति यहाँ तप करते हैं।
फैलाने वाली मेथीदाना अगला के समान यह कौन-सा पत दिखलाई पड रहा है।
मातलि आयुष्मन् यह हेमकूट नामक पुरुष (किका) पवत है और
तपस्या की सिद्धि का (उत्तम) स्थान है देखिये-
स्वायम्ममादितिजन्यवाद मरीचे व प्रजापति प्रभू सुरासुरगुरु स सपत्नीक उपस्थति
अनुवादक के मानस पुत्र मरीचि नामक महर्षि से जो प्रजाखष्टा मारीच या कश्यप नामक महर्षि उत्पन्न हुये देवो और असुरों के जनक वह महर्षि अपनी पत्नी अदिति के साथ तप कर रहे हैं।
भावाथ ब्रह्मा के मानसपुन महर्षि मरीचि मे उनसे प्रजाखष्टा मारीच या कश्यप नामक महर्षि उत्पन्न हुये यह मारीच महदेवासुरों के जनक थे, इनकी अदिति नामक पत्नी से अदितेरपत्यमा आदित्य अर्थात् देवता तथा इनकी दिलि नामक पत्नी से देतेरपत्य अर्थात् उत्पन्न हुये थे इस प्रकार देवासुरजनक मारीच थे, यह इस समय भी अपनी पत्नी अदिति के साथ इस किरण पवत पर तप कर रहे थे।
विशेष—यह अनुष्टुप नामक अष्टत्मिक छन्द है। इसके पारो ही चरणो मे पाचवा व लघु होता है, समपादो मे सप्तमाक्षर लघु होता है और सभी वादों मे गुरु होता है, अन्य के लिये कोई नियम नहीं है। यदि इसके बग के अनतरण हो तथा द्वितीय एवं चतुष पाद ने भ्रमण तथा एक गुरु वर्ण हो तो यही नाम होता है, और यदि इसी छन्द के पय यग के बाद जगण हो न हो तो यही पावस्य नामक छन्द कहलाता है, इनके प्रत्येक पाद मेही होते है ये दोनो भी अनुष्टुप के ही अन्य है।
संस्कृत व्यायामात्मा भवतीति स्वयम्भूतस्यापत्य मानु ] तम्मा स्वायम्भुवात् ब्रह्मणो मानसपुरादित्यम मरीचे एतदाख्यात् देवर्ष प्रजापति प्रजायष्टा मारीच कश्यपो वा प्रवभूव प्रथम जात

राजा तेन हानतिक्रमणीयानि श्रेयास प्रदक्षिणीकृत्य भगवन्त गन्तुमिच्छामि।
मातलि प्रथम कल्प
(नानावती'।)
राजा - (सविस्मयम्) उपोदशम्या न रथाङ्गमय मानि एतावानेव शतक्रतोरायुष्मतश्च विशेष ।
वर्तमान न च दृश्यते रज ।
अभूतलस्पर्शतयाऽनिरुद्धत- स्तवावतीर्णोऽपि रथो न लक्ष्यते ॥ १०॥
सुराणामसुराणाञ्च गुरुजनक सुरासुरगुरपचा सह वतमान पलीक अपरिमये पड़ते तपस्यति तपश्चरति ।
जात देवासुरजनमा सो स्वपल्या अवित्या सह उपम्चरति ।
उदारमा उदारा विशाल पासी रमणीया मनोहरा पृथिवीपृथना विस्तारयोगात् पृथिवी पूर्वी अपर व समुद्रम् अवगाह पूर्वपश्चिम समुद्र तक विस्तृत "प्रागायत महाराज अवगाढा भयत समुद्री पूर्वपश्विमो" महाभारत "पूर्वापरी तोयनिधी वगाहा— कु० स० कि पुरुष पयत भाँ इन्ही छ मे से एक है, इसे किये का निवास स्थान माना जाता है। फिर एक देवयोनि है, इनका शरीर मानव जैसा पर सिरोहे जैसा होता है। ये कुबेर के सेवक माने जात है। कूट स्वर्ण की चोटी वाला यह भी उक्त छ म पवतो मे से एक है जो कि हिमालय के उत्तर में कैलास के समीप माना जाता है। कनकरसनिष्यन्दी- कनकरस्य निष्यत्यस्येत्य मत्वर्थे नि "अनुपिभि इत्यादि से वैकल्पिक होने से निष्यन्द और निस्पन्द दोनों ही शब्द बनते हैं। तपस्यति तप चरति "कममोरोम चेत्यादिना क्याड, प्रत्यये तपस परस्मैपदमिति परस्मैपदम्
राजा तब तो कल्याणमयी चीजो का कर न जाना चाहिये। मै
अगजाद मारीच की प्रदक्षिणा करके ही जाना चाहता हूँ। मातलि यह उत्तम विचार है (दोनों उतरने का अभिनय करते है) राजा (विस्मयपूर्वक) उपोदेति अन्य अस्पतया स्वादगनेमय उपोदान र च
मनम् न दृश्यत । अस्ति तव रथ भवती अनि लक्ष्य
सभ्दाय अस्पतया पृथिवी का स्पा न होने के कारण,

रबाट गमय रथ के पहियों के प्रान्त भागो मे शब्द नहीं किया अर्थात् रम की नैमियो से कोई शब्द नही हुआ। रज च प्रवर्तमान न दुष्यते और पूलि भी हुई नहीं दिखाई पड़ी अनिरुद्ध लगाम न रोकने से तब रथ अवतीर्ण अपि तुम्हारा रथ (भूमि पर उतरा हुआ भी न लक्ष्यते बैसा प्रतीत नहीं होता।
अनुवाद पृथिवी का स्पष्ट न होने के कारण एम के पहियों के प्रान्त भयो से कोई शब्द नहीं हुआ और न धूलि ही उड़ती हुई दिवलाई गढ़ी लगाम न रोकने के कारण तुम्हारा र उतरा हुआ भी उतरा हुआ सा नहीं प्रतीत होता है।
भावार्थ राजा कहता है कि तुम्हारा र अब भूमि पर उतर आया है तथापि रम के घोड़ी की लगाम न रोकने के कारण यह उतरा हुआ सा प्रतीत नही होता, क्योंकि रथ के उतरने पर लगाम का रोकना आवश्यक होता है। आपका र पृथिवी का पण नहीं कर रहा है अतएव रच पक्षी की नेमियों से शब्द भी नहीं हो रहे है, जब कि पृथिवी पर चलते हुये रम की नेमियों से शब्द अवश्य होता है। इसी प्रकार र के बनने पर मूर्ति भी उड़ती है, पर आप के रथ से भी उड़ती नही दिखाई पती सामान्य एम की अपेक्षा देवरण में यही विशेषता होती है।
विशेष—यहाँ पर रथावतरण रूप कारण के होने पर भी आदि कार्यों की अनुत्पत्ति है, अत विक्ति अलकार, रचावतरण के न जानने के प्रति पूर्व क्या कारण है अत काम्यलिङ्ग अलकार अवतीय अपि न यह विरोधाभास अलकार है। श्रुति अनुमास और शस्य नामक छन्द है।
संस्कृत व्याख्यानास्ति मूल पृथिवीपृष्ठे पण यस्य तस्य भाव तया अस्पता पृथिवीतल स्पर्धाभावाद, रागान प्रान्त आगारबाट गमय उपोदा घृता मारावा शब्द परपरेतिध्वनय स्ते- उपोडशन्दाकृतपरपरेतिध्वनय न सन्ति रणधूलिश्व प्रवतमानम् = उदछन दृश्यते भावलोक्यते। अनिनिरोधाद, तब रथ त्वदीय रमोज्यम् अवतीय अपि हेमकूटभूतसमागतोऽपि न लक्ष्यते विज्ञायते । B =
संस्कृत सरलार्थ हेमकूटभूतसमागत मातलिरच मवलोक्य राजा पति- पद्यपि तचाय र हेमकूटी स्थाप्य रथाश्वप्रग्रहाणामनिरोधादवतीर्ण वाचान्तभाग अपि शब्दायमाना न सन्ति विश्वापि रथाश्व नरप्यते ।
मातलि— इन्द्र के और आपके रथ मे इतना हो अवर है। आपके जगतीग येर में उक्त तीनो बातें देखी जाती है पर इजर से नहीं।
अनतिक्रमणीयानि पानियोकि प्रतिबध्नाति हि श्रेय पूज्यपूजाव्यतिक्रम रघुवास से यहाँ तात्पयनिग्रहानुसमय ऋषि से है। प्रथम कल्प-प्रथम

सन्दष्टसपत्वचा, मातलि - (हस्तेन व कार्धनिमग्नमूर्तिरुरसा कण्डे जीर्णलताप्रतानवलयेनात्य सपीति । असव्यापि शकुन्तनीदनिचित विवज्जटामण्डल यत्र स्थाणुरिवाचलो मुनिरसावम्यकंविम्ब स्थित १११||
राजा-मातले, कतमस्मिन् प्रवेशे मारीचाधम २
= पत्नीकेति अन्ययमीका निम्नमूर्ति सन्दष्टपत्वचा उरसा (उपलक्षित) जीताप्रतानचनयेत अत्यसपीडित असम्मापि निचितम् जटा मण्डलम् विद् स्थागु व अचल असो गुनि यत्र अकविम्वम् अभि स्थित (तथैव मारीचायम बतते ।
का अर्थ उत्तम है. घेष्ठविचार उपोड उप यह कर्मणि । अनिरुद्धत अनिरोधात् निरोध रोकता, अनिरोधन रोकना अत्र ती पञ्चमी ।
राजामातलि किस स्थान पर मारी का आम है।
मातलिदान से दिलाता हुआ)
दात्मानमन्यमूर्ति जिसका आधा शरीर बसी मा बाँदी मे दुआ हुआ या दला हुआ है नीटियों द्वारा बनाया गया एक प्रकार का मिट्टी का ] मी या बाँब कहलाता है, पुराना हो जाने पर इस बावी मे प्राय सप रहने लगते है, तपस्या में निरंतर ध्यानावस्थित रहने के कारण चीटियो ने इनके चारो ओर यह मिट्टी का टीला खडा कर दिया था, जिसमे इनका आधा गरीब गया था। सन्दष्टसपत्यथा उरसा सपत्यकाको केसी, सन्दष्ट लिपटी हुई अर्थात् चुलियों से लपटे हुये बक्षस्थल उपलक्षित जीनता प्रतानवनयेन पुरानी ताओ के सतुओ या रेशों के वर्तुलाकार वेष्टन से, कठेले पर अत्ययपीडित अत्यधिक पीडित, असा पर फैले हुये कुतनीनिचितम्प के घोल से भरे हुये समूह को विधारण किये हुये स्माइल की तरह निश्चल भो मुनि मुनि, यहाँ antaraम् अधिमण्डल की ओर होकर स्थित स्थित है (वही मारीच का आश्रम है) । = =
अनुवाद जिनका आधा शरीर उल्मीक में दबा हुआ है, और जो केचुली लपटे हुये स्थान से उपलक्षित है (तथा) पुराने लता तन्तुओं के साकार वेष्टन से जो पर अधिक पीडित हो रहे है. (एवम्) कन्धों पर फैले हुये पक्षियों के से भरे हुये जटासमूह को धारण करते हुये छूठ के समान निपल यह मुद्रि जहा पर मण्डल की ओर बलि होकर बैठे है (नही मारीच का आयम है)/ भावाथ तपस्यानिरत मुनि को हाथ से दिलाता हुआ मातलि कहता है, राजन दो जिस स्थान पर यह मुनि स्थाणु के समान निश्चल होकर सूर्यमण्डल की


ओर मुँह किये हुये बैठे है वहा ही मारीचाथम है, आगे मातलि राजा के तपोनिरत मुनिका वगन करता हुआ कहता है कि इन मुनि का आधा शरीर तो वल्मीक मे बना हुआ है, और इनके वक्ष स्थल पर सर्पों की केचुली ही हुई है। इनके कण्ठ के चारो और पुराने नतान्तु सपटे हुये हैं जिससे अत्यधिक हो रहे हैं, इनके पर जाये फैनी हुई है, जिनमें पक्षियों ने अपने पोस बना लिये है। मुनि के इस प्रकार के मोर तप में उनका दोषकाल तक तप करना सूचित होता है। सन्दष्टेत्यादि पद से मुनि का सब जो पर भाव प्रकट होता है तथा पद पद उनका अपकारी के प्रति भी उपकारी होना घोषित करता है।
विशेष- यहाँ सभी विशेषण ने प्रिय होने से परिकर उनका तथा रसा आदि दो के टि होने से सेव तथा अनुप्रास बनकार है, त विशोषित छन्द है।
संस्कृत व्यायामीपनिर्मितमृत्तिका निमग्नानिविष्टा मूर्ति शरीरस्य वत्मीकाधनममूर्ति सदा सजगता सत्य निर्मोक यस्मिन् तेन सन्दष्टत्वा उरसा वक्षस्वजेन (उपलक्षित) जीर्णानाम् परिण नाम जताना वल्लीनाम् प्रताम कुटिलतन्तु स एव वलय वेष्टन तेन जीगलता- प्रतानवसमैन, कण्ठे कण्ठस्थले अत्यय सपदित अतिशयेन क्लेम प्राप्ति, असी स्वागत- असव्यापि काव्याप्तम् कुल्ताना पक्षिणा नी कुलाये निचित व्याप्तमन्तनीनिचितम् जटामण्डलम् जटासगृहम् विद् काण्ड, अचल निश्चल अशी मुनि ऋषि पत्र पस्मिन् स्थाने, अकविम्बम् सूर्यमण्डनम् अभिलक्ष्यीकृत्य स्थित तिष्ठति (तव मावाचन अस्ति ।
संस्कृत सरलाय मारीचाधम निर्दिशन् मातलि कथयति राजन् यच अस निवारिवाचनभूषा सूमण्डलीकृत्य तिष्ठति स एवास्ति मारीचाथम, तपोनित्तस्यास्य मुनेरशरीरस्मो निष्टि मस्ति पक्ष स्वलेऽस्य सत्यच साना पिता सन्तुष्टामुनि कण्ठस्य प्राप्तोऽस्ति व्याप्त पक्षिनीयाप्त चाय कटामण्डल धारयन्नस्ति ।
एतावान इतना ही, जिस प्रकार देवता पृथ्वी का नहीं करते इसी प्रकार इन्द्र का भी पृथिवी ना नहीं करता था वल्मीकेति इस श्लोक से जिस मुनि का  है वस्तुत यह मारीच मुनि न होकर कोई अन्य तपस्वी है, क्योंकि मारीय का जाने का वार्तालाप उन्हें समाधियोगी सिद्ध नहीं करता। अभ्यfreeवम अभि अत्र 'अभिरभागे' इत्यनेन कमप्रवचनीयत्वेन द्वितीया avar अभ्यकविम्वमित्येक पदम् नाभिप्रतीत्यादिना अन्ययीभावसमास । उपलक्षणे तृतीयासम् दश विद् = वि+भु+मतू । कोई आभाय स्वाणु पद का शिव अथ लेकर उसके साथ भी इन

राजा नमस्ते कष्टतपसे ।
मातलि (तप्रग्रह रथ कृत्या) एतावदितिपरिवतिमन्दारवृक्ष प्रजापतेरायम प्रविष्टी स्व
राजा स्वर्गादधिकतर निर्वृतिस्थानम् अमृतवमियावगाढोऽस्मि ।
मातलि (रच स्थापयित्वा ) अवतरत्वायुष्मान् ।
राजा - (अवतीर्य) मातले भवान् कथमिदानीम् । मातलि सयन्त्रितो मया रम पमप्यक्तराम (तथा कृत्वा)
इत आयुष्मन् (परिक्रम्प) ययन्तामत्रभवतामृषीणा तपोवनभूमय । राजा विस्मयादवलोकयामि ।
नामनिलेन वृत्तिरुचिता सत्कल्पवृधे बने, तोये काचनपद्मरेणुकपि धर्माभिषेकक्रिया | ध्यान रत्नशिलातलेषु विबुधस्त्रीसनियौ समो
सभी विशेषण को लगाते हैं। स्थाणु- मूलप्रकाण्ड के अर्थ मे भी के सब विशेषण ये जा सकते है, क्योकि राजा आदि पद यहाँ है। यहाँ मलकार ही है समाधिस्य योगी का विशद वर्णन है जो कि कवि की वगना- शक्ति का परिचायक है।
राजा कठोर तप करने वाले ( मुनि) को प्रणाम है।
मातलि ( रथ की लगाम खीच कर ) यहाँ पर अदिति द्वारा संबंधित मन्दार वृक्ष याने प्रजापति गारीच के आश्रम में हम दोनों प्रविष्ट हो गये हैं।
राजा यह स्वर्ग से भी अधिक शान्तिप्रद स्थान है। यहाँ पर मैं मानो समूह
सरोवर में निमग्न हो गया हूँ। माल ( रथ को रोककर ) आप उतरिये।
राजा - ( उतर कर मावि, अब आप कहाँ क्या करेंगे?
मार को भी भाँति रोक लिया है में भी उतरता है. वैसा ही करके आप इधर से आवे (मकर) आप माननीय ऋषियों की तपोभूमियो का दशन करें।
राजा पस्तुत से देख रहा हूँ।
प्राणानामितिअन्वय-कल्प बने अमिन प्राणानाम् पुति भिता । कापरे तोये धर्माभिषेकक्रिया रानातलेषु ध्यानम् विबुधस्त्री- समन्यय तपोभिपद् कान्ति तस्मिन् अभी तपस्यन्ति । शब्दाच सत्कल्पमुझे बने विद्यमान का वृक्ष वाले वन मे, अनिलेन नेद्वारा प्राणानां वृत्तिजीवन धारण की क्रिया, उचिता अभ्यस्त की जानी है परेशे तो स्वर्ण कमलों के पराय से पीतवर्ण जय

धर्माभिषेक क्रियामय स्थान विधि की जाती है। रत्नशिलातलेषु रत्नो के पर ध्यान ईश्वर-चिन्तन किया जाता है। विवुधरणीसनिधी देवा गाओ के समीप मे समद्रियनिग्रह किया जाता है। अन्य मुनय अन्य मुनियन, उपोभितपस्याओं के द्वारा यत् कान्तिजिन वस्तुओं की आकाशा करते हैं, तस्मिन् उन सभी पदार्थों के भोग से युक्त स्थान पर ममीये मुनिजन, तस्यन्ति तपस्या करते हैं।
अनुवाद - विद्यमान कल्प वृक्षो वाले वन में (भी) (वन) वायुभक्षण के द्वारा जीवन धारण को किया अभ्यस्त की जाती है. वायुभक्षण कर जीते रहने का अभ्यास किया जाता है। स्वर्ण-कमलो के पराम से पीतवर्ण जल मे (वन) धर्मा स्नान विधि की जाती है। लो के शिलातली पर ईश्वर ध्यान किया जाता है, देवा गनाओ के सानिध्य मे इन्द्रियनिग्रह किया जाता है। अन्य मुनि लोग तपस्याओ के द्वारा जिन पदार्थो की आकाक्षा करते हैं मे मुनिजन इन पदार्थों के भोग से युक्त स्वत मे (भी) तप करते हैं।
भावार्थ राजा कहता है कि ऐसे बाथमो मे पहुँच कर दी और तपस्याओ द्वारा अन्य मुनिजन जिन पदार्थों की शाप्ति के लिये कष्ट उठाते है. यहाँ के वे जिन उन सभी पदार्थों के भोगो को प्राप्त करके भी उनकी उपेक्षा कर पोर प मे रहते हैं सीलिये यद्यपि इस आधम में इच्छानुसार सभी पदार्थों को देने मा विद्यमान है, तथापि यहाँ के मुनिजन उनसे स्वादिष्ट भोज्य पदाच न लेकर केवल वायु चक्षण द्वारा ही अपने प्राणो को धारण करने का अभ्यास करते है। यद्यपि यहाँ के सरोवरो का जन स्वर्ण कमलों के पराग से पीतव एवं सुगन्धित है तथापि ये मुनिवन जनने जल विहार न करके केवल धर्म कियाओं को साधना के के लिये उनमें स्नान मात्र करते हैं। यद्यपि यहाँ रत्न मिलायें हैं तथापि ये मुनिजन उन पर सुरसुन्दरियो के साथ जनन करके उन पर केवल ध्यान करते हैं, यद्यपि यहाँ अनेक अप्सरायें रहती है तथापि ये मुनिजन उनके सम्पर्क में रह कर भी इन्द्रिय निग्रह का अभ्यास करते हैं। यहाँ के मुनिजनो की यही दिन है, जिसका एक उदाहरण वल्मीकेत्यादि श्लोक में दिया जा चुका है।
विशेष—यहाँ कल्पवयादि कारणों के रहते हुये भी उनसे तदनुकूल कार्योत्पति नही होती अपितु तद्विरुद्ध अनिनादि से प्राण धारणादि किया जाता है म उतनिमिता माना विशेषोक्ति अन कार है। इस कपन से अगत्य तपस्वियों का ध्यातिशयव्यति होता है अत अलकार से वस्तुवनि है। चतुरता के प्रति पूर चरणयत वायाच हेतु हैं अत वाक्यrय हेतु कालिङ्ग अलकार है। अन्य मुनियों को अपेक्षा अगत्य मुनियों में आधिक्य बतलाया गया है अत व्यतिरेक सकार है मूर्ति ति मनुप्रास, मुन्यावलम्वना रति भाव तथा विति छन्द है।
= मस्त विद्यमाना त्पवृक्षा एव नामका देवतरवो य तस्मिन् सत्कल्पवृक्षे बने बनाओमे अनिवायुभक्षन एवं केवलम् प्राणानाम् अतिजीवनधारण किया उचिताभ्यस्ता] [भवति । काञ्चनपश्चानाम्- रेणुभिराप पिलवणं, तो जले धर्माम अभिया स्नानविधिप्रमाभिषेकजिया (कियते) ग्लाना मणीनाम् शिलातलेषु शिलापट्टषु- रात ध्यानम ईश्वरचिन्तनम् (a) दुधानाम देवानाम रिय पस्य ताता सनिधौ समीपे विवस्त्रीसनिधी संयम इंद्रियनिग्रह (ि अयमुनयतपस्वि तपोभितपस्यामि यत् कल्पवृक्षादिवस्तु जातम, कातिभित्तिस्मिन्ाभोम्पदामा स्थाने, अभी अत्या मुनय तपस्यति तपश्चरति ।
मातलि उत्सर्पिणी खलु महता प्रार्थना (परिक्रम्य । आकाशे) अये वृद्धशाकल्य, किमनुतिष्ठति भगवान मारीच कि ब्रवीषि ? दाक्षायण्णा पतिताधर्ममधिकृत्य पृष्टस्तस्यै महषिपत्नीसहितायं कथयतीति । राजा कर्ण दस्ता अये प्रतिपाल्यावर खलु प्रस्ताव |
संस्कृत सरलाय राजा रुपयति अन्य मुनयस्तपोभिजित भ इसे मुनयस्ता समभानाचे परिमाश्रमे तपश्चरति । अत एवं इसे न केवल वा स्वप्राणधारणवृति [सम्पादयत स्वर्णमपरागत सुवासि च जसे केवल धर्मार्थस्नान किया कि, रत्नमितान एयनिमिते सुरा नासाभिध्ये निवसरि रयते मुनिभिरपि निकले।
निर्वास स्थानम गुल और शान्ति का स्थान भवान कथमिदानीम् अब कहा नया करेंगे। उचिता- इसका अर्थ कुछ कारण भी किया है। गयम समय अध्यानमवियामध्यायु तपस्यन्ति पलक में प्रयुक्त प्राणानामित्यादि पदों से मुक्ति की प्ता, निरीहता न हटा, जितेन्द्रियता नि स गता आदि योतित होती है।
मातलि महात्माओं की इच्छा सदा गामिनी होती है (अर्थात् लाभ से ही दुष्ट होकर नहीं बैठे रहते अपितु सदा उत्तमोतम पदार्थ और स्नान प्राप्ति के लिये बने रा है (चारो और काश मे) कहिये, वृद्धशाकल्य दस समय भगवान् मारीच क्या कर रहे है? क्या कहा? दाक्षायणी (अदिति) ने जो पतिव्रता धमके सम्बन्ध में उसने पूछा था, महर्षि लियो के साथ स्थित उनको विषयक उपदेश दे रहे है।
राजा - (कान लगाकर अर्थात् सुनकर अब तो यह पतिव्रता धर्मोपदेश) ऐसा है कि हमें अवसर की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी जब तक यह उपदेश समाप्त नहा होता तब तक हमे उनके दहन के अवसर के लिये प्रतीक्षा करनी होगी।
मान् यावस्वामित्रागुरवे निवेदयितुमन्तरान्वेषी भवामि। राजा यथा भवान् मन्यते ।
( इति स्थित 1)
मातलि – ( राजानमवलोक्य) अस्मितशोकसमूले तावदास्तामा- मातलि - (आयुष्मद, साथयाम्यहम् ।
राजा - (निमित्त सूचयित्वा ।) मनोरथाय नाशसे कि वाही स्पन्दसे बुधा ।
पूर्वावधीरित श्रेयो दुख हि परिवर्तते ॥ १३ ॥
( इति निष्क्रान्त 1)
मातलि (राजा की ओर देखकर) तक इस अशोक वृक्ष के नीचे बैठिये जब तक में इन्द्र के जनक भगवान मारीन को आपके आगमन की सूचना देने के लिये उचित अवसर प्राप्त कहे।
राजा उचित समझे यह कहकर बैठ जाता है)
मैं जा रहा है (यह कहकर प्रस्थान ) राजा - (शुभ शकुन का अभिनय करके) --
मनोरथायेति अम्ब मनोरसायन आणते, हे वाही, बुचा किरद
पूर्वावधीरितम् परिवर्तते ।
शब्दार्थ मनोरचा शत्रुता प्राप्ति रूप अपनी अभिलाषा के लिये तो न आपसे आशा ही नहीं करता है वह मेरी दाहिनी भुला था कि स्पन्द तब तू साथ ही वो रही है कि पूर्ववरित श्रेय यह कल्याण (कल्याणकारक वस्तु) जिसका पहले तिरस्कार कर दिया गया है, इस परियतते दुःख रूप में ही परिवर्तित होती है अर्थात् बढी कठिनाई से पुन प्राप्त होती है।
अनुवाद प्राप्ति रूप अपनी अभिलाषा के लिये तो मैं आणा ही नहीं करता है बाहू तब तू व्यथ ही क्यों फडक रहा है, क्योकि जिस कल्याणकर वस्तू का पहले तिरस्कार कर दिया जाता है वह फिर हुआ रूप ने ही परिवर्तित होती ही कठिनाई से ही प्राप्त होती है।
भावाथ अपनी दक्षिण भुजा का फटका, जो कि सुन्दर स्त्री की प्राप्ति का सूचक होता है, देख कर राजा अपने मन मे कहता है कि अपनी उत्कट अभिलाषा तो की प्राप्ति ही है, पर अब में उसकी तो आशा ही नहीं करता तो फिर इसका फड़कना मेरे लिये व्यय हो है क्योंकि जब कल्याणमयी कुन्तता मेरे पास आई तब तो मैंने उसका परिश्याग कर दिया था और अब इस अकारण परित्याग
के फलस्वरूप उसकी पुन प्राप्ति दुसाध्य ही है। विशेष-पूर्वाध मे मनीराम प्रयोग से कुता का विषय के निगरण
(नेपथ्ये)
मा खलु चापल कुरु कब गत एवात्मन प्रकृतिम् ? [मान चावल करेहि कह गयो एव अतणो पकिदि राजा - (कर्ण दत्त्वा अभूमिरियमविनयस्य को न सत्वेव
से यहाँ अतिशयोक्ति अलकार है। उत्तराध में सामान्य से विशेष समर्थन रूप अर्था
न्तरन्यास अनकार है। नृत्यनुप्रास पध्याय नामक छन्द है। संस्कृत व्याया मनोरयायमंदिच्छाविषयीभूताय तलासमागमाय न आभाव हे नाही मोदक्षिणा मुधा, किससे
किमर्थं स्फुरसिहत पूर्वावधीरितम् प्रथम तिरस्कृतम्, कल्याणकर
वस्तु दुख परियमेव परिणमति ।
रात्रीलायक स्वदक्षिणजस्पन्दनमवदत्य राजा मनसि चिन्तयति किमनेन भासिमा दक्षिणजस्पन्दनेन ममाभितापाविषयीभूताया शकुन्त लाया शप्तस्तु यतोहि मया सा कल्याणमयी पूर्व तिरस्कृता कल्याणकरस्य वस्तुनोऽकारणपरित्यागेन दुःख मेवानुभूयते ।
टिप्पणी
उत्तणीयगामिनी दूराधिरोहिणी उत्तरोत्तर से ही चढ़ने बाली, उत् + सपाच्छील्ये मिनि मृद्धशाकल्य ऋग्वेद की गाय शाला का अध्येता मारीच का सेवक यह कोई ऋषि था। आकाशे अर्थात् मात के द्वारा यह वार्तालाप होता है, इसमें कोई एक ही व्यक्ति किसी व्यक्ति विशेष को सम्बोधित कर स्वयं ही प्रश्नोत्तर करता है अन्य व्यक्ति नहीं रहता, नाटको का यह एक परिभाषिक शब्द है दक्षायणी दशपुत्री अदिति महर्षि ऋषियों की क्रमश उपत में सात यों होती है— कृषि महर्षि परमर्षि, देवर्षि, ब्रह्मपि काण्ड और प्रदानमितम् शुभशकून "वामेतरस्पन्दो "प्रस्तावप्रसग प्रतिपाल्यावर ऐसा अवसर जिसके लिये प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अशोक अशोक वृक्ष के नीचे इसलिये बैठाया गया था कि शकुन्तला की प्राप्ति उसका भी शोक दूर हो सके अन्तरान्वेषी जन्तरम् अवचरम अदितीति मनोरथाय मनोरथ विषयीभूतार्य शकुन्तला अत्र कापपदस्येति चतुर्थी पूर्वाधर तिरस्कृतपूर्व कल्याणम् दुख परिवर्त तिरस्कृत कल्याण केवल रूप से ही लौटता है, दुख ने ही मिलता है। वरस्त्री सासूचक
(से)
बलता मत करो, नयो, यह तो अपने स्वभाव पर ही जा गया है। राजा - (कान लगाकर यह स्थान तो अभिनय (उदण्डता) के योग्य नहीं है तो फिर किसके द्वारा कौन मना किया जा रहा है (आवाज की ओर देखकर)

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लेखाः
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
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अभिज्ञानशकुन्तलम् इति महाकविकालिदासस्य विश्वप्रसिद्धं नाटकं प्रायः सर्वासु विदेशीयभाषासु अनुवादितम् अस्ति । इयं राजा दुष्यन्त-शकुन्तलायोः प्रेम-विवाह-विरह-वियोग-पुनर्मिलनयोः सुन्दर-कथा अस्ति ।
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अभिज्ञान शाकुन्तलम् |

7 October 2023
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आज से लगभग तेरह सौ वर्ष पूर्व 'काव्यादर्श'- प्रणता आचार्य दण्डी ने कहा था - "संस्कृत नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभि" भारत की धर्मप्राण जनता आज के वैज्ञानिक युग मे भी संस्कृत को देववाणी कहने में किस

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अभिज्ञानशकुन्तलम्-2

16 October 2023
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अनसूया (सविस्मयम्) कथमिव ।[कह विज ।] प्रिया - ( सस्कृतमाधिस्थ) दुष्यन्तेनाहित तेजोबधना भूतये भुव । अहि तनया ब्रह्मग्निगर्भा शमीमय ॥४॥ शकुन्तला बाहुति और दुष्यन्त अग्नि के प्रतीक है अथवा शकुन्तला की

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अभिज्ञान शाकुन्तलम्-3

23 October 2023
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सप्तमा निषिध्यते ? (शब्दानुसारेणावलोक्य) (सविस्मयम्) अये को नु सल्बयमनु- वध्यमानस्तपस्विनीम्पामवालसस्वो बाल ? अर्धपीतस्तन मातुरामदक्लिष्टष्ठेसरम् । बलात्कारेण कर्षति ॥ १४ ॥  (विस्मय के साथ) अरे, दो

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अभिज्ञानशकुन्तलम्-2

6 November 2023
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पुस्तकं पठतु